द्रोण पर्व · अध्याय 9
द्रोण के लिए धृतराष्ट्र का शोक और उनके वध के विषय में प्रश्न
सञ्जय से यह सुनकर कि धृष्टद्युम्न ने द्रोण को मार डाला है, धृतराष्ट्र इस पर विश्वास नहीं कर पाते। वे द्रोण की अस्त्र-विद्या, उनके घोड़ों और रथ की प्रशंसा करते हैं और दैव तथा पाण्डवों के प्रति अपने अन्यायों को दोष देते हैं। फिर वे प्रश्नों की लम्बी झड़ी लगा देते हैं — द्रोण उस समय क्या कर रहे थे, उनके आगे-पीछे कौन लड़ रहा था, और कहीं उनके अपने योद्धाओं ने उन्हें छोड़ तो नहीं दिया — और अन्त में उनका मन घूमने लगता है और वे सञ्जय से कथा रोकने को कहते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.9.1)
किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृञ्जयाः । तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ॥
kiṃ kurvāṇaṃ raṇe droṇaṃ jaghnuḥ pāṇḍavasṛñjayāḥ | tathā nipuṇamastreṣu sarvaśastrabhṛtāmapi
जब पाण्डवों और सृञ्जयों ने द्रोण को मारा, तब रण में वे क्या कर रहे थे — वे द्रोण जो अस्त्रों में इतने निपुण थे और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे?
श्लोक 2 (7.9.2)
रथः पर्यपतद्वाऽस्य धनुर्वाऽशीर्यतास्यतः । प्रमत्तो वाऽभवद्द्रोणो यथा मृत्युमुपेयिवान् ॥
rathaḥ paryapatadvā'sya dhanurvā'śīryatāsyataḥ | pramatto vā'bhavaddroṇo yathā mṛtyumupeyivān
क्या उनका रथ टूट गया, या बाण चलाते समय उनका धनुष चटक गया, या द्रोण असावधान हो गए, जिससे उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ा?
श्लोक 3 (7.9.3)
कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् । किरन्तमिषुसङ्घातान्रुक्मपुङ्खाननेकशः ॥
kathaṃ nu pārṣatastāta śatrubhirduṣpradharṣaṇam | kirantamiṣusaṅghātānrukmapuṅkhānanekaśaḥ
हे तात सञ्जय, पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न उन पर कैसे विजय पा सके, जिन्हें शत्रु दबा नहीं सकते थे, और जो सोने के पंखों वाले बाणों की बौछारें बार-बार बरसाते थे —
श्लोक 4 (7.9.4)
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रयोधिनम् । दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम् ॥
kṣiprahastaṃ dvijaśreṣṭhaṃ kṛtinaṃ citrayodhinam | dūreṣupātinaṃ dāntamastrayuddheṣu pāragam
जो फुर्तीले हाथों वाले थे, ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, कुशल और विचित्र ढंग से लड़ने वाले, दूर तक बाण चलाने वाले, संयमी और अस्त्र-युद्ध में पारंगत थे?
श्लोक 5 (7.9.5)
पाञ्चालपुत्रो न्यवधीद्दिव्यास्त्रधरमच्युतम् । कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ॥
pāñcālaputro nyavadhīddivyāstradharamacyutam | kurvāṇaṃ dāruṇaṃ karma raṇe yattaṃ mahāratham
पाञ्चाल के पुत्र ने उन अटल, दिव्य अस्त्रों के धारक को मार डाला — उस महारथी को, जो रण में सावधान रहकर भयंकर कर्म कर रहा था।
श्लोक 6 (7.9.6)
व्यक्तं हि दैवं बलवत्पौरुषादिति मे मतिः । यद्द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ॥
vyaktaṃ hi daivaṃ balavatpauruṣāditi me matiḥ | yaddroṇo nihataḥ śūraḥ pārṣatena mahātmanā
मुझे स्पष्ट दीखता है कि दैव पुरुषार्थ से बलवान है, क्योंकि शूर द्रोण को महात्मा पार्षत ने मार डाला।
श्लोक 7 (7.9.7)
अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत्प्रतिष्ठितम् । तमिष्वस्त्रधराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ॥
