द्रोण पर्व · अध्याय 131
भीम और कर्ण का युद्ध; कर्ण का पीछे हटना
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि भीम ने कर्ण से, जिसके विषय में उसके पास स्मरण करने को इतना कुछ था, कैसे युद्ध किया; और सञ्जय उस युद्ध का वर्णन करते हैं। भीम अर्जुन की ओर जा रहे हैं कि कर्ण उन्हें पुकारकर पीठ दिखाने का ताना देता है। दोनों में बाणों की झड़ी चलती है: कर्ण भीम के रथ को बाणों के जाल से ढक देता है, और बाणों से बिंधे हुए भीम कर्ण का धनुष काट डालते हैं, उसके घोड़ों और सारथि को मार देते हैं और उसकी छाती बींध देते हैं। घबराया हुआ कर्ण भीम के भय से दूसरे रथ पर चला जाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.131.1)
वर्तमाने महाराज सङ्ग्रामे रोमहर्षणे । व्याकुलेषु च सर्वेषु पीड्यमानेषु सर्वशः ॥
vartamāne mahārāja saṅgrāme romaharṣaṇe | vyākuleṣu ca sarveṣu pīḍyamāneṣu sarvaśaḥ
हे महाराज, जब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला संग्राम चल रहा था और सारी सेनाएँ व्याकुल होकर चारों ओर से पीड़ित हो रही थीं,
श्लोक 2 (7.131.2)
राधेयो भीममानर्च्छ युद्धाय भरतर्षभ । यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमभिद्रवेत् ॥
rādheyo bhīmamānarccha yuddhāya bharatarṣabha | yathā nāgo vane nāgaṃ matto mattamabhidravet
तब हे भरतश्रेष्ठ, राधेय (कर्ण) भीम से युद्ध करने उसके सामने आया, जैसे वन में मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी पर टूट पड़ता है।
श्लोक 3 (7.131.3)
ततो व्यायच्छतामस्त्रैः पृथक्पृथगरिन्दमौ । मृदुपूर्वं च राधेयो दृढपूर्वं च पाण्डवः ॥
tato vyāyacchatāmastraiḥ pṛthakpṛthagarindamau | mṛdupūrvaṃ ca rādheyo dṛḍhapūrvaṃ ca pāṇḍavaḥ
तब शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों अपने-अपने ढंग से अस्त्रों से जूझने लगे: राधेय आरम्भ में मृदुता से, और पाण्डव आरम्भ में दृढ़ता से।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 4 (7.131.4)
यौ तौ कर्णश्च भीमश्च सम्प्रयुद्धौ महाबलौ । अर्जुनस्य रथोपान्ते कीदृशः सोऽभवद्रणः ॥
yau tau karṇaśca bhīmaśca samprayuddhau mahābalau | arjunasya rathopānte kīdṛśaḥ so'bhavadraṇaḥ
जब वे दोनों महाबली कर्ण और भीम अर्जुन के रथ के पास भिड़े, तब वह युद्ध कैसा हुआ?
श्लोक 5 (7.131.5)
पूर्वं हि निर्जितः कर्णो भीमसेनेन संयुगे । कथं भूयः स राधेयो भीममागान्महारथः ॥
pūrvaṃ hi nirjitaḥ karṇo bhīmasenena saṃyuge | kathaṃ bhūyaḥ sa rādheyo bhīmamāgānmahārathaḥ
कर्ण पहले युद्ध में भीमसेन से हार चुका था। फिर वह महारथी राधेय दुबारा भीम के सामने कैसे आया?
श्लोक 6 (7.131.6)
भीमो वा सूततनयं प्रत्युद्यातः कथं रणे । महारथसमाख्यातं पृथिव्यां प्रवरं रथम् ॥
bhīmo vā sūtatanayaṃ pratyudyātaḥ kathaṃ raṇe | mahārathasamākhyātaṃ pṛthivyāṃ pravaraṃ ratham
और भीम रणभूमि में उस सूतपुत्र का सामना करने कैसे गया, जो पृथ्वी पर महारथी कहलाने वाला श्रेष्ठ रथी है?
