द्रोण पर्व · अध्याय 11
धृतराष्ट्र द्वारा श्रीकृष्ण के पराक्रमों का वर्णन
भीष्म और द्रोण के वध से शोकाकुल धृतराष्ट्र श्रीकृष्ण के दिव्य कर्मों का वर्णन करते हैं: उनके मारे हुए असुर, जीते हुए राजा और प्राप्त किए हुए उपहार, और वे वृष्णि वीर जो अब भी युद्ध में उतर सकते हैं। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कृष्ण और अर्जुन नर-नारायण हैं, अतः कौरवों की विजय कहीं नहीं दीखती, और सञ्जय से कहते हैं कि युद्ध जैसा हुआ वैसा ठीक-ठीक सुनाओ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.11.1)
शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य सञ्जय । कृतवान्यानि गोविन्दो यथा नान्याःपुमान्क्वचित् ॥
śṛṇu divyāni karmāṇi vāsudevasya sañjaya | kṛtavānyāni govindo yathā nānyāḥpumānkvacit
सञ्जय, वासुदेव के उन दिव्य कर्मों को सुनो, जो गोविन्द ने किए हैं और जैसे कर्म और कोई पुरुष कभी नहीं कर सका।
श्लोक 2 (7.11.2)
संवर्धता गोपकुले बालेनैव महात्मना । विख्यापितं बलं बाह्वोस्त्रिषु लोकेषु सञ्जय ॥
saṃvardhatā gopakule bālenaiva mahātmanā | vikhyāpitaṃ balaṃ bāhvostriṣu lokeṣu sañjaya
सञ्जय, गोपों के कुल में पलते हुए उस महात्मा ने बालक रहते ही अपनी भुजाओं का बल तीनों लोकों में प्रसिद्ध कर दिया था।
श्लोक 3 (7.11.3)
पूतनां शकटं हत्वा केशिनं चैव वाजिनम् । ऋषभं धेनुकं चैव अरिष्टं च महाबलम् ॥
pūtanāṃ śakaṭaṃ hatvā keśinaṃ caiva vājinam | ṛṣabhaṃ dhenukaṃ caiva ariṣṭaṃ ca mahābalam
पूतना और शकट को उन्होंने नष्ट किया; केशी नामक अश्व, वृषभ, धेनुक और महाबली अरिष्ट को मारा;
श्लोक 4 (7.11.4)
दावान्मुक्त्वा महाबाहुर्धृत्वा गोवर्धनं गिरिम् । चाणूरं मुष्टिकं चैव रङ्गमध्ये निहत्य च ॥
dāvānmuktvā mahābāhurdhṛtvā govardhanaṃ girim | cāṇūraṃ muṣṭikaṃ caiva raṅgamadhye nihatya ca
दावाग्नि से (गोपों को) छुड़ाकर उन महाबाहु ने गोवर्धन पर्वत को उठाया, और रंगभूमि के बीच चाणूर तथा मुष्टिक को मार गिराया;
श्लोक 5 (7.11.5)
प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् । मुरुं चान्तकसङ्काशमवधीत्पुष्करेक्षणः ॥
pralambaṃ narakaṃ jambhaṃ pīṭhaṃ cāpi mahāsuram | muruṃ cāntakasaṅkāśamavadhītpuṣkarekṣaṇaḥ
प्रलम्ब, नरक, जम्भ, महान् असुर पीठ और यमराज के समान मुर को कमलनयन श्रीकृष्ण ने मार डाला।
श्लोक 6 (7.11.6)
तथा कंसो महातेजा जरासन्धेन पालितः । विक्रमेणैव कृष्णेन सगणः पातितो रणे ॥
tathā kaṃso mahātejā jarāsandhena pālitaḥ | vikrameṇaiva kṛṣṇena sagaṇaḥ pātito raṇe
इसी प्रकार जरासन्ध से रक्षित महातेजस्वी कंस भी अपने गणों सहित कृष्ण के पराक्रम से ही रण में मार गिराया गया।
