द्रोण पर्व · अध्याय 134
दुर्मुख का वध और भीम के सामने से कर्ण का पलायन
रथहीन हुआ कर्ण दूसरे रथ पर चढ़कर भीम से फिर भिड़ता है और बाणों की झड़ी के साथ द्वन्द्व चलता है। भीम गदा से कर्ण के घोड़े मार देते हैं, उसका ध्वज और सारथि काट डालते हैं, और जब दुर्योधन कर्ण के लिए रथ लेकर दुर्मुख को भेजता है तो भीम उसका वध कर देते हैं। कर्ण चौदह बाणों से भीम को बींधता है, पर भीम भी उसे घायल करते हैं और कर्ण भय से रणभूमि छोड़कर भाग जाता है, जबकि भीम अग्नि की तरह दहकते हुए खड़े रहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.134.1)
सर्वथा विरथः कर्णः पुनर्भीमेन निर्जितः । रथमन्यं समास्थाय पुनर्विव्याध पाण्डवम् ॥
sarvathā virathaḥ karṇaḥ punarbhīmena nirjitaḥ | rathamanyaṃ samāsthāya punarvivyādha pāṇḍavam
भीम द्वारा फिर पूरी तरह रथहीन किए गए कर्ण ने दूसरे रथ पर चढ़कर पाण्डव को फिर बींध दिया।
श्लोक 2 (7.134.2)
महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् । शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥
mahāgajāvivāsādya viṣāṇāgraiḥ parasparam | śaraiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairanyonyamabhijaghnatuḥ
दो महान हाथियों की तरह दाँतों के सिरों से भिड़कर वे पूरी तरह खींचकर छोड़े हुए बाणों से एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 3 (7.134.3)
अथ कर्णः शरव्रातैर्भीमसेनं समार्पयत् । ननाद च महानादं पुनर्विव्याध चोरसि ॥
atha karṇaḥ śaravrātairbhīmasenaṃ samārpayat | nanāda ca mahānādaṃ punarvivyādha corasi
फिर कर्ण ने बाणों की बौछार से भीमसेन को पीड़ा पहुँचाई, भारी गर्जना की और फिर उनकी छाती बींध दी।
श्लोक 4 (7.134.4)
तं भीमो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदजिह्मगैः । पुनर्विव्याध सप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥
taṃ bhīmo daśabhirbāṇaiḥ pratyavidhyadajihmagaiḥ | punarvivyādha saptatyā śarāṇāṃ nataparvaṇām
भीम ने उसे सीधे जाने वाले दस बाणों से बींधा, और फिर झुकी गाँठों वाले सत्तर बाणों से बींधा।
श्लोक 5 (7.134.5)
कर्णस्तु नवभिर्भीमं भित्त्वा राजंस्तनान्तरे । ध्वजमेकेन विव्याध विशोकं च त्रिभिः शरैः ॥
karṇastu navabhirbhīmaṃ bhittvā rājaṃstanāntare | dhvajamekena vivyādha viśokaṃ ca tribhiḥ śaraiḥ
परन्तु हे राजन्, कर्ण ने नौ बाणों से भीम की छाती बींधकर एक से उनका ध्वज और तीन बाणों से विशोक को बींध दिया।
श्लोक 6 (7.134.6)
सायकानां ततः पार्थस्त्रिषष्ट्या प्रत्यविध्यत । तोत्रैरिव महानागं कशाभिरिव वाजिनम् ॥
