द्रोण पर्व · अध्याय 115
सात्यकि द्वारा जलसन्ध का वध
संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि कृतवर्मा को हराकर और उसकी सेना को बिखेरकर सात्यकि सामने खड़े त्रिगर्तों की ओर बढ़ते हैं। मगध के राजा जलसन्ध हाथियों की सेना लेकर उन पर चढ़ आते हैं; सात्यकि हाथियों को तोड़ देते हैं, जलसन्ध की भुजाएँ और सिर काट देते हैं और उसके शरीर को हाथी से गिरा देते हैं। कौरव सेना घबराकर भागने लगती है, तब पाण्डवों को रोकने का भार कृतवर्मा को सौंपकर द्रोण कुरुवीरों के साथ सात्यकि पर चढ़ आते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.115.1)
शृणुष्वैकमना राजन्यन्मां त्वं परिपृच्छसि । द्राव्यमाणे बले तस्मिन्हार्दिक्येन महात्मना ॥
śṛṇuṣvaikamanā rājanyanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | drāvyamāṇe bale tasminhārdikyena mahātmanā
हे राजन्, आप मुझसे जो पूछ रहे हैं, उसे एकाग्र मन से सुनिए — जब हृदीक के महात्मा पुत्र कृतवर्मा द्वारा वह सेना खदेड़ी जा रही थी,
श्लोक 2 (7.115.2)
लज्जयावनते चापि परिहृष्टे च तावके । द्वीपो य आसीत्पाण्डूनामगाधे गाधमिच्छताम् ॥
lajjayāvanate cāpi parihṛṣṭe ca tāvake | dvīpo ya āsītpāṇḍūnāmagādhe gādhamicchatām
जब वह सेना लज्जा से सिर झुकाए थी और आपके अपने योद्धा हर्ष से भरे थे, तब अथाह जल में थाह चाहने वालों के लिए ठौर बने हुए, पाण्डवों के उस द्वीप ने —
श्लोक 3 (7.115.3)
श्रुत्वा स निनदं भीमं तावकानां महाहवे । शैनेयस्त्वरितो राजन्कृतवर्माणमभ्ययात् ॥
śrutvā sa ninadaṃ bhīmaṃ tāvakānāṃ mahāhave | śaineyastvarito rājankṛtavarmāṇamabhyayāt
उस महासंग्राम में आपके योद्धाओं की भयंकर गर्जना सुनकर शैनेय (सात्यकि) शीघ्रता से, हे राजन्, कृतवर्मा की ओर बढ़े।
श्लोक 4 (7.115.4)
उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वितः । हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम् ॥
uvāca sārathiṃ tatra krodhāmarṣasamanvitaḥ | hārdikyābhimukhaṃ sūta kuru me rathamuttamam
क्रोध और असहनशीलता से भरे हुए उन्होंने वहाँ अपने सारथि से कहा — "सूत, मेरा उत्तम रथ हार्दिक्य की ओर मोड़ दो।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 5 (7.115.5)
कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये ह्यमर्षितः । एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति ॥
kurute kadanaṃ paśya pāṇḍusainye hyamarṣitaḥ | enaṃ jitvā punaḥ sūta yāsyāmi vijayaṃ prati
देखो, वह क्रुद्ध होकर पाण्डव-सेना का संहार कर रहा है। सूत, इसे जीतकर मैं फिर विजय की ओर बढ़ूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (7.115.6)
एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते । निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणमभ्ययात् ॥
evamukte tu vacane sūtastasya mahāmate | nimeṣāntaramātreṇa kṛtavarmāṇamabhyayāt
हे बुद्धिमान राजन्, ऐसा कहे जाने पर उसके सारथि ने पलक झपकने भर में उन्हें कृतवर्मा के सामने पहुँचा दिया।
श्लोक 7 (7.115.7)
कृतवर्मा तु हार्दिक्यः शैनेयं निशितैः शरैः । अवाकिरत्सुसंक्रुद्धस्ततोऽक्रुद्ध्यत्स सात्यकिः ॥