श्लोक 7 (7.11.7)
सुनामा रणविक्रान्तः समग्राक्षौहिणीपतिः । भोजराजस्य मध्यस्थो भ्राता कंसस्य वीर्यवान् ॥
sunāmā raṇavikrāntaḥ samagrākṣauhiṇīpatiḥ | bhojarājasya madhyastho bhrātā kaṃsasya vīryavān
रण में पराक्रमी, पूरी अक्षौहिणी सेना के स्वामी, भोजराज के मध्यस्थ बने हुए, कंस के बलवान् भ्राता सुनामा को,
श्लोक 8 (7.11.8)
बलदेवद्वितीयेन कृष्णेनामित्रघातिना । तरस्वी समरे दग्धः ससैन्यः शूरसेनराट् ॥
baladevadvitīyena kṛṣṇenāmitraghātinā | tarasvī samare dagdhaḥ sasainyaḥ śūrasenarāṭ
उस वेगवान् शूरसेन-नरेश को, बलदेव को साथ लेकर शत्रुनाशक कृष्ण ने रण में सेना सहित भस्म कर दिया।
श्लोक 9 (7.11.9)
दुर्वासा नाम विप्रर्षिस्तथा परमकोपनः । आराधितः सदारेण स चास्मै प्रददौ वरान् ॥
durvāsā nāma viprarṣistathā paramakopanaḥ | ārādhitaḥ sadāreṇa sa cāsmai pradadau varān
दुर्वासा नामक अत्यन्त क्रोधी ब्रह्मर्षि की उन्होंने पत्नी सहित आराधना की, और उन्होंने इन्हें वर दिए।
श्लोक 10 (7.11.10)
तथा गान्धारराजस्य सुतां वीरः स्वयंवरे । निर्जित्य पृथिवीपालानावहत्पुष्करेक्षणः ॥
tathā gāndhārarājasya sutāṃ vīraḥ svayaṃvare | nirjitya pṛthivīpālānāvahatpuṣkarekṣaṇaḥ
और स्वयंवर में उस वीर कमलनयन ने पृथ्वी के राजाओं को जीतकर गान्धारराज की पुत्री का वरण किया।
श्लोक 11 (7.11.11)
अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हया इव । रथे वैवाहिके युक्ताः प्रतोदेन कृतव्रणाः ॥
amṛṣyamāṇā rājāno yasya jātyā hayā iva | rathe vaivāhike yuktāḥ pratodena kṛtavraṇāḥ
सहन न कर पाने वाले राजा उनके विवाह-रथ में घोड़ों की भाँति जोत दिए गए और चाबुक की मार से उनके शरीर पर घाव हो गए।
श्लोक 12 (7.11.12)
जरासन्धं महाबाहुमुपायेन जनार्दनः । परेण घातयामास समग्राक्षौहिणीपतिम् ॥
jarāsandhaṃ mahābāhumupāyena janārdanaḥ | pareṇa ghātayāmāsa samagrākṣauhiṇīpatim
जनार्दन ने उपाय से, पूरी अक्षौहिणी के स्वामी महाबाहु जरासन्ध को दूसरे के हाथ से मरवा दिया।
श्लोक 13 (7.11.13)
चेदिराजं च विक्रान्तं राजसेनापतिं बली । अर्घे विवदमानं च जघान पशुवत्तदा ॥
cedirājaṃ ca vikrāntaṃ rājasenāpatiṃ balī | arghe vivadamānaṃ ca jaghāna paśuvattadā
और अर्घ्य के विषय में विवाद करने वाले पराक्रमी चेदिराज को, जो राजाओं का सेनापति था, उस बली ने उस समय पशु की भाँति मार डाला।
श्लोक 14 (7.11.14)
सौभं दैत्यपुरं खस्थं शाल्वगुप्तं दुरासदम् । समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातयामास माधवः ॥
saubhaṃ daityapuraṃ khasthaṃ śālvaguptaṃ durāsadam | samudrakukṣau vikramya pātayāmāsa mādhavaḥ
