द्रोण पर्व · अध्याय 125
द्रोण के हाथों बृहत्क्षत्र, धृष्टकेतु और जरासन्ध-पुत्र का वध
अपराह्न में द्रोण फिर सोमकों से युद्ध करते हैं। केकय बृहत्क्षत्र के साथ ब्रह्मास्त्रों का आदान-प्रदान होने के बाद वे उसे मार डालते हैं; फिर चेदि-राज धृष्टकेतु को, जिसकी फेंकी हुई गदा और शक्ति व्यर्थ जाती है, फिर धृष्टकेतु के पुत्र को और जरासन्ध के पुत्र को। "द्रोण को मारो!" पुकारते हुए चेदि, पाञ्चाल और सृञ्जय उन पर टूट पड़ते हैं और कट जाते हैं; भीम द्रोण के अग्नि की भाँति क्षत्रियों को जलाने की बात कहते हैं, और द्रोण धृष्टद्युम्न के पुत्र क्षत्रधर्मा को मार डालते हैं तथा चेकितान का रथ छीन लेते हैं। द्रुपद दुर्योधन के लोभ को धिक्कारते हैं और पार्थों को आगे करके द्रोण पर चढ़ाई करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.125.1)
अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामः सुमहानभूत् । पर्जन्यसमनिर्घोषः पुनर्द्रोणस्य सोमकैः ॥
aparāhṇe mahārāja saṅgrāmaḥ sumahānabhūt | parjanyasamanirghoṣaḥ punardroṇasya somakaiḥ
हे महाराज, अपराह्न में द्रोण और सोमकों के बीच फिर बहुत बड़ा युद्ध छिड़ गया, जिसका नाद मेघ-गर्जन के समान था।
श्लोक 2 (7.125.2)
शोणाश्वं रथमास्थाय नरवीरः समाहितः । समरेऽभ्यद्रवत्पाण्डूञ्जवमास्थाय मध्यमम् ॥
śoṇāśvaṃ rathamāsthāya naravīraḥ samāhitaḥ | samare'bhyadravatpāṇḍūñjavamāsthāya madhyamam
वह नरवीर, सावधान और एकाग्र, लाल घोड़ों के रथ पर चढ़कर मध्यम गति से पाण्डवों पर टूट पड़ा।
श्लोक 3 (7.125.3)
तव प्रियहिते युक्तो महेष्वासो महाबलः । चित्रपुङ्खैः शितैर्बाणैः कलशोत्तमसम्भवः । जघान सोमकान्राजन्सृञ्जयान्केकयानपि ॥
tava priyahite yukto maheṣvāso mahābalaḥ | citrapuṅkhaiḥ śitairbāṇaiḥ kalaśottamasambhavaḥ | jaghāna somakānrājansṛñjayānkekayānapi
आपके प्रिय और हित में लगे हुए, श्रेष्ठ कलश से उत्पन्न उस महाबली महाधनुर्धर ने चित्र-पंखों वाले तीखे बाणों से, हे राजन्, सोमकों, सृञ्जयों और केकयों को भी मार गिराया।
श्लोक 4 (7.125.4)
वरान्वरान्हि योधानां विचिन्वन्निव भारत । आक्रीडत रणे राजन्भारद्वाजः प्रतापवान् ॥
varānvarānhi yodhānāṃ vicinvanniva bhārata | ākrīḍata raṇe rājanbhāradvājaḥ pratāpavān
हे भारत, मानो श्रेष्ठ-श्रेष्ठ योद्धाओं को चुनते हुए, प्रतापी भारद्वाज-पुत्र रण में क्रीड़ा करने लगे, हे राजन्।
श्लोक 5 (7.125.5)
तमभ्ययाद्बृहत्क्षत्रः केकयानां महारथः । भ्रातॄणां नृप पञ्चानां श्रेष्ठः समरकर्कशः ॥
tamabhyayādbṛhatkṣatraḥ kekayānāṃ mahārathaḥ | bhrātṝṇāṃ nṛpa pañcānāṃ śreṣṭhaḥ samarakarkaśaḥ
केकयों का महारथी बृहत्क्षत्र उनके सामने आया। हे राजन्, वह पाँच भाइयों में श्रेष्ठ और युद्ध में कठोर था।
श्लोक 6 (7.125.6)
विमुञ्चन्विशिखांस्तीक्ष्णानाचार्यं भृशमार्दयत् । महामेघो यथा वर्षं विमुञ्चन्गन्धमादने ॥
vimuñcanviśikhāṃstīkṣṇānācāryaṃ bhṛśamārdayat | mahāmegho yathā varṣaṃ vimuñcangandhamādane
तीखे बाण छोड़ते हुए उसने आचार्य को बहुत पीड़ित किया, जैसे बड़ा मेघ गन्धमादन पर वर्षा करता है।
श्लोक 7 (7.125.7)
तस्य द्रोणो महाराज स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् । प्रेषयामास सङ्क्रुद्धः सायकान्दश पञ्च च ॥
tasya droṇo mahārāja svarṇapuṅkhāñśilāśitān | preṣayāmāsa saṅkruddhaḥ sāyakāndaśa pañca ca
हे महाराज, क्रुद्ध द्रोण ने उस पर सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए पन्द्रह बाण छोड़े।
श्लोक 8 (7.125.8)
तांस्तु द्रोणविनिर्मुक्तान्क्रुद्धाशीविषसन्निभान् । एकैकं पञ्चभिर्बाणैर्युधि चिच्छेद हृष्टवत् ॥
tāṃstu droṇavinirmuktānkruddhāśīviṣasannibhān | ekaikaṃ pañcabhirbāṇairyudhi ciccheda hṛṣṭavat
