द्रोण पर्व · अध्याय 120
सात्यकि का कौरव-सेना को भेदना
काम्भोज और यवन सेनाओं को पार करके सात्यकि कौरव-सेना के बीच से आगे बढ़ते हैं, और दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि आदि उनका पीछा कर उन्हें घेर लेते हैं। सात्यकि अपने सारथि को धीरज देते हैं, घोषणा करते हैं कि वे इस सेना-सागर को रोक देंगे, और सैकड़ों घोड़ों व हाथियों को मार गिराते हैं। आगे के द्वन्द्व में वे कौरव राजकुमारों को घायल करते हैं, दुर्योधन के सारथि को मारते हैं जिससे राजा का रथ युद्धभूमि से हट जाता है, सेना को तितर-बितर करते हैं और अर्जुन के रथ की ओर बढ़ चलते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.120.1)
जित्वा यवनकाम्भोजान्युयुधानस्ततोऽर्जुनम् । जगाम तव सैन्यस्य मध्येन रथिनां वरः ॥
jitvā yavanakāmbhojānyuyudhānastato'rjunam | jagāma tava sainyasya madhyena rathināṃ varaḥ
यवनों और काम्भोजों को जीत लेने के बाद रथियों में श्रेष्ठ युयुधान अर्जुन की ओर चल पड़ा और आपकी सेना के बीच से होकर निकल गया।
श्लोक 2 (7.120.2)
शरदंष्ट्रो नरव्याघ्रो विचित्रकवचच्छविः । मृगं व्याघ्र इवाजिघ्रंस्तव सैन्यमभीषयत् ॥
śaradaṃṣṭro naravyāghro vicitrakavacacchaviḥ | mṛgaṃ vyāghra ivājighraṃstava sainyamabhīṣayat
बाण ही जिसकी दाढ़ें थे और जिसके कवच की छटा विचित्र रंगों से दमक रही थी, वह पुरुषों में व्याघ्र उसी प्रकार आपकी सेना को डराने लगा जैसे बाघ मृग को सूँघकर डराता है।
श्लोक 3 (7.120.3)
स रथेन चरन्मार्गान्धनुरुद्भ्रामयद्भृशम् । रुक्मपृष्ठं महावेगं रुक्मचन्द्रकसङ्कुलम् ॥
sa rathena caranmārgāndhanurudbhrāmayadbhṛśam | rukmapṛṣṭhaṃ mahāvegaṃ rukmacandrakasaṅkulam
रथ को अनेक मार्गों में घुमाते हुए वह अपने धनुष को ज़ोर से घुमा रहा था, जिसकी पीठ सोने की थी, जिसका वेग प्रचण्ड था और जो सोने के अर्धचन्द्रों से जड़ा हुआ था।
श्लोक 4 (7.120.4)
रुक्माङ्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृतः । रुक्मध्वजधनुः शूरो मेरुशृङ्गमिवाबभौ ॥
rukmāṅgadaśirastrāṇo rukmavarmasamāvṛtaḥ | rukmadhvajadhanuḥ śūro meruśṛṅgamivābabhau
सोने के बाजूबन्द, सोने के शिरस्त्राण और सोने के कवच से ढका तथा सोने की ध्वजा और सोने के धनुष वाला वह शूर मेरु के शिखर के समान चमक रहा था।
श्लोक 5 (7.120.5)
सधनुर्मण्डलः सङ्ख्ये तेजोभासुररश्मिवान् । शरदीवोदितः सूर्यो नृसूर्यो विरराज ह ॥
sadhanurmaṇḍalaḥ saṅkhye tejobhāsuraraśmivān | śaradīvoditaḥ sūryo nṛsūryo virarāja ha
युद्ध में धनुष को मण्डलाकार खींचे हुए, तेज से दीप्त किरणों वाला वह नरों में सूर्य शरद् ऋतु के उदित सूर्य के समान शोभा पा रहा था।
श्लोक 6 (7.120.6)
वृषभस्कन्धविक्रान्तो वृषभाक्षो नरर्षभः । तावकानां बभौ मध्ये गवां मध्ये यथा वृषः ॥
