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द्रोण पर्व · अध्याय 132

भीम और कर्ण का पुनः युद्ध

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि भीम के सामने दुर्योधन और कर्ण का क्या हुआ, और सञ्जय बताते हैं कि कर्ण नया रथ लेकर फिर भीम के सामने आया। पाण्डवों और द्रौपदी के प्रति किए गए एक-एक अन्याय को याद करके भीम पूरे बल से टूट पड़ते हैं। दोनों वीर एक-दूसरे को बाणों से ढक देते हैं, सेनाएँ काँप उठती हैं, कृष्ण और अर्जुन भीम पर भार बहुत भारी मानते हैं, और रणभूमि गिरे हुए योद्धाओं से पट जाती है।

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.132.1)

स्वयं शिष्यो महेशस्य भृगूत्तमधनुर्धरः । शिष्यत्वं प्राप्तवान्कर्णस्तस्य तुल्योऽस्त्रविद्यया ॥

svayaṃ śiṣyo maheśasya bhṛgūttamadhanurdharaḥ | śiṣyatvaṃ prāptavānkarṇastasya tulyo'stravidyayā

भृगुश्रेष्ठ परशुराम, जो धनुष धारण करते हैं, स्वयं महेश्वर शिव के शिष्य थे; कर्ण उन्हीं का शिष्य बना और अस्त्रविद्या में उनके समान है।

श्लोक 2 (7.132.2)

तद्विशिष्टोऽपि वा कर्णः शिष्यः शिष्यगुणैर्युतः । कुन्तीपुत्रेण भीमेन निर्जितः स तु लीलया ॥

tadviśiṣṭo'pi vā karṇaḥ śiṣyaḥ śiṣyaguṇairyutaḥ | kuntīputreṇa bhīmena nirjitaḥ sa tu līlayā

अथवा वह उनसे भी बढ़कर है, शिष्य के गुणों से सम्पन्न शिष्य। फिर भी उस कर्ण को कुन्तीपुत्र भीम ने खेल-खेल में जीत लिया।

श्लोक 3 (7.132.3)

यस्मिञ्जयाशा महती पुत्राणां मम सञ्जय । तं भीमाद्विमुखं दृष्ट्वा किन्नु दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

yasmiñjayāśā mahatī putrāṇāṃ mama sañjaya | taṃ bhīmādvimukhaṃ dṛṣṭvā kinnu duryodhano'bravīt

सञ्जय, जिस कर्ण पर मेरे पुत्रों को विजय की इतनी बड़ी आशा थी, उसे भीम से विमुख होते देखकर दुर्योधन ने क्या कहा?

श्लोक 4 (7.132.4)

कथं च युयुधे भीमो वीर्यश्लाघी महाबलः ॥

kathaṃ ca yuyudhe bhīmo vīryaślāghī mahābalaḥ

और अपने पराक्रम पर गर्व करने वाले महाबली भीम ने कैसे युद्ध किया?

श्लोक 5 (7.132.5)

कर्णो वा समरे तात किमकार्षीदतः परम् । भीमसेनं रणे दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव पावकम् ॥

karṇo vā samare tāta kimakārṣīdataḥ param | bhīmasenaṃ raṇe dṛṣṭvā jvalantamiva pāvakam

और तात, कर्ण ने रणभूमि में अग्नि की तरह दहकते हुए भीमसेन को देखकर इसके बाद क्या किया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (7.132.6)

रथमन्यं समास्थाय विधिवत्कल्पितं पुनः । अभ्ययात्पाण्डवं कर्णो वातोद्धूत इवार्णवः ॥

rathamanyaṃ samāsthāya vidhivatkalpitaṃ punaḥ | abhyayātpāṇḍavaṃ karṇo vātoddhūta ivārṇavaḥ

विधिपूर्वक नए सिरे से सजाए गए दूसरे रथ पर चढ़कर कर्ण वायु से उछलते सागर की तरह पाण्डव भीमसेन की ओर बढ़ा।

श्लोक 7 (7.132.7)

क्रुद्धमाधिरथिं दृष्ट्वा पुत्रास्तव विशाम्पते । भीमसेनममन्यन्त वैश्वानरमुखे हुतम् ॥

kruddhamādhirathiṃ dṛṣṭvā putrāstava viśāmpate | bhīmasenamamanyanta vaiśvānaramukhe hutam

