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द्रोण पर्व · अध्याय 136

भीम और कर्ण का युद्ध: दुर्योधन के सात और भाइयों का वध

धृतराष्ट्र के पुत्रों के मारे जाने से दुःखी कर्ण भीम से फिर लड़ता है; भीम उसके घोड़े और सारथि मार डालते हैं और उसका धनुष काट देते हैं, और रथहीन कर्ण जो गदा फेंकता है उसे भीम बाणों से रोक देते हैं। घायल और विमुख हुए कर्ण को बचाने के लिए दुर्योधन सात और भाइयों — चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, चित्रायुध और चित्रवर्मा — को भेजता है, और भीम एक-एक बाण से उन सबको गिरा देते हैं। विदुर की बात याद करता हुआ कर्ण दूसरे रथ पर चढ़कर लौटता है, और दोनों वीरों में बराबरी का लम्बा बाण-युद्ध चलता है।

अध्याय 135अध्याय-सूचीअध्याय 137

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.136.1)

तवात्मजांस्तु पतितान्दृष्ट्वा कर्णः प्रतापवान् । क्रोधेन महताऽऽविष्टो निर्विण्णोऽभूत्स जीवितात् ॥

tavātmajāṃstu patitāndṛṣṭvā karṇaḥ pratāpavān | krodhena mahatā''viṣṭo nirviṇṇo'bhūtsa jīvitāt

आपके पुत्रों को गिरा हुआ देखकर प्रतापी कर्ण महान् क्रोध से भर गया और जीवन से विरक्त-सा हो गया।

श्लोक 2 (7.136.2)

आगस्कृतमिवात्मानं मेने चाधिरथिस्तदा । यत्प्रत्यक्षं तव सुता भीमेन निहता रणे ॥

āgaskṛtamivātmānaṃ mene cādhirathistadā | yatpratyakṣaṃ tava sutā bhīmena nihatā raṇe

तब अधिरथ का पुत्र कर्ण मानो अपने को अपराधी मानने लगा, क्योंकि उसके सामने ही आपके पुत्र रण में भीम के हाथों मारे गये थे।

श्लोक 3 (7.136.3)

भीमसेनस्ततः क्रुद्धः कर्णस्य निशिताञ्शरान् । निचखान स सम्भ्रान्तः पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥

bhīmasenastataḥ kruddhaḥ karṇasya niśitāñśarān | nicakhāna sa sambhrāntaḥ pūrvavairamanusmaran

तब क्रोध में भरे भीमसेन ने पुराने वैर को याद करते हुए, हड़बड़ाहट में, तीखे बाण कर्ण में गाड़ दिये।

श्लोक 4 (7.136.4)

स भीमं पञ्चभिर्विद्ध्वा राधेयः प्रहसन्निव । पुनर्विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ॥

sa bhīmaṃ pañcabhirviddhvā rādheyaḥ prahasanniva | punarvivyādha saptatyā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ

राधापुत्र ने मानो हँसते हुए भीम को पाँच बाणों से बींधा, और फिर सत्तर सुनहरे पंखों वाले, पत्थर पर तेज़ किये बाणों से बींधा।

श्लोक 5 (7.136.5)

अविचिन्त्याथ तान्बाणान्कर्णेनास्तान्वृकोदरः । रणे विव्याध राधेयं शरेणानतपर्वणा ॥

avicintyātha tānbāṇānkarṇenāstānvṛkodaraḥ | raṇe vivyādha rādheyaṃ śareṇānataparvaṇā

कर्ण के छोड़े उन बाणों की परवाह न करके वृकोदर ने रण में एक सीधी गाँठ वाले बाण से राधापुत्र को बींध दिया।

श्लोक 6 (7.136.6)

पुनश्च विशिखैस्तीक्ष्णैर्विद्ध्वा मर्मसु पञ्चभिः । धनुश्चिच्छेद भल्लेन सूतपुत्रस्य मारिष ॥

punaśca viśikhaistīkṣṇairviddhvā marmasu pañcabhiḥ | dhanuściccheda bhallena sūtaputrasya māriṣa

