द्रोण पर्व · अध्याय 12
द्रोण की युधिष्ठिर को पकड़ लाने की प्रतिज्ञा
सेनापति का पद पाकर द्रोण दुर्योधन से वर माँगने को कहते हैं। दुर्योधन माँगता है कि युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर उसके पास लाया जाए, क्योंकि वध करने पर पाण्डव बदला लेंगे, जबकि पकड़े जाने पर वे फिर द्यूत हारकर वन जाएँगे। अर्जुन से डरने वाले द्रोण शर्त के साथ वर देते हैं कि पहले अर्जुन को राजा से दूर हटाया जाए। दुर्योधन यह समाचार सारी छावनियों में घोषित करा देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.12.1)
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा शंसतो मम भारत । हन्त ते कथयिष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् । यथा सत्यपरो द्रोणः सादितः पाण्डुसृञ्जयैः ॥
śuśrūṣasva sthiro bhūtvā śaṃsato mama bhārata | hanta te kathayiṣyāmi sarvaṃ pratyakṣadarśivān | yathā satyaparo droṇaḥ sāditaḥ pāṇḍusṛñjayaiḥ
भरतवंशी राजन्, स्थिर होकर मेरी बात सुनिए। अच्छा, मैं प्रत्यक्ष देखने वाले के रूप में आपको सब कुछ बताऊँगा, कि सत्य-परायण द्रोण को पाण्डवों और सृञ्जयों ने किस प्रकार गिराया।
श्लोक 2 (7.12.2)
सेनापतित्वं सम्प्राप्य भारद्वाजो महारथः । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य पुत्रं ते वाक्यमब्रवीत् ॥
senāpatitvaṃ samprāpya bhāradvājo mahārathaḥ | madhye sarvasya sainyasya putraṃ te vākyamabravīt
सेनापति का पद पाकर महारथी भरद्वाजपुत्र द्रोण ने सारी सेना के बीच आपके पुत्र से यह बात कही।
द्रोण उवाच
श्लोक 3 (7.12.3)
यत्कौरवाणामृषभादापगेयादनन्तरम् । सैनापत्ये त्वया राजन्नद्य सत्कृतवानहम् ॥
yatkauravāṇāmṛṣabhādāpageyādanantaram | saināpatye tvayā rājannadya satkṛtavānaham
राजन्, गङ्गापुत्र भीष्म के, जो कौरवों में वृषभ के समान थे, बाद आज आपने मुझे सेनापति के पद पर सम्मानित किया है,
श्लोक 4 (7.12.4)
सदृशं कर्मणस्तस्य फलं प्राप्नुहि भारत । करोमि कामं कं तेऽद्य प्रवृणीष्व यमिच्छसि ॥
sadṛśaṃ karmaṇastasya phalaṃ prāpnuhi bhārata | karomi kāmaṃ kaṃ te'dya pravṛṇīṣva yamicchasi
भारत, उस कर्म के अनुरूप फल प्राप्त कीजिए। आज आपकी जो भी इच्छा हो, मैं पूरी करूँगा; जो चाहें, माँग लीजिए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (7.12.5)
ततो दुर्योधनो राजा कर्णदुःशासनादिभिः । सम्मन्त्र्योवाच दुर्धर्षमाचार्यं जयतां वरम् ॥
tato duryodhano rājā karṇaduḥśāsanādibhiḥ | sammantryovāca durdharṣamācāryaṃ jayatāṃ varam
तब राजा दुर्योधन ने कर्ण, दुःशासन आदि से सलाह करके विजयी योद्धाओं में श्रेष्ठ दुर्धर्ष आचार्य से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 6 (7.12.6)
ददासि चेद्वरं मह्यं जीवग्राहं युधिष्ठिरम् । गृहीत्वा रथिनां श्रेष्ठं मत्समीपमिहानय ॥
dadāsi cedvaraṃ mahyaṃ jīvagrāhaṃ yudhiṣṭhiram | gṛhītvā rathināṃ śreṣṭhaṃ matsamīpamihānaya