हे प्रजापालक, अधिरथपुत्र कर्ण को क्रुद्ध देखकर आपके पुत्रों ने भीमसेन को मानो अग्नि के मुख में हवन किया हुआ मान लिया।

श्लोक 8 (7.132.8)

चापशब्दं ततः कृत्वा तलशब्दं च भैरवम् । अभ्यद्रवत राधेयो भीमसेनरथं प्रति ॥

cāpaśabdaṃ tataḥ kṛtvā talaśabdaṃ ca bhairavam | abhyadravata rādheyo bhīmasenarathaṃ prati

धनुष की टंकार और हथेलियों की भयंकर थाप करके राधापुत्र कर्ण भीमसेन के रथ की ओर झपटा।

श्लोक 9 (7.132.9)

पुनरेव तयो राजन्घोर आसीत्समागमः । वैकर्तनस्य शूरस्य भीमस्य च महात्मनः ॥

punareva tayo rājanghora āsītsamāgamaḥ | vaikartanasya śūrasya bhīmasya ca mahātmanaḥ

हे राजन्, शूर वैकर्तन कर्ण और महात्मा भीम के बीच फिर एक भयंकर संग्राम हुआ।

श्लोक 10 (7.132.10)

संरब्धौ हि महाबाहू परस्परवधैषिणौ । अन्योन्यभीक्षाञ्चक्राते दहन्ताविव लोचनैः ॥

saṃrabdhau hi mahābāhū parasparavadhaiṣiṇau | anyonyabhīkṣāñcakrāte dahantāviva locanaiḥ

दोनों महाबाहु क्रोध में भरे थे और एक-दूसरे का वध चाहते थे; वे आँखों से मानो एक-दूसरे को जलाते हुए ताकने लगे।

श्लोक 11 (7.132.11)

क्रोधरक्तेक्षणौ तीव्रौ निःश्वसन्ताविवोरगौ । शूरावन्योन्यमासाद्य ततक्षतुररिन्दमौ ॥

krodharaktekṣaṇau tīvrau niḥśvasantāvivoragau | śūrāvanyonyamāsādya tatakṣaturarindamau

क्रोध से लाल आँखों वाले, उग्र और साँपों की तरह फुफकारते हुए वे दोनों शत्रुदमन शूर एक-दूसरे के निकट आकर परस्पर घाव करने लगे।

श्लोक 12 (7.132.12)

व्याघ्राविव सुसंरब्धौ श्येनाविव च शीघ्रगौ । शरभाविव सङ्क्रुद्धौ युयुधाते परस्परम् ॥

vyāghrāviva susaṃrabdhau śyenāviva ca śīghragau | śarabhāviva saṅkruddhau yuyudhāte parasparam

वे दोनों क्रुद्ध बाघों की तरह, वेगवान बाजों की तरह और कुपित शरभों की तरह एक-दूसरे से लड़ने लगे।

श्लोक 13 (7.132.13)

ततो भीमः स्मरन्क्लेशानक्षद्यूते वनेऽपि च । विराटनगरे चैव दुःखं प्राप्तमरिन्दमः ॥

tato bhīmaḥ smarankleśānakṣadyūte vane'pi ca | virāṭanagare caiva duḥkhaṃ prāptamarindamaḥ

तब शत्रुदमन भीम ने द्यूत-सभा और वन के क्लेशों को, तथा विराट नगर में सहे हुए दुःख को स्मरण किया,

श्लोक 14 (7.132.14)

राष्ट्राणां स्फीतरत्नानां हरणं च तवात्मजैः । सततं च परिक्लेशान्सपुत्रेण त्वया कृतान् ॥

rāṣṭrāṇāṃ sphītaratnānāṃ haraṇaṃ ca tavātmajaiḥ | satataṃ ca parikleśānsaputreṇa tvayā kṛtān

रत्नों से भरे समृद्ध राज्यों के आपके पुत्रों द्वारा हड़प लिए जाने को, और पुत्रों सहित आपके द्वारा निरन्तर दिए गए कष्टों को,

श्लोक 15 (7.132.15)

