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द्रोण पर्व · अध्याय 143

सात्यकि द्वारा भूरिश्रवा का वध

जब भूरिश्रवा सात्यकि पर प्रहार करने ही वाला था, तभी अर्जुन के बाण ने उसकी तलवार वाली भुजा काट दी। भूरिश्रवा अर्जुन को उलाहना देता है कि उसने ऐसे पुरुष पर प्रहार किया जिसका ध्यान कहीं और था; अर्जुन उत्तर देता है कि वह सात्यकि की रक्षा कर रहा था, कृष्ण के साथ अपनी मित्रता का समर्थन करता है और अभिमन्यु के वध की याद दिलाता है। भूरिश्रवा आमरण उपवास का व्रत लेकर बैठ जाता है और अर्जुन तथा कृष्ण उसे पुण्यात्माओं के लोकों में जाने की अनुमति देते हैं। तब सात्यकि उठकर, पूरी सेना के रोकने पर भी, उसका सिर काट डालता है और कौरवों की निन्दा के उत्तर में अपने कर्म का समर्थन करता है।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.143.1)

स बाहुर्न्यपतद्भूमौ सखड्गः सशुभाङ्गदः । आदधज्जीवलोकस्य दुःखमद्भुतमुत्तमः । यन्त्रमुक्तो महेन्द्रस्य ध्वजो वृत्तोत्सवो यथा ॥

sa bāhurnyapatadbhūmau sakhaḍgaḥ saśubhāṅgadaḥ | ādadhajjīvalokasya duḥkhamadbhutamuttamaḥ | yantramukto mahendrasya dhvajo vṛttotsavo yathā

तलवार और सुन्दर बाजूबन्द सहित वह श्रेष्ठ भुजा भूमि पर गिर पड़ी और संसार के प्राणियों को अद्भुत तथा गहरा दुःख दे गई, मानो उत्सव समाप्त हो जाने पर यन्त्र से छूटा हुआ महेन्द्र का ध्वज गिरा हो।

श्लोक 2 (7.143.2)

प्रहरिष्यन्हृतो बाहुरदृश्येन किरीटिना । वेगेन न्यपतद्भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः ॥

prahariṣyanhṛto bāhuradṛśyena kirīṭinā | vegena nyapatadbhūmau pañcāsya iva pannagaḥ

प्रहार करने को उद्यत भूरिश्रवा की भुजा अदृश्य रहे किरीटधारी अर्जुन द्वारा काट दी गई; वह वेग से भूमि पर गिर पड़ी, जैसे पाँच फनों वाला सर्प गिरा हो।

श्लोक 3 (7.143.3)

स मोघं कृतमात्मानं दृष्ट्वा पार्थेन कौरवः । उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद्गर्हयामास पाण्डवम् ॥

sa moghaṃ kṛtamātmānaṃ dṛṣṭvā pārthena kauravaḥ | utsṛjya sātyakiṃ krodhādgarhayāmāsa pāṇḍavam

पार्थ द्वारा अपने को निष्फल किया हुआ देखकर उस कौरव ने सात्यकि को छोड़ दिया और क्रोध से पाण्डव अर्जुन की निन्दा की।

श्लोक 4 (7.143.4)

स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डजः । एकचक्रो रथो यद्वद्धरणीमास्थितो नृपः । उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥

sa vibāhurmahārāja ekapakṣa ivāṇḍajaḥ | ekacakro ratho yadvaddharaṇīmāsthito nṛpaḥ | uvāca pāṇḍavaṃ caiva sarvakṣatrasya paśyataḥ

हे महाराज! भुजा कट जाने पर वह राजा एक पंख वाले पक्षी के समान और एक पहिये वाले रथ के समान भूमि पर टिका खड़ा रहा, और सब क्षत्रियों के देखते-देखते उसने पाण्डव से कहा।

भूरिश्रवा उवाच

श्लोक 5 (7.143.5)

नृशंसं बत कौन्तेय कर्मेदं कृतवानसि । अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे त्वं बाहुमच्छिनः ॥

nṛśaṃsaṃ bata kaunteya karmedaṃ kṛtavānasi | apaśyato viṣaktasya yanme tvaṃ bāhumacchinaḥ

हे कुन्तीपुत्र! तुमने बड़ा क्रूर कर्म किया; मैं दूसरे में लगा हुआ था, तुम्हें देख नहीं रहा था, और तुमने मेरी भुजा काट डाली।

श्लोक 6 (7.143.6)

येषु येषु नरः पार्थ वर्तते सुसमाहितः । आशु तच्छीलतामेति तदिदं दृश्यते त्वयि ॥

yeṣu yeṣu naraḥ pārtha vartate susamāhitaḥ | āśu tacchīlatāmeti tadidaṃ dṛśyate tvayi

हे पार्थ! मनुष्य जिन-जिन लोगों के बीच सावधानी से रहता है, वह शीघ्र ही उन्हीं का स्वभाव अपना लेता है; यही बात आज तुम में दिखाई दे रही है।

श्लोक 7 (7.143.7)

किं नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । किं कुर्वाणो मया सङ्ख्ये हतो भूरिश्रवा इति ॥

kiṃ nu vakṣyasi rājānaṃ dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | kiṃ kurvāṇo mayā saṅkhye hato bhūriśravā iti

तुम धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर से क्या कहोगे? यही कि भूरिश्रवा को मैंने युद्ध में क्या करते हुए मार डाला?

श्लोक 8 (7.143.8)

इदमिन्द्रेण ते साक्षादुपदिष्टं महात्मना । अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा ॥

idamindreṇa te sākṣādupadiṣṭaṃ mahātmanā | astraṃ rudreṇa vā pārtha droṇenātha kṛpeṇa vā

हे पार्थ! यह अस्त्रविद्या तो तुम्हें स्वयं महात्मा इन्द्र ने, या रुद्र ने, या द्रोण अथवा कृपाचार्य ने सिखाई है।

श्लोक 9 (7.143.9)

ननु नामास्त्रधर्मज्ञस्त्वं लोकेऽभ्यधिकः परैः । सोऽयुध्यमानस्य कथं रणे प्रहृतवानसि ॥

nanu nāmāstradharmajñastvaṃ loke'bhyadhikaḥ paraiḥ | so'yudhyamānasya kathaṃ raṇe prahṛtavānasi

तुम अस्त्र-धर्म को जानने वाले हो और संसार में दूसरों से बढ़कर माने जाते हो; फिर जो युद्ध कर ही नहीं रहा था, उस पर तुमने रण में प्रहार कैसे कर दिया?