श्लोक 7 (7.131.7)
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । नान्यतो भयमादत्त विना कर्णान्महारथात् ॥
bhīṣmadroṇāvatikramya dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | nānyato bhayamādatta vinā karṇānmahārathāt
धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म और द्रोण को पार करके भी महारथी कर्ण को छोड़ किसी और से भयभीत नहीं हुए।
श्लोक 8 (7.131.8)
भयाद्यस्य महाबाहो न शेते बहुलाः समाः । चिन्तयन्नित्यशो वीर्यं राधेयस्य महात्मनः । तं कथं सूतपुत्रं तु भीमोऽयोधयताहवे ॥
bhayādyasya mahābāho na śete bahulāḥ samāḥ | cintayannityaśo vīryaṃ rādheyasya mahātmanaḥ | taṃ kathaṃ sūtaputraṃ tu bhīmo'yodhayatāhave
हे महाबाहो, जिसके भय से वे बहुत वर्षों से नहीं सोए, महात्मा राधेय के पराक्रम का सदा चिन्तन करते हुए — उस सूतपुत्र से भीम ने युद्ध में कैसे लड़ाई की?
श्लोक 9 (7.131.9)
ब्रह्मण्यं वीर्यसम्पन्नं समरेष्वनिवर्तिनम् । कथं कर्णं युधां श्रेष्ठं योधयामास पाण्डवः ॥
brahmaṇyaṃ vīryasampannaṃ samareṣvanivartinam | kathaṃ karṇaṃ yudhāṃ śreṣṭhaṃ yodhayāmāsa pāṇḍavaḥ
ब्राह्मणों के भक्त, पराक्रमी और युद्धों में कभी पीछे न हटने वाले योद्धाओं में श्रेष्ठ कर्ण से पाण्डव ने कैसे युद्ध किया?
श्लोक 10 (7.131.10)
यौ तौ समीयतुर्वीरौ वैकर्तनवृकोदरौ । कथं तावत्र युध्येतां महाबलपराक्रमौ ॥
yau tau samīyaturvīrau vaikartanavṛkodarau | kathaṃ tāvatra yudhyetāṃ mahābalaparākramau
जो दोनों वीर वैकर्तन (कर्ण) और वृकोदर आपस में भिड़े, वे महाबली और महापराक्रमी दोनों यहाँ कैसे लड़े?
श्लोक 11 (7.131.11)
भ्रातृत्वं दर्शितं पूर्वं घृणी चापि स सूतजः । कथं भीमेन युयुधे कुन्त्या वाक्यमनुस्मरन् ॥
bhrātṛtvaṃ darśitaṃ pūrvaṃ ghṛṇī cāpi sa sūtajaḥ | kathaṃ bhīmena yuyudhe kuntyā vākyamanusmaran
कर्ण ने पहले भ्रातृभाव दिखाया था, और वह सूतज दयालु भी है। कुन्ती की बात का स्मरण करते हुए उसने भीम से कैसे युद्ध किया?
श्लोक 12 (7.131.12)
भीमो वा सूतपुत्रेण स्मरन्वैरं पुरा कृतम् । अयुध्यत कथं शूरः कर्णेन सह संयुगे ॥
bhīmo vā sūtaputreṇa smaranvairaṃ purā kṛtam | ayudhyata kathaṃ śūraḥ karṇena saha saṃyuge
और वीर भीम ने भी सूतपुत्र द्वारा पहले किए गए वैर का स्मरण करते हुए युद्ध में कर्ण से कैसे संघर्ष किया?
श्लोक 13 (7.131.13)
आशास्ते च सदा सूतपुत्रे दुर्योधनो मम । कर्णो जेष्यति सङ्ग्रामे समस्तान्पाण्डवानिति ॥
āśāste ca sadā sūtaputre duryodhano mama | karṇo jeṣyati saṅgrāme samastānpāṇḍavāniti
मेरा दुर्योधन सदा सूतपुत्र से यही आशा रखता है कि "कर्ण संग्राम में सब पाण्डवों को जीत लेगा।"
श्लोक 14 (7.131.14)
जयाशा यत्र पुत्रस्य मम मन्दस्य संयुगे । स कथं भीमकर्माणं भीमसेनमयोधयत् ॥
jayāśā yatra putrasya mama mandasya saṃyuge | sa kathaṃ bhīmakarmāṇaṃ bhīmasenamayodhayat
जिस पर मेरे मन्दभाग्य पुत्र की युद्ध में विजय की आशा टिकी है, उसने भयंकर कर्म करने वाले भीमसेन से कैसे युद्ध किया?
