द्रोण पर्व · अध्याय 10
धृतराष्ट्र की मूर्च्छा और पाण्डव-वीरों के सामने टिकने वालों के विषय में प्रश्न
धृतराष्ट्र मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं; घर की स्त्रियाँ उन पर जल छिड़कती और पंखा झलती हैं, और होश आने पर वे सञ्जय से आगे कहने को कहते हैं। फिर वे एक-एक करके पाण्डवों के वीरों — युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, घटोत्कच आदि — का नाम लेकर पूछते हैं कि द्रोण के सामने से उन्हें किसने रोका। अन्त में वे कहते हैं कि वे उन नारायण के कर्मों का कीर्तन करेंगे जिनका पाण्डवों को आश्रय है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (7.10.1)
एवं पृष्ट्वा सूतपुत्रं हृच्छोकेनार्दितो भृशम् । जये निराशः पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽपतत्क्षितौ ॥
evaṃ pṛṣṭvā sūtaputraṃ hṛcchokenārdito bhṛśam | jaye nirāśaḥ putrāṇāṃ dhṛtarāṣṭro'patatkṣitau
इस प्रकार सूतपुत्र सञ्जय से पूछकर, हृदय के शोक से अत्यन्त पीड़ित और पुत्रों की विजय से निराश धृतराष्ट्र भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 2 (7.10.2)
तं विसंज्ञं निपतितं सिषिचुः परिचारिकाः । जलेनात्यर्थशीतेन वीजन्त्यः पुण्यगन्धिना ॥
taṃ visaṃjñaṃ nipatitaṃ siṣicuḥ paricārikāḥ | jalenātyarthaśītena vījantyaḥ puṇyagandhinā
उन्हें बेहोश पड़ा देखकर सेविकाओं ने अत्यन्त शीतल और सुगन्धित जल से उन्हें सींचा और पंखा झला।
श्लोक 3 (7.10.3)
पतितं चैनमालोक्य समस्ता भरतस्त्रियः । परिवव्रुर्महाराजमस्पृशंश्चैव पाणिभिः ॥
patitaṃ cainamālokya samastā bharatastriyaḥ | parivavrurmahārājamaspṛśaṃścaiva pāṇibhiḥ
उन्हें गिरा हुआ जानकर भरतवंश की सब स्त्रियाँ महाराज को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गईं और उन्हें हाथों से छूने लगीं।
श्लोक 4 (7.10.4)
उत्थाप्य चैनं शनकै राजानं पृथिवीतलात् । आसनं प्रापयामासुर्बाष्पकण्ठ्यो वराननाः ॥
utthāpya cainaṃ śanakai rājānaṃ pṛthivītalāt | āsanaṃ prāpayāmāsurbāṣpakaṇṭhyo varānanāḥ
धीरे-धीरे राजा को भूमि से उठाकर, आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाली सुन्दरियों ने उन्हें आसन पर बैठा दिया।
श्लोक 5 (7.10.5)
आसनं प्राप्य राजा तु मूर्च्छयाऽभिपरिप्लुतः । निश्चेष्टोऽतिष्ठत तदा वीज्यमानः समन्ततः ॥
āsanaṃ prāpya rājā tu mūrcchayā'bhipariplutaḥ | niśceṣṭo'tiṣṭhata tadā vījyamānaḥ samantataḥ
आसन पर बैठकर राजा मूर्च्छा से अभिभूत होकर निश्चेष्ट रहे, और चारों ओर से उन पर पंखा झला जाता रहा।
श्लोक 6 (7.10.6)
स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां वेपमानो महीपतिः । पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद्यथातथम् ॥
sa labdhvā śanakaiḥ saṃjñāṃ vepamāno mahīpatiḥ | punargāvalgaṇiṃ sūtaṃ paryapṛcchadyathātatham
धीरे-धीरे होश पाकर काँपते हुए पृथ्वीपति ने गवल्गण के पुत्र सूत सञ्जय से फिर पूछा, कि जैसा हुआ था वैसा ही कहो।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 7 (7.10.7)
यः स उद्यन्निवादित्यो ज्योतिषा प्रणुदंस्तमः । अजातशत्रुमायान्तं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥
yaḥ sa udyannivādityo jyotiṣā praṇudaṃstamaḥ | ajātaśatrumāyāntaṃ kastaṃ droṇādavārayat
जो उदय होते सूर्य की तरह अपने तेज से अन्धकार को दूर करते हैं, उन आते हुए अजातशत्रु युधिष्ठिर को द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 8 (7.10.8)
प्रभिन्नमिव मातङ्गं यथा क्रुद्धं तरस्विनम् । प्रसन्नवदनं दृष्ट्वा प्रतिद्विरदगामिनम् ॥
prabhinnamiva mātaṅgaṃ yathā kruddhaṃ tarasvinam | prasannavadanaṃ dṛṣṭvā pratidviradagāminam
मदमत्त हाथी की तरह, क्रोध में बलवान की तरह, प्रसन्न मुख वाले, शत्रुओं पर वैसे ही बढ़ने वाले जैसे हाथी प्रतिद्वन्द्वी हाथियों पर बढ़ता है —
श्लोक 9 (7.10.9)
वासितासङ्गमे यद्वदजय्यं प्रतियूथपैः । निजघान रणे वीरान्वीरः पुरुषसत्तमः ॥
vāsitāsaṅgame yadvadajayyaṃ pratiyūthapaiḥ | nijaghāna raṇe vīrānvīraḥ puruṣasattamaḥ
जैसे मादा हाथी के संग में हाथी प्रतिद्वन्द्वी यूथपतियों से अजेय होता है, वैसे ही वे पुरुषोत्तम वीर रण में योद्धाओं को मारते रहे।