आकाश में चलने वाले, शाल्व से रक्षित, दुर्गम दैत्य-नगर सौभ को माधव ने पराक्रम करके समुद्र की गहराई में गिरा दिया।
श्लोक 15 (7.11.15)
अङ्गान्वङ्गान्कलिङ्गंश्च मागधान्काशिकोसलान् । वात्स्यगार्ग्यकरूषांश्च पौण्ड्रांश्चाप्यजयद्रणे ॥
aṅgānvaṅgānkaliṅgaṃśca māgadhānkāśikosalān | vātsyagārgyakarūṣāṃśca pauṇḍrāṃścāpyajayadraṇe
अंग, वंग, कलिंग, मगध, काशी और कोसल, वात्स्य, गार्ग्य, करूष तथा पौण्ड्र देशवासियों को उन्होंने रण में जीता;
श्लोक 16 (7.11.16)
आवन्त्यान्दाक्षिणात्यांश्च पार्वतीयान्दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान्पिशाचांश्च समुद्गलान् ॥
āvantyāndākṣiṇātyāṃśca pārvatīyāndaśerakān | kāśmīrakānaurasikānpiśācāṃśca samudgalān
आवन्त्य, दाक्षिणात्य, पर्वतवासी, दशेरक, काश्मीरक, औरसिक, पिशाच और समुद्गलों को भी;
श्लोक 17 (7.11.17)
काम्भोजान्वाटधानांश्च चोलान्पाण्ड्यांश्च सञ्जय । त्रिगर्तान्मालवांश्चैव दरदांश्च सुदुर्जयान् ॥
kāmbhojānvāṭadhānāṃśca colānpāṇḍyāṃśca sañjaya | trigartānmālavāṃścaiva daradāṃśca sudurjayān
सञ्जय, काम्भोज, वाटधान, चोल और पाण्ड्य, त्रिगर्त, मालव तथा अत्यन्त दुर्जय दरदों को भी;
श्लोक 18 (7.11.18)
नानादिग्भ्यश्च सम्प्राप्तान्खशांश्चैव शकांस्तथा । जितवान्पुण्डरीकाक्षो यवनं च सहानुगम् ॥
nānādigbhyaśca samprāptānkhaśāṃścaiva śakāṃstathā | jitavānpuṇḍarīkākṣo yavanaṃ ca sahānugam
और नाना दिशाओं से आए हुए खश तथा शकों को, और अनुचरों सहित यवन को भी कमलनयन ने जीत लिया।
श्लोक 19 (7.11.19)
प्रविश्य मकरावासं यादोगणनिषेवितम् । जिगाय वरुणं सङ्ख्ये सलिलान्तर्गतं पुरा ॥
praviśya makarāvāsaṃ yādogaṇaniṣevitam | jigāya varuṇaṃ saṅkhye salilāntargataṃ purā
जलजन्तुओं के समूहों से भरे मकरों के निवास (समुद्र) में प्रवेश करके उन्होंने पूर्वकाल में जल के भीतर गए हुए वरुण को युद्ध में जीता था।
श्लोक 20 (7.11.20)
युधि पञ्चजनं हत्वा दैत्यं पातालवासिनम् । पाञ्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शङ्खमवाप्तवान् ॥
yudhi pañcajanaṃ hatvā daityaṃ pātālavāsinam | pāñcajanyaṃ hṛṣīkeśo divyaṃ śaṅkhamavāptavān
पाताल में रहने वाले पञ्चजन नामक दैत्य को युद्ध में मारकर हृषीकेश ने दिव्य शंख पाञ्चजन्य प्राप्त किया।
श्लोक 21 (7.11.21)
खाण्डवे पार्थसहितस्तोषयित्वा हुताशनम् । आग्नेयमस्त्रं दुर्धर्षं चक्रं लेभे महाबलः ॥
khāṇḍave pārthasahitastoṣayitvā hutāśanam | āgneyamastraṃ durdharṣaṃ cakraṃ lebhe mahābalaḥ
खाण्डव वन में पार्थ के साथ अग्नि को तृप्त करके उन महाबली ने आग्नेय अस्त्र-रूप दुर्धर्ष चक्र प्राप्त किया।
श्लोक 22 (7.11.22)