श्लोक 15 (7.131.15)
यं समासाद्य पुत्रैर्मे कृतं वैरं महारथैः । तं सूततनयं तात कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥
yaṃ samāsādya putrairme kṛtaṃ vairaṃ mahārathaiḥ | taṃ sūtatanayaṃ tāta kathaṃ bhīmo hyayodhayat
हे तात, जिस सूतपुत्र का आश्रय लेकर मेरे महारथी पुत्रों ने वैर ठाना, उसी से भीम ने कैसे युद्ध किया?
श्लोक 16 (7.131.16)
अनेकान्विप्रकारांश्च सूतपुत्रसमुद्भवान् । स्मरमाणः कथं भीमो युयुधे सूतसूनुना ॥
anekānviprakārāṃśca sūtaputrasamudbhavān | smaramāṇaḥ kathaṃ bhīmo yuyudhe sūtasūnunā
सूतपुत्र से मिले अनेक अपकारों का स्मरण करते हुए भीम ने उस सूत के पुत्र से कैसे युद्ध किया?
श्लोक 17 (7.131.17)
योऽजयत्पृथिवीं सर्वां रथेनैकेन वीर्यवान् । तं सूततनयं युद्धे कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥
yo'jayatpṛthivīṃ sarvāṃ rathenaikena vīryavān | taṃ sūtatanayaṃ yuddhe kathaṃ bhīmo hyayodhayat
जिस पराक्रमी ने एक ही रथ से सारी पृथ्वी जीत ली थी, उस सूतपुत्र से भीम ने युद्ध में कैसे लड़ाई की?
श्लोक 18 (7.131.18)
यो जातः कुण्डलाभ्यां च कवचेन सहैव च । तं सूतपुत्रं समरे भीमः कथमयोधयत् ॥
yo jātaḥ kuṇḍalābhyāṃ ca kavacena sahaiva ca | taṃ sūtaputraṃ samare bhīmaḥ kathamayodhayat
जो कुण्डलों और कवच के साथ ही उत्पन्न हुआ था, उस सूतपुत्र से भीम ने रण में कैसे युद्ध किया?
श्लोक 19 (7.131.19)
अस्त्रहेतोः पुरा तात भार्गवं समपूजयत् । तस्य प्रसादाद्ब्रह्मास्त्रं लब्धवांश्च भृगूत्तमात् ॥
astrahetoḥ purā tāta bhārgavaṃ samapūjayat | tasya prasādādbrahmāstraṃ labdhavāṃśca bhṛgūttamāt
हे तात, उसने अस्त्रों के लिए पहले भार्गव (परशुराम) की सेवा-पूजा की थी, और उनकी कृपा से उस भृगुश्रेष्ठ से ब्रह्मास्त्र पाया था।
श्लोक 20 (7.131.20)
यथा तयोर्युद्धमभूद्यश्चासीद्विजयी तयोः । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥
yathā tayoryuddhamabhūdyaścāsīdvijayī tayoḥ | tanmamācakṣva tattvena kuśalo hyasi sañjaya
उन दोनों का युद्ध कैसे हुआ और उनमें कौन विजयी हुआ, यह मुझे ठीक-ठीक बताओ; सञ्जय, तुम इसमें कुशल हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (7.131.21)
भीमसेनस्तु राधेयमुत्सृज्य रथिनां वरम् । इयेष गन्तुं यत्रास्तां वीरौ कृष्णधनञ्जयौ ॥
bhīmasenastu rādheyamutsṛjya rathināṃ varam | iyeṣa gantuṃ yatrāstāṃ vīrau kṛṣṇadhanañjayau
भीमसेन रथियों में श्रेष्ठ राधेय को छोड़कर वहाँ जाना चाहते थे जहाँ वे दोनों वीर कृष्ण और धनञ्जय थे।
श्लोक 22 (7.131.22)
तं प्रयान्तमभिद्रुत्य राधेयः कङ्कपत्रिभिः । अभ्यवर्षन्महाराज मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ॥
taṃ prayāntamabhidrutya rādheyaḥ kaṅkapatribhiḥ | abhyavarṣanmahārāja megho vṛṣṭyeva parvatam