kṛtavarmā tu hārdikyaḥ śaineyaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | avākiratsusaṃkruddhastato'kruddhyatsa sātyakiḥ
हृदीक-पुत्र कृतवर्मा ने अत्यन्त क्रोध में शैनेय को तीखे बाणों से ढक दिया; इस पर सात्यकि भी क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 8 (7.115.8)
अथाशु निशितं भल्लं शैनेयः कृतवर्मणः । प्रेषयामास समरे शरांश्च चतुरोऽपरान् ॥
athāśu niśitaṃ bhallaṃ śaineyaḥ kṛtavarmaṇaḥ | preṣayāmāsa samare śarāṃśca caturo'parān
तब शैनेय ने युद्ध में शीघ्र ही कृतवर्मा की ओर एक तीखा भल्ल और चार अन्य बाण भेजे।
श्लोक 9 (7.115.9)
ते तस्य जघ्निरे वाहान्भल्लेनास्याच्छिनद्धनुः । पृष्ठरक्षं तथा सूतमविध्यन्निशितैः शरैः ॥
te tasya jaghnire vāhānbhallenāsyācchinaddhanuḥ | pṛṣṭharakṣaṃ tathā sūtamavidhyanniśitaiḥ śaraiḥ
उन चार बाणों से उसने कृतवर्मा के घोड़े मार डाले, भल्ल से उसका धनुष काट दिया, और तीखे बाणों से उसके पृष्ठरक्षक तथा सारथि को बींध डाला।
श्लोक 10 (7.115.10)
ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः । सेनामस्यार्दयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
tatastaṃ virathaṃ kṛtvā sātyakiḥ satyavikramaḥ | senāmasyārdayāmāsa śaraiḥ sannataparvabhiḥ
इस प्रकार उसे रथहीन करके सत्यपराक्रमी सात्यकि सीधी गाँठों वाले बाणों से उसकी सेना को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 11 (7.115.11)
अभज्यताथ पृतना शैनेयशरपीडिता । पलायनकृतोत्साहा भ्रमन्ती तत्रतत्र ह । ततः प्रायात्स त्वरितः सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥
abhajyatātha pṛtanā śaineyaśarapīḍitā | palāyanakṛtotsāhā bhramantī tatratatra ha | tataḥ prāyātsa tvaritaḥ sātyakiḥ satyavikramaḥ
शैनेय के बाणों से पीड़ित वह सेना टूट गई — भागने को उत्साहित, इधर-उधर चक्कर काटती हुई। तब सत्यपराक्रमी सात्यकि शीघ्रता से आगे बढ़े।
श्लोक 12 (7.115.12)
शृणु राजन्यदकरोत्तव सैन्येषु वीर्यवान् । अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम् ॥
śṛṇu rājanyadakarottava sainyeṣu vīryavān | atītya sa mahārāja droṇānīkamahārṇavam
हे राजन्, सुनिए कि उस पराक्रमी ने आपकी सेना में क्या किया। हे महाराज, द्रोण की सेना के उस महासागर को पार करके,
श्लोक 13 (7.115.13)
पराजित्य तु संहृष्टः कृतवर्माणमाहवे । यन्तारमब्रवीच्छूरः शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम् ॥
parājitya tu saṃhṛṣṭaḥ kṛtavarmāṇamāhave | yantāramabravīcchūraḥ śanairyāhītyasambhramam
और युद्ध में कृतवर्मा को हराकर प्रसन्न हुए उस वीर ने अपने सारथि से कहा — "धीरे चलो, घबराओ मत।"
श्लोक 14 (7.115.14)
दृष्ट्वा तु तव तत्सैन्यं रथाश्वद्विपसङ्कुलम् । पदातिजनसम्पूर्णमब्रवीत्सारथिं पुनः ॥
dṛṣṭvā tu tava tatsainyaṃ rathāśvadvipasaṅkulam | padātijanasampūrṇamabravītsārathiṃ punaḥ
रथों, घोड़ों और हाथियों से भरी तथा पैदल सैनिकों से परिपूर्ण आपकी उस सेना को देखकर उन्होंने सारथि से फिर कहा —
सात्यकिरुवाच
श्लोक 15 (7.115.15)
यदेतन्मेघसङ्काशं द्रोणानीकस्य सव्यतः । सुमहत्कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ॥