astraṃ caturvidhaṃ vīre yasminnāsītpratiṣṭhitam | tamiṣvastradharācāryaṃ droṇaṃ śaṃsasi me hatam
उस वीर में चारों प्रकार के अस्त्र प्रतिष्ठित थे। आप मुझे बताते हैं कि धनुष और अस्त्र धारण करने वालों के आचार्य उन्हीं द्रोण का वध हो गया।
श्लोक 8 (7.9.8)
श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयाघ्रपरिवारणम् । जातरूपपरिष्कारं नाद्य शोकमपानुदे ॥
śrutvā hataṃ rukmarathaṃ vaiyāghraparivāraṇam | jātarūpapariṣkāraṃ nādya śokamapānude
जिनका रथ सोने का था, बाघ की खालों से ढका और सोने के साज से सजा था, उन्हें मारा गया सुनकर भी मैं आज अपना शोक दूर नहीं कर पा रहा।
श्लोक 9 (7.9.9)
न नूनं परदुःखेन म्रियते कोऽपि सञ्जय । यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधीः । दैवमेव परं मन्ये नन्वनर्थं हि पौरुषम् ॥
na nūnaṃ paraduḥkhena mriyate ko'pi sañjaya | yatra droṇamahaṃ śrutvā hataṃ jīvāmi mandadhīḥ | daivameva paraṃ manye nanvanarthaṃ hi pauruṣam
निश्चय ही कोई दूसरे के दुःख से नहीं मरता, सञ्जय, क्योंकि मैं मन्दबुद्धि द्रोण के वध की बात सुनकर भी जी रहा हूँ। मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ; पुरुषार्थ तो निश्चय ही व्यर्थ है।
श्लोक 10 (7.9.10)
अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम । यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते ॥
aśmasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ sudṛḍhaṃ mama | yacchrutvā nihataṃ droṇaṃ śatadhā na vidīryate
मेरा हृदय अवश्य ही पत्थर के सार का बना हुआ और बहुत कठोर है, क्योंकि द्रोण के मारे जाने की बात सुनकर भी वह सौ टुकड़े नहीं हो जाता।
श्लोक 11 (7.9.11)
ब्राह्मे दैवे तथेष्वस्त्रे यमुपासन्गुणार्थिनः । ब्राह्मणा राजपुत्राश्च स कथं मृत्युना हृतः ॥
brāhme daive tatheṣvastre yamupāsanguṇārthinaḥ | brāhmaṇā rājaputrāśca sa kathaṃ mṛtyunā hṛtaḥ
गुणों के अभिलाषी ब्राह्मण और राजपुत्र वेद-विद्या, दिव्य अस्त्रों और धनुर्विद्या के लिए जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गई?
श्लोक 12 (7.9.12)
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् । पतनं भास्करस्येव न मृष्ये द्रोणपातनम् ॥
śoṣaṇaṃ sāgarasyeva meroriva visarpaṇam | patanaṃ bhāskarasyeva na mṛṣye droṇapātanam
समुद्र का सूख जाना, मेरु का अपनी जगह से खिसक जाना, सूर्य का आकाश से गिर पड़ना — द्रोण का पतन भी इन्हीं के समान है, और मैं इसे सह नहीं सकता।
श्लोक 13 (7.9.13)
दुष्टानां प्रतिषेद्धासीद्धार्मिकाणां च रक्षिता । योऽहासीत्कृपणस्यार्थे प्राणानपि परन्तपः ॥
duṣṭānāṃ pratiṣeddhāsīddhārmikāṇāṃ ca rakṣitā | yo'hāsītkṛpaṇasyārthe prāṇānapi parantapaḥ
वे दुष्टों को रोकने वाले और धर्मात्माओं के रक्षक थे; उन शत्रुतापन ने एक दीन के लिए अपने प्राण तक त्याग दिए।
श्लोक 14 (7.9.14)
मन्दानां मम पुत्राणां जयाशा यस्य विक्रमे । बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्ध्या स निहतः कथम् ॥
mandānāṃ mama putrāṇāṃ jayāśā yasya vikrame | bṛhaspatyuśanastulyo buddhyā sa nihataḥ katham
मेरे मूर्ख पुत्रों को जिनके पराक्रम पर विजय की आशा थी, और जो बुद्धि में बृहस्पति और शुक्राचार्य के समान थे, वे कैसे मारे गए?
