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द्रोण पर्व · अध्याय 133

भीम द्वारा कर्ण का रथहीन होना और दुर्जय का वध

धृतराष्ट्र कर्ण के सामने भीम के पराक्रम पर विस्मय करते हैं, अपने पुत्रों के पक्ष को लेकर आशंकित होते हैं, और सञ्जय से दोनों के युद्ध का वर्णन माँगते हैं। कर्ण भीम पर शक्ति फेंकता है, जिसे भीम सात बाणों से आकाश में ही काट देते हैं। घोर आदान-प्रदान के बाद भीम कर्ण का धनुष काट डालते हैं और उसके घोड़े तथा सारथि मार देते हैं; दुर्योधन सहायता के लिए दुर्जय को भेजता है, तो भीम उसे भी यमलोक पहुँचा देते हैं।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.133.1)

अत्यद्भुतमहं मन्ये भीमसेनस्य विक्रमम् । यत्कर्णं योधयामास समरे लघुविक्रमः ॥

atyadbhutamahaṃ manye bhīmasenasya vikramam | yatkarṇaṃ yodhayāmāsa samare laghuvikramaḥ

मैं भीमसेन के पराक्रम को अत्यन्त अद्भुत मानता हूँ कि उस शीघ्र पराक्रमी ने युद्ध में कर्ण से लोहा लिया।

श्लोक 2 (7.133.2)

त्रिदशानपि वा युक्तान्सर्वशस्त्रधरान्युधि । वारयेद्यो रणे कर्णः सयक्षासुरमानुषान् ॥

tridaśānapi vā yuktānsarvaśastradharānyudhi | vārayedyo raṇe karṇaḥ sayakṣāsuramānuṣān

वही कर्ण, जो युद्ध में हथियार उठाए, उद्यत देवताओं को भी यक्षों, असुरों और मनुष्यों समेत रोक सकता है,

श्लोक 3 (7.133.3)

स कथं पाण्डवं युद्धे भ्राजमानमिव श्रिया । नातरत्संयुगे तात तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

sa kathaṃ pāṇḍavaṃ yuddhe bhrājamānamiva śriyā | nātaratsaṃyuge tāta tanmamācakṣva sañjaya

सञ्जय, वह युद्ध में तेज से दमकते हुए उस पाण्डव को कैसे नहीं पार कर सका? यह मुझे बताओ।

श्लोक 4 (7.133.4)

कथं च युद्धं सम्भूतं तयोः प्राणदुरोदरे । अत्र मन्ये समायत्तो जयो वाऽजय एव च ॥

kathaṃ ca yuddhaṃ sambhūtaṃ tayoḥ prāṇadurodare | atra manye samāyatto jayo vā'jaya eva ca

प्राणों की बाज़ी वाला उन दोनों का युद्ध कैसे हुआ? मेरे विचार से उसी में जय और पराजय दोनों दाँव पर लगी थीं।

श्लोक 5 (7.133.5)

कर्णं प्राप्य रणे सूत मम पुत्रः सुयोधनः । जेतुमुत्सहते पार्थान्सगोविन्दान्ससात्वतान् ॥

karṇaṃ prāpya raṇe sūta mama putraḥ suyodhanaḥ | jetumutsahate pārthānsagovindānsasātvatān

सूत, कर्ण को पाकर मेरा पुत्र सुयोधन रण में गोविन्द और सात्वतों सहित पार्थों को जीतने का साहस करता है।

श्लोक 6 (7.133.6)

श्रुत्वा तु निर्जितं कर्णमसकृद्भीमकर्मणा । भीमसेनेन समरे मोह आविशतीव माम् ॥

śrutvā tu nirjitaṃ karṇamasakṛdbhīmakarmaṇā | bhīmasenena samare moha āviśatīva mām

यह सुनकर कि भयंकर कर्म करने वाले भीमसेन ने रण में कर्ण को बार-बार हराया है, मुझे मानो मोह ने घेर लिया है।

श्लोक 7 (7.133.7)

विनष्टान्कौरवान्मन्ये मम पुत्रस्य दुर्नयैः । नहि कर्णो महेष्वासान्पार्थाञ्जेष्यति सञ्जय ॥

vinaṣṭānkauravānmanye mama putrasya durnayaiḥ | nahi karṇo maheṣvāsānpārthāñjeṣyati sañjaya