yadetanmeghasaṅkāśaṃ droṇānīkasya savyataḥ | sumahatkuñjarānīkaṃ yasya rukmaratho mukham
"द्रोण की सेना के बायें भाग में जो मेघ-सी यह विशाल गजसेना दिखती है, जिसके आगे सुनहरे रथ वाला वीर है —
श्लोक 16 (7.115.16)
एते हि बहवः सूत दुर्निवार्याश्च संयुगे । दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥
ete hi bahavaḥ sūta durnivāryāśca saṃyuge | duryodhanasamādiṣṭā madarthe tyaktajīvitāḥ
सूत, ये बहुत हैं और युद्ध में इन्हें रोकना कठिन है; दुर्योधन के भेजे हुए ये मेरे कारण प्राण त्यागने को तैयार खड़े हैं —
श्लोक 17 (7.115.17)
राजपुत्रा महेष्वासाः सर्वे विक्रान्तयोधिनः । न चाजित्वा रणे ह्येताञ्शक्यः प्राप्तुं जयद्रथः ॥
rājaputrā maheṣvāsāḥ sarve vikrāntayodhinaḥ | na cājitvā raṇe hyetāñśakyaḥ prāptuṃ jayadrathaḥ
ये सब राजकुमार महाधनुर्धर और पराक्रमी योद्धा हैं। इन्हें रणभूमि में जीते बिना जयद्रथ तक पहुँचा नहीं जा सकता।
श्लोक 18 (7.115.18)
नापि सूत मया पार्थः शक्यः प्राप्तुं कथञ्चन । एते तिष्ठन्ति सहिताः सर्वविद्यासु निष्ठिताः ॥
nāpi sūta mayā pārthaḥ śakyaḥ prāptuṃ kathañcana | ete tiṣṭhanti sahitāḥ sarvavidyāsu niṣṭhitāḥ
सूत, इनके रहते मैं किसी भी तरह पार्थ तक नहीं पहुँच सकता। ये सब मिलकर डटे हैं और सभी विद्याओं में निपुण हैं।
श्लोक 19 (7.115.19)
त्रिगर्तानां रथोदाराः सुवर्णविकृतध्वजाः । मामेवाभिमुखा वीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिताः ॥
trigartānāṃ rathodārāḥ suvarṇavikṛtadhvajāḥ | māmevābhimukhā vīrā yotsyamānā vyavasthitāḥ
सुनहरे ध्वजों वाले त्रिगर्तों के श्रेष्ठ रथी, वे वीर, युद्ध के लिए पाँत बाँधे केवल मेरे ही सामने खड़े हैं।
श्लोक 20 (7.115.20)
अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वांश्चोदय सारथे । त्रिगर्तैः सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यतः ॥
atra māṃ prāpaya kṣipramaśvāṃścodaya sārathe | trigartaiḥ saha yotsyāmi bhāradvājasya paśyataḥ
सारथि, मुझे शीघ्र वहाँ ले चलो और घोड़ों को हाँको। भरद्वाज-पुत्र के देखते-देखते मैं त्रिगर्तों से युद्ध करूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (7.115.21)
ततः प्रायाच्छनैः सूतः सात्वतस्य मते स्थितः । रथेनादित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना ॥
tataḥ prāyācchanaiḥ sūtaḥ sātvatasya mate sthitaḥ | rathenādityavarṇena bhāsvareṇa patākinā
तब सात्वत की इच्छा के अनुसार चलने वाला सारथि सूर्य के समान वर्ण वाले, चमकते और पताका से सुशोभित रथ में धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
श्लोक 22 (7.115.22)
तमूहुः सारथेर्वश्या वल्गमाना हयोत्तमाः । वायुवेगसमाः सङ्ख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभाः ॥
tamūhuḥ sārathervaśyā valgamānā hayottamāḥ | vāyuvegasamāḥ saṅkhye kundendurajataprabhāḥ
सारथि के वश में रहने वाले, उछलते हुए उत्तम घोड़े उसे ले चले — रणभूमि में वायु के समान वेग वाले, कुन्द, चन्द्रमा और चाँदी की-सी कान्ति वाले।
श्लोक 23 (7.115.23)
आपतन्तं रणे तं तु शङ्खवर्णैर्हयोत्तमैः । परिववुस्ततः शूरा गजानीकेन सर्वतः । किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान्सायकाँल्लघुवेधिनः ॥