vṛṣabhaskandhavikrānto vṛṣabhākṣo nararṣabhaḥ | tāvakānāṃ babhau madhye gavāṃ madhye yathā vṛṣaḥ
बैल के समान कन्धों वाला, बैल जैसी आँखों वाला वह नरश्रेष्ठ आपके योद्धाओं के बीच ऐसे शोभित हुआ जैसे गायों के बीच साँड़।
श्लोक 7 (7.120.7)
मत्तद्विरदसङ्काशं मत्तद्विरदगामिनम् । प्रभिन्नमिव मातङ्गं यूथमध्ये व्यवस्थितम् ॥
mattadviradasaṅkāśaṃ mattadviradagāminam | prabhinnamiva mātaṅgaṃ yūthamadhye vyavasthitam
मतवाले हाथी के समान रूप और चाल वाला वह यूथ के बीच मदस्रावी गजराज की भाँति खड़ा था।
श्लोक 8 (7.120.8)
व्याधा इव जिघांसन्तस्त्वदीयाः समुपाद्रवन् । सात्यकिं समरे राजन्परिवव्रुस्तवात्मजाः ॥
vyādhā iva jighāṃsantastvadīyāḥ samupādravan | sātyakiṃ samare rājanparivavrustavātmajāḥ
वध करना चाहने वाले व्याधों की भाँति आपके योद्धा उस पर टूट पड़े; हे राजन्, आपके पुत्रों ने युद्ध में सात्यकि को घेर लिया।
श्लोक 9 (7.120.9)
द्रोणानीकमतिक्रान्तं भोजानीकं च दुस्तरम् । जलसन्धार्णवं तीर्त्वा काम्भोजानां च वाहिनीम् ॥
droṇānīkamatikrāntaṃ bhojānīkaṃ ca dustaram | jalasandhārṇavaṃ tīrtvā kāmbhojānāṃ ca vāhinīm
द्रोण की सेना और दुस्तर भोज-सेना को लाँघकर, जलसन्ध की सेना-रूपी समुद्र और काम्भोजों की वाहिनी को भी पार करके वह निकल आया था।
श्लोक 10 (7.120.10)
हार्दिक्यमकरान्मुक्तं तीर्णं वै सैन्यसागरम् । परिवव्रुः सुसङ्क्रुद्वास्त्वदीयाः सात्यकिं रथाः ॥
hārdikyamakarānmuktaṃ tīrṇaṃ vai sainyasāgaram | parivavruḥ susaṅkrudvāstvadīyāḥ sātyakiṃ rathāḥ
हार्दिक्य (कृतवर्मा) रूपी मगर से छूटकर वह उस सेना-सागर को पार कर चुका था, फिर भी आपके रथी अत्यन्त क्रुद्ध होकर सात्यकि को घेरने लगे।
श्लोक 11 (7.120.11)
दुर्योधनश्चित्रसेनो दुःशासनविविंशती । शकुनिर्दुःसहश्चैव युवा दुर्धर्षणः क्रथः ॥
duryodhanaścitraseno duḥśāsanaviviṃśatī | śakunirduḥsahaścaiva yuvā durdharṣaṇaḥ krathaḥ
दुर्योधन, चित्रसेन, दुःशासन और विविंशति, शकुनि, दुःसह, युवा दुर्धर्षण और क्रथ—
श्लोक 12 (7.120.12)
अन्ये च बहवः शूराः शस्त्रवन्तो दुरासदाः । पृष्ठतः सात्यकिं यान्तमन्वधावन्नमर्षिणः ॥
anye ca bahavaḥ śūrāḥ śastravanto durāsadāḥ | pṛṣṭhataḥ sātyakiṃ yāntamanvadhāvannamarṣiṇaḥ
तथा और भी बहुत-से शस्त्रधारी, दुर्जय और क्रोधित शूर, जाते हुए सात्यकि के पीछे-पीछे दौड़ पड़े।
श्लोक 13 (7.120.13)
अथ शब्दो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष । मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ॥
atha śabdo mahānāsīttava sainyasya māriṣa | mārutoddhūtavegasya sāgarasyeva parvaṇi
हे मान्यवर, तब आपकी सेना में वैसा ही भारी कोलाहल उठा जैसा पूर्णिमा के पर्व पर वायु से उछाले हुए समुद्र का होता है।