जाते हुए भीम के पीछे दौड़कर राधेय ने उन पर कंकपत्र बाणों की वर्षा की, हे महाराज, जैसे मेघ पर्वत पर जल बरसाता है।
श्लोक 23 (7.131.23)
फुल्लता पङ्कजेनेव वक्त्रेण विहसन्बली । आजुहाव रणे यान्तं भीममाधिरथिस्तदा ॥
phullatā paṅkajeneva vaktreṇa vihasanbalī | ājuhāva raṇe yāntaṃ bhīmamādhirathistadā
खिले कमल के समान मुख से हँसते हुए बलवान आधिरथि (कर्ण) ने तब रण में जाते हुए भीम को पुकारा।
कर्ण उवाच
श्लोक 24 (7.131.24)
भीमाहितैस्तव रणः स्वप्नेऽपि न विभावितः । तद्दर्शयसि कस्मान्मे पृष्ठं पार्थदिदृक्षया ॥
bhīmāhitaistava raṇaḥ svapne'pi na vibhāvitaḥ | taddarśayasi kasmānme pṛṣṭhaṃ pārthadidṛkṣayā
हे भीम, तुम्हारे शत्रुओं ने स्वप्न में भी तुम्हें रण में ऐसा करते नहीं देखा। फिर पार्थ को देखने की इच्छा से तुम मुझे पीठ क्यों दिखा रहे हो?
श्लोक 25 (7.131.25)
कुन्त्याः पुत्रस्य सदृशं नेदं पाण्डवनन्दन । तेन मामभितः स्थित्वा शरवर्षैरवाकिर ॥
kuntyāḥ putrasya sadṛśaṃ nedaṃ pāṇḍavanandana | tena māmabhitaḥ sthitvā śaravarṣairavākira
हे पाण्डवनन्दन, यह कुन्ती के पुत्र के योग्य नहीं है। इसलिए मेरे सामने डटकर खड़े हो जाओ और मुझ पर बाणों की वर्षा करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 26 (7.131.26)
भीमसेनस्तदाह्वानं कर्णान्नामर्षयद्युधि । अर्धमण्डलमावृत्य सूतपुत्रमयोधयत् ॥
bhīmasenastadāhvānaṃ karṇānnāmarṣayadyudhi | ardhamaṇḍalamāvṛtya sūtaputramayodhayat
भीमसेन कर्ण की उस ललकार को युद्ध में सहन न कर सके। अर्धमण्डल बनाकर घूमते हुए उन्होंने सूतपुत्र से युद्ध किया।
श्लोक 27 (7.131.27)
अवक्रगामिभिर्बाणैरभ्यवर्षन्महायशाः । दंशितं द्वैरथे यत्तं सर्वशस्त्रविशारदम् ॥
avakragāmibhirbāṇairabhyavarṣanmahāyaśāḥ | daṃśitaṃ dvairathe yattaṃ sarvaśastraviśāradam
महायशस्वी भीम ने सीधे जाने वाले बाणों की वर्षा की उस कर्ण पर, जो कवच पहने, सावधान और सब शस्त्रों में निपुण था, उस रथ-द्वन्द्व में।
श्लोक 28 (7.131.28)
विधित्सुः कलहस्यान्तं जिघांसुः कर्णमक्षिणोत् ॥
vidhitsuḥ kalahasyāntaṃ jighāṃsuḥ karṇamakṣiṇot
झगड़े का अन्त करने की इच्छा से और कर्ण को मार डालने की चाह से उसने उसे घायल करके थका दिया।
श्लोक 29 (7.131.29)
हत्वा तस्यानुगांस्तं च हन्तुकामो महाबलः । तस्मै व्यसृजदुग्राणि विविधानि परन्तपः । अमर्षात्पाण्डवः क्रुद्धः शरवर्षाणि मारिष ॥
hatvā tasyānugāṃstaṃ ca hantukāmo mahābalaḥ | tasmai vyasṛjadugrāṇi vividhāni parantapaḥ | amarṣātpāṇḍavaḥ kruddhaḥ śaravarṣāṇi māriṣa
कर्ण के अनुयायियों को मारकर फिर उसे भी मार डालने की इच्छा से, महाबली, शत्रुओं को तपाने वाले क्रुद्ध पाण्डव ने अमर्ष में उस पर अनेक प्रकार की भयंकर बाण-वर्षाएँ कीं, हे मान्यवर।
श्लोक 30 (7.131.30)
तस्य तानीषुवर्षाणि मत्तद्विरदगामिनः । सूतपुत्रोऽस्त्रमायाभिरग्रसत्परमास्त्रवित् ॥
