द्रोण पर्व · अध्याय 122
द्रोण दुःशासन को फटकारते हैं; द्रोण और धृष्टद्युम्न का युद्ध
सात्यकि के सामने से दुःशासन को भागते देखकर द्रोण उसे फटकारते हैं, द्रौपदी के प्रति उसके पुराने ताने याद दिलाते हैं और कहते हैं कि या तो सात्यकि से लड़ो या पाण्डवों से सन्धि कर लो। दुःशासन कुछ उत्तर नहीं देता और सात्यकि की ओर चल पड़ता है। इधर द्रोण पाण्डव-सेना को रौंदते हैं, पाञ्चाल राजकुमार वीरकेतु को और बदला लेने दौड़े चार भाइयों को मार डालते हैं, फिर धृष्टद्युम्न उनके सामने आता है। धृष्टद्युम्न के प्रहार से द्रोण मूर्च्छित हो जाते हैं और वह तलवार लेकर उनके रथ पर चढ़ जाता है; द्रोण सँभलकर वितस्ति भर के बाणों से उसे पीछे हटा देते हैं, उसके सारथि को मार डालते हैं और अपना व्यूह फिर सँभाल लेते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.122.1)
दुःशासनरथं दृष्ट्वा समीपे पर्यवस्थितम् । भारद्वाजस्ततो वाक्यं दुःशासनमथाब्रवीत् ॥
duḥśāsanarathaṃ dṛṣṭvā samīpe paryavasthitam | bhāradvājastato vākyaṃ duḥśāsanamathābravīt
समीप ही खड़े दुःशासन के रथ को देखकर भारद्वाज द्रोण ने तब दुःशासन से ये वचन कहे।
द्रोण उवाच
श्लोक 2 (7.122.2)
दुःशासन रथाः सर्वे कस्माच्चैते प्रविद्रुताः । कच्चित्क्षेमं तु नृपतेः कच्चिज्जीवति सैन्धवः ॥
duḥśāsana rathāḥ sarve kasmāccaite pravidrutāḥ | kaccitkṣemaṃ tu nṛpateḥ kaccijjīvati saindhavaḥ
"दुःशासन, ये सब रथ क्यों भाग रहे हैं? राजा कुशल से तो हैं? सिन्धुराज जयद्रथ जीवित तो है?
श्लोक 3 (7.122.3)
राजपुत्रो भवानत्र राजभ्राता महारथः । किमर्थं द्रवते युद्धे यौवराज्यमवाप्य च ॥
rājaputro bhavānatra rājabhrātā mahārathaḥ | kimarthaṃ dravate yuddhe yauvarājyamavāpya ca
तुम यहाँ राजपुत्र हो, राजा के भाई हो, महारथी हो। युवराज का पद पाकर भी तुम युद्ध से क्यों भाग रहे हो?
श्लोक 4 (7.122.4)
दासी जिताऽसि द्यूते त्वं यथा कामचरी भव । वाससां वाहिका राज्ञो भ्रातुर्ज्येष्ठस्य मे भव ॥
dāsī jitā'si dyūte tvaṃ yathā kāmacarī bhava | vāsasāṃ vāhikā rājño bhrāturjyeṣṭhasya me bhava
'तू जुए में जीती गई दासी है; जैसे चाहे घूम। मेरे ज्येष्ठ भ्राता राजा के वस्त्र ढोने वाली बन जा।'
श्लोक 5 (7.122.5)
न सन्ति पतयः सर्वे तेऽद्य षण्ढतिलैः समाः । दुःशासनैवं कस्मात्त्वं पूर्वमुक्त्वा पलायसे ॥
na santi patayaḥ sarve te'dya ṣaṇḍhatilaiḥ samāḥ | duḥśāsanaivaṃ kasmāttvaṃ pūrvamuktvā palāyase
'अब तेरे कोई पति नहीं हैं; वे सब निरे बाँझ तिलों के समान हैं।' दुःशासन, पहले ऐसा कहकर अब तुम क्यों भाग रहे हो?
श्लोक 6 (7.122.6)
स्वयं वैरं महत्कृत्वा पाञ्चालैः पाण्डवैः सह । एकं सात्यकिमासाद्य कथं भीतोऽसि संयुगे ॥
svayaṃ vairaṃ mahatkṛtvā pāñcālaiḥ pāṇḍavaiḥ saha | ekaṃ sātyakimāsādya kathaṃ bhīto'si saṃyuge
पाञ्चालों और पाण्डवों के साथ स्वयं ही भारी वैर ठानकर, अकेले सात्यकि के सामने आकर तुम युद्ध में कैसे डर गए?