"यदि आप मुझे वर देते हैं, तो रथियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर मेरे पास ले आइए।"
श्लोक 7 (7.12.7)
इच्छेयं वै महात्मानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । भ्रातृणां पश्यतामेव जीवग्राहेण मे द्विज ॥
iccheyaṃ vai mahātmānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | bhrātṛṇāṃ paśyatāmeva jīvagrāheṇa me dvija
"हे द्विज, मैं महात्मा धर्मात्मा युधिष्ठिर को उसके भाइयों के देखते-देखते जीवित पकड़ना चाहता हूँ।"
श्लोक 8 (7.12.8)
गृहीत्वा रथिनां श्रेष्ठं मत्सकाशमिहानय । प्रीणाम्यनेन कार्येण ससुहृज्जनबान्धवः ॥
gṛhītvā rathināṃ śreṣṭhaṃ matsakāśamihānaya | prīṇāmyanena kāryeṇa sasuhṛjjanabāndhavaḥ
"रथियों में श्रेष्ठ उसे पकड़कर मेरे पास ले आइए; इस कार्य से मैं मित्रों, स्वजनों और बन्धुओं सहित प्रसन्न हो जाऊँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.12.9)
ततः कुरूणामाचार्यः श्रुत्वा पुत्रस्य ते वचः । सेनां प्रहर्षयन्सर्वामिदं वचनमब्रवीत् ॥
tataḥ kurūṇāmācāryaḥ śrutvā putrasya te vacaḥ | senāṃ praharṣayansarvāmidaṃ vacanamabravīt
तब कौरवों के आचार्य ने आपके पुत्र की बात सुनकर सारी सेना को हर्षित करते हुए यह वचन कहा:
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (7.12.10)
धन्यः कुन्तीसुतो राजन्यस्य ग्रहणमिच्छसि । न वधं तस्य दुर्धर्ष वरमद्य प्रयाचसे ॥
dhanyaḥ kuntīsuto rājanyasya grahaṇamicchasi | na vadhaṃ tasya durdharṣa varamadya prayācase
"राजन्, कुन्तीपुत्र धन्य है, जिसे आप पकड़ना चाहते हैं; हे दुर्धर्ष, आप आज उसके वध के लिए वर नहीं माँग रहे हैं।"
श्लोक 11 (7.12.11)
किमर्थं च नरव्याघ्र न वधं तस्य काङ्क्षसे । नाशंससि क्रियामेतां मत्तो दुर्योधन ध्रुवम् ॥
kimarthaṃ ca naravyāghra na vadhaṃ tasya kāṅkṣase | nāśaṃsasi kriyāmetāṃ matto duryodhana dhruvam
"पुरुषसिंह, आप उसका वध क्यों नहीं चाहते? दुर्योधन, निश्चय ही आप मुझसे यह कार्य होने की आशा नहीं करते।"
श्लोक 12 (7.12.12)
आहोस्विद्धर्मराजस्य द्वेष्टा कश्चिन्न विद्यते । यदीच्छसि त्वं जीवन्तं कुलं रक्षसि चात्मनः ॥
āhosviddharmarājasya dveṣṭā kaścinna vidyate | yadīcchasi tvaṃ jīvantaṃ kulaṃ rakṣasi cātmanaḥ
"अथवा क्या धर्मराज से द्वेष करने वाला कोई है ही नहीं? यदि आप उसे जीवित चाहते हैं, तो अपने कुल की भी रक्षा करते हैं।"
श्लोक 13 (7.12.13)
अथवा भरतश्रेष्ठ निर्जित्य युधि पाण्डवान् । राज्यांशं प्रति दत्त्वा च सौभ्रात्रं कर्तुमिच्छसि ॥
athavā bharataśreṣṭha nirjitya yudhi pāṇḍavān | rājyāṃśaṃ prati dattvā ca saubhrātraṃ kartumicchasi
"अथवा भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों को युद्ध में जीतकर और उन्हें राज्य का एक भाग लौटाकर आप भाई-चारे का सम्बन्ध करना चाहते हैं?"