और फिर पाँच तीखे बाणों से मर्मस्थानों में बींधकर उसने भल्ल से सूतपुत्र का धनुष काट डाला, हे मान्यवर।

श्लोक 7 (7.136.7)

अथान्यद्धनुरादाय कर्णो भारत दुर्मनाः । इषुभिश्छादयामास भीमसेनं परन्तपः ॥

athānyaddhanurādāya karṇo bhārata durmanāḥ | iṣubhiśchādayāmāsa bhīmasenaṃ parantapaḥ

तब हे भारत, उदास कर्ण ने दूसरा धनुष लेकर, शत्रुओं को तपाने वाले उस वीर ने, भीमसेन को बाणों से ढँक दिया।

श्लोक 8 (7.136.8)

तस्य भीमो हयान्हत्वा विनिहत्य च सारथिम् । प्रजहास महाहासं कृतप्रतिकृतं महत् ॥

tasya bhīmo hayānhatvā vinihatya ca sārathim | prajahāsa mahāhāsaṃ kṛtapratikṛtaṃ mahat

भीम ने उसके घोड़ों को मारकर और सारथि को भी गिराकर ज़ोर का ठहाका लगाया; यह उसके किये का बड़ा बदला था।

श्लोक 9 (7.136.9)

इषुभिः कार्मुकं चास्य चकर्त पुरुषर्षभः । तत्पपात महाराज स्वर्णपृष्ठं महास्वनम् ॥

iṣubhiḥ kārmukaṃ cāsya cakarta puruṣarṣabhaḥ | tatpapāta mahārāja svarṇapṛṣṭhaṃ mahāsvanam

उस पुरुषश्रेष्ठ ने बाणों से उसका धनुष भी काट डाला; हे महाराज, वह सुनहरी पीठ वाला धनुष बड़ी आवाज़ के साथ गिर पड़ा।

श्लोक 10 (7.136.10)

अवारोहद्रथात्तस्मादथ कर्णो महारथः । गदां गृहीत्वा समरे भीमाय प्राहिणोद्रुषा ॥

avārohadrathāttasmādatha karṇo mahārathaḥ | gadāṃ gṛhītvā samare bhīmāya prāhiṇodruṣā

तब महारथी कर्ण उस रथ से उतर पड़ा और गदा लेकर क्रोध से उसने भीम पर फेंकी।

श्लोक 11 (7.136.11)

तामापतन्तीमालक्ष्य भीमसेनो महागदाम् । शरैरवारयद्राजन्सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

tāmāpatantīmālakṣya bhīmaseno mahāgadām | śarairavārayadrājansarvasainyasya paśyataḥ

उस विशाल गदा को आते देखकर भीमसेन ने, हे राजन्, सारी सेना के देखते हुए बाणों से उसे रोक दिया।

श्लोक 12 (7.136.12)

ततो बाणसहस्राणि प्रेषयामास पाण्डवः । सूतपुत्रवधाकाङ्क्षी त्वरमाणः पराक्रमी ॥

tato bāṇasahasrāṇi preṣayāmāsa pāṇḍavaḥ | sūtaputravadhākāṅkṣī tvaramāṇaḥ parākramī

तब सूतपुत्र को मार डालने की इच्छा से उतावले पराक्रमी पाण्डुपुत्र ने हज़ारों बाण छोड़े।

श्लोक 13 (7.136.13)

तानिषूनिषुभिः कर्णो वारयित्वा महामृधे । कवचं भीमसेनस्य पाटयामास सायकैः ॥

tāniṣūniṣubhiḥ karṇo vārayitvā mahāmṛdhe | kavacaṃ bhīmasenasya pāṭayāmāsa sāyakaiḥ

उस महायुद्ध में कर्ण ने उन बाणों को बाणों से रोककर अपने तीरों से भीमसेन का कवच फाड़ डाला।

