द्रोण पर्व · अध्याय 124
दुर्योधन का पाण्डव-सेना में प्रहार
धृतराष्ट्र इस बात पर चकित होते हैं कि उनकी सेना का कोई भी योद्धा सात्यकि को रोक नहीं सका, और पूछते हैं कि एक अकेला वीर इतने योद्धाओं के बीच से कैसे निकल गया। सञ्जय विशाल सेनाओं और युद्ध के कोलाहल का वर्णन करते हैं, पाण्डव-नेताओं का अपनी सेना को कृष्ण और अर्जुन का मार्ग खोलने के लिए प्रेरित करना बताते हैं, और भारत-सेना के मध्य तथा द्रोण के व्यूह-द्वार पर हुए भीषण युद्ध का वृत्तान्त देते हैं। फिर दुर्योधन पाण्डव-पंक्तियों में घुसकर उनके नायकों को घायल करता है, युधिष्ठिर के हाथों अपना धनुष कटवा बैठता है और दूसरा धनुष लेकर आगे बढ़ता है; पाञ्चाल उस पर टूट पड़ते हैं और द्रोण उन्हें रोकते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.124.1)
किं तस्यां मम सेनायां नासन्केचिन्महारथाः । ये तथा सात्यकिं यान्तं नैवाघ्नन्नाप्यवारयन् ॥
kiṃ tasyāṃ mama senāyāṃ nāsankecinmahārathāḥ | ye tathā sātyakiṃ yāntaṃ naivāghnannāpyavārayan
क्या मेरी उस सेना में कोई भी महारथी नहीं था, जो इस प्रकार आगे बढ़ते हुए सात्यकि को न तो मार सके और न रोक सके?
श्लोक 2 (7.124.2)
एको हि समरे कर्म कृतवान्सत्यविक्रमः । शक्रतुल्यबलो युद्धे महेन्द्रो दानवेष्विव ॥
eko hi samare karma kṛtavānsatyavikramaḥ | śakratulyabalo yuddhe mahendro dānaveṣviva
सच्चे पराक्रम वाले उस अकेले वीर ने युद्ध में ऐसा कर्म कर दिखाया। वह बल में इन्द्र के समान था, जैसे दानवों के बीच महेन्द्र हों।
श्लोक 3 (7.124.3)
अथवा शून्यमासीत्तद्येन यातः स सात्यकिः । हतभूयिष्ठमथवा येन यातः स सात्यकिः ॥
athavā śūnyamāsīttadyena yātaḥ sa sātyakiḥ | hatabhūyiṣṭhamathavā yena yātaḥ sa sātyakiḥ
अथवा जहाँ से सात्यकि निकला, वह सेना सूनी रही होगी; या फिर जहाँ से वह गया, वहाँ अधिकांश योद्धा पहले ही मारे जा चुके होंगे।
श्लोक 4 (7.124.4)
यत्कृतं वृष्णिवीरेण कर्म शंससि मे रणे । नैतदुत्सहते कर्तुं कर्म शक्रोऽपि सञ्जय ॥
yatkṛtaṃ vṛṣṇivīreṇa karma śaṃsasi me raṇe | naitadutsahate kartuṃ karma śakro'pi sañjaya
वृष्णि-वीर ने रण में जो कर्म किया, जिसे तुम मुझे बता रहे हो, उसे करने का साहस तो इन्द्र भी नहीं कर सकता, सञ्जय।
श्लोक 5 (7.124.5)
अश्रद्धेयमचिन्त्यं च कर्म तस्य महात्मनः । वृष्ण्यन्धकप्रवीरस्य श्रुत्वा मे व्यथितं मनः ॥
aśraddheyamacintyaṃ ca karma tasya mahātmanaḥ | vṛṣṇyandhakapravīrasya śrutvā me vyathitaṃ manaḥ
वृष्णियों और अन्धकों के उस महात्मा श्रेष्ठ वीर का अविश्वसनीय और अचिन्त्य कर्म सुनकर मेरा मन व्यथित हो उठा है।
श्लोक 6 (7.124.6)
न सन्ति तस्मात्पुत्रा मे यथा सञ्जय भाषसे । एको वै बहुलाः सेनाः प्रामृद्नात्सत्यविक्रमः ॥
na santi tasmātputrā me yathā sañjaya bhāṣase | eko vai bahulāḥ senāḥ prāmṛdnātsatyavikramaḥ
तब तो मेरे पुत्र वैसे नहीं हैं जैसा तुम कहते हो, सञ्जय; क्योंकि सच्चे पराक्रम वाले उस अकेले वीर ने बहुत-सी सेनाओं को रौंद डाला।
