द्रोण पर्व · अध्याय 130
दुर्योधन द्रोण को उलाहना देता है; पाञ्चाल राजकुमारों से युद्ध
दुर्योधन उतावली में द्रोण के पास आकर उलाहना देता है कि अर्जुन, भीम और सात्यकि तीनों उन्हें लाँघ गए। द्रोण उत्तर देते हैं कि अब सैन्धव की रक्षा ही द्यूत का दाँव है, और दुर्योधन को उसकी रक्षा के लिए भेजकर स्वयं पाञ्चालों को रोकने के लिए वहीं ठहरते हैं। दुर्योधन का सामना पाञ्चाल राजकुमारों युधामन्यु और उत्तमौजा से होता है; उसके घोड़े और सारथि मारे जाते हैं, वह गदा से उनका रथ चूर कर देता है और मद्रराज शल्य के रथ पर चढ़ जाता है, जबकि दोनों राजकुमार अर्जुन की ओर बढ़ जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.130.1)
तस्मिन्विलुलिते सैन्ये सैन्धवायार्जुने गते । सात्वते भीमसेने च पुत्रस्ते द्रोणमभ्ययात् । त्वरन्नेकरथेनैव बहु कृत्यं विचिन्तयन् ॥
tasminvilulite sainye saindhavāyārjune gate | sātvate bhīmasene ca putraste droṇamabhyayāt | tvarannekarathenaiva bahu kṛtyaṃ vicintayan
जब वह सेना तितर-बितर हो गई और अर्जुन, सात्वत सात्यकि तथा भीमसेन सैन्धव की ओर बढ़ गए, तब आपका पुत्र करने योग्य बहुत-से कामों पर विचार करता हुआ, उतावली में अकेले रथ पर द्रोण के पास पहुँचा।
श्लोक 2 (7.130.2)
स रथस्तव पुत्रस्य त्वरया परया युतः । तूर्णमभ्यद्रवद्द्रोणं मनोमारुतवेगवान् ॥
sa rathastava putrasya tvarayā parayā yutaḥ | tūrṇamabhyadravaddroṇaṃ manomārutavegavān
आपके पुत्र का वह रथ अत्यन्त वेग से चलता हुआ मन और वायु की गति से तुरन्त द्रोण की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 3 (7.130.3)
इह दृष्ट इतो नष्टः सरथः प्राद्रवन्नृपः । मुहूर्तादिव पुत्रस्ते द्रोणमासाद्य मारिष । ससम्भ्रमामिदं वाक्यमब्रवीत्कुरनन्दनः ॥
iha dṛṣṭa ito naṣṭaḥ sarathaḥ prādravannṛpaḥ | muhūrtādiva putraste droṇamāsādya māriṣa | sasambhramāmidaṃ vākyamabravītkuranandanaḥ
"यहाँ दिखाई दिया और यहाँ से ओझल हो गया — राजा रथ सहित तेज़ी से निकल पड़ा"; और हे मान्यवर, मानो क्षण भर में ही आपका पुत्र द्रोण के पास पहुँच गया। तब कुरुकुल के आनन्द उस राजकुमार ने घबराहट के साथ यह बात कही।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 4 (7.130.4)
अर्जुनो भीमसेनश्च सात्यकिश्चापराजितः । विजित्य सर्वसैन्यानि सुमहान्ति महारथाः ॥
arjuno bhīmasenaśca sātyakiścāparājitaḥ | vijitya sarvasainyāni sumahānti mahārathāḥ
अर्जुन, भीमसेन और अजेय सात्यकि — इन तीनों महारथियों ने हमारी सारी विशाल सेनाओं को परास्त कर दिया है,
श्लोक 5 (7.130.5)
सम्प्राप्ताः सिन्धुराजस्य समीपमनिवारिताः । व्यायच्छन्ति च तत्रापि सर्व एवापराजिताः ॥
samprāptāḥ sindhurājasya samīpamanivāritāḥ | vyāyacchanti ca tatrāpi sarva evāparājitāḥ
और बिना किसी रोक-टोक के सिन्धुराज के पास जा पहुँचे हैं; वहाँ भी वे सब अपराजित रहकर जूझ रहे हैं।
श्लोक 6 (7.130.6)
यदि तावद्रणे पार्थो व्यतिक्रान्तो महारथः । कथं सात्यकिभीमाभ्यां व्यतिक्रान्तोऽसि मानद ॥
yadi tāvadraṇe pārtho vyatikrānto mahārathaḥ | kathaṃ sātyakibhīmābhyāṃ vyatikrānto'si mānada
यदि महारथी पार्थ रणभूमि में आपको लाँघ गया, तो हे मानद, सात्यकि और भीम भी आपको कैसे लाँघ गए?
