द्रोण पर्व · अध्याय 119
सात्यकि द्वारा काम्भोजों और यवनों का संहार
कौरव-पंक्तियों में रक्त की नदी बहाकर सात्यकि अपने सारथि से कहते हैं कि द्रोण की सेना का सागर पार हो गया और धूल, गाण्डीव की गर्जना तथा शकुनों से लगता है कि अर्जुन निकट ही हैं। वे अपने मार्ग में खड़े काम्भोजों और दूसरी भाड़े की जातियों की ओर रथ ले चलने को कहते हैं। सारथि कहता है कि सात्यकि का साथ रहते उसे किसी सेना का भय नहीं, और सात्यकि मुण्डित सिर वाली उस सेना को नष्ट करने तथा कौरवों को पाण्डवों के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने की प्रतिज्ञा करते हैं। फिर वे काम्भोज, यवन और शक सेनाओं को तोड़ डालते हैं और रणभूमि कटे हुए सिरों व भुजाओं से पट जाती है; अर्जुन के पृष्ठरक्षक के रूप में आगे बढ़ते हुए उनकी चारण और गन्धर्व स्तुति करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.119.1)
निर्जित्य कृतवर्माणं भारद्वाजं च संयुगे । स सात्यकिः सत्यधृतिर्महात्मा शिनिपुङ्गवः ॥
nirjitya kṛtavarmāṇaṃ bhāradvājaṃ ca saṃyuge | sa sātyakiḥ satyadhṛtirmahātmā śinipuṅgavaḥ
युद्ध में कृतवर्मा और भारद्वाज द्रोण को जीतकर वह दृढ़ व्रत वाले महात्मा सात्यकि, शिनि-वंश के वृषभ,
श्लोक 2 (7.119.2)
दुर्योधनं च निर्जित्य शूरं चैव सुयोधनम् । जलसन्धं निहत्याजौ शूरसेनं च पार्थिवम् ॥
duryodhanaṃ ca nirjitya śūraṃ caiva suyodhanam | jalasandhaṃ nihatyājau śūrasenaṃ ca pārthivam
दुर्योधन को और वीर सुयोधन को भी पराजित करके, युद्ध में जलसन्ध और शूरसेन-नरेश को मारकर,
श्लोक 3 (7.119.3)
म्लेच्छांश्च बहुधा राजन्काश्यपुत्रं च संयुगे । निषादांस्तङ्कणांश्चैव कलिङ्गान्मगधानपि ॥
mlecchāṃśca bahudhā rājankāśyaputraṃ ca saṃyuge | niṣādāṃstaṅkaṇāṃścaiva kaliṅgānmagadhānapi
और हे राजन्, म्लेच्छों को अनेक प्रकार से, युद्ध में काश्य-पुत्र को, निषादों, तंकणों, कलिंगों और मगधों को भी,
श्लोक 4 (7.119.4)
केकयाञ्छूरसेनांश्च तथा पर्वतवासिनः । काम्भोजान्यवनांश्चैव वसातींश्च शिबीनपि ॥
kekayāñchūrasenāṃśca tathā parvatavāsinaḥ | kāmbhojānyavanāṃścaiva vasātīṃśca śibīnapi
केकयों और शूरसेनों को, पर्वतवासियों को, काम्भोजों, यवनों, वसातियों और शिबियों को भी,
श्लोक 5 (7.119.5)
कोसलान्मगधांश्चैव यातुधानान्सतित्तिरान् । एतांश्चान्यान्रणे हत्वाऽगच्छद्युद्धे स सात्यकिः ॥
kosalānmagadhāṃścaiva yātudhānānsatittirān | etāṃścānyānraṇe hatvā'gacchadyuddhe sa sātyakiḥ
कोसलों और मगधों को, यातुधानों और तित्तिरों को — इन सबको और दूसरों को भी युद्ध में मारकर वह सात्यकि आगे बढ़ा।
श्लोक 6 (7.119.6)
रुधिरौघनदीं घोरां केशशैवालशाद्वलाम् । शक्तिग्राहसमाकीर्णां छत्रहंसोपशोभिताम् ॥
rudhiraughanadīṃ ghorāṃ keśaśaivālaśādvalām | śaktigrāhasamākīrṇāṃ chatrahaṃsopaśobhitām
बालों को सेवार और घास, शक्तियों को ग्राह और छत्रों को हंस बनाकर शोभित, रक्त के प्रवाह की एक भयंकर नदी बहाकर,
श्लोक 7 (7.119.7)
दुस्तरां भीरुभिर्नित्यं शूरलोकप्रवाहिनीम् । प्रवर्त्य हृषितो राजन्पुनर्यन्तारमब्रवीत् ॥
dustarāṃ bhīrubhirnityaṃ śūralokapravāhinīm | pravartya hṛṣito rājanpunaryantāramabravīt