श्लोक 10 (7.143.10)

न प्रमत्ताय भीताय विरथाय प्रयाचते । व्यसने वर्तमानाय प्रहरन्ति मनीषिणः ॥

na pramattāya bhītāya virathāya prayācate | vyasane vartamānāya praharanti manīṣiṇaḥ

विचारशील लोग असावधान, भयभीत, रथहीन, दया की याचना करने वाले, या संकट में पड़े हुए पर प्रहार नहीं करते।

श्लोक 11 (7.143.11)

इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम् । कथमाचरितं पार्थ पापकर्म सुदुष्करम् ॥

idaṃ tu nīcācaritamasatpuruṣasevitam | kathamācaritaṃ pārtha pāpakarma suduṣkaram

यह तो नीच आचरण है, जिसे दुष्ट पुरुष करते हैं। हे पार्थ! तुमने ऐसा पापकर्म कैसे कर डाला, जिसे करना किसी भले पुरुष के लिए अत्यन्त कठिन है?

श्लोक 12 (7.143.12)

आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्म धनञ्जय । अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि ॥

āryeṇa sukaraṃ tvāhurāryakarma dhanañjaya | anāryakarma tvāryeṇa suduṣkaratamaṃ bhuvi

हे धनञ्जय! कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष के लिए श्रेष्ठ कर्म सहज होता है, और नीच कर्म श्रेष्ठ पुरुष के लिए संसार में सबसे कठिन होता है।

श्लोक 13 (7.143.13)

कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषतः । क्षत्रधर्मादपक्रान्तः सुवृत्तश्चारितव्रतः ॥

kathaṃ hi rājavaṃśyastvaṃ kauraveyo viśeṣataḥ | kṣatradharmādapakrāntaḥ suvṛttaścāritavrataḥ

तुम तो राजवंश में जन्मे हो, विशेषतः कुरुवंशी हो, सदाचारी हो और व्रतों का पालन कर चुके हो; फिर क्षत्रिय-धर्म से कैसे डिग गए?

श्लोक 14 (7.143.14)

अल्पस्तवापराधोऽत्र न त्वां तात विगर्हये । वार्ष्णेयापशदं प्राप्य क्षुद्रं कृतमिदं त्वया ॥

alpastavāparādho'tra na tvāṃ tāta vigarhaye | vārṣṇeyāpaśadaṃ prāpya kṣudraṃ kṛtamidaṃ tvayā

इसमें तुम्हारा दोष थोड़ा है, तात! मैं तुम्हें दोष नहीं देता; उस नीच वृष्णिवंशी का साथ पाकर तुमने यह क्षुद्र कर्म किया है।

श्लोक 15 (7.143.15)

इदं तु यदतिक्षुद्रं वार्ष्णेयार्थे कृतं त्वया । वासुदेवमतं नूनं नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥

idaṃ tu yadatikṣudraṃ vārṣṇeyārthe kṛtaṃ tvayā | vāsudevamataṃ nūnaṃ naitattvayyupapadyate

वृष्णिवंशी के लिए तुमने जो यह अत्यन्त क्षुद्र कर्म किया है, यह निश्चय ही वासुदेव की सम्मति से हुआ है; यह तुम्हारे योग्य नहीं है।

श्लोक 16 (7.143.16)

को हि नाम प्रमत्ताय परेण सह युध्यते । ईदृशं व्यसनं दद्याद्यो न कृष्णसखो भवेत् ॥

ko hi nāma pramattāya pareṇa saha yudhyate | īdṛśaṃ vyasanaṃ dadyādyo na kṛṣṇasakho bhavet

भला असावधान पर दूसरे की सहायता से कौन युद्ध करता है? ऐसी विपत्ति कृष्ण के मित्र के सिवा और कौन देगा?

श्लोक 17 (7.143.17)

व्रात्याः सङ्क्लिष्टकर्माणः प्रकृत्यैव च गर्हिताः । वृष्ण्यन्धकाः कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृताः ॥

vrātyāḥ saṅkliṣṭakarmāṇaḥ prakṛtyaiva ca garhitāḥ | vṛṣṇyandhakāḥ kathaṃ pārtha pramāṇaṃ bhavatā kṛtāḥ

वृष्णि और अन्धक तो व्रात्य हैं, दूषित कर्म करने वाले और स्वभाव से ही निन्दित हैं। हे पार्थ! तुमने उन्हें अपना प्रमाण कैसे बना लिया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 18 (7.143.18)

एवमुक्तो रणे पार्थो भूरिश्रवसमब्रवीत् । व्यक्तं हि जीर्यमाणोऽपि बुद्धिं जरयते नरः । अनर्थकमिदं सर्वं यत्त्वया व्याहृतं प्रभो ॥

evamukto raṇe pārtho bhūriśravasamabravīt | vyaktaṃ hi jīryamāṇo'pi buddhiṃ jarayate naraḥ | anarthakamidaṃ sarvaṃ yattvayā vyāhṛtaṃ prabho

रण में ऐसा कहे जाने पर पार्थ ने भूरिश्रवा से कहा, “यह स्पष्ट है कि बूढ़ा होता हुआ मनुष्य अपनी बुद्धि को भी जर्जर कर लेता है। हे प्रभो! आपने जो कुछ कहा, वह सब निरर्थक है।”

अर्जुन उवाच

श्लोक 19 (7.143.19)

जानन्नेव हृषीकेशं गर्हसे मां च पाण्डवम् । सङ्ग्रामाणां हि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रार्थपारगः ॥

jānanneva hṛṣīkeśaṃ garhase māṃ ca pāṇḍavam | saṅgrāmāṇāṃ hi dharmajñaḥ sarvaśāstrārthapāragaḥ

आप हृषीकेश को भली-भाँति जानते हुए भी उनकी और मुझ पाण्डव की निन्दा करते हैं; जबकि आप युद्धों के धर्म को जानने वाले और सब शास्त्रों के अर्थ में पारंगत हैं।

श्लोक 20 (7.143.20)

न चाधर्ममहं कुर्यां जानंश्चैव हि मुह्यसे ॥

na cādharmamahaṃ kuryāṃ jānaṃścaiva hi muhyase

मैं अधर्म नहीं करता; और आप जानते हुए भी मोह में पड़ रहे हैं।

श्लोक 21 (7.143.21)

युध्यन्ते क्षत्रियाः शत्रून्स्वैःस्वैः परिवृता नराः । भ्रातृभिः पितृभिः पुत्रैस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः । वयस्यैरथ मित्रैश्च स्वबाहुबलमाश्रिताः ॥

yudhyante kṣatriyāḥ śatrūnsvaiḥsvaiḥ parivṛtā narāḥ | bhrātṛbhiḥ pitṛbhiḥ putraistathā sambandhibāndhavaiḥ | vayasyairatha mitraiśca svabāhubalamāśritāḥ

क्षत्रिय अपने-अपने लोगों से घिरे हुए शत्रुओं से लड़ते हैं, भाइयों, पिताओं, पुत्रों, सम्बन्धियों और बान्धवों के साथ, सखाओं और मित्रों के साथ, अपनी भुजाओं के बल का आश्रय लेकर।

श्लोक 22 (7.143.22)

स कथं सात्यकिं शिष्यं सुखसम्बन्धिमेव च । अस्मदर्थे च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान्सुदुस्त्यजान् ॥

sa kathaṃ sātyakiṃ śiṣyaṃ sukhasambandhimeva ca | asmadarthe ca yudhyantaṃ tyaktvā prāṇānsudustyajān

फिर मैं अपने शिष्य और प्रिय सम्बन्धी सात्यकि को, जो हमारे लिए उन प्राणों को भी त्यागकर लड़ रहा था जिन्हें त्यागना अत्यन्त कठिन है, अकेला कैसे देखता रह जाता?