श्लोक 15 (7.9.15)
गुणानां सर्वयोधानां स्थितिरासीन्महाद्युतिः । यं मृत्युर्वशगस्तिष्ठेत्स कथं मृत्युना हतः ॥
guṇānāṃ sarvayodhānāṃ sthitirāsīnmahādyutiḥ | yaṃ mṛtyurvaśagastiṣṭhetsa kathaṃ mṛtyunā hataḥ
वे समस्त योद्धाओं के गुणों के आधार थे, महातेजस्वी थे — मृत्यु स्वयं भी जिनके वश में रहकर खड़ी होती — वे मृत्यु के हाथों कैसे मारे गए?
श्लोक 16 (7.9.16)
ते च शोणा बृहन्तोऽश्वाश्छन्ना जालैर्हिरण्मयैः । रथे वातजवा युक्ताः सर्वशस्त्रातिगा रणे ॥
te ca śoṇā bṛhanto'śvāśchannā jālairhiraṇmayaiḥ | rathe vātajavā yuktāḥ sarvaśastrātigā raṇe
और वे ऊँचे लाल घोड़े, सोने के जालों से ढके, रथ में जुते हुए, वायु के समान वेगवान, रण में सब शस्त्रों को लाँघ जाने वाले —
श्लोक 17 (7.9.17)
बलिनो हेषिणो दान्ताः सैन्धवाः साधुवाहिनः । दृढाः सङ्ग्राममध्येषु कच्चिदासन्न विह्वलाः ॥
balino heṣiṇo dāntāḥ saindhavāḥ sādhuvāhinaḥ | dṛḍhāḥ saṅgrāmamadhyeṣu kaccidāsanna vihvalāḥ
बलवान, हिनहिनाने वाले, सधे हुए, सिन्धु देश के, रथ को भली-भाँति खींचने वाले और युद्ध के बीच दृढ़ रहने वाले — क्या वे घबरा तो नहीं गए थे?
श्लोक 18 (7.9.18)
करिणां बृंहतां युद्धे शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः । ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णवः ॥
kariṇāṃ bṛṃhatāṃ yuddhe śaṅkhadundubhiniḥsvanaiḥ | jyākṣepaśaravarṣāṇāṃ śastrāṇāṃ ca sahiṣṇavaḥ
जो युद्ध में हाथियों की चिंघाड़, शंखों और नगाड़ों की ध्वनि, प्रत्यंचा की टंकार तथा बाणों और शस्त्रों की वर्षा सह लेते थे —
श्लोक 19 (7.9.19)
आशंसन्तः पराञ्जेतुं जितश्वासा जितव्यथाः । हयाः पराजिताः शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहाः ॥
āśaṃsantaḥ parāñjetuṃ jitaśvāsā jitavyathāḥ | hayāḥ parājitāḥ śīghrā bhāradvājarathodvahāḥ
भारद्वाज का रथ खींचने वाले वे फुर्तीले घोड़े, शत्रु को जीतने की आशा रखने वाले, श्वास और थकान को जीते हुए, परास्त हो गए।
श्लोक 20 (7.9.20)
ते स्म रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमास्थिताः । कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
te sma rukmarathe yuktā naravīrasamāsthitāḥ | kathaṃ nābhyataraṃstāta pāṇḍavānāmanīkinīm
सोने के रथ में जुते हुए, जिस पर एक नरवीर आसीन था, वे पाण्डवों की सेना को कैसे पार न कर सके, हे तात?
श्लोक 21 (7.9.21)
जातरूपपरिष्कारमास्थाय रथमुत्तमम् । भारद्वाजः किमकरोद्युधि सत्यपराक्रमः ॥
jātarūpapariṣkāramāsthāya rathamuttamam | bhāradvājaḥ kimakarodyudhi satyaparākramaḥ
सोने के साज वाले उस उत्तम रथ पर बैठकर, सत्य पराक्रम वाले भारद्वाज ने युद्ध में क्या किया?
श्लोक 22 (7.9.22)
विद्यां यस्योपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्धराः । स सत्यसन्धो बलवान्द्रोणः किमकरोद्युधि ॥
vidyāṃ yasyopajīvanti sarvalokadhanurdharāḥ | sa satyasandho balavāndroṇaḥ kimakarodyudhi
जिनकी विद्या के सहारे संसार के सब धनुर्धर जीते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ बलवान द्रोण ने युद्ध में क्या किया?
