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द्रोण पर्व · अध्याय 129

भीम कर्ण को हराते हैं और दुश्शल मारा जाता है

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि गरजते हुए भीम के सामने कौन-से वीर डटे। सञ्जय बताते हैं कि कर्ण उन पर टूट पड़ता है और उनके द्वन्द्व से सेनाएँ काँप उठती हैं। भीम कर्ण का धनुष और डोरी काटते हैं, उसके सारथि और घोड़ों को मार देते हैं और उसे वृषसेन के रथ पर भागने को विवश करते हैं; फिर विजय-गर्जना करते हैं, पाण्डव-सेना में शंख बजते हैं और युधिष्ठिर प्रसन्न होते हैं। आगे भीम कर्ण का रथ, खड्ग और ढाल काट देते हैं; दुर्योधन कर्ण के लिए दुश्शल को रथ के साथ भेजता है और भीम दुश्शल का सिर काट देते हैं; इसके बाद भी कर्ण और भीम लड़ते रहते हैं और सेनाओं में अफ़रा-तफ़री मच जाती है।

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.129.1)

निनदन्तं तथा तं तु भीमसेनं महाबलम् । मेघस्तनितनिर्घोषं के वीराः पर्यवारयन् ॥

ninadantaṃ tathā taṃ tu bhīmasenaṃ mahābalam | meghastanitanirghoṣaṃ ke vīrāḥ paryavārayan

सञ्जय, मेघ के समान गर्जना करते हुए महाबली भीमसेन को किन वीरों ने घेरा?

श्लोक 2 (7.129.2)

न हि पश्याम्यहं तं वै त्रिषु लोकेषु कञ्चन । क्रुद्धस्य भीमसेनस्य यस्तिष्ठेदग्रतो रणे ॥

na hi paśyāmyahaṃ taṃ vai triṣu lokeṣu kañcana | kruddhasya bhīmasenasya yastiṣṭhedagrato raṇe

क्रुद्ध भीमसेन के सामने रण में जो खड़ा हो सके, ऐसे किसी को मैं तीनों लोकों में नहीं देखता।

श्लोक 3 (7.129.3)

गदां युयुत्समानस्य कालस्येवेह सञ्जय । न हि पश्याम्यहं युद्धे यस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ॥

gadāṃ yuyutsamānasya kālasyeveha sañjaya | na hi paśyāmyahaṃ yuddhe yastiṣṭhedagrataḥ pumān

सञ्जय, काल की तरह गदा चलाने को उद्यत उनके सामने युद्ध में जो पुरुष टिक सके, उसे मैं नहीं देखता।

श्लोक 4 (7.129.4)

रथं रथेन यो हन्यात्कुञ्जरं कुञ्जरेण च । कस्तस्य समरे स्थाता साक्षादपि पुरन्दरः ॥

rathaṃ rathena yo hanyātkuñjaraṃ kuñjareṇa ca | kastasya samare sthātā sākṣādapi purandaraḥ

जो रथ से रथ को और हाथी से हाथी को मार गिराए, रण में उसके सामने कौन ठहर सकता है — साक्षात् इन्द्र भी नहीं।

श्लोक 5 (7.129.5)

क्रुद्धस्य भीमसेनस्य मम पुत्राञ्जिघांसतः । दुर्योधनहिते युक्ताः समतिष्ठन्त केऽग्रतः ॥

kruddhasya bhīmasenasya mama putrāñjighāṃsataḥ | duryodhanahite yuktāḥ samatiṣṭhanta ke'grataḥ

मेरे पुत्रों को मारने की इच्छा से क्रुद्ध भीमसेन के सामने दुर्योधन के हित में लगे कौन लोग डटे रहे?

श्लोक 6 (7.129.6)

भीमसेनदवाग्नेस्तु मम पुत्रांस्तृणोलपम् । प्रधक्ष्यतो रणमुखे केऽतिष्ठन्नग्रतो नराः ॥

bhīmasenadavāgnestu mama putrāṃstṛṇolapam | pradhakṣyato raṇamukhe ke'tiṣṭhannagrato narāḥ

मेरे पुत्र-रूपी तिनकों को जलाने को उद्यत भीमसेन-रूपी दावानल के सामने रणमुख पर कौन वीर खड़े रहे?