āpatantaṃ raṇe taṃ tu śaṅkhavarṇairhayottamaiḥ | parivavustataḥ śūrā gajānīkena sarvataḥ | kiranto vividhāṃstīkṣṇānsāyakām̐llaghuvedhinaḥ
शंख के समान श्वेत उत्तम घोड़ों के साथ रण में आते हुए उन्हें शूरों ने गजसेना से चारों ओर घेर लिया और फुर्ती से बेधने वाले नाना प्रकार के तीखे बाण बरसाए।
श्लोक 24 (7.115.24)
सात्वतोऽपि शितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत् । पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान् ॥
sātvato'pi śitairbāṇairgajānīkamayodhayat | parvatāniva varṣeṇa tapānte jalado mahān
सात्वत ने भी तीखे बाणों से गजसेना से युद्ध किया, जैसे ग्रीष्म के अन्त में विशाल मेघ पर्वतों पर वर्षा करता है।
श्लोक 25 (7.115.25)
वज्राशनिसमस्पर्शैर्वध्यमानाः शरैर्गजाः । प्राद्रवन्रणमुत्सृज्य शिनिवीरसमीरितैः ॥
vajrāśanisamasparśairvadhyamānāḥ śarairgajāḥ | prādravanraṇamutsṛjya śinivīrasamīritaiḥ
वज्र के समान स्पर्श वाले, शिनि-वीर के छोड़े हुए बाणों से मारे जाते हुए हाथी रणभूमि छोड़कर भाग चले।
श्लोक 26 (7.115.26)
शीर्णदन्ता विरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः । विशीर्णकर्णास्यकरा विनियन्तृपताकिनः ॥
śīrṇadantā virudhirā bhinnamastakapiṇḍikāḥ | viśīrṇakarṇāsyakarā viniyantṛpatākinaḥ
उनके दाँत टूट गए थे, शरीर रक्तहीन हो गए थे, मस्तक के उभार फट गए थे, कान, मुख और सूँड़ बिखर गए थे, और सवार तथा पताकाएँ नष्ट हो गई थीं,
श्लोक 27 (7.115.27)
सम्भिन्नवर्मघण्टाश्च विनिकृत्तमहाध्वजाः । हतारोहा दिशो राजन्भेजिरे भ्रष्टकम्बलाः ॥
sambhinnavarmaghaṇṭāśca vinikṛttamahādhvajāḥ | hatārohā diśo rājanbhejire bhraṣṭakambalāḥ
उनके कवच और घण्टे टूट गए थे, बड़े-बड़े ध्वज कट गए थे, सवार मारे जा चुके थे, झूलें गिर गई थीं; हे राजन्, वे दिशाओं में भाग चले,
श्लोक 28 (7.115.28)
रुवन्तो विविधान्नादाञ्जलदोपमनिःस्वनाः । नाराचैर्वत्सदन्तैश्च भल्लैरञ्जलिकैस्तथा ॥
ruvanto vividhānnādāñjaladopamaniḥsvanāḥ | nārācairvatsadantaiśca bhallairañjalikaistathā
बादलों की गरज जैसी नाना ध्वनियों में चिंघाड़ते हुए, सात्वत के नाराचों, वत्सदन्तों, भल्लों और अञ्जलिक बाणों से विदीर्ण होकर,
श्लोक 29 (7.115.29)
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च सात्वतेन विदारिताः । क्षरन्तोऽसृक्तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवुः । बभ्रमुश्चस्खलुश्चान्ये पेतुर्मम्लुस्तथाऽपरे ॥
kṣuraprairardhacandraiśca sātvatena vidāritāḥ | kṣaranto'sṛktathā mūtraṃ purīṣaṃ ca pradudruvuḥ | babhramuścaskhaluścānye peturmamlustathā'pare
तथा क्षुरप्र और अर्धचन्द्र बाणों से। रक्त, मूत्र और मल बहाते हुए वे भागे; कोई चक्कर काटने लगे, कोई लड़खड़ाए, कोई गिर पड़े और कुछ मुरझाकर निढाल हो गए।
श्लोक 30 (7.115.30)
एवं तत्कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम् । शरैरग्न्यर्कसङ्काशैः प्रदुद्राव समन्ततः ॥
evaṃ tatkuñjarānīkaṃ yuyudhānena pīḍitam | śarairagnyarkasaṅkāśaiḥ pradudrāva samantataḥ