श्लोक 10 (7.10.10)
यो ह्येको हि महावीर्यो निर्दहेद्धोरचक्षुषा । कृत्स्नं दुर्योधनबलं धृतिमान्सत्यसङ्गरः ॥
yo hyeko hi mahāvīryo nirdaheddhoracakṣuṣā | kṛtsnaṃ duryodhanabalaṃ dhṛtimānsatyasaṅgaraḥ
जो महापराक्रमी अकेले ही अपनी भयंकर दृष्टि से दुर्योधन की सारी सेना को भस्म कर सकते थे, धैर्यवान और सत्य प्रतिज्ञा वाले —
श्लोक 11 (7.10.11)
चक्षुर्हणं जये सक्तमिष्वासधरमच्युतम् । दान्तं बहुमतं लोके के शूराः पर्यवारयन् ॥
cakṣurhaṇaṃ jaye saktamiṣvāsadharamacyutam | dāntaṃ bahumataṃ loke ke śūrāḥ paryavārayan
जिनकी दृष्टि ही शत्रुओं को मार गिराती थी, जो विजय में लगे हुए थे, महान धनुष धारण करने वाले, अपराजित, संयमी और लोक में सम्मानित थे — उन्हें किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 12 (7.10.12)
के दुष्प्रधर्षं राजानमिष्वासधरमच्युतम् । समासेदुर्नरव्याघ्रं कौन्तेयं तत्र मामकाः ॥
ke duṣpradharṣaṃ rājānamiṣvāsadharamacyutam | samāsedurnaravyāghraṃ kaunteyaṃ tatra māmakāḥ
दुर्जय, महान धनुषधारी, अपराजित, नरव्याघ्र राजा कुन्तीपुत्र के सामने मेरे पक्ष के कौन-से लोग गए?
श्लोक 13 (7.10.13)
तरसैवाभिपद्याथ यो वै द्रोणमुपाद्रवत् । यः करोति महत्कर्म शत्रूणां वै महाबलः ॥
tarasaivābhipadyātha yo vai droṇamupādravat | yaḥ karoti mahatkarma śatrūṇāṃ vai mahābalaḥ
जो अचानक बड़े वेग से द्रोण पर टूट पड़े, जो शत्रुओं के बीच बड़े-बड़े कर्म करते हैं, वे महाबली —
श्लोक 14 (7.10.14)
महाकायो महोत्साहो नागायुतसमो बले । तं भीमसेनमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥
mahākāyo mahotsāho nāgāyutasamo bale | taṃ bhīmasenamāyāntaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
विशाल शरीर वाले, महान उत्साह वाले, बल में दस हज़ार हाथियों के बराबर — उन आते हुए भीमसेन को किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 15 (7.10.15)
यदायाज्जलदप्रख्यो रथः परमवीर्यवान् । पर्जन्य इव बीभत्सुस्तुमुलामशनीं सृजन् ॥
yadāyājjaladaprakhyo rathaḥ paramavīryavān | parjanya iva bībhatsustumulāmaśanīṃ sṛjan
जब बीभत्सु अर्जुन आए — मेघ के समान रथ पर, परम पराक्रमी, पर्जन्य की भाँति भयंकर वज्र छोड़ते हुए —
श्लोक 16 (7.10.16)
विसृजञ्छरजालानि वर्षाणि मघवानिव । अवस्फूर्जन्दिशः सर्वास्तलनेमिस्वनेन च ॥
visṛjañcharajālāni varṣāṇi maghavāniva | avasphūrjandiśaḥ sarvāstalanemisvanena ca
इन्द्र की वर्षा की तरह बाणों के जाल छोड़ते हुए, हथेली की थाप और पहियों की धुरी की गड़गड़ाहट से सब दिशाओं को गुँजाते हुए —
श्लोक 17 (7.10.17)
चापविद्युत्प्रभो घोरो रथगुल्मवलाहकः । सनेमिघोषस्तनितः शरशब्दातिबन्धुरः ॥
cāpavidyutprabho ghoro rathagulmavalāhakaḥ | sanemighoṣastanitaḥ śaraśabdātibandhuraḥ
धनुष को बिजली बनाए हुए, भयंकर, रथों के समूह को बादल बनाए हुए, पहियों की घरघराहट की गर्जना वाले और बाणों की सनसनाहट से अत्यन्त सुन्दर —
श्लोक 18 (7.10.18)
रोषनिर्जितजीमूतो मनोभिप्रायशीघ्रगः । मर्मातिगो बाणधरस्तुमुलः शोणितोदकैः ॥
roṣanirjitajīmūto manobhiprāyaśīghragaḥ | marmātigo bāṇadharastumulaḥ śoṇitodakaiḥ
जिनके क्रोध ने मेघों को भी मात दे दी, जो मन के संकल्प की तरह तेज़ चलते थे, मर्मस्थानों को बेधने वाले, बाण धारण करने वाले, तुमुल नाद वाले और जिनका जल रक्त था —
श्लोक 19 (7.10.19)
सम्प्लावयन्दिशः सर्वा मानवैरास्तरन्महीम् । भीमनिःस्वनितो रौद्रो दुर्योधनपुरोगमान् ॥
samplāvayandiśaḥ sarvā mānavairāstaranmahīm | bhīmaniḥsvanito raudro duryodhanapurogamān
सब दिशाओं को बहाते हुए और पृथ्वी को मनुष्यों से पाटते हुए, भयंकर गर्जना करने वाले, रौद्र रूप में, दुर्योधन को आगे रखने वालों पर —
श्लोक 20 (7.10.20)
युद्धेऽभ्यषिञ्चद्विजयो गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । गाण्डीवं धारयन्धीमान्कीदृशं वो मनस्तदा ॥
yuddhe'bhyaṣiñcadvijayo gārdhrapatraiḥ śilāśitaiḥ | gāṇḍīvaṃ dhārayandhīmānkīdṛśaṃ vo manastadā
जब बुद्धिमान गाण्डीवधारी विजय ने उन्हें युद्ध में पत्थर पर तेज़ किए हुए, गृध्र-पंख वाले बाणों से नहला दिया, तब आप लोगों का मन कैसा हुआ?