श्लोक 23 (7.9.23)
दिवि शक्रमिव श्रेष्ठं महामात्रं धनुर्भृताम् । के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथाः ॥
divi śakramiva śreṣṭhaṃ mahāmātraṃ dhanurbhṛtām | ke nu taṃ raudrakarmāṇaṃ yuddhe pratyudyayū rathāḥ
धनुर्धारियों में प्रधान, स्वर्ग में इन्द्र के समान श्रेष्ठ, उन भयंकर कर्म करने वाले के सामने रण में कौन-से रथी गए?
श्लोक 24 (7.9.24)
ननु रुक्मरथं दृष्ट्वा प्राद्रवन्ति स्म पाण्डवाः । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं रणे तस्मिन्महाबलम् ॥
nanu rukmarathaṃ dṛṣṭvā prādravanti sma pāṇḍavāḥ | divyamastraṃ vikurvāṇaṃ raṇe tasminmahābalam
क्या उस सोने के रथ को देखकर पाण्डव भाग नहीं खड़े हुए, जब वह महाबली रण में अपना दिव्य अस्त्र चला रहा था?
श्लोक 25 (7.9.25)
उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः । पाञ्चालप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारयत् ॥
utāho sarvasainyena dharmarājaḥ sahānujaḥ | pāñcālapragraho droṇaṃ sarvataḥ samavārayat
अथवा क्या धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाइयों और सारी सेना के साथ, पाञ्चालों को अपनी लगाम बनाकर, द्रोण को चारों ओर से घेर लिया?
श्लोक 26 (7.9.26)
नूनमावारयत्पार्थो रथिनोऽन्यानजिह्मगैः । ततो द्रोणं समहरत्पार्षतः पापकर्मकृत् ॥
nūnamāvārayatpārtho rathino'nyānajihmagaiḥ | tato droṇaṃ samaharatpārṣataḥ pāpakarmakṛt
निश्चय ही पार्थ अर्जुन ने अपने सीधे जाने वाले बाणों से दूसरे रथियों को रोक रखा, और तब पापकर्मा पार्षत ने द्रोण का प्राण हर लिया।
श्लोक 27 (7.9.27)
नह्यहं परिपश्यामि वधे कञ्चन शुष्मिणः । धृष्टद्युम्नादृते रौद्रात्पाल्यमानात्किरीटिना ॥
nahyahaṃ paripaśyāmi vadhe kañcana śuṣmiṇaḥ | dhṛṣṭadyumnādṛte raudrātpālyamānātkirīṭinā
क्योंकि मैं किरीटी से रक्षित उग्र धृष्टद्युम्न को छोड़कर किसी और को नहीं देखता जो उस तेजस्वी का वध कर सके।
श्लोक 28 (7.9.28)
उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः । उत्सृज्य सर्वसैन्यानि द्रोणं तमभिदुद्रुवे ॥
utāho sarvasainyena dharmarājaḥ sahānujaḥ | utsṛjya sarvasainyāni droṇaṃ tamabhidudruve
अथवा क्या धर्मराज अपने छोटे भाइयों और सारी सेना के साथ, अन्य सब सेनाओं को छोड़कर, द्रोण पर टूट पड़े?
