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द्रोण पर्व · अध्याय 127

भीम का प्रस्थान, धृतराष्ट्र-पुत्रों का संहार और द्रोण के रथ का चूर होना

भीम युधिष्ठिर को अर्जुन और सात्यकि का समाचार लाने का वचन देते हैं और राजा की रक्षा धृष्टद्युम्न को सौंपते हैं; धृष्टद्युम्न प्रतिज्ञा करते हैं कि उन्हें मारे बिना द्रोण राजा को बन्दी नहीं बना सकेंगे। युधिष्ठिर का आशीर्वाद पाकर भीम रथ पर चल पड़ते हैं। पाञ्चजन्य का घोष फिर सुनाई देने पर युधिष्ठिर उन्हें शीघ्रता के लिए कहते हैं; भीम धावा बोलते हैं, धृतराष्ट्र के पुत्र उन्हें घेर लेते हैं, पर वे कुण्डभेदी, सुषेण, दीर्घनेत्र, वृन्दारक, अभय, रौद्रकर्मा, दुर्विमोचन, विन्द, अनुविन्द, सुवर्मा और सुदर्शन को मारकर शेष को भगा देते हैं। फिर द्रोण उनका मार्ग रोकते हैं; कटु वचनों के बाद भीम गदा फेंकते हैं, द्रोण रथ से कूद पड़ते हैं और उनका रथ चूर हो जाता है। भीम सेना में विचरते रहते हैं और द्रोण दूसरे रथ पर चढ़ते हैं।

अध्याय 126अध्याय-सूचीअध्याय 128

भीमसेन उवाच

श्लोक 1 (7.127.1)

ब्रह्मेशानेन्द्रवरुणानवहद्यः पुरा रथः । तमास्थाय गतौ कृष्णौ न तयोर्विद्यते भयम् ॥

brahmeśānendravaruṇānavahadyaḥ purā rathaḥ | tamāsthāya gatau kṛṣṇau na tayorvidyate bhayam

"जिस रथ ने प्राचीन काल में ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र और वरुण को वहन किया था, उसी पर चढ़कर दोनों कृष्ण गए हैं; उन्हें कोई भय नहीं है।

श्लोक 2 (7.127.2)

तवाज्ञां शिरसा बिभ्रदेष गच्छामि मा शुचः । समेत्य तान्नरव्याघ्रांस्तव दास्यामि संविदम् ॥

tavājñāṃ śirasā bibhradeṣa gacchāmi mā śucaḥ | sametya tānnaravyāghrāṃstava dāsyāmi saṃvidam

आपकी आज्ञा सिर पर धारण करके मैं जा रहा हूँ; शोक न कीजिए। उन नरश्रेष्ठों से मिलकर मैं आपको समाचार दूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (7.127.3)

एतावदुक्त्वा प्रययौ परिदाय युधिष्ठिरम् । धृष्टद्युम्नाय बलवान्सुहृद्भ्यश्च पुनःपुनः । धृष्टद्युम्नं चेदमाह भीमसेनो महाबलः ॥

etāvaduktvā prayayau paridāya yudhiṣṭhiram | dhṛṣṭadyumnāya balavānsuhṛdbhyaśca punaḥpunaḥ | dhṛṣṭadyumnaṃ cedamāha bhīmaseno mahābalaḥ

यह कहकर बलवान् भीमसेन युधिष्ठिर को धृष्टद्युम्न और मित्रों को बार-बार सौंपकर चल पड़े, और महाबली भीमसेन ने धृष्टद्युम्न से यह कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 4 (7.127.4)

विदितं ते महाबाहो यथा द्रोणो महारथः । ग्रहणे धर्मराजस्य सर्वोपायेन वर्तते ॥

viditaṃ te mahābāho yathā droṇo mahārathaḥ | grahaṇe dharmarājasya sarvopāyena vartate

"हे महाबाहो! आप जानते हैं कि महारथी द्रोण धर्मराज को पकड़ने के लिए सब उपायों से लगे हुए हैं।

श्लोक 5 (7.127.5)

न च मे गमने कृत्यं तादृक्पार्षत विद्यते । यादृशं रक्षणे राज्ञः कार्यमात्ययिकं हि नः ॥

na ca me gamane kṛtyaṃ tādṛkpārṣata vidyate | yādṛśaṃ rakṣaṇe rājñaḥ kāryamātyayikaṃ hi naḥ

हे पार्षत! मेरे लिए जाने का कोई कार्य राजा की रक्षा के समान नहीं है; वही हमारा सबसे अत्यावश्यक कर्तव्य है।

श्लोक 6 (7.127.6)

एवमुक्तोऽस्मि पार्थेन प्रतिवक्तुं न चोत्सहे । प्रयास्ये तत्र यत्रासौ मुमूर्षुः सैन्धवः स्थितः ॥

evamukto'smi pārthena prativaktuṃ na cotsahe | prayāsye tatra yatrāsau mumūrṣuḥ saindhavaḥ sthitaḥ

फिर भी पार्थ (युधिष्ठिर) ने मुझसे ऐसा कहा है और मैं उन्हें उत्तर नहीं दे सकता। मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ मरने को उतावला सैन्धव खड़ा है।