श्लोक 14 (7.120.14)
तानभिद्रवतः सर्वान्समीक्ष्य शिनिपुङ्गवः । शनैर्याहीति यन्तारमब्रवीत्प्रहसन्निव ॥
tānabhidravataḥ sarvānsamīkṣya śinipuṅgavaḥ | śanairyāhīti yantāramabravītprahasanniva
उन सबको दौड़ते आते देख शिनिवंश के श्रेष्ठ सात्यकि ने मानो हँसते हुए सारथि से कहा, "धीरे चलो।"
सात्यकिरुवाच
श्लोक 15 (7.120.15)
इदमेति समुद्धूतं धार्तराष्ट्रबलं महत् । मामेवाभिमुखं तूर्णं गजाश्वरथपत्तिमत् । नादयद्वै दिशः सर्वा रथघोषेण सारथे ॥
idameti samuddhūtaṃ dhārtarāṣṭrabalaṃ mahat | māmevābhimukhaṃ tūrṇaṃ gajāśvarathapattimat | nādayadvai diśaḥ sarvā rathaghoṣeṇa sārathe
"सारथि, धृतराष्ट्र-पुत्रों की यह विशाल सेना उमड़कर सीधे मेरी ही ओर तेज़ी से चली आ रही है, हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से भरी, और रथों की घरघराहट से सारी दिशाओं को गुँजाती हुई,"
श्लोक 16 (7.120.16)
पृथिवीं चान्तरिक्षं च कम्पयन्सागरानपि । एतद्बलार्णवं सूत वारयिष्ये महारणे । पौर्णमास्यामिवोद्धूतं वेलेव मकरालयम् ॥
pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca kampayansāgarānapi | etadbalārṇavaṃ sūta vārayiṣye mahāraṇe | paurṇamāsyāmivoddhūtaṃ veleva makarālayam
पृथ्वी, आकाश और समुद्रों तक को हिलाती हुई। सारथि, सेना के इस समुद्र को मैं इस महायुद्ध में रोक लूँगा, जैसे पूर्णिमा पर उमड़े हुए मगरों के घर समुद्र को तट रोक लेता है।"
श्लोक 17 (7.120.17)
पश्य मे सूत विक्रान्तमिन्द्रस्येव महामृधे । एष सैन्यानि शत्रूणां विधमामि शितैः शरैः ॥
paśya me sūta vikrāntamindrasyeva mahāmṛdhe | eṣa sainyāni śatrūṇāṃ vidhamāmi śitaiḥ śaraiḥ
"सारथि, महायुद्ध में इन्द्र के समान मेरा पराक्रम देखो। मैं अपने तीखे बाणों से शत्रुओं की सेनाओं को छिन्न-भिन्न किए देता हूँ।
श्लोक 18 (7.120.18)
निहतानाहवे पश्य पदात्यश्वरथद्विपान् । मच्छरैरग्निसङ्काशैर्विद्धदेहान्सहस्रशः ॥
nihatānāhave paśya padātyaśvarathadvipān | maccharairagnisaṅkāśairviddhadehānsahasraśaḥ
देखो, युद्ध में मारे गए पैदल, घोड़े, रथ और हाथी, जिनके शरीर मेरे अग्नि-जैसे दहकते बाणों से हज़ारों की संख्या में बिंध गए हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (7.120.19)
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य सात्यकेरमितौजसः । समीपे सैनिकास्ते तु शीघ्रमीयुर्युयुत्सवः । जह्याद्रवस्व तिष्ठेति पश्यपश्येति वादिनः ॥
ityevaṃ bruvatastasya sātyakeramitaujasaḥ | samīpe sainikāste tu śīghramīyuryuyutsavaḥ | jahyādravasva tiṣṭheti paśyapaśyeti vādinaḥ
अपार बल वाले सात्यकि के यों कहते-कहते युद्ध के इच्छुक सैनिक शीघ्र ही उनके पास आ पहुँचे और चिल्लाने लगे, "मारो! टूट पड़ो! ठहरो! देखो, देखो!"