दग्धुमैच्छश्च यः कुन्तीं सपुत्रां त्वमनागसम् । कृष्णायाश्च परिक्लेशं सभामध्ये दुरात्मभिः ॥

dagdhumaicchaśca yaḥ kuntīṃ saputrāṃ tvamanāgasam | kṛṣṇāyāśca parikleśaṃ sabhāmadhye durātmabhiḥ

निर्दोष कुन्ती को पुत्रों सहित जला डालने की आपकी इच्छा को, और दुष्टों द्वारा सभा के बीच कृष्णा के अपमान को,

श्लोक 16 (7.132.16)

केशपक्षग्रहं चैव दुःशासनकृतं तथा । परुषाणि च वाक्यानि कर्णेनोक्तानि भारत ॥

keśapakṣagrahaṃ caiva duḥśāsanakṛtaṃ tathā | paruṣāṇi ca vākyāni karṇenoktāni bhārata

दुःशासन द्वारा उसके केश पकड़े जाने को, और हे भारत, कर्ण द्वारा कहे गए कठोर वचनों को भी स्मरण किया:

श्लोक 17 (7.132.17)

पतिमन्यं परीप्सस्व न सन्ति पतयस्तव । पतिता नरके पार्थाः सर्वे षण्डतिलोपमाः ॥

patimanyaṃ parīpsasva na santi patayastava | patitā narake pārthāḥ sarve ṣaṇḍatilopamāḥ

"तुम किसी दूसरे पति को खोज लो, तुम्हारे कोई पति नहीं हैं। पार्थ सब नरक में गिर चुके हैं, सब के सब निष्फल तिलों के समान हैं।"

श्लोक 18 (7.132.18)

समक्षं तव कौरव्य यदूचुः कौरवास्तदा । दासीभावेन कृष्णां च भोक्तुकामाः सुतास्तव ॥

samakṣaṃ tava kauravya yadūcuḥ kauravāstadā | dāsībhāvena kṛṣṇāṃ ca bhoktukāmāḥ sutāstava

और हे कौरव्य, जब आपके पुत्र कृष्णा को दासी बनाकर भोगना चाहते थे, तब आपके सामने कौरवों ने जो कहा था, उसे भी,

श्लोक 19 (7.132.19)

यच्चापि तान्प्रव्रजतः कृष्णाजिननिवासिनः । परुषाण्युक्तवान्कर्णः सभायां सन्निधौ तव ॥

yaccāpi tānpravrajataḥ kṛṣṇājinanivāsinaḥ | paruṣāṇyuktavānkarṇaḥ sabhāyāṃ sannidhau tava

और कृष्णमृग-चर्म पहने हुए जब वे वनवास को जा रहे थे, तब सभा में आपके निकट कर्ण ने उनसे जो कठोर बातें कही थीं, उन्हें भी,

श्लोक 20 (7.132.20)

तृणीकृत्य च यत्पार्थांस्तव पुत्रो ववल्ग ह । विषमस्थान्समस्थो हि संरब्धो गतचेतनः ॥

tṛṇīkṛtya ca yatpārthāṃstava putro vavalga ha | viṣamasthānsamastho hi saṃrabdho gatacetanaḥ

और पार्थों को तिनके के समान तुच्छ मानकर आपके पुत्र ने कैसे इतराया था, स्वयं समतल भूमि पर खड़ा और क्रोध में बेसुध होकर, जबकि वे विषम स्थिति में थे।

श्लोक 21 (7.132.21)

बाल्यात्प्रभृति चारिघ्नः स्वानि दुःखानि चिन्तयन् । निरविद्यत धर्मात्मा जीवितेन वृकोदरः ॥

bālyātprabhṛti cārighnaḥ svāni duḥkhāni cintayan | niravidyata dharmātmā jīvitena vṛkodaraḥ

बचपन से ही अपने दुःखों का चिन्तन करते हुए शत्रुनाशक धर्मात्मा वृकोदर अपने जीवन से विरक्त हो गया था।

श्लोक 22 (7.132.22)

ततो विष्फार्य सुमहद्धेमपृष्ठं दुरासदम् । चापं भरतशार्दूलस्त्यक्तात्मा कर्णमभ्ययात् ॥

tato viṣphārya sumahaddhemapṛṣṭhaṃ durāsadam | cāpaṃ bharataśārdūlastyaktātmā karṇamabhyayāt