श्लोक 7 (7.127.7)

धर्मराजस्य वचने स्थातव्यमविशङ्कया । यास्यामि पदवीं भ्रातुः सात्वतस्य च धीमतः ॥

dharmarājasya vacane sthātavyamaviśaṅkayā | yāsyāmi padavīṃ bhrātuḥ sātvatasya ca dhīmataḥ

धर्मराज के वचन पर बिना संशय के दृढ़ रहना चाहिए। मैं अपने भाई और बुद्धिमान् सात्वत के मार्ग पर जाऊँगा।

श्लोक 8 (7.127.8)

सोऽद्य यत्तो रणे पार्थं परिरक्ष युधिष्ठिरम् । एतद्धि सर्वकार्याणां परमं कृत्यमाहवे ॥

so'dya yatto raṇe pārthaṃ parirakṣa yudhiṣṭhiram | etaddhi sarvakāryāṇāṃ paramaṃ kṛtyamāhave

इसलिए आज रण में सावधान रहकर पृथा के पुत्र युधिष्ठिर की रक्षा कीजिए; क्योंकि युद्ध में यही सब कर्तव्यों में श्रेष्ठ है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (7.127.9)

तमब्रवीन्महाराज धृष्टद्युम्नो वृकोदरम् । ईप्सितं ते करिष्यामि गच्छ पार्थाविचारयन् ॥

tamabravīnmahārāja dhṛṣṭadyumno vṛkodaram | īpsitaṃ te kariṣyāmi gaccha pārthāvicārayan

हे महाराज! धृष्टद्युम्न ने वृकोदर से कहा — "आप जो चाहते हैं मैं वही करूँगा; हे पार्थ, निःसंकोच जाइए।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 10 (7.127.10)

नाहत्वा समरे द्रोणो धृष्टद्युम्नं कथञ्चन । निग्रहं धर्मराजस्य प्रकरिष्यति संयुगे ॥

nāhatvā samare droṇo dhṛṣṭadyumnaṃ kathañcana | nigrahaṃ dharmarājasya prakariṣyati saṃyuge

द्रोण धृष्टद्युम्न को मारे बिना युद्ध में धर्मराज को कभी बन्दी नहीं बना सकेंगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 11 (7.127.11)

ततो निक्षिप्य राजानं धृष्टद्युम्ने च पाण्डवम् । अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं प्रययौ येन फल्गुनः ॥

tato nikṣipya rājānaṃ dhṛṣṭadyumne ca pāṇḍavam | abhivādya guruṃ jyeṣṭhaṃ prayayau yena phalgunaḥ

फिर राजा को धृष्टद्युम्न के संरक्षण में छोड़कर, अपने बड़े भाई पाण्डव (युधिष्ठिर) को प्रणाम करके वे उसी मार्ग से चले जिससे फल्गुन गया था।

श्लोक 12 (7.127.12)

परिष्वक्तश्च कौन्तेयो धर्मराजेन मारुतिः । आघ्रातश्च तथा मूर्ध्नि श्रावितश्चाशिषः शुभाः ॥

pariṣvaktaśca kaunteyo dharmarājena mārutiḥ | āghrātaśca tathā mūrdhni śrāvitaścāśiṣaḥ śubhāḥ

कुन्तीपुत्र मारुति (भीम) को धर्मराज ने गले लगाया, उनका मस्तक चूमा और उन्हें शुभ आशीर्वाद सुनाए।

श्लोक 13 (7.127.13)

कृत्वा प्रदक्षिणान्विप्रानर्चितांस्तुष्टमानसान् । आलभ्य मङ्गलान्यष्टौ पीत्वा कैरातकं मधु ॥

kṛtvā pradakṣiṇānviprānarcitāṃstuṣṭamānasān | ālabhya maṅgalānyaṣṭau pītvā kairātakaṃ madhu

प्रसन्नचित्त और सम्मानित ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा करके, आठ मंगल-वस्तुओं का स्पर्श करके और कैरातक मधु पीकर,

श्लोक 14 (7.127.14)

द्विगुणद्रविणो वीरो मदरक्तान्तलोचनः । विप्रैः कृतस्वस्त्ययनो विजयोत्पादसूचितः ॥

dviguṇadraviṇo vīro madaraktāntalocanaḥ | vipraiḥ kṛtasvastyayano vijayotpādasūcitaḥ

बल दुगुना हुआ वह वीर, मद से जिसकी आँखों के कोने लाल थे, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन पाकर, जिसकी विजय के शुभ शकुन प्रकट हो चुके थे,

श्लोक 15 (7.127.15)

पश्यन्नेवात्मनो बुद्धिं विजयानन्दकारिणीम् । अनुलोमानिलैश्चाशु प्रदर्शितजयोदयः ॥

paśyannevātmano buddhiṃ vijayānandakāriṇīm | anulomānilaiścāśu pradarśitajayodayaḥ

अपने मन को विजय के आनन्द से भरा हुआ देखता हुआ और अनुकूल हवाओं के द्वारा शीघ्र ही जय का उदय सूचित किए जाने पर,

श्लोक 16 (7.127.16)