श्लोक 14 (7.136.14)

अथैनं पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्पयत् । पश्यतां सर्वसैन्यानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥

athainaṃ pañcaviṃśatyā nārācānāṃ samārpayat | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ tadadbhutamivābhavat

फिर उसने उसे पचीस नाराच बाणों से घायल किया; सब सेनाओं के देखते वह मानो अद्भुत बात हुई।

श्लोक 15 (7.136.15)

ततो भीमो महाबाहुर्नवभिर्नतपर्वभिः । प्रेषयामास सङ्क्रुद्धः सूतपुत्रस्य मारिष ॥

tato bhīmo mahābāhurnavabhirnataparvabhiḥ | preṣayāmāsa saṅkruddhaḥ sūtaputrasya māriṣa

तब क्रोध में भरे महाबाहु भीम ने, हे मान्यवर, सूतपुत्र पर नौ सीधी गाँठ वाले बाण छोड़े।

श्लोक 16 (7.136.16)

ते तस्य कवचं भित्त्वा तथा बाहुं च दक्षिणम् । अभ्ययुर्धरणीं तीक्ष्णा वल्मीकमिव पन्नगाः ॥

te tasya kavacaṃ bhittvā tathā bāhuṃ ca dakṣiṇam | abhyayurdharaṇīṃ tīkṣṇā valmīkamiva pannagāḥ

वे तीखे बाण उसके कवच और दाहिनी भुजा को बींधकर धरती में उसी तरह घुस गये जैसे साँप बाँबी में घुसते हैं।

श्लोक 17 (7.136.17)

स च्छाद्यमानो बाणौधैर्भीमसेनधनुश्च्युतैः । पुनरेवाभवत्कर्णो भीमसेनात्पराङ्मुखः ॥

sa cchādyamāno bāṇaudhairbhīmasenadhanuścyutaiḥ | punarevābhavatkarṇo bhīmasenātparāṅmukhaḥ

भीमसेन के धनुष से छूटे बाणों की वर्षा से ढँका हुआ कर्ण फिर भीमसेन से मुँह फेरकर पीछे हट गया।

श्लोक 18 (7.136.18)

तं पराङ्मुखमालोक्य पदातिं सूतनन्दनम् । कौन्तेयशरसञ्छन्नं राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

taṃ parāṅmukhamālokya padātiṃ sūtanandanam | kaunteyaśarasañchannaṃ rājā duryodhano'bravīt

सूतपुत्र को पैदल, कुन्तीपुत्र के बाणों से ढँका और विमुख हुआ देखकर राजा दुर्योधन बोला —

श्लोक 19 (7.136.19)

त्वरध्वं सर्वतो यत्ता राधेयस्य रथं प्रति । ततस्तव सुता राजञ्श्रुत्वा भ्रातुर्वचो द्रुतम् ॥

tvaradhvaṃ sarvato yattā rādheyasya rathaṃ prati | tatastava sutā rājañśrutvā bhrāturvaco drutam

"तुम सब सावधान होकर राधापुत्र के रथ की ओर शीघ्र बढ़ो!" तब हे राजन्, आपके पुत्र अपने भाई की यह बात सुनकर तुरन्त

श्लोक 20 (7.136.20)

अभ्ययुः पाण्डवं युद्धे विसृजन्तः शिलीमुखान् । चित्रोपचित्रश्चित्राक्षश्चारुचित्रः शरासनः ॥

abhyayuḥ pāṇḍavaṃ yuddhe visṛjantaḥ śilīmukhān | citropacitraścitrākṣaścārucitraḥ śarāsanaḥ

बाण बरसाते हुए युद्ध में पाण्डुपुत्र पर टूट पड़े — चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र और शरासन,

श्लोक 21 (7.136.21)

