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द्रोण पर्व · अध्याय 142

भूरिश्रवा सात्यकि को पछाड़ता है; अर्जुन उसकी भुजा काट देते हैं

भूरिश्रवा गर्वभरी बातों से सात्यकि को ललकारता है और सात्यकि उसी तरह उत्तर देता है; फिर दोनों बाणों, तलवारों और अन्त में कुश्ती से लड़ते हैं। सात्यकि के निहत्था हो जाने पर कृष्ण उसे अर्जुन को दिखाते हैं, और भूरिश्रवा उसे भूमि पर पटककर केश पकड़कर घसीटता तथा तलवार उठा लेता है। भूरिश्रवा का सम्मान करते हुए भी अर्जुन अपने शिष्य को मरने नहीं दे सकते; वे गाण्डीव पर क्षुरप्र बाण चढ़ाकर उसकी उठी हुई दाहिनी भुजा काट देते हैं।

अध्याय 141अध्याय-सूचीअध्याय 143

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.142.1)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य सात्वतं युद्धदुर्मदम् । क्रोधाद्भूरिश्रवा राजन्सहसा समुपाद्रवत् ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya sātvataṃ yuddhadurmadam | krodhādbhūriśravā rājansahasā samupādravat

युद्ध के मद में चूर सात्वत को अपनी ओर आते देखकर, हे राजन्, भूरिश्रवा क्रोध से सहसा उस पर टूट पड़ा।

श्लोक 2 (7.142.2)

तमब्रवीन्महाराज कौरव्यः शिनिपुङ्गवम् । अद्य प्राप्तोऽपि दिष्ट्या मे चक्षुर्विषयमित्युत ॥

tamabravīnmahārāja kauravyaḥ śinipuṅgavam | adya prāpto'pi diṣṭyā me cakṣurviṣayamityuta

हे महाराज, कुरुवंशी भूरिश्रवा ने शिनिवंश के उस श्रेष्ठ वीर से कहा, "सौभाग्य से आज तुम मेरी आँखों के सामने आ पहुँचे हो!"

भूरिश्रवा उवाच

श्लोक 3 (7.142.3)

चिराभिलषितं काममहं प्राप्स्यामि संयुगे । न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे रणम् ॥

cirābhilaṣitaṃ kāmamahaṃ prāpsyāmi saṃyuge | na hi me mokṣyase jīvanyadi notsṛjase raṇam

"जिस इच्छा को मैं इतने समय से सँजोए था, उसे आज युद्ध में पूरा करूँगा। यदि तुम रण नहीं छोड़ दोगे, तो जीते-जी मुझसे बचकर नहीं जा सकोगे।"

श्लोक 4 (7.142.4)

अद्य त्वां समरे हत्वा नित्यं शूराभिमानिनम् । नन्दयिष्यामि दाशार्ह कुरुराजं सुयोधनम् ॥

adya tvāṃ samare hatvā nityaṃ śūrābhimāninam | nandayiṣyāmi dāśārha kururājaṃ suyodhanam

"हे दाशार्ह, सदा अपने को शूरवीर माननेवाले तुम्हें आज रण में मारकर मैं कुरुराज सुयोधन को आनन्दित करूँगा।"

श्लोक 5 (7.142.5)

अद्य मद्बाणनिर्दग्धं पतितं धरणीतले । द्रक्ष्यतस्त्वां रणे वीरौ सहितौ केशवार्जुनौ ॥

adya madbāṇanirdagdhaṃ patitaṃ dharaṇītale | drakṣyatastvāṃ raṇe vīrau sahitau keśavārjunau

"आज केशव और अर्जुन, दोनों वीर साथ-साथ, मेरे बाणों से जले हुए तुम्हें रण में भूमि पर गिरा हुआ देखेंगे।"

श्लोक 6 (7.142.6)

अद्य धर्मसुतो राजा श्रुत्वा त्वां निहतं मया । सव्रीडो भविता सद्यो येनासीह प्रवेशितः ॥

adya dharmasuto rājā śrutvā tvāṃ nihataṃ mayā | savrīḍo bhavitā sadyo yenāsīha praveśitaḥ

"आज धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, जिसने तुम्हें यहाँ भेजा था, तुम्हें मेरे हाथों मारा गया सुनकर तुरन्त लज्जित हो जाएगा।"

श्लोक 7 (7.142.7)

अद्य मे विक्रमं पार्थो विज्ञास्यति धनञ्जयः । त्वयि भूमौ विनिहते शयाने रुधिरोक्षिते ॥

adya me vikramaṃ pārtho vijñāsyati dhanañjayaḥ | tvayi bhūmau vinihate śayāne rudhirokṣite

"आज जब तुम मरकर लहू से लथपथ भूमि पर पड़े होगे, तब पार्थ धनञ्जय मेरा पराक्रम जान लेगा।"

श्लोक 8 (7.142.8)

चिराभिलषितो ह्येष त्वया सह समागमः । पुरा देवासुरे युद्धे शक्रस्य बलिना यथा ॥

cirābhilaṣito hyeṣa tvayā saha samāgamaḥ | purā devāsure yuddhe śakrasya balinā yathā

"तुम्हारे साथ यह मिलन मेरी चिरकाल की अभिलाषा थी, जैसे पूर्वकाल के देवासुर-युद्ध में बलि का शक्र के साथ हुआ था।"

श्लोक 9 (7.142.9)

अद्य युद्धं महाघोरं तव दास्यामि सात्वत । ततो ज्ञास्यसि तत्त्वेन मद्वीर्यबलपौरुषम् ॥

adya yuddhaṃ mahāghoraṃ tava dāsyāmi sātvata | tato jñāsyasi tattvena madvīryabalapauruṣam

"हे सात्वत, आज मैं तुम्हें अत्यन्त भयंकर युद्ध दूँगा; तब तुम मेरे बल, वीर्य और पौरुष को यथार्थ रूप से जान लोगे।"

श्लोक 10 (7.142.10)

अद्य संयमनीं याता मया त्वं निहतो रणे । यथा रामानुजेनाजौ रावणिर्लक्ष्मणेन ह ॥

adya saṃyamanīṃ yātā mayā tvaṃ nihato raṇe | yathā rāmānujenājau rāvaṇirlakṣmaṇena ha

"आज रण में मेरे हाथों मारे जाकर तुम यमपुरी पहुँचोगे, जैसे युद्ध में राम के छोटे भाई लक्ष्मण के हाथों रावण का पुत्र मारा गया था।"