श्लोक 14 (7.12.14)
धन्यः कुन्तीसुतो राजा सुजातं चास्य धीमतः । अजातशत्रुता सत्या तस्य यत्स्निह्यते भवान् ॥
dhanyaḥ kuntīsuto rājā sujātaṃ cāsya dhīmataḥ | ajātaśatrutā satyā tasya yatsnihyate bhavān
"कुन्तीपुत्र राजा धन्य है और उस बुद्धिमान् का जन्म भी उत्तम है; उसका अजातशत्रु नाम सच्चा है, क्योंकि आप भी उससे स्नेह करते हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (7.12.15)
द्रोणेन चैवमुक्तस्य तव पुत्रस्य भारत । सहसा निःसृतो भावो योऽस्य नित्यं हृदि स्थितः ॥
droṇena caivamuktasya tava putrasya bhārata | sahasā niḥsṛto bhāvo yo'sya nityaṃ hṛdi sthitaḥ
भारत, द्रोण के इस प्रकार कहने पर आपके पुत्र के हृदय में जो भाव सदा बना रहता था, वह सहसा बाहर निकल पड़ा।
श्लोक 16 (7.12.16)
नाकारो गूहितुं शक्यो बृहस्पतिसमैरपि । तस्मात्तव सुतो राजन्प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥
nākāro gūhituṃ śakyo bṛhaspatisamairapi | tasmāttava suto rājanprahṛṣṭo vākyamabravīt
मन के भाव का बाह्य रूप बृहस्पति के समान बुद्धिमानों से भी छिपाया नहीं जा सकता। इसलिए राजन्, आपके पुत्र ने प्रसन्न होकर यह वचन कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 17 (7.12.17)
वधे कुन्तीसुतस्याजौ नाचार्य विजयो मम । हते युधिष्ठिरे पार्था हन्युःसर्वान्हि नो ध्रुवम् ॥
vadhe kuntīsutasyājau nācārya vijayo mama | hate yudhiṣṭhire pārthā hanyuḥsarvānhi no dhruvam
"आचार्य, युद्ध में कुन्तीपुत्र का वध करने से मेरी विजय नहीं होती; क्योंकि युधिष्ठिर के मारे जाने पर पाण्डव निश्चय ही हम सबको मार डालेंगे।"
श्लोक 18 (7.12.18)
नैव शक्या रणे सर्वे निहन्तुममरैरपि । यदि सर्वे हनिष्यन्ते पाण्डवाः ससुता मृधे ॥
naiva śakyā raṇe sarve nihantumamarairapi | yadi sarve haniṣyante pāṇḍavāḥ sasutā mṛdhe
"और उन सबको तो देवता भी रण में नहीं मार सकते। यदि सब पाण्डव अपने पुत्रों सहित युद्ध में मार भी दिए जाएँ,"
श्लोक 19 (7.12.19)
ततः कृत्स्नं वशे कृत्वा निःशेषं नृपमण्डलम् । ससागरवनां स्फीतां विजित्य वसुधामिमाम् ॥
tataḥ kṛtsnaṃ vaśe kṛtvā niḥśeṣaṃ nṛpamaṇḍalam | sasāgaravanāṃ sphītāṃ vijitya vasudhāmimām
"तो फिर, राजाओं के समस्त मण्डल को वश में करके और समुद्र तथा वनों सहित इस समृद्ध पृथ्वी को जीतकर,"
श्लोक 20 (7.12.20)
विष्णुर्दास्यति कृष्णायै कुन्त्यै वा पुरुषोत्तमः । यद्येष चैषां शेषःस्यात्स एवास्मान्न शेषयेत् ॥
viṣṇurdāsyati kṛṣṇāyai kuntyai vā puruṣottamaḥ | yadyeṣa caiṣāṃ śeṣaḥsyātsa evāsmānna śeṣayet
"पुरुषोत्तम विष्णु उसे द्रौपदी अथवा कुन्ती को दे देंगे। और यदि इनमें से एक भी शेष रह गया, तो वही हमें शेष नहीं रहने देगा।"
श्लोक 21 (7.12.21)
सत्यप्रतिज्ञे त्वानीते पुनर्द्यूतेन निर्जिते । तस्मिञ्जीवति चायाते ह्युपायैर्बहुभिः कृतैः । पुनर्यास्यन्त्यरण्याय पाण्डवास्तमनुव्रताः ॥
satyapratijñe tvānīte punardyūtena nirjite | tasmiñjīvati cāyāte hyupāyairbahubhiḥ kṛtaiḥ | punaryāsyantyaraṇyāya pāṇḍavāstamanuvratāḥ