चित्रायुधश्चित्रवर्मा समरे चित्रयोधिनः । तानापतत एवाशु भीमसेनो महारथः ॥

citrāyudhaścitravarmā samare citrayodhinaḥ | tānāpatata evāśu bhīmaseno mahārathaḥ

चित्रायुध और चित्रवर्मा — ये सब रण में अद्भुत ढंग से लड़ने वाले थे। उन्हें आक्रमण करते देखकर महारथी भीमसेन ने तुरन्त

श्लोक 22 (7.136.22)

एकैकेन शरेणाजौ पातयामास ते सुतान् । ते हता न्यपतन्भूमौ वातरुग्णा इव द्रुमाः ॥

ekaikena śareṇājau pātayāmāsa te sutān | te hatā nyapatanbhūmau vātarugṇā iva drumāḥ

युद्ध में आपके उन पुत्रों को एक-एक बाण से गिरा दिया; मारे जाकर वे धरती पर वैसे ही गिर पड़े जैसे हवा से टूटे हुए पेड़।

श्लोक 23 (7.136.23)

दृष्ट्वा विनिहतान्पुत्रांस्तव राजन्महारथान् । अश्रुपूर्णमुखः कर्णः क्षत्तुः सस्मार तद्वचः ॥

dṛṣṭvā vinihatānputrāṃstava rājanmahārathān | aśrupūrṇamukhaḥ karṇaḥ kṣattuḥ sasmāra tadvacaḥ

हे राजन्, अपने महारथी पुत्रों को मरा हुआ देखकर आँसुओं से भरे मुख वाले कर्ण को क्षत्ता (विदुर) की बात याद आ गयी।

श्लोक 24 (7.136.24)

रथं चान्यं समास्थाय विधिवत्कल्पितं पुनः । अभ्ययात्पाण्डवं युद्धे त्वरमाणः पराक्रमी ॥

rathaṃ cānyaṃ samāsthāya vidhivatkalpitaṃ punaḥ | abhyayātpāṇḍavaṃ yuddhe tvaramāṇaḥ parākramī

विधिपूर्वक फिर से सजाये गये दूसरे रथ पर चढ़कर वह पराक्रमी शीघ्रता से युद्ध में पाण्डुपुत्र की ओर बढ़ा।

श्लोक 25 (7.136.25)

तावन्योन्यं शरैर्भित्त्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । व्यभ्राजेतां यथा मेघौ संस्यूतौ सूर्यरश्मिभिः ॥

tāvanyonyaṃ śarairbhittvā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | vyabhrājetāṃ yathā meghau saṃsyūtau sūryaraśmibhiḥ

सुनहरे पंखों वाले, पत्थर पर तेज़ किये बाणों से एक-दूसरे को बींधते हुए वे दोनों सूर्य की किरणों से बुने हुए दो बादलों की तरह शोभित हुए।

श्लोक 26 (7.136.26)

षट्त्रिंशद्भिस्ततो भल्लैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः । व्यधमत्कवचं क्रुद्धः सूतपुत्रस्य पाण्डवः ॥

ṣaṭtriṃśadbhistato bhallairniśitaistigmatejanaiḥ | vyadhamatkavacaṃ kruddhaḥ sūtaputrasya pāṇḍavaḥ

तब क्रुद्ध पाण्डुपुत्र ने छत्तीस तीखे, पैनी धार वाले भल्लों से सूतपुत्र का कवच तोड़ डाला।

श्लोक 27 (7.136.27)

सूतपुत्रोऽपि कौन्तेयं शरैः सन्नतपर्वभिः । पञ्चाशता महाबाहुर्विव्याध भरतर्षभ ॥

sūtaputro'pi kaunteyaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | pañcāśatā mahābāhurvivyādha bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, महाबाहु सूतपुत्र ने भी सीधी गाँठ वाले पचास बाणों से कुन्तीपुत्र को बींध दिया।

श्लोक 28 (7.136.28)