श्लोक 11 (7.142.11)

अद्य कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजश्च माधव । हते त्वयि निरुत्साहारणं त्यक्ष्यन्त्यसंशयम् ॥

adya kṛṣṇaśca pārthaśca dharmarājaśca mādhava | hate tvayi nirutsāhāraṇaṃ tyakṣyantyasaṃśayam

"हे माधव, आज तुम्हारे मारे जाने पर कृष्ण, पार्थ और धर्मराज निस्सन्देह निरुत्साह होकर युद्ध छोड़ देंगे।"

श्लोक 12 (7.142.12)

अद्य तेऽपचितिं कृत्वा शितैर्माधव सायकैः । तत्स्त्रियो नन्दयिष्यामि ये त्वया निहता रणे ॥

adya te'pacitiṃ kṛtvā śitairmādhava sāyakaiḥ | tatstriyo nandayiṣyāmi ye tvayā nihatā raṇe

"हे माधव, आज अपने तीखे बाणों से तुमसे बदला चुकाकर मैं उनकी स्त्रियों को आनन्दित करूँगा जिन्हें तुमने रण में मारा है।"

श्लोक 13 (7.142.13)

मच्चक्षुर्विषये प्राप्तो न त्वं माधव मोक्ष्यसे । सिंहस्य विषयं प्राप्तो यथा क्षुद्रमृगस्तथा ॥

maccakṣurviṣaye prāpto na tvaṃ mādhava mokṣyase | siṃhasya viṣayaṃ prāpto yathā kṣudramṛgastathā

"हे माधव, मेरी आँखों की पहुँच में आकर तुम उसी प्रकार नहीं बच सकोगे, जैसे सिंह के क्षेत्र में आया हुआ छोटा मृग नहीं बचता।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (7.142.14)

युयुधानस्तु तं राजन्प्रत्युवाच हसन्निव । कौरवेय न सन्त्रासो विद्यते मम संयुगे ॥

yuyudhānastu taṃ rājanpratyuvāca hasanniva | kauraveya na santrāso vidyate mama saṃyuge

हे राजन्, युयुधान ने मानो हँसते हुए उसे उत्तर दिया, "हे कौरवेय, युद्ध में मुझे कोई भय नहीं होता।"

सात्यकिरुवाच

श्लोक 15 (7.142.15)

नाहं भीषयितुं शक्यो वाङ्मात्रेण तु केवलम् । स मां निहन्यात्सङ्ग्रामे यो मां कुर्यान्निरायुधम् ॥

nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyo vāṅmātreṇa tu kevalam | sa māṃ nihanyātsaṅgrāme yo māṃ kuryānnirāyudham

"केवल बातों से मुझे डराया नहीं जा सकता। संग्राम में मुझे वही मार सकता है जो मुझे निहत्था कर दे।"

श्लोक 16 (7.142.16)

समास्तु शाश्वतीर्हन्याद्यो मां हन्याद्धि संयुगे । किं वृथोक्तेन बहुना कर्मणा तत्समाचर ॥

samāstu śāśvatīrhanyādyo māṃ hanyāddhi saṃyuge | kiṃ vṛthoktena bahunā karmaṇā tatsamācara

"और जो मुझे युद्ध में मार सके, वह सदा ही मारता रहे। इतनी व्यर्थ बातों से क्या? जो कर सकते हो, कर दिखाओ।"

श्लोक 17 (7.142.17)

शारदस्येव मेघस्य गर्जितं निष्फलं हिते । श्रुत्वा त्वद्गर्जितं वीर हास्यं हि मम जायते ॥

śāradasyeva meghasya garjitaṃ niṣphalaṃ hite | śrutvā tvadgarjitaṃ vīra hāsyaṃ hi mama jāyate

"हे वीर, तुम्हारी गर्जना शरद् ऋतु के बादल की गरज के समान निष्फल है; तुम्हारा यह गरजना सुनकर मुझे तो हँसी आती है।"

श्लोक 18 (7.142.18)

चिरकालेप्सितं लोके युद्धमद्यास्तु कौरव । त्वरते मे मतिस्तात तव युद्धाभिकाङ्क्षिणी । नाहत्वाऽहं निवर्तिष्ये त्वामद्य पुरुषाधम ॥

cirakālepsitaṃ loke yuddhamadyāstu kaurava | tvarate me matistāta tava yuddhābhikāṅkṣiṇī | nāhatvā'haṃ nivartiṣye tvāmadya puruṣādhama

"हे कौरव, संसार में जिस युद्ध की मैं चिरकाल से इच्छा करता था, वह आज हो जाए। हे तात, मेरी बुद्धि उतावली हो रही है, और तुम भी लड़ने को आतुर हो; हे अधम पुरुष, मैं आज तुम्हें मारे बिना नहीं लौटूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 19 (7.142.19)

अन्योन्यं तौ तथा वाग्भिस्तक्षन्तौ नरपुङ्गवौ । जिघांसू परमक्रुद्धावभिजघ्नतुराहवे ॥

anyonyaṃ tau tathā vāgbhistakṣantau narapuṅgavau | jighāṃsū paramakruddhāvabhijaghnaturāhave

इस प्रकार वाणी से एक-दूसरे को चीरते हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ, एक-दूसरे को मार डालने की इच्छा से अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध में परस्पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 20 (7.142.20)

समेतौ तौ महेष्वासौ शुष्मिणौ स्पर्धिनौ रणे । द्विरदाविव सङ्क्रुद्धौ वासितार्थे मदोत्कटौ ॥

sametau tau maheṣvāsau śuṣmiṇau spardhinau raṇe | dviradāviva saṅkruddhau vāsitārthe madotkaṭau

बलवान् और एक-दूसरे से होड़ करनेवाले वे दोनों महाधनुर्धर रण में मिले, जैसे मदमत्त दो क्रोधित हाथी हथिनी के लिए भिड़ते हैं।

श्लोक 21 (7.142.21)

भूरिश्रवाः सात्यकिश्च ववर्षतुररिन्दमौ । शरवर्षाणि घोराणि मेघाविव परस्परम् ॥

bhūriśravāḥ sātyakiśca vavarṣaturarindamau | śaravarṣāṇi ghorāṇi meghāviva parasparam

शत्रुओं का दमन करनेवाले भूरिश्रवा और सात्यकि दो बादलों की तरह एक-दूसरे पर भयंकर बाणों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 22 (7.142.22)