पर द्रोण के छोड़े हुए, क्रुद्ध विषधर सर्पों जैसे उन बाणों में से प्रत्येक को उसने युद्ध में पाँच-पाँच बाणों से मानो हर्ष के साथ काट डाला।
श्लोक 9 (7.125.9)
तदस्य लाघवं दृष्ट्वा प्रहस्य द्विजपुङ्गवः । प्रेषयामास विशिखानष्टौ सन्नतपर्वणः ॥
tadasya lāghavaṃ dṛṣṭvā prahasya dvijapuṅgavaḥ | preṣayāmāsa viśikhānaṣṭau sannataparvaṇaḥ
उसकी यह फुर्ती देखकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण ने मुसकराकर सीधी गाँठों वाले आठ बाण छोड़े।
श्लोक 10 (7.125.10)
तान्दृष्ट्वा पततस्तूर्णं द्रोणचापच्युताञ्शरान् । अवारयच्छरैरेव तावद्भिर्निशितैर्मृधे ॥
tāndṛṣṭvā patatastūrṇaṃ droṇacāpacyutāñśarān | avārayaccharaireva tāvadbhirniśitairmṛdhe
द्रोण के धनुष से छूटे उन बाणों को तेज़ी से गिरते देख उसने उतने ही तीखे और दृढ़ बाणों से उन्हें रोक दिया।
श्लोक 11 (7.125.11)
ततोऽभवन्महाराज तव सैन्यस्य विस्मयः । बृहत्क्षत्रेण तत्कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ॥
tato'bhavanmahārāja tava sainyasya vismayaḥ | bṛhatkṣatreṇa tatkarma kṛtaṃ dṛṣṭvā suduṣkaram
तब, हे महाराज, बृहत्क्षत्र का किया हुआ वह अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर आपकी सेना विस्मय से भर गई।
श्लोक 12 (7.125.12)
ततो द्रोणो महाराज बृहत्क्षत्रं विशेषयन् । प्रादुश्चक्रे रणे दिव्यं ब्राह्ममस्त्रं सुदुर्जयम् ॥
tato droṇo mahārāja bṛhatkṣatraṃ viśeṣayan | prāduścakre raṇe divyaṃ brāhmamastraṃ sudurjayam
तब हे महाराज, द्रोण ने बृहत्क्षत्र से बढ़ जाने की इच्छा से रण में अत्यन्त दुर्जय दिव्य ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।
श्लोक 13 (7.125.13)
कैकेयोऽस्त्रं समालोक्य मुक्तं द्रोणेन संयुगे । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ब्राह्ममस्त्रमशातयत् ॥
kaikeyo'straṃ samālokya muktaṃ droṇena saṃyuge | brahmāstreṇaiva rājendra brāhmamastramaśātayat
हे राजेन्द्र, युद्ध में द्रोण के छोड़े हुए अस्त्र को देखकर कैकेय ने ब्रह्मास्त्र से ही उस ब्रह्मास्त्र को नष्ट कर दिया।
श्लोक 14 (7.125.14)
ततोऽस्त्रे निहते ब्राह्मे बृहत्क्षत्रस्तु भारत । विव्याध ब्राह्मणं षष्ट्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ॥
tato'stre nihate brāhme bṛhatkṣatrastu bhārata | vivyādha brāhmaṇaṃ ṣaṣṭyā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ
फिर ब्रह्मास्त्र के नष्ट हो जाने पर, हे भारत, बृहत्क्षत्र ने सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए साठ बाणों से ब्राह्मण द्रोण को बींध दिया।
श्लोक 15 (7.125.15)
तं द्रोणो द्विपदां श्रेष्ठो नाराचेन समार्पयत् । स तस्य कवचं भित्त्वा प्राविशद्धरणीतलम् ॥
taṃ droṇo dvipadāṃ śreṣṭho nārācena samārpayat | sa tasya kavacaṃ bhittvā prāviśaddharaṇītalam
द्विपदों में श्रेष्ठ द्रोण ने उस पर एक नाराच चलाया; वह उसके कवच को भेदकर भूमि में जा धँसा।
श्लोक 16 (7.125.16)
कृष्णसर्पो यथा मुक्तो वल्मीकं नृपसत्तम । तथाऽत्यगान्महीं बाणो भित्त्वा कैकेयमाहवे ॥
kṛṣṇasarpo yathā mukto valmīkaṃ nṛpasattama | tathā'tyagānmahīṃ bāṇo bhittvā kaikeyamāhave
हे नृपश्रेष्ठ, जैसे छूटा हुआ काला साँप बाँबी में घुस जाता है, वैसे ही वह बाण युद्ध में कैकेय को भेदकर पृथ्वी में चला गया।
श्लोक 17 (7.125.17)
सोऽतिविद्धो महाराज कैकेयो द्रोणसायकैः । क्रोधेन महताऽऽविष्टो व्यावृत्य नयने शुभे ॥
so'tividdho mahārāja kaikeyo droṇasāyakaiḥ | krodhena mahatā''viṣṭo vyāvṛtya nayane śubhe
हे महाराज, द्रोण के बाणों से बुरी तरह बिंधा हुआ कैकेय भारी क्रोध से भर गया और उसने अपनी सुन्दर आँखें घुमाईं।
श्लोक 18 (7.125.18)
