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द्रोण पर्व · अध्याय 137

भीम धृतराष्ट्र के सात पुत्रों का वध करते हैं

भीम की प्रत्यंचा की टंकार से तिलमिलाया कर्ण उस पर टूट पड़ता है; दोनों एक-दूसरे को बाणों से ढक देते हैं और दस महारथी साधुवाद देते हैं। दुर्योधन कर्ण की रक्षा के लिए अपने सात भाइयों को भेजता है, पर भीम कर्ण के देखते-देखते उन सातों — शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र, चित्रायुध, दृढ, चित्रसेन और विकर्ण — को मार गिराता है; उसकी गर्जना सुनकर युधिष्ठिर द्रोण की ओर बढ़ते हैं। फिर सञ्जय द्रौपदी के अपमान और विदुर की अनसुनी सलाह को याद दिलाकर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि पुत्रों के विनाश का कारण वे स्वयं हैं।

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.137.1)

भीमसेनस्य राधेयः श्रुत्वा ज्यातलनिःस्वनम् । नामृष्यत यथा मत्तो गजः प्रतिगजस्वनम् ॥

bhīmasenasya rādheyaḥ śrutvā jyātalaniḥsvanam | nāmṛṣyata yathā matto gajaḥ pratigajasvanam

भीमसेन की प्रत्यंचा की टंकार सुनकर राधापुत्र कर्ण उसे सह न सका, जैसे मदमत्त हाथी दूसरे हाथी की चिंघाड़ को नहीं सह पाता।

श्लोक 2 (7.137.2)

सोऽपक्रम्य मुहूर्तं तु भीमसेनस्य गोचरात् । पुत्रांस्तव ददर्शाथ भीमसेनेन पातितान् ॥

so'pakramya muhūrtaṃ tu bhīmasenasya gocarāt | putrāṃstava dadarśātha bhīmasenena pātitān

तब कर्ण ने क्षण भर के लिए भीमसेन के बाणों की पहुँच से हटकर देखा कि आपके पुत्र भीमसेन के हाथों गिरा दिए गए हैं।

श्लोक 3 (7.137.3)

तानवेक्ष्य नरश्रेष्ठ विमना दुःखितस्तदा । निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च कर्णः पाण्डवमभ्ययात् ॥

tānavekṣya naraśreṣṭha vimanā duḥkhitastadā | niḥśvasandīrghamuṣṇaṃ ca karṇaḥ pāṇḍavamabhyayāt

उन्हें देखकर, हे नरश्रेष्ठ, कर्ण उदास और दुःखी हो गया, और लम्बी, गर्म साँस भरता हुआ पाण्डुपुत्र भीमसेन की ओर बढ़ा।

श्लोक 4 (7.137.4)

स ताम्रनयनः क्रोधाच्छ्वसन्निव महोरगः । बभौ कर्णः शरानस्यन्रश्मीनिव दिवाकरः ॥

sa tāmranayanaḥ krodhācchvasanniva mahoragaḥ | babhau karṇaḥ śarānasyanraśmīniva divākaraḥ

क्रोध से लाल आँखों वाला कर्ण, महासर्प की तरह फुफकारता हुआ, बाण छोड़ते समय ऐसा शोभित हुआ जैसे अपनी किरणें बिखेरता सूर्य।

श्लोक 5 (7.137.5)

किरणैरिव सूर्यस्य महीध्रो भरतर्षभ । कर्णचापच्युतैर्वाणैः प्राच्छाद्यत वृकोदरः ॥

kiraṇairiva sūryasya mahīdhro bharatarṣabha | karṇacāpacyutairvāṇaiḥ prācchādyata vṛkodaraḥ

हे भरतश्रेष्ठ, जैसे सूर्य की किरणों से पर्वत ढक जाता है, वैसे ही कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से वृकोदर भीम ढक गया।

श्लोक 6 (7.137.6)