श्लोक 7 (7.124.7)
कथं च युध्यमानानामपक्रान्तो महात्मनाम् । एको बहूनां शैनेयस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
kathaṃ ca yudhyamānānāmapakrānto mahātmanām | eko bahūnāṃ śaineyastanmamācakṣva sañjaya
और उससे लड़ रहे उन अनेक महात्मा योद्धाओं के बीच से अकेला शैनेय कैसे निकल गया? यह मुझे बताओ, सञ्जय।
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (7.124.8)
राजन्सेनासमुद्योगो रथनागाश्वपत्तिमान् । अतुल्यस्तव सेनायां युगान्तसदृशोऽभवत् ॥
rājansenāsamudyogo rathanāgāśvapattimān | atulyastava senāyāṃ yugāntasadṛśo'bhavat
राजन्, रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों से भरी आपकी सेना की वह सजावट अतुलनीय थी, मानो युग के अन्त का दृश्य हो।
श्लोक 9 (7.124.9)
आहूतेषु समूहेषु तव सैन्यस्य मानद । नास्ति लोके समः कश्चित्समूह इति मे मतिः ॥
āhūteṣu samūheṣu tava sainyasya mānada | nāsti loke samaḥ kaścitsamūha iti me matiḥ
हे मानद, जब आपकी सेना की टुकड़ियाँ बुलाई गईं, तब मेरा मत है कि संसार में उसके समान कोई सेना-समूह नहीं था।
श्लोक 10 (7.124.10)
तत्रैव देवास्त्वभाषन्त चारणाश्च समागताः । एतदन्ताः समूहा वै भविष्यन्ति महीतले ॥
tatraiva devāstvabhāṣanta cāraṇāśca samāgatāḥ | etadantāḥ samūhā vai bhaviṣyanti mahītale
वहीं एकत्र हुए देवता और चारण कहने लगे, "पृथ्वी पर ऐसे समूह अब इसी के साथ समाप्त हो जाएँगे।"
श्लोक 11 (7.124.11)
न च वै तादृशो व्यूह आसीत्कश्चिद्विशाम्पते । यादृग्जयद्रथवधे द्रोणेन विहितोऽभवत् ॥
na ca vai tādṛśo vyūha āsītkaścidviśāmpate | yādṛgjayadrathavadhe droṇena vihito'bhavat
और हे राजन्, जयद्रथ के वध के लिए द्रोण ने जो व्यूह रचा था, वैसा व्यूह पहले कभी नहीं हुआ।
श्लोक 12 (7.124.12)
उद्धृता पृथिवी नूनं युद्धहेतोः समागतैः । इति तत्र जनाश्चाहुर्दृष्टा तां जनसंसदम् ॥
uddhṛtā pṛthivī nūnaṃ yuddhahetoḥ samāgataiḥ | iti tatra janāścāhurdṛṣṭā tāṃ janasaṃsadam
"युद्ध के लिए जुटे हुए इन लोगों ने निश्चय ही पृथ्वी को उठा लिया है", उस विशाल जन-समूह को देखकर वहाँ के लोग ऐसा कहते थे।
श्लोक 13 (7.124.13)
चण्डवातविभिन्नानां समुद्राणामिव स्वनः । रणेऽभवद्बलौघानामन्योन्यमभिधावताम् ॥
caṇḍavātavibhinnānāṃ samudrāṇāmiva svanaḥ | raṇe'bhavadbalaughānāmanyonyamabhidhāvatām
एक-दूसरे पर दौड़ती हुई सेनाओं की उमड़ती धाराओं का नाद रण में ऐसा गूँज उठा, जैसे प्रचण्ड वायु से मथे हुए समुद्रों की गर्जना हो।
श्लोक 14 (7.124.14)
पार्थिवानां समेतानां बहून्यासन्नरोत्तम । त्वद्बले पाण्डवानां च सहस्राणि शतानि च ॥
pārthivānāṃ sametānāṃ bahūnyāsannarottama | tvadbale pāṇḍavānāṃ ca sahasrāṇi śatāni ca
हे नरश्रेष्ठ, आपकी सेना में और पाण्डवों की सेना में भी एकत्र हुए राजा सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में थे।
श्लोक 15 (7.124.15)