श्लोक 7 (7.130.7)
आश्चर्यभूतो लोकेऽस्मिन्समुद्रस्येव शोषणम् । निर्जयस्तव विप्राग्र्य सात्वतेनार्जुनेन च । तथैव भीमसेनेन लोकः संवदते भृशम् ॥
āścaryabhūto loke'sminsamudrasyeva śoṣaṇam | nirjayastava viprāgrya sātvatenārjunena ca | tathaiva bhīmasenena lokaḥ saṃvadate bhṛśam
यह संसार में आश्चर्य की बात है, मानो समुद्र का सूख जाना: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आपका सात्वत और अर्जुन से, और वैसे ही भीमसेन से भी, पराभूत होना। सारा संसार यही कह रहा है।
श्लोक 8 (7.130.8)
कथं द्रोणो जितः सङ्ख्ये धनुर्वेदस्य पारगः । इत्येवं ब्रुवते योधा अश्रद्धेयमिदं तव ॥
kathaṃ droṇo jitaḥ saṅkhye dhanurvedasya pāragaḥ | ityevaṃ bruvate yodhā aśraddheyamidaṃ tava
"धनुर्वेद के पारंगत द्रोण युद्ध में कैसे हार गए?" — योद्धा यही कह रहे हैं। आपके विषय में यह बात विश्वास करने योग्य नहीं है।
श्लोक 9 (7.130.9)
नाश एव तु मे नूनं मन्दभाग्यस्य संयुगे । यत्र त्वां पुरुषव्याघ्रं व्यतिक्रान्तास्त्रयो रथाः ॥
nāśa eva tu me nūnaṃ mandabhāgyasya saṃyuge | yatra tvāṃ puruṣavyāghraṃ vyatikrāntāstrayo rathāḥ
निश्चय ही यह इस युद्ध में मुझ अभागे का ही विनाश है कि आप जैसे पुरुषव्याघ्र को तीन रथी लाँघकर निकल गए।
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (7.130.10)
एवं गते तु कृत्येऽस्मिन्ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् । यद्गतं गतमेवेदं शेषं चिन्तय मानद ॥
evaṃ gate tu kṛtye'sminbrūhi yatte vivakṣitam | yadgataṃ gatamevedaṃ śeṣaṃ cintaya mānada
बात जब यहाँ तक आ पहुँची है, तो जो कहना चाहते हो कहो। जो बीत गया सो बीत गया; हे मानद, जो शेष है उसका विचार करो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 11 (7.130.11)
यत्कृत्यं सिन्धुराजस्य प्राप्तकालमनन्तरम् । तत्संविधीयतां क्षिप्रं साधु सञ्चिन्त्य नो द्विज ॥
yatkṛtyaṃ sindhurājasya prāptakālamanantaram | tatsaṃvidhīyatāṃ kṣipraṃ sādhu sañcintya no dvija
सिन्धुराज के लिए अब समय के अनुरूप जो करना उचित हो, हे द्विज, उसे भली-भाँति सोचकर हमारे लिए शीघ्र निश्चित कीजिए।
द्रोण उवाच
श्लोक 12 (7.130.12)
चिन्त्यं बहुविधं तात यत्कृत्यं तच्छृणुष्व मे । त्रयो हि समतिक्रान्ताः पाण्डवानां महारथाः ॥
cintyaṃ bahuvidhaṃ tāta yatkṛtyaṃ tacchṛṇuṣva me | trayo hi samatikrāntāḥ pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ
बेटा, सोचने को बहुत कुछ है; जो करना है उसे मुझसे सुनो। पाण्डवों के तीन महारथी हमें लाँघकर निकल गए हैं।
श्लोक 13 (7.130.13)
यावत्तेषां भयं पश्चात्तावदेषां पुरःसरम् । तद्गरीयस्तरं मन्ये यत्र कृष्णधनञ्जयौ ॥
yāvatteṣāṃ bhayaṃ paścāttāvadeṣāṃ puraḥsaram | tadgarīyastaraṃ manye yatra kṛṣṇadhanañjayau
उनके पीछे जितना भय है, उतना ही उनके आगे भी है; और मैं उसे अधिक भारी मानता हूँ जहाँ कृष्ण और धनञ्जय हैं।
श्लोक 14 (7.130.14)