तब अपने प्राणों का मोह छोड़कर भरतों के उस सिंह ने अपने विशाल, सुनहरी पीठ वाले, दुर्धर्ष धनुष को तानकर कर्ण पर चढ़ाई की।

श्लोक 23 (7.132.23)

स सायकमयैर्जालैर्भीमः कर्णरथं प्रति । भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोः प्राच्छादयत्प्रभां ॥

sa sāyakamayairjālairbhīmaḥ karṇarathaṃ prati | bhānumadbhiḥ śilādhautairbhānoḥ prācchādayatprabhāṃ

सान पर चढ़ाए हुए चमकते बाणों के जालों से भीम ने कर्ण के रथ के ऊपर सूर्य की प्रभा को ढक दिया।

श्लोक 24 (7.132.24)

ततः प्रहस्याधिरथिस्तूर्णमस्यञ्शिताञ्शरान् । व्यधमद्भीमसेनस्य शरजालानि पत्रिभिः ॥

tataḥ prahasyādhirathistūrṇamasyañśitāñśarān | vyadhamadbhīmasenasya śarajālāni patribhiḥ

तब अधिरथपुत्र कर्ण ने हँसकर शीघ्रता से तीखे बाण चलाए और अपने पंखदार बाणों से भीमसेन के बाणजालों को काट डाला।

श्लोक 25 (7.132.25)

महारथो महाबाहुर्महाबाणैर्महाबलः । विव्याधाधिरथिर्भीमं नवभिर्निशितैस्तदा ॥

mahāratho mahābāhurmahābāṇairmahābalaḥ | vivyādhādhirathirbhīmaṃ navabhirniśitaistadā

तब महारथी, महाबाहु और महाबली अधिरथपुत्र ने नौ तीखे और बड़े बाणों से भीम को बींध दिया।

श्लोक 26 (7.132.26)

स तोत्रैरिव मातङ्गो वार्यमाणः पतत्त्रिभः । अभ्यधावदसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं वृकोदरः ॥

sa totrairiva mātaṅgo vāryamāṇaḥ patattribhaḥ | abhyadhāvadasambhrāntaḥ sūtaputraṃ vṛkodaraḥ

अंकुशों से रोके जाते हाथी की तरह उन पंखदार बाणों से रोके जाने पर भी वृकोदर निर्भय होकर सूतपुत्र पर दौड़ पड़ा।

श्लोक 27 (7.132.27)

तमापतन्तं वेगेन रभसं पाण्डवर्षभम् । कर्णः प्रत्युद्ययौ युद्धे मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥

tamāpatantaṃ vegena rabhasaṃ pāṇḍavarṣabham | karṇaḥ pratyudyayau yuddhe matto mattamiva dvipam

वेग से झपटते हुए उस उतावले पाण्डव-वृषभ का सामना करने के लिए कर्ण युद्ध में ऐसे आगे बढ़ा, जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी की ओर बढ़ता है।

श्लोक 28 (7.132.28)

ततः प्रध्माप्य जलजं भेरीशतसमस्वनम् । अक्षुभ्यत बलं हर्षादुद्धूत इव सागरः ॥

tataḥ pradhmāpya jalajaṃ bherīśatasamasvanam | akṣubhyata balaṃ harṣāduddhūta iva sāgaraḥ

तब सैकड़ों भेरियों के समान गूँजने वाला शंख बजाकर उसने ऐसा नाद किया कि हर्ष से सेना उमड़ते सागर की तरह उमड़ पड़ी।

श्लोक 29 (7.132.29)

तदुद्धूतं बलं दृष्ट्वा नागाश्वरथपत्तिमत् । भीमः कर्णं समासाद्य च्छादयामास सायकैः ॥

taduddhūtaṃ balaṃ dṛṣṭvā nāgāśvarathapattimat | bhīmaḥ karṇaṃ samāsādya cchādayāmāsa sāyakaiḥ

हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से भरी उस सेना को उमड़ते देखकर भीम ने कर्ण के पास पहुँचकर उसे बाणों से ढक दिया।

श्लोक 30 (7.132.30)

