द्रोण पर्व · अध्याय 121
सात्यकि और पाषाणयोधी
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि उनके पुत्रों ने सात्यकि को कैसे निकल जाने दिया, और सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन के आदेश से शक, काम्भोज, यवन, बाह्लीक और पर्वतीय जातियाँ उन पर टूट पड़ीं, और दुःशासन पत्थर फेंकने वालों को उकसाता रहा। सात्यकि नाराचों से उनकी पत्थरों की वर्षा को आकाश में ही चूर कर देते हैं और हज़ारों मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को मारकर युद्धभूमि पाट देते हैं। कोलाहल सुनकर द्रोण सारथि को उसी ओर रथ ले चलने को कहते हैं, पर सारथि चेताता है कि सेना भाग रही है और सात्यकि दूर निकल चुके हैं; दुःशासन के रथ भी द्रोण की सेना की ओर भाग आते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.121.1)
सम्प्रमृद्य महत्सैन्यं यान्तं शैनेयमर्जुनम् । निर्ह्रीका मम ते पुत्राः किमकुर्वत सञ्जय ॥
sampramṛdya mahatsainyaṃ yāntaṃ śaineyamarjunam | nirhrīkā mama te putrāḥ kimakurvata sañjaya
सञ्जय, शैनेय को विशाल सेना को कुचलकर अर्जुन की ओर जाते देखकर मेरे उन निर्लज्ज पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2 (7.121.2)
कथं चैषां तदा युद्धे धृतिरासीन्मुमूर्षताम् । शैनेयचरितं दृष्ट्वा यादृशं सव्यसाचिनः ॥
kathaṃ caiṣāṃ tadā yuddhe dhṛtirāsīnmumūrṣatām | śaineyacaritaṃ dṛṣṭvā yādṛśaṃ savyasācinaḥ
मरने पर उतारू उन लोगों का धैर्य उस युद्ध में कैसा रहा, जब उन्होंने शैनेय को सव्यसाची के समान पराक्रम करते देखा?
श्लोक 3 (7.121.3)
किं नु वक्ष्यन्ति ते क्षात्रं सैन्यमध्ये पराजिताः । कथं नु सात्यकिर्युद्धे व्यतिक्रान्तो महायशाः ॥
kiṃ nu vakṣyanti te kṣātraṃ sainyamadhye parājitāḥ | kathaṃ nu sātyakiryuddhe vyatikrānto mahāyaśāḥ
अपनी ही सेना के बीच पराजित होकर वे अपने क्षात्रधर्म के विषय में क्या कहेंगे? और यशस्वी सात्यकि युद्ध में उन्हें लाँघकर कैसे निकल गया?
श्लोक 4 (7.121.4)
कथं च मम पुत्राणां जीवतां तत्र सञ्जय । शैनेयोऽभिययौ युद्धे तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
kathaṃ ca mama putrāṇāṃ jīvatāṃ tatra sañjaya | śaineyo'bhiyayau yuddhe tanmamācakṣva sañjaya
और सञ्जय, मेरे पुत्रों के जीते-जी शैनेय युद्ध में कैसे आगे बढ़ गया? वह मुझे बताओ, सञ्जय।
श्लोक 5 (7.121.5)
अत्यद्भुतमिदं तात त्वत्सकाशाच्छृणोम्यहम् । एकस्य बहुभिः सार्धं शत्रुभिस्तैर्महारथैः ॥
atyadbhutamidaṃ tāta tvatsakāśācchṛṇomyaham | ekasya bahubhiḥ sārdhaṃ śatrubhistairmahārathaiḥ
वत्स, तुमसे मैं यह अत्यन्त अद्भुत बात सुन रहा हूँ: एक अकेले का उन इतने सारे शत्रु-महारथियों के साथ युद्ध।
श्लोक 6 (7.121.6)
विपरीतमहं मन्ये मन्दभाग्यं सुतं प्रति । यत्रावध्यन्त समरे सात्वतेन महारथाः ॥
viparītamahaṃ manye mandabhāgyaṃ sutaṃ prati | yatrāvadhyanta samare sātvatena mahārathāḥ
मैं इसे अपने अभागे पुत्र के लिए भाग्य का उलटा पड़ना मानता हूँ कि सात्वत (सात्यकि) के हाथों महारथी युद्ध में मारे जा रहे थे।