श्लोक 7 (7.122.7)
न जानीषे पुरा त्वं तु गृह्णन्नक्षान्दुरोदरे । शरा ह्येते भविष्यन्ति दारुणाशीविषोपमाः ॥
na jānīṣe purā tvaṃ tu gṛhṇannakṣāndurodare | śarā hyete bhaviṣyanti dāruṇāśīviṣopamāḥ
उस समय जुआघर में पासे उठाते हुए तुम नहीं जानते थे कि ये बाण भयंकर विषैले सर्पों जैसे हो जाएँगे।
श्लोक 8 (7.122.8)
अप्रियाणां हि वचनं पाण्डवस्य विशेषतः । द्रौपद्याश्च परिक्लेशस्त्वन्मूलो ह्यभवत्पुरा ॥
apriyāṇāṃ hi vacanaṃ pāṇḍavasya viśeṣataḥ | draupadyāśca parikleśastvanmūlo hyabhavatpurā
पाण्डव के प्रति, विशेषकर, जो अप्रिय वचन कहे गए और पहले द्रौपदी को जो क्लेश दिया गया, उन सबकी जड़ तुम्हीं थे।
श्लोक 9 (7.122.9)
क्व ते मानश्च दर्पश्च क्व ते वीर्यं क्व गर्जितम् । आशीविषसमान्पार्थान्कोपयित्वा क्व यास्यसि ॥
kva te mānaśca darpaśca kva te vīryaṃ kva garjitam | āśīviṣasamānpārthānkopayitvā kva yāsyasi
कहाँ गया तुम्हारा मान और घमंड? कहाँ तुम्हारा पराक्रम, कहाँ तुम्हारी गर्जना? विषैले सर्पों जैसे कुन्तीपुत्रों को क्रुद्ध करके अब तुम कहाँ जाओगे?
श्लोक 10 (7.122.10)
शोच्येयं भारती सेना राज्यं चैव सुयोधनः । यस्य त्वं कर्कशो भ्राता पलायनपरायणः ॥
śocyeyaṃ bhāratī senā rājyaṃ caiva suyodhanaḥ | yasya tvaṃ karkaśo bhrātā palāyanaparāyaṇaḥ
यह भरतवंशियों की सेना, यह राज्य और सुयोधन भी शोचनीय हैं, जिसका भाई तुम जैसा कठोर और भागने में ही तत्पर है।
श्लोक 11 (7.122.11)
ननु नाम त्वया वीर दार्यमाणा भयार्दिता । स्वबाहुबलमास्थाय रक्षितव्या ह्यनीकिनी ॥
nanu nāma tvayā vīra dāryamāṇā bhayārditā | svabāhubalamāsthāya rakṣitavyā hyanīkinī
वीर, भय से पीड़ित और बिखरती हुई इस सेना की रक्षा तो तुम्हें अपने बाहुबल का आश्रय लेकर करनी चाहिए थी।
श्लोक 12 (7.122.12)
स त्वमद्य रणं हित्वा भीतो हर्षयसे परान् । विद्रुते त्वयि सैन्यस्य नायके शत्रुसूदन । कोऽन्यः स्थास्यति सङ्ग्रामे भीतो भीते व्यपाश्रये ॥
sa tvamadya raṇaṃ hitvā bhīto harṣayase parān | vidrute tvayi sainyasya nāyake śatrusūdana | ko'nyaḥ sthāsyati saṅgrāme bhīto bhīte vyapāśraye
पर आज तुम डरकर युद्ध छोड़ रहे हो और शत्रुओं को हर्षित कर रहे हो। शत्रुसूदन, सेना के नायक तुम्हारे भाग जाने पर और कौन, स्वयं डरा हुआ, डरे हुए का आश्रय लेकर युद्ध में टिकेगा?
श्लोक 13 (7.122.13)
एकेन सात्वतेनाद्य युध्यमानस्य तेन वै । पलायने तव मतिः सङ्ग्रामाद्धि प्रवर्तते ॥
ekena sātvatenādya yudhyamānasya tena vai | palāyane tava matiḥ saṅgrāmāddhi pravartate
आज एक अकेले सात्वत से लड़ते हुए तुम्हारा मन युद्ध से भाग जाने की ओर ही जा रहा है।
श्लोक 14 (7.122.14)
यदा गाण्डीवधन्वानं भीमसेनं च कौरव । यमौ च द्रक्ष्यसि रणे तदा वै किं करिष्यसि ॥
yadā gāṇḍīvadhanvānaṃ bhīmasenaṃ ca kaurava | yamau ca drakṣyasi raṇe tadā vai kiṃ kariṣyasi
हे कौरव, जब तुम युद्ध में गाण्डीवधारी अर्जुन को, भीमसेन को और दोनों जुड़वाँ भाइयों को देखोगे, तब क्या करोगे?