ते कर्णचापप्रभवाः शरा बर्हिणवाससः । विविशुः सर्वतः पार्थ वासायेवाण्डजाद्रुमम् ॥

te karṇacāpaprabhavāḥ śarā barhiṇavāsasaḥ | viviśuḥ sarvataḥ pārtha vāsāyevāṇḍajādrumam

कर्ण के धनुष से निकले, मोर के पंखों से सजे वे बाण पृथापुत्र भीम में चारों ओर से ऐसे घुस गए जैसे पक्षी बसेरा लेने के लिए वृक्ष में घुसते हैं।

श्लोक 7 (7.137.7)

कर्णचापच्युता बाणाः संपतन्तस्ततस्ततः । रुक्मपुङ्खा व्यराजन्त हंसाः श्रेणीकृता इव ॥

karṇacāpacyutā bāṇāḥ saṃpatantastatastataḥ | rukmapuṅkhā vyarājanta haṃsāḥ śreṇīkṛtā iva

कर्ण के धनुष से छूटे, इधर-उधर गिरते सोने की पुङ्ख वाले वे बाण पंक्तिबद्ध उड़ते हंसों के समान शोभा पा रहे थे।

श्लोक 8 (7.137.8)

चापध्वजोपस्करेभ्यश्छत्रादीषामुखाद्युगात् । प्रभवन्तो व्यदृश्यन्त राजन्नाघिरथेः शराः ॥

cāpadhvajopaskarebhyaśchatrādīṣāmukhādyugāt | prabhavanto vyadṛśyanta rājannāghiratheḥ śarāḥ

हे राजन्, अधिरथपुत्र कर्ण के बाण उसके धनुष, ध्वज, रथ की सामग्री, छत्र, ईषादण्ड के अग्रभाग और जुए से निकलते दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 9 (7.137.9)

खं पूरयन्महावेगात्खगमान्गृध्रवाससः । सुवर्णविकृतांश्चित्रान्मुमोचाधिरथिः शरान् ॥

khaṃ pūrayanmahāvegātkhagamāngṛdhravāsasaḥ | suvarṇavikṛtāṃścitrānmumocādhirathiḥ śarān

बड़े वेग से आकाश को भरते हुए अधिरथपुत्र कर्ण ने गिद्ध के पंखों वाले, सोने से गढ़े हुए, विचित्र और आकाश में उड़ने वाले बाण छोड़े।

श्लोक 10 (7.137.10)

तमन्तकमिवायस्तमापतन्तं वृकोदरम् । त्यक्त्वा प्राणानतिक्रम्य विव्याध निशितैः शरैः ॥

tamantakamivāyastamāpatantaṃ vṛkodaram | tyaktvā prāṇānatikramya vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

प्राणों की परवाह छोड़कर कर्ण ने यमराज की तरह जूझते हुए टूट पड़ने वाले वृकोदर को तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 11 (7.137.11)

तस्य वेगमसह्यं स दृष्ट्वा कर्णस्य पाण्डवः । महतश्च शरौघांस्तान्न्यवारयत् वीर्यवान् ॥

tasya vegamasahyaṃ sa dṛṣṭvā karṇasya pāṇḍavaḥ | mahataśca śaraughāṃstānnyavārayat vīryavān

कर्ण के उस असह्य वेग को देखकर पराक्रमी पाण्डुपुत्र भीम ने बाणों की उन भारी बाढ़ों को रोक दिया।

श्लोक 12 (7.137.12)

ततो विधम्याधिरथेः शरजालानि पाण्डवः । विव्याध कर्णं विंशत्या पुनरन्यैः शिलाशितैः ॥

tato vidhamyādhiratheḥ śarajālāni pāṇḍavaḥ | vivyādha karṇaṃ viṃśatyā punaranyaiḥ śilāśitaiḥ

तब पाण्डुपुत्र भीम ने अधिरथपुत्र कर्ण के बाणजालों को बिखेर दिया और कर्ण को बीस बाणों से, फिर पत्थर पर तेज किए अन्य बाणों से भी बींध डाला।