tasya tānīṣuvarṣāṇi mattadviradagāminaḥ | sūtaputro'stramāyābhiragrasatparamāstravit
मतवाले हाथी की चाल से चलने वाली भीम की उन बाण-वर्षाओं को परम अस्त्रवेत्ता सूतपुत्र ने अपनी अस्त्र-माया से निगल लिया।
श्लोक 31 (7.131.31)
स यथावन्महाबाहुर्विद्यया वै सुपूजितः । आचार्यवन्महेष्वासः कर्णः पर्यचरद्बली ॥
sa yathāvanmahābāhurvidyayā vai supūjitaḥ | ācāryavanmaheṣvāsaḥ karṇaḥ paryacaradbalī
अपनी विद्या से भली-भाँति सम्मानित, बलवान महाधनुर्धर कर्ण आचार्य की तरह निपुणता से युद्ध में विचरता रहा।
श्लोक 32 (7.131.32)
युध्यमानं तु संरम्भाद्भीमसेनं हसन्निव । अभ्यपद्यत कौन्तेयं कर्णो राजन्वृकोदरम् ॥
yudhyamānaṃ tu saṃrambhādbhīmasenaṃ hasanniva | abhyapadyata kaunteyaṃ karṇo rājanvṛkodaram
जब भीमसेन क्रोध में लड़ रहे थे, तब कर्ण मानो हँसता हुआ कुन्तीपुत्र वृकोदर के निकट जा पहुँचा, हे राजन्।
श्लोक 33 (7.131.33)
तन्नामृष्यत कौन्तेयः कर्णस्य स्मितमाहवे । युध्यमानेषु वीरेषु पश्यत्सु च समन्ततः ॥
tannāmṛṣyata kaunteyaḥ karṇasya smitamāhave | yudhyamāneṣu vīreṣu paśyatsu ca samantataḥ
कुन्तीपुत्र भीम को युद्ध में कर्ण की वह मुस्कान सहन नहीं हुई, जब वीर लड़ रहे थे और चारों ओर लोग देख रहे थे।
श्लोक 34 (7.131.34)
तं भीमसेनः सङ्ग्राप्तं वत्सदन्तैः स्तनान्तरे । विव्याध बलवान्क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥
taṃ bhīmasenaḥ saṅgrāptaṃ vatsadantaiḥ stanāntare | vivyādha balavānkruddhastotrairiva mahādvipam
निकट आए कर्ण की छाती में क्रुद्ध बलवान भीमसेन ने वत्सदन्त बाणों से वैसे बींध दिया जैसे अंकुशों से महाहाथी को बींधा जाता है।
श्लोक 35 (7.131.35)
पुनश्च सूतपुत्रं तु स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । सुमुक्तैश्चित्रवर्माणं निर्बिभेद त्रिसप्तभिः ॥
punaśca sūtaputraṃ tu svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | sumuktaiścitravarmāṇaṃ nirbibheda trisaptabhiḥ
और फिर उसने चमकीला कवच पहने सूतपुत्र को सोने के पंखों वाले, शान पर तेज़ किए, भली-भाँति छोड़े हुए इक्कीस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 36 (7.131.36)
कर्णो जाम्बूनदैर्जालैः सञ्छन्नान्वातरंहसः । हयान्विव्याध भीमस्य पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥
karṇo jāmbūnadairjālaiḥ sañchannānvātaraṃhasaḥ | hayānvivyādha bhīmasya pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ
कर्ण ने भीम के उन वायु के समान वेगवान घोड़ों को, जो सुनहरे जालों से ढके थे, पाँच-पाँच बाणों से बींध दिया।
श्लोक 37 (7.131.37)
ततो बाणमयं जालं भीमसेनरथं प्रति । कर्णेन विहितं राजन्निमेषार्धाददृश्यत ॥
tato bāṇamayaṃ jālaṃ bhīmasenarathaṃ prati | karṇena vihitaṃ rājannimeṣārdhādadṛśyata