श्लोक 7 (7.129.7)

काल्यमानांस्तु पुत्रान्मे दृष्ट्वा भीमस्य संयुगे । कालेनेव प्रजाः सर्वाः के भीमं पर्यवारयन् ॥

kālyamānāṃstu putrānme dṛṣṭvā bhīmasya saṃyuge | kāleneva prajāḥ sarvāḥ ke bhīmaṃ paryavārayan

काल से सब प्राणियों की भाँति रण में भीम के हाथों हाँके जाते मेरे पुत्रों को देखकर किन लोगों ने भीम को घेरा?

श्लोक 8 (7.129.8)

न मेऽर्जुनाद्भयं तादृक्कृष्णान्नापि च सात्वतात् । हुतभुग्जन्मनो नैव यादृग्भीमाद्भयं मम ॥

na me'rjunādbhayaṃ tādṛkkṛṣṇānnāpi ca sātvatāt | hutabhugjanmano naiva yādṛgbhīmādbhayaṃ mama

मुझे अर्जुन से वैसा भय नहीं, न कृष्ण से, न सात्वत से, न अग्नि से उत्पन्न वीर से, जैसा भय मुझे भीम से है।

श्लोक 9 (7.129.9)

भीमवह्नेः प्रदीप्तस्य मम पुत्रान्दिधक्षतः । के शूराः पर्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

bhīmavahneḥ pradīptasya mama putrāndidhakṣataḥ | ke śūrāḥ paryavartanta tanmamācakṣva sañjaya

सञ्जय, मेरे पुत्रों को भस्म करने की इच्छा से प्रज्वलित उस भीम-रूपी अग्नि के सामने कौन-कौन शूर आए, यह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (7.129.10)

तथा तु नर्दमानं तं भीमसेनं महाबलम् । तुमुलेनैव शब्देन कर्णोऽप्यभ्यद्रवद्बली ॥

tathā tu nardamānaṃ taṃ bhīmasenaṃ mahābalam | tumulenaiva śabdena karṇo'pyabhyadravadbalī

इस प्रकार गरजते हुए भीमसेन पर बलवान कर्ण भी तुमुल घोष के साथ टूट पड़ा।

श्लोक 11 (7.129.11)

व्याक्षिपन्सुमहच्चापमतिमात्रममर्षणः । कर्णः सुयुद्धमाकाङ्क्षन्दर्शयिष्यन्बलं मृधे ॥

vyākṣipansumahaccāpamatimātramamarṣaṇaḥ | karṇaḥ suyuddhamākāṅkṣandarśayiṣyanbalaṃ mṛdhe

अत्यन्त अमर्ष से भरा कर्ण अपने भारी धनुष को खींचते हुए, उत्तम युद्ध की इच्छा से रण में अपना बल दिखाने को उद्यत हुआ,

श्लोक 12 (7.129.12)

रुरोध मार्गं भीमस्य वातस्येव महीरुहः । भीमोऽपि दृष्ट्वा सावेगं पुरो वैकर्तनं स्थितम् ॥

rurodha mārgaṃ bhīmasya vātasyeva mahīruhaḥ | bhīmo'pi dṛṣṭvā sāvegaṃ puro vaikartanaṃ sthitam

और वायु का मार्ग रोकने वाले वृक्ष की भाँति भीम का रास्ता रोक लिया। वेग से बढ़ते भीम ने भी वैकर्तन (कर्ण) को सामने खड़ा देखकर

श्लोक 13 (7.129.13)

चुकोप बलवद्वीरश्चिक्षेपास्य शिलाशितान् । तान्प्रत्यगृह्णात्कर्णोऽपि प्रतीपं प्रापयच्छरान् ॥

cukopa balavadvīraścikṣepāsya śilāśitān | tānpratyagṛhṇātkarṇo'pi pratīpaṃ prāpayaccharān

क्रोध किया, और उस बलवान वीर ने उस पर तेज़ धार वाले बाण चलाए; कर्ण ने भी उन्हें सहकर बदले में बाण लौटा दिए।

श्लोक 14 (7.129.14)

ततस्तु सर्वयोधानां यतताम् प्रेक्षतां तदा । प्रावेपन्निव गात्राणि कर्णभीमसमागमे ॥

tatastu sarvayodhānāṃ yatatām prekṣatāṃ tadā | prāvepanniva gātrāṇi karṇabhīmasamāgame