सौमदत्तिस्तु शैनेयं प्रच्छाद्येषुभिराशुगैः । जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ विव्याध निशितैः शरैः ॥

saumadattistu śaineyaṃ pracchādyeṣubhirāśugaiḥ | jighāṃsurbharataśreṣṭha vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

हे भरतश्रेष्ठ, सोमदत्त के पुत्र ने शिनि के वंशज को शीघ्रगामी बाणों से ढक दिया और उसे मार डालने की इच्छा से तीखे बाणों द्वारा बींध दिया।

श्लोक 23 (7.142.23)

दशभिः सात्यकिं विद्ध्वा सौमदत्तिरथापरान् । मुमोच निशितान्बाणाञ्जिघांसुः शिनिपुङ्गवं ॥

daśabhiḥ sātyakiṃ viddhvā saumadattirathāparān | mumoca niśitānbāṇāñjighāṃsuḥ śinipuṅgavaṃ

सोमदत्त के पुत्र ने सात्यकि को दस बाणों से बींधकर, उस शिनिप्रवर को मार डालने की इच्छा से, और भी तीखे बाण छोड़े।

श्लोक 24 (7.142.24)

तानस्य विशिखांस्तीक्ष्णानन्तरिक्षे विशाम्पते । अप्राप्तानस्त्रमायाभिरग्रसत्सात्यकिः प्रभो ॥

tānasya viśikhāṃstīkṣṇānantarikṣe viśāmpate | aprāptānastramāyābhiragrasatsātyakiḥ prabho

परन्तु हे प्रजापालक, उसके उन तीखे बाणों को सात्यकि ने अपनी अस्त्र-माया से उनके पहुँचने से पहले ही आकाश में निगल लिया।

श्लोक 25 (7.142.25)

तौ पृथक्शस्त्रवर्षाभ्यामवर्षेतां परस्परम् । उत्तमाभिजनौ वीरौ कुरुवृष्णियशस्करौ ॥

tau pṛthakśastravarṣābhyāmavarṣetāṃ parasparam | uttamābhijanau vīrau kuruvṛṣṇiyaśaskarau

कुरुओं और वृष्णियों के यश को बढ़ानेवाले, उत्तम कुल में जन्मे वे दोनों वीर अलग-अलग शस्त्रों की वर्षा से एक-दूसरे को नहलाने लगे।

श्लोक 26 (7.142.26)

तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ । रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्चाप्यकृन्तताम् ॥

tau nakhairiva śārdūlau dantairiva mahādvipau | rathaśaktibhiranyonyaṃ viśikhaiścāpyakṛntatām

जैसे दो बाघ नखों से और दो महागज दाँतों से लड़ते हैं, वैसे ही वे दोनों रथ से चलाई जानेवाली शक्तियों और बाणों से एक-दूसरे को काटने लगे।

श्लोक 27 (7.142.27)

निर्भिदन्तौ हि गात्राणि विक्षरन्तौ च शोणितम् । व्यष्टम्भयेतामन्योन्यं प्राणद्यूताभिदेविनौ ॥

nirbhidantau hi gātrāṇi vikṣarantau ca śoṇitam | vyaṣṭambhayetāmanyonyaṃ prāṇadyūtābhidevinau

एक-दूसरे के अंगों को बेधते और रक्त बहाते हुए, प्राणों को दाँव पर लगाकर जुआ खेलनेवालों की तरह, वे परस्पर रोक-थाम करते रहे।

श्लोक 28 (7.142.28)

एवमुत्तमकर्माणौ कुरुवृष्णियशस्करौ । परस्परमयुध्येतां वारणाविव यूथपौ ॥

evamuttamakarmāṇau kuruvṛṣṇiyaśaskarau | parasparamayudhyetāṃ vāraṇāviva yūthapau

इस प्रकार कुरुओं और वृष्णियों का यश बढ़ानेवाले वे दोनों उत्तम कर्मा वीर, दो यूथपति हाथियों की तरह, एक-दूसरे से लड़ते रहे।

श्लोक 29 (7.142.29)

तावदीर्घेण कालेन ब्रह्मलोकपुरस्कृतौ । यियासन्तौ परं स्थानमन्योन्यं सञ्जगर्जतुः ॥

tāvadīrgheṇa kālena brahmalokapuraskṛtau | yiyāsantau paraṃ sthānamanyonyaṃ sañjagarjatuḥ

ब्रह्मलोक को सामने रखे हुए, परम स्थान को पाने की इच्छा करते हुए वे दोनों बहुत देर तक एक-दूसरे पर गरजते रहे।

श्लोक 30 (7.142.30)

सात्यकिः सौमदत्तिश्च शरवृष्ट्या परस्परम् । हृष्टवद्धार्तराष्ट्राणां पश्यतामभ्यवर्षताम् ॥

sātyakiḥ saumadattiśca śaravṛṣṭyā parasparam | hṛṣṭavaddhārtarāṣṭrāṇāṃ paśyatāmabhyavarṣatām

सात्यकि और सोमदत्त का पुत्र धृतराष्ट्र के पुत्रों के देखते-देखते मानो हर्ष के साथ एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करते रहे।

श्लोक 31 (7.142.31)

सम्प्रैक्षन्त जनास्तौ तु युध्यमानौ युधाम्पती । यूथपौ वासिताहेतोः प्रयुद्धाविव कुञ्जरौ ॥

sampraikṣanta janāstau tu yudhyamānau yudhāmpatī | yūthapau vāsitāhetoḥ prayuddhāviva kuñjarau

लोग उन दोनों योद्धाओं के स्वामियों को लड़ते हुए देखते रहे, जैसे हथिनी के लिए भिड़े हुए दो यूथपति हाथी हों।

श्लोक 32 (7.142.32)

भूयोभूयः शरै राजंस्तक्षन्तौ क्रोधमूर्च्छितौ । अयुध्येतां महारङ्गे वने केसरिणाविव ॥

bhūyobhūyaḥ śarai rājaṃstakṣantau krodhamūrcchitau | ayudhyetāṃ mahāraṅge vane kesariṇāviva

हे राजन्, क्रोध से मूर्च्छित-से वे बार-बार बाणों से एक-दूसरे को काटते हुए उस विशाल रंगभूमि में वन के दो सिंहों की तरह लड़ते रहे।

श्लोक 33 (7.142.33)