तब, हे राजन्, कर्ण द्वारा रचा हुआ बाणों का जाल भीमसेन के रथ के ऊपर आधे निमेष तक दिखाई दिया।
श्लोक 38 (7.131.38)
सरथः सध्वजस्तत्र ससूतः पाण्डवस्तदा । प्राच्छाद्यत महाराज कर्णचापच्युतैः शरैः ॥
sarathaḥ sadhvajastatra sasūtaḥ pāṇḍavastadā | prācchādyata mahārāja karṇacāpacyutaiḥ śaraiḥ
तब रथ, ध्वजा और सारथि सहित पाण्डव कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से ढक गया, हे महाराज।
श्लोक 39 (7.131.39)
तस्य कर्णश्चतुःषष्ट्या व्यधमत्कवचं दृढम् । क्रुद्धश्चाप्यहनत्पार्थं नाराचैर्मर्मभेदिभिः ॥
tasya karṇaścatuḥṣaṣṭyā vyadhamatkavacaṃ dṛḍham | kruddhaścāpyahanatpārthaṃ nārācairmarmabhedibhiḥ
कर्ण ने चौसठ बाणों से उसका दृढ़ कवच फाड़ डाला, और क्रुद्ध होकर मर्म को भेदने वाले नाराचों से पार्थ को घायल किया।
श्लोक 40 (7.131.40)
ततोऽचिन्त्य महाबाहुः कर्णकार्मुकनिःसृतान् । समाश्लिष्यदसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं वृकोदरः ॥
tato'cintya mahābāhuḥ karṇakārmukaniḥsṛtān | samāśliṣyadasambhrāntaḥ sūtaputraṃ vṛkodaraḥ
तब महाबाहु वृकोदर ने कर्ण के धनुष से निकले बाणों की परवाह न करते हुए, निर्भय होकर सूतपुत्र को जा घेरा।
श्लोक 41 (7.131.41)
स कर्णचापप्रभवानिषूनाशीविषोपमान् । बिभ्रद्भीमो महाराज न जगाम व्यथां रणे ॥
sa karṇacāpaprabhavāniṣūnāśīviṣopamān | bibhradbhīmo mahārāja na jagāma vyathāṃ raṇe
कर्ण के धनुष से उत्पन्न विषैले सर्पों जैसे उन बाणों को सहते हुए भीम को, हे महाराज, युद्ध में कोई पीड़ा नहीं हुई।
श्लोक 42 (7.131.42)
ततो द्वात्रिंशता भल्लैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः । विव्याध समरे कर्णं भीमसेनः प्रतापवान् ॥
tato dvātriṃśatā bhallairniśitaistigmatejanaiḥ | vivyādha samare karṇaṃ bhīmasenaḥ pratāpavān
तब प्रतापी भीमसेन ने युद्ध में बत्तीस तीखे, तेज़ धार वाले भल्लों से कर्ण को बींध दिया।
श्लोक 43 (7.131.43)
अयत्नेनैव तं कर्णः शरैर्भृशमवाकिरत् । भीमसेनं महाबाहुं सैन्धवस्य वधैषिणम् ॥
ayatnenaiva taṃ karṇaḥ śarairbhṛśamavākirat | bhīmasenaṃ mahābāhuṃ saindhavasya vadhaiṣiṇam
कर्ण ने बिना प्रयास के ही सैन्धव के वध की इच्छा रखने वाले महाबाहु भीमसेन पर बाणों की घनी वर्षा कर दी।
श्लोक 44 (7.131.44)
मृदुपूर्वं तु राधेयो भीममाजावयोधयत् । क्रोधपूर्वं तथा भीमः पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥
mṛdupūrvaṃ tu rādheyo bhīmamājāvayodhayat | krodhapūrvaṃ tathā bhīmaḥ pūrvavairamanusmaran
राधेय ने युद्ध में भीम से आरम्भ में मृदुता से युद्ध किया, और भीम ने पुराने वैर को याद करते हुए आरम्भ से ही क्रोध के साथ।
श्लोक 45 (7.131.45)
तं भीमसेनो नामृष्यदवमानममर्षणः । स तस्मै व्यसृजत्तूर्णं शरवर्षममित्रहा ॥