जो कायरों के लिए सदा दुस्तर थी और वीरों को शूरलोक की ओर बहा ले जाती थी, हर्षित होकर, हे राजन्, उसने फिर अपने सारथि से कहा:
सात्यकिरुवाच
श्लोक 8 (7.119.8)
ध्वजनागाश्वकलिलं शरशक्त्यूर्मिमालिनम् । खड्गमत्स्यं गदाग्राहं शूरायुधमहास्वनम् ॥
dhvajanāgāśvakalilaṃ śaraśaktyūrmimālinam | khaḍgamatsyaṃ gadāgrāhaṃ śūrāyudhamahāsvanam
"ध्वजाओं, हाथियों और घोड़ों से भरा हुआ, बाणों और शक्तियों की लहरों की माला वाला, तलवारों के मत्स्यों और गदाओं के ग्राहों वाला, शूरों के शस्त्रों के महान् घोष से गूँजता हुआ,
श्लोक 9 (7.119.9)
प्राणापहारिणं रौद्रं वादित्रोद्धुष्टनादितम् । शूराणां सुखसंस्पर्शमस्पृश्यमथ भीरुणाम् । तीर्णाः स्म दुस्तरं तात द्रोणानीकमहार्णवम् ॥
prāṇāpahāriṇaṃ raudraṃ vāditroddhuṣṭanāditam | śūrāṇāṃ sukhasaṃsparśamaspṛśyamatha bhīruṇām | tīrṇāḥ sma dustaraṃ tāta droṇānīkamahārṇavam
प्राण हर लेने वाले, भयंकर, वाद्यों की ध्वनि से गूँजते, शूरों को सुखद स्पर्श वाले और कायरों के लिए अस्पृश्य — द्रोण की सेना के इस दुस्तर महासागर को, मित्र, हम पार कर आए हैं,
श्लोक 10 (7.119.10)
जलसन्धबलेनाजौ पुरुषादैरिवावृतम् । अतोऽन्यत्पृतनाशेषं मन्ये कुनदिकामिव ॥
jalasandhabalenājau puruṣādairivāvṛtam | ato'nyatpṛtanāśeṣaṃ manye kunadikāmiva
जो युद्ध में जलसन्ध की सेना से मानो नरभक्षी जीवों से घिरा हुआ था। इसके आगे की बची हुई सेना को मैं एक तुच्छ नदी के समान मानता हूँ,
श्लोक 11 (7.119.11)
तर्तव्यामल्पसलिलां चोदयाश्वानसम्भ्रमम् । हस्तप्राप्तमहं मन्ये साम्प्रतं सव्यसाचिनम् ॥
tartavyāmalpasalilāṃ codayāśvānasambhramam | hastaprāptamahaṃ manye sāmprataṃ savyasācinam
जिसे पार करना है, जिसमें जल थोड़ा है। घोड़ों को बिना घबराहट हाँको। अब मैं सव्यसाची (अर्जुन) को हाथ में आया हुआ मानता हूँ।
श्लोक 12 (7.119.12)
निर्जित्य दुर्धरं द्रोणं सपदानुगमाहवे । हार्दिक्यं योधवर्यं च मन्ये प्राप्तं धनञ्जयम् ॥
nirjitya durdharaṃ droṇaṃ sapadānugamāhave | hārdikyaṃ yodhavaryaṃ ca manye prāptaṃ dhanañjayam
युद्ध में दुर्जेय द्रोण को उनके अनुयायियों सहित और योद्धाओं में श्रेष्ठ हार्दिक्य को भी जीतकर मैं मानता हूँ कि धनंजय तक पहुँच गया हूँ।
श्लोक 13 (7.119.13)
न हि मे जायते त्रासो दृष्ट्वा सैन्यान्यनेकशः । वह्नेरिव प्रदीप्तस्य वने शुष्कतृणालयम् ॥
na hi me jāyate trāso dṛṣṭvā sainyānyanekaśaḥ | vahneriva pradīptasya vane śuṣkatṛṇālayam
इन अनेक सेनाओं को देखकर मुझे कोई भय नहीं होता, जैसे वन में जलती हुई आग को सूखी घास देखकर नहीं होता।
श्लोक 14 (7.119.14)
पश्य पाण्डवमुख्येन यातां भूमिं किरीटिना । पत्त्यश्वरथनागौघैः पतितैर्विषमीकृताम् ॥
paśya pāṇḍavamukhyena yātāṃ bhūmiṃ kirīṭinā | pattyaśvarathanāgaughaiḥ patitairviṣamīkṛtām
देखो, पाण्डवों में प्रमुख किरीटी अर्जुन जिस भूमि से होकर गए हैं, वह गिरे हुए पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियों के ढेरों से ऊबड़-खाबड़ हो गई है।
श्लोक 15 (7.119.15)
द्रवते तद्यथा सैन्यं तेन भग्नं महात्मना । रथैर्विपरिधावद्भिर्गजैरश्वैश्च सारथे । कौशेयारुणसंकाशमेतदुद्वूयते रजः ॥