श्लोक 13 (7.137.13)

यथैव हि स कर्णेन पार्थः प्रच्छादितः शरैः । तथैव स रणे कर्णं छादयामास पाण्डवः ॥

yathaiva hi sa karṇena pārthaḥ pracchāditaḥ śaraiḥ | tathaiva sa raṇe karṇaṃ chādayāmāsa pāṇḍavaḥ

जैसे कर्ण ने पृथापुत्र भीम को बाणों से ढक दिया था, वैसे ही पाण्डुपुत्र भीम ने भी युद्ध में कर्ण को ढक दिया।

श्लोक 14 (7.137.14)

दृष्ट्वा तु भीमसेनस्य विक्रमं युधि भारत । अभ्यनन्दंस्त्वदीयाश्च संप्रहृष्टाश्च चारणाः ॥

dṛṣṭvā tu bhīmasenasya vikramaṃ yudhi bhārata | abhyanandaṃstvadīyāśca saṃprahṛṣṭāśca cāraṇāḥ

हे भारत, युद्ध में भीमसेन का पराक्रम देखकर आपके योद्धाओं और अत्यन्त हर्षित चारणों ने उसका अभिनन्दन किया।

श्लोक 15 (7.137.15)

भूरश्रवाः कृपो द्रौणिर्मद्रराजो जयद्रथः । उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिः केशवार्जुनौ ॥

bhūraśravāḥ kṛpo drauṇirmadrarājo jayadrathaḥ | uttamaujā yudhāmanyuḥ sātyakiḥ keśavārjunau

भूरिश्रवा, कृप, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य, जयद्रथ, उत्तमौजा, युधामन्यु, सात्यकि, केशव और अर्जुन —

श्लोक 16 (7.137.16)

कुरुपाण्डवपक्षस्था दश राजन्महारथाः । साधुसाध्विति वेगेन सिंहनादमथानदन् ॥

kurupāṇḍavapakṣasthā daśa rājanmahārathāḥ | sādhusādhviti vegena siṃhanādamathānadan

कुरुओं और पाण्डवों के पक्ष के ये दस महारथी, हे राजन्, "साधु! साधु!" कहते हुए बड़े वेग से सिंहनाद कर उठे।

श्लोक 17 (7.137.17)

तस्मिन्समुत्थिते शब्दे तुमुले रोमहर्षणे । अभ्यभाषत पुत्रस्ते राजन्दुर्योधनस्त्वरन् ॥

tasminsamutthite śabde tumule romaharṣaṇe | abhyabhāṣata putraste rājanduryodhanastvaran

जब वह तुमुल, रोमांचकारी कोलाहल उठा, तब आपके पुत्र दुर्योधन ने, हे राजन्, जल्दी में कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (7.137.18)

राज्ञः सराजपुत्रांश्च सोदर्यांश्च विशेषतः । कर्णं गच्छत भद्रं वः परीप्सन्तो वृकोदरात् ॥

rājñaḥ sarājaputrāṃśca sodaryāṃśca viśeṣataḥ | karṇaṃ gacchata bhadraṃ vaḥ parīpsanto vṛkodarāt

"राजाओ, राजकुमारो, और विशेष रूप से मेरे भाइयो, तुम कर्ण के पास जाओ — तुम्हारा कल्याण हो — और वृकोदर से उसकी रक्षा करो।

श्लोक 19 (7.137.19)

पुरा निघ्नन्ति राधेयं भीमचापच्युताः शराः । ते यतध्वं महेष्वासाः सूतपुत्रस्य रक्षणे ॥

purā nighnanti rādheyaṃ bhīmacāpacyutāḥ śarāḥ | te yatadhvaṃ maheṣvāsāḥ sūtaputrasya rakṣaṇe

भीम के धनुष से छूटे बाण राधापुत्र को मार गिराएँ, उससे पहले, हे महाधनुर्धरो, तुम सूतपुत्र की रक्षा के लिए प्रयत्न करो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (7.137.20)