श्लोक 23 (7.143.23)

मम बाहुं रणे राजन्दक्षिणं युद्धदुर्मदम् । त्वया निकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम् ॥

mama bāhuṃ raṇe rājandakṣiṇaṃ yuddhadurmadam | tvayā nikṛṣyamāṇaṃ ca dṛṣṭavānasmi niṣkriyam

हे राजन्! युद्ध में मतवाले, मेरी दाहिनी भुजा के समान उस सात्यकि को मैंने आपके द्वारा घसीटे जाते और निष्क्रिय होते देखा।

श्लोक 24 (7.143.24)

न च त्वं रक्षितव्यो हि एको रणगतेन हि । यो यस्य युध्यतेऽर्थाय संरक्ष्यो नराधिप । तै रक्ष्यमाणैः स नृपो रक्षितव्यो महामृधे ॥

na ca tvaṃ rakṣitavyo hi eko raṇagatena hi | yo yasya yudhyate'rthāya saṃrakṣyo narādhipa | tai rakṣyamāṇaiḥ sa nṛpo rakṣitavyo mahāmṛdhe

रणभूमि में उतरे हुए पुरुष को केवल तुम्हारी ही रक्षा नहीं करनी चाहिए। हे नराधिप! जो जिसके लिए लड़ता है, उसकी रक्षा वह करे; और उन रक्षित लोगों से रक्षा पाता हुआ वह राजा भी महासंग्राम में रक्षणीय है।

श्लोक 25 (7.143.25)

यद्यहं सात्यकिं दृष्ट्वा तूष्णीमासिष्य आहवे । ततस्तेन वियोगश्च प्राप्यं नरकमेव च ॥

yadyahaṃ sātyakiṃ dṛṣṭvā tūṣṇīmāsiṣya āhave | tatastena viyogaśca prāpyaṃ narakameva ca

यदि मैं युद्ध में सात्यकि को देखकर भी चुप बैठा रहता, तो उसके वियोग के साथ मुझे नरक भी भोगना पड़ता।

श्लोक 26 (7.143.26)

रक्षितव्यो मया यस्मात्तस्माल्लब्धो मया स च । यशश्चैव स्वपक्षेभ्यः फलं मित्रस्य रक्षणात् ॥

rakṣitavyo mayā yasmāttasmāllabdho mayā sa ca | yaśaścaiva svapakṣebhyaḥ phalaṃ mitrasya rakṣaṇāt

चूँकि वह मेरे द्वारा रक्षा के योग्य था, इसीलिए मैंने उसे बचा लिया; मित्र की रक्षा से अपने पक्ष में भी यश मिलता है, यही उसका फल है।

श्लोक 27 (7.143.27)

यच्च मां गर्हसे राजन्कृष्णेन सह सङ्गतम् । कस्तेन सङ्गमं नेच्छेत्तत्र ते बुद्धिविभ्रमः ॥

yacca māṃ garhase rājankṛṣṇena saha saṅgatam | kastena saṅgamaṃ necchettatra te buddhivibhramaḥ

और हे राजन्! आप जो मुझे कृष्ण के साथ मेल रखने के कारण दोष देते हैं, भला उनके साथ मेल कौन न चाहेगा? इस विषय में आपकी बुद्धि भ्रमित है।

श्लोक 28 (7.143.28)

आबद्धकवचस्येह रथमारुह्य तिष्ठतः । सर्वायुधैरुपेतस्य प्रतियोद्धृप्रतीक्षिणः ॥

ābaddhakavacasyeha rathamāruhya tiṣṭhataḥ | sarvāyudhairupetasya pratiyoddhṛpratīkṣiṇaḥ

आप रथ पर चढ़कर, कवच बाँधे, सब शस्त्रों से सम्पन्न, प्रतिद्वन्द्वी की प्रतीक्षा में खड़े थे,

श्लोक 29 (7.143.29)

अस्मिन्रथगजानीके हयपत्तिसमाकुले । सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे ॥

asminrathagajānīke hayapattisamākule | siṃhanādoddhatarave gambhīre sainyasāgare

रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदलों से भरे हुए, सिंहनाद की गर्जना से गूँजते इस गहरे सेना-सागर में,

श्लोक 30 (7.143.30)

स्वैश्चापि समुपेतस्य विक्रान्तस्य तथा रणे । सात्यकेन कथं योग्यः सङ्ग्रामस्ते भविष्यति ॥

svaiścāpi samupetasya vikrāntasya tathā raṇe | sātyakena kathaṃ yogyaḥ saṅgrāmaste bhaviṣyati

अपने लोगों से भी घिरे हुए, रण में पराक्रमी आपके लिए सात्यकि के साथ उचित युद्ध कैसे सम्भव होता?

श्लोक 31 (7.143.31)

बहुभिः सह सङ्गम्य निर्जित्य च महारथान् । श्रान्तश्च श्रान्तवाहश्च क्षीणसर्वायुधस्त्वया । समेतः सात्यकिः सङ्ख्ये निर्जितश्च महारथः ॥

bahubhiḥ saha saṅgamya nirjitya ca mahārathān | śrāntaśca śrāntavāhaśca kṣīṇasarvāyudhastvayā | sametaḥ sātyakiḥ saṅkhye nirjitaśca mahārathaḥ

बहुतों से भिड़कर और अनेक महारथियों को जीतकर थका हुआ, थके घोड़ों वाला, और आपके द्वारा सब शस्त्रों से रिक्त किया हुआ महारथी सात्यकि युद्ध में आपसे भिड़ा और पराजित हुआ।

श्लोक 32 (7.143.32)

ईदृशं सात्यकिं सङ्ख्ये निर्जित्य च महारथम् । अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम् ॥

īdṛśaṃ sātyakiṃ saṅkhye nirjitya ca mahāratham | adhikatvaṃ vijānīṣe svavīryavaśamāgatam

ऐसे महारथी सात्यकि को रण में जीतकर, जब वह आपके पराक्रम के वश में आ गया, तब आप अपने को बड़ा समझ रहे हैं।

श्लोक 33 (7.143.33)

इच्छसि त्वं शिरस्तस्य असिना हर्तुमाहवे । तथा कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा सात्यकिं कः क्षमिष्यति । एकस्यैकेन हि कथं सङ्ग्रामः सम्भविष्यति ॥

icchasi tvaṃ śirastasya asinā hartumāhave | tathā kṛcchragataṃ dṛṣṭvā sātyakiṃ kaḥ kṣamiṣyati | ekasyaikena hi kathaṃ saṅgrāmaḥ sambhaviṣyati

आप युद्ध में तलवार से उसका सिर काट लेना चाहते थे; ऐसी विपत्ति में पड़े सात्यकि को देखकर कौन सह सकता है? एक का दूसरे एक के साथ युद्ध कैसे सम्भव होगा?