श्लोक 15 (7.122.15)
युधि फल्गुनबाणानां सूर्याग्निसमवर्चसाम् । न तुल्याः सात्यकिशरा येभ्यो भीतः पलायसे ॥
yudhi phalgunabāṇānāṃ sūryāgnisamavarcasām | na tulyāḥ sātyakiśarā yebhyo bhītaḥ palāyase
सात्यकि के बाण सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी फल्गुन के बाणों की बराबरी नहीं कर सकते; फिर भी तुम सात्यकि के उन्हीं बाणों से डरकर भाग रहे हो।
श्लोक 16 (7.122.16)
त्वरितो वीर गच्छ त्वं गान्धार्युदरमाविश । पृथिव्यां धावमानस्य नान्यत्पश्यामि जीवनम् ॥
tvarito vīra gaccha tvaṃ gāndhāryudaramāviśa | pṛthivyāṃ dhāvamānasya nānyatpaśyāmi jīvanam
वीर, जल्दी जाओ और गान्धारी के गर्भ में घुस जाओ; पृथ्वी पर भागते फिरने वाले के लिए मुझे जीने का और कोई उपाय नहीं दीखता।
श्लोक 17 (7.122.17)
यदि तावत्कृता बुद्धिः पलायनपरायणा । पृथिवी धर्मराजाय शमेनैव प्रदीयताम् ॥
yadi tāvatkṛtā buddhiḥ palāyanaparāyaṇā | pṛthivī dharmarājāya śamenaiva pradīyatām
यदि तुमने सचमुच भाग जाने का ही निश्चय कर लिया है, तो पृथ्वी शान्ति से ही धर्मराज को दे दी जाए।
श्लोक 18 (7.122.18)
यावत्फल्गुननाराचा निर्मुक्तोरगसन्निभाः । नाविशन्ति शरीरं ते तावत्संशाम्य पाण्डवैः ॥
yāvatphalgunanārācā nirmuktoragasannibhāḥ | nāviśanti śarīraṃ te tāvatsaṃśāmya pāṇḍavaiḥ
जब तक केंचुली छोड़े हुए सर्पों जैसे फल्गुन के लोहे के नाराच तुम्हारे शरीर में नहीं घुसते, तब तक पाण्डवों से सन्धि कर लो।
श्लोक 19 (7.122.19)
यावत्ते पृथिवीं पार्था हत्वा भ्रातृशतं रणे । नाक्षिपन्ति महात्मानस्तावत्संशाम्य पाण्डवैः ॥
yāvatte pṛthivīṃ pārthā hatvā bhrātṛśataṃ raṇe | nākṣipanti mahātmānastāvatsaṃśāmya pāṇḍavaiḥ
जब तक महात्मा कुन्तीपुत्र युद्ध में तुम्हारे सौ भाइयों को मारकर तुमसे पृथ्वी छीन नहीं लेते, तब तक पाण्डवों से सन्धि कर लो।
श्लोक 20 (7.122.20)
यावन्न क्रुध्यते राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । कृष्णश्च समरश्लाघी तावत्संशाम्य पाण्डवैः ॥
yāvanna krudhyate rājā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | kṛṣṇaśca samaraślāghī tāvatsaṃśāmya pāṇḍavaiḥ
जब तक धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर क्रुद्ध नहीं होते और युद्ध में आनन्द लेने वाले कृष्ण कुपित नहीं होते, तब तक पाण्डवों से सन्धि कर लो।
श्लोक 21 (7.122.21)
यावद्भीमो महाबाहुर्विगाह्य महतीं चमूम् । सोदरांस्ते न मृद्नाति तावत्संशाम्य पाण्डवैः ॥
yāvadbhīmo mahābāhurvigāhya mahatīṃ camūm | sodarāṃste na mṛdnāti tāvatsaṃśāmya pāṇḍavaiḥ
जब तक महाबाहु भीम विशाल सेना में घुसकर तुम्हारे सहोदरों को कुचल नहीं डालते, तब तक पाण्डवों से सन्धि कर लो।
श्लोक 22 (7.122.22)
पूर्वमुक्तश्च ते भ्राता भीष्मेणासौ सुयोधनः । अजेयाः पाण्डवाः सङ्ख्ये सौम्य संशाम्य तैः सह ॥
pūrvamuktaśca te bhrātā bhīṣmeṇāsau suyodhanaḥ | ajeyāḥ pāṇḍavāḥ saṅkhye saumya saṃśāmya taiḥ saha
बहुत पहले भीष्म ने तुम्हारे भाई सुयोधन से कहा था: 'पाण्डव युद्ध में अजेय हैं; हे सौम्य, उनके साथ सन्धि कर लो।'
श्लोक 23 (7.122.23)
मया शमवता चोक्तो रक्ष शेषं सुयोधन । संशाम्य पार्थैस्त्वं रक्ष वीर सर्वान्महीक्षितः ॥
mayā śamavatā cokto rakṣa śeṣaṃ suyodhana | saṃśāmya pārthaistvaṃ rakṣa vīra sarvānmahīkṣitaḥ
'मैंने भी शान्ति चाहते हुए सुयोधन से कहा था: जो शेष बचा है उसकी रक्षा करो। वीर, कुन्तीपुत्रों से सन्धि करके सब राजाओं की रक्षा करो।'
श्लोक 24 (7.122.24)
न च तत्कृतवान्मन्दस्तव भ्राता सुयोधनः । स युद्धे धृतिमास्थाय यत्तो युध्यस्व पाण्डवैः ॥
na ca tatkṛtavānmandastava bhrātā suyodhanaḥ | sa yuddhe dhṛtimāsthāya yatto yudhyasva pāṇḍavaiḥ
पर तुम्हारे उस मूर्ख भाई सुयोधन ने वैसा नहीं किया। इसलिए अब युद्ध में धैर्य धारण करके सावधान होकर पाण्डवों से लड़ो।
श्लोक 25 (7.122.25)
तवापि शोणितं भीमः पास्यतीति मया श्रुतम् । तच्चाप्यवितथं तस्य तत्तथैव भविष्यति ॥
tavāpi śoṇitaṃ bhīmaḥ pāsyatīti mayā śrutam | taccāpyavitathaṃ tasya tattathaiva bhaviṣyati
मैंने सुना है कि भीम तुम्हारा रक्त भी पिएगा; उसकी वह बात झूठी नहीं है, वह वैसा ही होगा।
श्लोक 26 (7.122.26)
किं भीमस्य न जानासि विक्रमं त्वं सुबालिश । यत्त्वया वैरमारब्धं संयुगे प्रपलायिना ॥
kiṃ bhīmasya na jānāsi vikramaṃ tvaṃ subāliśa | yattvayā vairamārabdhaṃ saṃyuge prapalāyinā
अरे महामूर्ख, क्या तुम भीम का पराक्रम नहीं जानते, जो तुमने युद्ध में यह वैर ठाना और अब भाग रहे हो?