मर्मज्ञाविव सङ्क्रुद्धौ जिघांसन्तौ जगर्जतुः । विमर्दन्तावथान्योन्यं बलवज्रधराविव ॥

marmajñāviva saṅkruddhau jighāṃsantau jagarjatuḥ | vimardantāvathānyonyaṃ balavajradharāviva

मर्मस्थानों को जाननेवालों की तरह क्रुद्ध होकर, एक-दूसरे को मारने की इच्छा से वे गरजे और बल दैत्य तथा वज्रधारी इन्द्र की भाँति परस्पर कुचलने लगे।

श्लोक 34 (7.142.34)

अथान्योन्यं पताकाश्च रथोपकरणानि च । सञ्चिच्छिदतुरायान्तौ बाणैः सन्नतपर्वभिः ॥

athānyonyaṃ patākāśca rathopakaraṇāni ca | sañcicchidaturāyāntau bāṇaiḥ sannataparvabhiḥ

फिर आमने-सामने आते हुए उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणों से एक-दूसरे की पताकाएँ और रथ के उपकरण काट डाले।

श्लोक 35 (7.142.35)

पुनश्च शरवर्षाभ्यामन्योन्यमभिवर्षताम् । उभौ तु जघ्नतुस्तूर्णमितरेतरसारथी ॥

punaśca śaravarṣābhyāmanyonyamabhivarṣatām | ubhau tu jaghnatustūrṇamitaretarasārathī

और फिर बाणों की वर्षा से एक-दूसरे को नहलाते हुए दोनों ने शीघ्र ही एक-दूसरे के सारथि को मार डाला।

श्लोक 36 (7.142.36)

अन्योन्यस्य हयान्हत्वा धनुषी विनिकृत्य च । विरथावसियुद्धाय समेयातां महारणे ॥

anyonyasya hayānhatvā dhanuṣī vinikṛtya ca | virathāvasiyuddhāya sameyātāṃ mahāraṇe

एक-दूसरे के घोड़ों को मारकर और धनुषों को काटकर, रथहीन हुए वे दोनों उस महायुद्ध में तलवार से लड़ने के लिए भिड़ गए।

श्लोक 37 (7.142.37)

आर्षभे चर्मणी चित्रे प्रगृह्य विपुले शुभे । विकोशौ चाप्यसी कृत्वा समरे तौ विचेरतुः ॥

ārṣabhe carmaṇī citre pragṛhya vipule śubhe | vikośau cāpyasī kṛtvā samare tau viceratuḥ

बैल के चमड़े की चमकदार, चौड़ी और सुन्दर ढालें लेकर तथा तलवारें म्यान से खींचकर वे दोनों रणभूमि में विचरने लगे।

श्लोक 38 (7.142.38)

चरन्तौ विविधान्मार्गान्मण्डलानि च भागशः । मुहुराजघ्नतुः क्रुद्धावन्योन्यमरिमर्दनौ । सखङ्गौ चित्रवर्माणौ सनिष्काङ्गदभूषणौ ॥

carantau vividhānmārgānmaṇḍalāni ca bhāgaśaḥ | muhurājaghnatuḥ kruddhāvanyonyamarimardanau | sakhaṅgau citravarmāṇau saniṣkāṅgadabhūṣaṇau

नाना मार्गों पर और बारी-बारी से मण्डल बनाते हुए चलते, चमकीले कवच पहने, स्वर्ण-हारों और बाजूबन्दों से सजे वे दोनों शत्रुमर्दन वीर तलवारें लिए क्रोध से बार-बार एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 39 (7.142.39)

भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् । सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयन्तौ यशस्विनौ ॥

bhrāntamudbhrāntamāviddhamāplutaṃ viplutaṃ sṛtam | sampātaṃ samudīrṇaṃ ca darśayantau yaśasvinau

वे दोनों यशस्वी वीर घूमना, चक्कर काटना, तलवार लहराना, उछलना, छलाँग भरना, आगे बढ़ना, टूट पड़ना और ऊपर उठना जैसे पैंतरे दिखाते रहे।

श्लोक 40 (7.142.40)

असिभ्यां सम्प्रजह्राते परस्परमरिन्दमौ । उभौ छिद्रैषिणौ वीरावुभौ चित्रं ववल्गतुः ॥

asibhyāṃ samprajahrāte parasparamarindamau | ubhau chidraiṣiṇau vīrāvubhau citraṃ vavalgatuḥ

वे दोनों शत्रुदमन वीर तलवारों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; दोनों ही कमज़ोर स्थान की ताक में थे और दोनों अद्भुत ढंग से चपलता से घूम रहे थे।

श्लोक 41 (7.142.41)

दर्शयन्तावुभौ शिक्षां लाघवं सौष्ठवं तथा । रणे रणकृतां श्रेष्ठावन्योन्यं पर्यकर्षताम् ॥

darśayantāvubhau śikṣāṃ lāghavaṃ sauṣṭhavaṃ tathā | raṇe raṇakṛtāṃ śreṣṭhāvanyonyaṃ paryakarṣatām

कौशल, फुर्ती और सौष्ठव दिखाते हुए वे दोनों रणवीरों में श्रेष्ठ युद्ध में एक-दूसरे को खींचते रहे।

श्लोक 42 (7.142.42)

मुहूर्तमिव राजेन्द्र समाहत्य परस्परम् । पश्यतां सर्वसैन्यानां वीरावाश्वसतां पुनः ॥

muhūrtamiva rājendra samāhatya parasparam | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ vīrāvāśvasatāṃ punaḥ

हे राजेन्द्र, क्षण भर एक-दूसरे पर प्रहार करके वे दोनों वीर सारी सेनाओं के देखते-देखते फिर दम लेने लगे।

श्लोक 43 (7.142.43)

असिभ्यां चर्मणी चित्रे शतचन्द्रे नराधिप । निकृत्य पुरुषव्याघ्रौ बाहुयुद्धं प्रचक्रतुः ॥

asibhyāṃ carmaṇī citre śatacandre narādhipa | nikṛtya puruṣavyāghrau bāhuyuddhaṃ pracakratuḥ

हे नरेश्वर, सौ चन्द्र-चिह्नों से सजी अपनी विचित्र ढालों को तलवारों से काट डालने के बाद वे दोनों पुरुषव्याघ्र बाहुयुद्ध करने लगे।

श्लोक 44 (7.142.44)

व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ । बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिधैरिव ॥

vyūḍhoraskau dīrghabhujau niyuddhakuśalāvubhau | bāhubhiḥ samasajjetāmāyasaiḥ paridhairiva