taṃ bhīmaseno nāmṛṣyadavamānamamarṣaṇaḥ | sa tasmai vyasṛjattūrṇaṃ śaravarṣamamitrahā
क्रोधी भीमसेन उस अपमान को सह न सके, और शत्रुओं का नाश करने वाले उन्होंने उस पर तुरन्त बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 46 (7.131.46)
ते शराः प्रेषितास्तेन भीमसेनेन संयुगे । निपेतुः सर्वतो वीरे कूजन्त इव पक्षिणः ॥
te śarāḥ preṣitāstena bhīmasenena saṃyuge | nipetuḥ sarvato vīre kūjanta iva pakṣiṇaḥ
भीमसेन द्वारा युद्ध में छोड़े गए वे बाण चहचहाते पक्षियों की तरह उस वीर पर चारों ओर से आ गिरे।
श्लोक 47 (7.131.47)
हेमपुङ्खा महावेगा भीमसेनधनुश्च्युताः । प्राच्छादयंस्ते राधेयं शलभा इव पावकम् ॥
hemapuṅkhā mahāvegā bhīmasenadhanuścyutāḥ | prācchādayaṃste rādheyaṃ śalabhā iva pāvakam
सोने के पंखों वाले, अत्यन्त वेगवान, भीमसेन के धनुष से छूटे वे बाण राधेय को वैसे ढक बैठे जैसे पतंगे अग्नि को ढक लेते हैं।
श्लोक 48 (7.131.48)
कर्णस्तु रथिनां श्रेष्ठश्छाद्यमानः समन्ततः । राजन्व्यसृजदुग्राणि शरवर्षाणि भारत ॥
karṇastu rathināṃ śreṣṭhaśchādyamānaḥ samantataḥ | rājanvyasṛjadugrāṇi śaravarṣāṇi bhārata
परन्तु रथियों में श्रेष्ठ कर्ण ने चारों ओर से ढके जाने पर भी भयंकर बाण-वर्षाएँ कीं, हे राजन्, हे भारत।
श्लोक 49 (7.131.49)
तस्य तानशनिप्रख्यानिषून्समरशोभिनः । चिच्छेद बहुभिर्भल्लैरसम्प्राप्तान्वृकोदरः ॥
tasya tānaśaniprakhyāniṣūnsamaraśobhinaḥ | ciccheda bahubhirbhallairasamprāptānvṛkodaraḥ
वज्र के समान दीखने वाले और रणभूमि में शोभा पाने वाले उसके उन बाणों को वृकोदर ने उनके पहुँचने से पहले ही बहुत-से भल्लों से काट डाला।
श्लोक 50 (7.131.50)
पुनश्च शरवर्षेण च्छादयामास भारत । कर्णो वैकर्तनो युद्धे भीमसेनमरिन्दमः ॥
punaśca śaravarṣeṇa cchādayāmāsa bhārata | karṇo vaikartano yuddhe bhīmasenamarindamaḥ
और फिर शत्रुओं का दमन करने वाले वैकर्तन कर्ण ने युद्ध में भीमसेन को बाणों की वर्षा से ढक दिया, हे भारत।
श्लोक 51 (7.131.51)
तत्र भारत भीमं तु दृष्टवन्तः स्म सायकैः । समाचिततनुं सङ्ख्ये श्वाविधं शललैरिव ॥
tatra bhārata bhīmaṃ tu dṛṣṭavantaḥ sma sāyakaiḥ | samācitatanuṃ saṅkhye śvāvidhaṃ śalalairiva
वहाँ, हे भारत, हमने युद्ध में भीम को देखा, जिनका शरीर बाणों से ऐसा भर गया था जैसे काँटों से भरा साही।
श्लोक 52 (7.131.52)
हेमपुङ्खाञ्छिलाधौतान्कर्णचापच्युताञ्छरान् । दधार समरे वीरः स्वरश्मीनिव रश्मिमान् ॥
hemapuṅkhāñchilādhautānkarṇacāpacyutāñcharān | dadhāra samare vīraḥ svaraśmīniva raśmimān
उस वीर ने रण में कर्ण के धनुष से छूटे हुए सोने के पंखों वाले, शान पर चढ़े बाणों को वैसे धारण किया जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणों को धारण करता है।
श्लोक 53 (7.131.53)
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो भीमसेनो व्यराजत । समृद्धकुसुमापीडो वसन्तेऽशोकवृक्षवत् ॥