श्लोक 34 (7.143.34)

त्वं तु गर्हय चात्मानं स्वधर्मं यो न रक्षसि । कथं रक्षिष्यसे वीर ये वै त्वां संश्रिता जनाः ॥

tvaṃ tu garhaya cātmānaṃ svadharmaṃ yo na rakṣasi | kathaṃ rakṣiṣyase vīra ye vai tvāṃ saṃśritā janāḥ

आप तो अपनी ही निन्दा कीजिए, जो अपने धर्म की रक्षा नहीं करते। हे वीर! जो लोग आपकी शरण में आए हैं, उनकी रक्षा आप कैसे करेंगे?

श्लोक 35 (7.143.35)

आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिपुत्रं जिघांसतः । छिन्नवान्यदहं बाहुं नैतल्लोकविगर्हितम् ॥

āttaśastrasya hi raṇe vṛṣṇiputraṃ jighāṃsataḥ | chinnavānyadahaṃ bāhuṃ naitallokavigarhitam

जिसने शस्त्र उठा लिया था और रण में वृष्णिवंशी को मार डालना चाहता था, उसकी भुजा मैंने जो काटी, वह लोक में निन्दित नहीं है।

श्लोक 36 (7.143.36)

न्यस्तशस्त्रस्य हि पुनर्विकलस्य विवर्मणः । अभिमन्योर्वधं तात धार्मिकः को नु पूजयेत् ॥

nyastaśastrasya hi punarvikalasya vivarmaṇaḥ | abhimanyorvadhaṃ tāta dhārmikaḥ ko nu pūjayet

पर जिसने शस्त्र रख दिए थे, जो विकल था और कवचहीन था, उस अभिमन्यु के वध की, हे तात! कौन धर्मात्मा सराहना करेगा?

सञ्जय उवाच

श्लोक 37 (7.143.37)

एवमुक्तो महार्बाहुर्यूपकेतुर्महायशाः । युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत् ॥

evamukto mahārbāhuryūpaketurmahāyaśāḥ | yuyudhānaṃ samutsṛjya raṇe prāyamupāviśat

ऐसा कहे जाने पर महाबाहु, महायशस्वी यूपकेतु ने युयुधान को छोड़ दिया और रण में आमरण उपवास का व्रत लेकर बैठ गए।

श्लोक 38 (7.143.38)

शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षणः । यियासुर्ब्रह्मलोकाय प्राणान्प्राणेष्वथाजुहोत् ॥

śarānāstīrya savyena pāṇinā puṇyalakṣaṇaḥ | yiyāsurbrahmalokāya prāṇānprāṇeṣvathājuhot

पुण्य लक्षणों वाले उन्होंने बाएँ हाथ से बाण बिछाकर, ब्रह्मलोक जाने की इच्छा से अपने प्राणों की आहुति प्राणों में दे दी।

श्लोक 39 (7.143.39)

सूर्ये चक्षुः समाधाय प्रसन्नं सलिले मनः । ध्यायन्महोपनिषदं योगयुक्तोऽभवन्मुनिः ॥

sūrye cakṣuḥ samādhāya prasannaṃ salile manaḥ | dhyāyanmahopaniṣadaṃ yogayukto'bhavanmuniḥ

सूर्य में दृष्टि और जल के समान निर्मल मन को स्थिर करके, योग में लीन वे मुनि महोपनिषद् का ध्यान करने लगे।

श्लोक 40 (7.143.40)

ततस्ते सर्वसेनासु जनाः कृष्णधनञ्जयौ । गर्हयामासुरप्येतौ शशंसुर्भूरिदक्षिणम् ॥

tataste sarvasenāsu janāḥ kṛṣṇadhanañjayau | garhayāmāsurapyetau śaśaṃsurbhūridakṣiṇam

तब सारी सेनाओं में लोग कृष्ण और अर्जुन की निन्दा करने लगे और भूरिदक्षिण की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 41 (7.143.41)

निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतुः किञ्चिदप्रियम् । ततः प्रशस्यमानश्च नाहृष्यद्यूपकेतनः ॥

nindyamānau tathā kṛṣṇau nocatuḥ kiñcidapriyam | tataḥ praśasyamānaśca nāhṛṣyadyūpaketanaḥ

निन्दा सुनकर भी उन दोनों कृष्णों ने कोई अप्रिय बात नहीं कही; और प्रशंसा पाकर भी यूपकेतन प्रसन्न नहीं हुए।

श्लोक 42 (7.143.42)

तांस्तथावादिनो राजन्पुत्रांस्तव धनञ्जयः । अमृष्यमाणो मनसा तेषां तस्य च भाषितम् ॥

tāṃstathāvādino rājanputrāṃstava dhanañjayaḥ | amṛṣyamāṇo manasā teṣāṃ tasya ca bhāṣitam

हे राजन्! आपके पुत्रों को ऐसा कहते देखकर, और उनकी तथा भूरिश्रवा की बातों को मन में सहन न करते हुए, धनञ्जय ने

श्लोक 43 (7.143.43)

असङ्क्रुद्धमना वाचः स्मारयन्निव भारत । उवाच पाण्डुतनयः साक्षेपमिव फल्गुनः ॥

asaṅkruddhamanā vācaḥ smārayanniva bhārata | uvāca pāṇḍutanayaḥ sākṣepamiva phalgunaḥ

फिर भी क्रोध न करते हुए, मानो उन्हें उनकी ही बातें याद दिलाते हुए, हे भारत! पाण्डुपुत्र अर्जुन ने मानो आक्षेप करते हुए कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 44 (7.143.44)

मम सर्वेऽपि राजानो जानन्त्येतन्महाव्रतम् । न शक्यो मामको हन्तुं यो मे स्याद्बाणगोचरे ॥

mama sarve'pi rājāno jānantyetanmahāvratam | na śakyo māmako hantuṃ yo me syādbāṇagocare

