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द्रोण पर्व · अध्याय 147

कृष्ण सूर्य को ढकते हैं और अर्जुन जयद्रथ का सिर काटते हैं

अर्जुन के दिव्य अस्त्र कौरव सेना में भय और संहार फैलाते हैं और वह जयद्रथ पर टूट पड़ता है, जिसकी वराह-ध्वजा वह गिरा देता है। रक्षकों से घिरे राजा पर प्रहार का अवसर न मिलने पर अर्जुन कृष्ण से एक उपाय का वचन सुनता है: कृष्ण सूर्य को अन्धकार से ढक देते हैं, जयद्रथ सिर उठाकर देखता है, और कृष्ण के कहने पर अर्जुन का बाण उसका सिर उड़ा देता है। अर्जुन उस सिर को बाणों की झड़ी से आकाश में थामे रखता है, उसे स्यमन्तपञ्चक के बाहर ले जाता है और कृष्ण से पूछता है कि उसे कहाँ पहुँचाना है।

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.147.1)

श्रुत्वा निनादं धनुषश्च तस्य । विस्पष्टमुत्कृष्टमिवान्तकस्य । शक्राशनिस्फोटसमं सुघोरं । विकृष्यमाणस्य धनञ्जयेन ॥

śrutvā ninādaṃ dhanuṣaśca tasya | vispaṣṭamutkṛṣṭamivāntakasya | śakrāśanisphoṭasamaṃ sughoraṃ | vikṛṣyamāṇasya dhanañjayena

अर्जुन के खींचे जाते हुए उस धनुष की टंकार सुनकर, जो साफ़ और ऊँची थी, मानो स्वयं यमराज का नाद हो, और इन्द्र के वज्र के कड़ाके के समान अत्यन्त भयंकर थी,

श्लोक 2 (7.147.2)

त्रासोद्विग्नं तथोद्भ्रान्तं त्वदीयं तद्बलं नृप । युगान्तवातसङ्क्षुब्धं चलद्वीचितरङ्गितम् । प्रलीनमीनमकरं सागराम्भ इवाभवत् ॥

trāsodvignaṃ tathodbhrāntaṃ tvadīyaṃ tadbalaṃ nṛpa | yugāntavātasaṅkṣubdhaṃ caladvīcitaraṅgitam | pralīnamīnamakaraṃ sāgarāmbha ivābhavat

हे राजन्! आपकी वह सेना भय से घबराकर व्याकुल और भ्रमित हो गई। वह प्रलयकाल की आँधी से क्षुब्ध उस समुद्र के समान हो गई, जिसकी लहरें उठ-गिर रही हों और जिसकी मछलियाँ तथा मगर छिप गए हों।

श्लोक 3 (7.147.3)

मध्यन्दिनगतं सूर्यमापतन्तमिवाम्बरे । न शेकुः सर्वभूतानि पाण्डवं प्रतिवीक्षितुम् ॥

madhyandinagataṃ sūryamāpatantamivāmbare | na śekuḥ sarvabhūtāni pāṇḍavaṃ prativīkṣitum

आकाश में गिर पड़ते हुए मध्याह्न के सूर्य के समान टूट पड़ने वाले उस पाण्डव की ओर कोई भी प्राणी आँख उठाकर देख न सका।

श्लोक 4 (7.147.4)

स रणे व्यचरत्पार्थः प्रेक्ष्यमाणो धनञ्जयः । युगपद्दिक्षु सर्वासु सर्वाण्यस्त्राणि दर्शयन् ॥

sa raṇe vyacaratpārthaḥ prekṣyamāṇo dhanañjayaḥ | yugapaddikṣu sarvāsu sarvāṇyastrāṇi darśayan

रणभूमि में सबके देखते-देखते पार्थ धनञ्जय एक ही साथ सभी दिशाओं में अपने सारे अस्त्र दिखाता हुआ विचरता रहा।

श्लोक 5 (7.147.5)

आददानं महाराज सन्दधानं च पाण्डवम् । उत्कर्षन्तं सृजन्तं च न स्म पश्याम लाघवात् ॥

ādadānaṃ mahārāja sandadhānaṃ ca pāṇḍavam | utkarṣantaṃ sṛjantaṃ ca na sma paśyāma lāghavāt