भीमसेनो महाबाहुः कवची शुभकुण्डली । सगदः सतलत्राणः सशरी रथिनां वरः । रथमारुह्य निर्युक्तं सर्वोपकरणान्वितम् ॥

bhīmaseno mahābāhuḥ kavacī śubhakuṇḍalī | sagadaḥ satalatrāṇaḥ saśarī rathināṃ varaḥ | rathamāruhya niryuktaṃ sarvopakaraṇānvitam

महाबाहु भीमसेन ने, कवच और चमकते कुण्डल धारण किए, गदा, हस्त-त्राण और बाणों से युक्त होकर, रथियों में श्रेष्ठ वे सब साधनों से सज्जित जुते हुए रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 17 (7.127.17)

तस्य कार्ष्णायसं वर्म हेमचित्रं महर्द्धिमत् । विबभौ सर्वतः श्लिष्टं सविद्युदिव तोयदः ॥

tasya kārṣṇāyasaṃ varma hemacitraṃ maharddhimat | vibabhau sarvataḥ śliṣṭaṃ savidyudiva toyadaḥ

उसका सोने से चित्रित, भव्य लोहे का कवच चारों ओर कसकर बैठा हुआ था और बिजली से युक्त बादल की भाँति चमक रहा था।

श्लोक 18 (7.127.18)

पीतरक्तासितसितैर्वासोभिश्च सुवेष्टितः । कण्ठसूत्रेण विबभौ सेन्द्रायुध इवाम्बुदः ॥

pītaraktāsitasitairvāsobhiśca suveṣṭitaḥ | kaṇṭhasūtreṇa vibabhau sendrāyudha ivāmbudaḥ

पीले, लाल, काले और श्वेत वस्त्रों से सुशोभित, कण्ठ में सूत्र (हार) धारण किए वे इन्द्रधनुष से युक्त बादल की तरह शोभित हुए।

श्लोक 19 (7.127.19)

प्रयाते भीमसेने तु तव सैन्यं युयुत्सया । पाञ्चजन्यरवो घोरः पुनरासीद्विशाम्पते ॥

prayāte bhīmasene tu tava sainyaṃ yuyutsayā | pāñcajanyaravo ghoraḥ punarāsīdviśāmpate

हे प्रजानाथ! जब भीमसेन युद्ध की इच्छा से आपकी सेना की ओर चल पड़े, तब पाञ्चजन्य का भयंकर घोष फिर सुनाई दिया।

श्लोक 20 (7.127.20)

तं श्रुत्वा निनदं घोरं त्रैलोक्यत्रासनं महत् । पुनर्भीमं महाबाहुं धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत ॥

taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ trailokyatrāsanaṃ mahat | punarbhīmaṃ mahābāhuṃ dharmaputro'bhyabhāṣata

तीनों लोकों को त्रास देने वाले उस भयंकर, महान् नाद को सुनकर धर्मपुत्र ने महाबाहु भीम से फिर कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (7.127.21)

एष वृष्णिप्रवीरेण ध्मातः सलिलजो भृशम् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च विनादयति शङ्खराट् ॥

eṣa vṛṣṇipravīreṇa dhmātaḥ salilajo bhṛśam | pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca vinādayati śaṅkharāṭ

"वृष्णिवीर के द्वारा जोर से फूँका गया वह जलजात शंखराज पृथ्वी और आकाश को गुँजा रहा है।

श्लोक 22 (7.127.22)

नूनं व्यसनमापन्ने सुमहत्सव्यसाचिनि । कुरुभिर्युध्यते सार्धं सर्वैश्चक्रगदाधरः ॥

nūnaṃ vyasanamāpanne sumahatsavyasācini | kurubhiryudhyate sārdhaṃ sarvaiścakragadādharaḥ

निश्चय ही सव्यसाची बहुत बड़ी विपत्ति में पड़ गए हैं, और चक्र-गदाधारी समस्त कुरुओं के साथ युद्ध कर रहे हैं।

श्लोक 23 (7.127.23)

नूनमार्या महत्कुन्ती पापं व्यसनमीदृशम् । द्रौपदी च सुभद्रा च पश्यन्ति सह बन्धुभिः । तद्भीम त्वरया युक्तो याहि यत्र धनञ्जयः ॥

nūnamāryā mahatkuntī pāpaṃ vyasanamīdṛśam | draupadī ca subhadrā ca paśyanti saha bandhubhiḥ | tadbhīma tvarayā yukto yāhi yatra dhanañjayaḥ

निश्चय ही आर्या कुन्ती, तथा द्रौपदी और सुभद्रा अपने बन्धुजनों के साथ इस महान् अनिष्ट को, ऐसी विपत्ति को देख रही हैं। इसलिए, भीम, तुम शीघ्रता से वहाँ जाओ जहाँ धनञ्जय है।

श्लोक 24 (7.127.24)

मुह्यतीव हि मे चित्तं धनञ्जयदिदृक्षया । दिशश्च प्रदिशः पार्थ सात्वतस्य च कारणात् ॥

muhyatīva hi me cittaṃ dhanañjayadidṛkṣayā | diśaśca pradiśaḥ pārtha sātvatasya ca kāraṇāt