मेरे इस महाव्रत को सभी राजा जानते हैं कि जो मेरा अपना हो और मेरे बाणों की पहुँच में हो, उसे कोई नहीं मार सकता।

श्लोक 45 (7.143.45)

यूपकेतुं समीक्ष्यैतन्न मां गर्हितुमर्हथ । न हि धर्ममविज्ञाय युक्तं गर्हयितुं परम् ॥

yūpaketuṃ samīkṣyaitanna māṃ garhitumarhatha | na hi dharmamavijñāya yuktaṃ garhayituṃ param

यूपकेतु को देखकर आप लोग मेरी निन्दा न करें; धर्म को जाने बिना दूसरे की निन्दा करना उचित नहीं।

श्लोक 46 (7.143.46)

न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मणः । नाभिमन्योर्वधं यूयं गर्हयध्वं कुतस्तदा ॥

nyastaśastrasya bālasya virathasya vivarmaṇaḥ | nābhimanyorvadhaṃ yūyaṃ garhayadhvaṃ kutastadā

जब अभिमन्यु शस्त्र रख चुका था, बालक था, रथहीन और कवचहीन था, तब तुम लोगों ने उसके वध की निन्दा क्यों नहीं की?

श्लोक 47 (7.143.47)

दुर्योधनस्य क्षुद्रस्य अप्रमाणे च तिष्ठतः । सौमदत्तेरयं साधुः सर्वसाहाय्यकारिणः ॥

duryodhanasya kṣudrasya apramāṇe ca tiṣṭhataḥ | saumadatterayaṃ sādhuḥ sarvasāhāyyakāriṇaḥ

सोमदत्त के इस पुत्र ने, जो किसी मर्यादा में नहीं रहता, उस क्षुद्र दुर्योधन की सब प्रकार से सहायता की; उसके प्रति मेरा यह कर्म उचित ही था।

श्लोक 48 (7.143.48)

अस्मदीया मया रक्ष्याः प्राणबाध उपस्थिते । ये मे प्रत्यक्षतो वीरा हन्येरन्निति मे मतिः ॥

asmadīyā mayā rakṣyāḥ prāṇabādha upasthite | ye me pratyakṣato vīrā hanyeranniti me matiḥ

प्राणों पर संकट आने पर हमारे अपने लोगों की रक्षा मुझे करनी ही है, जो वीर मेरी आँखों के सामने मारे जाते हों; मेरा यही निश्चय है।

श्लोक 49 (7.143.49)

सात्यकश्च वशं नीतः कौरवेण महात्मना । ततो मयैतच्चरितं प्रतिज्ञारक्षणं प्रति ॥

sātyakaśca vaśaṃ nītaḥ kauraveṇa mahātmanā | tato mayaitaccaritaṃ pratijñārakṣaṇaṃ prati

और सात्यकि महात्मा कौरव के वश में पड़ गया था; इसलिए अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए मैंने यह कर्म किया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 50 (7.143.50)

पुनश्च कृपयाऽऽविष्टो बहु तत्तद्विचिन्तयन् । उवाच चैनं कौरव्यमर्जुनः शोकपीडितः ॥

punaśca kṛpayā''viṣṭo bahu tattadvicintayan | uvāca cainaṃ kauravyamarjunaḥ śokapīḍitaḥ

फिर दया से भरकर, बहुत कुछ सोचते हुए, शोक से पीड़ित अर्जुन ने उस कौरव से कहा,

अर्जुन उवाच

श्लोक 51 (7.143.51)

धिगस्तु क्षत्रधर्मं तु यत्र त्वं पुरुषेश्वरः । अवस्थामीदृशीं प्राप्तः शरण्यः शरणप्रदः ॥

dhigastu kṣatradharmaṃ tu yatra tvaṃ puruṣeśvaraḥ | avasthāmīdṛśīṃ prāptaḥ śaraṇyaḥ śaraṇapradaḥ

“क्षत्रिय-धर्म को धिक्कार है, जिसमें आप जैसे पुरुषेश्वर, शरण लेने योग्य और शरण देने वाले, ऐसी दशा को पहुँच गए!

श्लोक 52 (7.143.52)

नातिभारः कृतान्तस्य विद्यते कुरुनन्दन । यत्र त्वं पुरुषव्याघ्रः प्राप्तः पापामिमां दशाम् ॥

nātibhāraḥ kṛtāntasya vidyate kurunandana | yatra tvaṃ puruṣavyāghraḥ prāptaḥ pāpāmimāṃ daśām

हे कुरुनन्दन! नियति के लिए कुछ भी बहुत भारी नहीं है, जब आप जैसे पुरुषव्याघ्र इस दुर्दशा को पहुँच गए।

श्लोक 53 (7.143.53)

नात्मनः सुकृतस्यास्य फलं वै नृपसत्तम । यत्र त्वं कुरुशार्दूल प्राप्तः पापामिमां दशाम् ॥

nātmanaḥ sukṛtasyāsya phalaṃ vai nṛpasattama | yatra tvaṃ kuruśārdūla prāptaḥ pāpāmimāṃ daśām

हे नृपश्रेष्ठ! यह आपके अपने सुकर्म का फल नहीं है कि आप जैसे कुरुश्रेष्ठ इस दुर्दशा को पहुँच गए।

श्लोक 54 (7.143.54)

रौरवं नरकं भीमं गमिष्यति सुयोधनः । यत्कृते नरशार्दूलः प्राप्तः पापामिमां दशाम् ॥

rauravaṃ narakaṃ bhīmaṃ gamiṣyati suyodhanaḥ | yatkṛte naraśārdūlaḥ prāptaḥ pāpāmimāṃ daśām

सुयोधन भयंकर रौरव नरक में जाएगा, जिसके कारण आप जैसे नरश्रेष्ठ इस दुर्दशा को पहुँचे।

श्लोक 55 (7.143.55)

को हि नाम पुमाँल्लोके मादृशः पुरुषोत्तम । प्रहरेत्त्वद्विधे त्वद्य प्रतिज्ञा यदि नो भवेत् ॥

ko hi nāma pumām̐lloke mādṛśaḥ puruṣottama | praharettvadvidhe tvadya pratijñā yadi no bhavet

हे पुरुषोत्तम! संसार में मेरे जैसा कौन पुरुष आज आप जैसे पर प्रहार करता, यदि मेरी प्रतिज्ञा न होती?”