तब कर्ण और भीम की उस भिड़न्त पर सब योद्धा एकटक देख रहे थे और उनके अंग काँपने लगे।

श्लोक 15 (7.129.15)

रथिनां सादिनां चैव तयोः श्रुत्वा तलस्वनम् । भीमसेनस्य निनदं श्रुत्वा घोरं रणाजिरे ॥

rathināṃ sādināṃ caiva tayoḥ śrutvā talasvanam | bhīmasenasya ninadaṃ śrutvā ghoraṃ raṇājire

रथियों और घुड़सवारों के बीच उन दोनों की थपकियों का स्वर सुनकर और रणभूमि में भीमसेन की भयंकर गर्जना सुनकर

श्लोक 16 (7.129.16)

खं च भूमिं च संरुद्धां मेनिरे क्षत्रियर्षभाः । पुनर्घोरेण नादेन पाण्डवस्य महात्मनः ॥

khaṃ ca bhūmiṃ ca saṃruddhāṃ menire kṣatriyarṣabhāḥ | punarghoreṇa nādena pāṇḍavasya mahātmanaḥ

श्रेष्ठ क्षत्रियों ने समझा कि आकाश और पृथ्वी एक हो गए हैं; और महात्मा पाण्डव की फिर वैसी भयंकर गर्जना सुनकर

श्लोक 17 (7.129.17)

समरे सर्वयोधानां धनूंष्यभ्यपतन्क्षितौ । शस्त्राणि न्यपतन्दोर्भ्यः केषाञ्चिच्चासवोऽद्रवन् ॥

samare sarvayodhānāṃ dhanūṃṣyabhyapatankṣitau | śastrāṇi nyapatandorbhyaḥ keṣāñciccāsavo'dravan

रण में सब योद्धाओं के धनुष भूमि पर गिर पड़े, किन्हीं के हाथों से शस्त्र छूट गए और किन्हीं के प्राण निकल गए।

श्लोक 18 (7.129.18)

वित्रस्तानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः । वाहनानि च सर्वाणि बभूवुर्विमनांसि च ॥

vitrastāni ca sarvāṇi śakṛnmūtraṃ prasusruvuḥ | vāhanāni ca sarvāṇi babhūvurvimanāṃsi ca

डरे हुए सब प्राणियों ने मल-मूत्र त्याग दिया और सभी वाहन उदास हो गए।

श्लोक 19 (7.129.19)

प्रादुरासन्निमित्तानि घोराणि सुबहून्युत । गृध्रकङ्कबलैश्चासीदन्तरिक्षं समावृतम् ॥

prādurāsannimittāni ghorāṇi subahūnyuta | gṛdhrakaṅkabalaiścāsīdantarikṣaṃ samāvṛtam

बहुत-से भयंकर अपशकुन प्रकट हुए; गीधों और कंकों के झुण्डों से आकाश भर गया।

श्लोक 20 (7.129.20)

तस्मिन्सुतुमुले राजन्कर्णभीमसमागमे । ततः कर्णस्तु विंशत्या शराणां भीममार्दयत् ॥

tasminsutumule rājankarṇabhīmasamāgame | tataḥ karṇastu viṃśatyā śarāṇāṃ bhīmamārdayat

कर्ण और भीम की उस तुमुल भिड़न्त में, हे राजन्, कर्ण ने बीस बाणों से भीम को पीड़ित किया

श्लोक 21 (7.129.21)

विव्याध चास्य त्वरितः सूतं पञ्चभिराशुगैः । प्रहस्य भीमसेनोऽपि कर्णं प्रत्याद्रवद्रणे ॥

vivyādha cāsya tvaritaḥ sūtaṃ pañcabhirāśugaiḥ | prahasya bhīmaseno'pi karṇaṃ pratyādravadraṇe

और शीघ्रता से पाँच तीव्र बाणों से उनके सारथि को बेध दिया। भीमसेन ने हँसकर रण में कर्ण पर पलटवार किया।

श्लोक 22 (7.129.22)

सायकानां चतुः षष्ट्या क्षिप्रकारी महायशाः । तस्य कर्णो महेष्वासः सायकांश्चतुरोऽक्षिपत् ॥

sāyakānāṃ catuḥ ṣaṣṭyā kṣiprakārī mahāyaśāḥ | tasya karṇo maheṣvāsaḥ sāyakāṃścaturo'kṣipat