धनञ्जय को देखने की इच्छा से मेरा चित्त मानो भ्रमित हो रहा है; और हे पार्थ, सात्वत के कारण दिशाएँ और उपदिशाएँ भी मानो घूम रही हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 25 (7.127.25)

गच्छगच्छेति गुरुणा सोऽनुज्ञातो वृकोदरः । ततः पाण्डुसुतो राजन्भीमसेनः प्रतापवान् ॥

gacchagaccheti guruṇā so'nujñāto vṛkodaraḥ | tataḥ pāṇḍusuto rājanbhīmasenaḥ pratāpavān

"जाओ, जाओ" इस प्रकार बड़े भाई से आज्ञा पाकर वृकोदर — तब पाण्डु के तेजस्वी पुत्र भीमसेन, हे राजन् —

श्लोक 26 (7.127.26)

बद्धगोधाङ्गुलित्राणः प्रगृहीतशरासनः । ज्येष्ठेन प्रहितो भ्रात्रा भ्राता भ्रातुः प्रियङ्करः ॥

baddhagodhāṅgulitrāṇaḥ pragṛhītaśarāsanaḥ | jyeṣṭhena prahito bhrātrā bhrātā bhrātuḥ priyaṅkaraḥ

गोह की खाल के दस्ताने बाँधे हुए, धनुष हाथ में लिए, बड़े भाई द्वारा भेजे गए, भाई का प्रिय करने वाले भाई,

श्लोक 27 (7.127.27)

आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्खं प्रध्माप्य चासकृत् । विनद्य सिंहनादेन ज्यां विकर्षन्पुनःपुनः ॥

āhatya dundubhiṃ bhīmaḥ śaṅkhaṃ pradhmāpya cāsakṛt | vinadya siṃhanādena jyāṃ vikarṣanpunaḥpunaḥ

नगाड़ा बजाकर, बार-बार शंख फूँककर, सिंहनाद करके और बार-बार प्रत्यंचा खींचते हुए,

श्लोक 28 (7.127.28)

तेन शब्देन वीराणां पातयित्वा मनांस्युत । दर्शयन्घोरमात्मानममित्रान्सहसाऽभ्ययात् ॥

tena śabdena vīrāṇāṃ pātayitvā manāṃsyuta | darśayanghoramātmānamamitrānsahasā'bhyayāt

उस नाद से वीरों के हृदय गिराते हुए और अपना भयंकर रूप दिखाते हुए वे सहसा शत्रुओं पर टूट पड़े।

श्लोक 29 (7.127.29)

तमूहुर्जवना दान्ता विरुवन्तो हयोत्तमाः । विशोकेन सुसंयत्ता मनोमारुतरंहसः ॥

tamūhurjavanā dāntā viruvanto hayottamāḥ | viśokena susaṃyattā manomārutaraṃhasaḥ

उनके उत्तम घोड़े उन्हें लेकर चले — वेगवान्, सधे हुए, हिनहिनाते हुए, विशोक द्वारा भली-भाँति सँभाले हुए, मन और वायु के समान तेज़।

श्लोक 30 (7.127.30)

आरुजन्विरुजन्पार्थो ज्यां विकर्षंश्च पाणिना । सम्प्रकर्षन्विकर्षंश्च सेनाग्रं समलोडयत् ॥

ārujanvirujanpārtho jyāṃ vikarṣaṃśca pāṇinā | samprakarṣanvikarṣaṃśca senāgraṃ samaloḍayat

तोड़ते-फोड़ते हुए, हाथ से प्रत्यंचा को बार-बार खींचते और कसकर खींचते हुए पार्थ (भीम) ने सेना के अग्रभाग को मथ डाला।

श्लोक 31 (7.127.31)

तं प्रयान्तं महाबाहुं पाञ्चालाः सहसोमकाः । पृष्ठतोऽनुययुः शूरा मघवन्तमिवामराः ॥

taṃ prayāntaṃ mahābāhuṃ pāñcālāḥ sahasomakāḥ | pṛṣṭhato'nuyayuḥ śūrā maghavantamivāmarāḥ

उन महाबाहु के आगे बढ़ने पर सोमकों सहित पाञ्चाल शूरवीर उनके पीछे-पीछे चले, जैसे देवता इन्द्र के पीछे चलते हैं।

श्लोक 32 (7.127.32)

तं समेत्य महाराज तावकाः पर्यवारयन् । दुःशासनश्चित्रसेनः कुण्डभेदी विविंशतिः ॥

taṃ sametya mahārāja tāvakāḥ paryavārayan | duḥśāsanaścitrasenaḥ kuṇḍabhedī viviṃśatiḥ

हे महाराज! आपके योद्धाओं ने उनसे भिड़कर उन्हें घेर लिया — दुःशासन, चित्रसेन, कुण्डभेदी, विविंशति,

श्लोक 33 (7.127.33)

दुर्मुखो दुःसहश्चैव विकर्णश्च शलस्तथा । विन्दानुविन्दौ सुमुखो दीर्घबाहुः सुदर्शनः ॥

durmukho duḥsahaścaiva vikarṇaśca śalastathā | vindānuvindau sumukho dīrghabāhuḥ sudarśanaḥ