सञ्जय, मुझे लगता है कि मेरे पुत्र की कुनीतियों से कौरव नष्ट हो गए, क्योंकि कर्ण महान धनुर्धर पार्थों को नहीं जीत पाएगा।

श्लोक 8 (7.133.8)

कृतवान्यानि युद्धानि कर्णः पाण्डुसुतैः सह । सर्वत्र पाण्डवाः कर्णमजयंस्ते रणाजिरे ॥

kṛtavānyāni yuddhāni karṇaḥ pāṇḍusutaiḥ saha | sarvatra pāṇḍavāḥ karṇamajayaṃste raṇājire

पाण्डुपुत्रों के साथ कर्ण ने जितने युद्ध किए हैं, उन सबमें रणभूमि पर पाण्डवों ने कर्ण को हराया है।

श्लोक 9 (7.133.9)

अजेयाः पाण्डवास्तात देवैरपि सवासवैः । न च तद्बुध्यते मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥

ajeyāḥ pāṇḍavāstāta devairapi savāsavaiḥ | na ca tadbudhyate mandaḥ putro duryodhano mama

तात, पाण्डव इन्द्र सहित देवताओं से भी अजेय हैं, और मेरा मूर्ख पुत्र दुर्योधन यह नहीं समझता।

श्लोक 10 (7.133.10)

धनं धनेश्वरस्येव हृत्वा पार्थस्य मे सुतः । मधुप्रेप्सुरिवाबुद्धिः प्रपातं नावबुध्यते ॥

dhanaṃ dhaneśvarasyeva hṛtvā pārthasya me sutaḥ | madhuprepsurivābuddhiḥ prapātaṃ nāvabudhyate

कुबेर के धन की तरह पार्थ का धन छीनकर मेरा पुत्र शहद चाहने वाले के समान बुद्धिहीन होकर सामने के गड्ढे को नहीं देखता।

श्लोक 11 (7.133.11)

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो राज्यं हृत्वा महात्मनाम् । जितमित्येव मन्वानः पाण्डवानवमन्यते ॥

nikṛtyā nikṛtiprajño rājyaṃ hṛtvā mahātmanām | jitamityeva manvānaḥ pāṇḍavānavamanyate

छल में चतुर उसने महात्माओं का राज्य छल से छीन लिया और यह मानकर कि वे जीत लिए गए, पाण्डवों का तिरस्कार करता है।

श्लोक 12 (7.133.12)

पुत्रस्नेहाभिभूतेन मया चाप्यकृतात्मना । धर्मे स्थिता महात्मानो निकृताः पाण्डुनन्दनाः ॥

putrasnehābhibhūtena mayā cāpyakṛtātmanā | dharme sthitā mahātmāno nikṛtāḥ pāṇḍunandanāḥ

और पुत्र-स्नेह से अभिभूत तथा असंस्कृत बुद्धि वाले मैंने भी धर्म में स्थित उन महात्मा पाण्डवों के साथ छल होने दिया।

श्लोक 13 (7.133.13)

शमकामः ससोदर्यो दीर्घप्रेक्षी युधिष्ठिरः । अशक्त इति मत्वा तु मम पुत्रैर्निराकृतः ॥

śamakāmaḥ sasodaryo dīrghaprekṣī yudhiṣṭhiraḥ | aśakta iti matvā tu mama putrairnirākṛtaḥ

दूरदर्शी युधिष्ठिर शान्ति चाहते थे, भाइयों सहित; मेरे पुत्रों ने उन्हें असमर्थ समझकर ठुकरा दिया।

श्लोक 14 (7.133.14)

तानि दुःखान्यनेकानि विप्रकारांश्च सर्वशः । हृदि कृत्वा महाबाहुर्भीमोऽयुध्यत सूतजम् ॥

tāni duḥkhānyanekāni viprakārāṃśca sarvaśaḥ | hṛdi kṛtvā mahābāhurbhīmo'yudhyata sūtajam

उन अनेक दुःखों और चारों ओर से हुए अपमानों को हृदय में रखकर महाबाहु भीम ने सूतपुत्र से युद्ध किया।

श्लोक 15 (7.133.15)