श्लोक 20 (7.120.20)
तानेवं ब्रुवतो वीरान्सात्यकिर्निशितैः शरैः । जघान त्रिशतानश्वान्कुञ्जरांश्च चतुःशतान् । लध्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रहरञ्शिनिपुङ्गवः ॥
tānevaṃ bruvato vīrānsātyakirniśitaiḥ śaraiḥ | jaghāna triśatānaśvānkuñjarāṃśca catuḥśatān | ladhvastraścitrayodhī ca praharañśinipuṅgavaḥ
जब वे वीर ऐसा कह रहे थे, तभी सात्यकि ने अपने तीखे बाणों से तीन सौ घोड़ों और चार सौ हाथियों को मार डाला। शिनिवंश का वह साँड़ अस्त्र चलाने में फुर्तीला और विचित्र ढंग से लड़ने वाला था।
श्लोक 21 (7.120.21)
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तस्य तेषां च धन्विनाम् । देवासुररणप्रख्यः प्रावर्तत जनक्षयः ॥
sa samprahārastumulastasya teṣāṃ ca dhanvinām | devāsuraraṇaprakhyaḥ prāvartata janakṣayaḥ
फिर उसके और उन धनुर्धारियों के बीच भयंकर संग्राम छिड़ गया, जो देवासुर-संग्राम के समान था और जिसमें मनुष्यों का संहार हो रहा था।
श्लोक 22 (7.120.22)
मेघजालनिभं सैन्यं तव पुत्रस्य मारिष । प्रत्यगृह्णाच्छिनेः पौत्रः शरैराशीविषोपमैः ॥
meghajālanibhaṃ sainyaṃ tava putrasya māriṣa | pratyagṛhṇācchineḥ pautraḥ śarairāśīviṣopamaiḥ
हे मान्यवर, आपके पुत्र की मेघ-समूह जैसी उस सेना का सामना शिनि के पौत्र ने विषैले सर्पों जैसे बाणों से किया।
श्लोक 23 (7.120.23)
प्रच्छाद्यमानः समरे शरजालैः स वीर्यवान् । असम्भ्रमन्महाराज तावकानवधीद्बहून् ॥
pracchādyamānaḥ samare śarajālaiḥ sa vīryavān | asambhramanmahārāja tāvakānavadhīdbahūn
युद्ध में उनके बाणों के जाल से ढका जाने पर भी वह पराक्रमी बिना घबराए आपके बहुत-से योद्धाओं को मारता रहा, हे महाराज।
श्लोक 24 (7.120.24)
आश्चर्यं तत्र राजेन्द्र सुमहद्दृष्टवानहम् । न मोघः सायकः कश्चित्सात्यकेरभवत्प्रभो ॥
āścaryaṃ tatra rājendra sumahaddṛṣṭavānaham | na moghaḥ sāyakaḥ kaścitsātyakerabhavatprabho
हे राजेन्द्र, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा: हे प्रभु, सात्यकि का कोई भी बाण व्यर्थ नहीं गया।
श्लोक 25 (7.120.25)
रथनागाश्वकलिलः पदात्यूर्मिसमाकुलः । शैनेयवेलामासाद्य स्थितः सैन्यमहार्णवः ॥
rathanāgāśvakalilaḥ padātyūrmisamākulaḥ | śaineyavelāmāsādya sthitaḥ sainyamahārṇavaḥ
रथ, हाथी और घोड़ों से भरा तथा पैदलों की लहरों से उमड़ता हुआ वह सेना-महासागर शैनेय-रूपी तट तक पहुँचकर रुक गया।
श्लोक 26 (7.120.26)
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमावर्तत मुहुर्मुहुः । तत्सैन्यमिषुभिस्तेन वध्यमानं समन्ततः । बभ्राम तत्रतत्रैव गावः शीतार्दिता इव ॥
sambhrāntanaranāgāśvamāvartata muhurmuhuḥ | tatsainyamiṣubhistena vadhyamānaṃ samantataḥ | babhrāma tatratatraiva gāvaḥ śītārditā iva