"किन्तु यदि सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिर को यहाँ लाकर फिर द्यूत में हरा दिया जाए, और बहुत-से उपायों से रचे गए प्रयत्न से वह जीवित अवस्था में यहाँ आ जाए, तो उसके अनुयायी पाण्डव फिर वन को चले जाएँगे।"
श्लोक 22 (7.12.22)
सोऽयं मम जयो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति । अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ॥
so'yaṃ mama jayo vyaktaṃ dīrghakālaṃ bhaviṣyati | ato na vadhamicchāmi dharmarājasya karhicit
"इस प्रकार मेरी विजय स्पष्ट ही दीर्घकाल तक रहेगी। इसीलिए मैं धर्मराज का वध कभी नहीं चाहता।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (7.12.23)
तस्य जिह्ममभिप्रायं ज्ञात्वा द्रोणोऽर्थतत्त्ववित् । तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥
tasya jihmamabhiprāyaṃ jñātvā droṇo'rthatattvavit | taṃ varaṃ sāntaraṃ tasmai dadau saṃcintya buddhimān
उसके कुटिल अभिप्राय को जानकर तत्त्व को समझने वाले बुद्धिमान् द्रोण ने विचार करके उसे वह वर शर्त के साथ दे दिया।
द्रोण उवाच
श्लोक 24 (7.12.24)
न चेद्युधिष्ठिरं वीरः पालयेदर्जुनो युधि । मन्यस्व पाण्डवश्रेष्ठमानीतं वशमात्मनः ॥
na cedyudhiṣṭhiraṃ vīraḥ pālayedarjuno yudhi | manyasva pāṇḍavaśreṣṭhamānītaṃ vaśamātmanaḥ
"यदि वीर अर्जुन युद्ध में युधिष्ठिर की रक्षा न करे, तो पाण्डवश्रेष्ठ को अपने वश में आया हुआ मान लीजिए।"
श्लोक 25 (7.12.25)
न हि शक्यो रणे पार्थः सेन्द्रैर्देवासुरैरपि । प्रत्युद्यातुमतस्तात न तस्माद्धर्षयाम्यहम् ॥
na hi śakyo raṇe pārthaḥ sendrairdevāsurairapi | pratyudyātumatastāta na tasmāddharṣayāmyaham
"क्योंकि इन्द्र सहित देवता और असुर भी रण में पार्थ का सामना नहीं कर सकते; इसलिए, तात, मैं उसे नहीं छेड़ता।"
श्लोक 26 (7.12.26)
असंशयं स मे शिष्यो मत्पूर्वश्चास्त्रकर्मणि । तरुणः सुकृती युक्त एकायनगतश्च सः ॥
asaṃśayaṃ sa me śiṣyo matpūrvaścāstrakarmaṇi | taruṇaḥ sukṛtī yukta ekāyanagataśca saḥ
"निस्सन्देह वह मेरा शिष्य है और अस्त्र-कर्म में मैं उससे पहले का हूँ; वह तरुण, कृतकृत्य, संयमी और एक ही मार्ग (जय या मरण) पर डटा हुआ है।"
श्लोक 27 (7.12.27)
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च भूयांसि समवाप्तवान् । अमर्षितश्च ते राजंस्ततो नामर्षयाम्यहम् ॥
astrāṇīndrācca rudrācca bhūyāṃsi samavāptavān | amarṣitaśca te rājaṃstato nāmarṣayāmyaham
"उसने इन्द्र और रुद्र से बहुत-से अस्त्र प्राप्त किए हैं; और राजन्, वह आप पर कुपित है, इसलिए मैं उसे और क्रुद्ध नहीं करता।"
श्लोक 28 (7.12.28)
स चापक्रम्यतां युद्धाद्येनोपायेन शक्यते । अपनीते ततः पार्थे धर्मराजो जितस्त्वया ॥
sa cāpakramyatāṃ yuddhādyenopāyena śakyate | apanīte tataḥ pārthe dharmarājo jitastvayā
"जिस उपाय से सम्भव हो, उसे युद्ध से हटाया जाए। पार्थ के हट जाने पर धर्मराज आपके द्वारा जीता हुआ समझिए।"
श्लोक 29 (7.12.29)