श्लोक 7 (7.121.7)
एकस्य हि न पर्याप्तं यत्सैन्यं तस्य सञ्जय । क्रुद्धस्य युयुधानस्य सर्वे तिष्ठन्तु पाण्डवाः ॥
ekasya hi na paryāptaṃ yatsainyaṃ tasya sañjaya | kruddhasya yuyudhānasya sarve tiṣṭhantu pāṇḍavāḥ
सञ्जय, क्रुद्ध युयुधान अकेले के लिए मेरे पुत्र की सारी सेना भी पर्याप्त नहीं है; सारे पाण्डव तो एक ओर रहें।
श्लोक 8 (7.121.8)
निर्जित्य समरे द्रोणं कृतिनं चित्रयोधिनम् । यथा पशुगणान्सिंहस्तद्वद्धन्ता सुतान्मम ॥
nirjitya samare droṇaṃ kṛtinaṃ citrayodhinam | yathā paśugaṇānsiṃhastadvaddhantā sutānmama
कुशल और विचित्र रीति से लड़ने वाले द्रोण को युद्ध में हराकर वह मेरे पुत्रों को वैसे ही मारेगा जैसे सिंह पशुओं के झुंड को मारता है।
श्लोक 9 (7.121.9)
कृतवर्मादिभिः शूरैर्यत्तैर्बहुभिराहवे । युयुधानो न शकितो हन्तुं यत्पुरुषर्षभः ॥
kṛtavarmādibhiḥ śūrairyattairbahubhirāhave | yuyudhāno na śakito hantuṃ yatpuruṣarṣabhaḥ
कृतवर्मा आदि बहुत-से यत्नशील शूरों के सामने होने पर भी वह पुरुषश्रेष्ठ युयुधान युद्ध में मारा न जा सका।
श्लोक 10 (7.121.10)
नैतदीदृशकं युद्धं कृतवांस्तत्र फल्गुनः । यादृशं कृतवान्युद्धं शिनेर्नप्ता महायशाः ॥
naitadīdṛśakaṃ yuddhaṃ kṛtavāṃstatra phalgunaḥ | yādṛśaṃ kṛtavānyuddhaṃ śinernaptā mahāyaśāḥ
यशस्वी शिनि-पौत्र ने जैसा युद्ध किया, वैसा युद्ध वहाँ फल्गुन (अर्जुन) ने नहीं किया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 11 (7.121.11)
तव दुर्मन्त्रिते राजन्दुर्योधनकृतेन च । शृणुष्वावहितो भूत्वा यत्ते वक्ष्यामि भारत ॥
tava durmantrite rājanduryodhanakṛtena ca | śṛṇuṣvāvahito bhūtvā yatte vakṣyāmi bhārata
हे राजन्, यह सब आपकी बुरी मन्त्रणा और दुर्योधन के किए का फल है। हे भारत, ध्यान से सुनिए, मैं आपसे जो कहने जा रहा हूँ।
श्लोक 12 (7.121.12)
ते पुनः सन्न्यवर्तन्त कृत्वा संशपथान्मिथः । परां युद्धे मतिं क्रूरां तव पुत्रस्य शासनात् ॥
te punaḥ sannyavartanta kṛtvā saṃśapathānmithaḥ | parāṃ yuddhe matiṃ krūrāṃ tava putrasya śāsanāt
आपके पुत्र की आज्ञा से, आपस में शपथ लेकर और युद्ध का क्रूर निश्चय करके, वे फिर लौट पड़े।
श्लोक 13 (7.121.13)
त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः । शककाम्भोजबालह्लीका यवनाः पारदास्तथा ॥
trīṇi sādisahasrāṇi duryodhanapurogamāḥ | śakakāmbhojabālahlīkā yavanāḥ pāradāstathā
तीन हज़ार घुड़सवार, जिनके आगे दुर्योधन था: शक, काम्भोज, बाह्लीक, यवन और पारद,
श्लोक 14 (7.121.14)
कुलिन्दास्तङ्कणाम्बष्ठाः पैशाचाश्च सबर्बराः । पार्वतीयाश्च राजेन्द्र क्रुद्धाः पाषाणपाणयः । अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा ॥
kulindāstaṅkaṇāmbaṣṭhāḥ paiśācāśca sabarbarāḥ | pārvatīyāśca rājendra kruddhāḥ pāṣāṇapāṇayaḥ | abhyadravanta śaineyaṃ śalabhāḥ pāvakaṃ yathā
कुलिन्द, तङ्कण, अम्बष्ठ, बर्बरों सहित पिशाच, और पहाड़ी लोग, हे राजेन्द्र, क्रोध से भरे, हाथों में पत्थर लिए, शैनेय पर वैसे ही टूट पड़े जैसे पतिंगे आग पर।