सा पुरस्ताच्च पश्चाच्च गृहीता भारती चमूः । तत्र कृत्यमहं मन्ये सैन्धवस्याभिरक्षणम् ॥
sā purastācca paścācca gṛhītā bhāratī camūḥ | tatra kṛtyamahaṃ manye saindhavasyābhirakṣaṇam
भरतों की सेना आगे और पीछे दोनों ओर से जकड़ी हुई है। वहाँ, मेरे विचार से, करने योग्य कार्य सैन्धव की रक्षा है।
श्लोक 15 (7.130.15)
स नो रक्ष्यतमस्तात क्रुद्धाद्भीतो धनञ्जयात् । गतौ च सैन्धवं भीमौ युयुधानवृकोदरौ ॥
sa no rakṣyatamastāta kruddhādbhīto dhanañjayāt | gatau ca saindhavaṃ bhīmau yuyudhānavṛkodarau
बेटा, उसी की हमें सबसे अधिक रक्षा करनी है, क्योंकि वह क्रुद्ध धनञ्जय से डरा हुआ है; और भयंकर युयुधान तथा वृकोदर भी सैन्धव की ओर जा चुके हैं।
श्लोक 16 (7.130.16)
सम्प्राप्तं तदिदं द्यूतं यत्तच्छकुनिबुद्धिजम् । न सभायां जयो वृत्तो नापि तत्र पराजयः । इह नो ग्लहमानानामद्य तावज्जयाजयौ ॥
samprāptaṃ tadidaṃ dyūtaṃ yattacchakunibuddhijam | na sabhāyāṃ jayo vṛtto nāpi tatra parājayaḥ | iha no glahamānānāmadya tāvajjayājayau
शकुनि की बुद्धि से उपजा वही द्यूत अब हम पर आ पड़ा है। सभा में न जीत तय हुई थी, न हार; यहाँ आज दाँव लगाते हुए हम लोगों की जीत और हार का निर्णय होना है।
श्लोक 17 (7.130.17)
यान्स्म तान्ग्लहते घोराञ्छकुनिः कुरुसंसदि । अक्षान्स मन्यमानः प्राक्शरास्ते हि दुरासदाः ॥
yānsma tānglahate ghorāñchakuniḥ kurusaṃsadi | akṣānsa manyamānaḥ prākśarāste hi durāsadāḥ
शकुनि ने कुरुओं की सभा में जिन भयंकर पासों से जुआ खेला था और जिन्हें वह केवल पासे समझता था, वे वास्तव में बाण थे, जिनका सामना करना कठिन है।
श्लोक 18 (7.130.18)
यत्र ते बहवस्तात कौरवेया व्यवस्थिताः । सेनां दुरोदरं विद्धि शरानक्षान्विशाम्पते । ग्लहं च सैन्धवं राजंस्तत्र द्यूतस्य निश्चयः ॥
yatra te bahavastāta kauraveyā vyavasthitāḥ | senāṃ durodaraṃ viddhi śarānakṣānviśāmpate | glahaṃ ca saindhavaṃ rājaṃstatra dyūtasya niścayaḥ
जैसे उस सभा में, जहाँ बहुत-से कौरव बैठे थे, वैसे ही अब: हे प्रजापति, सेना को जुआरी और बाणों को पासे जानो, और हे राजन्, सैन्धव को दाँव। इसी में द्यूत का निर्णय है।
श्लोक 19 (7.130.19)
सैन्धवे तु महद्द्यूतं समासक्तं परैः सह । अत्र ते ध्रुवमायत्तो जयो वाऽजय एव वा ॥
saindhave tu mahaddyūtaṃ samāsaktaṃ paraiḥ saha | atra te dhruvamāyatto jayo vā'jaya eva vā
सैन्धव पर शत्रुओं के साथ बहुत बड़ा दाँव लगा हुआ है। आपकी जीत या हार निश्चय ही इसी पर टिकी है।
श्लोक 20 (7.130.20)
अत्र सर्वे महाराज त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । सैन्धवस्य रणे रक्षां विधिवत्कर्तुमर्हथ । तत्र नो ग्लहमानानां ध्रुवौ जयपराजयौ ॥
atra sarve mahārāja tyaktvā jīvitamātmanaḥ | saindhavasya raṇe rakṣāṃ vidhivatkartumarhatha | tatra no glahamānānāṃ dhruvau jayaparājayau