श्लोक 21 (7.10.21)
इषुसम्बाधमाकाशं कुर्वन्कपिवरध्वजः । यदायात्कथमासीत्तु तदा पार्थं समीक्षताम् ॥
iṣusambādhamākāśaṃ kurvankapivaradhvajaḥ | yadāyātkathamāsīttu tadā pārthaṃ samīkṣatām
कपिध्वज अर्जुन आकाश को बाणों की घनी भीड़ से भरते हुए जब आए, तब पार्थ को देखते हुए आपकी कैसी दशा थी?
श्लोक 22 (7.10.22)
कच्चिद्गाण्डीवशब्देन न प्रणश्यति वै बलम् । यद्वः सभैरवं कुर्वन्नर्जुनो भृशमन्वयात् ॥
kaccidgāṇḍīvaśabdena na praṇaśyati vai balam | yadvaḥ sabhairavaṃ kurvannarjuno bhṛśamanvayāt
जब अर्जुन भयंकर नाद करते हुए आप लोगों के पीछे तेज़ी से चढ़ आए, तब क्या गाण्डीव की ध्वनि से आपका बल नष्ट तो नहीं हो गया?
श्लोक 23 (7.10.23)
कच्चिन्नापानुदत्प्राणानिषुभिर्वो धनञ्जयः । वातो वेगादिवाविध्यन्मेघाञ्शरगणैर्नृपान् ॥
kaccinnāpānudatprāṇāniṣubhirvo dhanañjayaḥ | vāto vegādivāvidhyanmeghāñśaragaṇairnṛpān
क्या धनञ्जय ने अपने बाणों से आपके प्राण तो नहीं निकाल दिए — वे जो वायु के वेग से मेघों को बिखेरने की तरह बाणों के समूहों से राजाओं को बेधते चले गए?
श्लोक 24 (7.10.24)
को हि गाण्डीवधन्वानं रणे सोढुं नरोऽर्हति । यमुपश्रुत्य सेनाग्रे जनः सर्वो विदीर्यते ॥
ko hi gāṇḍīvadhanvānaṃ raṇe soḍhuṃ naro'rhati | yamupaśrutya senāgre janaḥ sarvo vidīryate
गाण्डीवधारी का सामना रण में कौन-सा मनुष्य कर सकता है, जिनका नाम सुनते ही सेना के आगे के सब लोग विदीर्ण हो जाते हैं?
श्लोक 25 (7.10.25)
यत्सेनाः समकम्पन्त यद्वीरानस्पृशद्भयम् । के तत्र नाजहुर्द्रोणं के क्षुद्राः प्राद्रवन्भयात् ॥
yatsenāḥ samakampanta yadvīrānaspṛśadbhayam | ke tatra nājahurdroṇaṃ ke kṣudrāḥ prādravanbhayāt
जब सेनाएँ काँप उठीं और वीरों को भय ने छू लिया, तब वहाँ कौन द्रोण को छोड़कर नहीं गया, और कौन तुच्छ लोग डर के मारे भाग निकले?
श्लोक 26 (7.10.26)
के वा तत्र तनूस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् । अमानुषाणां जेतारं युद्धेष्वपि धनञ्जयम् ॥
ke vā tatra tanūstyaktvā pratīpaṃ mṛtyumāvrajan | amānuṣāṇāṃ jetāraṃ yuddheṣvapi dhanañjayam
और वहाँ किन्होंने अपना शरीर त्यागकर मृत्यु का सामना किया — उन धनञ्जय के सामने, जो युद्धों में अमानवीय प्राणियों को भी जीत लेते हैं?