शीघ्र हाथ चलाने वाले महायशस्वी भीम ने चौंसठ बाणों से उसका सामना किया, और महाधनुर्धर कर्ण ने उन पर चार बाण छोड़े।

श्लोक 23 (7.129.23)

असम्प्राप्तांश्च तान्भीमः सायकैर्नतपर्वभिः । चिच्छेद बहुधा राजन्दर्शयन्पाणिलाघवम् ॥

asamprāptāṃśca tānbhīmaḥ sāyakairnataparvabhiḥ | ciccheda bahudhā rājandarśayanpāṇilāghavam

हे राजन्, उन बाणों के पास पहुँचने से पहले ही भीम ने झुकी गाँठ वाले बाणों से उन्हें कई टुकड़ों में काट डाला और अपने हाथ की फुर्ती दिखाई।

श्लोक 24 (7.129.24)

तं कर्णश्चादयामास शरव्रातैरनेकशः । सञ्छाद्यमानः कर्णेन बहुधा पाण्डुनन्दनः ॥

taṃ karṇaścādayāmāsa śaravrātairanekaśaḥ | sañchādyamānaḥ karṇena bahudhā pāṇḍunandanaḥ

कर्ण ने उन्हें अनेक प्रकार से बाणों की झड़ियों से ढक दिया; और जब कर्ण द्वारा पाण्डुपुत्र बार-बार ढके जा रहे थे,

श्लोक 25 (7.129.25)

चिच्छेद चापं कर्णस्य मुष्टिदेशे महारथः । विव्याध चैनं बहुभिः सायकैर्नतपर्वभिः ॥

ciccheda cāpaṃ karṇasya muṣṭideśe mahārathaḥ | vivyādha cainaṃ bahubhiḥ sāyakairnataparvabhiḥ

तब उस महारथी ने कर्ण के धनुष को मुट्ठी वाले स्थान पर काट दिया और झुकी गाँठ वाले बहुत-से बाणों से उसे बेध दिया।

श्लोक 26 (7.129.26)

अथान्यद्धनुरादाय सज्यं कृत्वा च सूतजः । विव्याध समरे भीमं भीमकर्मा महारथः ॥

athānyaddhanurādāya sajyaṃ kṛtvā ca sūtajaḥ | vivyādha samare bhīmaṃ bhīmakarmā mahārathaḥ

तब सूतपुत्र कर्ण ने दूसरा धनुष लेकर उसे चढ़ाया, और भयंकर कर्म करने वाले उस महारथी ने रण में भीम को बेध दिया।

श्लोक 27 (7.129.27)

तस्य भीमो भृशं क्रुद्धस्त्रीञ्शरान्नतपर्वणः । निचखानोरसि क्रुद्धः सूतपुत्रस्य वेगतः ॥

tasya bhīmo bhṛśaṃ kruddhastrīñśarānnataparvaṇaḥ | nicakhānorasi kruddhaḥ sūtaputrasya vegataḥ

भीम ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर सूतपुत्र की छाती में झुकी गाँठ वाले तीन बाण वेग से गहरे गाड़ दिए।

श्लोक 28 (7.129.28)

तैः कर्णोऽराजत शरैरुरोमध्यगतैः सदा । महीधर इवोदग्रस्त्रिशृङ्गो भरतर्षभ ॥

taiḥ karṇo'rājata śarairuromadhyagataiḥ sadā | mahīdhara ivodagrastriśṛṅgo bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, छाती के बीच धँसे उन बाणों से कर्ण तीन शिखरों वाले ऊँचे पर्वत की तरह दीप्त दिखाई दिया।

श्लोक 29 (7.129.29)

सुस्राव चास्य रुधिरं विद्धस्य परमेषुभिः । धातुप्रस्यन्दिनः शैलाद्यथा गैरिकधातवः ॥

susrāva cāsya rudhiraṃ viddhasya parameṣubhiḥ | dhātuprasyandinaḥ śailādyathā gairikadhātavaḥ

उन उत्तम बाणों से बिंधे उसके शरीर से रक्त वैसे बह चला जैसे धातुएँ बहाते पर्वत से गेरू की धाराएँ बहती हैं।

श्लोक 30 (7.129.30)