इसलिए हे महाराज, आप सब अपने प्राणों का मोह छोड़कर इस युद्ध में विधिपूर्वक सैन्धव की रक्षा कीजिए; वहाँ दाँव लगाने वाले हम लोगों की जय और पराजय निश्चित रूप से उसी पर निर्भर हैं।
श्लोक 21 (7.130.21)
यत्र ते परमेष्वासा यत्ता रक्षन्ति सैन्धवम् । तत्र गच्छ स्वयं शीघ्रं तांश्च रक्षस्व रक्षिणः ॥
yatra te parameṣvāsā yattā rakṣanti saindhavam | tatra gaccha svayaṃ śīghraṃ tāṃśca rakṣasva rakṣiṇaḥ
जहाँ महान धनुर्धर सावधान रहकर सैन्धव की रक्षा कर रहे हैं, वहाँ आप स्वयं शीघ्र जाइए और उन रक्षकों की भी रक्षा कीजिए।
श्लोक 22 (7.130.22)
इहैव त्वहमासिष्ये प्रेषयिष्यामि चापरान् । निरोत्स्यामि च पाञ्चालान्सहितान्पाण्डुसृञ्जयैः ॥
ihaiva tvahamāsiṣye preṣayiṣyāmi cāparān | nirotsyāmi ca pāñcālānsahitānpāṇḍusṛñjayaiḥ
मैं यहीं ठहरूँगा और दूसरों को भेजूँगा, तथा पाण्डवों और सृञ्जयों सहित पाञ्चालों को रोके रखूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (7.130.23)
ततो दुर्योधनोऽगच्छत्तूर्णमाचार्यशासनात् । उद्यम्यात्मानमुग्राय कर्मणे स पदानुगः ॥
tato duryodhano'gacchattūrṇamācāryaśāsanāt | udyamyātmānamugrāya karmaṇe sa padānugaḥ
तब आचार्य की आज्ञा से दुर्योधन उस भयंकर कार्य के लिए अपने को कसकर अपने अनुयायियों सहित तुरन्त चल पड़ा।
श्लोक 24 (7.130.24)
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ । बाह्येन सेनामभ्येत्य जग्मतुः सव्यसाचिनम् ॥
cakrarakṣau tu pāñcālyau yudhāmanyūttamaujasau | bāhyena senāmabhyetya jagmatuḥ savyasācinam
अर्जुन के रथ के चक्ररक्षक दोनों पाञ्चाल राजकुमार युधामन्यु और उत्तमौजा सेना के बाहरी किनारे से घूमकर सव्यसाची की ओर चले।
श्लोक 25 (7.130.25)
यौ तु पूर्वं महाराज वारितौ कृतवर्मणा । प्रविष्टे त्वर्जुने राजंस्तव सैन्यं युयुत्सया ॥
yau tu pūrvaṃ mahārāja vāritau kṛtavarmaṇā | praviṣṭe tvarjune rājaṃstava sainyaṃ yuyutsayā
ये वही दोनों थे, हे महाराज, जिन्हें पहले कृतवर्मा ने रोक लिया था जब अर्जुन आपकी सेना में घुसा था, हे राजन्; वे युद्ध के लिए उत्सुक थे।
श्लोक 26 (7.130.26)
पार्श्वे भित्त्वा चमूं वीरौ प्रविष्टौ तव वाहिनीम् । पार्श्वेन सैन्यमायान्तौ कुरुराजो ददर्श ह ॥
pārśve bhittvā camūṃ vīrau praviṣṭau tava vāhinīm | pārśvena sainyamāyāntau kururājo dadarśa ha
सेना को बगल से भेदकर वे दोनों वीर आपकी सेना में घुस आए थे; सेना के पार्श्व से आते हुए उन्हें कुरुराज ने देखा।
श्लोक 27 (7.130.27)
ताभ्यां दुर्योधनः सार्धमकरोत्सङ्ख्यमुत्तमम् । त्वरितस्त्वरमाणाभ्यां भ्रातृभ्यां भारतो बली ॥
tābhyāṃ duryodhanaḥ sārdhamakarotsaṅkhyamuttamam | tvaritastvaramāṇābhyāṃ bhrātṛbhyāṃ bhārato balī
वीर भरतवंशी दुर्योधन ने उन दोनों भाइयों के साथ उत्तम युद्ध किया; वह स्वयं भी जल्दी में था और वे दोनों भी जल्दी में थे।
श्लोक 28 (7.130.28)
तावेनमभ्यद्रवतामुभावुद्यतकार्मुकौ । महारथसमाख्यातौ क्षत्रियप्रवरौ युधि ॥
tāvenamabhyadravatāmubhāvudyatakārmukau | mahārathasamākhyātau kṣatriyapravarau yudhi