सञ्जय उवाच

श्लोक 56 (7.143.56)

एवमुक्तः स पार्थेन शिरसा भूमिमस्पृशत् । पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम् ॥

evamuktaḥ sa pārthena śirasā bhūmimaspṛśat | pāṇinā caiva savyena prāhiṇodasya dakṣiṇam

पार्थ के ऐसा कहने पर उसने सिर से भूमि का स्पर्श किया और बाएँ हाथ से अपना दाहिना हाथ अर्जुन की ओर भेज दिया।

श्लोक 57 (7.143.57)

एतत्पार्थस्य तु वचस्ततः श्रुत्वा महाद्युतिः । यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ॥

etatpārthasya tu vacastataḥ śrutvā mahādyutiḥ | yūpaketurmahārāja tūṣṇīmāsīdavāṅmukhaḥ

पार्थ की यह बात सुनकर तेजस्वी यूपकेतु, हे महाराज! नीचा मुख किए चुप हो गए।

अर्जुन उवाच

श्लोक 58 (7.143.58)

या प्रीतिर्धर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे । नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज ॥

yā prītirdharmarāje me bhīme ca balināṃ vare | nakule sahadeve ca sā me tvayi śalāgraja

धर्मराज, बलवानों में श्रेष्ठ भीम, तथा नकुल और सहदेव पर मेरी जो प्रीति है, हे शलाग्रज! वही प्रीति मेरी आप पर है।

श्लोक 59 (7.143.59)

मया त्वं समनुज्ञातः कृष्णेन च महात्मना । गच्छ पुण्यकृतां लोकाञ्छिबिरौशीनरो यथा ॥

mayā tvaṃ samanujñātaḥ kṛṣṇena ca mahātmanā | gaccha puṇyakṛtāṃ lokāñchibirauśīnaro yathā

मेरी और महात्मा कृष्ण की अनुमति से आप पुण्यात्माओं के लोकों में जाइए, जैसे औशीनर शिबि गए थे।

वासुदेव उवाच

श्लोक 60 (7.143.60)

ये लोका मम विमलाः सकृद्विभाता । ब्रह्माद्यैः सुरवृषभैरपीष्यमाणाः । तान्क्षिप्रं व्रज सतताग्निहोत्रयाजिन् । मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाङ्गयानः ॥

ye lokā mama vimalāḥ sakṛdvibhātā | brahmādyaiḥ suravṛṣabhairapīṣyamāṇāḥ | tānkṣipraṃ vraja satatāgnihotrayājin | mattulyo bhava garuḍottamāṅgayānaḥ

मेरे जो निर्मल, एक साथ प्रकाशित लोक हैं, जिन्हें ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता भी चाहते हैं, उनमें शीघ्र जाइए, हे निरन्तर अग्निहोत्र करने वाले! और गरुड़ की पीठ को वाहन बनाकर मेरे समान हो जाइए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 61 (7.143.61)

धनञ्जये ब्रुवत्येवं घृणया च परिप्लुते । अवाङ्मुखा बभूवुश्च सैनिकाः सर्व एव ते ॥

dhanañjaye bruvatyevaṃ ghṛṇayā ca pariplute | avāṅmukhā babhūvuśca sainikāḥ sarva eva te

जब धनञ्जय करुणा से भरकर ऐसा कह रहे थे, तब वहाँ के सभी सैनिक नीचा मुख किए खड़े रहे।

श्लोक 62 (7.143.62)

मुहूर्तादिव विश्रम्य सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः । अमर्षवशमापन्नः सौमदत्तिनिराकृतः ॥

muhūrtādiva viśramya sātyakiḥ krodhamūrcchitaḥ | amarṣavaśamāpannaḥ saumadattinirākṛtaḥ

क्षण भर विश्राम करके क्रोध से मूर्छित-सा सात्यकि, जिसे सोमदत्त के पुत्र ने झटक कर अलग कर दिया था, अमर्ष के वश में हो गया।

श्लोक 63 (7.143.63)

उत्थितः स तु शैनेयो विमुक्तः सौमदत्तिना । खड्गमादाय चिच्छित्सुः शिरस्तस्य महात्मनः ॥

utthitaḥ sa tu śaineyo vimuktaḥ saumadattinā | khaḍgamādāya cicchitsuḥ śirastasya mahātmanaḥ

तब सोमदत्त के पुत्र से छूटकर शिनिपौत्र सात्यकि उठा, और तलवार लेकर उन महात्मा का सिर काट डालना चाहने लगा।

श्लोक 64 (7.143.64)

निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रसक्तं भूरिदक्षिणम् । इयेष सात्यकिर्हन्तुं शलाग्रजमकल्मषम् ॥

nihataṃ pāṇḍuputreṇa prasaktaṃ bhūridakṣiṇam | iyeṣa sātyakirhantuṃ śalāgrajamakalmaṣam

पाण्डुपुत्र के हाथों गिराए गए, दूसरी ओर ध्यान लगाए हुए, निष्पाप शलाग्रज भूरिदक्षिण को सात्यकि मार डालना चाहता था।

श्लोक 65 (7.143.65)

निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम् । क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमानः सुदुर्मनाः ॥

nikṛttabhujamāsīnaṃ chinnahastamiva dvipam | krośatāṃ sarvasainyānāṃ nindyamānaḥ sudurmanāḥ

वह भुजा कटी हुई अवस्था में बैठा था, जैसे सूँड कटा हाथी; सब सेनाएँ चिल्ला रही थीं और सात्यकि की निन्दा कर रही थीं, वह स्वयं भी मन से बहुत खिन्न था,

श्लोक 66 (7.143.66)

वार्यमाणः स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना । भीमेन चक्ररक्षाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च ॥

vāryamāṇaḥ sa kṛṣṇena pārthena ca mahātmanā | bhīmena cakrarakṣābhyāmaśvatthāmnā kṛpeṇa ca

कृष्ण, महात्मा पार्थ, भीम, दोनों चक्ररक्षक, अश्वत्थामा और कृपाचार्य द्वारा रोके जाने पर भी,

श्लोक 67 (7.143.67)

कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च । विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत्तं धृतव्रतम् ॥

karṇena vṛṣasenena saindhavena tathaiva ca | vikrośatāṃ ca sainyānāmavadhīttaṃ dhṛtavratam

तथा कर्ण, वृषसेन और जयद्रथ द्वारा भी रोके जाने पर, सेनाओं के चिल्लाते रहने पर भी उसने उस दृढ़व्रती को मार डाला।

श्लोक 68 (7.143.68)

प्रायोपविष्टस्य रणे पार्थेन च्छिन्नबाहुनः । सात्यकिः कौरवेयस्य खड्गेनापाहरच्छिरः ॥

prāyopaviṣṭasya raṇe pārthena cchinnabāhunaḥ | sātyakiḥ kauraveyasya khaḍgenāpāharacchiraḥ

पार्थ ने जिसकी भुजा काट दी थी और जो रण में आमरण उपवास पर बैठा था, उस कौरववंशी का सिर सात्यकि ने तलवार से उतार लिया।