rudhirokṣitasarvāṅgo bhīmaseno vyarājata | samṛddhakusumāpīḍo vasante'śokavṛkṣavat
सारे अंगों में रक्त से भीगे हुए भीमसेन वैसे ही शोभित हुए जैसे वसन्त में फूलों से लदा अशोक वृक्ष।
श्लोक 54 (7.131.54)
तत्तु भीमो महाबाहोः कर्णस्य चरितं रणे । नामृष्यत महाबाहुः क्रोधादुद्वृत्तलोचनः ॥
tattu bhīmo mahābāhoḥ karṇasya caritaṃ raṇe | nāmṛṣyata mahābāhuḥ krodhādudvṛttalocanaḥ
महाबाहु भीम कर्ण के उस रण-कर्म को सह न सके, और क्रोध से उनकी आँखें चढ़ गईं।
श्लोक 55 (7.131.55)
स कर्णं पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्पयत् । महीधरमिव श्वेतं गूढपादैर्विषोल्बणैः ॥
sa karṇaṃ pañcaviṃśatyā nārācānāṃ samārpayat | mahīdharamiva śvetaṃ gūḍhapādairviṣolbaṇaiḥ
उन्होंने कर्ण पर पच्चीस नाराच चलाए, मानो विषैले साँपों से भरा कोई श्वेत पर्वत हो।
श्लोक 56 (7.131.56)
पुनरेव च विव्याध षड्भिरष्टाभिरेव च । मर्मस्वमरविक्रान्तः सूतपुत्रं तनुत्यजम् ॥
punareva ca vivyādha ṣaḍbhiraṣṭābhireva ca | marmasvamaravikrāntaḥ sūtaputraṃ tanutyajam
अमरों के समान पराक्रमी भीम ने फिर छह और आठ बाणों से मर्मस्थानों में उस सूतपुत्र को बींधा, जो प्राण देने को भी तैयार था।
श्लोक 57 (7.131.57)
पुनरन्येन बाणेन भीमसेनः प्रतापवान् । चिच्छेद कार्मुकं तूर्णं कर्णस्य प्रहसन्निव ॥
punaranyena bāṇena bhīmasenaḥ pratāpavān | ciccheda kārmukaṃ tūrṇaṃ karṇasya prahasanniva
फिर प्रतापी भीमसेन ने एक और बाण से मानो हँसते हुए कर्ण का धनुष तुरन्त काट डाला।
श्लोक 58 (7.131.58)
जघान चतुरश्चाश्वान्सूतं च त्वरितः शरैः । नाराचैरर्करश्म्याभैः कर्णं विव्याध चोरसि ॥
jaghāna caturaścāśvānsūtaṃ ca tvaritaḥ śaraiḥ | nārācairarkaraśmyābhaiḥ karṇaṃ vivyādha corasi
उसने शीघ्र ही बाणों से कर्ण के चारों घोड़ों और सारथि को मार डाला, और सूर्य की किरणों जैसे चमकते नाराचों से कर्ण की छाती बींध दी।
श्लोक 59 (7.131.59)
ते जग्मुर्धरणीमाशु कर्णं निर्भिद्य पत्रिणः । यथा जलधरं भित्त्वा दिवाकरमरीचयः ॥
te jagmurdharaṇīmāśu karṇaṃ nirbhidya patriṇaḥ | yathā jaladharaṃ bhittvā divākaramarīcayaḥ
कर्ण को बींधकर वे पंखदार बाण शीघ्र ही पृथ्वी में जा धँसे, जैसे सूर्य की किरणें मेघ को चीरकर निकल जाती हैं।
श्लोक 60 (7.131.60)
स वैक्लव्यं महत्प्राप्य च्छिन्नधन्वा शराहतः । तथा पुरुषमानी स लज्जामुत्सृज्य भारत । भीमसेनभयात्कर्णः प्रत्यपायाद्रथान्तरम् ॥
sa vaiklavyaṃ mahatprāpya cchinnadhanvā śarāhataḥ | tathā puruṣamānī sa lajjāmutsṛjya bhārata | bhīmasenabhayātkarṇaḥ pratyapāyādrathāntaram
बहुत व्याकुल होकर, धनुष कट जाने और बाणों से घायल हो जाने पर, अपने को पुरुषार्थी मानने वाला कर्ण, हे भारत, लज्जा छोड़कर भीमसेन के भय से दूसरे रथ पर चला गया।