श्लोक 15 (7.121.15)
युक्ताश्च पार्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् । शूराः पञ्चशतं राजञ्शैनेयं समुपाद्रवन् ॥
yuktāśca pārvatīyānāṃ rathāḥ pāṣāṇayodhinām | śūrāḥ pañcaśataṃ rājañśaineyaṃ samupādravan
पत्थरों से लड़ने वाले पहाड़ियों के जुते हुए रथ भी, और पाँच सौ शूर, हे राजन्, शैनेय पर चढ़ आए।
श्लोक 16 (7.121.16)
ततो रथसहस्रेण महारथशतेन च । द्विरदानां सहस्रेण द्विसाहस्रैश्च वाजिभिः ॥
tato rathasahasreṇa mahārathaśatena ca | dviradānāṃ sahasreṇa dvisāhasraiśca vājibhiḥ
फिर एक हज़ार रथों, सौ महारथियों, एक हज़ार हाथियों और दो हज़ार घोड़ों के साथ—
श्लोक 17 (7.121.17)
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो विविधानि महारथाः । अभ्यद्रवन्त शैनेयमसङ्ख्येयाश्च पत्तयः ॥
śaravarṣāṇi muñcanto vividhāni mahārathāḥ | abhyadravanta śaineyamasaṅkhyeyāśca pattayaḥ
भाँति-भाँति की बाण-वर्षा करते हुए वे महारथी और असंख्य पैदल सैनिक शैनेय पर टूट पड़े।
श्लोक 18 (7.121.18)
तांश्च सञ्चोदयन्सर्वान्घ्नतैनमिति भारत । दुःशासनो महाराज सात्यकिं पर्यवारयत् ॥
tāṃśca sañcodayansarvānghnatainamiti bhārata | duḥśāsano mahārāja sātyakiṃ paryavārayat
"इसे मारो!" कहकर उन सबको उकसाता हुआ दुःशासन, हे महाराज, सात्यकि को चारों ओर से घेरने लगा।
श्लोक 19 (7.121.19)
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयचरितं महत् । यदेको बहुभिः सार्धमसम्भ्रान्तमयुध्यत ॥
tatrādbhutamapaśyāma śaineyacaritaṃ mahat | yadeko bahubhiḥ sārdhamasambhrāntamayudhyata
वहाँ हमने शैनेय का एक महान् आश्चर्यजनक पराक्रम देखा कि वह अकेला इतने सारे योद्धाओं से बिना घबराए लड़ता रहा।
श्लोक 20 (7.121.20)
अवधीच्च रथानीकं द्विरदानां च तद्बलम् । सादिनश्चैव तान्सर्वान्दस्यूनपि च सर्वशः ॥
avadhīcca rathānīkaṃ dviradānāṃ ca tadbalam | sādinaścaiva tānsarvāndasyūnapi ca sarvaśaḥ
उसने रथ-सेना को, हाथियों की उस सेना को, घुड़सवारों को और उन सब डाकुओं को भी सब ओर मार गिराया।
श्लोक 21 (7.121.21)
तत्र चक्रैर्विमथितैर्भग्नैश्च परमायुधैः । अक्षैश्च बहुधा भग्नैरीषादण्डकबन्धुरैः ॥
tatra cakrairvimathitairbhagnaiśca paramāyudhaiḥ | akṣaiśca bahudhā bhagnairīṣādaṇḍakabandhuraiḥ
वहाँ टूटे हुए पहियों, चकनाचूर उत्तम शस्त्रों और अनेक जगह टूटे, ईषादण्डों के साथ उभरे धुरों से धरती पटी पड़ी थी,
श्लोक 22 (7.121.22)
कुञ्जरैर्मथितैश्चापि ध्वजैश्च विनिपातितैः । वर्मभिश्च तथाऽनीकैर्व्यवकीर्णा वसुन्धरा ॥
kuñjarairmathitaiścāpi dhvajaiśca vinipātitaiḥ | varmabhiśca tathā'nīkairvyavakīrṇā vasundharā
कुचले हुए हाथियों, गिरे हुए ध्वजों, कवचों और टुकड़ियों से भी धरती बिछी हुई थी।
श्लोक 23 (7.121.23)
स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैरनुकर्षैश्च मारिष । सञ्छन्ना वसुधा तत्र द्यौर्ग्रहैरिव भारत ॥
sragbhirābharaṇairvastrairanukarṣaiśca māriṣa | sañchannā vasudhā tatra dyaurgrahairiva bhārata