श्लोक 27 (7.10.27)
न च वेगं सिताश्वस्य विसहिष्यन्ति मामकाः । गाण्डीवस्य च निर्घोषं प्रावृड्जलदनिःस्वनम् ॥
na ca vegaṃ sitāśvasya visahiṣyanti māmakāḥ | gāṇḍīvasya ca nirghoṣaṃ prāvṛḍjaladaniḥsvanam
मेरे लोग श्वेत अश्वों वाले अर्जुन का वेग और वर्षा ऋतु के मेघ की गर्जना जैसा गाण्डीव का घोष नहीं सह सकेंगे।
श्लोक 28 (7.10.28)
विष्वक्सेनो यस्य यन्ता यस्य योद्धा धनञ्जयः । अशक्यः स रथो जेतुं मन्ये देवासुरैरपि ॥
viṣvakseno yasya yantā yasya yoddhā dhanañjayaḥ | aśakyaḥ sa ratho jetuṃ manye devāsurairapi
जिस रथ के सारथी विष्वक्सेन कृष्ण हैं और योद्धा धनञ्जय, उसे मैं देवता और असुर भी नहीं जीत सकते — ऐसा मानता हूँ।
श्लोक 29 (7.10.29)
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीयश्च पाण्डवः । मेधावी निपुणो धीमान्युधि सत्यपराक्रमः ॥
sukumāro yuvā śūro darśanīyaśca pāṇḍavaḥ | medhāvī nipuṇo dhīmānyudhi satyaparākramaḥ
जो पाण्डव सुकुमार, युवा, शूर और देखने योग्य है, मेधावी, निपुण और बुद्धिमान है, युद्ध में सत्य पराक्रम वाला —
श्लोक 30 (7.10.30)
आरावं विपुलं कुर्वन्व्यथयन्सर्वसैनिकान् । यदायान्नकुलो द्रोणं के शूराः पर्यवारयन् ॥
ārāvaṃ vipulaṃ kurvanvyathayansarvasainikān | yadāyānnakulo droṇaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
बड़ा कोलाहल करता हुआ और सब सैनिकों को व्यथित करता हुआ — जब नकुल द्रोण की ओर आया, तब किन शूरों ने उसे घेरा?
श्लोक 31 (7.10.31)
आशीविष इव क्रुद्धः सहदेवो यदाऽभ्ययात् । कदनं करिष्यञ्शत्रूणां तेजसा दुर्जयो युधि ॥
āśīviṣa iva kruddhaḥ sahadevo yadā'bhyayāt | kadanaṃ kariṣyañśatrūṇāṃ tejasā durjayo yudhi
जब सहदेव क्रुद्ध विषधर सर्प की तरह शत्रुओं का संहार करने के इरादे से आया, जो अपने तेज से युद्ध में दुर्जय था —
श्लोक 32 (7.10.32)
आर्यव्रतममोघेषुं हीमन्तमपराजितम् । सहदेवं तमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥
āryavratamamogheṣuṃ hīmantamaparājitam | sahadevaṃ tamāyāntaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
उस आर्य-व्रत के पालक, अमोघ बाणों वाले, लज्जाशील और अपराजित सहदेव को आते हुए किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 33 (7.10.33)
यस्तु सौवीरराजस्य प्रमथ्य महतीं चमूम् । आदत्त महिषीं भोजां काम्यां सर्वाङ्गशोभनाम् ॥
yastu sauvīrarājasya pramathya mahatīṃ camūm | ādatta mahiṣīṃ bhojāṃ kāmyāṃ sarvāṅgaśobhanām
जिसने सौवीरराज की विशाल सेना को कुचलकर सर्वांगसुन्दरी, प्रिय भोज-राजकन्या महिषी को हर लिया —
श्लोक 34 (7.10.34)
सत्यं धृतिश्च शौर्यं च ब्रह्मचर्यं च केवलम् । सर्वाणि युयुधानेऽस्मिन्नित्यानि पुरुषर्षभे ॥
satyaṃ dhṛtiśca śauryaṃ ca brahmacaryaṃ ca kevalam | sarvāṇi yuyudhāne'sminnityāni puruṣarṣabhe
सत्य, धैर्य, शौर्य और अखण्ड ब्रह्मचर्य — ये सब इस पुरुषश्रेष्ठ युयुधान में सदा रहते हैं —
श्लोक 35 (7.10.35)
बलिनं सत्यकर्माणमदीनमपराजितम् । वासुदेवसमं युद्धे वासुदेवादनन्तरम् ॥
balinaṃ satyakarmāṇamadīnamaparājitam | vāsudevasamaṃ yuddhe vāsudevādanantaram
बलवान, सत्यकर्मा, दीनता से रहित, अपराजित, युद्ध में वासुदेव के समान और वासुदेव के बाद दूसरे —
श्लोक 36 (7.10.36)
धनञ्जयोपदेशेन श्रेष्ठमिष्वस्त्रकर्मणि । पार्थेन सममस्त्रेषु कस्तं द्रोणादवारयत् ॥
dhanañjayopadeśena śreṣṭhamiṣvastrakarmaṇi | pārthena samamastreṣu kastaṃ droṇādavārayat
धनञ्जय के उपदेश से धनुष और अस्त्र के कर्म में श्रेष्ठ, अस्त्रों में पार्थ के समान — उसे द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 37 (7.10.37)
वृष्णीनां प्रवरं वीरं शूरं सर्वधनुष्मताम् । रामेण सममस्त्रेषु यशसा विक्रमेण च ॥
vṛṣṇīnāṃ pravaraṃ vīraṃ śūraṃ sarvadhanuṣmatām | rāmeṇa samamastreṣu yaśasā vikrameṇa ca
वृष्णियों में सर्वश्रेष्ठ वीर, सब धनुर्धारियों में शूर, अस्त्रों में, यश में और पराक्रम में राम के समान —
श्लोक 38 (7.10.38)
सत्यं धृतिर्मतिः शौर्यं ब्राह्मं चास्त्रमनुत्तमम् । सात्वते तानि सर्वाणि त्रैलोक्यमिव केशवे ॥
satyaṃ dhṛtirmatiḥ śauryaṃ brāhmaṃ cāstramanuttamam | sātvate tāni sarvāṇi trailokyamiva keśave
सत्य, धैर्य, बुद्धि, शौर्य और सर्वोत्तम ब्रह्मास्त्र — ये सब उस सात्वत में हैं, जैसे तीनों लोक केशव में हैं।
श्लोक 39 (7.10.39)
तमेवङ्गुणसम्पन्नं दुर्वारमपि दैवतैः । समासाद्य महेष्वासं के शूराः पर्यवारयन् ॥
tamevaṅguṇasampannaṃ durvāramapi daivataiḥ | samāsādya maheṣvāsaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
ऐसे गुणों से सम्पन्न, देवताओं के लिए भी जिसे रोकना कठिन है, उस महाधनुर्धर को सामने पाकर किन शूरों ने उसे घेरा?