दुर्योधनसमादिष्टाः सोदर्याः सप्त भारत । भीमसेनमभिद्रुत्य संरब्धाः पर्यवारयन् ॥

duryodhanasamādiṣṭāḥ sodaryāḥ sapta bhārata | bhīmasenamabhidrutya saṃrabdhāḥ paryavārayan

दुर्योधन की आज्ञा पाकर उसके सात भाई, हे भारत, क्रोध में भरकर भीमसेन पर टूट पड़े और उसे चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 21 (7.137.21)

ते समासाद्य कौन्तेयमावृण्वञ्शरवृष्टिभिः । पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकाः ॥

te samāsādya kaunteyamāvṛṇvañśaravṛṣṭibhiḥ | parvataṃ vāridhārābhiḥ prāvṛṣīva balāhakāḥ

कुन्तीपुत्र के पास पहुँचकर उन्होंने उसे बाणों की वर्षा से ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु में बादल जलधाराओं से पर्वत को ढक लेते हैं।

श्लोक 22 (7.137.22)

तेऽपीडयन्भीमसेनं क्रुद्धाः सप्त महारथाः । प्रजासंहरणे राजन्सोमं सप्तग्रहा इव ॥

te'pīḍayanbhīmasenaṃ kruddhāḥ sapta mahārathāḥ | prajāsaṃharaṇe rājansomaṃ saptagrahā iva

क्रोध में भरे उन सात महारथियों ने, हे राजन्, भीमसेन को वैसे ही दबाया जैसे प्रलय के समय सात ग्रह चन्द्रमा को सताते हैं।

श्लोक 23 (7.137.23)

ततो वेगेन कौन्तेयः पीडयित्वा शरासनम् । मुष्टिना पाण्डवो राजन्दृढेन सुपरिष्कृतम् ॥

tato vegena kaunteyaḥ pīḍayitvā śarāsanam | muṣṭinā pāṇḍavo rājandṛḍhena supariṣkṛtam

तब, हे राजन्, कुन्तीपुत्र पाण्डव भीम ने बड़े वेग से अपने सुसज्जित धनुष को दृढ़ मुट्ठी में कसकर पकड़ा,

श्लोक 24 (7.137.24)

अमानुषं कर्म कृत्वा सप्त सन्धाय सायकान् । तेभ्यो व्यसृजदायस्तः सूर्यरश्मिनिभान्प्रभुः ॥

amānuṣaṃ karma kṛtvā sapta sandhāya sāyakān | tebhyo vyasṛjadāyastaḥ sūryaraśminibhānprabhuḥ

और अमानवीय कर्म करके उस समर्थ वीर ने सात बाण चढ़ाए और पूरी शक्ति लगाकर उन सातों पर सूर्य की किरणों जैसे चमकते वे बाण छोड़े,

श्लोक 25 (7.137.25)

निरस्यन्निव देहेभ्यस्तनयानामसूंस्तव । भीमसेनो महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥

nirasyanniva dehebhyastanayānāmasūṃstava | bhīmaseno mahārāja pūrvavairamanusmaran

मानो आपके पुत्रों के प्राण उनके शरीरों से निकाल रहे हों — हे महाराज, भीमसेन पुरानी शत्रुता को याद करते हुए।

श्लोक 26 (7.137.26)

ते क्षिप्ता भीमसेनेन शरा भारत भारतान् । विदार्य खं समुत्पेतुः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः ॥

te kṣiptā bhīmasenena śarā bhārata bhāratān | vidārya khaṃ samutpetuḥ svarṇapuṅkhāḥ śilāśitāḥ

भीमसेन के छोड़े हुए, सोने की पुङ्ख वाले और पत्थर पर तेज किए वे बाण, हे भारत, कौरव वीरों को चीरते हुए आकाश में उड़ गए।

श्लोक 27 (7.137.27)