द्रोणं विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । सारथिं चास्य बाणेन भृशं मर्मस्वताडयत् ॥
droṇaṃ vivyādha saptatyā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | sārathiṃ cāsya bāṇena bhṛśaṃ marmasvatāḍayat
उसने सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए सत्तर बाणों से द्रोण को बींधा और एक बाण से उनके सारथि को मर्म-स्थानों में गहरी चोट पहुँचाई।
श्लोक 19 (7.125.19)
द्रोणस्तु बहुभिर्विद्धो बृहत्क्षत्रेण मारिष । असृजद्विशिखांस्तीक्ष्णान्कैकेयस्य रथं प्रति ॥
droṇastu bahubhirviddho bṛhatkṣatreṇa māriṣa | asṛjadviśikhāṃstīkṣṇānkaikeyasya rathaṃ prati
किन्तु बृहत्क्षत्र के अनेक बाणों से बिंधे हुए द्रोण ने, हे मान्यवर, कैकेय के रथ पर तीखे बाण बरसाए।
श्लोक 20 (7.125.20)
व्याकुलीकृत्य तं द्रोणो बृहत्क्षत्रं महारथम् । अश्वांश्चतुर्भिर्न्यवधीच्चतुरोऽस्य पतत्त्रिभिः ॥
vyākulīkṛtya taṃ droṇo bṛhatkṣatraṃ mahāratham | aśvāṃścaturbhirnyavadhīccaturo'sya patattribhiḥ
महारथी बृहत्क्षत्र को व्याकुल करके द्रोण ने चार पंखदार बाणों से उसके चारों घोड़े मार डाले।
श्लोक 21 (7.125.21)
सूतं चैकेन बाणेन रथनीडादपातयत् । द्वाभ्यां ध्वजं च च्छत्रं च च्छित्त्वा भूमावपातयत् ॥
sūtaṃ caikena bāṇena rathanīḍādapātayat | dvābhyāṃ dhvajaṃ ca cchatraṃ ca cchittvā bhūmāvapātayat
एक बाण से उसके सारथि को रथ के आसन से गिरा दिया और दो बाणों से उसकी ध्वजा और छत्र को काटकर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 22 (7.125.22)
ततः साधुविसृष्टेन नाराचेन द्विजर्षभः । हृद्यविध्यद्बृहत्क्षत्रं स च्छिन्नहृदयोऽपतत् ॥
tataḥ sādhuvisṛṣṭena nārācena dvijarṣabhaḥ | hṛdyavidhyadbṛhatkṣatraṃ sa cchinnahṛdayo'patat
तब द्विजश्रेष्ठ ने भली-भाँति चलाए हुए नाराच से बृहत्क्षत्र के हृदय को बींध दिया, और वह विदीर्ण हृदय होकर गिर पड़ा।
श्लोक 23 (7.125.23)
बृहत्क्षत्रे हते राजन्केकयानां महारथे । शैशुपालिरभिक्रुद्धो यन्तारमिदमब्रवीत् ॥
bṛhatkṣatre hate rājankekayānāṃ mahārathe | śaiśupālirabhikruddho yantāramidamabravīt
केकयों के महारथी बृहत्क्षत्र के मारे जाने पर शिशुपाल का पुत्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने सारथि से यह बोला।
श्लोक 24 (7.125.24)
सारथे याहि यत्रैष द्रोणस्तिष्ठति दंशितः । विनिघ्नन्केकयान्सर्वान्पाञ्चालानां च वाहिनीं ॥
sārathe yāhi yatraiṣa droṇastiṣṭhati daṃśitaḥ | vinighnankekayānsarvānpāñcālānāṃ ca vāhinīṃ
"सारथि, वहाँ चलो जहाँ कवच पहने द्रोण खड़ा है और सब केकयों तथा पाञ्चालों की सेना को काट रहा है।"
श्लोक 25 (7.125.25)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सारथी रथिनां वरम् । द्रोणाय प्रापयामास काम्भोजैर्जवनैर्हयैः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā sārathī rathināṃ varam | droṇāya prāpayāmāsa kāmbhojairjavanairhayaiḥ
उसकी बात सुनकर सारथि ने काम्भोज देश के वेगवान घोड़ों से उस रथियों में श्रेष्ठ को द्रोण के पास पहुँचा दिया।
श्लोक 26 (7.125.26)
धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः । वधायाभ्यद्रवद्द्रोणं पतङ्ग इव पावकम् ॥
dhṛṣṭaketuśca cedīnāmṛṣabho'tibaloditaḥ | vadhāyābhyadravaddroṇaṃ pataṅga iva pāvakam
और चेदियों का वृषभ धृष्टकेतु, अपार बल से उमड़ता हुआ, पतंगे की तरह आग पर, द्रोण को मारने के लिए उन पर झपटा।
श्लोक 27 (7.125.27)
सोऽविध्यत तदा द्रोणं षष्ट्या साश्वरथध्वजम् । पुनश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुप्तं व्याघ्रं तुदन्निव ॥
so'vidhyata tadā droṇaṃ ṣaṣṭyā sāśvarathadhvajam | punaścānyaiḥ śaraistīkṣṇaiḥ suptaṃ vyāghraṃ tudanniva
तब उसने घोड़ों, रथ और ध्वजा सहित द्रोण को साठ बाणों से बींधा, और फिर और भी तीखे बाणों से, जैसे सोए हुए बाघ को कोई कोंचे।