श्लोक 40 (7.10.40)
पाञ्चालेषूत्तमं वीरमुत्तमाभिजनप्रियम् । नित्यमुत्तमकर्माणमुत्तमौजसमाहवे ॥
pāñcāleṣūttamaṃ vīramuttamābhijanapriyam | nityamuttamakarmāṇamuttamaujasamāhave
पाञ्चालों में सर्वश्रेष्ठ वीर, उत्तम कुलों के प्रिय, सदा उत्तम कर्म करने वाले, युद्ध में उत्तम ओज वाले —
श्लोक 41 (7.10.41)
युक्तं धनञ्जयहिते ममानर्थार्थमुत्थितम् । यमवैश्रवणादित्यमहेन्द्रवरुणोपमम् ॥
yuktaṃ dhanañjayahite mamānarthārthamutthitam | yamavaiśravaṇādityamahendravaruṇopamam
धनञ्जय के हित में लगे हुए, मेरे अनर्थ के लिए उठ खड़े हुए, यम, वैश्रवण, आदित्य, महेन्द्र और वरुण के समान —
श्लोक 42 (7.10.42)
महारथं समाख्यातं द्रोणायोद्यतमाहवे । त्यजन्तं तुमुले प्राणान्के शूराः समवारयन् ॥
mahārathaṃ samākhyātaṃ droṇāyodyatamāhave | tyajantaṃ tumule prāṇānke śūrāḥ samavārayan
जो महारथी के रूप में विख्यात है, द्रोण के विरुद्ध युद्ध में उठा है और घमासान में प्राण त्यागने को तैयार है — उसे किन शूरों ने रोका?
श्लोक 43 (7.10.43)
एकोऽपसृत्य चेदिभ्यः पाण्डवान्यः समाश्रितः । धृष्टकेतुं समायान्तं द्रोणं कस्तं न्यवारयत् ॥
eko'pasṛtya cedibhyaḥ pāṇḍavānyaḥ samāśritaḥ | dhṛṣṭaketuṃ samāyāntaṃ droṇaṃ kastaṃ nyavārayat
जो अकेला चेदियों से अलग होकर पाण्डवों की शरण में आया — उस द्रोण की ओर आते हुए धृष्टकेतु को किसने रोका?
श्लोक 44 (7.10.44)
योऽवधीत्केतुमान्वीरो राजपुत्रं दुरासदम् । अपरान्तगिरिद्वारे द्रोणात्कस्तं न्यवारयत् ॥
yo'vadhītketumānvīro rājaputraṃ durāsadam | aparāntagiridvāre droṇātkastaṃ nyavārayat
जिस वीर केतुमान् ने अपरान्त के पर्वत-द्वार पर एक दुर्जय राजपुत्र को मारा था — उसे द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 45 (7.10.45)
स्त्रीपुंसयोर्नरव्याघ्रो यः स वेद गुणागुणान् । शिखण्डिनं याज्ञसेनिमम्लानमनसं युधि ॥
strīpuṃsayornaravyāghro yaḥ sa veda guṇāguṇān | śikhaṇḍinaṃ yājñasenimamlānamanasaṃ yudhi
जो नरव्याघ्र स्त्री और पुरुष दोनों के गुण-दोष जानता है — याज्ञसेनि शिखण्डी, जिसका मन युद्ध में कभी म्लान नहीं होता —
श्लोक 46 (7.10.46)
देवव्रतस्य समरे हेतुं मृत्योर्महात्मनः । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥
devavratasya samare hetuṃ mṛtyormahātmanaḥ | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
जो युद्ध में महात्मा देवव्रत की मृत्यु का कारण बना, उसे द्रोण की ओर बढ़ते हुए किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 47 (7.10.47)
यस्मिन्नभ्यधिका वीरे गुणाः सर्वे धनञ्जयात् । यस्मिन्नस्त्राणि सत्यं च ब्रह्मचर्यं च सर्वदा ॥
yasminnabhyadhikā vīre guṇāḥ sarve dhanañjayāt | yasminnastrāṇi satyaṃ ca brahmacaryaṃ ca sarvadā
जिस वीर में सब गुण धनञ्जय से भी बढ़कर हैं, जिसमें अस्त्र, सत्य और ब्रह्मचर्य सदा रहते हैं —
श्लोक 48 (7.10.48)
वासुदेवसमं वीर्ये धनञ्जयसमं बले । तेजसाऽऽदित्यसदृशं बृहस्पतिसमं मतौ ॥
vāsudevasamaṃ vīrye dhanañjayasamaṃ bale | tejasā''dityasadṛśaṃ bṛhaspatisamaṃ matau
पराक्रम में वासुदेव के समान, बल में धनञ्जय के समान, तेज में सूर्य के समान और बुद्धि में बृहस्पति के समान —
श्लोक 49 (7.10.49)
अभिमन्युं महात्मानं व्यात्ताननमिवान्तकम् । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः समवारयन् ॥
abhimanyuṃ mahātmānaṃ vyāttānanamivāntakam | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ ke śūrāḥ samavārayan
उन महात्मा अभिमन्यु को, जो मुँह फैलाए यमराज की तरह द्रोण की ओर बढ़ रहे थे, किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 50 (7.10.50)
तरुणस्तरुणप्रज्ञः सौभद्रः परवीरहा । यदाभ्यधावद्वै द्रोणं तदाऽऽसीद्वो मनः कथं ॥
taruṇastaruṇaprajñaḥ saubhadraḥ paravīrahā | yadābhyadhāvadvai droṇaṃ tadā''sīdvo manaḥ kathaṃ
तरुण, तरुण बुद्धि वाले, शत्रुवीरों के संहारक सुभद्रापुत्र जब द्रोण पर दौड़े, तब आप लोगों का मन कैसा था?