उसके बाणों से चारों ओर मारी जाती हुई वह सेना, जिसके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबरा गए थे, बार-बार चक्कर काटती थी और जाड़े से पीड़ित गायों की तरह इधर-उधर भटकती फिरती थी।
श्लोक 27 (7.120.27)
पदातिनं रथं नागं सादिनं तुरगं तथा । अविद्धं तत्र नाद्राक्षं युयुधानस्य सायकैः ॥
padātinaṃ rathaṃ nāgaṃ sādinaṃ turagaṃ tathā | aviddhaṃ tatra nādrākṣaṃ yuyudhānasya sāyakaiḥ
वहाँ मैंने कोई भी पैदल, रथ, हाथी, घुड़सवार या घोड़ा ऐसा नहीं देखा जो युयुधान के बाणों से बिंधा न हो।
श्लोक 28 (7.120.28)
न तादृक्कदनं राजन्कृतवांस्तत्र फल्गुनः । यादृक्क्षयमनीकानामकरोत्सात्यकिर्नृप ॥
na tādṛkkadanaṃ rājankṛtavāṃstatra phalgunaḥ | yādṛkkṣayamanīkānāmakarotsātyakirnṛpa
हे राजन्, जैसा संहार सात्यकि ने आपकी सेनाओं का किया, हे नरेश्वर, वैसा संहार वहाँ फल्गुन (अर्जुन) ने भी नहीं किया।
श्लोक 29 (7.120.29)
अत्यर्जुनं शिनेः पौत्रो युध्यते पुरुषर्षभः । वीतभीर्लाघवोपेतः कृतित्वं सम्प्रदर्शयन् ॥
atyarjunaṃ śineḥ pautro yudhyate puruṣarṣabhaḥ | vītabhīrlāghavopetaḥ kṛtitvaṃ sampradarśayan
शिनि का पौत्र, वह पुरुषश्रेष्ठ, निर्भय और फुर्तीला होकर अपनी कुशलता दिखाता हुआ अर्जुन से भी बढ़कर लड़ रहा था।
श्लोक 30 (7.120.30)
ततो दुर्योधनो राजा सात्वतस्य त्रिभिः शरैः । विव्याध सूतं निशितैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
tato duryodhano rājā sātvatasya tribhiḥ śaraiḥ | vivyādha sūtaṃ niśitaiścaturbhiścaturo hayān
तब राजा दुर्योधन ने सात्वत (सात्यकि) के सारथि को तीन बाणों से और उसके चारों घोड़ों को चार तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 31 (7.120.31)
सात्यकिं च त्रिभिर्विद्ध्वा पुनरष्टाभिरेव च । दुःशासनः षोडशभिर्विव्याध शिनिपुङ्गवम् ॥
sātyakiṃ ca tribhirviddhvā punaraṣṭābhireva ca | duḥśāsanaḥ ṣoḍaśabhirvivyādha śinipuṅgavam
दुर्योधन ने सात्यकि को तीन बाणों से और फिर आठ बाणों से बेधा, और दुःशासन ने शिनिवंश के उस श्रेष्ठ वीर को सोलह बाणों से बेध डाला।
श्लोक 32 (7.120.32)
शकुनिः पञ्चविंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः । दुःसहः पञ्चदशभिर्विव्याधोरसि सात्यकिम् ॥
śakuniḥ pañcaviṃśatyā citrasenaśca pañcabhiḥ | duḥsahaḥ pañcadaśabhirvivyādhorasi sātyakim
शकुनि ने पच्चीस, चित्रसेन ने पाँच और दुःसह ने पन्द्रह बाणों से सात्यकि की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 33 (7.120.33)
उत्स्मयन्वृष्णिशार्दूलस्तथा बाणैः समाहतः । तानविध्यन्महाराज सर्वानेव त्रिभिस्त्रिभिः ॥
utsmayanvṛṣṇiśārdūlastathā bāṇaiḥ samāhataḥ | tānavidhyanmahārāja sarvāneva tribhistribhiḥ