dravate tadyathā sainyaṃ tena bhagnaṃ mahātmanā | rathairviparidhāvadbhirgajairaśvaiśca sārathe | kauśeyāruṇasaṃkāśametadudvūyate rajaḥ
उस महात्मा से टूटी हुई वह सेना भाग रही है — रथ, हाथी और घोड़े इधर-उधर दौड़ रहे हैं, सारथि! — और यह रेशमी वस्त्र जैसी लाल धूल उड़ रही है।
श्लोक 16 (7.119.16)
अभ्याशस्थमहं मन्ये श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ॥
abhyāśasthamahaṃ manye śvetāśvaṃ kṛṣṇasārathim
मैं समझता हूँ कि श्वेत घोड़ों वाले, जिनके सारथि कृष्ण हैं, वे अर्जुन पास ही हैं।
श्लोक 17 (7.119.17)
श्रूयते ह्येष निर्घोषो जलदस्येव गर्जतः । विष्फार्यमाणस्य रणे गाण्डीवस्यामितौजसः ॥
śrūyate hyeṣa nirghoṣo jaladasyeva garjataḥ | viṣphāryamāṇasya raṇe gāṇḍīvasyāmitaujasaḥ
बादल के गरजने जैसा यह घोष सुनाई दे रहा है, अपार तेज वाले गाण्डीव के रण में खींचे जाने का।
श्लोक 18 (7.119.18)
अभ्याशस्थमहं मन्ये सैन्धवस्य किरीटिनम् । तादृशः श्रूयते शब्दः सैन्यानां सागरोपमः ॥
abhyāśasthamahaṃ manye saindhavasya kirīṭinam | tādṛśaḥ śrūyate śabdaḥ sainyānāṃ sāgaropamaḥ
मैं समझता हूँ कि किरीटी सिन्धुराज के निकट ही हैं। सेनाओं का वैसा ही समुद्र जैसा शब्द सुनाई दे रहा है।
श्लोक 19 (7.119.19)
यादृशानि निमित्तानि मम प्रादुर्भवन्ति वै । अनस्तंगत आदित्ये हन्ता सैन्धवमर्जुनः ॥
yādṛśāni nimittāni mama prādurbhavanti vai | anastaṃgata āditye hantā saindhavamarjunaḥ
जैसे शकुन मुझे दिखाई दे रहे हैं, उनसे लगता है कि सूर्यास्त से पहले अर्जुन सैन्धव को मार डालेंगे।
श्लोक 20 (7.119.20)
शनैर्विस्रम्भयन्नश्वान्याहि यत्रारिवाहिनी ॥
śanairvisrambhayannaśvānyāhi yatrārivāhinī
घोड़ों को धीरज बँधाते हुए धीरे-धीरे वहाँ चलो जहाँ शत्रु की सेना है,
श्लोक 21 (7.119.21)
यत्रैते सतलत्राणाः सुयोधनपुरोगमाः । दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्भोजा युद्धदुर्मदाः ॥
yatraite satalatrāṇāḥ suyodhanapurogamāḥ | daṃśitāḥ krūrakarmāṇaḥ kāmbhojā yuddhadurmadāḥ
जहाँ ये काम्भोज खड़े हैं — दस्ताने और कवच पहने, क्रूर कर्म करने वाले, युद्ध के मद में चूर, सुयोधन को आगे किए हुए,
श्लोक 22 (7.119.22)
शरबाणासनधरा यवनाश्च प्रहारिणः । शकाः किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तकाः ॥
śarabāṇāsanadharā yavanāśca prahāriṇaḥ | śakāḥ kirātā daradā barbarāstāmraliptakāḥ
और धनुष-बाण धारण करने वाले, वार करने में कुशल यवन, शक, किरात, दरद, बर्बर और ताम्रलिप्तक,
श्लोक 23 (7.119.23)
अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधायुधपाणयः । मामेवाभिमुखाः सर्वे तिष्ठन्ति समरार्थिनः ॥
anye ca bahavo mlecchā vividhāyudhapāṇayaḥ | māmevābhimukhāḥ sarve tiṣṭhanti samarārthinaḥ
और अनेक प्रकार के शस्त्र हाथ में लिए बहुत-से और म्लेच्छ — वे सब युद्ध की इच्छा से मेरे ही सामने खड़े हैं।
श्लोक 24 (7.119.24)
एतान्सरथनागाश्वान्निहत्याजौ सपत्तिनः । इदं दुर्गं महाघोरं तीर्णमेवोपधारय ॥
etānsarathanāgāśvānnihatyājau sapattinaḥ | idaṃ durgaṃ mahāghoraṃ tīrṇamevopadhāraya