दुर्मुख, दुःसह, विकर्ण और शल, विन्द और अनुविन्द, सुमुख, दीर्घबाहु, सुदर्शन,

श्लोक 34 (7.127.34)

वृन्दारकः सुहस्तश्च सुषेणो दीर्घलोचनः । अभयो रौद्रकर्मा च सुवर्मा दुर्विमोचनः ॥

vṛndārakaḥ suhastaśca suṣeṇo dīrghalocanaḥ | abhayo raudrakarmā ca suvarmā durvimocanaḥ

वृन्दारक, सुहस्त, सुषेण, दीर्घलोचन, अभय, रौद्रकर्मा, सुवर्मा और दुर्विमोचन —

श्लोक 35 (7.127.35)

शोभन्तो रथिनां श्रेष्ठाः सहसैन्यपदानुगाः । संयत्ताः समरे वीरा भीमसेनमुपाद्रवन् ॥

śobhanto rathināṃ śreṣṭhāḥ sahasainyapadānugāḥ | saṃyattāḥ samare vīrā bhīmasenamupādravan

रथियों में श्रेष्ठ ये शोभायमान, दृढ़ निश्चयी वीर अपनी सेनाओं और अनुचरों सहित रण में भीमसेन पर टूट पड़े।

श्लोक 36 (7.127.36)

तैः समन्ताद्वृतः शूरैः समरेषु महारथः । तान्समीक्ष्य तु कौन्तेयो भीमसेनः पराक्रमी । अभ्यवर्तत वेगेन सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥

taiḥ samantādvṛtaḥ śūraiḥ samareṣu mahārathaḥ | tānsamīkṣya tu kaunteyo bhīmasenaḥ parākramī | abhyavartata vegena siṃhaḥ kṣudramṛgāniva

युद्धों में उन शूरों से चारों ओर घिरे हुए महारथी, पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीमसेन ने उन्हें देखकर वेग से उन पर धावा किया, जैसे सिंह छोटे मृगों पर झपटता है।

श्लोक 37 (7.127.37)

ते महास्त्राणि दिव्यानि तत्र वीरा अदर्शयन् । छादयन्तः शरैर्भीमं मेघाः सूर्यमिवोदितम् ॥

te mahāstrāṇi divyāni tatra vīrā adarśayan | chādayantaḥ śarairbhīmaṃ meghāḥ sūryamivoditam

उन वीरों ने वहाँ महान् दिव्य अस्त्र दिखाए और बाणों से भीम को ढक दिया, जैसे बादल उगते हुए सूर्य को ढक लेते हैं।

श्लोक 38 (7.127.38)

ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः पराक्रमी । अग्रतः स्यन्दनानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ॥

tataḥ kruddho mahārāja bhīmasenaḥ parākramī | agrataḥ syandanānīkaṃ śaravarṣairavākirat

तब हे महाराज, क्रोध में भरे पराक्रमी भीमसेन ने सामने के रथ-समूह पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 39 (7.127.39)

ते वध्यमानाः समरे तव पुत्रा महारथाः । भीमं भीमबला युद्धे योधयन्ति जयैषिणः ॥

te vadhyamānāḥ samare tava putrā mahārathāḥ | bhīmaṃ bhīmabalā yuddhe yodhayanti jayaiṣiṇaḥ

रण में मारे जाते हुए भी आपके भयंकर बलवाले महारथी पुत्र विजय की इच्छा से भीम से युद्ध करते रहे।

श्लोक 40 (7.127.40)

ततो दुःशासनः क्रुद्धो रथशक्तिं समाक्षिपत् । सर्वपारशवीं तीक्ष्णां जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥

tato duḥśāsanaḥ kruddho rathaśaktiṃ samākṣipat | sarvapāraśavīṃ tīkṣṇāṃ jighāṃsuḥ pāṇḍunandanam

तब क्रुद्ध दुःशासन ने पाण्डुपुत्र को मारने की इच्छा से सम्पूर्ण लोहे की बनी तीखी रथ-शक्ति फेंकी।

श्लोक 41 (7.127.41)

आपतन्तीं महाशक्तिं तव पुत्रप्रणोदिताम् । द्विधा चिच्छेद तां भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

āpatantīṃ mahāśaktiṃ tava putrapraṇoditām | dvidhā ciccheda tāṃ bhīmastadadbhutamivābhavat

आपके पुत्र द्वारा चलाई गई उस गिरती हुई महाशक्ति को भीम ने दो टुकड़े कर दिया; वह एक अद्भुत बात-सी हुई।

श्लोक 42 (7.127.42)

अथान्यैर्विशिखैस्तीक्ष्णैः सङ्क्रुद्धः कुण्डभेदिनम् । सुषेणं दीर्घनेत्रं च त्रिभिस्त्रीनवधीद्बली ॥

athānyairviśikhaistīkṣṇaiḥ saṅkruddhaḥ kuṇḍabhedinam | suṣeṇaṃ dīrghanetraṃ ca tribhistrīnavadhīdbalī

फिर क्रुद्ध होकर उस बली ने अन्य तीखे बाणों से कुण्डभेदी, सुषेण और दीर्घनेत्र — इन तीनों को तीन बाणों से मार डाला।

श्लोक 43 (7.127.43)

ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् । पुत्राणां तव वीराणां युध्यतामवधीत्पुनः ॥

tato vṛndārakaṃ vīraṃ kurūṇāṃ kīrtivardhanam | putrāṇāṃ tava vīrāṇāṃ yudhyatāmavadhītpunaḥ

फिर उसने कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाले वीर वृन्दारक को, जो आपके युद्ध करते हुए पुत्रों में था, फिर मार डाला।

श्लोक 44 (7.127.44)

अभयं रौद्रकर्माणं दुर्विमोचनमेव च । त्रिभिस्त्रीनवधीद्भीमः पुनरेव सुतांस्तव ॥

abhayaṃ raudrakarmāṇaṃ durvimocanameva ca | tribhistrīnavadhīdbhīmaḥ punareva sutāṃstava

अभय, रौद्रकर्मा और दुर्विमोचन — आपके इन तीन पुत्रों को भीम ने फिर तीन बाणों से मार डाला।

श्लोक 45 (7.127.45)

वध्यमाना महाराज पुत्रास्तव बलीयसा । भीमं प्रहरतां श्रेष्ठं समन्तात्पर्यवारयन् ॥

vadhyamānā mahārāja putrāstava balīyasā | bhīmaṃ praharatāṃ śreṣṭhaṃ samantātparyavārayan

हे महाराज! बलवान् भीम के हाथों मारे जाते हुए आपके पुत्रों ने योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 46 (7.127.46)

ते शरैर्भीमकर्माणं ववर्षुः पाण्डवं युधि । मेघा इवातपापाये धाराभिर्धरणीधरम् ॥

te śarairbhīmakarmāṇaṃ vavarṣuḥ pāṇḍavaṃ yudhi | meghā ivātapāpāye dhārābhirdharaṇīdharam

उन्होंने रण में भयंकर कर्म करने वाले पाण्डव भीम पर बाणों की वर्षा की, जैसे ग्रीष्म के अन्त में बादल पर्वत पर जलधाराएँ बरसाते हैं।

श्लोक 47 (7.127.47)

स तद्बाणमयं वर्षमश्मवर्षमिवाचलः । प्रतीच्छन्पाण्डुदायादो न प्राव्यथत शत्रुहा ॥

sa tadbāṇamayaṃ varṣamaśmavarṣamivācalaḥ | pratīcchanpāṇḍudāyādo na prāvyathata śatruhā

उस बाणमयी वर्षा को पर्वत के पत्थरों की वर्षा सहने के समान झेलते हुए पाण्डु का वह उत्तराधिकारी, शत्रुहन्ता, विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 48 (7.127.48)

विन्दानुविन्दौ सहितौ सुवर्माणं च ते सुतम् । प्रहसन्नेव कौन्तेयः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥

vindānuvindau sahitau suvarmāṇaṃ ca te sutam | prahasanneva kaunteyaḥ śarairninye yamakṣayam

मुस्कराते हुए कुन्तीपुत्र ने विन्द और अनुविन्द को साथ-साथ और आपके पुत्र सुवर्मा को भी बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 49 (7.127.49)

ततः सुदर्शनं वीरं पुत्रं ते भरतर्षभ । विव्याध समरे तूर्णं स पपात ममार च ॥

tataḥ sudarśanaṃ vīraṃ putraṃ te bharatarṣabha | vivyādha samare tūrṇaṃ sa papāta mamāra ca

तब हे भरतश्रेष्ठ! उसने रण में आपके पुत्र वीर सुदर्शन को तुरन्त बींध दिया, और वह गिरकर मर गया।

श्लोक 50 (7.127.50)

सोऽचिरेणैव कालेन तद्रथानीकमाशुगैः । दिशः सर्वाः समालोक्य व्यधमत्पाण्डुनन्दनः ॥

so'cireṇaiva kālena tadrathānīkamāśugaiḥ | diśaḥ sarvāḥ samālokya vyadhamatpāṇḍunandanaḥ

थोड़े ही समय में पाण्डुपुत्र ने चारों ओर देखकर शीघ्रगामी बाणों से उस रथ-समूह को नष्ट कर दिया।

श्लोक 51 (7.127.51)

ततो वै रथघोषेण गर्जितेन मृगा इव । भज्यमानाश्च समरे तव पुत्रा विशाम्पते । प्राद्रवन्सहसा सर्वे भीमसेनभयार्दिताः ॥

tato vai rathaghoṣeṇa garjitena mṛgā iva | bhajyamānāśca samare tava putrā viśāmpate | prādravansahasā sarve bhīmasenabhayārditāḥ

तब रथ की घर्घराहट और गर्जना से डरे मृगों के समान, हे प्रजानाथ, रण में टूटते हुए आपके सब पुत्र भीमसेन के भय से पीड़ित होकर अचानक भाग खड़े हुए।

श्लोक 52 (7.127.52)

अनुयायाच्च कौन्तेयः पुत्राणां ते महद्बलम् । विव्याध समरे राजन्कौरवेयान्समन्ततः ॥

anuyāyācca kaunteyaḥ putrāṇāṃ te mahadbalam | vivyādha samare rājankauraveyānsamantataḥ