संरब्धानां प्रवीराणां समरे दृढकर्मणाम् । तत्रासीत्सुमहाशब्दस्तुमुलो रोमहर्षणः ॥
saṃrabdhānāṃ pravīrāṇāṃ samare dṛḍhakarmaṇām | tatrāsītsumahāśabdastumulo romaharṣaṇaḥ
क्रोध से भरे, दृढ़ कर्म करने वाले उन श्रेष्ठ वीरों के बीच रण में अत्यन्त भारी कोलाहल उठा, जिससे रोंगटे खड़े हो जाते थे।
श्लोक 16 (7.124.16)
पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् । क्ष्वेलाः किलकिलाशब्दास्तत्रासन्वै सहस्रशः ॥
pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca garjatāmitaretaram | kṣvelāḥ kilakilāśabdāstatrāsanvai sahasraśaḥ
पाण्डव और कौरव जब एक-दूसरे पर गरज रहे थे, तब वहाँ हज़ारों ललकारें और 'किलकिल' की ध्वनियाँ उठ रही थीं।
श्लोक 17 (7.124.17)
भेरीशब्दाश्च तुमुला बाणशब्दाश्च भारत । अन्योन्यं निघ्नतां चैव नराणां शुश्रुवे स्वनः ॥
bherīśabdāśca tumulā bāṇaśabdāśca bhārata | anyonyaṃ nighnatāṃ caiva narāṇāṃ śuśruve svanaḥ
हे भारत, नगाड़ों का भीषण नाद, बाणों की सनसनाहट और एक-दूसरे को मारते हुए मनुष्यों का कोलाहल सुनाई दे रहा था।
श्लोक 18 (7.124.18)
अथाक्रन्दन्भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च मारिष । नकुलः सहदेवश्च धर्मराजश्च पाण्डवः ॥
athākrandanbhīmaseno dhṛṣṭadyumnaśca māriṣa | nakulaḥ sahadevaśca dharmarājaśca pāṇḍavaḥ
तब भीमसेन ने पुकारा, और हे मान्यवर, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव तथा पाण्डव राजा युधिष्ठिर ने भी पुकारा।
भीमसेनादय ऊचुः
श्लोक 19 (7.124.19)
आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत । प्रविष्टावरिसेनां हि वीरौ माधवपाण्डवौ ॥
āgacchata praharata drutaṃ viparidhāvata | praviṣṭāvarisenāṃ hi vīrau mādhavapāṇḍavau
"आओ, प्रहार करो, शीघ्र दौड़ो! माधव और पाण्डव, वे दोनों वीर, शत्रु-सेना में घुस गए हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (7.124.20)
यथा सुखेन गच्छेतां जयद्रथवधं प्रति । तथा प्रकुरुत क्षिप्रमिति सैन्यान्यचोदयन् ॥
yathā sukhena gacchetāṃ jayadrathavadhaṃ prati | tathā prakuruta kṣipramiti sainyānyacodayan
ऐसा शीघ्र करो कि वे दोनों जयद्रथ के वध की ओर सहज ही बढ़ सकें — इस प्रकार उन्होंने सेनाओं को उकसाया।
भीमसेनादय ऊचुः
श्लोक 21 (7.124.21)
तयोरभावे कुरवः कृतार्थाः स्युर्वयं जिताः ॥
tayorabhāve kuravaḥ kṛtārthāḥ syurvayaṃ jitāḥ
यदि वे दोनों न रहे, तो कौरवों का मनोरथ पूरा हो जाएगा और हम हार जाएँगे।
श्लोक 22 (7.124.22)
यत्र यातौ महात्मानौ तूर्णं परपुरञ्जयौ । ते यूयं सहिता भूत्वा तूर्णमेव बलार्णवम् । क्षोभयध्वं महावेगाः पवनः सागरं यथा ॥
yatra yātau mahātmānau tūrṇaṃ parapurañjayau | te yūyaṃ sahitā bhūtvā tūrṇameva balārṇavam | kṣobhayadhvaṃ mahāvegāḥ pavanaḥ sāgaraṃ yathā
जहाँ शत्रुओं के नगर जीतने वाले वे दोनों महात्मा तेज़ी से गए हैं, वहाँ तुम सब एक साथ मिलकर बड़े वेग से उस सेना-सागर को वैसे ही मथ डालो जैसे वायु समुद्र को मथ डालती है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (7.124.23)