चौड़ी छातीवाले, लम्बी भुजाओंवाले और मल्लयुद्ध में कुशल वे दोनों लोहे की गदाओं जैसी भुजाओं से एक-दूसरे से भिड़ गए।

श्लोक 45 (7.142.45)

तयो राजन्भुजाघातनिग्रहप्रग्रहास्तथा । शिक्षाबलसमुद्भूताः सर्वयोधप्रहर्षणाः ॥

tayo rājanbhujāghātanigrahapragrahāstathā | śikṣābalasamudbhūtāḥ sarvayodhapraharṣaṇāḥ

हे राजन्, बल और अभ्यास से उपजे उनके भुजाओं के आघात, पकड़ें और जकड़ें सभी योद्धाओं को हर्षित कर रही थीं।

श्लोक 46 (7.142.46)

तयोर्नृवरयो राजन्समरे युध्यमानयोः । भीमोऽभवन्महाशब्दो वज्रपर्वतयोरिव ॥

tayornṛvarayo rājansamare yudhyamānayoḥ | bhīmo'bhavanmahāśabdo vajraparvatayoriva

हे राजन्, रण में लड़ते हुए उन दोनों नरश्रेष्ठों से ऐसा भीषण शब्द उठा, जैसा वज्र और पर्वत के टकराने से होता है।

श्लोक 47 (7.142.47)

द्विपाविव विषाणाग्रैः शृङ्गैरिव महर्षभौ । भुजयोक्त्रावबन्धैश्च शिरोभ्यां चावघातनैः ॥

dvipāviva viṣāṇāgraiḥ śṛṅgairiva maharṣabhau | bhujayoktrāvabandhaiśca śirobhyāṃ cāvaghātanaiḥ

दो हाथियों की तरह दाँतों के सिरों से और दो महावृषभों की तरह सींगों से, भुजाओं की जकड़ों और कसी पकड़ों से, सिरों की टक्करों और आघातों से,

श्लोक 48 (7.142.48)

पादावकर्षसन्धानैस्तोमराङ्कुशलासनैः । पादोदरविबन्धैश्च भूमावुद्भ्रमणैस्तथा ॥

pādāvakarṣasandhānaistomarāṅkuśalāsanaiḥ | pādodaravibandhaiśca bhūmāvudbhramaṇaistathā

पैरों से खींचने और पैरों में फँसाने से, तोमर, अङ्कुश और लासन नामक पकड़ों से, पैरों को पेट पर कसने से और भूमि पर चक्कर काटने से,

श्लोक 49 (7.142.49)

गतप्रत्यागताक्षेपैः पातनोत्थानसम्प्लुतैः । युयुधाते महात्मानौ कुरुसात्वतपुङ्गवौ ॥

gatapratyāgatākṣepaiḥ pātanotthānasamplutaiḥ | yuyudhāte mahātmānau kurusātvatapuṅgavau

आगे जाने और पीछे लौटने से, प्रहारों से, पटकने, उठने और उछलकर टूट पड़ने से, कुरुओं और सात्वतों के वे दोनों महात्मा श्रेष्ठ वीर लड़ते रहे।

श्लोक 50 (7.142.50)

द्वात्रिंशत्कारणानि स्युर्यानि युद्धानि भारत । तान्यदर्शयतां तत्र युध्यमानौ महाबलौ ॥

dvātriṃśatkāraṇāni syuryāni yuddhāni bhārata | tānyadarśayatāṃ tatra yudhyamānau mahābalau

हे भारत, युद्ध में जितने बत्तीस प्रकार के दाँव-पेच होते हैं, उन सबको वहाँ लड़ते हुए उन दोनों महाबली वीरों ने दिखाया।

श्लोक 51 (7.142.51)

क्षीणायुधे सात्वते युध्यमाने । ततोऽब्रवीदर्जुनं वासुदेवः । पश्यस्वैनं विरथं युध्यमानं । रणे वरं सर्वधनुर्धराणाम् ॥

kṣīṇāyudhe sātvate yudhyamāne | tato'bravīdarjunaṃ vāsudevaḥ | paśyasvainaṃ virathaṃ yudhyamānaṃ | raṇe varaṃ sarvadhanurdharāṇām

सात्वत के शस्त्र समाप्त हो जाने पर भी जब वह लड़ता रहा, तब वासुदेव ने अर्जुन से कहा, "देखो, रथहीन होकर लड़ते हुए इस वीर को, जो रण में सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ है।"

श्लोक 52 (7.142.52)

सिन्धुराजवधे सक्तं पार्थं कृष्णोऽब्रवीत्पुनः । सीदन्तं सात्यकिं पश्य पार्थैनं परिरक्ष च ॥

sindhurājavadhe saktaṃ pārthaṃ kṛṣṇo'bravītpunaḥ | sīdantaṃ sātyakiṃ paśya pārthainaṃ parirakṣa ca

सिन्धुराज के वध में लगे हुए पार्थ से कृष्ण ने फिर कहा, "देखो, सात्यकि अवसन्न हो रहा है; हे पार्थ, इसकी रक्षा करो।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 53 (7.142.53)

प्रविष्टो भारतीं भित्त्वा तव पाण्डव पृष्ठतः । योधितश्च महावीर्यैः सर्वैर्भारत भारतैः ॥

praviṣṭo bhāratīṃ bhittvā tava pāṇḍava pṛṣṭhataḥ | yodhitaśca mahāvīryaiḥ sarvairbhārata bhārataiḥ

"हे पाण्डव, वह भरतों की सेना को चीरकर तुम्हारे पीछे घुसा है, और सभी महापराक्रमी भरतों ने उससे युद्ध किया है।"

श्लोक 54 (7.142.54)

धार्तराष्ट्राश्च ये मुख्या ये च मुख्या महारथाः । निहता वृष्णिवीरेण शतशोऽथ सहस्रशः ॥

dhārtarāṣṭrāśca ye mukhyā ye ca mukhyā mahārathāḥ | nihatā vṛṣṇivīreṇa śataśo'tha sahasraśaḥ

"धृतराष्ट्र के पक्ष के जो प्रमुख वीर और प्रमुख महारथी थे, वे वृष्णिवीर के हाथों सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में मारे गए हैं।"

श्लोक 55 (7.142.55)