किञ्चिद्विचलितः कर्णः सुप्रहाराभिपीडितः । आकर्णपूर्णमाकृष्य भीमं विव्याध सायकैः ॥

kiñcidvicalitaḥ karṇaḥ suprahārābhipīḍitaḥ | ākarṇapūrṇamākṛṣya bhīmaṃ vivyādha sāyakaiḥ

कर्ण कुछ डगमगा गया, प्रहारों से बहुत पीड़ित था; उसने कान तक धनुष खींचकर भीम को बाणों से बेध दिया।

श्लोक 31 (7.129.31)

चिक्षेप च पुनर्बाणाञ्शतशोऽथ सहस्रशः । स शरैरर्दितस्तेन कर्णेन दृढधन्विना । धनुर्ज्यामच्छिनत्तूर्णं भीमस्तस्य क्षुरेण ह ॥

cikṣepa ca punarbāṇāñśataśo'tha sahasraśaḥ | sa śarairarditastena karṇena dṛḍhadhanvinā | dhanurjyāmacchinattūrṇaṃ bhīmastasya kṣureṇa ha

उसने फिर सैकड़ों-हज़ारों बाण छोड़े। दृढ़ धनुर्धर कर्ण के बाणों से पीड़ित भीम ने तुरन्त क्षुर नामक बाण से उसकी प्रत्यंचा काट दी।

श्लोक 32 (7.129.32)

सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् । वाहांश्च चतुरस्तस्य व्यसूंश्चक्रे महारथः ॥

sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat | vāhāṃśca caturastasya vyasūṃścakre mahārathaḥ

उन्होंने भल्ल से कर्ण के सारथि को रथ के आसन से गिरा दिया और उस महारथी ने उसके चारों घोड़ों को प्राणहीन कर दिया।

श्लोक 33 (7.129.33)

हताश्वात्तु रथात्कर्णः समाप्लुत्य विशाम्पते । स्यन्दनं वृषसेनस्य तूर्णमापुप्लुवे भयात् ॥

hatāśvāttu rathātkarṇaḥ samāplutya viśāmpate | syandanaṃ vṛṣasenasya tūrṇamāpupluve bhayāt

घोड़ों के मारे जाने पर कर्ण रथ से कूदा, हे नरेश, और भय से तुरन्त वृषसेन के रथ पर जा चढ़ा।

श्लोक 34 (7.129.34)

निर्जित्य तु रणे कर्णं भीमसेनः प्रतापवान् । ननाद बलवान्नादं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥

nirjitya tu raṇe karṇaṃ bhīmasenaḥ pratāpavān | nanāda balavānnādaṃ parjanyaninadopamam

रण में कर्ण को हराकर प्रतापी बलवान भीमसेन ने मेघ की गर्जना के समान महानाद किया।

श्लोक 35 (7.129.35)

तस्य तं निनदं श्रुत्वा प्रहृष्टोऽभूद्युधिष्ठिरः । कर्णं पराजितं मत्वा भीमसेनेन संयुगे ॥

tasya taṃ ninadaṃ śrutvā prahṛṣṭo'bhūdyudhiṣṭhiraḥ | karṇaṃ parājitaṃ matvā bhīmasenena saṃyuge

उसकी वह गर्जना सुनकर, कर्ण को भीमसेन के हाथों युद्ध में पराजित मानकर, युधिष्ठिर प्रसन्न हुए।

श्लोक 36 (7.129.36)

समन्ताच्छङ्खनिनदं पाण्डुसेनाऽकरोत्तदा । शत्रुसेनाध्वनिं श्रुत्वा तावका ह्यनदन्भृशम् ॥

samantācchaṅkhaninadaṃ pāṇḍusenā'karottadā | śatrusenādhvaniṃ śrutvā tāvakā hyanadanbhṛśam

तब पाण्डव-सेना ने चारों ओर शंख बजाए; शत्रु-सेना का स्वर सुनकर आपके योद्धा भी ज़ोर से गरज उठे।

श्लोक 37 (7.129.37)

स शङ्खबाणनिनदैर्हर्षाद्राजा स्ववाहिनीम् । चक्रे युधिष्ठिरः सङ्ख्ये हर्षनादैश्च सङ्कुलाम् । गाण्डीवं व्याक्षिपत्पार्थः कृष्णोऽप्यब्जमवादयत् ॥

sa śaṅkhabāṇaninadairharṣādrājā svavāhinīm | cakre yudhiṣṭhiraḥ saṅkhye harṣanādaiśca saṅkulām | gāṇḍīvaṃ vyākṣipatpārthaḥ kṛṣṇo'pyabjamavādayat