भीमसेनेन ते राजन्पाञ्चाल्येन च नोदिताः । आजघ्नुः कौरवान्सङ्ख्ये त्यक्त्वाऽसूनात्मनः प्रियान् ॥
bhīmasenena te rājanpāñcālyena ca noditāḥ | ājaghnuḥ kauravānsaṅkhye tyaktvā'sūnātmanaḥ priyān
भीमसेन और पाञ्चाल राजकुमार धृष्टद्युम्न से प्रेरित होकर वे अपने प्रिय प्राणों को त्यागकर युद्ध में कौरवों पर टूट पड़े।
श्लोक 24 (7.124.24)
इच्छन्तो निधनं युद्धे शस्त्रैरुत्तमतेजसः । स्वर्गेप्सवो मित्रकार्ये नाभ्यनन्दन्त जीवितम् ॥
icchanto nidhanaṃ yuddhe śastrairuttamatejasaḥ | svargepsavo mitrakārye nābhyanandanta jīvitam
परम तेजस्वी वे योद्धा युद्ध में शस्त्रों से मृत्यु चाहते थे और स्वर्ग की कामना रखते थे; मित्र के कार्य के लिए उन्हें अपने जीवन से कोई मोह नहीं रहा।
श्लोक 25 (7.124.25)
तथैव तावका राजन्प्रार्थयन्तो महद्यशः । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा युद्धायैवावतस्थिरे ॥
tathaiva tāvakā rājanprārthayanto mahadyaśaḥ | āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā yuddhāyaivāvatasthire
हे राजन्, उसी प्रकार आपके योद्धा भी महान् यश की इच्छा से, युद्ध में श्रेष्ठ संकल्प करके, लड़ने के लिए डटे रहे।
श्लोक 26 (7.124.26)
तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयावहे । जित्वा सर्वाणि सैन्यानि प्रायात्सात्यकिरर्जुनं ॥
tasminsutumule yuddhe vartamāne bhayāvahe | jitvā sarvāṇi sainyāni prāyātsātyakirarjunaṃ
जब वह भयंकर और अत्यन्त तुमुल युद्ध चल रहा था, तब सात्यकि सब सेनाओं को जीतकर अर्जुन की ओर बढ़ता गया।
श्लोक 27 (7.124.27)
कवचानां प्रभास्तत्र सूर्यरश्मिविराजिताः । दृष्टीः सङ्ख्ये सैनिकानां प्रतिजघ्नुः समन्ततः । ध्वजशस्त्रप्रतिहता लोकान्समवदीपयन् ॥
kavacānāṃ prabhāstatra sūryaraśmivirājitāḥ | dṛṣṭīḥ saṅkhye sainikānāṃ pratijaghnuḥ samantataḥ | dhvajaśastrapratihatā lokānsamavadīpayan
वहाँ कवचों की चमक सूर्य की किरणों की तरह दमक रही थी और युद्ध में चारों ओर सैनिकों की आँखों को चौंधिया रही थी; ध्वजाओं और शस्त्रों से टकराकर वह सब दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी।
श्लोक 28 (7.124.28)
चण्डवातोद्धतान्मेघान्विकिरन्रश्मिमानिव । तथा तव महत्सैन्यं तद्व्यरोचत तापयन् ॥
caṇḍavātoddhatānmeghānvikiranraśmimāniva | tathā tava mahatsainyaṃ tadvyarocata tāpayan
जैसे तेजस्वी सूर्य प्रचण्ड वायु से उड़ाए गए बादलों को बिखेर देता है, वैसे ही आपकी वह विशाल सेना शत्रुओं को तपाती हुई चमक रही थी।
श्लोक 29 (7.124.29)
सम्प्रहृष्टः स सहसा तव सैन्यार्णवं प्रति । लोलयन्सर्वतो गत्वा समुद्रं मकरो यथा ॥
samprahṛṣṭaḥ sa sahasā tava sainyārṇavaṃ prati | lolayansarvato gatvā samudraṃ makaro yathā
अत्यन्त हर्षित होकर वह सहसा आपकी सेना के सागर में घुस गया और उसे चारों ओर से मथता हुआ ऐसा लगता था जैसे समुद्र में कोई मगर हो।