परिश्रान्तं युधां श्रेष्ठं सम्प्राप्तो भूरिदक्षिणः । युद्धाकाङ्क्षी समायान्तं नैतत्सममिवार्जुन ॥

pariśrāntaṃ yudhāṃ śreṣṭhaṃ samprāpto bhūridakṣiṇaḥ | yuddhākāṅkṣī samāyāntaṃ naitatsamamivārjuna

"थका हुआ यह योद्धाओं में श्रेष्ठ वीर अब युद्ध की इच्छा से आते हुए उदार दानी भूरिश्रवा से जा भिड़ा है; हे अर्जुन, यह बराबरी का मुक़ाबला नहीं है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 56 (7.142.56)

ततो भूरिश्रवाः क्रुद्धः सात्यकिं युद्धदुर्मदः । उद्यम्याभ्याहनद्राजन्मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥

tato bhūriśravāḥ kruddhaḥ sātyakiṃ yuddhadurmadaḥ | udyamyābhyāhanadrājanmatto mattamiva dvipam

तब युद्ध के उन्माद में क्रुद्ध भूरिश्रवा ने, हे राजन्, सात्यकि को उठाकर पटक दिया, जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी को पटकता है।

श्लोक 57 (7.142.57)

ततो जलदनिर्घोषः समीपे नृपसत्तम । हाहाकारो महानासीत्सैन्यानां भरतर्षभ । यदुद्यम्य महाबाहुः सात्यकिं न्यहनद्भुवि ॥

tato jaladanirghoṣaḥ samīpe nṛpasattama | hāhākāro mahānāsītsainyānāṃ bharatarṣabha | yadudyamya mahābāhuḥ sātyakiṃ nyahanadbhuvi

तब, हे नृपश्रेष्ठ, हे भरतर्षभ, पास ही सेनाओं में मेघगर्जन जैसा बड़ा हाहाकार उठा, जब उस महाबाहु ने सात्यकि को उठाकर भूमि पर पटक दिया।

श्लोक 58 (7.142.58)

रथस्थयोर्द्वयोर्युद्धे क्रुद्धयोर्योधमुख्ययोः । केशवार्जुनयो राजन्समरे प्रेक्षमाणयोः ॥

rathasthayordvayoryuddhe kruddhayoryodhamukhyayoḥ | keśavārjunayo rājansamare prekṣamāṇayoḥ

हे राजन्, जब रथ पर खड़े वे दोनों प्रमुख योद्धा केशव और अर्जुन क्रुद्ध होकर रण में यह सब देख रहे थे,

श्लोक 59 (7.142.59)

अथ कृष्णो महाबाहुरर्जुनं प्रत्यभाषत । पश्य वृष्ण्यन्धकव्याघ्रं सौमदत्तिवशं गतम् ॥

atha kṛṣṇo mahābāhurarjunaṃ pratyabhāṣata | paśya vṛṣṇyandhakavyāghraṃ saumadattivaśaṃ gatam

तब महाबाहु कृष्ण ने अर्जुन से कहा, "देखो, वृष्णियों और अन्धकों का वह व्याघ्र सोमदत्त के पुत्र के वश में पड़ गया है।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 60 (7.142.60)

परिश्रान्तं गतं भूमौ कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । तवान्तेवासिनं वीरं पालयार्जुन सात्यकिम् ॥

pariśrāntaṃ gataṃ bhūmau kṛtvā karma suduṣkaram | tavāntevāsinaṃ vīraṃ pālayārjuna sātyakim

"अत्यन्त कठिन कर्म करके थका हुआ यह वीर भूमि पर गिरा है; हे अर्जुन, अपने शिष्य सात्यकि की रक्षा करो।"

श्लोक 61 (7.142.61)

न वशं यज्ञशीलस्य गच्छेदेष वरोऽर्जुन । त्वत्कृते पुरुषव्याघ्र तदाऽऽशु क्रियतां विभो ॥

na vaśaṃ yajñaśīlasya gacchedeṣa varo'rjuna | tvatkṛte puruṣavyāghra tadā''śu kriyatāṃ vibho

"यज्ञशील भूरिश्रवा के वश में यह श्रेष्ठ वीर न पड़ने पाए; हे पुरुषव्याघ्र, हे प्रभु, तुम्हारे ही लिए इसे तुरन्त किया जाए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 62 (7.142.62)

स सिंह इव मातङ्गं विकर्षन्भूरिदक्षिणः । व्यरोचत कुरुश्रेष्ठः सात्वतप्रवरं युधि ॥

sa siṃha iva mātaṅgaṃ vikarṣanbhūridakṣiṇaḥ | vyarocata kuruśreṣṭhaḥ sātvatapravaraṃ yudhi

सिंह जिस प्रकार हाथी को घसीटता है, वैसे ही सात्वतों के उस श्रेष्ठ वीर को घसीटते हुए कुरुश्रेष्ठ भूरिश्रवा युद्ध में शोभित हुआ।

श्लोक 63 (7.142.63)

अथाब्रवीद्धृष्टमना वासुदेवं धनञ्जयः । पश्य वृष्णिप्रवीरेण क्रीडन्तं कुरुपुङ्गवम् । महाद्विपेनेव वने मत्तेन हरियूथपम् ॥

athābravīddhṛṣṭamanā vāsudevaṃ dhanañjayaḥ | paśya vṛṣṇipravīreṇa krīḍantaṃ kurupuṅgavam | mahādvipeneva vane mattena hariyūthapam

तब प्रसन्न मन से धनञ्जय ने वासुदेव से कहा, "देखो, वह कुरुश्रेष्ठ वृष्णिवीर के साथ खेल रहा है, जैसे वन में सिंहों का यूथपति किसी मतवाले महागज के साथ खेलता हो।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 64 (7.142.64)

मामेव च महाबाहो परियान्ति महारथाः । यथाशक्ति यतन्तो मां योधयन्तो जनार्दन ॥

māmeva ca mahābāho pariyānti mahārathāḥ | yathāśakti yatanto māṃ yodhayanto janārdana

"हे महाबाहु जनार्दन, महारथी अपनी पूरी शक्ति से यत्न करते हुए मुझसे लड़ते मुझे घेर रहे हैं।"

श्लोक 65 (7.142.65)

ध्रुवं च योधयाम्येताञ्छिद्रान्वेषणतत्परान् । रक्षामि सात्यकिं चैव सौमदत्तिवशं गतम् ॥

dhruvaṃ ca yodhayāmyetāñchidrānveṣaṇatatparān | rakṣāmi sātyakiṃ caiva saumadattivaśaṃ gatam