श्लोक 28 (7.125.28)
तस्य द्रोणो धनुर्मध्ये क्षुरप्रेण शितेन च । चकर्त गार्ध्रपत्रेण यतमानस्य शुष्मिणः ॥
tasya droṇo dhanurmadhye kṣurapreṇa śitena ca | cakarta gārdhrapatreṇa yatamānasya śuṣmiṇaḥ
द्रोण ने तीखे, गीध के पंखों वाले क्षुरप्र बाण से उस बलवान के प्रयत्न करते-करते उसके धनुष को बीच से काट डाला।
श्लोक 29 (7.125.29)
अथान्यद्धनुरादाय शैशुपालिर्महारथः । विव्याध सायकैर्द्रोणं कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥
athānyaddhanurādāya śaiśupālirmahārathaḥ | vivyādha sāyakairdroṇaṃ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ
तब शिशुपाल-पुत्र महारथी ने दूसरा धनुष लेकर कंक और मोर के पंखों से सजे बाणों से द्रोण को बींधा।
श्लोक 30 (7.125.30)
तस्य द्रोणो हयान्हत्वा चतुर्भिश्चतुरः शरैः । सारथेश्च शिरः कायाच्चकर्त प्रहसन्निव ॥
tasya droṇo hayānhatvā caturbhiścaturaḥ śaraiḥ | sāratheśca śiraḥ kāyāccakarta prahasanniva
द्रोण ने चार बाणों से उसके चारों घोड़े मार डाले और मानो हँसते हुए उसके सारथि का सिर धड़ से काट दिया।
श्लोक 31 (7.125.31)
अथैनं पञ्चविंशत्या सायकानां समार्पयत् ॥
athainaṃ pañcaviṃśatyā sāyakānāṃ samārpayat
फिर उन्होंने उसे पच्चीस बाणों से मारा।
श्लोक 32 (7.125.32)
अवप्लुत्य रथाच्चैद्यो गदामादाय सत्वरः । भारद्वाजाय चिक्षेप रुषितामिव पन्नगीम् ॥
avaplutya rathāccaidyo gadāmādāya satvaraḥ | bhāradvājāya cikṣepa ruṣitāmiva pannagīm
रथ से कूदकर चेदि-राजकुमार ने शीघ्रता से गदा उठाई और क्रुद्ध सर्पिणी की तरह उसे भारद्वाज-पुत्र की ओर फेंका।
श्लोक 33 (7.125.33)
तामापतन्तीमालोक्य कालरात्रिमिवोद्यताम् । अश्मसारमयीं गुर्वीं तपनीयविभूषिताम् । शरैरनेकसाहस्रैर्भारद्वाजोऽच्छिनच्छितैः ॥
tāmāpatantīmālokya kālarātrimivodyatām | aśmasāramayīṃ gurvīṃ tapanīyavibhūṣitām | śarairanekasāhasrairbhāradvājo'cchinacchitaiḥ
कालरात्रि की तरह उठी हुई, भारी, लोहे की बनी और सोने से सजी उस गदा को अपनी ओर आते देख भारद्वाज-पुत्र ने अनेक हज़ार तीखे बाणों से उसे काट डाला।
श्लोक 34 (7.125.34)
सा छिन्ना बहुभिर्बाणैर्भारद्वाजेन मारिष । गदा पपात कौरव्य नादयन्ती धरातलम् ॥
sā chinnā bahubhirbāṇairbhāradvājena māriṣa | gadā papāta kauravya nādayantī dharātalam
हे मान्यवर, भारद्वाज-पुत्र के बहुत-से बाणों से कटी हुई वह गदा, हे कौरव्य, भूमि को गुँजाती हुई गिर पड़ी।
श्लोक 35 (7.125.35)
गदां विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टकेतुरमर्षणः । तोमरं व्यसृजद्वीरः शक्तिं च कनकोज्ज्वलाम् ॥
gadāṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭaketuramarṣaṇaḥ | tomaraṃ vyasṛjadvīraḥ śaktiṃ ca kanakojjvalām
अपनी गदा को नष्ट हुआ देखकर क्रोध से भरे वीर धृष्टकेतु ने एक तोमर और सोने से चमकती हुई शक्ति फेंकी।
श्लोक 36 (7.125.36)
तोमरं पञ्चभिर्भित्त्वा शक्तिं चिच्छेद पञ्चभिः । तौ जग्मतुर्महीं छिन्नौ सर्पाविव गरुत्मता ॥
tomaraṃ pañcabhirbhittvā śaktiṃ ciccheda pañcabhiḥ | tau jagmaturmahīṃ chinnau sarpāviva garutmatā
द्रोण ने तोमर को पाँच बाणों से भेदा और शक्ति को पाँच से काट डाला; गरुड़ के मारे हुए दो सर्पों की तरह वे दोनों कटकर भूमि पर जा गिरे।
श्लोक 37 (7.125.37)
ततोऽस्य विशिखं तीक्ष्णं वधाय वधकाङ्क्षिणः । प्रेषयामास समरे भारद्वाजः प्रतापवान् ॥
tato'sya viśikhaṃ tīkṣṇaṃ vadhāya vadhakāṅkṣiṇaḥ | preṣayāmāsa samare bhāradvājaḥ pratāpavān
तब उसे मार डालने की इच्छा से प्रतापी भारद्वाज-पुत्र ने रण में उसके वध के लिए एक तीखा बाण छोड़ा।
श्लोक 38 (7.125.38)