श्लोक 29 (7.9.29)
तैर्वृतः सर्वतः क्षुद्रैः पाञ्चालापशदैस्ततः । केकयैश्चेदिकारूशैर्मत्स्यैरन्यैश्च भूमिपैः ॥
tairvṛtaḥ sarvataḥ kṣudraiḥ pāñcālāpaśadaistataḥ | kekayaiścedikārūśairmatsyairanyaiśca bhūmipaiḥ
तब वे चारों ओर से उन तुच्छ नीच पाञ्चालों से, तथा केकयों, चेदियों, कारूशों, मत्स्यों और अन्य राजाओं से घिर गए,
श्लोक 30 (7.9.30)
व्याकुलीकृतमाचार्यं पिपीलैरुरगं यथा । कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम ॥
vyākulīkṛtamācāryaṃ pipīlairuragaṃ yathā | karmaṇyasukare saktaṃ jaghāneti matirmama
और आचार्य, चींटियों से साँप की तरह व्याकुल किए जाते हुए, एक कठिन कर्म में लगे हुए मारे गए — ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 31 (7.9.31)
योऽधीत्य चतुरो वेदान्साङ्गानाख्यानपञ्चमान् । ब्राह्मणानां प्रतिष्ठासीत्स्रोतसामिव सागरः ॥
yo'dhītya caturo vedānsāṅgānākhyānapañcamān | brāhmaṇānāṃ pratiṣṭhāsītsrotasāmiva sāgaraḥ
जिन्होंने अंगों सहित चारों वेद और पाँचवें आख्यानों का अध्ययन किया था, और जो ब्राह्मणों के लिए वैसे ही आधार थे जैसे नदियों के लिए सागर,
श्लोक 32 (7.9.32)
क्षत्रं च ब्रह्म चैवेह योऽभ्यतिष्ठत्परन्तपः । दृप्तानां प्रतिषेद्धा च चक्षुरासीदचक्षुषाम् ॥
kṣatraṃ ca brahma caiveha yo'bhyatiṣṭhatparantapaḥ | dṛptānāṃ pratiṣeddhā ca cakṣurāsīdacakṣuṣām
जो ब्रह्मबल और क्षात्रबल दोनों में दृढ़ स्थित थे, शत्रुओं को तपाने वाले, अभिमानियों को रोकने वाले और नेत्रहीनों के लिए नेत्र के समान थे,
श्लोक 33 (7.9.33)
अमर्षी चावलिप्तेषु धार्मिकेषु च धार्मिकः । स कथं ब्राह्मणो वृद्धः शस्त्रेण वधमाप्तवान् ॥
amarṣī cāvalipteṣu dhārmikeṣu ca dhārmikaḥ | sa kathaṃ brāhmaṇo vṛddhaḥ śastreṇa vadhamāptavān
जो उद्दण्डों के प्रति असहिष्णु थे और धर्मात्माओं के प्रति धर्मशील — वे वृद्ध ब्राह्मण शस्त्र से मृत्यु को कैसे प्राप्त हुए?
श्लोक 34 (7.9.34)
अमर्षिणा मर्षितवान्क्लिश्यमानान्सदा मया । अनर्हमाणान्कौन्तेयान्कर्मणस्तस्य तत्फलम् ॥
amarṣiṇā marṣitavānkliśyamānānsadā mayā | anarhamāṇānkaunteyānkarmaṇastasya tatphalam
अन्याय को न सह सकने वाले होते हुए भी उन्होंने मेरे द्वारा सदा सताए जाते हुए कुन्ती के उन पुत्रों को सहन किया जो इसके योग्य नहीं थे। यह उसी कर्म का फल है।
श्लोक 35 (7.9.35)
यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भृतः । स सत्यसन्धः सुकृती श्रीकामैर्निहतः कथम् ॥
yasya karmānujīvanti loke sarvadhanurbhṛtaḥ | sa satyasandhaḥ sukṛtī śrīkāmairnihataḥ katham
संसार के सब धनुर्धर जिनके कर्म पर जीते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ और पुण्यकर्मा को श्री के अभिलाषी लोगों ने कैसे मार डाला?
श्लोक 36 (7.9.36)
दिवि शक्र इव श्रेष्ठो महासत्वो महाबलः । स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः ॥
divi śakra iva śreṣṭho mahāsatvo mahābalaḥ | sa kathaṃ nihataḥ pārthaiḥ kṣudramatsyairyathā timiḥ
स्वर्ग में इन्द्र के समान श्रेष्ठ, महान बल और पराक्रम वाले वे पृथा के पुत्रों के हाथों कैसे मारे गए, जैसे छोटी मछलियों से कोई विशाल तिमि मछली?
श्लोक 37 (7.9.37)
क्षिप्रहस्तश्च बलवान्दृढधन्वारिमर्दनः । न यस्य विजयाकाङ्क्षी विषयं प्राप्य जीवति ॥
kṣiprahastaśca balavāndṛḍhadhanvārimardanaḥ | na yasya vijayākāṅkṣī viṣayaṃ prāpya jīvati
फुर्तीले हाथों वाले, बलवान, दृढ़ धनुष वाले, शत्रुओं को कुचलने वाले — विजय चाहने वाला कोई भी उनकी पहुँच में आकर जीवित नहीं रहता था।
श्लोक 38 (7.9.38)
यं द्वौ न जहतः शब्दौ जीवमानं कदाचन । ब्राह्मश्च वेदकामानां ज्याघोषश्च धनुष्मताम् ॥
yaṃ dvau na jahataḥ śabdau jīvamānaṃ kadācana | brāhmaśca vedakāmānāṃ jyāghoṣaśca dhanuṣmatām
जब तक वे जीवित रहे, दो ध्वनियाँ उन्हें कभी नहीं छोड़ती थीं — वेद चाहने वालों का वेदपाठ और धनुर्धारियों की प्रत्यंचा की टंकार।
श्लोक 39 (7.9.39)
अदीनं पुरुषव्याघ्रं हीमन्तमपराजितम् । तमिष्वासवराचार्यं द्रोणं जघ्नुः कथं रथाः ॥
adīnaṃ puruṣavyāghraṃ hīmantamaparājitam | tamiṣvāsavarācāryaṃ droṇaṃ jaghnuḥ kathaṃ rathāḥ
जो दीन न होने वाले थे, पुरुषों में व्याघ्र, लज्जाशील और अपराजित थे — धनुर्धरों के उन श्रेष्ठ आचार्य द्रोण को रथियों ने कैसे मार डाला?