आपके पुत्रों की उस विशाल सेना का पीछा करते हुए कुन्तीपुत्र ने रण में, हे राजन्, कौरवों को चारों ओर से बींध डाला।

श्लोक 53 (7.127.53)

वध्यमाना महाराज भीमसेनेन तावकाः । त्यक्त्वा भीमं रणाज्जग्मुश्चोदयन्तो हयोत्तमान् ॥

vadhyamānā mahārāja bhīmasenena tāvakāḥ | tyaktvā bhīmaṃ raṇājjagmuścodayanto hayottamān

हे महाराज! भीमसेन के हाथों मारे जाते हुए आपके योद्धा भीम को छोड़कर, अपने उत्तम घोड़ों को हाँकते हुए रणभूमि से चले गए।

श्लोक 54 (7.127.54)

तांस्तु निर्जित्य समरे भीमसेनो महाबलः । सिंहनादरवं चक्रे बाहुशब्दं च पाण्डवः ॥

tāṃstu nirjitya samare bhīmaseno mahābalaḥ | siṃhanādaravaṃ cakre bāhuśabdaṃ ca pāṇḍavaḥ

उन्हें रण में जीतकर महाबली पाण्डव भीमसेन ने सिंहनाद किया और भुजाओं की ताल ठोंकी।

श्लोक 55 (7.127.55)

महान्तं तलशब्दं च कृत्वा द्रोणान्तिकं ययौ । तमावारयदाचार्यो वेलेवोद्वृत्तमर्णवम् ॥

mahāntaṃ talaśabdaṃ ca kṛtvā droṇāntikaṃ yayau | tamāvārayadācāryo velevodvṛttamarṇavam

हथेलियों से बहुत बड़ी ताल की ध्वनि करके वे द्रोण के निकट गए। आचार्य ने उन्हें उसी प्रकार रोक लिया जैसे तट उमड़ते हुए समुद्र को रोक लेता है।

श्लोक 56 (7.127.56)

तस्य द्रोणो रथं राजञ्छादयामास संयुगे । साश्वसूतध्वजं तूर्णं तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tasya droṇo rathaṃ rājañchādayāmāsa saṃyuge | sāśvasūtadhvajaṃ tūrṇaṃ tadadbhutamivābhavat

हे राजन्! द्रोण ने रण में उनके रथ को घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित शीघ्र ढक दिया; वह एक अद्भुत बात-सी हुई।

श्लोक 57 (7.127.57)

ललाटेऽताडयच्चैनं नाराचेन स्मयन्निव । ऊर्ध्वरश्मिरिवादित्यो विबभौ तत्र पाण्डवः ॥

lalāṭe'tāḍayaccainaṃ nārācena smayanniva | ūrdhvaraśmirivādityo vibabhau tatra pāṇḍavaḥ

उन्होंने मुस्कराते हुए-से नाराच बाण से उनके ललाट पर प्रहार किया; और वहाँ पाण्डव ऊपर की ओर किरणें उठाए सूर्य के समान शोभित हुए।

श्लोक 58 (7.127.58)

स मन्यमानस्त्वाचार्यो ममायं फल्गुनो यथा । भीमः करिष्यते पूजामित्युवाच वृकोदरम् ॥

sa manyamānastvācāryo mamāyaṃ phalguno yathā | bhīmaḥ kariṣyate pūjāmityuvāca vṛkodaram

यह मानते हुए कि "यह मेरे लिए फल्गुन के समान है; भीम मेरी पूजा करेगा," आचार्य ने वृकोदर से कहा —

द्रोण उवाच

श्लोक 59 (7.127.59)

भीमसेन न ते शक्यं प्रवेष्टुमरिवाहिनीम् । मामनिर्जित्य समरे शत्रुमद्य महाबल ॥

bhīmasena na te śakyaṃ praveṣṭumarivāhinīm | māmanirjitya samare śatrumadya mahābala

"भीमसेन! हे महाबली! आज रण में मुझ शत्रु को जीते बिना तुम शत्रु की सेना में प्रवेश नहीं कर सकते।

श्लोक 60 (7.127.60)

यदि ते सानुजः कृष्णः प्रविष्टोऽनुमते मम । अनीकं न तु शक्यं मे प्रवेष्टुमिह वै त्वया ॥

yadi te sānujaḥ kṛṣṇaḥ praviṣṭo'numate mama | anīkaṃ na tu śakyaṃ me praveṣṭumiha vai tvayā

यदि कृष्ण अपने अनुज-साथी के साथ मेरी अनुमति से भीतर गया हो, तब भी तुम यहाँ इस सेना में प्रवेश नहीं कर सकते।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 61 (7.127.61)

अथ भीमस्तु तच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यमशेषतः । क्रुद्धः प्रोवाच वै द्रोणं रक्तताम्रेक्षणः श्वसन् ॥

atha bhīmastu tacchrutvā gurorvākyamaśeṣataḥ | kruddhaḥ provāca vai droṇaṃ raktatāmrekṣaṇaḥ śvasan

गुरु की पूरी बात सुनकर क्रुद्ध भीम ने, ताँबे के समान लाल आँखों से फुफकारते हुए, द्रोण से कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 62 (7.127.62)