रक्तचन्दनदिग्धाङ्गौ शरैः कृतमहाव्रणौ । शोणिताक्तौ व्यराजेतां कालसूर्याविवोदितौ ॥

raktacandanadigdhāṅgau śaraiḥ kṛtamahāvraṇau | śoṇitāktau vyarājetāṃ kālasūryāvivoditau

लाल चन्दन से लिपटे अंगों वाले, बाणों से गहरे घायल और रक्त से सने वे दोनों ऐसे शोभित हुए मानो काल और सूर्य एक साथ उदित हुए हों।

श्लोक 29 (7.136.29)

तौ शोणितोक्षितैर्गात्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । विवृताङ्गौ व्यराजेतां निर्मुक्ताविव पन्नगौ ॥

tau śoṇitokṣitairgātraiḥ śaraiśchinnatanucchadau | vivṛtāṅgau vyarājetāṃ nirmuktāviva pannagau

रक्त से भीगे शरीरों वाले और बाणों से कटे कवच वाले वे दोनों उघड़े अंगों से ऐसे शोभित हुए जैसे केंचुल छोड़े हुए दो साँप।

श्लोक 30 (7.136.30)

क्रोधाग्नितेजसा दीप्तौ संरम्भाद्रक्तलोचनौ । व्यभ्राजेतां महाराज विधूमाविव पावकौ ॥

krodhāgnitejasā dīptau saṃrambhādraktalocanau | vyabhrājetāṃ mahārāja vidhūmāviva pāvakau

क्रोध की आग के तेज से दीप्त, आवेश से लाल आँखों वाले वे दोनों, हे महाराज, धुएँ से रहित दो अग्नियों की तरह शोभित हुए।

श्लोक 31 (7.136.31)

व्याघ्राविव नरव्याघ्रौ दंष्ट्राभिरितरेतरम् । शरधारासृजौ वीरौ मेघाविव ववर्षतुः ॥

vyāghrāviva naravyāghrau daṃṣṭrābhiritaretaram | śaradhārāsṛjau vīrau meghāviva vavarṣatuḥ

दो बाघों की तरह वे दोनों नरव्याघ्र एक-दूसरे को दाँतों से चीरने लगे; बाणों की धाराएँ बरसाते हुए वे दोनों वीर दो बादलों की तरह बरसे।

श्लोक 32 (7.136.32)

वारणाविव चान्योन्यं विषाणाभ्यामरिन्दमौ । निर्भिन्दन्तौ स्वगात्राणि सायकैश्चारु रेजतुः ॥

vāraṇāviva cānyonyaṃ viṣāṇābhyāmarindamau | nirbhindantau svagātrāṇi sāyakaiścāru rejatuḥ

दो हाथियों की तरह एक-दूसरे को दाँतों से भेदते हुए वे दोनों शत्रुदमन बाणों से अपने शरीरों को चीरते हुए सुन्दर लग रहे थे।

श्लोक 33 (7.136.33)

नादयन्तौ प्रहर्षन्तौ विक्रीडन्तौ परस्परम् । मण्डलानि विकुर्वाणौ रथाभ्यां रथिषूत्तमौ ॥

nādayantau praharṣantau vikrīḍantau parasparam | maṇḍalāni vikurvāṇau rathābhyāṃ rathiṣūttamau

गर्जते, हर्ष मनाते, एक-दूसरे के साथ खेल-सा करते और रथों से मण्डल बनाकर घूमते हुए वे दोनों श्रेष्ठ रथी

श्लोक 34 (7.136.34)

वृषाविवाथ नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । सिंहाविव पराक्रान्तौ नरसिंहौ महाबलौ ॥

vṛṣāvivātha nardantau balinau vāsitāntare | siṃhāviva parākrāntau narasiṃhau mahābalau

ऋतुमती गायों के बीच डकराते दो बलवान् साँड़ों की तरह, पराक्रमी दो सिंहों की तरह नरसिंह और महाबली थे,

श्लोक 35 (7.136.35)