श्लोक 51 (7.10.51)
द्रौपदेया नरव्याघ्राः समुद्रमिव सिन्धवः । यद्रोणमाद्रवन्सङ्ख्ये के शूरास्तान्न्यवारयन् ॥
draupadeyā naravyāghrāḥ samudramiva sindhavaḥ | yadroṇamādravansaṅkhye ke śūrāstānnyavārayan
द्रौपदी के पुत्र, नरव्याघ्र, जैसे नदियाँ समुद्र की ओर दौड़ती हैं — जब वे युद्ध में द्रोण पर दौड़े, तब किन शूरों ने उन्हें रोका?
श्लोक 52 (7.10.52)
एते द्वादश वर्षाणि क्रीडामुत्सृज्य बालकाः । अस्त्रार्थमवसन्भीष्मे बिभ्रतो व्रतमुत्तमम् ॥
ete dvādaśa varṣāṇi krīḍāmutsṛjya bālakāḥ | astrārthamavasanbhīṣme bibhrato vratamuttamam
इन बालकों ने बारह वर्ष तक खेल छोड़कर, उत्तम व्रत धारण करते हुए, अस्त्र-विद्या के लिए भीष्म के पास निवास किया।
श्लोक 53 (7.10.53)
क्षत्रञ्जयः क्षत्रदेवः क्षत्रवर्मा च मानदः । धृष्टद्युम्नात्मजा वीराः के तान्द्रोणादवारयन् ॥
kṣatrañjayaḥ kṣatradevaḥ kṣatravarmā ca mānadaḥ | dhṛṣṭadyumnātmajā vīrāḥ ke tāndroṇādavārayan
क्षत्रंजय, क्षत्रदेव और मान देने वाले क्षत्रवर्मा — धृष्टद्युम्न के उन वीर पुत्रों को द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 54 (7.10.54)
शताद्विशिष्टं यं युद्धे सममन्यन्त वृष्णयः । चेकितानं महेष्वासं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥
śatādviśiṣṭaṃ yaṃ yuddhe samamanyanta vṛṣṇayaḥ | cekitānaṃ maheṣvāsaṃ kastaṃ droṇādavārayat
महाधनुर्धर चेकितान, जिसे वृष्णि लोग युद्ध में सौ से भी बढ़कर मानते थे — उसे द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 55 (7.10.55)
वार्धक्षेमिः कलिङ्गानां यः कन्यामाहरद्युधि । अनाधृष्टिरदीनात्मा कस्तं द्रोणादवारयत् ॥
vārdhakṣemiḥ kaliṅgānāṃ yaḥ kanyāmāharadyudhi | anādhṛṣṭiradīnātmā kastaṃ droṇādavārayat
कलिंगों की कन्या को युद्ध में हर ले जाने वाला वार्धक्षेमि — दीनता से रहित अनाधृष्टि — उसे द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 56 (7.10.56)
भ्रातरः पञ्च कैकेया धार्मिकाः सत्यविक्रमाः । इन्द्रगोपकसङ्काशा रक्तवर्मायुधध्वजाः ॥
bhrātaraḥ pañca kaikeyā dhārmikāḥ satyavikramāḥ | indragopakasaṅkāśā raktavarmāyudhadhvajāḥ
पाँच कैकेय भाई, धर्मात्मा और सत्य पराक्रमी, इन्द्रगोप कीड़ों के समान लाल, लाल कवच, शस्त्र और ध्वजा वाले —
श्लोक 57 (7.10.57)
मातृष्वसुः सुता वीराः पाण्डवानां जयार्थिनः । तान्द्रोणं हन्तुमायातान्के वीराः पर्यवारयन् ॥
mātṛṣvasuḥ sutā vīrāḥ pāṇḍavānāṃ jayārthinaḥ | tāndroṇaṃ hantumāyātānke vīrāḥ paryavārayan
पाण्डवों की मौसी के वे वीर पुत्र, जो उनकी विजय चाहते हैं — द्रोण को मारने आते हुए उन्हें किन वीरों ने घेरा?