श्लोक 27 (7.122.27)
गच्छ तूर्णं रथेनैव यत्र तिष्ठति सात्यकिः । त्वया हीनं बलं ह्येतद्विद्रविष्यति भारत । आत्मार्थं योधय रणे सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥
gaccha tūrṇaṃ rathenaiva yatra tiṣṭhati sātyakiḥ | tvayā hīnaṃ balaṃ hyetadvidraviṣyati bhārata | ātmārthaṃ yodhaya raṇe sātyakiṃ satyavikramam
शीघ्र ही अपने रथ से वहाँ जाओ जहाँ सात्यकि खड़ा है। हे भारत, तुम्हारे बिना यह सेना बिखर जाएगी। अपने ही लिए सत्यपराक्रमी सात्यकि से युद्ध करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (7.122.28)
एवमुक्तस्तव सुतो नाब्रवीत्किञ्चिदप्यसौ । श्रुतं चाश्रुतवत्कृत्वा प्रायाद्येन स सात्यकिः ॥
evamuktastava suto nābravītkiñcidapyasau | śrutaṃ cāśrutavatkṛtvā prāyādyena sa sātyakiḥ
इस प्रकार कहे जाने पर तुम्हारे पुत्र ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। सुने को अनसुना करके वह उसी ओर चल पड़ा जहाँ सात्यकि था।
श्लोक 29 (7.122.29)
सैन्येन महता युक्तो म्लेच्छानामनिवर्तिनाम् । आसाद्य च रणे यत्तो युयुधानमयोधयत् ॥
sainyena mahatā yukto mlecchānāmanivartinām | āsādya ca raṇe yatto yuyudhānamayodhayat
कभी पीछे न हटने वाले म्लेच्छों की विशाल सेना के साथ वह युद्ध में युयुधान के पास पहुँचा और पूरे संकल्प से उससे लड़ने लगा।
श्लोक 30 (7.122.30)
द्रोणोऽपि रथिनां श्रेष्ठः पाञ्चालान्पाण्डवांस्तथा । अभ्यद्रवत सङ्क्रुद्धो जवमास्थाय मध्यमम् ॥
droṇo'pi rathināṃ śreṣṭhaḥ pāñcālānpāṇḍavāṃstathā | abhyadravata saṅkruddho javamāsthāya madhyamam
रथियों में श्रेष्ठ द्रोण भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर मध्यम गति से पाञ्चालों और पाण्डवों पर टूट पड़े।
श्लोक 31 (7.122.31)
प्रविश्य च रणे द्रोणः पाण्डवानां वरूथिनीम् । द्रावयामास योधान्वै शतशोऽथ सहस्रशः ॥
praviśya ca raṇe droṇaḥ pāṇḍavānāṃ varūthinīm | drāvayāmāsa yodhānvai śataśo'tha sahasraśaḥ
युद्ध में पाण्डवों की सेना में घुसकर द्रोण ने योद्धाओं को सैकड़ों और फिर हज़ारों की संख्या में भगा दिया।
श्लोक 32 (7.122.32)
ततो द्रोणो महाराज नाम विश्राव्य संयुगे । पाण्डुपाञ्चालमत्स्यानां प्रचक्रे कदनं महत् ॥
tato droṇo mahārāja nāma viśrāvya saṃyuge | pāṇḍupāñcālamatsyānāṃ pracakre kadanaṃ mahat
तब, महाराज, द्रोण ने युद्ध में अपना नाम सुनाकर पाण्डवों, पाञ्चालों और मत्स्यों का भारी संहार किया।
श्लोक 33 (7.122.33)
तं जयन्तमनीकानि भारद्वाजं ततस्ततः । पाञ्चालपुत्रो द्युतिमान्वीरकेतुः समभ्ययात् ॥
taṃ jayantamanīkāni bhāradvājaṃ tatastataḥ | pāñcālaputro dyutimānvīraketuḥ samabhyayāt
जब भारद्वाज इधर-उधर सेनाओं को जीतते हुए बढ़ रहे थे, तब पाञ्चाल राजकुमार तेजस्वी वीरकेतु उनके सामने आया।
श्लोक 34 (7.122.34)
स द्रोणं पञ्चभिर्विद्ध्वा शरैः सन्नतपर्वभिः । ध्वजमेकेन विव्याध सारथिं चास्य सप्तभिः ॥
sa droṇaṃ pañcabhirviddhvā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | dhvajamekena vivyādha sārathiṃ cāsya saptabhiḥ
उसने झुकी हुई गाँठों वाले पाँच बाणों से द्रोण को बींधा, एक से उनकी ध्वजा को और सात से उनके सारथि को।
श्लोक 35 (7.122.35)
तत्राद्भुतं महाराज दृष्टवानस्मि संयुगे । यद्द्रोणो रभसं युद्धे पाञ्चाल्यं नात्यवर्तत ॥
tatrādbhutaṃ mahārāja dṛṣṭavānasmi saṃyuge | yaddroṇo rabhasaṃ yuddhe pāñcālyaṃ nātyavartata
महाराज, उस युद्ध में मैंने एक आश्चर्य देखा: द्रोण अपने सारे वेग के बावजूद उस पाञ्चाल पर हावी नहीं हो सके।
श्लोक 36 (7.122.36)