हे मान्यवर, मालाओं, आभूषणों, वस्त्रों और रथ के ढाँचों से ढकी वहाँ की भूमि, हे भारत, ग्रहों से भरे आकाश जैसी लग रही थी।
श्लोक 24 (7.121.24)
गिरिरूपधरैश्चापि पतितैश्च महागजैः । म्लेच्छस्थितैर्महाराज भिन्नाञ्जनचयोपमैः ॥
girirūpadharaiścāpi patitaiśca mahāgajaiḥ | mlecchasthitairmahārāja bhinnāñjanacayopamaiḥ
वहाँ पर्वत जैसे विशाल हाथी भी गिरे पड़े थे, जिन पर म्लेच्छ सवार थे, हे महाराज, जो टूटे हुए अञ्जन के ढेरों जैसे दीखते थे;
श्लोक 25 (7.121.25)
मृगैर्मन्द्रैश्च भद्रैश्च मृगमन्द्रैस्तथाऽपरैः । भद्रैर्मन्द्रमृगैश्चैव मृगभद्रैस्तथैव च ॥
mṛgairmandraiśca bhadraiśca mṛgamandraistathā'paraiḥ | bhadrairmandramṛgaiścaiva mṛgabhadraistathaiva ca
मृग, मन्द्र और भद्र जाति के हाथी, मृग-मन्द्र तथा अन्य जातियों के भी; भद्र, मन्द्र-मृग और मृग-भद्र,
श्लोक 26 (7.121.26)
भद्रमन्द्रैश्चैव तथा तथा भद्रमृगैरपि । तत्रतत्र धरा कीर्णा शयानैः पर्वतोपमैः ॥
bhadramandraiścaiva tathā tathā bhadramṛgairapi | tatratatra dharā kīrṇā śayānaiḥ parvatopamaiḥ
भद्र-मन्द्र तथा भद्र-मृग भी: जहाँ-तहाँ पर्वतों जैसे लेटे हुए उन हाथियों से धरती पट गई थी।
श्लोक 27 (7.121.27)
अञ्जनस्य कुले जाता वामनस्य च भारत । सुप्रतीककुले जाता महापद्मकुले तथा ॥
añjanasya kule jātā vāmanasya ca bhārata | supratīkakule jātā mahāpadmakule tathā
अञ्जन और वामन के कुल में उत्पन्न, सुप्रतीक और महापद्म के कुल में उत्पन्न,
श्लोक 28 (7.121.28)
ऐरावतकुले चैव तथाऽन्येषु कुलेषु च । जाता दन्तिवरा राजञ्शेरते बहवो हताः ॥
airāvatakule caiva tathā'nyeṣu kuleṣu ca | jātā dantivarā rājañśerate bahavo hatāḥ
ऐरावत के कुल में और अन्य कुलों में उत्पन्न बहुत-से श्रेष्ठ गजराज, हे राजन्, मरे पड़े थे।
श्लोक 29 (7.121.29)
वनायुजान्पार्वतीयान्काम्भोजान्बाह्लिकानपि । तथा हयवरान्राजन्निजघ्ने तत्र सात्यकिः ॥
vanāyujānpārvatīyānkāmbhojānbāhlikānapi | tathā hayavarānrājannijaghne tatra sātyakiḥ
हे राजन्, वहाँ सात्यकि ने वनायु, पर्वत, काम्भोज और बाह्लीक देशों के उत्तम घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 30 (7.121.30)
नानादेशसमुत्थांश्च नानाजातींश्च दन्तिनः । निजघ्ने तत्र शैनेयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
nānādeśasamutthāṃśca nānājātīṃśca dantinaḥ | nijaghne tatra śaineyaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
अनेक देशों से आए और अनेक जातियों के हाथियों को शैनेय ने वहाँ सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में मार डाला।
श्लोक 31 (7.121.31)
तेषु प्रकाल्यमानेषु दस्यून्दुःशासनोऽब्रवीत् । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥
teṣu prakālyamāneṣu dasyūnduḥśāsano'bravīt | nivartadhvamadharmajñā yudhyadhvaṃ kiṃ sṛtena vaḥ
जब वे डाकू खदेड़े जा रहे थे, तब दुःशासन ने उनसे कहा, "लौटो, अधर्म जानने वालो! लड़ो! तुम्हारे भागने से क्या लाभ?"