तस्मान्मे सञ्जय ब्रूहि कर्णभीमौ यथा रणे । अयुध्येतां युधांश्रेष्ठौ परस्परवधैषिणौ ॥

tasmānme sañjaya brūhi karṇabhīmau yathā raṇe | ayudhyetāṃ yudhāṃśreṣṭhau parasparavadhaiṣiṇau

इसलिए सञ्जय, मुझे बताओ कि एक-दूसरे का वध चाहने वाले उन दोनों श्रेष्ठ योद्धा कर्ण और भीम ने रण में कैसे युद्ध किया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (7.133.16)

शृणु राजन्यथावृत्तं सङ्ग्रामं कर्णभीमयोः । परस्परवधप्रेप्स्वोर्वनकुञ्जरयोरिव ॥

śṛṇu rājanyathāvṛttaṃ saṅgrāmaṃ karṇabhīmayoḥ | parasparavadhaprepsvorvanakuñjarayoriva

हे राजन्, सुनिए, एक-दूसरे का वध चाहने वाले दो वन-हाथियों की तरह कर्ण और भीम का संग्राम जैसे हुआ।

श्लोक 17 (7.133.17)

राजन्वैकर्तनो भीमं क्रुद्धः क्रुद्धमरिन्दमम् । पराक्रान्तं पराक्रम्य विव्याध त्रिंशता शरैः ॥

rājanvaikartano bhīmaṃ kruddhaḥ kruddhamarindamam | parākrāntaṃ parākramya vivyādha triṃśatā śaraiḥ

हे राजन्, क्रुद्ध वैकर्तन ने क्रुद्ध शत्रुदमन भीम पर, जो पराक्रम से बढ़ आया था, स्वयं भी पराक्रम दिखाते हुए तीस बाण मारे।

श्लोक 18 (7.133.18)

महावेगैः प्रसन्नाग्रैः शातकुम्भपरिष्कृतैः । नातरद्भरतश्रेष्ठ भीमं वैकर्तनः शरैः ॥

mahāvegaiḥ prasannāgraiḥ śātakumbhapariṣkṛtaiḥ | nātaradbharataśreṣṭha bhīmaṃ vaikartanaḥ śaraiḥ

हे भरतश्रेष्ठ, तीव्र गति वाले, चमकती नोक वाले, सोने से सजे बाणों से भी वैकर्तन भीम को पार नहीं कर सका।

श्लोक 19 (7.133.19)

तस्यास्यतो धनुर्भीमश्चकर्त विशिखैस्त्रिभिः । रथनीडाच्च यन्तारं भल्लेनापातयत्क्षितौ ॥

tasyāsyato dhanurbhīmaścakarta viśikhaistribhiḥ | rathanīḍācca yantāraṃ bhallenāpātayatkṣitau

बाण चलाते हुए कर्ण का धनुष भीम ने तीन बाणों से काट दिया और भल्ल से उसके सारथि को रथ के पीछे के स्थान से धरती पर गिरा दिया।

श्लोक 20 (7.133.20)

स काङ्क्षन्भीमसेनस्य वधं वैकर्तनो भृशम् । शक्तिं कनकवैदूर्यचित्रदण्डां परामृशत् ॥

sa kāṅkṣanbhīmasenasya vadhaṃ vaikartano bhṛśam | śaktiṃ kanakavaidūryacitradaṇḍāṃ parāmṛśat

भीमसेन का वध चाहते हुए वैकर्तन ने सोने और वैदूर्य से चित्रित दण्ड वाली एक शक्ति उठा ली।

श्लोक 21 (7.133.21)

प्रगृह्य च महाशक्तिं कालरात्रिमिवापराम् । समुत्क्षिप्य च राधेयः सन्धाय च महाबलः । चिक्षेप भीमसेनाय जीवितान्तकरीमिव ॥

pragṛhya ca mahāśaktiṃ kālarātrimivāparām | samutkṣipya ca rādheyaḥ sandhāya ca mahābalaḥ | cikṣepa bhīmasenāya jīvitāntakarīmiva

दूसरी कालरात्रि के समान उस महाशक्ति को पकड़कर, उठाकर और साधकर महाबली राधेय ने प्राणों का अन्त करने वाली-सी उस शक्ति को भीमसेन पर फेंका।