श्लोक 40 (7.9.40)
नाहं मन्ये हतं द्रोणं स हि लोकमयोत्स्यत । को हि शक्तो रणे जेतुमनाधृष्ययशोबलम् ॥
nāhaṃ manye hataṃ droṇaṃ sa hi lokamayotsyata | ko hi śakto raṇe jetumanādhṛṣyayaśobalam
मैं नहीं मानता कि द्रोण मारे गए, क्योंकि वे तो सारे संसार से लड़ जाते। जिनका यश और बल अजेय है, उन्हें रण में कौन जीत सकता है?
श्लोक 41 (7.9.41)
ब्रह्मकल्पो भवेद्ब्राह्मे क्षात्रे नारायणोपमः । ब्रह्मक्षत्रे च यस्यास्तां वशे स्थाणोरिवाखिले ॥
brahmakalpo bhavedbrāhme kṣātre nārāyaṇopamaḥ | brahmakṣatre ca yasyāstāṃ vaśe sthāṇorivākhile
वे ब्रह्मविद्या में ब्रह्मा के समान और क्षात्रविद्या में नारायण के समान थे, और ब्रह्मबल तथा क्षात्रबल दोनों उनके वश में थे, जैसे सारा जगत् स्थाणु शिव के वश में है।
श्लोक 42 (7.9.42)
सर्वान्हि मामकान्वीरान्सहाश्वरथकुञ्जरान् । युधिष्ठिरस्य तपसा हतान्मन्यामहे कुरून् ॥
sarvānhi māmakānvīrānsahāśvarathakuñjarān | yudhiṣṭhirasya tapasā hatānmanyāmahe kurūn
मैं समझता हूँ कि मेरे सब वीर, घोड़ों, रथों और हाथियों सहित सारे कुरु, युधिष्ठिर के तप से मारे गए।
श्लोक 43 (7.9.43)
कथं सञ्जय दुर्धर्षमनाधृष्ययशोबलम् । पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतोऽवधीत् ॥
kathaṃ sañjaya durdharṣamanādhṛṣyayaśobalam | paśyatāṃ puruṣendrāṇāṃ samare pārṣato'vadhīt
सञ्जय, जिनका यश और बल अजेय था, उन्हें पुरुषश्रेष्ठों के देखते-देखते पार्षत ने रण में कैसे मार डाला?
श्लोक 44 (7.9.44)
के पुरस्तादयुध्यन्त रक्षन्तो द्रोणमन्तिकात् । के नु पश्चादवर्तन्त गच्छतो दुर्गमां गतिम् ॥
ke purastādayudhyanta rakṣanto droṇamantikāt | ke nu paścādavartanta gacchato durgamāṃ gatim
द्रोण की समीप से रक्षा करते हुए आगे कौन लड़ रहे थे? और जब वे कठिन मार्ग पर जा रहे थे, तब पीछे कौन चल रहे थे?
श्लोक 45 (7.9.45)
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः । पुरस्तात्के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे ॥
ke'rakṣandakṣiṇaṃ cakraṃ savyaṃ ke ca mahātmanaḥ | purastātke ca vīrasya yudhyamānasya saṃyuge
उन महात्मा के दाहिने पहिये की रक्षा किसने की, बाएँ की किसने? और युद्ध करते हुए उन वीर के आगे कौन खड़ा था?