श्लोक 32 (7.121.32)
तांश्चातिभग्नान्सम्प्रेक्ष्य पुत्रो दुःशासनस्तव । पाषाणयोधिनः शूरान्पार्वतीयानचोदयत् ॥
tāṃścātibhagnānsamprekṣya putro duḥśāsanastava | pāṣāṇayodhinaḥ śūrānpārvatīyānacodayat
उन्हें बुरी तरह टूटा देखकर आपके पुत्र दुःशासन ने पत्थरों से लड़ने वाले उन शूर पहाड़ियों को आगे बढ़ाया।
दुःशासन उवाच
श्लोक 33 (7.121.33)
अश्मयुद्धेषु कुशला नैतज्जानाति सात्यकिः । अश्मयुद्धमजानन्तं हतैनं युद्धकामुकम् ॥
aśmayuddheṣu kuśalā naitajjānāti sātyakiḥ | aśmayuddhamajānantaṃ hatainaṃ yuddhakāmukam
"तुम पत्थरों से लड़ने में कुशल हो; सात्यकि यह विद्या नहीं जानता। पत्थरों की लड़ाई न जानने वाले इस युद्ध-लोलुप को मार डालो।
श्लोक 34 (7.121.34)
तथैव कुरवः सर्वे नाश्मयुद्धविशारदाः । अभिद्रवत माभैष्ट न वः प्राप्स्यति सात्यकिः ॥
tathaiva kuravaḥ sarve nāśmayuddhaviśāradāḥ | abhidravata mābhaiṣṭa na vaḥ prāpsyati sātyakiḥ
इसी प्रकार सब कौरव भी पत्थरों के युद्ध में निपुण नहीं हैं। टूट पड़ो, डरो मत; सात्यकि तुम्हें नहीं पा सकेगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (7.121.35)
ते पार्वतीया राजानः सर्वे पाषाणयोधिनः । अभ्यद्रवन्त शैनेयं राजानमिव मन्त्रिणः ॥
te pārvatīyā rājānaḥ sarve pāṣāṇayodhinaḥ | abhyadravanta śaineyaṃ rājānamiva mantriṇaḥ
पत्थरों से लड़ने वाले वे सब पहाड़ी राजा, राजा पर मन्त्रियों की तरह, शैनेय पर टूट पड़े।
श्लोक 36 (7.121.36)
ततो गजशिरःप्रख्यैरुपलैः शैलवासिनः । उद्यतैर्युयुधानस्य पुरतस्तस्थुराहवे ॥
tato gajaśiraḥprakhyairupalaiḥ śailavāsinaḥ | udyatairyuyudhānasya puratastasthurāhave
तब पर्वतवासी हाथी के सिर जैसी शिलाओं को उठाए हुए युद्ध में युयुधान के सामने आ डटे।
श्लोक 37 (7.121.37)
क्षेपणीयैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिणः । चोदितास्तव पुत्रेण सर्वतो रुरुधुर्दिशः ॥
kṣepaṇīyaistathāpyanye sātvatasya vadhaiṣiṇaḥ | coditāstava putreṇa sarvato rurudhurdiśaḥ
फेंकने के साधनों से लैस दूसरे लोग, जो सात्वत को मारना चाहते थे, आपके पुत्र के उकसाने पर सब दिशाओं को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 38 (7.121.38)
तेषामापततामेव शिलायुद्धं चिकीर्षताम् । सात्यकिः प्रतिसन्धाय निशितान्प्राहिणोच्छरान् ॥
teṣāmāpatatāmeva śilāyuddhaṃ cikīrṣatām | sātyakiḥ pratisandhāya niśitānprāhiṇoccharān
जब वे शिलाओं से युद्ध करने की इच्छा से टूट पड़े, तब सात्यकि ने निशाना साधकर तीखे बाण चलाए।
श्लोक 39 (7.121.39)
तामश्मवृष्टिं तुमुलां पार्वतीयैः समीरिताम् । चिच्छेदोरगसंकाशैर्नाराचैः शिनिपुङ्गवः ॥
tāmaśmavṛṣṭiṃ tumulāṃ pārvatīyaiḥ samīritām | cicchedoragasaṃkāśairnārācaiḥ śinipuṅgavaḥ
पहाड़ियों द्वारा बरसाई गई पत्थरों की उस भयंकर वर्षा को शिनि-वंश के श्रेष्ठ वीर ने सर्पों जैसे नाराचों से काट डाला।
श्लोक 40 (7.121.40)
तैरश्मचूर्णैर्दीप्यद्भिः खद्योतानामिव व्रजैः । प्रायः सैन्यान्यहन्यन्त हाहाभूतानि मारिष ॥