हे महाराज! उस पाण्डव को बाण उठाते, चढ़ाते, खींचते और छोड़ते हुए हम उसकी फुर्ती के कारण देख ही नहीं पाते थे।

श्लोक 6 (7.147.6)

ततः क्रुद्धो महाबाहुरैन्द्रमस्त्रं दुरासदम् । प्रादुश्चक्रे महाराज त्रासयन्सर्वभारतान् ॥

tataḥ kruddho mahābāhuraindramastraṃ durāsadam | prāduścakre mahārāja trāsayansarvabhāratān

तब उस महाबाहु ने क्रुद्ध होकर, हे महाराज, इन्द्र का दुर्धर्ष अस्त्र प्रकट किया, जिससे सब भरतवंशी भयभीत हो उठे।

श्लोक 7 (7.147.7)

ततः शराः प्रादुरासन्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रिताः । प्रदीपाश्च शिखिमुखाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

tataḥ śarāḥ prādurāsandivyāstrapratimantritāḥ | pradīpāśca śikhimukhāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

तब दिव्य अस्त्रों के मन्त्रों से अभिमन्त्रित बाण प्रकट हुए, जो जलते हुए और अग्नि-मुख वाले थे और सैकड़ों-हजारों की संख्या में थे।

श्लोक 8 (7.147.8)

आकर्णपूर्णनिर्मुक्तैरग्न्यर्कांशुनिभैः शरैः । नभोऽभवत्तद्दुष्प्रेक्ष्यमुल्काभिरिव संवृतम् ॥

ākarṇapūrṇanirmuktairagnyarkāṃśunibhaiḥ śaraiḥ | nabho'bhavattadduṣprekṣyamulkābhiriva saṃvṛtam

कान तक खिंचे धनुष से छूटे हुए, अग्नि और सूर्य की किरणों जैसे उन बाणों से आकाश ऐसा हो गया कि उसकी ओर देखना कठिन था, मानो वह उल्काओं से ढक गया हो।

श्लोक 9 (7.147.9)

ततः शस्त्रान्धकारं तत्कौरवैः समुदीरितम् । अशक्यं मनसाऽप्यन्यैः पाण्डवः सम्भ्रमन्निव ॥

tataḥ śastrāndhakāraṃ tatkauravaiḥ samudīritam | aśakyaṃ manasā'pyanyaiḥ pāṇḍavaḥ sambhramanniva

तब कौरवों द्वारा उठाए गए शस्त्रों के उस अन्धकार को, जिसे दूसरे लोग मन में भी नहीं रोक सकते थे, पाण्डव ने मानो घूमते हुए, तेज़ी से,

श्लोक 10 (7.147.10)

नाशयामास विक्रम्य शरैर्दिव्यास्त्रमन्त्रितैः । नैशं तमोऽंशुभिः क्षिप्रं दिनादाविव भास्करः ॥

nāśayāmāsa vikramya śarairdivyāstramantritaiḥ | naiśaṃ tamo'ṃśubhiḥ kṣipraṃ dinādāviva bhāskaraḥ

पराक्रम से, दिव्य अस्त्रों से अभिमन्त्रित बाणों द्वारा नष्ट कर दिया, जैसे दिन के आरम्भ में सूर्य अपनी किरणों से रात के अँधेरे को शीघ्र मिटा देता है।

श्लोक 11 (7.147.11)

ततस्तु तावकं सैन्यं दीप्तैः शरगभस्तिभिः । आक्षिपत्पल्वलाम्बूनि निदाघार्क इव प्रभुः ॥

tatastu tāvakaṃ sainyaṃ dīptaiḥ śaragabhastibhiḥ | ākṣipatpalvalāmbūni nidāghārka iva prabhuḥ

तब उसने अपनी जलती हुई बाण-किरणों से आपकी सेना को वैसे ही सोख लिया, जैसे ग्रीष्म का प्रतापी सूर्य छोटे जलाशयों का पानी सोख लेता है।

श्लोक 12 (7.147.12)

ततो दिव्यास्त्रविदुषा प्रहिताः सायकांशवः । समाप्लवन्द्विषत्सैन्यं लोकं भानोरिवांशवः ॥

tato divyāstraviduṣā prahitāḥ sāyakāṃśavaḥ | samāplavandviṣatsainyaṃ lokaṃ bhānorivāṃśavaḥ