स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजसः । अभ्यगाद्धरणीं बाणो हंसः पद्मवनं यथा ॥
sa tasya kavacaṃ bhittvā hṛdayaṃ cāmitaujasaḥ | abhyagāddharaṇīṃ bāṇo haṃsaḥ padmavanaṃ yathā
वह बाण अपार तेज वाले उस वीर के कवच और हृदय को भेदकर भूमि में जा गिरा, जैसे हंस कमल-वन में उतरता है।
श्लोक 39 (7.125.39)
पतङ्गं हि ग्रसेच्चाषो यथा क्षुद्रं बुभुक्षितः । तथा द्रोणोऽग्रसच्छूरो धृष्टकेतुं महाहवे ॥
pataṅgaṃ hi graseccāṣo yathā kṣudraṃ bubhukṣitaḥ | tathā droṇo'grasacchūro dhṛṣṭaketuṃ mahāhave
जैसे भूखा नीलकण्ठ किसी छोटे पतंगे को निगल जाता है, वैसे ही वीर द्रोण ने उस महायुद्ध में धृष्टकेतु को निगल लिया।
श्लोक 40 (7.125.40)
निहते चेदिराजे तु तत्खण्डं पित्र्यमाविशत् । अमर्षवशमापन्नः पुत्रोऽस्य परमास्त्रवित् ॥
nihate cedirāje tu tatkhaṇḍaṃ pitryamāviśat | amarṣavaśamāpannaḥ putro'sya paramāstravit
चेदिराज के मारे जाने पर उसका पुत्र, जो परम अस्त्रों का ज्ञाता था, क्रोध के वश में आ गया और अपने पिता के हिस्से का युद्ध उसने सँभाल लिया।
श्लोक 41 (7.125.41)
तमपि प्रहसन्द्रोणः शरैर्निन्ये यमक्षयम् । महाव्याघ्रो महारण्ये मृगशावं यथा बली ॥
tamapi prahasandroṇaḥ śarairninye yamakṣayam | mahāvyāghro mahāraṇye mṛgaśāvaṃ yathā balī
हँसते हुए द्रोण ने उसे भी बाणों से यमलोक पहुँचा दिया, जैसे विशाल वन में बलवान बाघ मृग-शावक को मारता है।
श्लोक 42 (7.125.42)
तेषु प्रक्षीयमाणेषु पाण्डवेयेषु भारत । जरासन्धसुतो वीरः स्वयं द्रोणमुपाद्रवत् ॥
teṣu prakṣīyamāṇeṣu pāṇḍaveyeṣu bhārata | jarāsandhasuto vīraḥ svayaṃ droṇamupādravat
हे भारत, उन पाण्डव-योद्धाओं के नष्ट होते समय जरासन्ध का पुत्र वीर स्वयं द्रोण पर टूट पड़ा।
श्लोक 43 (7.125.43)
स तु द्रोणं महाबाहुः शरधाराभिराहवे । अदृश्यमकरोत्तूर्णं जलदो भास्करं यथा ॥
sa tu droṇaṃ mahābāhuḥ śaradhārābhirāhave | adṛśyamakarottūrṇaṃ jalado bhāskaraṃ yathā
उस महाबाहु ने रण में बाणों की धाराओं से द्रोण को ढक दिया और शीघ्र ही उन्हें ऐसा अदृश्य कर दिया जैसे बादल सूर्य को कर देता है।
श्लोक 44 (7.125.44)
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । व्यसृजत्सायकांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tasya tallāghavaṃ dṛṣṭvā droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ | vyasṛjatsāyakāṃstūrṇaṃ śataśo'tha sahasraśaḥ
उसकी फुर्ती देखकर क्षत्रियों का मर्दन करने वाले द्रोण ने सैकड़ों और हज़ारों बाण तेज़ी से छोड़े।
श्लोक 45 (7.125.45)
छादयित्वा रणे द्रोणो रथस्थं रथिनां वरम् । जारासन्धिं जघानाशु मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
chādayitvā raṇe droṇo rathasthaṃ rathināṃ varam | jārāsandhiṃ jaghānāśu miṣatāṃ sarvadhanvinām
रण में रथ पर बैठे उस रथी-श्रेष्ठ को ढककर द्रोण ने सब धनुर्धारियों के देखते-देखते जरासन्ध के पुत्र को शीघ्र ही मार डाला।
श्लोक 46 (7.125.46)
योयो विधीयते खण्डस्तंतं द्रोणोऽन्तकोपमः । आदत्त सर्वभूतानि प्राप्ते काले यथान्तकः ॥
yoyo vidhīyate khaṇḍastaṃtaṃ droṇo'ntakopamaḥ | ādatta sarvabhūtāni prāpte kāle yathāntakaḥ
जो-जो टुकड़ी उसके सामने डाली गई, यमराज के समान द्रोण ने उसे-उसे समेट लिया, जैसे समय आने पर यम सब प्राणियों को समेट लेता है।
श्लोक 47 (7.125.47)
ततो द्रोणो महाराज नाम विश्राव्य संयुगे । शरैरनेकसाहस्रैः पाण्डवेयान्समावृणोत् ॥
tato droṇo mahārāja nāma viśrāvya saṃyuge | śarairanekasāhasraiḥ pāṇḍaveyānsamāvṛṇot
तब, हे महाराज, युद्ध में अपना नाम सुनाकर द्रोण ने अनेक हज़ार बाणों से पाण्डव-योद्धाओं को ढक दिया।
श्लोक 48 (7.125.48)
ते तु नामाङ्किता बाणा द्रोणेनास्ताः शिलाशिताः । नरान्नागान्हयांश्चैव निजघ्नुः शतशो मृधे ॥