श्लोक 22 (7.133.22)

शक्तिं विसृज्य राधेयः पुरन्दर इवाशनिम् । ननाद सुमहानादं बलवान्सूतनन्दनः ॥

śaktiṃ visṛjya rādheyaḥ purandara ivāśanim | nanāda sumahānādaṃ balavānsūtanandanaḥ

इन्द्र के वज्र की तरह उस शक्ति को छोड़कर बलवान सूतपुत्र राधेय ने भारी गर्जना की।

श्लोक 23 (7.133.23)

तं च नादं ततः श्रुत्वा पुत्रास्ते हर्षिताऽभवन् ॥

taṃ ca nādaṃ tataḥ śrutvā putrāste harṣitā'bhavan

और उस गर्जना को सुनकर आपके पुत्र हर्षित हो उठे।

श्लोक 24 (7.133.24)

तां कर्णभुजनिर्मुक्तामर्कवैश्वानरप्रभाम् । शक्तिं वियति चिच्छेद भीमः सप्तभिराशुगैः ॥

tāṃ karṇabhujanirmuktāmarkavaiśvānaraprabhām | śaktiṃ viyati ciccheda bhīmaḥ saptabhirāśugaiḥ

कर्ण की भुजा से छूटी, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी उस शक्ति को भीम ने आकाश में सात तीव्र बाणों से काट डाला।

श्लोक 25 (7.133.25)

छित्त्वा शक्तिं ततो भीमो निर्मुक्तोरगसन्निभाम् । मार्गमाणामिव प्राणान्सूतपुत्रस्य मारिष ॥

chittvā śaktiṃ tato bhīmo nirmuktoragasannibhām | mārgamāṇāmiva prāṇānsūtaputrasya māriṣa

केंचुल से छूटे साँप जैसी दिखने वाली और मानो सूतपुत्र के प्राण खोजती हुई उस शक्ति को काटकर, हे मान्यवर,

श्लोक 26 (7.133.26)

प्राहिणोत्कृतसंरम्भः शरान्बर्हिणवाससः । स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाधौतान्यमदण्डोपमान्मृधे ॥

prāhiṇotkṛtasaṃrambhaḥ śarānbarhiṇavāsasaḥ | svarṇapuṅkhāñśilādhautānyamadaṇḍopamānmṛdhe

क्रोध से भरे भीम ने मोर के पंखों वाले, सोने की पूँछ वाले, सान पर चढ़े और यमदण्ड के समान बाण रण में उस पर चलाए।

श्लोक 27 (7.133.27)

कर्णोऽप्यन्यद्धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् । विकृष्य तन्महच्चापं व्यसृजत्सायकांस्तदा ॥

karṇo'pyanyaddhanurgṛhya hemapṛṣṭhaṃ durāsadam | vikṛṣya tanmahaccāpaṃ vyasṛjatsāyakāṃstadā

कर्ण ने भी सोने की पीठ वाला दूसरा दुर्धर्ष धनुष लेकर उस विशाल धनुष को खींचा और तब बाण छोड़े।

श्लोक 28 (7.133.28)

तान्पाण्डुपुत्रश्चिच्छेद नवभिर्नतपर्वभिः । वसुषेणेन निर्मुक्तान्नव राजन्महाशरान् । छित्त्वा भीमो महाराज नादं सिंह इवानदत् ॥

tānpāṇḍuputraściccheda navabhirnataparvabhiḥ | vasuṣeṇena nirmuktānnava rājanmahāśarān | chittvā bhīmo mahārāja nādaṃ siṃha ivānadat

पाण्डुपुत्र ने झुकी गाँठों वाले नौ बाणों से, वसुषेण के छोड़े हुए उन नौ महाबाणों को, हे राजन्, काट डाला; और उन्हें काटकर, हे महाराज, भीम सिंह की तरह गरजे।

श्लोक 29 (7.133.29)

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । शार्दूलाविव चान्योन्यमामिषार्थेऽभ्यगर्जताम् ॥

tau vṛṣāviva nardantau balinau vāsitāntare | śārdūlāviva cānyonyamāmiṣārthe'bhyagarjatām