तब दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता द्वारा छोड़ी गई बाण-किरणों ने शत्रु-सेना को वैसे ही आप्लावित कर दिया, जैसे सूर्य की किरणें संसार को करती हैं।

श्लोक 13 (7.147.13)

अथापरे समुत्सृष्टा विशिखास्तिग्मतेजसः । हृदयान्याशु वीराणां विविशुः प्रियबन्धुवत् ॥

athāpare samutsṛṣṭā viśikhāstigmatejasaḥ | hṛdayānyāśu vīrāṇāṃ viviśuḥ priyabandhuvat

फिर छोड़े गए दूसरे तीखी धार और तेज़ वाले बाण, प्रिय बन्धु की तरह, वीरों के हृदयों में झट घुस गए।

श्लोक 14 (7.147.14)

य एनमीयुः समरे त्वद्योधाः शूरमानिनः । शलभा इव ते दीप्तमग्निं प्राप्य ययुः क्षयम् ॥

ya enamīyuḥ samare tvadyodhāḥ śūramāninaḥ | śalabhā iva te dīptamagniṃ prāpya yayuḥ kṣayam

आपके जो योद्धा अपने को शूर मानते हुए युद्ध में उसके सामने आए, वे जलती आग में पड़े पतंगों की तरह नाश को प्राप्त हुए।

श्लोक 15 (7.147.15)

एवं स मृद्नञ्शत्रूणां जीवितानि यशांसि च । पार्थश्चचार सङ्ग्रामे मृत्युर्विग्रहवानिव ॥

evaṃ sa mṛdnañśatrūṇāṃ jīvitāni yaśāṃsi ca | pārthaścacāra saṅgrāme mṛtyurvigrahavāniva

इस प्रकार शत्रुओं के प्राणों और यश को कुचलता हुआ पार्थ युद्ध में मानो देहधारी मृत्यु की तरह विचरता रहा।

श्लोक 16 (7.147.16)

स किरीटानि वस्त्राणि साङ्गदान्विपुलान्भुजान् । सकुण्डलयुगान्कर्णान्केषाञ्चिदहरच्छरैः ॥

sa kirīṭāni vastrāṇi sāṅgadānvipulānbhujān | sakuṇḍalayugānkarṇānkeṣāñcidaharaccharaiḥ

उसने बाणों से किसी के मुकुट, किसी के वस्त्र, किसी की बाजूबन्द सहित विशाल भुजाएँ और किसी के कुण्डलों की जोड़ी सहित कान हर लिए।

श्लोक 17 (7.147.17)

सतोमरान्गजस्थानां सप्रासान्हयसादिनाम् । सचर्मणः पदातीनां रथिनां च सधन्वनः । सप्रतोदान्नियन्तॄणां बाहूंश्चिच्छेद पाण्डवः ॥

satomarāngajasthānāṃ saprāsānhayasādinām | sacarmaṇaḥ padātīnāṃ rathināṃ ca sadhanvanaḥ | sapratodānniyantṝṇāṃ bāhūṃściccheda pāṇḍavaḥ

उस पाण्डव ने हाथियों पर सवार योद्धाओं की भुजाएँ उनके तोमरों सहित, घुड़सवारों की प्रासों सहित, पैदल सैनिकों की ढालों सहित, रथियों की धनुषों सहित और सारथियों की चाबुकों सहित काट डालीं।

श्लोक 18 (7.147.18)

प्रदीप्तोग्रशरार्जिष्मान्बभौ तत्र धनञ्जयः । सविस्फुलिङ्गाग्रशिखो ज्वलन्निव हुताशनः ॥

pradīptograśarārjiṣmānbabhau tatra dhanañjayaḥ | savisphuliṅgāgraśikho jvalanniva hutāśanaḥ

वहाँ धनञ्जय प्रज्वलित और उग्र बाणों की ज्वालाओं से शोभित था। उसकी लपटों के अग्रभाग से चिंगारियाँ छूट रही थीं, मानो वह जलती हुई अग्नि हो।

श्लोक 19 (7.147.19)

तं देवराजप्रतिमं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । युगपद्दिक्षु सर्वासु रथस्थं पुरुषर्षभम् ॥

taṃ devarājapratimaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | yugapaddikṣu sarvāsu rathasthaṃ puruṣarṣabham