इस प्रकार युयुधान की अग्नि और सूर्य के समान बाणों से पीड़ित वह गजसेना चारों ओर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 31 (7.115.31)
तस्मिन्हते गजानीके जलसन्धो महाबलः । यत्तः सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति ॥
tasminhate gajānīke jalasandho mahābalaḥ | yattaḥ samprāpayannāgaṃ rajatāśvarathaṃ prati
उस गजसेना के टूट जाने पर महाबली जलसन्ध ने सावधान होकर अपना हाथी चाँदी जैसे घोड़ों वाले रथ की ओर बढ़ाया।
श्लोक 32 (7.115.32)
रुक्मवर्मधरः शूरस्तपनीयाङ्गदः शुचिः । कुण्डली मकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषितः ॥
rukmavarmadharaḥ śūrastapanīyāṅgadaḥ śuciḥ | kuṇḍalī makuṭī khaḍgī raktacandanarūṣitaḥ
उस शुद्ध-हृदय वीर ने सुनहरा कवच और सोने के बाजूबन्द पहने थे; वह कुण्डल, मुकुट और खड्ग धारण किए था और लाल चन्दन से लिप्त था।
श्लोक 33 (7.115.33)
शिरसा धारयन्दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम् । उरसा धारयन्निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् ॥
śirasā dhārayandīptāṃ tapanīyamayīṃ srajam | urasā dhārayanniṣkaṃ kaṇṭhasūtraṃ ca bhāsvaram
सिर पर वह सोने की दमकती माला पहने था; वक्ष पर निष्क और कण्ठ में चमकता हुआ हार धारण किए था।
श्लोक 34 (7.115.34)
चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन्गजमूर्धनि । अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयदः ॥
cāpaṃ ca rukmavikṛtaṃ vidhunvangajamūrdhani | aśobhata mahārāja savidyudiva toyadaḥ
हे महाराज, हाथी के मस्तक पर सोने से सजे धनुष को हिलाता हुआ वह बिजली से युक्त मेघ के समान शोभित हो रहा था।
श्लोक 35 (7.115.35)
तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम् । सात्यकिर्वारयामास वेलेव मकरालयम् ॥
tamāpatantaṃ sahasā māgadhasya gajottamam | sātyakirvārayāmāsa veleva makarālayam
मगधराज के उस श्रेष्ठ हाथी को सहसा टूट पड़ते देख सात्यकि ने उसे रोक दिया, जैसे तट मकरों के निवास सागर को रोक देता है।
श्लोक 36 (7.115.36)
नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेयस्य शरोत्तमैः । अक्रुध्यत रणे राजञ्जलसन्धो महाबलः ॥
nāgaṃ nivāritaṃ dṛṣṭvā śaineyasya śarottamaiḥ | akrudhyata raṇe rājañjalasandho mahābalaḥ
शैनेय के उत्तम बाणों से अपने हाथी को रुका देखकर महाबली जलसन्ध रणभूमि में क्रुद्ध हो उठा, हे राजन्।
श्लोक 37 (7.115.37)
ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनैः । अविध्यत शिनेः पौत्रं जलसन्धो महोरसि ॥
tataḥ kruddho mahārāja mārgaṇairbhārasādhanaiḥ | avidhyata śineḥ pautraṃ jalasandho mahorasi
तब हे महाराज, क्रोध में भरे जलसन्ध ने भारी बाणों से शिनि के पौत्र की चौड़ी छाती बींध दी।
श्लोक 38 (7.115.38)
ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् ॥
tato'pareṇa bhallena pītena niśitena ca | asyato vṛṣṇivīrasya nicakarta śarāsanam
फिर एक और पीले, तीखे भल्ल से उसने बाण चलाते हुए वृष्णि-वीर का धनुष काट डाला।
श्लोक 39 (7.115.39)
सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत । अविध्यन्मागधो वीरः पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥
sātyakiṃ chinnadhanvānaṃ prahasanniva bhārata | avidhyanmāgadho vīraḥ pañcabhirniśitaiḥ śaraiḥ
सात्यकि को धनुषहीन देखकर, हे भारत, मगध-वीर ने मानो हँसते हुए उन्हें पाँच तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 40 (7.115.40)
स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसन्धेन वीर्यवान् । नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sa viddho bahubhirbāṇairjalasandhena vīryavān | nākampata mahābāhustadadbhutamivābhavat
जलसन्ध के बहुत-से बाणों से बिंधकर भी वह पराक्रमी महाबाहु काँपा नहीं; यह मानो एक आश्चर्य हुआ।
श्लोक 41 (7.115.41)
अचिन्तयन्वै स शरान्नात्यर्थं सम्भ्रमाद्बली । धनुरन्यत्समादाय तिष्ठतिष्ठेत्युवाच ह ॥
acintayanvai sa śarānnātyarthaṃ sambhramādbalī | dhanuranyatsamādāya tiṣṭhatiṣṭhetyuvāca ha
उस बली ने उतावली में उन बाणों की विशेष परवाह नहीं की। दूसरा धनुष उठाकर वह बोला — "ठहर, ठहर!"
श्लोक 42 (7.115.42)
एतावदुक्त्वा शैनेयो जलसन्धं महोरसि । विव्याध षष्ट्या सुभृशं शराणां प्रहसन्निव ॥
etāvaduktvā śaineyo jalasandhaṃ mahorasi | vivyādha ṣaṣṭyā subhṛśaṃ śarāṇāṃ prahasanniva
इतना कहकर शैनेय ने मानो हँसते हुए जलसन्ध की चौड़ी छाती में साठ बाणों से गहरा प्रहार किया।
श्लोक 43 (7.115.43)
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन मुष्टिदेशे महद्धनुः । जलसन्धस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभिः शरैः ॥
kṣurapreṇa sutīkṣṇena muṣṭideśe mahaddhanuḥ | jalasandhasya ciccheda vivyādha ca tribhiḥ śaraiḥ
एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्र से उन्होंने जलसन्ध के विशाल धनुष को मुट्ठी वाले स्थान पर काट दिया और उसे तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 44 (7.115.44)
जलसन्धस्तु तत्त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम् । तोमरं व्यसृजत्तूर्णं सात्यकिं प्रति मारिष ॥
jalasandhastu tattyaktvā saśaraṃ vai śarāsanam | tomaraṃ vyasṛjattūrṇaṃ sātyakiṃ prati māriṣa
किन्तु जलसन्ध ने बाण सहित उस धनुष को फेंककर, हे मान्यवर, सात्यकि पर शीघ्र ही एक तोमर चला दिया।
श्लोक 45 (7.115.45)
स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे । अभ्यगाद्धरणीं घोरः श्वसन्निव महोरगः ॥
sa nirbhidya bhujaṃ savyaṃ mādhavasya mahāraṇe | abhyagāddharaṇīṃ ghoraḥ śvasanniva mahoragaḥ
उस महायुद्ध में माधव की बायीं भुजा को छेदकर वह भयंकर तोमर फुफकारते महासर्प की भाँति धरती में जा धँसा।
श्लोक 46 (7.115.46)
निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकिः सत्यविक्रमः । त्रिंशद्भिर्विशिखैस्तीक्ष्णैर्जलसन्धमताडयत् ॥
nirbhinne tu bhuje savye sātyakiḥ satyavikramaḥ | triṃśadbhirviśikhaistīkṣṇairjalasandhamatāḍayat
बायीं भुजा के बिंध जाने पर सत्यपराक्रमी सात्यकि ने जलसन्ध पर तीस तीखे बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 47 (7.115.47)
प्रगृह्य तु ततः खड्गं जलसन्धो महाबलः । आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रकसङ्कुलम् । आविध्य च ततः खड्गं सात्वतायोत्ससर्ज ह ॥