श्लोक 69 (7.143.69)

नाभ्यनन्दन्त तं सैन्याः सात्यकिं तेन कर्मणा । अर्जुनेन हतं पूर्वं यज्जघान कुरूद्वहम् ॥

nābhyanandanta taṃ sainyāḥ sātyakiṃ tena karmaṇā | arjunena hataṃ pūrvaṃ yajjaghāna kurūdvaham

सेनाओं ने सात्यकि के उस कर्म का अभिनन्दन नहीं किया, क्योंकि जिस कुरुश्रेष्ठ को अर्जुन पहले ही गिरा चुके थे, उसी को उसने मारा।

श्लोक 70 (7.143.70)

सहस्राक्षसमं चैव सिद्धचारणमानवाः । भूरिश्रवसमालोक्य युद्धे प्रायगतं हतम् ॥

sahasrākṣasamaṃ caiva siddhacāraṇamānavāḥ | bhūriśravasamālokya yuddhe prāyagataṃ hatam

सहस्राक्ष इन्द्र के समान भूरिश्रवा को, जो आमरण उपवास में बैठे युद्ध में मारे गए थे, देखकर सिद्ध, चारण और मनुष्य,

श्लोक 71 (7.143.71)

अपूजयन्त तं देवा विस्मितास्तेऽस्य कर्मभिः । पक्षवादांश्च सुबहून्प्रावदंस्तव सैनिकाः ॥

apūjayanta taṃ devā vismitāste'sya karmabhiḥ | pakṣavādāṃśca subahūnprāvadaṃstava sainikāḥ

तथा देवताओं ने उनके कर्मों से विस्मित होकर उनका सत्कार किया; और आपके सैनिकों ने पक्ष-विपक्ष की बहुत-सी बातें कहीं।

सैनिका ऊचुः

श्लोक 72 (7.143.72)

न वार्ष्णेयस्यापराधो भवितव्यं हि तत्तथा । तस्मान्मन्युर्न वः कार्यः क्रोधो दुःखतरो नृणाम् ॥

na vārṣṇeyasyāparādho bhavitavyaṃ hi tattathā | tasmānmanyurna vaḥ kāryaḥ krodho duḥkhataro nṛṇām

“इसमें वृष्णिवंशी का अपराध नहीं है, क्योंकि ऐसा ही होना था; इसलिए आप लोगों को क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्रोध मनुष्यों के लिए और भी दुःखदायी है।

श्लोक 73 (7.143.73)

हन्तव्यश्चैष वीरेण नात्र कार्या विचारणा । विहितो ह्यस्य धात्रैव मृत्युः सात्यकिराहवे ॥

hantavyaścaiṣa vīreṇa nātra kāryā vicāraṇā | vihito hyasya dhātraiva mṛtyuḥ sātyakirāhave

यह वीर के हाथों मारा जाने योग्य था, इसमें विचार की आवश्यकता नहीं; विधाता ने ही रण में सात्यकि के हाथों इसकी मृत्यु निश्चित कर दी थी।

श्लोक 74 (7.143.74)

मर्तव्यमेव सर्वेण चरमं पूर्वमेव वा । मन्यध्वं मृत इत्येष माभूद्वो बुद्धिलाघवम् ॥

martavyameva sarveṇa caramaṃ pūrvameva vā | manyadhvaṃ mṛta ityeṣa mābhūdvo buddhilāghavam

सभी को मरना ही है, कोई पहले मरेगा कोई बाद में; उसे मरा हुआ ही मान लो; तुम्हारी बुद्धि में हलकापन न आए।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 75 (7.143.75)

तस्मिन्हते महाबाहौ यूपकेतौ महात्मनि । धिगेनमिति चाक्रन्दन्क्षत्रियाः क्रोधमूर्च्छिताः ॥

tasminhate mahābāhau yūpaketau mahātmani | dhigenamiti cākrandankṣatriyāḥ krodhamūrcchitāḥ

उन महाबाहु, महात्मा यूपकेतु के मारे जाने पर क्रोध से मूर्छित क्षत्रिय ‘इसे धिक्कार है!’ कहकर चिल्लाने लगे।

श्लोक 76 (7.143.76)

अन्ये न युक्तमित्येव भवितव्यं तथेति च । केचिदासन्विमनसः केचिद्दुःखसमन्विताः ॥

anye na yuktamityeva bhavitavyaṃ tatheti ca | kecidāsanvimanasaḥ kecidduḥkhasamanvitāḥ

कुछ बोले, ‘यह उचित नहीं हुआ’; कुछ बोले, ‘ऐसा होना ही था।’ कुछ मन से खिन्न थे और कुछ दुःख से भरे थे।

सात्यकिरुवाच

श्लोक 77 (7.143.77)

न हन्तव्यो न हन्तव्य इति मन्दाः प्रभाषत । धर्मवादैरधर्मिष्ठा धर्मकञ्चुकमास्थिताः ॥

na hantavyo na hantavya iti mandāḥ prabhāṣata | dharmavādairadharmiṣṭhā dharmakañcukamāsthitāḥ

“‘इसे मत मारो, इसे मत मारो’ ऐसा आप मूर्ख लोग कहते हैं; आप अधर्मी हैं, जो धर्म की बातों और धर्म के कवच की आड़ ले रहे हैं।

श्लोक 78 (7.143.78)

यदा बालः सुभद्रायाः सुतः शस्त्रविनाकृतः । युष्माभिर्निहतो युद्धे तदा धर्मः क्व वो गतः ॥

yadā bālaḥ subhadrāyāḥ sutaḥ śastravinākṛtaḥ | yuṣmābhirnihato yuddhe tadā dharmaḥ kva vo gataḥ

जब शस्त्र रख चुके बालक सुभद्रापुत्र को आप लोगों ने युद्ध में मार डाला था, तब आपका धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 79 (7.143.79)

मया त्वेतत्प्रतिज्ञातं क्षेपे कस्मिंश्चिदेव हि । श्रुत्वा तत्सर्वभावेन गर्हयध्वं न चार्जुनम् । शृणुध्वं सर्वमेवेह श्रुत्वा गर्हथ मानवाः ॥

mayā tvetatpratijñātaṃ kṣepe kasmiṃścideva hi | śrutvā tatsarvabhāvena garhayadhvaṃ na cārjunam | śṛṇudhvaṃ sarvameveha śrutvā garhatha mānavāḥ

मैंने किसी अपमान के अवसर पर यह प्रतिज्ञा की थी। उसे पूरी तरह सुनकर ही दोष दीजिए, पर अर्जुन को नहीं। हे मनुष्यो! यह सब यहाँ सुनिए, सुनकर ही निन्दा कीजिए।