श्लोक 30 (7.124.30)
तत्र राजन्महानासीत्सङ्ग्रामो भीतिवर्धनः । पाण्डवस्य महाबाहो तावकानां च दारुणः ॥
tatra rājanmahānāsītsaṅgrāmo bhītivardhanaḥ | pāṇḍavasya mahābāho tāvakānāṃ ca dāruṇaḥ
वहाँ, हे राजन्, पाण्डव और आपके योद्धाओं के बीच, हे महाबाहो, भय बढ़ाने वाला भारी और भयंकर संग्राम हुआ।
श्लोक 31 (7.124.31)
रुद्रस्याक्रीडसङ्काशः संहारः सर्वदेहिनाम् । ततः शब्दो महानासीत्प्रायाद्यत्र धनञ्चयः ॥
rudrasyākrīḍasaṅkāśaḥ saṃhāraḥ sarvadehinām | tataḥ śabdo mahānāsītprāyādyatra dhanañcayaḥ
वह रुद्र की क्रीड़ा जैसा था, सब देहधारियों का संहार। तब जहाँ धनञ्जय गया था, वहाँ बड़ा कोलाहल उठा।
श्लोक 32 (7.124.32)
तत्र स्म कदनं घोरं वर्तते पाण्डुपूर्वज । अर्जुनस्य महाबाहोस्तावकानां च धन्विनाम् ॥
tatra sma kadanaṃ ghoraṃ vartate pāṇḍupūrvaja | arjunasya mahābāhostāvakānāṃ ca dhanvinām
वहाँ, हे पाण्डु के अग्रज, महाबाहु अर्जुन और आपके धनुर्धारियों के बीच भयंकर संहार हो रहा था,
श्लोक 33 (7.124.33)
मध्ये भारतसैन्यस्य माधवस्य महारणे । द्रोणस्यापि परैः सार्धं व्यूहद्वारे सुदारुणम् ॥
madhye bhāratasainyasya mādhavasya mahāraṇe | droṇasyāpi paraiḥ sārdhaṃ vyūhadvāre sudāruṇam
भारत-सेना के मध्य में, माधव के महायुद्ध में, और व्यूह के द्वार पर शत्रुओं के साथ द्रोण के भी युद्ध में, अत्यन्त भीषण रूप से।
श्लोक 34 (7.124.34)
एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते । क्रुद्धेऽर्जुने तथा द्रोणे सात्वते च महारथे ॥
evameṣa kṣayo vṛttaḥ pṛthivyāṃ pṛthivīpate | kruddhe'rjune tathā droṇe sātvate ca mahārathe
इस प्रकार, हे पृथ्वीपति, अर्जुन, द्रोण और महारथी सात्वत सात्यकि के क्रुद्ध होने पर पृथ्वी पर यह विनाश हुआ।
श्लोक 35 (7.124.35)
तथा प्रयतमानानां पाण्डवानां महात्मनाम् । दुर्योधनो महाराजन्व्यगाहत महद्बलम् ॥
tathā prayatamānānāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | duryodhano mahārājanvyagāhata mahadbalam
जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार प्रयत्न कर रहे थे, तब हे महाराज, दुर्योधन उनकी विशाल सेना में घुस पड़ा।
श्लोक 36 (7.124.36)
स सन्निपातस्तुमुलस्तेषां तस्य च भारत । अभवत्सर्वभूतानामभावकरणो महान् ॥
sa sannipātastumulasteṣāṃ tasya ca bhārata | abhavatsarvabhūtānāmabhāvakaraṇo mahān
हे भारत, उनके और उसके बीच वह टक्कर बड़ी भीषण थी और सब प्राणियों का भारी विनाश करने वाली बनी।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 37 (7.124.37)
तथा यातेषु सैन्येषु तथा कृच्छ्रगतः स्वयम् । कच्चिद्दुर्योधनः सूत नाकार्षीत्पृष्ठतो रणम् ॥
tathā yāteṣu sainyeṣu tathā kṛcchragataḥ svayam | kaccidduryodhanaḥ sūta nākārṣītpṛṣṭhato raṇam
सूत, जब सेनाएँ इस प्रकार चली गई थीं और स्वयं दुर्योधन भी ऐसे संकट में था, तब क्या उसने रण से पीठ तो नहीं दिखाई?