"मैं निश्चय ही छिद्र खोजने में लगे इन सबसे लड़ भी रहा हूँ और सोमदत्त के पुत्र के वश में पड़े सात्यकि की रक्षा भी कर रहा हूँ।"

श्लोक 66 (7.142.66)

अप्राप्तोऽयं मया कृष्ण हन्तुं भूरिश्रवा रणे । अन्येन तु समासक्तं मम नोत्सहते मनः ॥

aprāpto'yaṃ mayā kṛṣṇa hantuṃ bhūriśravā raṇe | anyena tu samāsaktaṃ mama notsahate manaḥ

"हे कृष्ण, भूरिश्रवा मेरी पहुँच में नहीं आया है, इसलिए मैं उसे रण में नहीं मार सकता; और जो दूसरे से भिड़ा हुआ हो, उस पर प्रहार करने का मेरा मन नहीं होता।"

श्लोक 67 (7.142.67)

अवश्यं च मया कृष्ण वृष्णिवीरस्य रक्षणम् । मदर्थं युध्यमानस्य कार्यं प्राणैरपि प्रभो ॥

avaśyaṃ ca mayā kṛṣṇa vṛṣṇivīrasya rakṣaṇam | madarthaṃ yudhyamānasya kāryaṃ prāṇairapi prabho

"और मेरे लिए लड़नेवाले इस वृष्णिवीर की रक्षा मुझे अवश्य करनी है, हे प्रभो, चाहे इसके लिए अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें।"

श्लोक 68 (7.142.68)

अधर्मो वाऽस्तु धर्मो वा मम माधव माधवः । परेण निहतो मा स्म प्राणान्हासीन्महारथः ॥

adharmo vā'stu dharmo vā mama mādhava mādhavaḥ | pareṇa nihato mā sma prāṇānhāsīnmahārathaḥ

"हे माधव, मेरे लिए यह अधर्म हो या धर्म, वह महारथी माधव किसी दूसरे के हाथों मारा जाकर प्राण न खो दे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 69 (7.142.69)

एवमुक्त्वाऽर्जुनः कृष्णं परानाशु शितैः शरैः । छादयामास सङ्क्रुद्धः परे चापि धनञ्जयम् ॥

evamuktvā'rjunaḥ kṛṣṇaṃ parānāśu śitaiḥ śaraiḥ | chādayāmāsa saṅkruddhaḥ pare cāpi dhanañjayam

कृष्ण से यह कहकर अर्जुन ने क्रोध में भरकर शीघ्र ही तीखे बाणों से शत्रुओं को ढक दिया, और शत्रुओं ने भी बदले में धनञ्जय को ढक लिया।

श्लोक 70 (7.142.70)

एवं स्म युध्यते वीरः सात्यकिं च मुहुर्मुहुः । प्रेक्षते स्म नरव्याघ्रो भूरिश्रवसमेव च ॥

evaṃ sma yudhyate vīraḥ sātyakiṃ ca muhurmuhuḥ | prekṣate sma naravyāghro bhūriśravasameva ca

इस प्रकार वह वीर लड़ता रहा, और वह पुरुषव्याघ्र बार-बार सात्यकि की ओर और भूरिश्रवा की ओर भी देखता रहा।

श्लोक 71 (7.142.71)

तथा तु कृष्यमाणं तं दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे । वासुदेवस्तदा वाक्यं भूयोऽप्यर्जुनमब्रवीत् ॥

tathā tu kṛṣyamāṇaṃ taṃ dṛṣṭvā sātyakimāhave | vāsudevastadā vākyaṃ bhūyo'pyarjunamabravīt

युद्ध में सात्यकि को इस प्रकार घसीटा जाता देखकर वासुदेव ने तब अर्जुन से फिर कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 72 (7.142.72)

पश्य वृष्ण्यन्धकव्याघ्रं सौमदत्तिवशं गतम् । तव शिष्यं महाबाहो धनुष्यनवमं त्वया ॥

paśya vṛṣṇyandhakavyāghraṃ saumadattivaśaṃ gatam | tava śiṣyaṃ mahābāho dhanuṣyanavamaṃ tvayā

"हे महाबाहु, देखो, वृष्णियों और अन्धकों का वह व्याघ्र, तुम्हारा शिष्य, जो धनुर्विद्या में तुमसे कम नहीं है, सोमदत्त के पुत्र के वश में पड़ गया है।"

श्लोक 73 (7.142.73)

अनित्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे । विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥

anityo vikramaḥ pārtha yatra bhūriśravā raṇe | viśeṣayati vārṣṇeyaṃ sātyakiṃ satyavikramam

"हे पार्थ, पराक्रम अनित्य है, जब इस युद्ध में भूरिश्रवा वृष्णिवंशी, सत्यपराक्रमी सात्यकि पर भारी पड़ रहा है।"

श्लोक 74 (7.142.74)

बहुभिर्महारथैरेष पराक्रान्तैर्युयुत्सुभिः । युद्ध्वा भृशं परिश्रान्तः क्षीणायुधपरिच्छदः ॥

bahubhirmahārathaireṣa parākrāntairyuyutsubhiḥ | yuddhvā bhṛśaṃ pariśrāntaḥ kṣīṇāyudhaparicchadaḥ

"लड़ने को उत्सुक बहुत-से पराक्रमी महारथियों से घोर युद्ध करके वह बहुत थक गया है, उसके शस्त्र और साज-सामान समाप्त हो चुके हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 75 (7.142.75)

एवमुक्तो महाराज वासुदेवेन पाण्डवः । मनसा पूजयामास भूरिश्रवसमाहवे ॥

evamukto mahārāja vāsudevena pāṇḍavaḥ | manasā pūjayāmāsa bhūriśravasamāhave

हे महाराज, वासुदेव के ऐसा कहने पर पाण्डव ने मन ही मन युद्ध में भूरिश्रवा का सम्मान किया।

अर्जुन उवाच

श्लोक 76 (7.142.76)

विकर्षन्सात्वतां श्रेष्ठं क्रीडमान इवाहवे । स हर्षयति मां भूयः कुरूणां नन्दिवर्धनः ॥

vikarṣansātvatāṃ śreṣṭhaṃ krīḍamāna ivāhave | sa harṣayati māṃ bhūyaḥ kurūṇāṃ nandivardhanaḥ