श्लोक 58 (7.10.58)
यं योधयन्तो राजानो नाजयन्वारणावते । षण्मासानपि संरब्धा जिघांसन्तो युधां पतिं ॥
yaṃ yodhayanto rājāno nājayanvāraṇāvate | ṣaṇmāsānapi saṃrabdhā jighāṃsanto yudhāṃ patiṃ
वारणावत में जिससे लड़ते हुए राजा छह महीने तक क्रोध में भरकर भी उस योद्धाओं के स्वामी को मारने की इच्छा के बावजूद उसे जीत न सके —
श्लोक 59 (7.10.59)
धनुष्मतां वरं शूरं सत्यसन्धं महाबलम् । द्रोणात्कस्तं नरव्याघ्रं युयुत्सुं पर्यवारयत् ॥
dhanuṣmatāṃ varaṃ śūraṃ satyasandhaṃ mahābalam | droṇātkastaṃ naravyāghraṃ yuyutsuṃ paryavārayat
उस धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, शूर, सत्यप्रतिज्ञ और महाबली, युद्ध के इच्छुक नरव्याघ्र को द्रोण के लिए किसने घेरा?
श्लोक 60 (7.10.60)
यः पुत्रं काशिराजस्य वाराणस्यां महारथम् । समरे स्त्रीषु गृध्यन्तं भल्लेनापाहरद्रथात् ॥
yaḥ putraṃ kāśirājasya vārāṇasyāṃ mahāratham | samare strīṣu gṛdhyantaṃ bhallenāpāharadrathāt
जिसने वाराणसी में काशिराज के पुत्र को, जो महारथी था और युद्ध में स्त्रियों के लोभ में पड़ा था, भल्ल बाण से रथ से गिरा दिया —
श्लोक 61 (7.10.61)
धृष्टद्युम्नं महेष्वासं पार्थानां मन्त्रधारिणम् । युक्तं दुर्योधनानर्थे सृष्टं द्रोणवधाय च ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ maheṣvāsaṃ pārthānāṃ mantradhāriṇam | yuktaṃ duryodhanānarthe sṛṣṭaṃ droṇavadhāya ca
महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न, पार्थों की मन्त्रणा को धारण करने वाला, दुर्योधन के अनर्थ में लगा हुआ और द्रोण के वध के लिए उत्पन्न —
श्लोक 62 (7.10.62)
निर्दहन्तं रणे योधान्दारयन्तं च सर्वतः । द्रोणाभिमुखमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥
nirdahantaṃ raṇe yodhāndārayantaṃ ca sarvataḥ | droṇābhimukhamāyāntaṃ ke śūrāḥ paryavārayan
रण में योद्धाओं को जलाते और सब ओर से चीरते हुए द्रोण की ओर आते उस वीर को किन शूरों ने घेरा?
श्लोक 63 (7.10.63)
उत्सङ्ग इव सम्वृद्धं द्रुपदस्यास्त्रवित्तमम् । शैखण्डिनं शस्त्रगुप्तं के द्रोणादवारयन् ॥
utsaṅga iva samvṛddhaṃ drupadasyāstravittamam | śaikhaṇḍinaṃ śastraguptaṃ ke droṇādavārayan
शिखण्डी का पुत्र, जो द्रुपद की गोद में पला-सा बढ़ा, अस्त्रों का सबसे बड़ा जानकार और शस्त्रों से सुरक्षित — उसे द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 64 (7.10.64)
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां चर्मवत्समवेष्टयत् । महता रथघोषेण मुख्यारिघ्नो महारथः ॥
ya imāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ carmavatsamaveṣṭayat | mahatā rathaghoṣeṇa mukhyārighno mahārathaḥ
जिसने रथों की बड़ी घरघराहट से इस सारी पृथ्वी को चमड़े की तरह लपेट लिया, शत्रुओं का प्रधान संहारक महारथी —
श्लोक 65 (7.10.65)
दशाश्वमेधानाजहे स्वन्नपानाप्तदक्षिणान् । निरर्गलान्सर्वमेधान्पुत्रवत्पालयन्प्रजाः ॥
daśāśvamedhānājahe svannapānāptadakṣiṇān | nirargalānsarvamedhānputravatpālayanprajāḥ
जिसने भरपूर अन्न-पान और पूरी दक्षिणा वाले दस अश्वमेध यज्ञ और बिना रोक-टोक के सर्वमेध यज्ञ किए, प्रजा का पुत्रों की तरह पालन करते हुए —
श्लोक 66 (7.10.66)
विसृष्टा दक्षिणा यस्य गङ्गाजलमवारयत् । गङ्गास्रोतसि यावत्यः सिकता अप्यशेषतः । तावतीर्गा ददौ वीर उशीनरसुतोऽध्वरे ॥
visṛṣṭā dakṣiṇā yasya gaṅgājalamavārayat | gaṅgāsrotasi yāvatyaḥ sikatā apyaśeṣataḥ | tāvatīrgā dadau vīra uśīnarasuto'dhvare
जिसकी दी हुई दक्षिणा ने गङ्गा के जल को रोक दिया: गङ्गा की धारा में जितने बालू के कण हैं, बिना एक भी छोड़े, उतनी गायें उशीनर के पुत्र उस वीर ने यज्ञ में दीं।
श्लोक 67 (7.10.67)
न पूर्वे नापरे चक्रुरिदं केचन मानवाः । इतीदं चुक्रुशुर्देवाः कृते कर्मणि दुष्करे ॥