उनके बाणों से घायल होने पर भी वृष्णि-वंश का वह व्याघ्र मुस्कराता रहा और हे महाराज, उसने उन सबको तीन-तीन बाणों से बेध दिया।
श्लोक 34 (7.120.34)
गाढविद्धानरीन्कृत्वा मार्गणैः सोऽतितेजनैः । शैनेयः श्येनवत्सङ्ख्ये व्यचरल्लघुविक्रमः ॥
gāḍhaviddhānarīnkṛtvā mārgaṇaiḥ so'titejanaiḥ | śaineyaḥ śyenavatsaṅkhye vyacarallaghuvikramaḥ
अपने अति तीक्ष्ण बाणों से शत्रुओं को गहरा घायल करके फुर्तीले शैनेय बाज की तरह युद्धभूमि में विचरने लगे।
श्लोक 35 (7.120.35)
सौबलस्य धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च । दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥
saubalasya dhanuśchittvā hastāvāpaṃ nikṛtya ca | duryodhanaṃ tribhirbāṇairabhyavidhyatstanāntare
उन्होंने शकुनि का धनुष काट दिया और उसका दस्ताना भी काट डाला, और तीन बाणों से दुर्योधन की छाती के बीच प्रहार किया।
श्लोक 36 (7.120.36)
चित्रसेनं शतेनैव दशभिर्दुःसहं तथा । दुःशासनं तु विंशत्या विव्याध शिनिपुङ्गवः ॥
citrasenaṃ śatenaiva daśabhirduḥsahaṃ tathā | duḥśāsanaṃ tu viṃśatyā vivyādha śinipuṅgavaḥ
शिनिवंश के उस श्रेष्ठ वीर ने चित्रसेन को सौ, दुःसह को दस और दुःशासन को बीस बाणों से बेध दिया।
श्लोक 37 (7.120.37)
अथान्यद्धनुरादाय श्यालस्तव विशाम्पते । अष्टाभिः सात्यकिं विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥
athānyaddhanurādāya śyālastava viśāmpate | aṣṭābhiḥ sātyakiṃ viddhvā punarvivyādha pañcabhiḥ
तब हे प्रजापालक, आपके साले (शकुनि) ने दूसरा धनुष लेकर सात्यकि को आठ बाणों से बेधा और फिर पाँच से बेधा।
श्लोक 38 (7.120.38)
दुःशासनश्च दशभिर्दुःसहश्च त्रिभिः शरैः । दुर्मुखश्च द्वादशभी राजन्विव्याध सात्यकिम् ॥
duḥśāsanaśca daśabhirduḥsahaśca tribhiḥ śaraiḥ | durmukhaśca dvādaśabhī rājanvivyādha sātyakim
दुःशासन ने दस, दुःसह ने तीन और दुर्मुख ने बारह बाणों से, हे राजन्, सात्यकि को बेध दिया।
श्लोक 39 (7.120.39)
दुर्योधनस्त्रिसप्तत्या विद्ध्वा भारत माधवम् । ततोऽस्य निशितैर्बाणैस्त्रिभिर्विव्याध सारथिम् ॥
duryodhanastrisaptatyā viddhvā bhārata mādhavam | tato'sya niśitairbāṇaistribhirvivyādha sārathim
हे भारत, दुर्योधन ने माधव (सात्यकि) को तिहत्तर बाणों से बेधकर फिर तीन तीखे बाणों से उसके सारथि को बेध दिया।
श्लोक 40 (7.120.40)
तान्सर्वान्सहिताञ्शूरान्यतमानान्महारथान् । पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैः पुनर्विव्याध सात्यकिः ॥
tānsarvānsahitāñśūrānyatamānānmahārathān | pañcabhiḥ pañcabhirbāṇaiḥ punarvivyādha sātyakiḥ
सात्यकि ने भी एकजुट होकर प्रयत्न करते हुए उन सब महारथी शूरों को फिर पाँच-पाँच बाणों से बेध दिया।