गायों के बीच दो बलवान साँड़ों की तरह गरजते हुए, और शिकार के लिए एक-दूसरे पर दहाड़ते दो बाघों की तरह, वे दोनों गरजे।

श्लोक 30 (7.133.30)

अन्योन्यं प्रजिहीर्षन्तावन्योन्यस्यान्तरैषिणौ । अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ गोष्ठेष्विव महर्षभौ ॥

anyonyaṃ prajihīrṣantāvanyonyasyāntaraiṣiṇau | anyonyamabhivīkṣantau goṣṭheṣviva maharṣabhau

एक-दूसरे पर प्रहार करने को आतुर, एक-दूसरे की चूक की ताक में, एक-दूसरे को घूरते हुए वे गोशाला में दो महान साँड़ों की तरह थे।

श्लोक 31 (7.133.31)

महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् । शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥

mahāgajāvivāsādya viṣāṇāgraiḥ parasparam | śaraiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairanyonyamabhijaghnatuḥ

दो महान हाथियों की तरह दाँतों के सिरों से भिड़कर वे पूरी तरह खींचकर छोड़े हुए बाणों से एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 32 (7.133.32)

निर्दहन्तौ महाराज शस्त्रवृष्ट्या परस्परम् । अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ कोपाद्विवृतलोचनौ ॥

nirdahantau mahārāja śastravṛṣṭyā parasparam | anyonyamabhivīkṣantau kopādvivṛtalocanau

हे महाराज, शस्त्रों की वर्षा से एक-दूसरे को जलाते हुए और क्रोध से आँखें फाड़कर एक-दूसरे को घूरते हुए,

श्लोक 33 (7.133.33)

प्रहसन्तौ तथाऽन्योन्यं भर्त्सयन्तौ मुहुर्मुहुः । शङ्खशब्दं च कुर्वाणौ युयुधाते परस्परम् ॥

prahasantau tathā'nyonyaṃ bhartsayantau muhurmuhuḥ | śaṅkhaśabdaṃ ca kurvāṇau yuyudhāte parasparam

एक-दूसरे पर हँसते, बार-बार एक-दूसरे को धमकाते और शंख बजाते हुए वे लड़ते रहे।

श्लोक 34 (7.133.34)

तस्य भीमः पुनश्चापं मुष्टौ चिच्छेद मारिष । शङ्खवर्णांश्च तानश्वान्बाणैर्निन्ये यमक्षयम् । सारथिं च तथाप्यस्य रथनीडादपातयत् ॥

tasya bhīmaḥ punaścāpaṃ muṣṭau ciccheda māriṣa | śaṅkhavarṇāṃśca tānaśvānbāṇairninye yamakṣayam | sārathiṃ ca tathāpyasya rathanīḍādapātayat

फिर हे मान्यवर, भीम ने उसका धनुष मुट्ठी के स्थान पर फिर काट डाला, शंख-जैसे श्वेत घोड़ों को बाणों से यमलोक भेज दिया, और उसके सारथि को भी रथ के पीछे के स्थान से गिरा दिया।

श्लोक 35 (7.133.35)

ततो वैकर्तनः कर्णश्चिन्तां प्राप दुरत्ययाम् । स च्छाद्यमानः समरे हताश्वो हतसारथिः । मोहितः शरजालेन कर्तव्यं नाभ्यपद्यत ॥

tato vaikartanaḥ karṇaścintāṃ prāpa duratyayām | sa cchādyamānaḥ samare hatāśvo hatasārathiḥ | mohitaḥ śarajālena kartavyaṃ nābhyapadyata

तब वैकर्तन कर्ण अपार चिन्ता में पड़ गया। रण में बाणों से ढके जाते हुए, घोड़े और सारथि के मारे जाने पर, बाणजाल से मोहित होकर उसे अपना कर्तव्य नहीं सूझा।

श्लोक 36 (7.133.36)

तथा कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णं दुर्योधनो नृपः । वेपमान इव क्रोधाद्व्यादिदेशाथ दुर्जयम् ॥

tathā kṛcchragataṃ dṛṣṭvā karṇaṃ duryodhano nṛpaḥ | vepamāna iva krodhādvyādideśātha durjayam

कर्ण को ऐसी विपत्ति में देखकर राजा दुर्योधन ने क्रोध से काँपते हुए-से दुर्जय को आज्ञा दी:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 37 (7.133.37)