रथ, हाथी, घोड़ों और पैदलों सहित इन्हें युद्ध में मारकर इस अत्यन्त भयंकर दुर्ग को पार हुआ ही समझो।"
सूत उवाच
श्लोक 25 (7.119.25)
न सम्भ्रमो मे वार्ष्णेय विद्यते सत्यविक्रम । यद्यपि स्यात्तव क्रुद्धो जामदग्न्योऽग्रतः स्थितः ॥
na sambhramo me vārṣṇeya vidyate satyavikrama | yadyapi syāttava kruddho jāmadagnyo'grataḥ sthitaḥ
"हे वृष्णिवंशी, सत्य-पराक्रमी, मुझे कोई घबराहट नहीं है, चाहे आप पर क्रुद्ध जमदग्नि-पुत्र ही सामने खड़े हों,
श्लोक 26 (7.119.26)
द्रोणो वा रथिनां श्रेष्ठः कृपो मद्रेश्वरोऽपि वा । तथापि सम्भ्रामो न स्यात्त्वामाश्रित्य महाभुज ॥
droṇo vā rathināṃ śreṣṭhaḥ kṛpo madreśvaro'pi vā | tathāpi sambhrāmo na syāttvāmāśritya mahābhuja
या रथियों में श्रेष्ठ द्रोण हों, या कृप, या मद्रराज शल्य हों — तब भी, हे महाबाहो, आपका आश्रय लेकर मुझे कोई घबराहट न होगी।
श्लोक 27 (7.119.27)
त्वया सुबहवो युद्धे निर्जिताः शत्रुसूदन । दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्भोजा युद्धदुर्मदाः ॥
tvayā subahavo yuddhe nirjitāḥ śatrusūdana | daṃśitāḥ krūrakarmāṇaḥ kāmbhojā yuddhadurmadāḥ
हे शत्रुसूदन, आपने युद्ध में बहुतों को जीता है — कवचधारी, क्रूर कर्म वाले, युद्ध-मद से चूर काम्भोजों को,
श्लोक 28 (7.119.28)
शरबाणासनधरा यवनाश्च प्रहारिणः । शकाः किराता दरदा बर्बरास्ताम्रलिप्तकाः । अन्ये च बहवो म्लेच्छा विविधायुधपाणयः ॥
śarabāṇāsanadharā yavanāśca prahāriṇaḥ | śakāḥ kirātā daradā barbarāstāmraliptakāḥ | anye ca bahavo mlecchā vividhāyudhapāṇayaḥ
धनुष-बाण धारण करने वाले, वार करने में कुशल यवनों को, शकों, किरातों, दरदों, बर्बरों और ताम्रलिप्तकों को, और विविध शस्त्र हाथ में लिए अनेक दूसरे म्लेच्छों को भी।
श्लोक 29 (7.119.29)
न च मे सम्भ्रमः कश्चिद्भूतपूर्वः कथञ्चन । किमुतैतत्समासाद्य धीरं संयुगगोष्पदम् ॥
na ca me sambhramaḥ kaścidbhūtapūrvaḥ kathañcana | kimutaitatsamāsādya dhīraṃ saṃyugagoṣpadam
मुझे पहले कभी कोई घबराहट नहीं हुई — फिर धीर पुरुष के लिए गाय के खुर के गड्ढे जैसे इस युद्ध को पाकर अब कैसी घबराहट?
श्लोक 30 (7.119.30)
आयुष्मन्कतरेण त्वां प्रापयामि धनञ्जयम् । केभ्यः क्रुद्धोऽसि वार्ष्णेय कान्स्विन्मृत्युरुपस्थितः ॥
āyuṣmankatareṇa tvāṃ prāpayāmi dhanañjayam | kebhyaḥ kruddho'si vārṣṇeya kānsvinmṛtyurupasthitaḥ
आयुष्मन्, किस मार्ग से मैं आपको धनंजय के पास पहुँचाऊँ? हे वृष्णिवंशी, आप किन पर क्रुद्ध हैं? किनकी मृत्यु आ पहुँची है?
श्लोक 31 (7.119.31)
केषां सङ्घमनीकस्य हन्तुमुत्सहते मनः । केत्वां युधि पराक्रान्तं कालान्तकयमोपमम् ॥
keṣāṃ saṅghamanīkasya hantumutsahate manaḥ | ketvāṃ yudhi parākrāntaṃ kālāntakayamopamam
किसकी सेना के समूह को मारने का आपका मन है? पराक्रम में बढ़े-चढ़े काल, अन्तक और यम के समान आपको युद्ध में टूट पड़ते देखकर कौन
श्लोक 32 (7.119.32)
दृष्ट्वा विक्रमसम्पन्नं विद्रविष्यन्ति संयुगे । केषां वैवस्वतो राजा स्मरतेऽद्य महाभुज ॥
dṛṣṭvā vikramasampannaṃ vidraviṣyanti saṃyuge | keṣāṃ vaivasvato rājā smarate'dya mahābhuja
भाग खड़े होंगे? हे महाबाहो, आज राजा वैवस्वत (यम) किसे स्मरण कर रहे हैं?"