देवराज के समान, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, रथ पर खड़े उस पुरुषश्रेष्ठ को, जो एक ही समय सब दिशाओं में

श्लोक 20 (7.147.20)

निक्षिपन्तं महास्त्राणि प्रेक्षणीयं धनञ्जयम् । नृत्यन्तं रथमार्गेषु धनुर्ज्यातलनादिनम् ॥

nikṣipantaṃ mahāstrāṇi prekṣaṇīyaṃ dhanañjayam | nṛtyantaṃ rathamārgeṣu dhanurjyātalanādinam

बड़े-बड़े अस्त्र चला रहा था, उस दर्शनीय धनञ्जय को, जो रथ के मार्गों पर मानो नाचता था और जिसके धनुष की प्रत्यञ्चा पर करतल की थाप गूँज रही थी,

श्लोक 21 (7.147.21)

निरीक्षितुं न शेकुस्ते यत्नवन्तोऽपि पार्थिवाः । मध्यन्दिनगतं सूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे ॥

nirīkṣituṃ na śekuste yatnavanto'pi pārthivāḥ | madhyandinagataṃ sūryaṃ pratapantamivāmbare

वे राजा प्रयत्न करके भी उसे आँख भरकर नहीं देख सके, जो आकाश में तपते हुए मध्याह्न के सूर्य के समान था।

श्लोक 22 (7.147.22)

दीप्तोग्रसम्भृतशरः किरीटी विरराज ह । वर्षास्विवोदीर्णजलः सेन्द्रधन्वाम्बुदो महान् ॥

dīptograsambhṛtaśaraḥ kirīṭī virarāja ha | varṣāsvivodīrṇajalaḥ sendradhanvāmbudo mahān

प्रज्वलित और उग्र बाणों का भण्डार लिए हुए किरीटी वैसे ही शोभित हुआ, जैसे वर्षा ऋतु में जल से भरा, इन्द्रधनुष वाला विशाल मेघ।

श्लोक 23 (7.147.23)

महास्त्रसंप्लुवे तस्मिञ्जिष्णुना सम्प्रवर्तिते । सुदुस्तरे महाघोरे ममज्जुर्योधपुङ्गवाः ॥

mahāstrasaṃpluve tasmiñjiṣṇunā sampravartite | sudustare mahāghore mamajjuryodhapuṅgavāḥ

जब जिष्णु ने महान् अस्त्रों की वह बाढ़ छोड़ी, जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था और जो महाभयंकर थी, तब श्रेष्ठ योद्धा उसमें डूब गए।

श्लोक 24 (7.147.24)

उत्कृत्तवदनैर्देहैः शरीरैः कृत्तबाहुभिः । भुजैश्च पाणिनिर्मुक्तैः पाणिभिर्व्यङ्गुलीकृतैः ॥

utkṛttavadanairdehaiḥ śarīraiḥ kṛttabāhubhiḥ | bhujaiśca pāṇinirmuktaiḥ pāṇibhirvyaṅgulīkṛtaiḥ

वहाँ ऐसे शरीर थे जिनके मुख कट गए थे, ऐसे धड़ थे जिनकी भुजाएँ कट गई थीं, हाथों से छूटी हुई भुजाएँ थीं और ऐसे हाथ थे जिनकी उँगलियाँ कट गई थीं;

श्लोक 25 (7.147.25)

कृत्ताग्रहस्तैः करिभिः कृत्तदन्तैर्मदोत्कटैः । हयैश्च विधुरग्रीवै रथैश्च शकलीकृतैः ॥

kṛttāgrahastaiḥ karibhiḥ kṛttadantairmadotkaṭaiḥ | hayaiśca vidhuragrīvai rathaiśca śakalīkṛtaiḥ

मद से उन्मत्त ऐसे हाथी थे जिनकी सूँड़ के अगले भाग कट गए थे और दाँत कट गए थे, ऐसे घोड़े थे जिनकी गर्दनें टूट गई थीं, और रथ टुकड़े-टुकड़े हो गए थे;

श्लोक 26 (7.147.26)

निकृत्तान्त्रैः कृत्तपादैस्तथाऽन्यैः कृत्तसन्धिभिः । निश्चेष्टैर्विस्फुरद्भिश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥

nikṛttāntraiḥ kