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द्रोण पर्व · अध्याय 126

युधिष्ठिर का भीम को अर्जुन और सात्यकि की खोज में भेजना

पाण्डव-व्यूहों के छिन्न-भिन्न हो जाने और द्रोण के प्रचण्ड संहार के बीच युधिष्ठिर को न अर्जुन दिखते हैं, न कृष्ण, न सात्यकि। भाई की ही खोज करने और सात्यकि की न करने से लोकनिन्दा के भय के कारण वे भीम को उनके पीछे भेजने का निश्चय करते हैं और रथ भीम के पास ले चलने को कहते हैं। पाञ्चजन्य का घोष सुनकर वे विषाद में डूब जाते हैं, भीम से कहते हैं कि अर्जुन कहीं मारे न गए हों, और उन्हें आज्ञा देते हैं कि जहाँ अर्जुन और सात्यकि गए हैं वहाँ जाएँ और उन्हें सकुशल देखकर सिंहनाद से सूचना दें।

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.126.1)

व्यूहेष्वालोड्यमानेषु पाण्डवानां ततस्ततः । सुदूरमन्वयुः पार्थाः पाञ्चालाः सह सोमकैः ॥

vyūheṣvāloḍyamāneṣu pāṇḍavānāṃ tatastataḥ | sudūramanvayuḥ pārthāḥ pāñcālāḥ saha somakaiḥ

पाण्डवों के व्यूह जब जहाँ-तहाँ उलट-पुलट किए जा रहे थे, तब पार्थ, पाञ्चाल और सोमक बहुत दूर तक शत्रुओं का पीछा करते चले गए।

श्लोक 2 (7.126.2)

वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामे रोमहर्षणे । सङ्क्षये जगतस्तीव्रे युगान्त इव भारत ॥

vartamāne tathā raudre saṅgrāme romaharṣaṇe | saṅkṣaye jagatastīvre yugānta iva bhārata

हे भारत! जब वह भयंकर, रोमांचकारी संग्राम चल रहा था, जो युग के अन्त में होने वाले जगत् के संहार के समान तीव्र था,

श्लोक 3 (7.126.3)

द्रोणे युधि पराक्रान्ते नर्दमाने मुहुर्मुहुः । पाञ्चालेषु च क्षीणेषु वध्यमानेषु पाण्डुषु ॥

droṇe yudhi parākrānte nardamāne muhurmuhuḥ | pāñcāleṣu ca kṣīṇeṣu vadhyamāneṣu pāṇḍuṣu

द्रोण युद्ध में प्रचण्ड पराक्रम दिखाते हुए बार-बार गरज रहे थे, पाञ्चाल क्षीण हो रहे थे और पाण्डव मारे जा रहे थे,

श्लोक 4 (7.126.4)

नापश्यच्छरणं कञ्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः । चिन्तयामास राजेन्द्र कथमेतद्भविष्यति ॥

nāpaśyaccharaṇaṃ kañciddharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | cintayāmāsa rājendra kathametadbhaviṣyati

तब धर्मराज युधिष्ठिर को कहीं कोई शरण नहीं दिखाई दी। हे राजेन्द्र! वे सोचने लगे — "यह सब कैसे होगा?"

श्लोक 5 (7.126.5)

ततो विक्ष्य दिशः सर्वाः सव्यसाचिदिदृक्षया । युधिष्ठिरो ददर्शाथ नैव पार्थं न माधवम् ॥

tato vikṣya diśaḥ sarvāḥ savyasācididṛkṣayā | yudhiṣṭhiro dadarśātha naiva pārthaṃ na mādhavam

फिर सव्यसाची को देखने की इच्छा से सब दिशाओं में दृष्टि डालने पर भी युधिष्ठिर को न पार्थ दिखाई दिए, न माधव।

श्लोक 6 (7.126.6)

सोऽपश्यन्नरशार्दूलं वानरर्षभलक्षणम् । गाण्डीवस्य च निर्घोषमशृण्वन्व्यथितेन्द्रियः ॥

so'paśyannaraśārdūlaṃ vānararṣabhalakṣaṇam | gāṇḍīvasya ca nirghoṣamaśṛṇvanvyathitendriyaḥ

जिनकी ध्वजा पर श्रेष्ठ वानर का चिह्न है, उन नरश्रेष्ठ अर्जुन को वे नहीं देख पाए और गाण्डीव की टंकार भी नहीं सुन पाए; इससे उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं।

श्लोक 7 (7.126.7)

अपश्यन्सात्यकिं चापि वृष्णीनां प्रवरं रथम् । चिन्तयाभिपरीताङ्गो धर्मराजो युधिष्ठिरः । नाध्यगच्छत्तदा शान्तिं तावपश्यन्नरोत्तमौ ॥

apaśyansātyakiṃ cāpi vṛṣṇīnāṃ pravaraṃ ratham | cintayābhiparītāṅgo dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | nādhyagacchattadā śāntiṃ tāvapaśyannarottamau

वृष्णियों के उस श्रेष्ठ रथी सात्यकि को भी वे नहीं देख पाए। चिन्ता से घिरे धर्मराज युधिष्ठिर को तब शान्ति नहीं मिली, क्योंकि वे उन दोनों नरश्रेष्ठों को देख नहीं पा रहे थे।

श्लोक 8 (7.126.8)

लोकोपक्रोशभीरुत्वाद्धर्मराजो महामनाः । अचिन्तयन्महाबाहुः शैनेयस्य रथं प्रति ॥

lokopakrośabhīrutvāddharmarājo mahāmanāḥ | acintayanmahābāhuḥ śaineyasya rathaṃ prati

लोकनिन्दा के भय से महामना, महाबाहु धर्मराज का ध्यान शैनेय (सात्यकि) के रथ की ओर गया।

श्लोक 9 (7.126.9)

पदवीं प्रेषितश्चैव फल्गुनस्य मया रणे । शैनेयः सात्यकिः सत्यो मित्राणामभयङ्करः ॥

padavīṃ preṣitaścaiva phalgunasya mayā raṇe | śaineyaḥ sātyakiḥ satyo mitrāṇāmabhayaṅkaraḥ

"मैंने रण में सत्यनिष्ठ शैनेय सात्यकि को, जो मित्रों का भय हरने वाला है, फल्गुन के पदचिह्नों पर भेजा था।

श्लोक 10 (7.126.10)

तदिदं ह्येकमेवासीद्द्विधा जातं ममाऽद्य वै । सात्यकिश्च हि विज्ञेयः पाण्डवश्च धनञ्जयः ॥

tadidaṃ hyekamevāsīddvidhā jātaṃ mamā'dya vai | sātyakiśca hi vijñeyaḥ pāṇḍavaśca dhanañjayaḥ

आज मेरे लिए यह एक ही चिन्ता दो हो गई है — सात्यकि की भी सुध लेनी है और पाण्डव धनञ्जय की भी।

श्लोक 11 (7.126.11)

सात्यकिं प्रेषयित्वा तु पाण्डवस्य पदानुगम् । सात्वतस्यापि कं युद्धे प्रेषयिष्ये पदानुगम् ॥

sātyakiṃ preṣayitvā tu pāṇḍavasya padānugam | sātvatasyāpi kaṃ yuddhe preṣayiṣye padānugam

पाण्डव (अर्जुन) के पीछे चलने के लिए सात्यकि को भेजकर अब युद्ध में उस सात्वत के पीछे चलने के लिए मैं किसे भेजूँ?

श्लोक 12 (7.126.12)

करिष्यामि प्रयत्नेन भ्रातुरन्वेषणं यदि । युयुधानमनन्विष्य लोको मां गर्हयिष्यति ॥

kariṣyāmi prayatnena bhrāturanveṣaṇaṃ yadi | yuyudhānamananviṣya loko māṃ garhayiṣyati

यदि मैं यत्नपूर्वक केवल भाई की खोज करूँ और युयुधान की खोज न करूँ, तो संसार मेरी निन्दा करेगा।

श्लोक 13 (7.126.13)

भ्रातुरन्वेषणं कृत्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । परित्यजति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥

bhrāturanveṣaṇaṃ kṛtvā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | parityajati vārṣṇeyaṃ sātyakiṃ satyavikramam

भाई की खोज करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर सत्यपराक्रमी वृष्णिवंशी सात्यकि को त्याग रहा है।

श्लोक 14 (7.126.14)

लोकापवादभीरुत्वात्सोऽहं पार्थं वृकोदरम् । पदवीं प्रेषयिष्यामि माधवस्य महात्मनः ॥

lokāpavādabhīrutvātso'haṃ pārthaṃ vṛkodaram | padavīṃ preṣayiṣyāmi mādhavasya mahātmanaḥ

इसीलिए लोकनिन्दा के भय से मैं पार्थ वृकोदर (भीम) को माधव-वंश के महात्मा सात्यकि के पदचिह्नों पर भेजूँगा।

श्लोक 15 (7.126.15)

यथैव च मम प्रीतिरर्जुने शत्रुसूदने । तथैव वृष्णिवीरेऽपि सात्वते युद्धदुर्मदे ॥

yathaiva ca mama prītirarjune śatrusūdane | tathaiva vṛṣṇivīre'pi sātvate yuddhadurmade

जैसा मेरा स्नेह शत्रुसूदन अर्जुन पर है, वैसा ही युद्ध में दुर्मद वृष्णिवीर सात्वत पर भी है।

श्लोक 16 (7.126.16)

अतिभारे नियुक्तश्च मया शैनेयनन्दनः । स तु मित्रोपरोधेन गौरवात्तु महाबलः । प्रविष्टो भारतीं सेनां मकरः सागरं यथा ॥

atibhāre niyuktaśca mayā śaineyanandanaḥ | sa tu mitroparodhena gauravāttu mahābalaḥ | praviṣṭo bhāratīṃ senāṃ makaraḥ sāgaraṃ yathā

मैंने शिनि-वंश के उस वीर पर बहुत भारी बोझ डाल दिया। फिर भी मित्र के आग्रह और मेरे प्रति आदर के कारण वह महाबली भरतों की सेना में ऐसे घुस गया है जैसे मगरमच्छ समुद्र में।

श्लोक 17 (7.126.17)

असौ हि श्रूयते शब्दः शूराणामनिवर्तिनाम् । मिथः संयुध्यमानानां वृष्णिवीरेण धीमता ॥

asau hi śrūyate śabdaḥ śūrāṇāmanivartinām | mithaḥ saṃyudhyamānānāṃ vṛṣṇivīreṇa dhīmatā

वह शब्द सुनाई दे रहा है — पीछे न हटने वाले शूरों का, जो बुद्धिमान् वृष्णिवीर से परस्पर युद्ध कर रहे हैं।

श्लोक 18 (7.126.18)

प्राप्तकालं सुबलवन्निश्चितं बहुधा हि मे । तत्रैव पाण्डवेयस्य भीमसेनस्य धन्विनः । गमनं रोचते मह्यं यत्र यातौ महारथौ ॥

prāptakālaṃ subalavanniścitaṃ bahudhā hi me | tatraiva pāṇḍaveyasya bhīmasenasya dhanvinaḥ | gamanaṃ rocate mahyaṃ yatra yātau mahārathau

समय आ गया है। बहुत प्रकार से विचार करके मैंने दृढ़ निश्चय किया है कि जहाँ वे दोनों महारथी गए हैं, वहीं धनुर्धर पाण्डुपुत्र भीमसेन का जाना मुझे उचित लगता है।

श्लोक 19 (7.126.19)

न चाप्यसह्यं भीमस्य विद्यते भुवि किञ्चिन ॥

na cāpyasahyaṃ bhīmasya vidyate bhuvi kiñcina

और पृथ्वी पर ऐसा कुछ नहीं जो भीम के लिए असाध्य हो।

श्लोक 20 (7.126.20)

शक्तो ह्येष रणे यत्तः पृथिव्यां सर्वधन्विनाम् । स्वबाहुबलमास्थाय प्रतिव्यूहितुमञ्जसा ॥

śakto hyeṣa raṇe yattaḥ pṛthivyāṃ sarvadhanvinām | svabāhubalamāsthāya prativyūhitumañjasā

वह रण में तत्पर होकर केवल अपने बाहुबल के सहारे पृथ्वी के सभी धनुर्धारियों का सहज ही सामना करने में समर्थ है।

श्लोक 21 (7.126.21)

यस्य बाहुबलं सर्वे समाश्रित्य महात्मनः । वनवासान्निवृत्ताः स्म न च युद्धेषु निर्जिताः ॥

yasya bāhubalaṃ sarve samāśritya mahātmanaḥ | vanavāsānnivṛttāḥ sma na ca yuddheṣu nirjitāḥ

जिस महात्मा के बाहुबल का आश्रय लेकर हम सब वनवास से लौटे और युद्धों में कभी पराजित नहीं हुए।

श्लोक 22 (7.126.22)

इतो गते भीमसेने सात्वतं प्रति पाण्डवे । सनाथौ भवितारौ हि युधि सात्वतफल्गुनौ ॥

ito gate bhīmasene sātvataṃ prati pāṇḍave | sanāthau bhavitārau hi yudhi sātvataphalgunau

यहाँ से पाण्डव भीमसेन के सात्वत (सात्यकि) के पास चले जाने पर युद्ध में सात्यकि और फल्गुन दोनों को सहायक मिल जाएगा।

श्लोक 23 (7.126.23)

कामं त्वशोचनीयौ तौ रणे सात्वतफल्गुनौ । रक्षितौ वासुदेवेन स्वयं शस्त्रविशारदौ ॥

kāmaṃ tvaśocanīyau tau raṇe sātvataphalgunau | rakṣitau vāsudevena svayaṃ śastraviśāradau

यों तो वे दोनों, सात्यकि और फल्गुन, रण में शोक करने योग्य नहीं हैं, क्योंकि वे स्वयं शस्त्रों में निपुण हैं और वासुदेव उनकी रक्षा करते हैं;

श्लोक 24 (7.126.24)

अवश्यं तु मया कार्यमात्मनः शोकनाशनम् । तस्माद्भीमं नियोक्ष्यामि सात्वतस्य पदानुगम् ॥

avaśyaṃ tu mayā kāryamātmanaḥ śokanāśanam | tasmādbhīmaṃ niyokṣyāmi sātvatasya padānugam

फिर भी मुझे अपने शोक का निवारण तो अवश्य करना है; इसलिए मैं भीम को सात्वत के पीछे जाने के लिए नियुक्त करूँगा।

श्लोक 25 (7.126.25)

ततः प्रतिकृतं मन्ये विधानं सात्यकिं प्रति । एवं निश्चित्य मनसा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

tataḥ pratikṛtaṃ manye vidhānaṃ sātyakiṃ prati | evaṃ niścitya manasā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

तब मैं मानूँगा कि सात्यकि के लिए उचित व्यवस्था हो गई।" मन में ऐसा निश्चय करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने

श्लोक 26 (7.126.26)

यन्तारमब्रवीद्राजा भीमं प्रति नयस्व माम् ॥

yantāramabravīdrājā bhīmaṃ prati nayasva mām

राजा ने सारथि से कहा — "मुझे भीम के पास ले चलो।"

श्लोक 27 (7.126.27)

धर्मराजवचः श्रुत्वा सारथिर्हयकोविदः । रथं हेमपरिष्कारं भीमान्तिकमुपानयत् ॥

dharmarājavacaḥ śrutvā sārathirhayakovidaḥ | rathaṃ hemapariṣkāraṃ bhīmāntikamupānayat

धर्मराज की बात सुनकर घोड़ों के जानकार सारथि ने सोने से सजे रथ को भीम के समीप पहुँचा दिया।

श्लोक 28 (7.126.28)

भीमसेनमनुज्ञाप्य प्राप्तकालमचिन्तयत् । कश्मलं प्राविशद्राजा बहु तत्र समादिशत् ॥

bhīmasenamanujñāpya prāptakālamacintayat | kaśmalaṃ prāviśadrājā bahu tatra samādiśat

भीमसेन की अनुमति माँगकर उन्होंने समझा कि समय आ गया है; राजा खिन्नता में डूब गए और वहाँ बहुत-से आदेश देने लगे।

श्लोक 29 (7.126.29)

स कश्मलसमाविष्टो भीममाहूय पार्थिवः । अब्रवीद्वचनं राजन्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

sa kaśmalasamāviṣṭo bhīmamāhūya pārthivaḥ | abravīdvacanaṃ rājankuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

विषाद से घिरे राजा ने भीम को पास बुलाकर ये वचन कहे। हे राजन्! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर बोले —

श्लोक 30 (7.126.30)

अब्रवीद्वचनं राजन्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । यः सदेवान्सगन्धर्वान्दैत्यांश्चैकरथोऽजयत् ॥

abravīdvacanaṃ rājankuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | yaḥ sadevānsagandharvāndaityāṃścaikaratho'jayat

हे राजन्! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने कहा — "जिसने अकेले एक ही रथ पर देवताओं, गन्धर्वों और दैत्यों को जीत लिया था —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 31 (7.126.31)

तस्य लक्ष्म न पश्यामि भीमसेनानुजस्य ते ॥

tasya lakṣma na paśyāmi bhīmasenānujasya te

तुम्हारे उस छोटे भाई का, भीमसेन, मुझे कोई चिह्न नहीं दिखाई देता।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 32 (7.126.32)