सात्यकिरुवाच
श्लोक 33 (7.119.33)
मुण्डानेतान्हनिष्यामि दानवानिव वासवः । प्रतिज्ञां पारयिष्यामि काम्भोजानेव मां वह ॥
muṇḍānetānhaniṣyāmi dānavāniva vāsavaḥ | pratijñāṃ pārayiṣyāmi kāmbhojāneva māṃ vaha
"इन मुण्डित सिर वालों को मैं वैसे ही मारूँगा जैसे वासव ने दानवों को मारा था; मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँगा। मुझे काम्भोजों के पास ही ले चलो।
श्लोक 34 (7.119.34)
अद्यैषां कदनं कृत्वा क्षिप्रं यास्यामि पाण्डवम् ॥
adyaiṣāṃ kadanaṃ kṛtvā kṣipraṃ yāsyāmi pāṇḍavam
उनका संहार करके मैं शीघ्र ही पाण्डव (अर्जुन) के पास जाऊँगा।
श्लोक 35 (7.119.35)
अद्य द्रक्ष्यन्ति मे वीर्यं कौरवाः ससुयोधनाः । मुण्डानीके हते सूत सर्वसैन्येषु चासकृत् ॥
adya drakṣyanti me vīryaṃ kauravāḥ sasuyodhanāḥ | muṇḍānīke hate sūta sarvasainyeṣu cāsakṛt
आज, सारथि, जब मुण्डितों की सेना सब सेनाओं के बीच बार-बार मारी जाएगी, तब सुयोधन सहित कौरव मेरा पराक्रम देखेंगे।
श्लोक 36 (7.119.36)
अद्य कौरवसैन्यस्य दीर्यमाणस्य संयुगे । श्रुत्वा विरावं बहुधा सन्तप्स्यति सुयोधनः ॥
adya kauravasainyasya dīryamāṇasya saṃyuge | śrutvā virāvaṃ bahudhā santapsyati suyodhanaḥ
आज युद्ध में चीरी जाती हुई कौरव-सेना की बहुविध चीत्कार सुनकर सुयोधन सन्तप्त होगा।
श्लोक 37 (7.119.37)
अद्य पाण्डवमुख्यस्य श्वेताश्वस्य महात्मनः । आचार्यककृतं मार्गं दर्शयिष्यामि संयुगे ॥
adya pāṇḍavamukhyasya śvetāśvasya mahātmanaḥ | ācāryakakṛtaṃ mārgaṃ darśayiṣyāmi saṃyuge
आज मैं युद्ध में महात्मा पाण्डव-प्रमुख, श्वेताश्व अर्जुन का वह मार्ग दिखाऊँगा जो आचार्य का बनाया हुआ है।
श्लोक 38 (7.119.38)
अद्य मद्बाणनिहतान्योधमुख्यान्सहस्रशः । दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा पश्चात्तापं गमिष्यति ॥
adya madbāṇanihatānyodhamukhyānsahasraśaḥ | dṛṣṭvā duryodhano rājā paścāttāpaṃ gamiṣyati
आज राजा दुर्योधन मेरे बाणों से मारे गए हजारों प्रमुख योद्धाओं को देखकर पछताएगा।
श्लोक 39 (7.119.39)
अद्य मे क्षिप्रहस्तस्य क्षिपतः सायकोत्तमान् । अलातचक्रप्रतिमं धनुर्द्रक्ष्यन्ति कौरवाः ॥
adya me kṣiprahastasya kṣipataḥ sāyakottamān | alātacakrapratimaṃ dhanurdrakṣyanti kauravāḥ
आज शीघ्र हाथों से उत्तम बाण चलाते हुए मेरे धनुष को कौरव घूमते हुए अलातचक्र के समान देखेंगे।
श्लोक 40 (7.119.40)
मत्सायकचिताङ्गानां रुधिरं स्रवतां मुहुः । सैनिकानां वधं दृष्ट्वा सन्तप्स्यति सुयोधनः ॥
matsāyakacitāṅgānāṃ rudhiraṃ sravatāṃ muhuḥ | sainikānāṃ vadhaṃ dṛṣṭvā santapsyati suyodhanaḥ
मेरे बाणों से बिंधे अंगों वाले, निरन्तर रक्त बहाते सैनिकों का वध देखकर सुयोधन सन्तप्त होगा।
श्लोक 41 (7.119.41)
अद्य मे क्रुद्धरूपस्य निघ्नतश्च वरान्वरान् । द्विफल्गुनमिमं लोकं मंस्यतेऽद्य सुयोधनः ॥
adya me kruddharūpasya nighnataśca varānvarān | dviphalgunamimaṃ lokaṃ maṃsyate'dya suyodhanaḥ
आज जब मैं क्रोध में भरकर एक-एक श्रेष्ठ योद्धा को मारता जाऊँगा, तो सुयोधन इस संसार को दो अर्जुनों वाला मानेगा।
श्लोक 42 (7.119.42)
अद्य राजसहस्राणि निहतानि मया रणे । दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा सन्तप्स्यति महामृधे ॥
adya rājasahasrāṇi nihatāni mayā raṇe | dṛṣṭvā duryodhano rājā santapsyati mahāmṛdhe
आज मेरे हाथों रणभूमि में मारे गए हजारों राजाओं को देखकर राजा दुर्योधन उस महासंग्राम में सन्तप्त होगा।
श्लोक 43 (7.119.43)
अद्य स्नेहं च भक्तिं च पाण्डवेषु महात्मसु । हत्वा राजसहस्राणि दर्शयिष्यामि राजसु ॥
adya snehaṃ ca bhaktiṃ ca pāṇḍaveṣu mahātmasu | hatvā rājasahasrāṇi darśayiṣyāmi rājasu
आज हजारों राजाओं को मारकर मैं महात्मा पाण्डवों के प्रति अपना स्नेह और भक्ति राजाओं को दिखाऊँगा।
श्लोक 44 (7.119.44)
बलं वीर्यं कृतज्ञत्वं मम ज्ञास्यन्ति कौरवाः ॥
balaṃ vīryaṃ kṛtajñatvaṃ mama jñāsyanti kauravāḥ
कौरव मेरा बल, पराक्रम और कृतज्ञता जान लेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 45 (7.119.45)
एवमुक्तस्तदा सूतः शिक्षितान्साधुवाहिनः । शशाङ्कसन्निकाशान्वै वाजिनो व्यनुदद्भृशम् ॥
evamuktastadā sūtaḥ śikṣitānsādhuvāhinaḥ | śaśāṅkasannikāśānvai vājino vyanudadbhṛśam
ऐसा कहे जाने पर सारथि ने अपने सधे हुए, स्थिर चाल वाले, चन्द्रमा जैसे श्वेत घोड़ों को जोर से हाँका।
श्लोक 46 (7.119.46)
ते पिबन्त इवाकाशं युयुधानं हयोत्तमाः । प्रापयन्यवनाञ्शीघ्रं मनः पवनरंहसः ॥
te pibanta ivākāśaṃ yuyudhānaṃ hayottamāḥ | prāpayanyavanāñśīghraṃ manaḥ pavanaraṃhasaḥ
मन और वायु की तरह वेग वाले वे उत्तम घोड़े मानो आकाश को पीते हुए युयुधान को शीघ्र यवनों के पास ले गए।
श्लोक 47 (7.119.47)
सात्यकिं ते समासाद्य पृतनास्वनिवर्तिनम् । बहवो लघुहस्ताश्च शरवर्षैरवाकिरन् ॥
sātyakiṃ te samāsādya pṛtanāsvanivartinam | bahavo laghuhastāśca śaravarṣairavākiran
युद्धों में पीछे न हटने वाले सात्यकि के पास पहुँचकर बहुत-से फुर्तीले हाथों वाले योद्धाओं ने उन्हें बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 48 (7.119.48)
तेषामिषूनथास्त्राणि वेगवान्नतपर्वभिः । अच्छिनत्सात्यकी राजन्नैनं ते प्राप्नुवञ्शराः ॥
teṣāmiṣūnathāstrāṇi vegavānnataparvabhiḥ | acchinatsātyakī rājannainaṃ te prāpnuvañśarāḥ
वेगवान् सात्यकि ने, हे राजन्, अपने सीधी गाँठ वाले बाणों से उनके बाणों और अस्त्रों को काट डाला; वे बाण उन तक पहुँच ही न सके।
श्लोक 49 (7.119.49)
रुक्मपुङ्खैः सुनिशितैर्गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैः । उच्चकर्त शिरांस्युग्रो यवनानां भुजानपि ॥
rukmapuṅkhaiḥ suniśitairgārdhrapatrairajihmagaiḥ | uccakarta śirāṃsyugro yavanānāṃ bhujānapi
सोने के पंखों वाले, तीखे, गिद्ध के पंख लगे, सीधे जाने वाले बाणों से उस उग्र वीर ने यवनों के सिर और भुजाएँ भी काट डालीं।
श्लोक 50 (7.119.50)
शैक्यायसानि वर्माणि कांस्यानि च समन्ततः । भित्त्वा देहांस्तथा तेषां शरा जग्मुर्महीतलम् ॥
śaikyāyasāni varmāṇi kāṃsyāni ca samantataḥ | bhittvā dehāṃstathā teṣāṃ śarā jagmurmahītalam