सन्निरुद्धं रणे द्रोणं पाञ्चाला वीक्ष्य मारिष । आवव्रुः सर्वतो राजन्धर्मपुत्रजयैषिणः ॥
sanniruddhaṃ raṇe droṇaṃ pāñcālā vīkṣya māriṣa | āvavruḥ sarvato rājandharmaputrajayaiṣiṇaḥ
हे मान्यवर, युद्ध में द्रोण को रुका हुआ देखकर, युधिष्ठिर की विजय चाहने वाले पाञ्चालों ने, हे राजन्, उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 37 (7.122.37)
ते शरैरग्निसंकाशैस्तोमरैश्च महाधनैः । शस्त्रैश्च विविधै राजन्द्रोणमेकमवाकिरन् ॥
te śarairagnisaṃkāśaistomaraiśca mahādhanaiḥ | śastraiśca vividhai rājandroṇamekamavākiran
उन्होंने अग्नि जैसे दहकते बाणों, बहुमूल्य तोमरों और अनेक प्रकार के शस्त्रों से अकेले द्रोण पर वर्षा कर दी।
श्लोक 38 (7.122.38)
निवार्य तान्बाणगणान्द्रोणो राजन्समन्ततः । महाजलधरान्व्योम्नि मातरिश्वेव चाबभौ ॥
nivārya tānbāṇagaṇāndroṇo rājansamantataḥ | mahājaladharānvyomni mātariśveva cābabhau
हे राजन्, उन बाणों के समूहों को चारों ओर से काटकर द्रोण आकाश में बड़े-बड़े मेघों के बीच बहती वायु की तरह शोभित हुए।
श्लोक 39 (7.122.39)
ततः शरं महाघोरं सूर्यपावकसन्निभम् । सन्दधे परवीरघ्नो वीरकेतो रथं प्रति ॥
tataḥ śaraṃ mahāghoraṃ sūryapāvakasannibham | sandadhe paravīraghno vīraketo rathaṃ prati
तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले द्रोण ने सूर्य और अग्नि के समान दीप्त एक अत्यन्त भयंकर बाण वीरकेतु के रथ की ओर साधा।
श्लोक 40 (7.122.40)
स भित्त्वा तु शरो राजन्पाञ्चालकुलनन्दनम् । अभ्यगाद्धरणीं तूर्णं लोहितार्द्रो ज्वलन्निव ॥
sa bhittvā tu śaro rājanpāñcālakulanandanam | abhyagāddharaṇīṃ tūrṇaṃ lohitārdro jvalanniva
हे राजन्, वह बाण पाञ्चाल कुल के आनन्द को बींधकर रक्त से भीगा, मानो जलता हुआ, तुरन्त धरती में जा धँसा।
श्लोक 41 (7.122.41)
ततोऽपतद्रथात्तूर्णं पाञ्चालकुलनन्दनः । पर्वताग्रादिव महांश्चम्पको वायुपीडितः ॥
tato'patadrathāttūrṇaṃ pāñcālakulanandanaḥ | parvatāgrādiva mahāṃścampako vāyupīḍitaḥ
तब पाञ्चाल कुल का वह आनन्द रथ से शीघ्र ही गिर पड़ा, जैसे वायु से झकझोरा हुआ कोई विशाल चम्पक वृक्ष पर्वत की चोटी से गिर पड़े।
श्लोक 42 (7.122.42)
तस्मिन्हते महेष्वासे राजपुत्रे महाबले । पाञ्चालास्त्वरिता द्रोणं समन्तात्पर्यवारयन् ॥
tasminhate maheṣvāse rājaputre mahābale | pāñcālāstvaritā droṇaṃ samantātparyavārayan
उस महाधनुर्धर, महाबली राजकुमार के मारे जाने पर पाञ्चालों ने तुरन्त द्रोण को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 43 (7.122.43)
चित्रकेतुः सुधन्वा च चित्रवर्मा च भारत । तथा चित्ररथश्चैव भ्रातृव्यसनकर्शिताः ॥
citraketuḥ sudhanvā ca citravarmā ca bhārata | tathā citrarathaścaiva bhrātṛvyasanakarśitāḥ
हे भारत, चित्रकेतु, सुधन्वा, चित्रवर्मा और चित्ररथ भी भाई की मृत्यु के शोक से व्याकुल होकर
श्लोक 44 (7.122.44)
अभ्यद्रवन्त सहिता भारद्वाजं युयुत्सवः । मुञ्चन्तः शरवर्षाणि तपान्ते जलदा इव । अदृश्यं समरे चक्रुर्भारद्वाजं सुधन्विनः ॥
abhyadravanta sahitā bhāradvājaṃ yuyutsavaḥ | muñcantaḥ śaravarṣāṇi tapānte jaladā iva | adṛśyaṃ samare cakrurbhāradvājaṃ sudhanvinaḥ
युद्ध की इच्छा से एक साथ भारद्वाज पर टूट पड़े, ग्रीष्म के अन्त के बादलों की तरह बाणों की वर्षा करते हुए। उन उत्तम धनुर्धरों ने युद्ध में भारद्वाज को अदृश्य कर दिया।
श्लोक 45 (7.122.45)
स वध्यमानो बहुधा राजपुत्रैर्महारथैः । क्रोधमाहारयत्तेषामभावाय द्विजर्षभः ॥
sa vadhyamāno bahudhā rājaputrairmahārathaiḥ | krodhamāhārayatteṣāmabhāvāya dvijarṣabhaḥ