tairaśmacūrṇairdīpyadbhiḥ khadyotānāmiva vrajaiḥ | prāyaḥ sainyānyahanyanta hāhābhūtāni māriṣa
जुगनुओं के झुंड जैसे चमकते उस पत्थर के चूर्ण से, हे मान्यवर, सेनाएँ प्रायः मारी गईं और 'हाय-हाय' की चीखों में बदल गईं।
श्लोक 41 (7.121.41)
ततः पञ्चशतं शूराः समुद्यतमहाशिलाः । निकृत्तबाहवो राजन्निपेतुर्धरणीतले ॥
tataḥ pañcaśataṃ śūrāḥ samudyatamahāśilāḥ | nikṛttabāhavo rājannipeturdharaṇītale
तब बड़ी-बड़ी शिलाएँ उठाए हुए पाँच सौ शूर, हे राजन्, भुजाएँ कट जाने पर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 42 (7.121.42)
सात्वतस्य च भल्लेन निष्पिष्टैस्तैस्तथाऽद्रिभिः । न्यपतन्निहता म्लेच्छास्तत्रतत्र गतासवः ॥
sātvatasya ca bhallena niṣpiṣṭaistaistathā'dribhiḥ | nyapatannihatā mlecchāstatratatra gatāsavaḥ
सात्वत के भल्लों से उन चट्टानों के साथ ही चूर-चूर हुए म्लेच्छ जहाँ-तहाँ प्राणहीन होकर गिर पड़े।
श्लोक 43 (7.121.43)
ते हन्यमानाः समरे सात्वतेन महात्मना । अश्मवृष्टिं महाघोरां पातयन्ति स्म सात्वते ॥
te hanyamānāḥ samare sātvatena mahātmanā | aśmavṛṣṭiṃ mahāghorāṃ pātayanti sma sātvate
महात्मा सात्वत के हाथों युद्ध में मारे जाते हुए भी वे उस पर पत्थरों की अत्यन्त भयानक वर्षा करते रहे।
श्लोक 44 (7.121.44)
पाषाणयोधिनः शूरान्यतमानानवस्थितान् । न्यवधीद्बहुसाहस्रांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
pāṣāṇayodhinaḥ śūrānyatamānānavasthitān | nyavadhīdbahusāhasrāṃstadadbhutamivābhavat
पत्थरों से लड़ने वाले, डटे हुए और यत्न करते हुए उन हज़ारों शूरों को उसने मार डाला; यह मानो अद्भुत बात थी।
श्लोक 45 (7.121.45)
ततः पुनर्बस्तमुखैरश्मवृष्टीः समन्ततः । अधोबस्तैः स्थूलबस्तैर्दरदैः खसतङ्कणैः ॥
tataḥ punarbastamukhairaśmavṛṣṭīḥ samantataḥ | adhobastaiḥ sthūlabastairdaradaiḥ khasataṅkaṇaiḥ
फिर चारों ओर से पत्थरों की वर्षा हुई, जो बकरे के मुँह वालों, अधोबस्तों, स्थूलबस्तों, दरदों, खसों और तङ्कणों ने बरसाई,
श्लोक 46 (7.121.46)
लम्बकैश्च कुणिन्दैश्च क्षिप्ताः क्षिप्ताश्च सात्यकिः । नाराचैः प्रतिचिच्छेद प्रतिपत्तिविशारदः ॥
lambakaiśca kuṇindaiśca kṣiptāḥ kṣiptāśca sātyakiḥ | nārācaiḥ praticiccheda pratipattiviśāradaḥ
तथा लम्बकों और कुणिन्दों ने बार-बार फेंकी, उन सबको उचित उत्तर देने में निपुण सात्यकि ने नाराचों से काट डाला।
श्लोक 47 (7.121.47)
अद्रीणां भिद्यमानानामन्तरिक्षे शितैः शरैः । शब्देन प्राद्रवन्सङ्ख्ये रथाश्वगजपत्तयः ॥
adrīṇāṃ bhidyamānānāmantarikṣe śitaiḥ śaraiḥ | śabdena prādravansaṅkhye rathāśvagajapattayaḥ
आकाश में उसके तीखे बाणों से शिलाओं के टूटने की ध्वनि से रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिक युद्ध से भाग खड़े हुए।
श्लोक 48 (7.121.48)
अश्मचूर्णैरवाकीर्णा मनुष्यगजवाजिनः । नाशक्नुवन्नवस्थातुं भ्रमरैरिव दंशिताः ॥
aśmacūrṇairavākīrṇā manuṣyagajavājinaḥ | nāśaknuvannavasthātuṃ bhramarairiva daṃśitāḥ