गच्छ दुर्जय राधेयं पुरा ग्रसति पाण्डवः । जहि तूबरकं क्षिप्रं कर्णस्य बलमादधत् ॥

gaccha durjaya rādheyaṃ purā grasati pāṇḍavaḥ | jahi tūbarakaṃ kṣipraṃ karṇasya balamādadhat

"दुर्जय, जाओ; पाण्डव राधेय को निगलने ही वाला है। उस बिना दाढ़ी-मूँछ वाले को शीघ्र मार डालो और कर्ण को बल दो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (7.133.38)

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा तव पुत्रं तवात्मजः । अभ्यद्रवद्भीमसेनं व्यासक्तं विकिरञ्छरैः ॥

evamuktastathetyuktvā tava putraṃ tavātmajaḥ | abhyadravadbhīmasenaṃ vyāsaktaṃ vikirañcharaiḥ

इस प्रकार कहे जाने पर आपके पुत्र से "ऐसा ही हो" कहकर आपके दूसरे पुत्र दुर्जय ने बाण बरसाते हुए युद्ध में लगे भीमसेन पर धावा बोला।

श्लोक 39 (7.133.39)

स भीमं नवभिर्बाणैरश्वानष्टभिरार्दयत् । षड्भिः सूतं त्रिभिः केतं पुनस्तं चापि सप्तभिः ॥

sa bhīmaṃ navabhirbāṇairaśvānaṣṭabhirārdayat | ṣaḍbhiḥ sūtaṃ tribhiḥ ketaṃ punastaṃ cāpi saptabhiḥ

उसने भीम को नौ बाणों से, घोड़ों को आठ से, सारथि को छह से, ध्वज को तीन से और फिर भीम को सात से पीड़ित किया।

श्लोक 40 (7.133.40)

भीमसेनोऽपि सङ्क्रुद्धः साश्वयन्तारमाशुगैः । दुर्जयं भिन्नमर्माणमनयद्यमसादनम् ॥

bhīmaseno'pi saṅkruddhaḥ sāśvayantāramāśugaiḥ | durjayaṃ bhinnamarmāṇamanayadyamasādanam

भीमसेन ने भी क्रुद्ध होकर तेज बाणों से मर्मस्थल बिंधे हुए दुर्जय को घोड़ों और सारथि सहित यमलोक भेज दिया।

श्लोक 41 (7.133.41)

बाढं हतं क्षितौ क्षुण्णं वेष्टमानं यथोरगम् । रुदन्नार्तस्तव सुतं कर्णश्चक्रे प्रदक्षिणम् ॥

bāḍhaṃ hataṃ kṣitau kṣuṇṇaṃ veṣṭamānaṃ yathoragam | rudannārtastava sutaṃ karṇaścakre pradakṣiṇam

सचमुच मारा गया, धरती पर कुचला हुआ और साँप की तरह छटपटाता हुआ आपका वह पुत्र पड़ा था; आर्त होकर रोते हुए कर्ण ने उसकी प्रदक्षिणा की।

श्लोक 42 (7.133.42)

स तु तं विरथं कृत्वा स्मयन्नत्यन्तवैरिणम् । समाचिनोद्बाणगणैः शतघ्नीभिश्च शङ्कुभिः ॥

sa tu taṃ virathaṃ kṛtvā smayannatyantavairiṇam | samācinodbāṇagaṇaiḥ śataghnībhiśca śaṅkubhiḥ

अपने परम शत्रु को रथहीन करके भीम ने मुस्कराते हुए उसे बाणों के समूहों, शतघ्नियों और कीलों से ढक दिया।

श्लोक 43 (7.133.43)

तथाप्यतिरथः कर्णो भिद्यमानोऽस्य सायकैः । न जहौ समरे भीमं क्रुद्धरूपं परन्तपः ॥

tathāpyatirathaḥ karṇo bhidyamāno'sya sāyakaiḥ | na jahau samare bhīmaṃ kruddharūpaṃ parantapaḥ

तब भी महारथी कर्ण, शत्रुओं को तपाने वाला, उसके बाणों से बिंधता हुआ भी क्रोध में खड़े भीम से मुँह मोड़कर नहीं हटा।

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