श्लोक 38 (7.124.38)
एकस्य च बहूनां च सन्निपातो महाहवे । विशेषतो नरपतेर्विषमः प्रतिभाति मे ॥
ekasya ca bahūnāṃ ca sannipāto mahāhave | viśeṣato narapaterviṣamaḥ pratibhāti me
बड़े संग्राम में एक का बहुतों से भिड़ना मुझे विषम जान पड़ता है, और राजा के लिए तो विशेष रूप से।
श्लोक 39 (7.124.39)
सोऽत्यन्तसुखसंवृद्धो लक्ष्म्या लोकस्य चेश्वरः । एको बहून्समासाद्य कच्चिन्नासीत्पराङ्मुखः ॥
so'tyantasukhasaṃvṛddho lakṣmyā lokasya ceśvaraḥ | eko bahūnsamāsādya kaccinnāsītparāṅmukhaḥ
वह अत्यन्त सुख में पला था और अपने वैभव के कारण संसार का स्वामी था। अकेले बहुतों का सामना करके क्या वह विमुख तो नहीं हुआ?
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (7.124.40)
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं तव पुत्रस्य भारत । एकस्य बहुभिः सार्धं शृणुष्व गदतो मम ॥
rājansaṅgrāmamāścaryaṃ tava putrasya bhārata | ekasya bahubhiḥ sārdhaṃ śṛṇuṣva gadato mama
हे राजन्, हे भारत, आपके पुत्र के उस अद्भुत संग्राम को सुनिए, जिसमें वह अकेला बहुतों से लड़ा; मैं उसे कहता हूँ।
श्लोक 41 (7.124.41)
दुर्योधनेन समरे पृतना पाण्डवी रणे । नलिनी द्विरदेनेव समन्तात्प्रतिलोडिता ॥
duryodhanena samare pṛtanā pāṇḍavī raṇe | nalinī dviradeneva samantātpratiloḍitā
दुर्योधन ने युद्ध में पाण्डव-सेना को चारों ओर से वैसे ही मथ डाला, जैसे हाथी कमल-सरोवर को मथ डालता है।
श्लोक 42 (7.124.42)
ततस्तां प्रहतां सेनां दृष्ट्वा पुत्रेण ते नृप । भीमसेनपुरोगास्तं पाञ्चालाः समुपाद्रुवन् ॥
tatastāṃ prahatāṃ senāṃ dṛṣṭvā putreṇa te nṛpa | bhīmasenapurogāstaṃ pāñcālāḥ samupādruvan
तब, हे राजन्, अपनी उस सेना को आपके पुत्र के हाथों मार खाई देखकर भीमसेन को आगे करके पाञ्चाल उस पर टूट पड़े।
श्लोक 43 (7.124.43)
स भीमसेनं दशभिः शरैर्विव्याध पाण्डवम् । त्रिभिस्त्रिभिर्यमौ वीरौ धर्मराजं च सप्तभिः ॥
sa bhīmasenaṃ daśabhiḥ śarairvivyādha pāṇḍavam | tribhistribhiryamau vīrau dharmarājaṃ ca saptabhiḥ
उसने पाण्डव भीमसेन को दस बाणों से, दोनों वीर जुड़वाँ भाइयों को तीन-तीन से और धर्मराज को सात बाणों से बींध डाला।
श्लोक 44 (7.124.44)
विराटद्रुपदौ षद्भिः शतेन च शिखण्डिनम् । धृष्टद्युम्नं च विंशत्या द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥
virāṭadrupadau ṣadbhiḥ śatena ca śikhaṇḍinam | dhṛṣṭadyumnaṃ ca viṃśatyā draupadeyāṃstribhistribhiḥ
विराट और द्रुपद को छह-छह बाणों से, शिखण्डी को सौ से, धृष्टद्युम्न को बीस से और द्रौपदी के पुत्रों को तीन-तीन से उसने घायल किया।