पत्थर के चूर्ण से ढके मनुष्य, हाथी और घोड़े भौंरों के डंक खाए जैसे वहाँ टिक न सके।
श्लोक 49 (7.121.49)
हतशिष्टाः सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः । विभिन्नशिरसो राजन्दन्तैश्छिन्नैश्च दन्तिनः । निर्धूतैश्च करैर्नागा व्यङ्गाश्च शतशः कृताः ॥
hataśiṣṭāḥ sarudhirā bhinnamastakapiṇḍikāḥ | vibhinnaśiraso rājandantaiśchinnaiśca dantinaḥ | nirdhūtaiśca karairnāgā vyaṅgāśca śataśaḥ kṛtāḥ
जो बचे थे वे लहूलुहान थे, उनके मस्तक फट गए थे; और हाथियों के सिर फट गए थे, हे राजन्, दाँत टूट गए थे, सूँड़ें झटक कर कटी थीं, और वे सैकड़ों की संख्या में अपाहिज हो गए थे।
श्लोक 50 (7.121.50)
हत्वा पञ्चशतं योधांस्तत्क्षणेनैव मारिष । व्यचरत्पृतनामध्ये शैनेयः कृतहस्तवत् ॥
hatvā pañcaśataṃ yodhāṃstatkṣaṇenaiva māriṣa | vyacaratpṛtanāmadhye śaineyaḥ kṛtahastavat
उसी क्षण पाँच सौ योद्धाओं को मारकर, हे मान्यवर, शैनेय सधे हाथ वाले की तरह सेना के बीच विचरता रहा।
श्लोक 51 (7.121.51)
कुञ्जराः सन्न्यवर्तन्त युयुधानेन मोहिताः ॥
kuñjarāḥ sannyavartanta yuyudhānena mohitāḥ
युयुधान से मोहित होकर हाथी लौट पड़े।
श्लोक 52 (7.121.52)
अश्मनां भिद्यमानानां सायकैः श्रूयते ध्वनिः । पद्मपत्रेषुधाराणां पतन्तीनामिव ध्वनिः ॥
aśmanāṃ bhidyamānānāṃ sāyakaiḥ śrūyate dhvaniḥ | padmapatreṣudhārāṇāṃ patantīnāmiva dhvaniḥ
उसके बाणों से टूटते पत्थरों की ध्वनि ऐसी सुनाई देती थी जैसे कमल के पत्तों पर गिरती धाराओं की ध्वनि।
श्लोक 53 (7.121.53)
ततः शब्दः समभवत्तव सैन्यस्य मारिष । माधवेनार्द्यमानस्य सागरस्येव पर्वणि ॥
tataḥ śabdaḥ samabhavattava sainyasya māriṣa | mādhavenārdyamānasya sāgarasyeva parvaṇi
तब माधव (सात्यकि) से पीड़ित होती आपकी सेना में, हे मान्यवर, वैसा ही कोलाहल उठा जैसा पूर्णिमा के पर्व पर समुद्र में उठता है।
श्लोक 54 (7.121.54)
तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा द्रोणो यन्तारमब्रवीत् । एष सूत रणे क्रुद्धः सात्वतानां महारथः ॥
taṃ śabdaṃ tumulaṃ śrutvā droṇo yantāramabravīt | eṣa sūta raṇe kruddhaḥ sātvatānāṃ mahārathaḥ
उस भयंकर कोलाहल को सुनकर द्रोण ने सारथि से कहा, "सारथि, यह सात्वतों का महारथी युद्ध में क्रुद्ध है,
द्रोण उवाच
श्लोक 55 (7.121.55)
दारयन्बहुधा सैन्यं रणे चरति कालवत् । यत्रैष शब्दस्तुमुलस्तत्र सूत रथं नय ॥
dārayanbahudhā sainyaṃ raṇe carati kālavat | yatraiṣa śabdastumulastatra sūta rathaṃ naya
सेना को अनेक प्रकार से चीरता हुआ मृत्यु की तरह रण में विचर रहा है। जहाँ यह भयंकर शोर हो रहा है, सारथि, वहीं रथ ले चलो।
श्लोक 56 (7.121.56)
पाषाणयोधिभिर्नूनं युयुधानः समागतः । तथाहि रथिनः सर्वे हियन्ते विद्रुतैर्हयैः ॥
pāṣāṇayodhibhirnūnaṃ yuyudhānaḥ samāgataḥ | tathāhi rathinaḥ sarve hiyante vidrutairhayaiḥ
निश्चय ही युयुधान पत्थरों से लड़ने वालों से जा भिड़ा है, क्योंकि भड़के हुए घोड़े सब रथियों को लिए जा रहे हैं।
श्लोक 57 (7.121.57)