sāyakānāṃ tataḥ pārthastriṣaṣṭyā pratyavidhyata | totrairiva mahānāgaṃ kaśābhiriva vājinam
तब पार्थ ने तिरसठ बाणों से उत्तर दिया, जैसे महान हाथी को अंकुशों से और घोड़े को चाबुकों से मारा जाता है।
श्लोक 7 (7.134.7)
सोऽतिविद्धो महाराज पाण्डवेन यशस्विना । सृक्विणी लेलिहन्वीरः क्रोधरक्तान्तलोचनः ॥
so'tividdho mahārāja pāṇḍavena yaśasvinā | sṛkviṇī lelihanvīraḥ krodharaktāntalocanaḥ
यशस्वी पाण्डव से बुरी तरह बिंधा हुआ, हे महाराज, वह वीर क्रोध से लाल आँखें किए होंठों के कोने चाटने लगा।
श्लोक 8 (7.134.8)
ततः शरं महाराज सर्वकायावदारणम् । प्राहिणोद्भीमसेनाय बलायेन्द्र इवाशनिम् ॥
tataḥ śaraṃ mahārāja sarvakāyāvadāraṇam | prāhiṇodbhīmasenāya balāyendra ivāśanim
तब हे महाराज, उसने भीमसेन पर समूचे शरीर को चीर देने वाला एक बाण छोड़ा, जैसे इन्द्र बल पर वज्र फेंकता है।
श्लोक 9 (7.134.9)
स निर्भिद्य रणे पार्थं सूतपुत्रधनुश्च्युतः । अगच्छद्दारयन्भूमिं चित्रपुङ्खः शिलीमुखः ॥
sa nirbhidya raṇe pārthaṃ sūtaputradhanuścyutaḥ | agacchaddārayanbhūmiṃ citrapuṅkhaḥ śilīmukhaḥ
सूतपुत्र के धनुष से छूटा वह रंग-बिरंगे पंखों वाला बाण रण में पार्थ को बींधकर धरती को चीरता हुआ घुस गया।
श्लोक 10 (7.134.10)
ततो भीमो महाबाहुः क्रोधसंरक्तलोचनः । वज्रकल्पां चतुष्किष्कुं गुर्वीं रुक्माङ्गदां गदाम् । प्राहिणोत्सूतपुत्राय षडस्रामविचारयन् ॥
tato bhīmo mahābāhuḥ krodhasaṃraktalocanaḥ | vajrakalpāṃ catuṣkiṣkuṃ gurvīṃ rukmāṅgadāṃ gadām | prāhiṇotsūtaputrāya ṣaḍasrāmavicārayan
तब क्रोध से लाल आँखों वाले महाबाहु भीम ने बिना सोचे-विचारे सूतपुत्र पर एक भारी गदा फेंकी, जो वज्र के समान थी, चार हाथ लम्बी, छह धारों वाली और सोने के बाजूबन्दों से सजी थी।
श्लोक 11 (7.134.11)
तया जघानाधिरथेः सदश्वान्साधुवाहिनः । गदया भारतः क्रुद्धो वज्रेणेन्द्र इवासुरान् ॥
tayā jaghānādhiratheḥ sadaśvānsādhuvāhinaḥ | gadayā bhārataḥ kruddho vajreṇendra ivāsurān
उसी गदा से क्रुद्ध भारत ने अधिरथपुत्र के उत्तम और सधे हुए घोड़ों को वैसे ही मार डाला, जैसे इन्द्र वज्र से असुरों को मारता है।
श्लोक 12 (7.134.12)
ततो भीमो महाबाहुः क्षुराभ्यां भरतर्षभ । ध्वजमाधिरथेश्छित्त्वा सूतमभ्यहनच्छरैः ॥
tato bhīmo mahābāhuḥ kṣurābhyāṃ bharatarṣabha | dhvajamādhiratheśchittvā sūtamabhyahanaccharaiḥ
फिर हे भरतश्रेष्ठ, महाबाहु भीम ने दो क्षुर-बाणों से अधिरथपुत्र का ध्वज काट डाला और बाणों से उसके सारथि को मार गिराया।
श्लोक 13 (7.134.13)