श्लोक 41 (7.120.41)
ततः स रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम् । आजघानाशु भल्लेन स हतो न्यपतद्भुवि ॥
tataḥ sa rathināṃ śreṣṭhastava putrasya sārathim | ājaghānāśu bhallena sa hato nyapatadbhuvi
फिर रथियों में श्रेष्ठ सात्यकि ने तुरन्त एक भल्ल से आपके पुत्र के सारथि को मार गिराया, और वह मरकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 42 (7.120.42)
पतिते सारथौ तस्मिंस्तव पुत्ररथः प्रभो । वातायमानैस्तैरश्वैरपानीयत सङ्गरात् ॥
patite sārathau tasmiṃstava putrarathaḥ prabho | vātāyamānaistairaśvairapānīyata saṅgarāt
सारथि के गिरने पर, हे प्रभु, आपके पुत्र के रथ को वायु की तरह दौड़ते घोड़े युद्धभूमि से बाहर ले गए।
श्लोक 43 (7.120.43)
ततस्तव सुतो राजन्सैनिकाश्च विशाम्पते । राज्ञो रथमभिप्रेक्ष्य विद्रुताः शतशोऽभवन् ॥
tatastava suto rājansainikāśca viśāmpate | rājño rathamabhiprekṣya vidrutāḥ śataśo'bhavan
तब हे राजन्, आपके पुत्र और सैनिक भी, हे प्रजापालक, राजा के रथ को देखकर सैकड़ों की संख्या में भाग खड़े हुए।
श्लोक 44 (7.120.44)
विद्रुतं तत्र तत्सैन्यं दृष्ट्वा भारत सात्यकिः । अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णै रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥
vidrutaṃ tatra tatsainyaṃ dṛṣṭvā bhārata sātyakiḥ | avākiraccharaistīkṣṇai rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ
हे भारत, उस सेना को भागते देख सात्यकि ने उस पर सोने के पंख वाले, पत्थर पर तेज़ किए हुए तीखे बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 45 (7.120.45)
विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि सहस्रशः । प्रययौ सात्यकी राजञ्श्वेताश्वस्य रथं प्रति ॥
vidrāvya sarvasainyāni tāvakāni sahasraśaḥ | prayayau sātyakī rājañśvetāśvasya rathaṃ prati
आपकी सब सेनाओं को हज़ारों की संख्या में भगाकर, हे राजन्, सात्यकि श्वेत अश्वों वाले अर्जुन के रथ की ओर बढ़ चला।
श्लोक 46 (7.120.46)
तं प्रयान्तं महाबाहुं तावकाः प्रेक्ष्य मारिष । दृष्टं चादृष्टवत्कृत्वा क्रियामन्यामयोजयन् ॥
taṃ prayāntaṃ mahābāhuṃ tāvakāḥ prekṣya māriṣa | dṛṣṭaṃ cādṛṣṭavatkṛtvā kriyāmanyāmayojayan
उस महाबाहु को आगे बढ़ते देखकर, हे मान्यवर, आपके योद्धाओं ने देखकर भी अनदेखा कर दिया और दूसरे ही काम में लग गए।
श्लोक 47 (7.120.47)
तं शरानाददानं च रक्षमाणं च सारथिम् । आत्मानं पालयानं च तावकाः समपूजयन् ॥
taṃ śarānādadānaṃ ca rakṣamāṇaṃ ca sārathim | ātmānaṃ pālayānaṃ ca tāvakāḥ samapūjayan
जब वह बाण उठा रहा था, अपने सारथि की रक्षा कर रहा था और अपनी भी रक्षा कर रहा था, तब आपके योद्धाओं ने उसकी सराहना की।