विशस्त्रकवचा रुग्णास्तत्रतत्र पतन्ति च । न शक्नुवन्ति यन्तारः संयन्तुं तुमुले हयान् ॥
viśastrakavacā rugṇāstatratatra patanti ca | na śaknuvanti yantāraḥ saṃyantuṃ tumule hayān
शस्त्र और कवच से रहित, घायल योद्धा जहाँ-तहाँ गिर रहे हैं, और इस कोलाहल में सारथि घोड़ों को सँभाल नहीं पा रहे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 58 (7.121.58)
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा भारद्वाजस्य सारथिः । प्रत्युवाच ततो द्रोणं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥
ityetadvacanaṃ śrutvā bhāradvājasya sārathiḥ | pratyuvāca tato droṇaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam
ये वचन सुनकर भरद्वाज-पुत्र के सारथि ने समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण को उत्तर दिया:
सारथिरुवाच
श्लोक 59 (7.121.59)
सैन्यं द्रवति चायुष्मन्कौरवेयं समन्ततः । पश्य योधान्रणे भग्नान्धावतो वै ततस्ततः ॥
sainyaṃ dravati cāyuṣmankauraveyaṃ samantataḥ | paśya yodhānraṇe bhagnāndhāvato vai tatastataḥ
"आयुष्मन्, कौरवों की सेना चारों ओर भाग रही है। देखिए, रण में टूटे हुए योद्धा इधर-उधर दौड़ रहे हैं।
श्लोक 60 (7.121.60)
इमे च संहताः शूराः पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । त्वामेव हि जिघांसन्त आद्रवन्ति समन्ततः ॥
ime ca saṃhatāḥ śūrāḥ pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | tvāmeva hi jighāṃsanta ādravanti samantataḥ
और ये एकजुट शूर, पाञ्चाल पाण्डवों के साथ, केवल आपको मारना चाहते हुए चारों ओर से दौड़े आ रहे हैं।
श्लोक 61 (7.121.61)
अत्र कार्यं समाधत्स्व प्राप्तकालमरिन्दम । स्थाने वा गमने वापि दूरं यातश्च सात्यकिः ॥
atra kāryaṃ samādhatsva prāptakālamarindama | sthāne vā gamane vāpi dūraṃ yātaśca sātyakiḥ
हे शत्रुदमन, यहाँ जो करना है उस पर विचार कीजिए; समय आ गया है, चाहे ठहरना हो या चलना। सात्यकि दूर निकल गया है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 62 (7.121.62)
तथैवं वदतस्तस्य भारद्वाजस्य सारथेः । प्रत्यदृश्यत शैनेयो निघ्नन्बहुविधान्रथान् ॥
tathaivaṃ vadatastasya bhāradvājasya sāratheḥ | pratyadṛśyata śaineyo nighnanbahuvidhānrathān
भरद्वाज-पुत्र का सारथि जब ऐसा कह ही रहा था, तभी अनेक प्रकार के रथों को काटता हुआ शैनेय दिखाई दिया।
श्लोक 63 (7.121.63)
ते वध्यमानाः समरे युयुधानेन तावकाः । युयुधानरथं त्यक्त्वा द्रोणानीकाय दुद्रुवुः ॥
te vadhyamānāḥ samare yuyudhānena tāvakāḥ | yuyudhānarathaṃ tyaktvā droṇānīkāya dudruvuḥ
युद्ध में युयुधान से मारे जाते हुए आपके योद्धा युयुधान का रथ छोड़कर द्रोण की सेना की ओर भाग गए।
श्लोक 64 (7.121.64)
यैस्तु दुःशासनः सार्धं रथैः पूर्वं न्यवर्तत । ते भीतास्त्वभ्यधावन्त सर्वे द्रोणरथं प्रति ॥
yaistu duḥśāsanaḥ sārdhaṃ rathaiḥ pūrvaṃ nyavartata | te bhītāstvabhyadhāvanta sarve droṇarathaṃ prati
और जिन रथों के साथ दुःशासन पहले लौटा था, वे सब डरे हुए द्रोण के रथ की ओर दौड़ पड़े।