अश्वानृक्षसवर्णांश्च हंसवर्णैर्हयोत्तमैः । व्यामिश्रयद्रणे कर्णः पाण्डवं छादयञ्छरैः ॥

aśvānṛkṣasavarṇāṃśca haṃsavarṇairhayottamaiḥ | vyāmiśrayadraṇe karṇaḥ pāṇḍavaṃ chādayañcharaiḥ

रण में कर्ण के हंस के रंग वाले उत्तम घोड़े पाण्डव के रीछ के रंग वाले घोड़ों से मिल गए, जब वह उन्हें बाणों से ढक रहा था।

श्लोक 31 (7.132.31)

ऋक्षवर्णान्हयान्कर्कैर्मिश्रान्मारुतरंहसः । निरीक्ष्य तव पुत्राणां हाहाकृतमभूद्बलम् ॥

ṛkṣavarṇānhayānkarkairmiśrānmārutaraṃhasaḥ | nirīkṣya tava putrāṇāṃ hāhākṛtamabhūdbalam

वायु के समान वेग वाले रीछ के रंग के घोड़ों को श्वेत घोड़ों से मिला हुआ देखकर आपके पुत्रों की सेना में हाहाकार मच गया।

श्लोक 32 (7.132.32)

ते हया बह्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहसः । सितासिता महाराज यथा व्योम्नि वलाहकाः ॥

te hayā bahvaśobhanta miśritā vātaraṃhasaḥ | sitāsitā mahārāja yathā vyomni valāhakāḥ

वायु के समान वेग वाले वे मिले हुए घोड़े, हे महाराज, आकाश में श्वेत और श्याम बादलों की तरह बहुत शोभा पा रहे थे।

श्लोक 33 (7.132.33)

संरब्धौ क्रोधताम्राक्षौ प्रेक्ष्य कर्णवृकोदरौ । सन्त्रस्ताः समकम्पन्त त्वदीयानां महारथाः ॥

saṃrabdhau krodhatāmrākṣau prekṣya karṇavṛkodarau | santrastāḥ samakampanta tvadīyānāṃ mahārathāḥ

क्रोध से ताँबे जैसी लाल आँखों वाले उन क्रुद्ध कर्ण और वृकोदर को देखकर आपके पक्ष के महारथी भय से काँप उठे।

श्लोक 34 (7.132.34)

यमराष्ट्रोपमं घोरमासीदायोधनं तयोः । दुर्दर्शं भरतश्रेष्ठ प्रेतराजपुरं यथा ॥

yamarāṣṭropamaṃ ghoramāsīdāyodhanaṃ tayoḥ | durdarśaṃ bharataśreṣṭha pretarājapuraṃ yathā

उन दोनों का वह रणक्षेत्र यमलोक के समान भयंकर था; हे भरतश्रेष्ठ, वह प्रेतराज की नगरी की तरह देखा नहीं जाता था।

श्लोक 35 (7.132.35)

समाजमिव तच्चित्रं प्रेक्षमाणा महारथाः । नालक्षयञ्जयं व्यक्तमेकस्यैव महारणे ॥

samājamiva taccitraṃ prekṣamāṇā mahārathāḥ | nālakṣayañjayaṃ vyaktamekasyaiva mahāraṇe

उस विचित्र दृश्य को समाज (उत्सव-सभा) की तरह देखते हुए महारथी उस महायुद्ध में किसी एक की ही जय स्पष्ट नहीं देख सके।

श्लोक 36 (7.132.36)

तयोः प्रैक्षन्त सम्मर्दं सन्निकृष्टं महास्त्रयोः । तव दुर्मन्त्रिते राजन्सपुत्रस्य विशाम्पते ॥

tayoḥ praikṣanta sammardaṃ sannikṛṣṭaṃ mahāstrayoḥ | tava durmantrite rājansaputrasya viśāmpate

हे राजन्, हे प्रजापालक, महान् अस्त्रों के उन दोनों ज्ञाताओं के उस निकट के संघर्ष को, जो आपके और आपके पुत्रों के कुमन्त्र का फल था, सब देखते रहे।

श्लोक 37 (7.132.37)

छादयन्तौ हि शत्रुघ्नावन्योन्यं सायकैः शितैः । शरजालावृतं व्योम चक्रातेऽद्भुतविक्रमौ ॥

chādayantau hi śatrughnāvanyonyaṃ sāyakaiḥ śitaiḥ | śarajālāvṛtaṃ vyoma cakrāte'dbhutavikramau