तवार्जुनो नानुमते ब्रह्मबन्धो रणाजिरम् । प्रविष्टः स हि दुर्धर्षः शक्रस्यापि विशेद्बलम् ॥

tavārjuno nānumate brahmabandho raṇājiram | praviṣṭaḥ sa hi durdharṣaḥ śakrasyāpi viśedbalam

"हे ब्रह्मबन्धो! अर्जुन तुम्हारी अनुमति से रणभूमि में नहीं घुसा। वह दुर्धर्ष तो इन्द्र की सेना में भी घुस सकता है।

श्लोक 63 (7.127.63)

येन त्वं परमां पूजां कुर्वता मानितो ह्यसि । नार्जुनोऽहं घृणी विप्र भीमसेनोऽस्मि ते रिपुः ॥

yena tvaṃ paramāṃ pūjāṃ kurvatā mānito hyasi | nārjuno'haṃ ghṛṇī vipra bhīmaseno'smi te ripuḥ

जिसने तुम्हारा परम आदर करके तुम्हें सम्मानित किया, वह अर्जुन — मैं दयालु अर्जुन नहीं हूँ, हे ब्राह्मण; मैं भीमसेन हूँ, तुम्हारा शत्रु।

श्लोक 64 (7.127.64)

पिता नस्त्वं गुरुर्बन्धुस्तथा पुत्रा हि ते वयम् । इति मन्यामहे सर्वे भवन्तं प्रणताः स्थिताः ॥

pitā nastvaṃ gururbandhustathā putrā hi te vayam | iti manyāmahe sarve bhavantaṃ praṇatāḥ sthitāḥ

आप हमारे पिता, गुरु और बन्धु थे और हम आपके पुत्र — ऐसा ही हम सब आपके सामने नत होकर मानते आए हैं।

श्लोक 65 (7.127.65)

तदद्य विपरीतं ते वदतोऽस्मासु दृश्यते । यदि शत्रुं त्वमात्मानं मन्यसे तत्तथाऽस्त्विह । एष ते सदृशं कर्म शत्रोर्भीमः करिष्यति ॥

tadadya viparītaṃ te vadato'smāsu dṛśyate | yadi śatruṃ tvamātmānaṃ manyase tattathā'stviha | eṣa te sadṛśaṃ karma śatrorbhīmaḥ kariṣyati

आज आप हमसे उलटी बात कह रहे हैं। यदि आप अपने को शत्रु मानते हैं तो वैसा ही सही। यह भीम शत्रु के योग्य कर्म करेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 66 (7.127.66)

अथोद्भ्राम्य गदां वीरः कालदण्डमिवान्तकः । द्रोणायावासृजद्राजन्स रथादवपुप्लुवे ॥

athodbhrāmya gadāṃ vīraḥ kāladaṇḍamivāntakaḥ | droṇāyāvāsṛjadrājansa rathādavapupluve

फिर उस वीर ने काल के दण्ड के समान गदा घुमाकर द्रोण पर फेंक दी, हे राजन्, और द्रोण रथ से कूद पड़े।

श्लोक 67 (7.127.67)

साश्वसूतध्वजं यानं द्रोणस्यापोथयत्तदा । तदद्भुतमपश्याम पाण्डवेयस्य विक्रमम् ॥

sāśvasūtadhvajaṃ yānaṃ droṇasyāpothayattadā | tadadbhutamapaśyāma pāṇḍaveyasya vikramam

तब उस गदा ने घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित द्रोण के रथ को चूर कर दिया; हमने पाण्डुपुत्र का वह अद्भुत पराक्रम देखा।

श्लोक 68 (7.127.68)

द्रोणं तु विरथं कृत्वा भीमसेनो महाबलः । अभ्यवर्तत सैन्यानि तावकानि समन्ततः ॥

droṇaṃ tu virathaṃ kṛtvā bhīmaseno mahābalaḥ | abhyavartata sainyāni tāvakāni samantataḥ

द्रोण को रथहीन करके महाबली भीमसेन चारों ओर आपकी सेनाओं पर टूट पड़े।

श्लोक 69 (7.127.69)

स मृद्नंस्तरसा योधान्वायुर्वृक्षानिवौजसा । विचचार रणे राजन्वायुतुल्यपराक्रमः ॥

sa mṛdnaṃstarasā yodhānvāyurvṛkṣānivaujasā | vicacāra raṇe rājanvāyutulyaparākramaḥ

वायु जैसे अपने वेग से वृक्षों को तोड़ती है, वैसे ही योद्धाओं को बल से कुचलते हुए वे रण में विचरते रहे, हे राजन्, वायु के समान पराक्रमी।

श्लोक 70 (7.127.70)

निर्जितस्तु तदा तेन पाण्डवेन महात्मना । अन्यं तु रथमातिष्ठद्द्रोणः प्रहरतां वरः ॥

nirjitastu tadā tena pāṇḍavena mahātmanā | anyaṃ tu rathamātiṣṭhaddroṇaḥ praharatāṃ varaḥ

उस महात्मा पाण्डव से तब पराजित होकर योद्धाओं में श्रेष्ठ द्रोण दूसरे रथ पर चढ़ गए।

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