परस्परं वीक्षमाणौ क्रोधसंरक्तलोचनौ । युयुधाते महावीर्यौ शक्रवैरोचनी यथा ॥

parasparaṃ vīkṣamāṇau krodhasaṃraktalocanau | yuyudhāte mahāvīryau śakravairocanī yathā

क्रोध से लाल आँखों से एक-दूसरे को घूरते हुए वे दोनों महापराक्रमी इन्द्र और विरोचनपुत्र बलि की तरह लड़े।

श्लोक 36 (7.136.36)

ततो भीमो महाबाहुर्बाहुभ्यां विक्षिपन्धनुः । व्यराजत रणे राजन्सविद्युदिव तोयदः ॥

tato bhīmo mahābāhurbāhubhyāṃ vikṣipandhanuḥ | vyarājata raṇe rājansavidyudiva toyadaḥ

तब महाबाहु भीम अपनी भुजाओं से धनुष को घुमाता हुआ, हे राजन्, रण में बिजली-सहित बादल की तरह शोभित हुआ।

श्लोक 37 (7.136.37)

सनेमिघोषस्तनितश्चापविद्युच्छराम्बुभिः । भीमसेनमहामेघः कर्णपर्वतमावृणोत् ॥

sanemighoṣastanitaścāpavidyuccharāmbubhiḥ | bhīmasenamahāmeghaḥ karṇaparvatamāvṛṇot

पहियों की घरघराहट को गर्जन, धनुष को बिजली और बाणों को जलधारा बनाकर भीमसेन रूपी महामेघ ने कर्ण रूपी पर्वत को ढँक दिया।

श्लोक 38 (7.136.38)

ततः शरसहस्रेण सम्यगस्तेन भारत । पाण्डवो व्यकिरत्कर्णं भीमो भीमपराक्रमः ॥

tataḥ śarasahasreṇa samyagastena bhārata | pāṇḍavo vyakiratkarṇaṃ bhīmo bhīmaparākramaḥ

तब हे भारत, भयंकर पराक्रम वाले पाण्डुपुत्र भीम ने भलीभाँति छोड़े हुए हज़ार बाणों से कर्ण को ढँक दिया।

श्लोक 39 (7.136.39)

तत्रापश्यंस्तव सुता भीमसेनस्य विक्रमम् । सुपुङ्खैः कङ्कवासोभिर्यत्कर्णं छादयञ्शरैः ॥

tatrāpaśyaṃstava sutā bhīmasenasya vikramam | supuṅkhaiḥ kaṅkavāsobhiryatkarṇaṃ chādayañśaraiḥ

वहाँ आपके पुत्रों ने भीमसेन का पराक्रम देखा कि उसने सुन्दर पंखों वाले, कंक पक्षी के पर लगे बाणों से कर्ण को ढँक दिया।

श्लोक 40 (7.136.40)

स नन्दयन्रणे पार्थं केशवं च यशस्विनम् । सात्यकिं चक्ररक्षौ च भीमः कर्णमयोधयत् ॥

sa nandayanraṇe pārthaṃ keśavaṃ ca yaśasvinam | sātyakiṃ cakrarakṣau ca bhīmaḥ karṇamayodhayat

पार्थ (अर्जुन), यशस्वी केशव, सात्यकि और दोनों चक्ररक्षकों को हर्षित करता हुआ भीम कर्ण से युद्ध करता रहा।

श्लोक 41 (7.136.41)

विक्रमं भुजयोर्वीर्यं धैर्यं च विदितात्मनः । पुत्रास्तव महाराज दृष्ट्वा विमनसोऽभवन् ॥

vikramaṃ bhujayorvīryaṃ dhairyaṃ ca viditātmanaḥ | putrāstava mahārāja dṛṣṭvā vimanaso'bhavan

हे महाराज, उस आत्मज्ञानी भीम के बाहुबल, वीर्य और धैर्य को देखकर आपके पुत्र उदास हो गये।

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