हर्ष से राजा युधिष्ठिर ने शंखों और बाणों की ध्वनि तथा हर्ष-नादों से रण में अपनी सेना को भर दिया; पार्थ ने गाण्डीव की टंकार की और कृष्ण ने भी अपना शंख बजाया।

श्लोक 38 (7.129.38)

तमन्तर्धाय निनदं भीमस्य नदतो ध्वनिः । अश्रूयत तदा राजन्सर्वसैन्येषु दारुणः ॥

tamantardhāya ninadaṃ bhīmasya nadato dhvaniḥ | aśrūyata tadā rājansarvasainyeṣu dāruṇaḥ

उस कोलाहल को ढककर, हे राजन्, गरजते हुए भीम का भयंकर स्वर तब सब सेनाओं में सुनाई दिया।

श्लोक 39 (7.129.39)

ततो व्यायच्छतामस्त्रैः पृथक्पृथगजिह्मगैः । मृदुपूर्वं तु राधेयो दृढपूर्वं तु पाण्डवः ॥

tato vyāyacchatāmastraiḥ pṛthakpṛthagajihmagaiḥ | mṛdupūrvaṃ tu rādheyo dṛḍhapūrvaṃ tu pāṇḍavaḥ

तब वे दोनों अपने-अपने सीधे जाने वाले अस्त्रों से लड़ते रहे — राधा का पुत्र नरमी से आरम्भ करता हुआ, पाण्डव कठोरता से आरम्भ करता हुआ।

श्लोक 40 (7.129.40)

भीमोऽपि च महाराज वैकर्तनमुपाद्रवत् । आसुरे तु महासैन्ये तारकं पावकिर्यथा ॥

bhīmo'pi ca mahārāja vaikartanamupādravat | āsure tu mahāsainye tārakaṃ pāvakiryathā

और हे महाराज, भीम भी असुरों की महासेना में पावकि (स्कन्द) जैसे तारक पर टूटे थे, वैसे ही वैकर्तन पर टूट पड़े।

श्लोक 41 (7.129.41)

तयोरेवं महद्युद्धमभवद्भीमकर्णयोः । तं भीमसेनो महता शरवर्षेण वारयन् ॥

tayorevaṃ mahadyuddhamabhavadbhīmakarṇayoḥ | taṃ bhīmaseno mahatā śaravarṣeṇa vārayan

इस प्रकार भीम और कर्ण में महान युद्ध छिड़ गया। भीमसेन ने बाणों की भारी वर्षा से उसे रोकते हुए

श्लोक 42 (7.129.42)

विव्याध सारथिं चास्य हयांश्च चतुरः शरैः । ध्वजं चास्य पताकां च भल्लैः सन्नतपर्वभिः । रथं च चक्ररक्षौ च भीमश्चिच्छेद मारिष ॥

vivyādha sārathiṃ cāsya hayāṃśca caturaḥ śaraiḥ | dhvajaṃ cāsya patākāṃ ca bhallaiḥ sannataparvabhiḥ | rathaṃ ca cakrarakṣau ca bhīmaściccheda māriṣa

उसके सारथि और चारों घोड़ों को बाणों से बेध दिया, और हे मारिष, झुकी गाँठ वाले भल्लों से उसकी ध्वजा और पताका, रथ तथा दोनों चक्र-रक्षकों को काट डाला।

श्लोक 43 (7.129.43)

कर्णोऽपि रथिनां श्रेष्ठो भीमसेनेन कम्पितः । खड्गचर्मधरो राजन्भीममभ्यद्रवद्बली ॥

karṇo'pi rathināṃ śreṣṭho bhīmasenena kampitaḥ | khaḍgacarmadharo rājanbhīmamabhyadravadbalī

रथियों में श्रेष्ठ कर्ण भी, भीमसेन से हिला हुआ, हे राजन्, खड्ग और ढाल लेकर बलवान होने से भीम पर टूट पड़ा।

श्लोक 44 (7.129.44)