श्लोक 80 (7.143.80)

यो मां निष्पिष्य सङ्ग्रमे जीवन्हन्यात्पदा रुषा । स मे वध्यो भवेच्छत्रुर्यद्यपि स्यान्मुनिव्रतः ॥

yo māṃ niṣpiṣya saṅgrame jīvanhanyātpadā ruṣā | sa me vadhyo bhavecchatruryadyapi syānmunivrataḥ

“जो रण में मुझे कुचलकर, मेरे जीवित रहते क्रोध से लात मारकर मुझे मारेगा, वह शत्रु मेरे हाथों वध्य होगा, चाहे वह मुनि-व्रत का पालन करने वाला ही क्यों न हो।”

श्लोक 81 (7.143.81)

चेष्टमानं प्रतीघाते सभुजं मां सचक्षुषः । मन्यध्वं मृत इत्येवमेतद्वो बुद्धिलाघवम् ॥

ceṣṭamānaṃ pratīghāte sabhujaṃ māṃ sacakṣuṣaḥ | manyadhvaṃ mṛta ityevametadvo buddhilāghavam

आँखें होते हुए भी आपने मुझे भुजा सहित प्रतिकार के लिए प्रयत्न करते देखा और फिर भी मरा हुआ मान लिया; यही आपकी बुद्धि का हलकापन है।

श्लोक 82 (7.143.82)

युक्तो ह्यस्य प्रतीघातः कृतो मे कुरुपुङ्गवाः ॥

yukto hyasya pratīghātaḥ kṛto me kurupuṅgavāḥ

हे कुरुश्रेष्ठो! मैंने उसके प्रति उचित प्रतिकार ही किया है।

श्लोक 83 (7.143.83)

यत्तु पार्थेन मां दृष्ट्वा प्रतिज्ञामभिरक्षता । सखड्गोऽस्य हृतो बाहुरेतेनैवास्मि वञ्चितः ॥

yattu pārthena māṃ dṛṣṭvā pratijñāmabhirakṣatā | sakhaḍgo'sya hṛto bāhuretenaivāsmi vañcitaḥ

परन्तु पार्थ ने मुझे देखकर अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए उसकी तलवार सहित भुजा काट दी; उसी कारण मैं ठगा गया।

श्लोक 84 (7.143.84)

भवितव्यं हि यद्भावि दैवं चेष्टयते हि तत् । सोयं हतो विमर्देऽस्मिन्किमत्राधर्मचेष्टितम् ॥

bhavitavyaṃ hi yadbhāvi daivaṃ ceṣṭayate hi tat | soyaṃ hato vimarde'sminkimatrādharmaceṣṭitam

जो होनहार है वह होकर रहता है; दैव ही उसे प्रेरित करता है। वह इस संग्राम में मारा गया; इसमें अधर्म का आचरण क्या है?

श्लोक 85 (7.143.85)

अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद्ब्रवीषि प्लवङ्गम ॥

api cāyaṃ purā gītaḥ śloko vālmīkinā bhuvi | na hantavyāḥ striya iti yadbravīṣi plavaṅgama

वाल्मीकि ने पृथ्वी पर बहुत पहले एक श्लोक भी गाया था, ‘स्त्रियों को नहीं मारना चाहिए’; जैसा कि तुम कहते हो, हे वानर!

श्लोक 86 (7.143.86)

सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात्कर्तव्यमेव तत् । अनुष्ठितं मया तच्च कस्माद्गर्हथ मूढवत् ॥

sarvakālaṃ manuṣyeṇa vyavasāyavatā sadā | pīḍākaramamitrāṇāṃ yatsyātkartavyameva tat | anuṣṭhitaṃ mayā tacca kasmādgarhatha mūḍhavat

दृढ़ निश्चय वाले मनुष्य को सदा वही करना चाहिए जिससे शत्रुओं को पीड़ा पहुँचे। वही मैंने किया है; फिर आप मूर्खों की तरह मेरी निन्दा क्यों करते हैं?

सञ्जय उवाच

श्लोक 87 (7.143.87)

एवमुक्ते महाराज सर्वे कौरवपुङ्गवाः । न स्म किंचिदभाषन्त मनसा समपूजयन् ॥

evamukte mahārāja sarve kauravapuṅgavāḥ | na sma kiṃcidabhāṣanta manasā samapūjayan

हे महाराज! ऐसा कहे जाने पर कौरवों के सब श्रेष्ठ वीर कुछ नहीं बोले; उन्होंने मन ही मन उस गिरे हुए राजा का सम्मान किया।

श्लोक 88 (7.143.88)

मन्त्राभिपूतस्य महाध्वरेषु । यशस्विनो भूरिसहस्रदस्य । मुनेरिवारण्यगतस्य तस्य । न तत्र कश्चिद्वधमभ्यनन्दत् ॥

mantrābhipūtasya mahādhvareṣu | yaśasvino bhūrisahasradasya | munerivāraṇyagatasya tasya | na tatra kaścidvadhamabhyanandat

महायज्ञों में मन्त्रों से पवित्र हुए, यशस्वी, सहस्रों के दाता, वन में गए मुनि के समान उन भूरिश्रवा के वध का वहाँ किसी ने अभिनन्दन नहीं किया।

श्लोक 89 (7.143.89)

सुनीलकेशं वरदस्य तस्य । सूरस्य पारावतलोहिताक्षम् । अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं । न्यस्तं हविर्धानमिवान्तरेण ॥

sunīlakeśaṃ varadasya tasya | sūrasya pārāvatalohitākṣam | aśvasya medhyasya śiro nikṛttaṃ | nyastaṃ havirdhānamivāntareṇa

वर देने वाले उन शूरवीर का सिर, जिनके केश गहरे नीले-काले थे और आँखें कबूतर की आँखों जैसी लाल थीं, कटकर ऐसा पड़ा था जैसे यज्ञीय अश्व का सिर हविर्धान के बीच रखा हो।

श्लोक 90 (7.143.90)

स तेजसा शस्त्रकृतेन पूतो । महाहवे देहवरं विसृज्य । आक्रामदूर्ध्वं वरदो वरार्हो । व्यावृत्त्य धर्मेण परेण रोदसी ॥

sa tejasā śastrakṛtena pūto | mahāhave dehavaraṃ visṛjya | ākrāmadūrdhvaṃ varado varārho | vyāvṛttya dharmeṇa pareṇa rodasī

शस्त्र से प्राप्त तेज से पवित्र होकर, उस महायुद्ध में श्रेष्ठ देह त्यागकर, वर देने वाले और श्रेष्ठता के योग्य वे ऊपर उठ गए, अपने परम धर्म से आकाश और पृथ्वी दोनों को व्याप्त करके।

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