वैनतेयं समारुह्य त्रासयित्वाऽमरावतीम् । महेन्द्रभवनाद्वीरः पारिजातमुपानयत् ॥
vainateyaṃ samāruhya trāsayitvā'marāvatīm | mahendrabhavanādvīraḥ pārijātamupānayat
वैनतेय (गरुड़) पर चढ़कर और अमरावती को भयभीत करके उस वीर ने महेन्द्र के भवन से पारिजात वृक्ष लाकर दिया।
श्लोक 23 (7.11.23)
तच्च मर्षितवाञ्शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् । राज्ञां चाप्यजितं कंचित्कृष्णेनेह न शुश्रुम ॥
tacca marṣitavāñśakro jānaṃstasya parākramam | rājñāṃ cāpyajitaṃ kaṃcitkṛṣṇeneha na śuśruma
इन्द्र ने उनके पराक्रम को जानते हुए यह भी सह लिया; और हमने ऐसा कोई राजा नहीं सुना जिसे कृष्ण ने न जीता हो।
श्लोक 24 (7.11.24)
यच्च तन्महदाश्चर्यं सभायां मम सञ्जय । कृतवान्पुण्डरीकाक्षः कस्तदन्य इहार्हति ॥
yacca tanmahadāścaryaṃ sabhāyāṃ mama sañjaya | kṛtavānpuṇḍarīkākṣaḥ kastadanya ihārhati
और सञ्जय, मेरी सभा में उन कमलनयन ने जो महान् आश्चर्य किया, उसे यहाँ दूसरा कौन कर सकता है?
श्लोक 25 (7.11.25)
यच्च भक्त्या प्रसन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् । तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमम् ॥
yacca bhaktyā prasanno'hamadrākṣaṃ kṛṣṇamīśvaram | tanme suviditaṃ sarvaṃ pratyakṣamiva cāgamam
और भक्ति से प्रसन्न होकर मैंने जो ईश्वर कृष्ण का दर्शन किया, उससे वह सब मुझे भली-भाँति ज्ञात है, मानो मैंने उसे प्रत्यक्ष जाना हो।
श्लोक 26 (7.11.26)
नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य सञ्जय ॥
nānto vikramayuktasya buddhyā yuktasya vā punaḥ | karmaṇāṃ śakyate gantuṃ hṛṣīkeśasya sañjaya
सञ्जय, पराक्रम अथवा बुद्धि से युक्त होकर भी कोई हृषीकेश के कर्मों का अन्त नहीं पा सकता।
श्लोक 27 (7.11.27)
तथा गदश्च साम्बश्च प्रद्युम्नोऽथ विदूरथः । अगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णः ससारणः ॥
tathā gadaśca sāmbaśca pradyumno'tha vidūrathaḥ | agāvaho'niruddhaśca cārudeṣṇaḥ sasāraṇaḥ
तथा गद और साम्ब, प्रद्युम्न और विदूरथ, अगावह और अनिरुद्ध, चारुदेष्ण और सारण,
श्लोक 28 (7.11.28)
उल्मुको निशठश्चैव झिल्ली बभ्रुश्च वीर्यवान् । पृथुश्च विपृथुश्चैव शमीकोऽथारिमेजयः ॥
ulmuko niśaṭhaścaiva jhillī babhruśca vīryavān | pṛthuśca vipṛthuścaiva śamīko'thārimejayaḥ
उल्मुक, निशठ, झिल्ली और पराक्रमी बभ्रु, पृथु और विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय,
श्लोक 29 (7.11.29)
एतेऽन्ये बलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः । कथंचित्पाण्डवानीकं श्रयेयुः समरे स्थिताः ॥
ete'nye balavantaśca vṛṣṇivīrāḥ prahāriṇaḥ | kathaṃcitpāṇḍavānīkaṃ śrayeyuḥ samare sthitāḥ