उन महारथी राजकुमारों से बार-बार घायल किए जाने पर ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोण ने उनके विनाश के लिए क्रोध धारण किया।
श्लोक 46 (7.122.46)
ततः शरमयं जालं द्रोणस्तेषामवासृजत् । ते हन्यमाना द्रोणस्य शरैराकर्णचोदितैः । कर्तव्यं नाभ्यजानन्वै कुमारा राजसत्तम ॥
tataḥ śaramayaṃ jālaṃ droṇasteṣāmavāsṛjat | te hanyamānā droṇasya śarairākarṇacoditaiḥ | kartavyaṃ nābhyajānanvai kumārā rājasattama
तब द्रोण ने उन पर बाणों का जाल बिछा दिया। कान तक खिंचे हुए द्रोण के बाणों से मारे जाते हुए वे कुमार, हे राजाओं में श्रेष्ठ, यह नहीं समझ पाए कि क्या करना चाहिए।
श्लोक 47 (7.122.47)
तान्विमूढान्रणे द्रोणः प्रहसन्निव भारत । व्यश्वसूतरथांश्चक्रे कुमारान्कुपितो रणे ॥
tānvimūḍhānraṇe droṇaḥ prahasanniva bhārata | vyaśvasūtarathāṃścakre kumārānkupito raṇe
हे भारत, उन्हें युद्ध में किंकर्तव्यविमूढ़ देखकर द्रोण ने मानो हँसते हुए क्रोध से उन कुमारों को घोड़ों, सारथियों और रथों से रहित कर दिया।
श्लोक 48 (7.122.48)
अथापरैः सुनिशितैर्भल्लैस्तेषां महायशाः । पुष्पाणीव विवान्वायुः सोत्तमाङ्गान्यपातयत् ॥
athāparaiḥ suniśitairbhallaisteṣāṃ mahāyaśāḥ | puṣpāṇīva vivānvāyuḥ sottamāṅgānyapātayat
फिर उन यशस्वी ने अन्य अत्यन्त तीखे भल्लों से उनके सिर इस तरह काट गिराए, जैसे बहती हवा फूलों को गिरा देती है।
श्लोक 49 (7.122.49)
ते रथेभ्यो हताः पेतुः क्षितौ राजन्सुवर्चसः । देवासुरे पुरा युद्धे यथा दैतेयदानवाः ॥
te rathebhyo hatāḥ petuḥ kṣitau rājansuvarcasaḥ | devāsure purā yuddhe yathā daiteyadānavāḥ
हे राजन्, मारे जाने पर वे तेजस्वी कुमार रथों से भूमि पर गिर पड़े, जैसे प्राचीन देवासुर-संग्राम में दैत्य और दानव गिरे थे।
श्लोक 50 (7.122.50)
तान्निहत्य रणे राजन्भारद्वाजः प्रतापवान् । कार्मुकं भ्रामयामास हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥
tānnihatya raṇe rājanbhāradvājaḥ pratāpavān | kārmukaṃ bhrāmayāmāsa hemapṛṣṭhaṃ durāsadam
हे राजन्, उन्हें युद्ध में मारकर प्रतापी भारद्वाज ने अपने दुर्धर्ष सोने की पीठ वाले धनुष को घुमाया।
श्लोक 51 (7.122.51)
तदस्य भ्राजते राजन्मेघमध्ये तडिद्यथा ॥
tadasya bhrājate rājanmeghamadhye taḍidyathā
हे राजन्, वह उनके हाथ में ऐसा चमका जैसे बादल के बीच बिजली।
श्लोक 52 (7.122.52)
पाञ्चालान्निहतान्दृष्ट्वा देवकल्पान्महारथान् । धृष्टद्युम्नो भृशोद्विग्नो नेत्राभ्यां पातयञ्जलम् । अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥
pāñcālānnihatāndṛṣṭvā devakalpānmahārathān | dhṛṣṭadyumno bhṛśodvigno netrābhyāṃ pātayañjalam | abhyavartata saṅgrāme kruddho droṇarathaṃ prati
देवताओं के समान महारथी पाञ्चालों को मरा हुआ देखकर धृष्टद्युम्न अत्यन्त व्यथित हुआ; उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे और वह क्रोध में युद्ध में द्रोण के रथ की ओर बढ़ा।
श्लोक 53 (7.122.53)
ततो हाहेति सहसा नादः समभवन्नृप । पाञ्चाल्येन रणे दृष्ट्वा द्रोणमावारितं शरैः ॥
tato hāheti sahasā nādaḥ samabhavannṛpa | pāñcālyena raṇe dṛṣṭvā droṇamāvāritaṃ śaraiḥ
तब, राजन्, पाञ्चाल राजकुमार के बाणों से द्रोण को ढका हुआ देखकर सहसा 'हाय!' की पुकार उठी।
श्लोक 54 (7.122.54)
सञ्छाद्यमानो बहुधा पार्षतेन महात्मना । न विव्यथे ततो द्रोणः स्मयन्नेवान्वयुध्यत ॥
sañchādyamāno bahudhā pārṣatena mahātmanā | na vivyathe tato droṇaḥ smayannevānvayudhyata
महात्मा पार्षत से अनेक प्रकार से ढक दिए जाने पर भी द्रोण विचलित नहीं हुए; वे मुस्कराते हुए ही लड़ते रहे।
श्लोक 55 (7.122.55)