श्लोक 45 (7.124.45)
शतशश्चापरान्योधान्सद्विपांश्च रथान्रणे । शरैरवचकर्तोग्रैः क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ॥
śataśaścāparānyodhānsadvipāṃśca rathānraṇe | śarairavacakartograiḥ kruddho'ntaka iva prajāḥ
प्रजा के बीच क्रुद्ध यमराज की तरह उसने रण में उग्र बाणों से और भी सैकड़ों योद्धाओं को काट डाला, और हाथियों सहित रथों को भी।
श्लोक 46 (7.124.46)
न सन्दधद्विमुञ्चन्वा मण्डलीकृतकार्मुकः । अदृश्यत रिपून्निघ्नञ्छिक्षयाऽस्तबलेन च ॥
na sandadhadvimuñcanvā maṇḍalīkṛtakārmukaḥ | adṛśyata ripūnnighnañchikṣayā'stabalena ca
धनुष को मण्डलाकार खींचे हुए वह शत्रुओं को मारता दिखाई देता था, पर बाण चढ़ाते या छोड़ते हुए नहीं दिखता था, ऐसी थी उसकी शिक्षा और अस्त्र-बल।
श्लोक 47 (7.124.47)
तस्य तान्निघ्नतः शत्रून्हेमपृष्ठं महद्धनुः । अजस्रं मण्डलीभूतं ददृशुः समरे जनाः ॥
tasya tānnighnataḥ śatrūnhemapṛṣṭhaṃ mahaddhanuḥ | ajasraṃ maṇḍalībhūtaṃ dadṛśuḥ samare janāḥ
जब वह उन शत्रुओं को मार रहा था, तब रण में लोगों ने उसके स्वर्ण-पृष्ठ वाले विशाल धनुष को निरन्तर मण्डलाकार खिंचा हुआ देखा।
श्लोक 48 (7.124.48)
ततो युधिष्ठिरो राजा भल्लाभ्यामच्छिनद्धनुः । तव पुत्रस्य कौरव्य यतमानस्य संयुगे ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā bhallābhyāmacchinaddhanuḥ | tava putrasya kauravya yatamānasya saṃyuge
तब हे कौरव्य, राजा युधिष्ठिर ने दो भल्ल बाणों से, युद्ध में प्रयत्न करते हुए आपके पुत्र का धनुष काट डाला।
श्लोक 49 (7.124.49)
विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शरोत्तमैः । वर्म चाशु समासाद्य ते भित्त्वा क्षितिमाविशन् ॥
vivyādha cainaṃ daśabhiḥ samyagastaiḥ śarottamaiḥ | varma cāśu samāsādya te bhittvā kṣitimāviśan
और उसने भली-भाँति चलाए हुए दस उत्तम बाणों से उसे बींध दिया; वे शीघ्र ही उसके कवच तक पहुँचे, उसे भेदकर भूमि में जा धँसे।
श्लोक 50 (7.124.50)
ततः प्रमुदिताः पार्थाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् । यथा वृत्रवधे देवाः पुरा शक्रं महर्षयः ॥
tataḥ pramuditāḥ pārthāḥ parivavruryudhiṣṭhiram | yathā vṛtravadhe devāḥ purā śakraṃ maharṣayaḥ
तब प्रसन्न हुए पार्थों ने युधिष्ठिर को घेर लिया, जैसे वृत्र के वध के समय देवताओं और महर्षियों ने पहले इन्द्र को घेरा था।
श्लोक 51 (7.124.51)
ततोऽन्यद्धनुरादाय तव पुत्रः प्रतापवान् । तिष्ठेतिष्ठेति राजानं ब्रुवन्पाण्डवमभ्ययात् ॥
tato'nyaddhanurādāya tava putraḥ pratāpavān | tiṣṭhetiṣṭheti rājānaṃ bruvanpāṇḍavamabhyayāt