na pūrve nāpare cakruridaṃ kecana mānavāḥ | itīdaṃ cukruśurdevāḥ kṛte karmaṇi duṣkare
इससे पहले या बाद में किसी मनुष्य ने ऐसा नहीं किया — उस कठिन कर्म के पूरा होने पर देवताओं ने इसी प्रकार पुकारकर कहा।
श्लोक 68 (7.10.68)
पश्यामस्त्रिषु लोकेषु न तं संस्थास्नुचारिषु । जातं चापि जनिष्यन्तं द्वितीयं चापि साम्प्रतम् ॥
paśyāmastriṣu lokeṣu na taṃ saṃsthāsnucāriṣu | jātaṃ cāpi janiṣyantaṃ dvitīyaṃ cāpi sāmpratam
तीनों लोकों में स्थिर और चलने वाले प्राणियों में हमें उसके समान कोई नहीं दीखता — न कोई हुआ, न होगा, और न इस समय कोई दूसरा है।
श्लोक 69 (7.10.69)
अन्यमौशीनराच्छेब्याद्धुरो वोढारमित्युत । गतिं यस्य न यास्यन्ति मानुषा लोकवासिनः ॥
anyamauśīnarācchebyāddhuro voḍhāramityuta | gatiṃ yasya na yāsyanti mānuṣā lokavāsinaḥ
हम कहते हैं कि उशीनर के पुत्र शैब्य को छोड़कर कोई दूसरा ऐसा भार उठाने वाला नहीं है; इस लोक में रहने वाले मनुष्य उस गति को कभी नहीं पा सकेंगे जिसे उसने पाया।
श्लोक 70 (7.10.70)
तस्य नप्तारमायान्तं शैब्यं कः समवारयत् । द्रोणायाभिमुखं यत्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥
tasya naptāramāyāntaṃ śaibyaṃ kaḥ samavārayat | droṇāyābhimukhaṃ yattaṃ vyāttānanamivāntakam
उसके पौत्र शैब्य को, जो मुँह फैलाए यमराज की तरह द्रोण की ओर बढ़ा आ रहा था, किसने रोका?
श्लोक 71 (7.10.71)
विराटस्य रथानीकं मत्स्यस्यामित्रघातिनः । प्रेप्सन्तं समरे द्रोणं के वीराः पर्यवारयन् ॥
virāṭasya rathānīkaṃ matsyasyāmitraghātinaḥ | prepsantaṃ samare droṇaṃ ke vīrāḥ paryavārayan
शत्रुओं का संहार करने वाले मत्स्यराज विराट को, जो अपनी रथसेना के साथ रण में द्रोण तक पहुँचना चाहता था, किन वीरों ने घेरा?
श्लोक 72 (7.10.72)
सद्यो वृकोदराज्जातो महाबलपराक्रमः । मायावी राक्षसो वीरो यस्मान्मम महद्भयम् ॥
sadyo vṛkodarājjāto mahābalaparākramaḥ | māyāvī rākṣaso vīro yasmānmama mahadbhayam
वृकोदर से तत्काल उत्पन्न, महान बल और पराक्रम वाला, मायावी राक्षस वीर, जिससे मुझे बड़ा भय है —
श्लोक 73 (7.10.73)
पार्थानां जयकामं तं तं पुत्राणां मम कण्टकम् । घटोत्कचं महात्मानं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥
pārthānāṃ jayakāmaṃ taṃ taṃ putrāṇāṃ mama kaṇṭakam | ghaṭotkacaṃ mahātmānaṃ kastaṃ droṇādavārayat
पार्थों की विजय चाहने वाले, मेरे पुत्रों के लिए काँटे के समान, महात्मा घटोत्कच को द्रोण से किसने रोका?
श्लोक 74 (7.10.74)
एते चान्ये च बहवो येषामजितं युधि । त्यक्तारः संयुगे प्राणान्किं तेषामजितं युधि ॥
ete cānye ca bahavo yeṣāmajitaṃ yudhi | tyaktāraḥ saṃyuge prāṇānkiṃ teṣāmajitaṃ yudhi
ये और दूसरे बहुत-से वीर, जिनके लिए युद्ध में कुछ भी अजेय नहीं है और जो रण में प्राण त्यागने को तत्पर हैं — उनके लिए क्या अजेय है?
श्लोक 75 (7.10.75)
येषां च पुरुषव्याघ्रः शार्ङ्गधन्वा व्यपाश्रयः । लोकानां गुरुरत्यर्थं लोकनाथः सनातनः ॥
yeṣāṃ ca puruṣavyāghraḥ śārṅgadhanvā vyapāśrayaḥ | lokānāṃ gururatyarthaṃ lokanāthaḥ sanātanaḥ
जिनका आश्रय पुरुषव्याघ्र शार्ङ्गधन्वा हैं, जो लोकों के परम गुरु, लोकनाथ और सनातन हैं —
श्लोक 76 (7.10.76)
नारायणोरणे नाथो दिव्यो दिव्यात्मकः प्रभुः । यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
nārāyaṇoraṇe nātho divyo divyātmakaḥ prabhuḥ | yasya divyāni karmāṇi pravadanti manīṣiṇaḥ
रण में स्वामी नारायण, दिव्य, दिव्य स्वभाव वाले प्रभु, जिनके दिव्य कर्मों का ज्ञानी लोग वर्णन करते हैं —
श्लोक 77 (7.10.77)
तान्यहं कीर्तयिष्यामि भक्त्या स्थैर्यार्थमात्मनः ॥
tānyahaṃ kīrtayiṣyāmi bhaktyā sthairyārthamātmanaḥ
उन कर्मों का मैं भक्तिपूर्वक कीर्तन करूँगा, अपने मन की स्थिरता के लिए।