भीमश्चिच्छेद खड्गं च चर्मणा सह मारिष ॥

bhīmaściccheda khaḍgaṃ ca carmaṇā saha māriṣa

हे मारिष, भीम ने उसका खड्ग ढाल सहित काट डाला।

श्लोक 45 (7.129.45)

दृष्ट्वा कर्णं च पार्थेन बाधितं बहुभिः शरैः । दुर्योधनो महाराज दुश्शलं प्रत्यभाषत । कर्णं कृच्छ्रगतं पश्य शीघ्रं यानं प्रयच्छ ह ॥

dṛṣṭvā karṇaṃ ca pārthena bādhitaṃ bahubhiḥ śaraiḥ | duryodhano mahārāja duśśalaṃ pratyabhāṣata | karṇaṃ kṛcchragataṃ paśya śīghraṃ yānaṃ prayaccha ha

पृथापुत्र (भीम) के बहुत-से बाणों से कर्ण को पीड़ित देखकर, हे महाराज, दुर्योधन ने दुश्शल से कहा — "देखो, कर्ण संकट में है; शीघ्र उसे वाहन दो।"

श्लोक 46 (7.129.46)

एवमुक्तस्ततो राज्ञा दुश्शलः समुपाद्रवत् । दुश्शलस्य रथं कर्णश्चारुरोह महारथः ॥

evamuktastato rājñā duśśalaḥ samupādravat | duśśalasya rathaṃ karṇaścāruroha mahārathaḥ

राजा के ऐसा कहने पर दुश्शल आगे दौड़ा, और महारथी कर्ण दुश्शल के रथ पर चढ़ गया।

श्लोक 47 (7.129.47)

तौ पार्थः सहसा गत्वा विव्याध दशभिः शरैः । पुनश्च कर्णं विद्ध्वाऽपि दुश्शलस्य शिरोऽहरत् ॥

tau pārthaḥ sahasā gatvā vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ | punaśca karṇaṃ viddhvā'pi duśśalasya śiro'harat

पार्थ (भीम) ने सहसा उन दोनों के पास जाकर दस बाणों से उन्हें बेध दिया; और कर्ण को फिर बेधकर दुश्शल का सिर भी काट डाला।

श्लोक 48 (7.129.48)

दुश्शलं निहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन मारिष । तस्यैव धनुरादाय कर्णो विव्याध पाण्डवम् ॥

duśśalaṃ nihataṃ dṛṣṭvā bhīmasenena māriṣa | tasyaiva dhanurādāya karṇo vivyādha pāṇḍavam

हे मारिष, भीमसेन के हाथों दुश्शल को मरा देखकर कर्ण ने उसी का धनुष उठाकर पाण्डव को बेध दिया।

श्लोक 49 (7.129.49)

अन्योन्यं समरे वीरौ युयुधाते महाबलौ । शत्रुघ्नौ शत्रुमध्ये तु बलवज्रभृताविव ॥

anyonyaṃ samare vīrau yuyudhāte mahābalau | śatrughnau śatrumadhye tu balavajrabhṛtāviva

वे दोनों महाबली वीर, शत्रुओं के संहारक, शत्रुओं के बीच रण में एक-दूसरे से ऐसे भिड़े जैसे बल असुर और वज्रधारी इन्द्र।

श्लोक 50 (7.129.50)

भीमो विद्ध्वा हयांश्चैव सारथिं च पुनः पुनः । कर्णमभ्यद्रवत्पार्थः प्रहसंश्च महाबलः ॥

bhīmo viddhvā hayāṃścaiva sārathiṃ ca punaḥ punaḥ | karṇamabhyadravatpārthaḥ prahasaṃśca mahābalaḥ

भीम ने बार-बार उसके घोड़ों और सारथि को बेधा, और महाबली पार्थ हँसते हुए कर्ण पर टूट पड़े।

श्लोक 51 (7.129.51)

ततो व्यायच्छमानस्य भीमसेनस्य संयुगे । तत्सैन्यं कलिलीभूतं न प्राज्ञायत किञ्चन ॥

tato vyāyacchamānasya bhīmasenasya saṃyuge | tatsainyaṃ kalilībhūtaṃ na prājñāyata kiñcana

तब रण में भीमसेन के जूझते रहने पर वह सेना अस्त-व्यस्त हो गई और कुछ भी पहचान में नहीं आता था।

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