उनके लोहे और काँसे के कवचों तथा शरीरों को सब ओर से भेदकर वे बाण धरती पर जा गिरे।
श्लोक 51 (7.119.51)
ते हन्यमाना वीरेण म्लेच्छाः सात्यकिना रणे । शतशोऽभ्यपतंस्तत्र व्यसवो वसुधातले ॥
te hanyamānā vīreṇa mlecchāḥ sātyakinā raṇe | śataśo'bhyapataṃstatra vyasavo vasudhātale
वीर सात्यकि के हाथों रण में मारे जाते हुए वे म्लेच्छ सैकड़ों की संख्या में प्राणहीन होकर धरती पर गिरे।
श्लोक 52 (7.119.52)
सुपूर्णायतमुक्तैस्तानव्यवच्छिन्नपिण्डितैः । पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च बिभेद यवनाञ्शरैः ॥
supūrṇāyatamuktaistānavyavacchinnapiṇḍitaiḥ | pañca ṣaṭ sapta cāṣṭau ca bibheda yavanāñśaraiḥ
पूरी तरह खींचकर छोड़े हुए, बिना टूटे एक साथ गुँथे हुए बाणों से उसने यवनों को पाँच-पाँच, छह-छह, सात-सात और आठ-आठ करके बींध डाला।
श्लोक 53 (7.119.53)
काम्भोजानां सहस्रैश्च शकानां च विशाम्पते । शबराणां किरातानां बर्बराणां तथैव च ॥
kāmbhojānāṃ sahasraiśca śakānāṃ ca viśāmpate | śabarāṇāṃ kirātānāṃ barbarāṇāṃ tathaiva ca
हे प्रजापति, हजारों काम्भोजों, शकों, शबरों, किरातों और बर्बरों में से
श्लोक 54 (7.119.54)
अगम्यरूपां पृथिवीं मांसशोणितकर्दमाम् । कृतवांस्तत्र शैनेयः क्षपयंस्तावकं बलम् ॥
agamyarūpāṃ pṛthivīṃ māṃsaśoṇitakardamām | kṛtavāṃstatra śaineyaḥ kṣapayaṃstāvakaṃ balam
आपकी सेना का नाश करते हुए सात्यकि ने पृथ्वी को मांस और रक्त के कीचड़ से अगम्य बना दिया।
श्लोक 55 (7.119.55)
दस्यूनां सशिरस्त्राणैः शिरोभिर्लूनमूर्धजैः । दीर्घकूर्चैर्मही कीर्णा विबर्हैरण्डजैरिव ॥
dasyūnāṃ saśirastrāṇaiḥ śirobhirlūnamūrdhajaiḥ | dīrghakūrcairmahī kīrṇā vibarhairaṇḍajairiva
लुटेरों के शिरस्त्राण सहित कटे बालों और लम्बी दाढ़ियों वाले सिरों से धरती ऐसी पट गई थी जैसे पंख नुचे हुए पक्षियों से।
श्लोक 56 (7.119.56)
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गैस्तैस्तदायोधनं बभौ । कबन्धैः संवृतं सर्वं ताम्राभ्रैः खमिवावृतम् ॥
rudhirokṣitasarvāṅgaistaistadāyodhanaṃ babhau | kabandhaiḥ saṃvṛtaṃ sarvaṃ tāmrābhraiḥ khamivāvṛtam
रक्त से सने सब अंगों वाले उन कबन्धों से ढकी हुई वह रणभूमि ऐसी शोभित हुई जैसे ताँबे के रंग के बादलों से ढका आकाश।
श्लोक 57 (7.119.57)
वज्राशनिसमस्पर्शैः सुपर्वभिरजिह्मगैः । ते सात्वतेन निहताः समावव्रुर्वसुन्धराम् ॥
vajrāśanisamasparśaiḥ suparvabhirajihmagaiḥ | te sātvatena nihatāḥ samāvavrurvasundharām
वज्र और बिजली जैसे स्पर्श वाले, सुन्दर गाँठों वाले सीधे जाने वाले बाणों से सात्वत द्वारा मारे गए वे धरती को ढक बैठे।
श्लोक 58 (7.119.58)
तेषामस्त्राणि बाणांश्च शैनेयो नतपर्वभिः । निचकर्त महाराज यवनानां शिरोधराः ॥
teṣāmastrāṇi bāṇāṃśca śaineyo nataparvabhiḥ | nicakarta mahārāja yavanānāṃ śirodharāḥ
हे महाराज, सात्यकि ने सीधी गाँठ वाले बाणों से उनके अस्त्र और बाण काट डाले, और यवनों की गर्दनें भी।
श्लोक 59 (7.119.59)
ते शरा नतपर्वाणो युयुधानप्रचोदिताः । हित्वा देहांस्तथा तेषां पतन्ति स्म महीतले ॥