ये तथा और भी बलवान् प्रहार करने वाले वृष्णि वीर, यदि किसी प्रकार रण में डटकर पाण्डवों की सेना का आश्रय ले लें,
श्लोक 30 (7.11.30)
आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना । ततः संशयितं सर्वे भवेदिति मतिर्मम ॥
āhūtā vṛṣṇivīreṇa keśavena mahātmanā | tataḥ saṃśayitaṃ sarve bhavediti matirmama
और महात्मा वृष्णिवीर केशव उन्हें बुला लें, तो सब कुछ संशय में पड़ जाएगा, ऐसा मेरा विचार है।
श्लोक 31 (7.11.31)
नागायुतबलो वीरः कैलासशिखरोपमः । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ॥
nāgāyutabalo vīraḥ kailāsaśikharopamaḥ | vanamālī halī rāmastatra yatra janārdanaḥ
दस हजार हाथियों के बल वाले, कैलास-शिखर के समान, वनमाला और हल धारण करने वाले वीर बलराम वहीं रहते हैं जहाँ जनार्दन हैं।
श्लोक 32 (7.11.32)
यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातयः । अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय सञ्जय ॥
yamāhuḥ sarvapitaraṃ vāsudevaṃ dvijātayaḥ | api vā hyeṣa pāṇḍūnāṃ yotsyate'rthāya sañjaya
सञ्जय, जिन वासुदेव को द्विज सबका पिता कहते हैं, वे भी पाण्डवों के लिए युद्ध कर सकते हैं।
श्लोक 33 (7.11.33)
स यदा तात सन्नह्येत्पाण्डवार्थाय सञ्जय । न तदा प्रतिसंयोद्धा भविता तत्र कश्चन ॥
sa yadā tāta sannahyetpāṇḍavārthāya sañjaya | na tadā pratisaṃyoddhā bhavitā tatra kaścana
तात सञ्जय, जब वे पाण्डवों के लिए कमर कस लेंगे, तब वहाँ उनका सामना करने वाला कोई न होगा।
श्लोक 34 (7.11.34)
यदि स्म कुरवः सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान् । वार्ष्णेयोऽर्थाय तेषां वै गृह्णीयाच्छस्त्रमुत्तमम् ॥
yadi sma kuravaḥ sarve jayeyurnāma pāṇḍavān | vārṣṇeyo'rthāya teṣāṃ vai gṛhṇīyācchastramuttamam
यदि कदाचित् सब कौरव पाण्डवों को जीत भी लें, तो वार्ष्णेय पाण्डवों के हित के लिए अपना उत्तम शस्त्र उठा लेंगे।
श्लोक 35 (7.11.35)
ततः सर्वान्नरव्याघ्रो हत्वा नरपतीन्रणे । कौरवांश्च महाबाहुःकुन्त्यै दद्यात्स मेदिनीम् ॥
tataḥ sarvānnaravyāghro hatvā narapatīnraṇe | kauravāṃśca mahābāhuḥkuntyai dadyātsa medinīm
तब वे पुरुषसिंह महाबाहु रण में सब राजाओं और कौरवों को मारकर पृथ्वी कुन्ती को दे देंगे।
श्लोक 36 (7.11.36)
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जयः । रथस्य तस्य कः सङ्ख्ये प्रत्यनीको भवेद्रथः ॥
yasya yantā hṛṣīkeśo yoddhā yasya dhanañjayaḥ | rathasya tasya kaḥ saṅkhye pratyanīko bhavedrathaḥ
जिस रथ के सारथि हृषीकेश हैं और योद्धा धनञ्जय हैं, उस रथ का सामना युद्ध में कौन-सा रथ कर सकता है?