te tu nāmāṅkitā bāṇā droṇenāstāḥ śilāśitāḥ | narānnāgānhayāṃścaiva nijaghnuḥ śataśo mṛdhe
द्रोण के छोड़े हुए, उनके नाम से अंकित और शिला पर तेज़ किए हुए वे बाण युद्ध में सैकड़ों मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों को मारने लगे।
श्लोक 49 (7.125.49)
ते वध्यमाना द्रोणेन शक्रेणेव महासुराः । समकम्पन्त पाञ्चाला गावः शीतार्दिता इव ॥
te vadhyamānā droṇena śakreṇeva mahāsurāḥ | samakampanta pāñcālā gāvaḥ śītārditā iva
जैसे इन्द्र के हाथों महान् असुर मारे जाते हैं, वैसे ही द्रोण के हाथों मारे जाते हुए पाञ्चाल काँप उठे, जैसे सर्दी से पीड़ित गायें।
श्लोक 50 (7.125.50)
ततो निष्टानको घोरः पाण्डवानामजायत । द्रोणेन वध्यमानेषु सैन्येषु भरतर्षभ ॥
tato niṣṭānako ghoraḥ pāṇḍavānāmajāyata | droṇena vadhyamāneṣu sainyeṣu bharatarṣabha
तब, हे भरतश्रेष्ठ, द्रोण के हाथों सेनाओं के कटते समय पाण्डवों में भयंकर आर्तनाद उठा।
श्लोक 51 (7.125.51)
प्रताप्यमानाः सूर्येण हन्यमानाश्च सायकैः । अन्वपद्यन्त पाञ्चालास्तदा सन्त्रस्तचेतसः ॥
pratāpyamānāḥ sūryeṇa hanyamānāśca sāyakaiḥ | anvapadyanta pāñcālāstadā santrastacetasaḥ
सूर्य के ताप से तपे और बाणों से मारे जाते हुए पाञ्चाल तब भय से व्याकुल चित्त लिए उन पर चढ़े चले आए।
श्लोक 52 (7.125.52)
मोहिता बाणजालेन भारद्वाजेन संयुगे । ऊरुग्राहगृहीतानां पाञ्चालानां महारथाः ॥
mohitā bāṇajālena bhāradvājena saṃyuge | ūrugrāhagṛhītānāṃ pāñcālānāṃ mahārathāḥ
रण में भारद्वाज-पुत्र के बाण-जाल से मोहित हुए पाञ्चालों के महारथियों को ऊरु-स्तम्भ ने जकड़ लिया।
श्लोक 53 (7.125.53)
चेदयश्च महाराज सृञ्जयाः काशिकोसलाः । अभ्यद्रवन्त संहृष्टा भारद्वाजं युयुत्सया ॥
cedayaśca mahārāja sṛñjayāḥ kāśikosalāḥ | abhyadravanta saṃhṛṣṭā bhāradvājaṃ yuyutsayā
हे महाराज, चेदि, सृञ्जय, काशी और कोसल के योद्धा हर्ष से भरकर लड़ने की इच्छा से भारद्वाज-पुत्र पर टूट पड़े।
श्लोक 54 (7.125.54)
ब्रुवन्तश्च रणेऽन्योन्यं चेदिपाञ्चालसृञ्जयाः । हत द्रोणं हत द्रोणमिति ते द्रोणमभ्ययुः ॥
bruvantaśca raṇe'nyonyaṃ cedipāñcālasṛñjayāḥ | hata droṇaṃ hata droṇamiti te droṇamabhyayuḥ
रण में एक-दूसरे को पुकारते हुए चेदि, पाञ्चाल और सृञ्जय "द्रोण को मारो! द्रोण को मारो!" कहते हुए उन पर चढ़ आए।
श्लोक 55 (7.125.55)
यतन्तः पुरुपव्याघ्राः सर्वशक्त्या महाद्युतिम् । निनीपवो रणे द्रोणं यमस्य सदनं प्रति ॥
yatantaḥ purupavyāghrāḥ sarvaśaktyā mahādyutim | ninīpavo raṇe droṇaṃ yamasya sadanaṃ prati
वे पुरुष-व्याघ्र अपनी पूरी शक्ति से यत्न करते हुए महातेजस्वी द्रोण को रण में यमलोक पहुँचा देना चाहते थे।
श्लोक 56 (7.125.56)
यतमानांस्तु तान्वीरान्भारद्वाजः शिलीमुखैः । यमाय प्रेषयामास चेदिमुख्यान्विशेषतः ॥
yatamānāṃstu tānvīrānbhāradvājaḥ śilīmukhaiḥ | yamāya preṣayāmāsa cedimukhyānviśeṣataḥ
पर प्रयत्न करते हुए उन वीरों को भारद्वाज-पुत्र ने बाणों से यमलोक भेज दिया, विशेषकर चेदियों के प्रमुख योद्धाओं को।
श्लोक 57 (7.125.57)
तेषु प्रक्षीयमाणेषु चेदिमुख्येषु सर्वशः । पाञ्चालाः समकम्पन्त द्रोणसायकपीडिताः ॥
teṣu prakṣīyamāṇeṣu cedimukhyeṣu sarvaśaḥ | pāñcālāḥ samakampanta droṇasāyakapīḍitāḥ
चेदियों के प्रमुख योद्धाओं के चारों ओर नष्ट होने पर द्रोण के बाणों से पीड़ित पाञ्चाल काँप उठे।
श्लोक 58 (7.125.58)
प्राक्रोशन्भीमसेनं ते धृष्टद्युम्नं च भारत । दृष्ट्वा द्रोणस्य कर्माणि तथारूपाणि मारिष ॥
prākrośanbhīmasenaṃ te dhṛṣṭadyumnaṃ ca bhārata | dṛṣṭvā droṇasya karmāṇi tathārūpāṇi māriṣa
हे भारत, द्रोण के ऐसे कर्म देखकर वे भीमसेन और धृष्टद्युम्न को पुकारने लगे, हे मान्यवर।
भीम उवाच
श्लोक 59 (7.125.59)