pragṛhya tu tataḥ khaḍgaṃ jalasandho mahābalaḥ | ārṣabhaṃ carma ca mahacchatacandrakasaṅkulam | āvidhya ca tataḥ khaḍgaṃ sātvatāyotsasarja ha
तब महाबली जलसन्ध ने खड्ग और सैकड़ों चन्द्र-चिह्नों से भरी बैल की खाल की बड़ी ढाल उठाई और खड्ग को घुमाकर सात्वत पर फेंक दिया।
श्लोक 48 (7.115.48)
शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् । अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः ॥
śaineyasya dhanuśchittvā sa khaḍgo nyapatanmahīm | alātacakravaccaiva vyarocata mahīṃ gataḥ
वह खड्ग शैनेय का धनुष काटकर धरती पर गिरा और भूमि पर पड़ा घूमते अलातचक्र की तरह चमकता रहा।
श्लोक 49 (7.115.49)
अथान्यद्धनुरादाय सर्वकायावदारणम् । जलसन्धमभिप्रेक्ष्य उत्स्मयित्वा च माधवः ॥
athānyaddhanurādāya sarvakāyāvadāraṇam | jalasandhamabhiprekṣya utsmayitvā ca mādhavaḥ
फिर सब अंगों को चीर देने वाला दूसरा धनुष लेकर — माधव ने जलसन्ध की ओर देखकर मुस्कराते हुए —
श्लोक 50 (7.115.50)
शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् । विष्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसन्धं शरेण ह ॥
śālaskandhapratīkāśamindrāśanisamasvanam | viṣphārya vivyadhe kruddho jalasandhaṃ śareṇa ha
शाल के तने जैसे और इन्द्र के वज्र जैसे घोष वाले उस धनुष को खींचकर क्रुद्ध होकर जलसन्ध को एक बाण से बींध दिया।
श्लोक 51 (7.115.51)
ततः साभरणौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तमः । साङ्गदौ जलसन्धस्य चिच्छेद प्रहसन्निव ॥
tataḥ sābharaṇau bāhū kṣurābhyāṃ mādhavottamaḥ | sāṅgadau jalasandhasya ciccheda prahasanniva
तब माधवों में श्रेष्ठ सात्यकि ने मानो हँसते हुए दो क्षुर बाणों से जलसन्ध की आभूषणों और बाजूबन्दों सहित दोनों भुजाएँ काट डालीं।
श्लोक 52 (7.115.52)
तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात् । वसुन्धराधराद्भ्रष्टौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ॥
tau bāhū parighaprakhyau petaturgajasattamāt | vasundharādharādbhraṣṭau pañcaśīrṣāvivoragau
लोहे की गदा जैसी वे दोनों भुजाएँ उस श्रेष्ठ हाथी से ऐसे गिरीं जैसे पर्वत से गिरे हुए दो पाँच फन वाले सर्प।
श्लोक 53 (7.115.53)
ततः सुदंष्ट्रं सुहनु चारुकुण्डलमण्डितम् । क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्चिच्छेद सात्यकिः ॥
tataḥ sudaṃṣṭraṃ suhanu cārukuṇḍalamaṇḍitam | kṣureṇāsya tṛtīyena śiraściccheda sātyakiḥ
फिर तीसरे क्षुर बाण से सात्यकि ने उसका सिर काट दिया, जिसके दाँत और जबड़े सुन्दर थे और जो मनोहर कुण्डलों से सजा था।
श्लोक 54 (7.115.54)
तत्पातितशिरोबाहुकबन्धं भीमदर्शनम् । द्विरदं जलसन्धस्य रुधिरेणाभ्यषिञ्चत ॥
tatpātitaśirobāhukabandhaṃ bhīmadarśanam | dviradaṃ jalasandhasya rudhireṇābhyaṣiñcata
जलसन्ध का हाथी, जिसके सवार का सिर और भुजाएँ कट गई थीं और जो उस धड़ को लिए भयंकर दिखाई देता था, रक्त से नहा गया।
श्लोक 55 (7.115.55)
जलसन्धं निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वतः । विमानं पातयामास गजस्कन्धाद्विशांपते ॥