तेषां विदार्य देहांस्ते शरा हेमविभूषिताः । भित्त्वाभित्त्वा क्षितिं जग्मुस्तेषामेवासुभिः सह । व्यराजन्त महाराज सुपर्णा इव खेचराः ॥

teṣāṃ vidārya dehāṃste śarā hemavibhūṣitāḥ | bhittvābhittvā kṣitiṃ jagmusteṣāmevāsubhiḥ saha | vyarājanta mahārāja suparṇā iva khecarāḥ

सोने से सजे वे बाण उनके शरीरों को चीरकर उनके प्राणों के साथ ही पृथ्वी को बींधते हुए धरती में समा गए, और, हे महाराज, आकाशचारी सुपर्ण पक्षियों की तरह शोभित हुए।

श्लोक 28 (7.137.28)

शोणितादिग्धवाजाग्राः सप्त हेमपरिष्कृताः । पुत्राणां तव राजेन्द्र पीत्वा शोणितमुद्गताः ॥

śoṇitādigdhavājāgrāḥ sapta hemapariṣkṛtāḥ | putrāṇāṃ tava rājendra pītvā śoṇitamudgatāḥ

हे राजेन्द्र, सोने से मढ़े वे सात बाण, जिनके पंखों के सिरे रक्त से सने थे, आपके पुत्रों का रक्त पीकर ऊपर उठ आए।

श्लोक 29 (7.137.29)

ते शरैर्भिन्नमर्माणो रथेभ्यः प्रापतन्क्षितौ । गिरिसानुरुहा भग्ना द्विपेनेव महाद्रुमाः ॥

te śarairbhinnamarmāṇo rathebhyaḥ prāpatankṣitau | girisānuruhā bhagnā dvipeneva mahādrumāḥ

बाणों से मर्मस्थल बिंध जाने पर वे रथों से धरती पर गिर पड़े, जैसे पर्वत की ढलान पर उगे बड़े वृक्ष हाथी से टूटकर गिर पड़ते हैं।

श्लोक 30 (7.137.30)

शत्रुंजयः शत्रुसहश्चित्रश्चित्रायुधो दृढः । चित्रसेनो विकर्णश्च सप्तैते विनिपातिताः ॥

śatruṃjayaḥ śatrusahaścitraścitrāyudho dṛḍhaḥ | citraseno vikarṇaśca saptaite vinipātitāḥ

शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र, चित्रायुध, दृढ, चित्रसेन और विकर्ण — ये सातों मार गिराए गए।

श्लोक 31 (7.137.31)

पुत्राणां तव सर्वेषां निहतानां वृकोदरः । शोचत्यतिभृशं दुःखाद्विकर्णं पाण्डवः प्रियम् ॥

putrāṇāṃ tava sarveṣāṃ nihatānāṃ vṛkodaraḥ | śocatyatibhṛśaṃ duḥkhādvikarṇaṃ pāṇḍavaḥ priyam

आपके मारे गए सभी पुत्रों में से पाण्डुपुत्र वृकोदर प्रिय विकर्ण के लिए अपने दुःख में सबसे अधिक शोक करता है।

भीमसेन उवाच

श्लोक 32 (7.137.32)

प्रतिज्ञेयं मया वृत्ता निहन्तव्यास्तु संयुगे । विकर्ण तेनासि हतः प्रतिज्ञा रक्षिता मया ॥

pratijñeyaṃ mayā vṛttā nihantavyāstu saṃyuge | vikarṇa tenāsi hataḥ pratijñā rakṣitā mayā

"मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि वे युद्ध में मारे ही जाने चाहिए। हे विकर्ण, इसीलिए तुम मारे गए हो; मैंने अपनी प्रतिज्ञा निभाई है।

श्लोक 33 (7.137.33)

त्वमागाः समरं वीर क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् । ततो विनिहतः सङ्ख्ये युद्धधर्मो हि निष्ठुरः ॥

tvamāgāḥ samaraṃ vīra kṣātraṃ dharmamanusmaran | tato vinihataḥ saṅkhye yuddhadharmo hi niṣṭhuraḥ