धनुष उठाए दोनों उस पर टूट पड़े — महारथी कहलाने वाले वे दोनों श्रेष्ठ क्षत्रिय।
श्लोक 29 (7.130.29)
तमविध्यद्युधामन्युस्त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः । विंशत्या सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
tamavidhyadyudhāmanyustriṃśatā kaṅkapatribhiḥ | viṃśatyā sārathiṃ cāsya caturbhiścaturo hayān
युधामन्यु ने उसे तीस कंकपत्र बाणों से, उसके सारथि को बीस से और उसके चारों घोड़ों को चार बाणों से बींध दिया।
श्लोक 30 (7.130.30)
दुर्योधनो युधामन्योर्ध्वजमेकेषुणाऽच्छिनत् । एकेन कार्मुकं चास्य चकर्त तनयस्तव ॥
duryodhano yudhāmanyordhvajamekeṣuṇā'cchinat | ekena kārmukaṃ cāsya cakarta tanayastava
दुर्योधन ने एक ही बाण से युधामन्यु की ध्वजा काट डाली, और आपके पुत्र ने एक और बाण से उसका धनुष भी काट दिया।
श्लोक 31 (7.130.31)
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत् । ततोऽविध्यच्छरैस्तीक्ष्णैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapāharat | tato'vidhyaccharaistīkṣṇaiścaturbhiścaturo hayān
उसने एक भल्ल से उसके सारथि को रथ के आसन से नीचे गिरा दिया, और फिर चार तीखे बाणों से चारों घोड़ों को बींध दिया।
श्लोक 32 (7.130.32)
युधामन्युश्च सङ्क्रुद्धः शरांस्त्रिंशतमाहवे । व्यसृजत्तव पुत्रस्य त्वरमाणः स्तनान्तरे ॥
yudhāmanyuśca saṅkruddhaḥ śarāṃstriṃśatamāhave | vyasṛjattava putrasya tvaramāṇaḥ stanāntare
क्रोध से भरे युधामन्यु ने उतावली में युद्ध के बीच आपके पुत्र की छाती पर तीस बाण छोड़े।
श्लोक 33 (7.130.33)
तथोत्तमौजाः सङ्क्रुद्धः शरैर्हेमविभूषितैः । अविध्यत्सारथिं चास्य प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
tathottamaujāḥ saṅkruddhaḥ śarairhemavibhūṣitaiḥ | avidhyatsārathiṃ cāsya prāhiṇodyamasādanam
वैसे ही क्रुद्ध उत्तमौजा ने सोने से सजे बाणों से उसके सारथि को बींधकर यमलोक भेज दिया।
श्लोक 34 (7.130.34)
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्यौत्तमौजसः । जघान चतुरोऽस्याश्चानुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ॥
duryodhano'pi rājendra pāñcālyasyauttamaujasaḥ | jaghāna caturo'syāścānubhau tau pārṣṇisārathī
हे राजेन्द्र, दुर्योधन ने भी पाञ्चाल उत्तमौजा के चारों घोड़ों को मार डाला, और उसके पार्ष्णि-रक्षक तथा सारथि दोनों को भी।
श्लोक 35 (7.130.35)
उत्तमौजा हताश्वस्तु हतसूतश्च संयुगे । आरुरोह रथं भ्रातुर्युधामन्योरभित्वरन् ॥
uttamaujā hatāśvastu hatasūtaśca saṃyuge | āruroha rathaṃ bhrāturyudhāmanyorabhitvaran
युद्ध में घोड़े और सारथि के मारे जाने पर उत्तमौजा झट अपने भाई युधामन्यु के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 36 (7.130.36)
स रथं प्राप्य तं भ्रातुर्दुर्योधनहयाञ्शरैः । बहुभिस्ताडयामास ते हताः प्रापतन्भुवि ॥