jalasandhaṃ nihatyājau tvaramāṇastu sātvataḥ | vimānaṃ pātayāmāsa gajaskandhādviśāṃpate
युद्ध में जलसन्ध को मारकर सात्वत ने, हे राजन्, उतावली से हाथी की पीठ से अम्बारी को नीचे गिरा दिया।
श्लोक 56 (7.115.56)
रुधिरेणावसिक्ताङ्गो जलसन्धस्य कुञ्जरः । विलम्बमानमवहत्संश्लिष्टं परमासनम् ॥
rudhireṇāvasiktāṅgo jalasandhasya kuñjaraḥ | vilambamānamavahatsaṃśliṣṭaṃ paramāsanam
जलसन्ध का हाथी, जिसका शरीर रक्त से भीग गया था, उस उत्तम आसन से चिपककर लटकते शव को लिए चल पड़ा।
श्लोक 57 (7.115.57)
शरार्दितः सात्वतेन मर्दमानः स्ववाहिनीम् । घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागजः ॥
śarārditaḥ sātvatena mardamānaḥ svavāhinīm | ghoramārtasvaraṃ kṛtvā vidudrāva mahāgajaḥ
सात्वत के बाणों से पीड़ित वह महान हाथी अपनी ही सेना को रौंदता हुआ भयंकर आर्तनाद करके भाग निकला।
श्लोक 58 (7.115.58)
हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष । जलसन्धं हतं दृष्ट्वा वृष्णीनामृषभेण तु ॥
hāhākāro mahānāsīttava sainyasya māriṣa | jalasandhaṃ hataṃ dṛṣṭvā vṛṣṇīnāmṛṣabheṇa tu
वृष्णियों के उस वृषभ के हाथों जलसन्ध को मारा गया देखकर, हे मान्यवर, आपकी सेना में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 59 (7.115.59)
विमुखाश्चाभ्यधावन्त तव योधाः समन्ततः । पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥
vimukhāścābhyadhāvanta tava yodhāḥ samantataḥ | palāyanakṛtotsāhā nirutsāhā dviṣajjaye
आपके योद्धा मुँह फेरकर चारों ओर दौड़ पड़े; उनका उत्साह भागने में ही था, शत्रु को जीतने में उनका उत्साह नहीं रह गया था।
श्लोक 60 (7.115.60)
एतस्मिन्नन्तरे राजन्द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । सन्न्यस्य भारं सुमहत्कृतवर्मणि भारत ॥
etasminnantare rājandroṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | sannyasya bhāraṃ sumahatkṛtavarmaṇi bhārata
इसी बीच, हे राजन्, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने, हे भारत, वह बहुत बड़ा भार कृतवर्मा पर डालकर —
श्लोक 61 (7.115.61)
अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्युयुधानं महारथम् । स हि पार्थान्रणे यत्तान्दधारैको महाबलः ॥
abhyayājjavanairaśvairyuyudhānaṃ mahāratham | sa hi pārthānraṇe yattāndadhāraiko mahābalaḥ
तेज़ घोड़ों से महारथी युयुधान पर चढ़ाई की; क्योंकि उस महाबली ने प्रयत्न करते हुए पार्थों को अकेले ही रोक रखा था।
श्लोक 62 (7.115.62)
तमुदीर्णं तथा दृष्ट्वा शैनेयं कुरुपुङ्गवाः । द्रोणेनैव सह क्रुद्धा सात्यकिं समुपाद्रवन् ॥
tamudīrṇaṃ tathā dṛṣṭvā śaineyaṃ kurupuṅgavāḥ | droṇenaiva saha kruddhā sātyakiṃ samupādravan
शैनेय को इस प्रकार उमड़ते देख क्रुद्ध कुरुश्रेष्ठ द्रोण के साथ ही सात्यकि पर टूट पड़े।
श्लोक 63 (7.115.63)
ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां सात्वतस्य च । द्रोणस्य च रणे राजन्घोरं देवासुरोपमम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ kurūṇāṃ sātvatasya ca | droṇasya ca raṇe rājanghoraṃ devāsuropamam
तब, हे राजन्, कौरवों तथा सात्वत और द्रोण के बीच देवासुर-संग्राम जैसा भयंकर युद्ध छिड़ गया।