तीखे बाणों से एक-दूसरे को ढकते हुए वे दोनों शत्रुनाशक, अद्भुत पराक्रमी वीर आकाश को बाणजालों से आच्छादित करने लगे।

श्लोक 38 (7.132.38)

तावन्योन्यं जिघांसन्तौ शरैस्तीक्ष्णैर्महारथौ । प्रेक्षणीयतरावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥

tāvanyonyaṃ jighāṃsantau śaraistīkṣṇairmahārathau | prekṣaṇīyatarāvāstāṃ vṛṣṭimantāvivāmbudau

तीखे बाणों से एक-दूसरे को मार डालने की इच्छा करने वाले वे दोनों महारथी वर्षा करते दो बादलों की तरह अत्यन्त दर्शनीय हो गए।

श्लोक 39 (7.132.39)

सुवर्णविकृतान्बाणान्विमुञ्चन्तावरिन्दमौ । भास्वरं व्योम चक्राते महोल्काभिरिव प्रभो ॥

suvarṇavikṛtānbāṇānvimuñcantāvarindamau | bhāsvaraṃ vyoma cakrāte maholkābhiriva prabho

सोने से गढ़े हुए बाण छोड़ते हुए उन दोनों शत्रुदमनों ने, हे प्रभो, आकाश को मानो बड़ी-बड़ी उल्काओं से जगमगा दिया।

श्लोक 40 (7.132.40)

ताभ्यां मुक्ताः शरा राजन्गार्ध्रपत्राश्चकाशिरे । श्रेण्यः शरदि मत्तानां सारसानामिवाम्बरे ॥

tābhyāṃ muktāḥ śarā rājangārdhrapatrāścakāśire | śreṇyaḥ śaradi mattānāṃ sārasānāmivāmbare

उन दोनों के छोड़े हुए गिद्ध के पंखों वाले बाण, हे राजन्, शरद ऋतु के आकाश में मतवाले सारसों की पंक्तियों की तरह चमक रहे थे।

श्लोक 41 (7.132.41)

संसक्तं सूतपुत्रेण दृष्ट्वा भीममरिन्दमम् । अतिभारममन्येतां भीमे कृष्णधनञ्जयौ ॥

saṃsaktaṃ sūtaputreṇa dṛṣṭvā bhīmamarindamam | atibhāramamanyetāṃ bhīme kṛṣṇadhanañjayau

शत्रुदमन भीम को सूतपुत्र से भिड़ा हुआ देखकर कृष्ण और अर्जुन ने मान लिया कि भीम पर भार बहुत अधिक है।

श्लोक 42 (7.132.42)

तत्राधिरथिभीमाभ्यां शरैर्मुक्तैर्दृढं हताः । इषुपातमतिक्रम्य पेतुरश्वनरद्विपाः ॥

tatrādhirathibhīmābhyāṃ śarairmuktairdṛḍhaṃ hatāḥ | iṣupātamatikramya peturaśvanaradvipāḥ

वहाँ अधिरथपुत्र और भीम के छोड़े हुए बाणों से कसकर मारे गए घोड़े, मनुष्य और हाथी बाण की पहुँच से दूर तक गिरते गए।

श्लोक 43 (7.132.43)

पतद्भिः पतितैश्चान्यैर्गतासुभिरनेकशः । कृतो राजन्महाराज पुत्राणां ते जनक्षयः ॥

patadbhiḥ patitaiścānyairgatāsubhiranekaśaḥ | kṛto rājanmahārāja putrāṇāṃ te janakṣayaḥ

बहुत-से गिरते हुए और गिरे हुए प्राणहीन योद्धाओं से, हे महाराज, आपके पुत्रों के लोगों का भारी संहार हो गया।

श्लोक 44 (7.132.44)

मनुष्याश्वगजानां च शरीरैर्गतजीवितैः । क्षणेन भूमिः सञ्जज्ञे संवृता भरतर्षभ ॥

manuṣyāśvagajānāṃ ca śarīrairgatajīvitaiḥ | kṣaṇena bhūmiḥ sañjajñe saṃvṛtā bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, क्षण भर में पृथ्वी मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के प्राणहीन शरीरों से पट गई।

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