ततो द्रोणं महाराज पाञ्चाल्यः क्रोधमूर्च्छितः । आजघानोरसि क्रुद्धो नवत्या नतपर्वणाम् ॥
tato droṇaṃ mahārāja pāñcālyaḥ krodhamūrcchitaḥ | ājaghānorasi kruddho navatyā nataparvaṇām
तब, महाराज, क्रोध से मूर्च्छित-से पाञ्चाल ने द्रोण की छाती पर नब्बे झुकी गाँठों वाले बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 56 (7.122.56)
स गाढविद्धो बलिना भारद्वाजो महायशाः । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ॥
sa gāḍhaviddho balinā bhāradvājo mahāyaśāḥ | niṣasāda rathopasthe kaśmalaṃ ca jagāma ha
उस बलवान से गहरी चोट खाकर यशस्वी भारद्वाज रथ के पिछले भाग में बैठ गए और मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 57 (7.122.57)
तं वै तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः पराक्रमी । चापमुत्सृज्य शीघ्रं तु असिं जग्राह वीर्यवान् ॥
taṃ vai tathāgataṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnaḥ parākramī | cāpamutsṛjya śīghraṃ tu asiṃ jagrāha vīryavān
उन्हें उस दशा में देखकर पराक्रमी और वीर्यवान धृष्टद्युम्न ने धनुष फेंक दिया और तुरन्त तलवार उठा ली।
श्लोक 58 (7.122.58)
अवप्लुत्य रथाच्चापि त्वरितः स महारथः । आरुरोह रथं तूर्णं भारद्वाजस्य मारिष । हर्तुमिच्छञ्शिरः कायात्क्रोधसंरक्तलोचनः ॥
avaplutya rathāccāpi tvaritaḥ sa mahārathaḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ bhāradvājasya māriṣa | hartumicchañśiraḥ kāyātkrodhasaṃraktalocanaḥ
हे मान्यवर, वह महारथी अपने रथ से कूदकर शीघ्र ही भारद्वाज के रथ पर चढ़ गया; क्रोध से उसकी आँखें लाल थीं और वह उनका सिर धड़ से काट देना चाहता था।
श्लोक 59 (7.122.59)
प्रत्याश्वस्तस्ततो द्रोणो धनुर्गृह्य महारवम् । आसन्नमागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं जिघांसया ॥
pratyāśvastastato droṇo dhanurgṛhya mahāravam | āsannamāgataṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnaṃ jighāṃsayā
तब द्रोण सँभलकर गर्जना के साथ अपना विशाल धनुष उठाकर, धृष्टद्युम्न को मारने की इच्छा से निकट आया देखकर,
श्लोक 60 (7.122.60)
शरैर्वैतस्तिकै राजन्विव्याधासन्नवेधिभिः । योधयामास समरे धृष्टद्युम्नं महारथम् ॥
śarairvaitastikai rājanvivyādhāsannavedhibhiḥ | yodhayāmāsa samare dhṛṣṭadyumnaṃ mahāratham
हे राजन्, निकट से वेधने वाले वितस्ति भर लम्बे बाणों से उसे बींधने लगे और युद्ध में महारथी धृष्टद्युम्न से लड़ने लगे।
श्लोक 61 (7.122.61)
ते हि वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिनः । द्रोणस्य विहिता राजन्यैर्धृष्टद्युम्नमाक्षिणोत् ॥
te hi vaitastikā nāma śarā āsannayodhinaḥ | droṇasya vihitā rājanyairdhṛṣṭadyumnamākṣiṇot
हे राजन्, वे बाण वैतस्तिक कहलाते हैं, क्योंकि वे निकट के युद्ध में काम आते हैं; द्रोण ने उन्हें तैयार कर रखा था और उन्हीं से उन्होंने धृष्टद्युम्न को पीड़ित किया।
श्लोक 62 (7.122.62)
स वध्यमानो बहुभिः सायकैस्तैर्महाबलः । अवप्लुत्य रथात्तूर्णं भग्नवेगः पराक्रमी ॥
sa vadhyamāno bahubhiḥ sāyakaistairmahābalaḥ | avaplutya rathāttūrṇaṃ bhagnavegaḥ parākramī
उन बहुत-से बाणों की मार से बलवान और पराक्रमी धृष्टद्युम्न का वेग टूट गया और वह शीघ्र ही रथ से कूद पड़ा।
श्लोक 63 (7.122.63)
आरुह्य स्वरथं वीरः प्रगृह्य च महद्धनुः । विव्याध समरे द्रोणं धृष्टद्युम्नो महारथः ॥
āruhya svarathaṃ vīraḥ pragṛhya ca mahaddhanuḥ | vivyādha samare droṇaṃ dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ
अपने रथ पर चढ़कर और बड़ा धनुष लेकर वीर महारथी धृष्टद्युम्न ने युद्ध में द्रोण को बींध दिया।