हे वीर, तुम क्षत्रिय-धर्म को याद करके युद्ध में आए थे, और इसीलिए रण में मारे गए; क्योंकि युद्ध का धर्म बड़ा कठोर है।

श्लोक 34 (7.137.34)

विशेषतो हि नृपतेस्तथाऽस्माकं हिते रतः । न्यायतोऽन्यायतो वाऽपि हतः शेते महाद्युतिः ॥

viśeṣato hi nṛpatestathā'smākaṃ hite rataḥ | nyāyato'nyāyato vā'pi hataḥ śete mahādyutiḥ

विशेष रूप से राजा के और हमारे भी हित में लगा रहने वाला वह महातेजस्वी, चाहे न्याय से हो या अन्याय से, मारा जाकर पड़ा है।

श्लोक 35 (7.137.35)

अगाधबुद्धिर्गाङ्गेयः क्षितौ सुरगुरोः समः । त्याजितः समरे प्राणांस्तस्माद्युद्धं हि निष्ठुरम् ॥

agādhabuddhirgāṅgeyaḥ kṣitau suraguroḥ samaḥ | tyājitaḥ samare prāṇāṃstasmādyuddhaṃ hi niṣṭhuram

अथाह बुद्धि वाले गंगापुत्र भीष्म, जो पृथ्वी पर देवगुरु बृहस्पति के समान थे, उन्हें भी युद्ध में प्राण त्यागने पड़े; इसलिए युद्ध निष्ठुर ही है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 36 (7.137.36)

तान्निहत्य महाबाहू राधेयस्यैव पश्यतः । सिंहनादरवं घोरमसृजत्पाण्डुनन्दनः ॥

tānnihatya mahābāhū rādheyasyaiva paśyataḥ | siṃhanādaravaṃ ghoramasṛjatpāṇḍunandanaḥ

राधापुत्र कर्ण के देखते-देखते उन्हें मारकर महाबाहु पाण्डुपुत्र भीम ने भयंकर सिंहनाद किया।

श्लोक 37 (7.137.37)

स रवस्तस्य शूरस्य धर्मराजस्य भारत । आचख्याविव तद्युद्धं विजयं चात्मनो महत् ॥

sa ravastasya śūrasya dharmarājasya bhārata | ācakhyāviva tadyuddhaṃ vijayaṃ cātmano mahat

उस वीर भीम की वह गर्जना, हे भारत, मानो धर्मराज युधिष्ठिर को उस युद्ध और अपनी महान् विजय का समाचार सुना रही थी।

श्लोक 38 (7.137.38)

तं श्रुत्वा तु महानादं भीमसेनस्य धन्विनः । बभूव परमा प्रीतिर्धर्मराजस्य धीमतः ॥

taṃ śrutvā tu mahānādaṃ bhīmasenasya dhanvinaḥ | babhūva paramā prītirdharmarājasya dhīmataḥ

धनुर्धर भीमसेन की वह महागर्जना सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज को परम प्रसन्नता हुई।

श्लोक 39 (7.137.39)

ततो हृष्टमना राजन्वादित्राणां महास्वनैः । सिंहनादरवं भ्रातुः प्रतिजग्राह पाण्डवः ॥

tato hṛṣṭamanā rājanvāditrāṇāṃ mahāsvanaiḥ | siṃhanādaravaṃ bhrātuḥ pratijagrāha pāṇḍavaḥ

तब, हे राजन्, प्रसन्न मन वाले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने वाद्यों की ऊँची ध्वनि से अपने भाई के सिंहनाद का उत्तर दिया।

श्लोक 40 (7.137.40)

हर्षेण महता युक्तः कृतसंज्ञे वृकोदरे । अभ्ययात्समरे द्रोणं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥

harṣeṇa mahatā yuktaḥ kṛtasaṃjñe vṛkodare | abhyayātsamare droṇaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam

वृकोदर के संकेत कर देने पर बड़े हर्ष से भरकर वह युद्ध में समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य पर चढ़ आया।

श्लोक 41 (7.137.41)

एकत्रिंशन्महाराज पुत्रांस्तव निपातितान् । हतान्दुर्योधनो दृष्ट्वा क्षत्तुः सस्मार तद्वचः ॥

ekatriṃśanmahārāja putrāṃstava nipātitān | hatānduryodhano dṛṣṭvā kṣattuḥ sasmāra tadvacaḥ

हे महाराज, आपके इकतीस पुत्रों को मारा गया और गिरा हुआ देखकर दुर्योधन को क्षत्ता विदुर की बात याद आई।

श्लोक 42 (7.137.42)

तदिदं समनुप्राप्तं क्षत्तुर्नैःश्रेयसं वचः । इति संचिन्त्य ते पुत्रो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥

tadidaṃ samanuprāptaṃ kṣatturnaiḥśreyasaṃ vacaḥ | iti saṃcintya te putro nottaraṃ pratyapadyata

"क्षत्ता का वह परम कल्याणकारी वचन अब सच होकर आ पहुँचा है" — यह सोचकर आपके पुत्र ने कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 43 (7.137.43)

यद्द्यूतकाले दुर्बुद्धिरब्रवीत्तनयस्तव । सभामानाय्य पाञ्चालीं कर्णेन सहितोऽल्पधीः ॥

yaddyūtakāle durbuddhirabravīttanayastava | sabhāmānāyya pāñcālīṃ karṇena sahito'lpadhīḥ

जुए के समय आपके दुर्बुद्धि और अल्पबुद्धि पुत्र ने कर्ण के साथ पांचाली को सभा में लाकर जो कुछ कहा था,

श्लोक 44 (7.137.44)

यच्च कर्णोऽब्रवीत्कृष्णां सभायां परुषं वचः । प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां तव चैव विशांपते । शृण्वतस्तव राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वशः ॥

yacca karṇo'bravītkṛṣṇāṃ sabhāyāṃ paruṣaṃ vacaḥ | pramukhe pāṇḍuputrāṇāṃ tava caiva viśāṃpate | śṛṇvatastava rājendra kauravāṇāṃ ca sarvaśaḥ

और जो कठोर वचन कर्ण ने सभा में कृष्णा द्रौपदी से कहे थे, पाण्डवों के सामने और आपके भी सामने, हे प्रजापति, और, हे राजेन्द्र, आपके और सब कौरवों के सुनते हुए —

श्लोक 45 (7.137.45)

विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः । पतिमन्यं वृणीष्वेति तस्येदं फलमागतम् ॥

vinaṣṭāḥ pāṇḍavāḥ kṛṣṇe śāśvataṃ narakaṃ gatāḥ | patimanyaṃ vṛṇīṣveti tasyedaṃ phalamāgatam

"कृष्णे, पाण्डव नष्ट हो गए, वे सदा के लिए नरक में पहुँच गए; किसी दूसरे को पति बना लो" — उन्हीं वचनों का फल अब आ पहुँचा है।

श्लोक 46 (7.137.46)

यच्च षण्ढतिलादीनि परुषाणि तवात्मजैः । श्रावितास्ते महात्मानः पाण्डवाः कोपयिष्णुभिः ॥

yacca ṣaṇḍhatilādīni paruṣāṇi tavātmajaiḥ | śrāvitāste mahātmānaḥ pāṇḍavāḥ kopayiṣṇubhiḥ

और "नपुंसक", "बंजर तिल" जैसे जो कठोर ताने आपके पुत्रों ने उन्हें भड़काने की इच्छा से महात्मा पाण्डवों को सुनाए थे —

श्लोक 47 (7.137.47)