हताश्वसूतमुत्सृज्य स रथं पतितध्वजम् । विष्फारयन्धनुः कर्णस्तस्थौ भारत दुर्मनाः ॥
hatāśvasūtamutsṛjya sa rathaṃ patitadhvajam | viṣphārayandhanuḥ karṇastasthau bhārata durmanāḥ
घोड़े और सारथि मारे जाने तथा ध्वज गिर जाने पर उस रथ को छोड़कर कर्ण, हे भारत, धनुष की टंकार करता हुआ उदास खड़ा रहा।
श्लोक 14 (7.134.14)
तत्राद्भुतमपश्याम राधेयस्य पराक्रमम् । विरथो रथिनां श्रेष्ठो वारयामास यद्रिपुम् ॥
tatrādbhutamapaśyāma rādheyasya parākramam | viratho rathināṃ śreṣṭho vārayāmāsa yadripum
वहाँ हमने राधेय का अद्भुत पराक्रम देखा कि रथियों में श्रेष्ठ उस वीर ने रथहीन होकर भी अपने शत्रु को रोक रखा।
श्लोक 15 (7.134.15)
विरथं तं नरश्रेष्ठं दृष्ट्वाऽऽधिरथिमाहवे । दुर्योधनस्ततो राजन्नभ्यभाषत दुर्मुखम् ॥
virathaṃ taṃ naraśreṣṭhaṃ dṛṣṭvā''dhirathimāhave | duryodhanastato rājannabhyabhāṣata durmukham
हे राजन्, युद्ध में नरश्रेष्ठ आधिरथि कर्ण को रथहीन देखकर तब दुर्योधन ने दुर्मुख से कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 16 (7.134.16)
एष दुर्मुख राधेयो भीमेन विरथीकृतः । तं रथेन नरश्रेष्ठ सम्पादय महारथम् ॥
eṣa durmukha rādheyo bhīmena virathīkṛtaḥ | taṃ rathena naraśreṣṭha sampādaya mahāratham
"दुर्मुख, भीम ने राधेय को रथहीन कर दिया है। उस नरश्रेष्ठ महारथी को रथ दिलाओ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (7.134.17)
ततो दुर्योधनवचः श्रुत्वा भारत दुर्मुखः । त्वरमाणोऽभ्ययात्कर्णं भीमं चावारयच्छरैः ॥
tato duryodhanavacaḥ śrutvā bhārata durmukhaḥ | tvaramāṇo'bhyayātkarṇaṃ bhīmaṃ cāvārayaccharaiḥ
तब हे भारत, दुर्योधन के वचन सुनकर दुर्मुख शीघ्रता से कर्ण के पास गया और बाणों से भीम को रोकने लगा।
श्लोक 18 (7.134.18)
दुर्मुखं प्रेक्ष्य सङ्ग्रामे सूतपुत्रपदानुगम् । वायुपुत्रः प्रहृष्टोऽभूत्सृक्विणी परिसंलिहन् ॥
durmukhaṃ prekṣya saṅgrāme sūtaputrapadānugam | vāyuputraḥ prahṛṣṭo'bhūtsṛkviṇī parisaṃlihan
सूतपुत्र के पीछे-पीछे चलने वाले दुर्मुख को युद्ध में देखकर वायुपुत्र भीम प्रसन्न हो गए और होंठों के कोने चाटने लगे।
श्लोक 19 (7.134.19)
ततः कर्णं महाराज वारयित्वा शिलीमुखैः । दुर्मुखाय रथं तूर्णं प्रेषयामास पाण्डवः ॥
tataḥ karṇaṃ mahārāja vārayitvā śilīmukhaiḥ | durmukhāya rathaṃ tūrṇaṃ preṣayāmāsa pāṇḍavaḥ
तब हे महाराज, बाणों से कर्ण को रोककर पाण्डव भीम ने अपना रथ शीघ्र ही दुर्मुख की ओर बढ़ाया।
श्लोक 20 (7.134.20)
तस्मिन्क्षणे महाराज नवभिर्नतपर्वभिः । सुमुखैर्दुर्मुखं भीमः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥
tasminkṣaṇe mahārāja navabhirnataparvabhiḥ | sumukhairdurmukhaṃ bhīmaḥ śarairninye yamakṣayam
उसी क्षण हे महाराज, भीम ने नौ तीखी नोक वाले, झुकी गाँठों वाले बाणों से दुर्मुख को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 21 (7.134.21)
ततस्तमेवाधिरथिः स्यन्दनं दुर्मुखे हते । आस्थितः प्रबभौ राजन्दीप्यमान इवांशुमान् ॥
tatastamevādhirathiḥ syandanaṃ durmukhe hate | āsthitaḥ prababhau rājandīpyamāna ivāṃśumān
फिर दुर्मुख के मारे जाने पर उसी रथ पर चढ़कर अधिरथपुत्र, हे राजन्, दहकते सूर्य की तरह शोभित हुआ।
श्लोक 22 (7.134.22)
शयानं भिन्नमर्माणं दुर्मुखं शोणितोक्षितम् । दृष्ट्वा कर्णोऽश्रुपूर्णाक्षो मुहूर्तं नाभ्यवर्तत ॥
śayānaṃ bhinnamarmāṇaṃ durmukhaṃ śoṇitokṣitam | dṛṣṭvā karṇo'śrupūrṇākṣo muhūrtaṃ nābhyavartata
मर्मस्थल कटे हुए और रक्त से लथपथ पड़े दुर्मुख को देखकर कर्ण की आँखें आँसुओं से भर आईं और वह क्षण भर वहाँ से आगे नहीं बढ़ा।
श्लोक 23 (7.134.23)
तं गतासुमतिक्रम्य कृत्वा कर्णः प्रदक्षिणम् । दीर्घमुष्णं श्वसन्वीरो न किञ्चित्प्रत्यपद्यत ॥
taṃ gatāsumatikramya kṛtvā karṇaḥ pradakṣiṇam | dīrghamuṣṇaṃ śvasanvīro na kiñcitpratyapadyata
उस प्राणहीन के पास से निकलकर और उसकी प्रदक्षिणा करके वीर कर्ण लम्बी गर्म साँसें लेता रहा और कुछ न कर सका।
श्लोक 24 (7.134.24)
तस्मिंस्तु विवरे राजन्नाराचान्गार्धवाससः । प्राहिणोत्सूतपुत्राय भीमसेनश्चतुर्दश ॥
tasmiṃstu vivare rājannārācāngārdhavāsasaḥ | prāhiṇotsūtaputrāya bhīmasenaścaturdaśa
उसी अवसर पर, हे राजन्, भीमसेन ने सूतपुत्र पर गिद्ध के पंखों वाले चौदह नाराच छोड़े।
श्लोक 25 (7.134.25)
ते तस्य कवचं भित्त्वा स्वर्णचित्रं महोजसः । हेमपुङ्खा महाराज व्यशोभन्त दिशो दश ॥
te tasya kavacaṃ bhittvā svarṇacitraṃ mahojasaḥ | hemapuṅkhā mahārāja vyaśobhanta diśo daśa
सुनहरे अलंकारों वाले उसके कवच को बींधकर प्रचण्ड वेग वाले वे सोने की पूँछ वाले बाण, हे महाराज, दसों दिशाओं में चमक उठे।
श्लोक 26 (7.134.26)
अपिबन्सूतपुत्रस्य शोणितं रक्तभोजनाः । क्रुद्धा इव मनुष्येन्द्र भुजङ्गाः कालचोदिताः ॥
apibansūtaputrasya śoṇitaṃ raktabhojanāḥ | kruddhā iva manuṣyendra bhujaṅgāḥ kālacoditāḥ
रक्त पीने वाले उन बाणों ने सूतपुत्र का रक्त पिया, हे नरेन्द्र, मानो काल से प्रेरित क्रुद्ध साँप हों।
श्लोक 27 (7.134.27)
प्रसर्पमाणा मेदिन्यां ते व्यरोचन्त मार्गणाः । अर्धप्रविष्टाः संरब्धा बिलानीव महोरगाः ॥