te śarā nataparvāṇo yuyudhānapracoditāḥ | hitvā dehāṃstathā teṣāṃ patanti sma mahītale
युयुधान के चलाए हुए वे सीधी गाँठ वाले बाण उनके शरीरों को पार करके धरती पर गिर पड़ते थे।
श्लोक 60 (7.119.60)
ते हन्यमाना वीरास्तु वृष्णिवीरेण संयुगे । शस्त्राहताः पतन्त्युर्व्यां काम्भोजाः सपदानुगाः ॥
te hanyamānā vīrāstu vṛṣṇivīreṇa saṃyuge | śastrāhatāḥ patantyurvyāṃ kāmbhojāḥ sapadānugāḥ
वृष्णि-वीर के हाथों युद्ध में मारे जाते हुए वे काम्भोज वीर अपने अनुचरों सहित शस्त्रों से कटकर धरती पर गिरते जाते थे।
श्लोक 61 (7.119.61)
काम्भोजानां भुजैश्छिन्नैर्यवनानां च भारत । तत्रतत्र मही भाति पञ्चास्यैरिव पन्नगैः ॥
kāmbhojānāṃ bhujaiśchinnairyavanānāṃ ca bhārata | tatratatra mahī bhāti pañcāsyairiva pannagaiḥ
हे भारत, काम्भोजों और यवनों की कटी हुई भुजाओं से जहाँ-तहाँ धरती पाँच फन वाले साँपों से ढकी-सी दिखाई देती थी।
श्लोक 62 (7.119.62)
अल्पावशिष्टाः सम्भग्नाः कृच्छ्रप्राणा विचेतसः । जिताः सङ्ख्ये महाराज युयुधानेन दंशिताः ॥
alpāvaśiṣṭāḥ sambhagnāḥ kṛcchraprāṇā vicetasaḥ | jitāḥ saṅkhye mahārāja yuyudhānena daṃśitāḥ
जो थोड़े-से बचे थे, वे टूटे हुए, बड़ी कठिनाई से प्राण बचाए, होश खोए हुए कवचधारी योद्धा भी, हे महाराज, युयुधान से युद्ध में हार गए।
श्लोक 63 (7.119.63)
पार्ष्णिभिश्च कशाभिश्च ताडयन्तस्तुरङ्गमान् । जवमुत्तममास्थाय सर्वतः प्राद्रवन्भयात् ॥
pārṣṇibhiśca kaśābhiśca tāḍayantasturaṅgamān | javamuttamamāsthāya sarvataḥ prādravanbhayāt
एड़ियों और कोड़ों से घोड़ों को मारते हुए वे पूरी तेजी से भय के मारे चारों ओर भाग खड़े हुए।
श्लोक 64 (7.119.64)
काम्भोजसैन्यं विद्राव्य दुर्जयं युधि भारत । यवनानां च तत्सैन्यं शकानां च महद्बलम् ॥
kāmbhojasainyaṃ vidrāvya durjayaṃ yudhi bhārata | yavanānāṃ ca tatsainyaṃ śakānāṃ ca mahadbalam
हे भारत, युद्ध में अजेय काम्भोज-सेना को, यवनों की उस सेना को और शकों के विशाल दल को भगाकर,
श्लोक 65 (7.119.65)
ततः स पुरुषव्याघ्रः सात्यकिः सत्यविक्रमः । प्रहृष्टस्तावकाञ्जित्वा सूतं याहीत्यचोदयत् ॥
tataḥ sa puruṣavyāghraḥ sātyakiḥ satyavikramaḥ | prahṛṣṭastāvakāñjitvā sūtaṃ yāhītyacodayat
पुरुषों में व्याघ्र, सत्य-पराक्रमी सात्यकि ने हर्षित होकर आपके योद्धाओं को जीतने के बाद सारथि को "चलो" कहकर प्रेरित किया।
श्लोक 66 (7.119.66)
तत्तस्य समरे कर्म दृष्ट्वाऽन्यैरकृतं पुरा । चारणाः सहगन्धर्वाः पूजयाञ्चक्रिरे भृशम् ॥
tattasya samare karma dṛṣṭvā'nyairakṛtaṃ purā | cāraṇāḥ sahagandharvāḥ pūjayāñcakrire bhṛśam
रण में उसका वह कर्म देखकर, जो पहले किसी और ने नहीं किया था, चारणों और गन्धर्वों ने उसकी बहुत प्रशंसा की।
श्लोक 67 (7.119.67)
तं यान्तं पृष्ठगोप्तारमर्जुनस्य विशाम्पते । चारणाः प्रेक्ष्य संहृष्टास्त्वदीयाश्चाभ्यपूजयन् ॥
taṃ yāntaṃ pṛṣṭhagoptāramarjunasya viśāmpate | cāraṇāḥ prekṣya saṃhṛṣṭāstvadīyāścābhyapūjayan
अर्जुन के पीछे की रक्षा करने वाले उसे आगे बढ़ते देखकर, हे प्रजापति, हर्षित चारणों ने और आपके योद्धाओं ने भी उसका सत्कार किया।