ब्राह्मणेन तपो नूनं चरितं दुश्चरं महत् । तथा हि युधि सङ्क्रुद्धो दहति क्षत्रियर्षभान् ॥
brāhmaṇena tapo nūnaṃ caritaṃ duścaraṃ mahat | tathā hi yudhi saṅkruddho dahati kṣatriyarṣabhān
"निश्चय ही इस ब्राह्मण ने बड़ा कठिन तप किया है, क्योंकि युद्ध में क्रुद्ध होकर वह श्रेष्ठ क्षत्रियों को जला रहा है।
श्लोक 60 (7.125.60)
धर्मो युद्धं क्षत्रियस्य ब्राह्मणस्य परं तपः । तपस्वी कृतविद्यश्च प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ॥
dharmo yuddhaṃ kṣatriyasya brāhmaṇasya paraṃ tapaḥ | tapasvī kṛtavidyaśca prekṣitenāpi nirdahet
युद्ध क्षत्रिय का धर्म है और तप ब्राह्मण का परम धर्म। तपस्वी, और वह भी विद्वान्, केवल दृष्टि से ही भस्म कर सकता है।
श्लोक 61 (7.125.61)
द्रोणाग्निमस्त्रसंस्पर्शं प्रविष्टाः क्षत्रियर्षभाः । बहवो दुस्तरं घोरं यत्रादह्यन्त भारत ॥
droṇāgnimastrasaṃsparśaṃ praviṣṭāḥ kṣatriyarṣabhāḥ | bahavo dustaraṃ ghoraṃ yatrādahyanta bhārata
हे भारत, अस्त्रों के स्पर्श वाली द्रोण-रूपी उस दुस्तर और भयंकर अग्नि में प्रवेश करके बहुत-से श्रेष्ठ क्षत्रिय जल गए हैं।
श्लोक 62 (7.125.62)
यथाबलं यथोत्साहं यथासत्वं महाद्युतिः । मोहयन्सर्वभूतानि द्रोणो हन्ति बलानि नः ॥
yathābalaṃ yathotsāhaṃ yathāsatvaṃ mahādyutiḥ | mohayansarvabhūtāni droṇo hanti balāni naḥ
अपने बल, उत्साह और सामर्थ्य के अनुसार वह महातेजस्वी द्रोण सब प्राणियों को मोहित करता हुआ हमारी सेनाओं का संहार कर रहा है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 63 (7.125.63)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्षत्रधर्मा व्यवस्थितः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद द्रोणस्य सशरं धनुः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā kṣatradharmā vyavasthitaḥ | ardhacandreṇa ciccheda droṇasya saśaraṃ dhanuḥ
उसकी बात सुनकर क्षत्रधर्मा दृढ़ होकर डट गया और उसने अर्धचन्द्र बाण से द्रोण के बाण-सहित धनुष को काट डाला।
श्लोक 64 (7.125.64)
स संरब्धतरो भूत्वा द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ॥
sa saṃrabdhataro bhūtvā droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ
क्षत्रियों का मर्दन करने वाले द्रोण और भी अधिक क्रुद्ध हो गए।
श्लोक 65 (7.125.65)
अन्यत्कार्मुकमादाय भास्वरं वेगवत्तरम् । तत्राधाय शरं तीक्ष्णं परानीकविशातनम् ॥
anyatkārmukamādāya bhāsvaraṃ vegavattaram | tatrādhāya śaraṃ tīkṣṇaṃ parānīkaviśātanam
उन्होंने दूसरा चमकता हुआ, अधिक वेगवान धनुष लिया और उस पर शत्रु-सेना को तितर-बितर करने वाला तीखा बाण चढ़ाया;
श्लोक 66 (7.125.66)
आकर्णपूर्णमाचार्यो बलवानभ्यवासृजत् । स हत्वा क्षत्रधर्माणं जगाम धरणीतलम् ॥
ākarṇapūrṇamācāryo balavānabhyavāsṛjat | sa hatvā kṣatradharmāṇaṃ jagāma dharaṇītalam
बलवान आचार्य ने उसे कान तक खींचकर छोड़ा; क्षत्रधर्मा को मारकर वह बाण भूमि में जा धँसा।
श्लोक 67 (7.125.67)
स भिन्नहृदयो वाहान्न्यपतन्मेदिनीतले । ततः सैन्यान्यकम्पन्त धृष्टद्युम्नसुते हते ॥
sa bhinnahṛdayo vāhānnyapatanmedinītale | tataḥ sainyānyakampanta dhṛṣṭadyumnasute hate
विदीर्ण हृदय होकर वह रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। धृष्टद्युम्न के पुत्र के मारे जाने पर सेनाएँ काँप उठीं।
श्लोक 68 (7.125.68)
अथ द्रोणं समारोहच्चेकितानो महाबलः । स द्रोणं दशभिर्विद्ध्वा प्रत्यविद्ध्यत्स्तनान्तरे ॥
atha droṇaṃ samārohaccekitāno mahābalaḥ | sa droṇaṃ daśabhirviddhvā pratyaviddhyatstanāntare
तब महाबली चेकितान ने द्रोण पर चढ़ाई की और उन्हें दस बाणों से बींधकर उनके वक्ष पर वार किया।
श्लोक 69 (7.125.69)