sa rathaṃ prāpya taṃ bhrāturduryodhanahayāñśaraiḥ | bahubhistāḍayāmāsa te hatāḥ prāpatanbhuvi
भाई के रथ पर पहुँचकर उसने बहुत-से बाणों से दुर्योधन के घोड़ों को मारा, और वे मरकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 37 (7.130.37)
हयेषु पतितेष्वस्य चिच्छेद परमेषुणा । युधामन्युर्धनुः शीघ्रं शरावापं च संयुगे । अविध्यत्सारथिं चास्य प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
hayeṣu patiteṣvasya ciccheda parameṣuṇā | yudhāmanyurdhanuḥ śīghraṃ śarāvāpaṃ ca saṃyuge | avidhyatsārathiṃ cāsya prāhiṇodyamasādanam
घोड़ों के गिर जाने पर युधामन्यु ने एक उत्तम बाण से युद्ध में उसका धनुष और तरकस शीघ्र काट डाले। उसने उसके सारथि को भी बींधकर यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 38 (7.130.38)
हताश्वसूतात्सरथादवतीर्य नराधिपः । गदामादाय ते पुत्रः पाञ्चाल्यावभ्यधावत ॥
hatāśvasūtātsarathādavatīrya narādhipaḥ | gadāmādāya te putraḥ pāñcālyāvabhyadhāvata
आपका पुत्र राजा, घोड़े और सारथि के मारे जाने पर रथ से उतरा और गदा हाथ में लेकर दोनों पाञ्चालों पर दौड़ा।
श्लोक 39 (7.130.39)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धं कुरुपतिं तदा । अवप्लुतौ रथोपस्थाद्युधामन्यूत्तमौजसौ ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya kruddhaṃ kurupatiṃ tadā | avaplutau rathopasthādyudhāmanyūttamaujasau
क्रुद्ध कुरुपति को अपनी ओर आते देखकर युधामन्यु और उत्तमौजा रथ के पटरे से कूद पड़े।
श्लोक 40 (7.130.40)
ततः स हेमचित्रं तं गदया स्यन्दनं गदी । सङ्क्रुद्धः पोथयामास साश्वसूतध्वजं नृप ॥
tataḥ sa hemacitraṃ taṃ gadayā syandanaṃ gadī | saṅkruddhaḥ pothayāmāsa sāśvasūtadhvajaṃ nṛpa
तब क्रोध से भरे गदाधारी दुर्योधन ने उनके सोने से चित्रित रथ को घोड़ों, सारथि और ध्वजा सहित गदा से चूर-चूर कर दिया, हे राजन्।
श्लोक 41 (7.130.41)
एतदीदृशकं पुत्रस्तवाकार्षीज्जनाधिप । गदया गदिनां श्रेष्ठः सर्वलोकमहारथः ॥
etadīdṛśakaṃ putrastavākārṣījjanādhipa | gadayā gadināṃ śreṣṭhaḥ sarvalokamahārathaḥ
हे जनाधिप, आपके पुत्र ने ऐसा कर्म किया — गदाधारियों में श्रेष्ठ और सारे लोकों में महारथी।
श्लोक 42 (7.130.42)
भङ्क्त्वा रथं स पुत्रस्ते हताश्वो हतसारथिः । मद्रराजरथं तूर्णमारुरोह परन्तपः ॥
bhaṅktvā rathaṃ sa putraste hatāśvo hatasārathiḥ | madrarājarathaṃ tūrṇamāruroha parantapaḥ
उनके रथ को तोड़कर, घोड़े और सारथि के मारे जाने पर, आपका पुत्र शत्रुओं को तपाने वाला दुर्योधन तुरन्त मद्रराज के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 43 (7.130.43)
पाञ्चालानां ततो मुख्यौ राजपुत्रौ महारथौ । रथावन्यौ समारुह्य बीभत्सुमभिजग्मुतः ॥
pāñcālānāṃ tato mukhyau rājaputrau mahārathau | rathāvanyau samāruhya bībhatsumabhijagmutaḥ
तब पाञ्चालों के दोनों प्रमुख महारथी राजकुमार दूसरे रथों पर चढ़कर बीभत्सु (अर्जुन) की ओर चले।