ग्रहणे हि जयस्तस्य न वधे पुरुषर्षभ । ग्रहणं हि वधात्तस्य धर्मराजस्य मन्यसे । अनेनैवाभ्युपायेन ग्रहणं समुपैष्यसि ॥
grahaṇe hi jayastasya na vadhe puruṣarṣabha | grahaṇaṃ hi vadhāttasya dharmarājasya manyase | anenaivābhyupāyena grahaṇaṃ samupaiṣyasi
"पुरुषश्रेष्ठ, उस पर आपकी विजय उसे पकड़ने में है, मारने में नहीं; आप धर्मराज को पकड़ना उसके वध से अच्छा मानते हैं। इसी उपाय से आप उसे पकड़ सकेंगे।"
श्लोक 30 (7.12.30)
अहं गृहीत्वा राजानं सत्यधर्मपरायणम् । आनयिष्यामि ते राजन्वशमद्य न संशयः ॥
ahaṃ gṛhītvā rājānaṃ satyadharmaparāyaṇam | ānayiṣyāmi te rājanvaśamadya na saṃśayaḥ
"राजन्, मैं सत्य और धर्म में तत्पर राजा को पकड़कर आज आपके वश में ले आऊँगा, इसमें संशय नहीं।"
श्लोक 31 (7.12.31)
यदि स्थास्यति सङ्ग्रामे मुहूर्तमपि मेऽग्रतः । अपनीते नरव्याघ्रे कुन्तीपुत्रे धनञ्जये ॥
yadi sthāsyati saṅgrāme muhūrtamapi me'grataḥ | apanīte naravyāghre kuntīputre dhanañjaye
"यदि नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र धनञ्जय के हट जाने पर वह रण में एक मुहूर्त भर भी मेरे सामने ठहर गया,"
श्लोक 32 (7.12.32)
फल्गुनस्य समीपे तु न हि शक्यो युधिष्ठिरः । ग्रहीतुं समरे राजन्सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥
phalgunasya samīpe tu na hi śakyo yudhiṣṭhiraḥ | grahītuṃ samare rājansendrairapi surāsuraiḥ
"फल्गुन के समीप रहते युधिष्ठिर को रण में इन्द्र सहित देवता और असुर भी नहीं पकड़ सकते, राजन्।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 33 (7.12.33)
एवमुक्ते तदा तस्मिन्युद्धे देवासुरोपमे । सान्तरं तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे । गृहीतं तममन्यन्त तव पुत्राः सुबालिशाः ॥
evamukte tadā tasminyuddhe devāsuropame | sāntaraṃ tu pratijñāte rājño droṇena nigrahe | gṛhītaṃ tamamanyanta tava putrāḥ subāliśāḥ
यह कहे जाने पर, देवासुर-संग्राम के समान उस युद्ध में, द्रोण द्वारा शर्त के साथ राजा को पकड़ने की प्रतिज्ञा किए जाने पर आपके मूर्ख पुत्रों ने उसे पकड़ा हुआ ही मान लिया।
श्लोक 34 (7.12.34)
ततो दुर्योधनेनापि ग्रहणं पाण्डवस्य तत् । स्कन्धावारेषु सर्वेषु यथास्थानेषु मारिष । सैन्यस्थानेषु सर्वेषु सुघोषितमरिन्दम ॥
tato duryodhanenāpi grahaṇaṃ pāṇḍavasya tat | skandhāvāreṣu sarveṣu yathāsthāneṣu māriṣa | sainyasthāneṣu sarveṣu sughoṣitamarindama
तब दुर्योधन ने भी पाण्डव के उस पकड़े जाने की घोषणा सब छावनियों में, उनके अपने-अपने स्थानों पर और सेना के सब पड़ावों में करा दी, शत्रुदमन।
श्लोक 35 (7.12.35)
पाण्डवेयेषु सापेक्षं द्रोणं जानाति ते सुतः । ततः प्रतिज्ञास्थैर्यार्थं स मन्त्रो बहुलीकृतः ॥
pāṇḍaveyeṣu sāpekṣaṃ droṇaṃ jānāti te sutaḥ | tataḥ pratijñāsthairyārthaṃ sa mantro bahulīkṛtaḥ
आपका पुत्र जानता है कि द्रोण पाण्डवों के प्रति पक्षपात रखते हैं; इसलिए प्रतिज्ञा को दृढ़ करने के लिए वह मन्त्रणा बहुतों में प्रकट कर दी गई।