श्लोक 46 (7.9.46)
के च तस्मिंस्तनूस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् । द्रोणस्य समरे वीराः केऽकुर्वन्त परां धृतिम् ॥
ke ca tasmiṃstanūstyaktvā pratīpaṃ mṛtyumāvrajan | droṇasya samare vīrāḥ ke'kurvanta parāṃ dhṛtim
और वहाँ किन्होंने अपना शरीर त्यागकर मृत्यु का सामना किया? द्रोण के लिए रण में किन वीरों ने परम धैर्य दिखाया?
श्लोक 47 (7.9.47)
कच्चिन्नैनं भयान्मन्दाः क्षत्रिया व्यजहन्रणे । रक्षितारस्ततः शून्ये कच्चित्तैर्न हतः परैः ॥
kaccinnainaṃ bhayānmandāḥ kṣatriyā vyajahanraṇe | rakṣitārastataḥ śūnye kaccittairna hataḥ paraiḥ
क्या डरपोक क्षत्रियों ने उन्हें भय से युद्ध में छोड़ तो नहीं दिया? और रक्षकों के हट जाने से सूनी जगह में वे शत्रुओं के हाथों मारे तो नहीं गए?
श्लोक 48 (7.9.48)
न स पृष्ठमरेस्त्रासाद्रणे शौर्यात्प्रदर्शयेत् । परामप्यापदं प्राप्य स कथं निहतः परैः ॥
na sa pṛṣṭhamarestrāsādraṇe śauryātpradarśayet | parāmapyāpadaṃ prāpya sa kathaṃ nihataḥ paraiḥ
वे शौर्य के कारण भय से रण में शत्रु को कभी पीठ नहीं दिखाते थे। इतनी बड़ी विपत्ति में पड़कर भी वे शत्रुओं के हाथों कैसे मारे गए?
श्लोक 49 (7.9.49)
एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु सञ्जय । पराक्रमेद्यथा शक्त्या तच्च तस्मिन्प्रतिष्ठितम् । यो यथाशक्ति युद्ध्येत द्विषद्भिःस्वांश्च पालयन् ॥
etadāryeṇa kartavyaṃ kṛcchrāsvāpatsu sañjaya | parākramedyathā śaktyā tacca tasminpratiṣṭhitam | yo yathāśakti yuddhyeta dviṣadbhiḥsvāṃśca pālayan
सञ्जय, कठिन विपत्तियों में श्रेष्ठ पुरुष को यही करना चाहिए कि अपनी शक्ति भर पराक्रम करे, और वह गुण उनमें स्थित था। जो शत्रुओं से लड़ता हुआ अपने लोगों की रक्षा करते हुए यथाशक्ति युद्ध करे —
श्लोक 50 (7.9.50)
कच्चिन्नैनं भयात्क्षुद्राः पार्थेभ्यः प्रददू रणे । गोप्तृभिस्तैः समुत्सृष्टः कच्चिन्नैष परैर्हतः ॥
kaccinnainaṃ bhayātkṣudrāḥ pārthebhyaḥ pradadū raṇe | goptṛbhistaiḥ samutsṛṣṭaḥ kaccinnaiṣa parairhataḥ
क्या नीच लोगों ने भय से उन्हें रण में पृथा के पुत्रों के हाथ सौंप तो नहीं दिया? क्या रक्षकों से छोड़े जाने पर वे शत्रुओं के हाथों मारे तो नहीं गए?
श्लोक 51 (7.9.51)
धृष्टद्युम्नं प्रपश्यामि निघ्नन्तमिव ब्राह्मणम् । वार्यमाणं रणे तात द्रौणिनाऽमिततेजसा ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ prapaśyāmi nighnantamiva brāhmaṇam | vāryamāṇaṃ raṇe tāta drauṇinā'mitatejasā
मैं देखता हूँ कि धृष्टद्युम्न मानो एक ब्राह्मण का वध कर रहा है, यद्यपि रण में असीम तेज वाले द्रोणपुत्र उसे रोक रहे हैं, हे तात।
श्लोक 52 (7.9.52)
मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम् । भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि सञ्जय ॥
muhyate me manastāta kathā tāvannivāryatām | bhūyastu labdhasaṃjñastvāṃ paripṛcchāmi sañjaya
हे तात, मेरा मन घूम रहा है; अभी कथा रोक दो। जब मुझे फिर होश आएगा, तब मैं तुमसे फिर पूछूँगा, सञ्जय।