ततोऽब्रवीद्धर्मराजं भीमसेनस्तथागतम् । नैवाद्राक्षं नचाश्रौषं तव कश्मलमीदृशम् ॥

tato'bravīddharmarājaṃ bhīmasenastathāgatam | naivādrākṣaṃ nacāśrauṣaṃ tava kaśmalamīdṛśam

तब भीमसेन ने उस दशा में पड़े धर्मराज से कहा — "ऐसी विकलता मैंने आपमें न कभी देखी, न सुनी।

भीमसेन उवाच

श्लोक 33 (7.126.33)

पुरातिदुःखदीर्णानां भवान्गतिरभूद्धि नः । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र शाधि किं करवाणि ते ॥

purātiduḥkhadīrṇānāṃ bhavāngatirabhūddhi naḥ | uttiṣṭhottiṣṭha rājendra śādhi kiṃ karavāṇi te

पहले जब हम दुःख से विदीर्ण थे, तब आप ही हमारा सहारा थे। उठिए, उठिए, राजेन्द्र! आज्ञा दीजिए, मैं आपके लिए क्या करूँ?

श्लोक 34 (7.126.34)

न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते मम मानद । आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ॥

na hyasādhyamakāryaṃ vā vidyate mama mānada | ājñāpaya kuruśreṣṭha mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ

हे मानद! मेरे लिए कुछ भी असाध्य या अकरणीय नहीं है। हे कुरुश्रेष्ठ! आज्ञा कीजिए, और मन को शोक में मत डुबाइए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 35 (7.126.35)

तमब्रवीदश्रुपूर्णः कृष्णसर्प इव श्वसन् । भीमसेनमिदं वाक्यं प्रम्लानवदनो नृपः ॥

tamabravīdaśrupūrṇaḥ kṛṣṇasarpa iva śvasan | bhīmasenamidaṃ vākyaṃ pramlānavadano nṛpaḥ

आँखों में आँसू भरे, काले साँप की तरह फुफकारते हुए, मलिन मुख वाले राजा ने भीमसेन से यह बात कही —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 36 (7.126.36)

श्रूयते पाञ्चजन्यस्य यथा शङ्खस्य निस्वनः । पूरितो वासुदेवेन संरब्धेन यशस्विना ॥

śrūyate pāñcajanyasya yathā śaṅkhasya nisvanaḥ | pūrito vāsudevena saṃrabdhena yaśasvinā

"पाञ्चजन्य शंख का घोष सुनाई दे रहा है, जिसे यशस्वी वासुदेव क्रोध में भरकर फूँक रहे हैं।

श्लोक 37 (7.126.37)

नूनमद्य हतः शेते तव भ्राता धनञ्जयः । तस्मिन्विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः ॥

nūnamadya hataḥ śete tava bhrātā dhanañjayaḥ | tasminvinihate nūnaṃ yudhyate'sau janārdanaḥ

निश्चय ही आज तुम्हारा भाई धनञ्जय मारा जाकर पड़ा है, और उसके मारे जाने पर वे जनार्दन निश्चय ही युद्ध कर रहे हैं।

श्लोक 38 (7.126.38)

यस्य सत्ववतो वीर्यं ह्युपजीवन्ति पाण्डवाः । यं भयेष्वभिगच्छन्ति सहस्राक्षमिवामराः ॥

yasya satvavato vīryaṃ hyupajīvanti pāṇḍavāḥ | yaṃ bhayeṣvabhigacchanti sahasrākṣamivāmarāḥ

जिस बलवान् के पराक्रम के सहारे पाण्डव जीते हैं, भय के समय जिसके पास वे वैसे ही जाते हैं जैसे देवता सहस्राक्ष इन्द्र के पास जाते हैं —

श्लोक 39 (7.126.39)

स शूरः सैन्धवप्रेप्सुरन्वयाद्भारतीं चमूम् । तस्य वै गमनं विद्मो भीम नावर्तनं पुनः ॥

sa śūraḥ saindhavaprepsuranvayādbhāratīṃ camūm | tasya vai gamanaṃ vidmo bhīma nāvartanaṃ punaḥ

वही वीर सैन्धव को पाने की इच्छा से भरतों की सेना में घुस गया। भीम! हम उसका जाना जानते हैं, उसका लौटना नहीं।

श्लोक 40 (7.126.40)

श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयो महारथः । व्यूढोरस्को महाबाहुर्मत्तद्विरदविक्रमः ॥

śyāmo yuvā guḍākeśo darśanīyo mahārathaḥ | vyūḍhorasko mahābāhurmattadviradavikramaḥ

साँवला, युवा, घने केशों वाला, देखने में सुन्दर महारथी, चौड़ी छाती वाला, महाबाहु, मतवाले हाथी के समान पराक्रमी,

श्लोक 41 (7.126.41)

चकोरनेत्रस्ताम्रास्यो द्विषतां भयवर्धनः । मम प्रियहितार्थं च शक्रलोकादिहागतः ॥

cakoranetrastāmrāsyo dviṣatāṃ bhayavardhanaḥ | mama priyahitārthaṃ ca śakralokādihāgataḥ

चकोर-जैसे नेत्रों और ताँबे-जैसे लाल मुख वाला, शत्रुओं का भय बढ़ाने वाला — और जो मेरे प्रिय और हित के लिए इन्द्रलोक से यहाँ आया था —

श्लोक 42 (7.126.42)

वृद्धोपसेवी धृतिमान्कृतज्ञः सत्यसङ्गरः । प्रविष्टो महतीं सेनामपर्यन्तां धनञ्जयः ॥

vṛddhopasevī dhṛtimānkṛtajñaḥ satyasaṅgaraḥ | praviṣṭo mahatīṃ senāmaparyantāṃ dhanañjayaḥ

वृद्धों की सेवा करने वाला, धैर्यवान्, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ धनञ्जय उस विशाल, अनन्त सेना में घुस गया है।

श्लोक 43 (7.126.43)

प्रविष्टे च चमूं घोरामर्जुने शत्रुनाशने । प्रेषितः सात्वतो वीरः फल्गुनस्य पदानुगः ॥

praviṣṭe ca camūṃ ghorāmarjune śatrunāśane | preṣitaḥ sātvato vīraḥ phalgunasya padānugaḥ

शत्रुनाशक अर्जुन के उस भयानक सेना में प्रवेश करने पर वीर सात्वत (सात्यकि) को फल्गुन के पीछे-पीछे भेजा गया।

श्लोक 44 (7.126.44)

तस्याभिगमनं जाने भीम नावर्तनं पुनः । तदिदं मम भद्रं ते शोकस्थानमरिन्दम ॥

tasyābhigamanaṃ jāne bhīma nāvartanaṃ punaḥ | tadidaṃ mama bhadraṃ te śokasthānamarindama

मैं उसका वहाँ जाना जानता हूँ, भीम, उसका लौटना नहीं। इसीलिए, शत्रुदमन — तुम्हारा कल्याण हो — यही मेरे शोक का कारण है,

श्लोक 45 (7.126.45)

अर्जुनार्थे महाबाहो सात्वतस्य च कारणात् । वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः ॥

arjunārthe mahābāho sātvatasya ca kāraṇāt | vardhate haviṣevāgniridhyamānaḥ punaḥ punaḥ

अर्जुन के कारण, हे महाबाहो, और सात्वत के कारण। वह बार-बार आहुति पाकर बढ़ती हुई अग्नि के समान बढ़ रहा है।

श्लोक 46 (7.126.46)

तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम् । तं विद्धि पुरुषव्याघ्रं सात्वतं च महारथम् ॥

tasya lakṣma na paśyāmi tena vindāmi kaśmalam | taṃ viddhi puruṣavyāghraṃ sātvataṃ ca mahāratham

मुझे उसका कोई चिह्न नहीं दिखता, इसी से मैं विकल हूँ। उस पुरुषव्याघ्र, सात्वत महारथी को भी जानो —

श्लोक 47 (7.126.47)

स तं महारथं पश्चादनुयातस्तवानुजम् । तमपश्यन्महाबाहुमहं विन्दामि कश्मलम् ॥

sa taṃ mahārathaṃ paścādanuyātastavānujam | tamapaśyanmahābāhumahaṃ vindāmi kaśmalam

वह उस महारथी, तुम्हारे छोटे भाई के पीछे गया है। उस महाबाहु को न देखकर मैं विकल हूँ।

श्लोक 48 (7.126.48)

अथैनं पुनराचक्ष्व लोहिताक्षं सकेशवम् । दृष्ट्वा कुशलिनं पार्थं सैन्धवान्ते ससात्यकिम् ॥

athainaṃ punarācakṣva lohitākṣaṃ sakeśavam | dṛṣṭvā kuśalinaṃ pārthaṃ saindhavānte sasātyakim

फिर सैन्धव के अन्त के स्थान पर लाल नेत्रों वाले पार्थ को केशव और सात्यकि के साथ सकुशल देखकर, उसका समाचार मुझे फिर बताना।

श्लोक 49 (7.126.49)

संविदं मम कुर्यास्त्वं सिंहनादेन पाण्डव ॥

saṃvidaṃ mama kuryāstvaṃ siṃhanādena pāṇḍava

हे पाण्डव! सिंहनाद के द्वारा मुझे संकेत देना।

श्लोक 50 (7.126.50)

नूनं विनिहतः शूरः सव्यसाची परन्तप । पार्थे तस्मिन्हते चैव युध्यते गरुडध्वजः ॥

nūnaṃ vinihataḥ śūraḥ savyasācī parantapa | pārthe tasminhate caiva yudhyate garuḍadhvajaḥ

निश्चय ही शत्रुसन्तापक वीर सव्यसाची मारे गए हैं; और पार्थ के मारे जाने पर गरुडध्वज (कृष्ण) युद्ध कर रहे हैं।

श्लोक 51 (7.126.51)

सहायो नास्य वै कश्चित्तेन विन्दामि कश्मलम् । तस्मात्कृष्णो रणे नूनं युध्यते युद्धकोविदः ॥

sahāyo nāsya vai kaścittena vindāmi kaśmalam | tasmātkṛṣṇo raṇe nūnaṃ yudhyate yuddhakovidaḥ

उसका कोई सहायक नहीं है, इसी से मैं विकल हूँ। इसलिए युद्धकुशल कृष्ण रण में निश्चय ही लड़ रहे हैं।

श्लोक 52 (7.126.52)

न हि मे शुध्यते भावस्तयोरेव परन्तप । स तत्र गच्छ कौन्तेय यत्र यातो धनञ्जयः ॥

na hi me śudhyate bhāvastayoreva parantapa | sa tatra gaccha kaunteya yatra yāto dhanañjayaḥ

शत्रुसन्तापक! उन दोनों के विषय में मेरा मन शान्त नहीं होता। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, तुम वहीं जाओ जहाँ धनञ्जय गया है।

श्लोक 53 (7.126.53)

सात्यकिश्च महावीर्यः कर्तव्यं यदि मन्यसे । वचनं मम धर्मज्ञ भ्राता ज्येष्ठो भवामि ते ॥

sātyakiśca mahāvīryaḥ kartavyaṃ yadi manyase | vacanaṃ mama dharmajña bhrātā jyeṣṭho bhavāmi te

और महापराक्रमी सात्यकि के पास भी, यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो, हे धर्मज्ञ; मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ।

श्लोक 54 (7.126.54)

न मेऽर्जुनस्तथा ज्ञेयो ज्ञातव्यः सात्यकिर्यथा ॥

na me'rjunastathā jñeyo jñātavyaḥ sātyakiryathā

मेरे लिए अर्जुन की उतनी खोज करनी नहीं है जितनी सात्यकि की।

श्लोक 55 (7.126.55)

चिकीर्षुर्मत्प्रियं पार्थ स यातः सव्यसाचिनः । पदवीं दुर्गमां घोरामगम्यामकृतात्मभिः ॥

cikīrṣurmatpriyaṃ pārtha sa yātaḥ savyasācinaḥ | padavīṃ durgamāṃ ghorāmagamyāmakṛtātmabhiḥ

मेरा प्रिय करने की इच्छा से, हे पार्थ, वह सव्यसाची के उस दुर्गम, भयंकर मार्ग पर गया है, जहाँ असंयत मन वाले नहीं पहुँच सकते।

श्लोक 56 (7.126.56)

दृष्ट्वा कुशलिनौ कृष्णौ सात्वतं चैव सात्यकिम् । संविदं चैव कुर्यास्त्वं सिंहनादेन पाण्डव ॥

dṛṣṭvā kuśalinau kṛṣṇau sātvataṃ caiva sātyakim | saṃvidaṃ caiva kuryāstvaṃ siṃhanādena pāṇḍava

दोनों कृष्णों को और सात्वत सात्यकि को भी सकुशल देखकर, हे पाण्डव, सिंहनाद से मुझे संकेत देना।"

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