चतुर्भिः सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् । तमाचार्यस्त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्दयत् ॥
caturbhiḥ sārathiṃ cāsya caturbhiścaturo hayān | tamācāryastribhirbāṇairbāhvorurasi cārdayat
उसने उनके सारथि को चार बाणों से और चारों घोड़ों को चार बाणों से मारा; आचार्य ने उसे तीन बाणों से भुजाओं और छाती में पीड़ित किया।
श्लोक 70 (7.125.70)
ध्वजं सप्तभिरुन्मथ्य यन्तारमवधीत्त्रिभिः । तस्य सूते हते तेऽश्वा रथमादाय विद्रुताः ॥
dhvajaṃ saptabhirunmathya yantāramavadhīttribhiḥ | tasya sūte hate te'śvā rathamādāya vidrutāḥ
द्रोण ने सात बाणों से उसकी ध्वजा तोड़ दी और तीन से उसके सारथि को मार डाला; सारथि के मारे जाने पर घोड़े रथ को लेकर भाग निकले।
श्लोक 71 (7.125.71)
समरे शरसंवीता भारद्वाजेन मारिष । चेकितानरथं दृष्ट्वा हताश्वं हतसारथिम् ॥
samare śarasaṃvītā bhāradvājena māriṣa | cekitānarathaṃ dṛṣṭvā hatāśvaṃ hatasārathim
हे मान्यवर, रण में भारद्वाज-पुत्र के बाणों से ढके हुए, घोड़े और सारथि मारे जाने वाले चेकितान के रथ को देखकर,
श्लोक 72 (7.125.72)
तान्समेतान्रणे शूरांश्चेदिपाञ्चालसृञ्जयान् । समन्ताद्द्रावयन्द्रोणो बह्वशोभत मारिष ॥
tānsametānraṇe śūrāṃścedipāñcālasṛñjayān | samantāddrāvayandroṇo bahvaśobhata māriṣa
द्रोण, एकत्र हुए उन चेदि, पाञ्चाल और सृञ्जय वीरों को चारों ओर खदेड़ते हुए, हे मान्यवर, बहुत शोभित हुए।
श्लोक 73 (7.125.73)
आकर्णपलितः श्यामो वयसाऽशीतिपञ्चकः । रणे पर्यचरद्द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥
ākarṇapalitaḥ śyāmo vayasā'śītipañcakaḥ | raṇe paryacaraddroṇo vṛddhaḥ ṣoḍaśavarṣavat
कानों तक पके केशों वाले, श्याम वर्ण के, पचासी वर्ष की आयु के द्रोण रण में सोलह वर्ष के तरुण की तरह विचर रहे थे।
श्लोक 74 (7.125.74)
अथ द्रोणं महाराज विचरन्तमभीतवत् । वज्रहस्तममन्यन्त शत्रवः शत्रुसूदनम् ॥
atha droṇaṃ mahārāja vicarantamabhītavat | vajrahastamamanyanta śatravaḥ śatrusūdanam
तब, हे महाराज, निर्भय विचरते हुए शत्रु-संहारक द्रोण को शत्रु वज्रधारी इन्द्र के समान समझने लगे।
श्लोक 75 (7.125.75)
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्द्रुपदो बुद्धिमान्नृप । लुब्धोऽयं क्षत्रियान्हन्ति व्याघ्रः क्षुद्रमृगानिव ॥
tato'bravīnmahābāhurdrupado buddhimānnṛpa | lubdho'yaṃ kṣatriyānhanti vyāghraḥ kṣudramṛgāniva
तब बुद्धिमान महाबाहु द्रुपद ने, हे राजन्, कहा, "यह लोभी क्षत्रियों को वैसे ही मार रहा है जैसे बाघ छोटे मृगों को मारता है।
द्रुपद उवाच
श्लोक 76 (7.125.76)
कृच्छ्रान्दुर्योधनो लोकान्पापः प्राप्स्यति दुर्मतिः । यस्य लोभाद्विनिहताः समरे क्षत्रियर्षभाः ॥
kṛcchrānduryodhano lokānpāpaḥ prāpsyati durmatiḥ | yasya lobhādvinihatāḥ samare kṣatriyarṣabhāḥ
पापी और दुर्बुद्धि दुर्योधन कष्टमय लोकों को प्राप्त होगा, जिसके लोभ से श्रेष्ठ क्षत्रिय युद्ध में मारे गए हैं।
श्लोक 77 (7.125.77)
शतशः शेरते भूमौ निकृत्ता गोवृषा इव । रुधिरेण परीताङ्गाः श्वशृगालादनीकृताः ॥
śataśaḥ śerate bhūmau nikṛttā govṛṣā iva | rudhireṇa parītāṅgāḥ śvaśṛgālādanīkṛtāḥ
वे सैकड़ों की संख्या में कटे हुए बैलों की तरह भूमि पर पड़े हैं, उनके अंग रक्त से भीगे हैं और कुत्ते-सियार उन्हें खा रहे हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 78 (7.125.78)
एवमुक्त्वा महाराज द्रुपदोऽक्षौहिणीपतिः । पुरस्कृत्य रणे पार्थान्द्रोणमभ्यद्रवद्द्रुतम् ॥
evamuktvā mahārāja drupado'kṣauhiṇīpatiḥ | puraskṛtya raṇe pārthāndroṇamabhyadravaddrutam
ऐसा कहकर, हे महाराज, अक्षौहिणी के स्वामी द्रुपद पार्थों को आगे करके रण में शीघ्रता से द्रोण पर टूट पड़े।