तब आपका प्रतापी पुत्र दूसरा धनुष लेकर "ठहरो, ठहरो!" कहता हुआ पाण्डव राजा पर चढ़ आया।
श्लोक 52 (7.124.52)
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य तव पुत्रं महामृधे । प्रत्युद्ययुः समुदिताः पाञ्चाला जयगृद्धिनः ॥
tamāyāntamabhiprekṣya tava putraṃ mahāmṛdhe | pratyudyayuḥ samuditāḥ pāñcālā jayagṛddhinaḥ
उस महायुद्ध में आपके पुत्र को आते देखकर विजय के इच्छुक पाञ्चाल हर्ष से भरकर उसका सामना करने दौड़ पड़े।
श्लोक 53 (7.124.53)
तान्द्रोणः प्रतिजग्राह परीप्सन्युधि पाण्डवम् । चण्डवातोद्धुतान्मेघान्गिरिरम्बुमुचो यथा ॥
tāndroṇaḥ pratijagrāha parīpsanyudhi pāṇḍavam | caṇḍavātoddhutānmeghāngirirambumuco yathā
द्रोण ने युद्ध में पाण्डव को पकड़ लेने की इच्छा से उनका सामना किया, जैसे पर्वत प्रचण्ड वायु से उड़ाए गए जल-भरे बादलों को रोक लेता है।
श्लोक 54 (7.124.54)
तत्र राजन्महानासीत्सङ्ग्रामो रोमहर्षणः । पाण्डवानां महाबाहो तावकानां च संयुगे ॥
tatra rājanmahānāsītsaṅgrāmo romaharṣaṇaḥ | pāṇḍavānāṃ mahābāho tāvakānāṃ ca saṃyuge
वहाँ, हे राजन्, हे महाबाहो, पाण्डवों और आपके योद्धाओं के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला संग्राम हुआ।
श्लोक 55 (7.124.55)
रुद्रस्याक्रीडसदृशः संहारः सर्वदेहिनाम् ॥
rudrasyākrīḍasadṛśaḥ saṃhāraḥ sarvadehinām
वह रुद्र की क्रीड़ा के समान था, सब देहधारियों का संहार।
श्लोक 56 (7.124.56)
ततः शब्दो महानासीद्यातो येन धनञ्जयः । अतीव सर्वशब्देभ्यो रोमहर्षकरः प्रभो ॥
tataḥ śabdo mahānāsīdyāto yena dhanañjayaḥ | atīva sarvaśabdebhyo romaharṣakaraḥ prabho
तब, हे प्रभो, जहाँ धनञ्जय गया था, वहाँ एक महान् नाद उठा, जो अन्य सब ध्वनियों से बढ़कर रोमांचकारी था।
श्लोक 57 (7.124.57)
अर्जुनस्य महाबाहो तावकानां च धन्विनाम् । मध्ये भारतसैन्यस्य माधवस्य महारणे । द्रोणस्यापि परैः सार्धं व्यूहद्वारे महारणे ॥
arjunasya mahābāho tāvakānāṃ ca dhanvinām | madhye bhāratasainyasya mādhavasya mahāraṇe | droṇasyāpi paraiḥ sārdhaṃ vyūhadvāre mahāraṇe
महाबाहु अर्जुन और आपके धनुर्धारियों का, भारत-सेना के मध्य में, माधव के महायुद्ध में, और व्यूह के द्वार पर शत्रुओं के साथ द्रोण के भी महायुद्ध में।
श्लोक 58 (7.124.58)
एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते । क्रुद्धेऽर्जुने तथा द्रोणे सात्वते च महारथे ॥
evameṣa kṣayo vṛttaḥ pṛthivyāṃ pṛthivīpate | kruddhe'rjune tathā droṇe sātvate ca mahārathe
इस प्रकार, हे पृथ्वीपति, अर्जुन, द्रोण और महारथी सात्वत सात्यकि के क्रुद्ध होने पर पृथ्वी पर यह विनाश हुआ।