श्लोक 37 (7.11.37)
न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जयः । तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ॥
na kenacidupāyena kurūṇāṃ dṛśyate jayaḥ | tasmānme sarvamācakṣva yathā yuddhamavartata
मुझे किसी भी उपाय से कौरवों की विजय नहीं दीखती। इसलिए युद्ध जैसा हुआ, वह सब मुझसे कहो।
श्लोक 38 (7.11.38)
अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः । अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ॥
arjunaḥ keśavasyātmā kṛṣṇo'pyātmā kirīṭinaḥ | arjune vijayo nityaṃ kṛṣṇe kīrtiśca śāśvatī
अर्जुन केशव की आत्मा है और कृष्ण भी किरीटधारी अर्जुन की आत्मा हैं। अर्जुन में सदा विजय है और कृष्ण में शाश्वत कीर्ति।
श्लोक 39 (7.11.39)
सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजितः । प्राधान्येनैव भूयिष्ठममेयाः केशवे गुणाः ॥
sarveṣvapi ca lokeṣu bībhatsuraparājitaḥ | prādhānyenaiva bhūyiṣṭhamameyāḥ keśave guṇāḥ
सभी लोकों में बीभत्सु (अर्जुन) अपराजित हैं; और केशव के गुण अपार हैं, जिनमें प्रधानता सबसे बढ़कर है।
श्लोक 40 (7.11.40)
मोहाद्दुर्योधनः कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम् । मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृतः ॥
mohādduryodhanaḥ kṛṣṇaṃ yo na vettīha keśavam | mohito daivayogena mṛtyupāśapuraskṛtaḥ
मोह के कारण दुर्योधन जो यहाँ कृष्ण को केशव नहीं जानता, वह दैव के योग से मोहित हो गया है और मृत्यु का पाश उसके सामने है।
श्लोक 41 (7.11.41)
न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् । पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ॥
na veda kṛṣṇaṃ dāśārhamarjunaṃ caiva pāṇḍavam | pūrvadevau mahātmānau naranārāyaṇāvubhau
वह दाशार्ह कृष्ण को और पाण्डुपुत्र अर्जुन को नहीं जानता, जो दोनों महात्मा पुरातन देव नर और नारायण हैं।
श्लोक 42 (7.11.42)
एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसापि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ ॥
ekātmānau dvidhābhūtau dṛśyete mānavairbhuvi | manasāpi hi durdharṣau senāmetāṃ yaśasvinau
एक आत्मा होकर भी दो रूप हुए वे दोनों पृथ्वी पर मनुष्यों को दिखाई देते हैं; मन से भी जिन्हें जीतना कठिन है, वे दोनों यशस्वी
श्लोक 43 (7.11.43)
नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छतः । युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् ॥
nāśayetāmihecchantau mānuṣatvācca necchataḥ | yugasyeva viparyāso lokānāmiva mohanam
यदि चाहें तो इस सेना का यहीं नाश कर दें, पर मनुष्य-भाव के कारण नहीं चाहते। यह युग के उलट जाने जैसा, लोकों के मोह जैसा है:
श्लोक 44 (7.11.44)
भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मनः । न ह्येव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च ॥
bhīṣmasya ca vadhastāta droṇasya ca mahātmanaḥ | na hyeva brahmacaryeṇa na vedādhyayanena ca