श्लोक 64 (7.122.64)
द्रोणश्चापि महाराज शरैर्विव्याध पार्षतम् ॥
droṇaścāpi mahārāja śarairvivyādha pārṣatam
और हे महाराज, द्रोण ने भी बाणों से पार्षत को बींधा।
श्लोक 65 (7.122.65)
तदद्भुतमभूद्युद्धं द्रोणपाञ्चालयोस्तदा । त्रैलोक्यकाङ्क्षिणोरासीच्छक्रप्रह्लादयोरिव ॥
tadadbhutamabhūdyuddhaṃ droṇapāñcālayostadā | trailokyakāṅkṣiṇorāsīcchakraprahlādayoriva
तब द्रोण और पाञ्चाल का वह युद्ध अद्भुत हुआ, जैसे तीनों लोकों के अभिलाषी इन्द्र और प्रह्लाद के बीच हुआ था।
श्लोक 66 (7.122.66)
मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च । चरन्तौ युद्धमार्गज्ञौ ततक्षतुरथेषुभिः ॥
maṇḍalāni vicitrāṇi yamakānītarāṇi ca | carantau yuddhamārgajñau tatakṣaturatheṣubhiḥ
युद्ध के मार्ग को जानने वाले वे दोनों विचित्र मण्डल बनाकर, जोड़ीदार और अन्य पैंतरों से चलते हुए बाणों से एक-दूसरे को घायल करते रहे।
श्लोक 67 (7.122.67)
मोहयन्तौ मनांस्याजौ योधानां द्रोणपार्षतौ । सृजन्तौ शरवर्षाणि वर्षास्विव बलाहकौ । छादयन्तौ महात्मानौ शरैर्व्योम दिशो महीम् ॥
mohayantau manāṃsyājau yodhānāṃ droṇapārṣatau | sṛjantau śaravarṣāṇi varṣāsviva balāhakau | chādayantau mahātmānau śarairvyoma diśo mahīm
युद्ध में योद्धाओं के मन को मोहित करते हुए, वर्षा ऋतु के दो बादलों की तरह बाणों की वर्षा करते हुए, वे दोनों महात्मा द्रोण और पार्षत बाणों से आकाश, दिशाओं और पृथ्वी को ढकते रहे।
श्लोक 68 (7.122.68)
तदद्भुतं तयोर्युद्धं भूतसङ्घा ह्यपूजयन् । क्षत्रियाश्च महाराज ये चान्ये तव सैनिकाः ॥
tadadbhutaṃ tayoryuddhaṃ bhūtasaṅghā hyapūjayan | kṣatriyāśca mahārāja ye cānye tava sainikāḥ
प्राणियों के समूहों ने उन दोनों के उस अद्भुत युद्ध की सराहना की; हे महाराज, क्षत्रियों ने और तुम्हारे अन्य सैनिकों ने भी की।
श्लोक 69 (7.122.69)
अवश्यं समरे द्रोणो धृष्टद्युम्नेन सङ्गतः । वशमेष्यति नो राजन्पाञ्चाला इति चुक्रुशुः ॥
avaśyaṃ samare droṇo dhṛṣṭadyumnena saṅgataḥ | vaśameṣyati no rājanpāñcālā iti cukruśuḥ
"युद्ध में धृष्टद्युम्न से भिड़कर द्रोण अवश्य ही हमारे वश में आ जाएँगे, हे राजन्," ऐसा पाञ्चाल चिल्ला उठे।
श्लोक 70 (7.122.70)
द्रोणस्तु त्वरितो युद्धे धृष्टद्युम्नस्य सारथेः । शिरः प्रच्यावयामास फलं पक्वं तरोरिव ॥
droṇastu tvarito yuddhe dhṛṣṭadyumnasya sāratheḥ | śiraḥ pracyāvayāmāsa phalaṃ pakvaṃ taroriva
पर द्रोण ने युद्ध में शीघ्रता से धृष्टद्युम्न के सारथि का सिर पके फल की तरह पेड़ से गिरा दिया।
श्लोक 71 (7.122.71)
ततस्तु प्रद्रुता वाहा राजंस्तस्य महात्मनः ॥
tatastu pradrutā vāhā rājaṃstasya mahātmanaḥ
तब, हे राजन्, उस महात्मा के घोड़े बिदककर भाग निकले।
श्लोक 72 (7.122.72)
तेषु प्रद्रवमाणेषु पाञ्चालान्सृञ्जयांस्तथा । अयोधयद्रणे द्रोणस्तत्रतत्र पराक्रमी ॥
teṣu pradravamāṇeṣu pāñcālānsṛñjayāṃstathā | ayodhayadraṇe droṇastatratatra parākramī
उनके भागने पर पराक्रमी द्रोण युद्ध में जहाँ-तहाँ पाञ्चालों और सृञ्जयों से लड़ते रहे।
श्लोक 73 (7.122.73)
विजित्य पाण्डुपाञ्चालान्भारद्वाजः प्रतापवान् । स्वं व्यूहं पुनरास्थाय स्थितोऽभवदरिन्दमः । न चैनं पाण्डवा युद्धे जेतुमुत्सेहिरे प्रभो ॥
vijitya pāṇḍupāñcālānbhāradvājaḥ pratāpavān | svaṃ vyūhaṃ punarāsthāya sthito'bhavadarindamaḥ | na cainaṃ pāṇḍavā yuddhe jetumutsehire prabho
पाण्डवों और पाञ्चालों को जीतकर प्रतापी, शत्रुदमन भारद्वाज अपना व्यूह फिर सँभालकर डटे रहे; और हे प्रभो, पाण्डव युद्ध में उन्हें जीतने का साहस नहीं कर सके।