"सात्वतों के श्रेष्ठ वीर को मानो खेल में युद्ध में घसीटता हुआ कुरुओं की प्रसन्नता बढ़ानेवाला वह मुझे फिर आनन्दित कर रहा है।"

श्लोक 77 (7.142.77)

प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्निहन्त्येष सात्यकिम् । महाद्विपमिवारण्ये कर्षन्निव हरिर्भृशम् ॥

pravaraṃ vṛṣṇivīrāṇāṃ yannihantyeṣa sātyakim | mahādvipamivāraṇye karṣanniva harirbhṛśam

"कि वह वृष्णिवीरों में श्रेष्ठ सात्यकि को ऐसे पटक रहा है, जैसे वन में सिंह किसी महागज को बलपूर्वक घसीटता है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 78 (7.142.78)

एवं तु मनसा राजन्पार्थः सम्पूज्य कौरवम् । अयुध्यतारिभिर्वीरस्तं च सम्प्रेक्षते मुहुः ॥

evaṃ tu manasā rājanpārthaḥ sampūjya kauravam | ayudhyatāribhirvīrastaṃ ca samprekṣate muhuḥ

इस प्रकार, हे राजन्, पार्थ ने कौरव भूरिश्रवा का मन ही मन आदर किया; वह वीर शत्रुओं से लड़ता रहा और बार-बार उसकी ओर देखता रहा।

श्लोक 79 (7.142.79)

अथ कोशाद्विनिष्कृष्य खङ्गं भूरिश्रवाः शितम् । मूर्धजेषु च जग्राह पदा चोरस्याताडयत् । आक्रम्य चाप्यथोद्यम्य सहासिं सुभुजो भुजम् ॥

atha kośādviniṣkṛṣya khaṅgaṃ bhūriśravāḥ śitam | mūrdhajeṣu ca jagrāha padā corasyātāḍayat | ākramya cāpyathodyamya sahāsiṃ subhujo bhujam

तब भूरिश्रवा ने म्यान से अपनी चमकती तलवार खींची, सात्यकि के केश पकड़ लिए और पाँव से उसकी छाती पर आघात किया; फिर उसे दबाकर और तलवार सहित अपनी भुजा ऊपर उठाकर वह सुन्दर भुजाओंवाला वीर,

श्लोक 80 (7.142.80)

शुशुभे स भुजस्तस्य तपनीयविभूषणः । मध्ये रथसमूहस्य इन्द्रध्वज इवोच्छ्रितः ॥

śuśubhe sa bhujastasya tapanīyavibhūṣaṇaḥ | madhye rathasamūhasya indradhvaja ivocchritaḥ

— सोने के आभूषणों से सजी उसकी वह भुजा रथों के समूह के बीच ऊँचे उठे इन्द्रध्वज के समान शोभित हुई।

श्लोक 81 (7.142.81)

हाहाकृतमभूत्सर्वं पाण्डवानां महद्बलम् । तावकाश्च मुदा युक्ताः सिंहनादं विचुक्रुशुः ॥

hāhākṛtamabhūtsarvaṃ pāṇḍavānāṃ mahadbalam | tāvakāśca mudā yuktāḥ siṃhanādaṃ vicukruśuḥ

पाण्डवों की सारी विशाल सेना में हाहाकार मच गया, और आपके योद्धा हर्ष से भरकर सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 82 (7.142.82)

निमीलिताक्षास्त्वभवञ्जनाः सङ्ग्रामभीरवः । तथा भूरिश्रवोग्रस्ते सात्वते नष्टविक्रमे ॥

nimīlitākṣāstvabhavañjanāḥ saṅgrāmabhīravaḥ | tathā bhūriśravograste sātvate naṣṭavikrame

जब सात्वत का पराक्रम नष्ट हो गया और वह भूरिश्रवा की पकड़ में आ गया, तब युद्ध से डरनेवाले लोगों ने आँखें मूँद लीं।

श्लोक 83 (7.142.83)

वासुदेवं महाबाहुरर्जुनः प्रत्यभाषत । सैन्धवे सक्तदृष्टित्वान्न तं पश्यामि माधवम् ॥

vāsudevaṃ mahābāhurarjunaḥ pratyabhāṣata | saindhave saktadṛṣṭitvānna taṃ paśyāmi mādhavam

महाबाहु अर्जुन ने वासुदेव से कहा, "मेरी दृष्टि सैन्धव पर टिकी रहने के कारण मैं उस माधव को नहीं देख पाता।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 84 (7.142.84)

एष त्वसुकरं कर्म यादवार्थे करोम्यहम् । मम शिष्यो ममार्थाय युध्यते मम शत्रुभिः । तं कृष्ण मोक्षयिष्यामि दावात्सिंहशिशुं यथा ॥

eṣa tvasukaraṃ karma yādavārthe karomyaham | mama śiṣyo mamārthāya yudhyate mama śatrubhiḥ | taṃ kṛṣṇa mokṣayiṣyāmi dāvātsiṃhaśiśuṃ yathā

"पर अब मैं यादव के लिए एक कठिन कर्म करने जा रहा हूँ: मेरा शिष्य मेरे लिए मेरे शत्रुओं से लड़ रहा है। हे कृष्ण, मैं उसे वैसे ही छुड़ाऊँगा जैसे सिंह के बच्चे को दावाग्नि से छुड़ाया जाता है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 85 (7.142.85)

इत्युक्त्वा वचनं कुर्वन्वासुदेवस्य पाण्डवः । ततः क्षुरप्रं निशितं गाण्डीवे समयोजयत् ॥

ityuktvā vacanaṃ kurvanvāsudevasya pāṇḍavaḥ | tataḥ kṣurapraṃ niśitaṃ gāṇḍīve samayojayat

यह कहकर और वासुदेव की बात मानकर पाण्डव ने तब गाण्डीव पर एक तीखा क्षुरप्र बाण चढ़ाया।

श्लोक 86 (7.142.86)

पार्थबाहुविसृष्टः स महोल्केव नभश्च्युता । सखङ्गं यज्ञशीलस्य बाहुं दक्षिणमच्छिनत् ॥

pārthabāhuvisṛṣṭaḥ sa maholkeva nabhaścyutā | sakhaṅgaṃ yajñaśīlasya bāhuṃ dakṣiṇamacchinat

पार्थ की भुजा से छूटा हुआ वह बाण आकाश से गिरी महान् उल्का की तरह उड़ा और उसने यज्ञशील भूरिश्रवा की तलवार सहित दाहिनी भुजा काट डाली।

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