तात सञ्जय, भीष्म का वध और महात्मा द्रोण का वध। न ब्रह्मचर्य से, न वेदाध्ययन से,
श्लोक 45 (7.11.45)
न क्रियाभिर्न चास्त्रेण मृत्योः कश्चिन्निर्वायते । लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ॥
na kriyābhirna cāstreṇa mṛtyoḥ kaścinnirvāyate | lokasambhāvitau vīrau kṛtāstrau yuddhadurmadau
न कर्मों से, न अस्त्र से कोई मृत्यु से बच पाता है। वे दोनों वीर, जगत् में सम्मानित, अस्त्रविद्या में कुशल और युद्ध में प्रचण्ड थे;
श्लोक 46 (7.11.46)
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा किन्नु जीवामि सञ्जय । यां तां श्रियमसूयामः पुरा दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ॥
bhīṣmadroṇau hatau śrutvā kinnu jīvāmi sañjaya | yāṃ tāṃ śriyamasūyāmaḥ purā dṛṣṭvā yudhiṣṭhire
सञ्जय, भीष्म और द्रोण के मारे जाने की बात सुनकर भी मैं क्यों जी रहा हूँ? युधिष्ठिर की जिस लक्ष्मी को पहले देखकर हम डाह करते थे,
श्लोक 47 (7.11.47)
अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । मत्कृते चाप्यनुप्राप्तः कुरूणामेष सङ्क्षयः ॥
adya tāmanujānīmo bhīṣmadroṇavadhena ha | matkṛte cāpyanuprāptaḥ kurūṇāmeṣa saṅkṣayaḥ
आज भीष्म और द्रोण के वध से उसे हम मान ही लेते हैं। और मेरे ही कारण कौरवों का यह विनाश आ पहुँचा है।
श्लोक 48 (7.11.48)
पक्वानां हि वधे सूत वज्रायन्ते तृणान्युत । अनन्तमिदमैश्वर्यं लोके प्राप्तो युधिष्ठिरः ॥
pakvānāṃ hi vadhe sūta vajrāyante tṛṇānyuta | anantamidamaiśvaryaṃ loke prāpto yudhiṣṭhiraḥ
सूत, पके हुओं के वध में तो तिनके भी वज्र बन जाते हैं। युधिष्ठिर ने संसार में अनन्त ऐश्वर्य पा लिया है,
श्लोक 49 (7.11.49)
यस्य कोपान्महात्मानौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ । प्राप्तः प्रकृतितो धर्मो न धर्मो मामकान्प्रति ॥
yasya kopānmahātmānau bhīṣmadroṇau nipātitau | prāptaḥ prakṛtito dharmo na dharmo māmakānprati
जिसके कोप से महात्मा भीष्म और द्रोण गिराए गए। उसे स्वभाव से ही धर्म प्राप्त है, मेरे पक्ष वालों के लिए धर्म नहीं है।
श्लोक 50 (7.11.50)
क्रूरः सर्वविनाशाय कालोऽसौ नातिवर्तते । अन्यथा चिन्तिता ह्यर्था नरैस्तात मनस्विभिः । अन्यथैव प्रपद्यन्ते दैवादिति मतिर्मम ॥
krūraḥ sarvavināśāya kālo'sau nātivartate | anyathā cintitā hyarthā naraistāta manasvibhiḥ | anyathaiva prapadyante daivāditi matirmama
सबके विनाश के लिए वह क्रूर काल टलता नहीं। तात, बुद्धिमान् मनुष्य जिन बातों को एक प्रकार से सोचते हैं, वे दैव से दूसरे ही प्रकार से घटित होती हैं, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 51 (7.11.51)
तस्मादपरिहार्येऽर्थे सम्प्राप्ते कृच्छ्र उत्तमे । अपारणीये दुश्चिन्त्ये यथाभूतं प्रचक्ष्व मे ॥
tasmādaparihārye'rthe samprāpte kṛcchra uttame | apāraṇīye duścintye yathābhūtaṃ pracakṣva me
इसलिए जब यह अनिवार्य, भयंकर और परम संकट आ पड़ा है, जो असह्य और चिन्तन करने योग्य भी नहीं, तब जैसा हुआ वैसा ही मुझे बताओ।