तं भीमसेनः क्रोधाग्निं त्रयोदश समाः स्थितम् । उद्गिरंस्तव पुत्राणामन्तं गच्छति पाण्डवः ॥

taṃ bhīmasenaḥ krodhāgniṃ trayodaśa samāḥ sthitam | udgiraṃstava putrāṇāmantaṃ gacchati pāṇḍavaḥ

उसी क्रोधाग्नि को, जिसे भीमसेन तेरह वर्षों से भीतर रखे हुए था, अब वह उगल रहा है और आपके पुत्रों का अन्त कर रहा है।

श्लोक 48 (7.137.48)

विलपंश्च बहु क्षत्ता शमं नालभत त्वयि । सपुत्रो भरतश्रेष्ठ तस्य भुङ्क्ष्व फलोदयम् ॥

vilapaṃśca bahu kṣattā śamaṃ nālabhata tvayi | saputro bharataśreṣṭha tasya bhuṅkṣva phalodayam

और क्षत्ता ने बहुत विलाप किया, फिर भी आपसे शान्ति न पा सके। हे भरतश्रेष्ठ, अब अपने पुत्रों सहित उसके पके हुए फल को भोगिए।

श्लोक 49 (7.137.49)

त्वया वृद्धेन धीरेण कार्यतत्त्वार्थदर्शिना । न कृतं सुहृदां वाक्यं दैवमत्र परायणम् ॥

tvayā vṛddhena dhīreṇa kāryatattvārthadarśinā | na kṛtaṃ suhṛdāṃ vākyaṃ daivamatra parāyaṇam

आप वृद्ध, धीर और कार्य के तत्त्व को समझने वाले होकर भी मित्रों की बात पर नहीं चले; इसमें दैव ही एकमात्र सहारा रहा।

श्लोक 50 (7.137.50)

तन्मा शुचो नरव्याघ्र तवैवापनयो महान् । विनाशहेतुः पुत्राणां भवानेव मतो मम ॥

tanmā śuco naravyāghra tavaivāpanayo mahān | vināśahetuḥ putrāṇāṃ bhavāneva mato mama

इसलिए, हे नरव्याघ्र, शोक मत कीजिए; बड़ा अनीति-कर्म आपका ही था। मैं मानता हूँ कि आप ही अपने पुत्रों के विनाश का कारण हैं।

श्लोक 51 (7.137.51)

हतो विकर्णो राजेन्द्र चित्रसेनश्च वीर्यवान् । प्रवराश्चात्मजानां ते सुताश्चान्ये महारथाः ॥

hato vikarṇo rājendra citrasenaśca vīryavān | pravarāścātmajānāṃ te sutāścānye mahārathāḥ

हे राजेन्द्र, विकर्ण मारा गया, पराक्रमी चित्रसेन भी, और आपके श्रेष्ठ पुत्र तथा अन्य महारथी पुत्र भी मारे गए।

श्लोक 52 (7.137.52)

यानन्यान्ददृशे भीमश्चक्षुर्विषयमागतान् । पुत्रांस्तव महाराज त्वरया ताञ्जधान ह ॥

yānanyāndadṛśe bhīmaścakṣurviṣayamāgatān | putrāṃstava mahārāja tvarayā tāñjadhāna ha

हे महाराज, आपके जिन-जिन दूसरे पुत्रों पर भीम की दृष्टि पड़ी, उन सबको उसने शीघ्रता से मार डाला।

श्लोक 53 (7.137.53)

त्वत्कृते ह्यहमद्राक्षं दह्यमानां वरुथिनीम् । सहस्रशः शरैर्मुक्तैः पाण्डवेन वृषेण च ॥

tvatkṛte hyahamadrākṣaṃ dahyamānāṃ varuthinīm | sahasraśaḥ śarairmuktaiḥ pāṇḍavena vṛṣeṇa ca

आपके ही कारण मैंने आपकी सेना को पाण्डव भीम और वृष कर्ण के छोड़े हज़ारों बाणों से जलते हुए देखा।

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