prasarpamāṇā medinyāṃ te vyarocanta mārgaṇāḥ | ardhapraviṣṭāḥ saṃrabdhā bilānīva mahoragāḥ
पृथ्वी पर रेंगते हुए, आधे घुसे और रोष से भरे वे बाण बिलों में घुसते बड़े साँपों की तरह चमके।
श्लोक 28 (7.134.28)
तं प्रत्यविध्यद्राधेयो जाम्बूनदविभूषितैः । चतुर्दशभिरत्युग्रैर्नाराचैरविचारयन् ॥
taṃ pratyavidhyadrādheyo jāmbūnadavibhūṣitaiḥ | caturdaśabhiratyugrairnārācairavicārayan
राधेय ने बिना हिचक जाम्बूनद सोने से सजे चौदह अत्यन्त उग्र नाराचों से उसे बदले में बींध दिया।
श्लोक 29 (7.134.29)
ते भीमसेनस्य भुजं सव्यं निर्भिद्य पत्रिणः । प्राविशन्मेदिनीं भीमाः क्रौञ्चं पत्ररथा इव ॥
te bhīmasenasya bhujaṃ savyaṃ nirbhidya patriṇaḥ | prāviśanmedinīṃ bhīmāḥ krauñcaṃ patrarathā iva
भीमसेन की बायीं भुजा को बींधकर वे भयंकर पंखदार बाण धरती में ऐसे घुस गए, जैसे पक्षी क्रौञ्च पर्वत में घुसते हैं।
श्लोक 30 (7.134.30)
ते व्यरोचन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुन्धराम् । गच्छत्यस्तं दिनकरे दीप्यमाना इवांशवः ॥
te vyarocanta nārācāḥ praviśanto vasundharām | gacchatyastaṃ dinakare dīpyamānā ivāṃśavaḥ
धरती में घुसते हुए वे नाराच अस्त होते सूर्य की दहकती किरणों की तरह चमके।
श्लोक 31 (7.134.31)
स निर्भिन्नो रणे भीमो नाराचैर्मर्मभेदिभिः । सुस्राव रुधिरं भूरि पर्वतः सलिलं यथा ॥
sa nirbhinno raṇe bhīmo nārācairmarmabhedibhiḥ | susrāva rudhiraṃ bhūri parvataḥ salilaṃ yathā
मर्म को बींधने वाले उन नाराचों से रण में बिंधे भीम से बहुत रक्त बहा, जैसे पर्वत से जल बहता है।
श्लोक 32 (7.134.32)
स भीमस्त्रिभिरायस्तः सूतपुत्रं पतत्रिभिः । सुपर्णवेगैर्विव्याध सारथिं चास्य सप्तभिः ॥
sa bhīmastribhirāyastaḥ sūtaputraṃ patatribhiḥ | suparṇavegairvivyādha sārathiṃ cāsya saptabhiḥ
तीन बाणों से पीड़ित भीम ने गरुड़ के-से वेग वाले तीन पंखदार बाणों से सूतपुत्र को और सात से उसके सारथि को बींधा।
श्लोक 33 (7.134.33)
स विह्वलो महाराज कर्णो भीमशराहतः । प्राद्रवज्जवनैरश्वै रणं हित्वा महाभयात् ॥
sa vihvalo mahārāja karṇo bhīmaśarāhataḥ | prādravajjavanairaśvai raṇaṃ hitvā mahābhayāt
हे महाराज, भीम के बाणों से आहत विह्वल कर्ण महान भय से रण छोड़कर अपने तेज घोड़ों पर भाग निकला।
श्लोक 34 (7.134.34)
भीमसेनस्तु विष्फार्य चापं हेमपरिष्कृतम् । आहवेऽतिरथोऽतिष्ठज्ज्वलन्निव हुताशनः ॥
bhīmasenastu viṣphārya cāpaṃ hemapariṣkṛtam | āhave'tiratho'tiṣṭhajjvalanniva hutāśanaḥ
और भीमसेन सोने से सजे धनुष को टंकारकर युद्ध में महारथी की तरह अग्नि के समान दहकते हुए खड़े रहे।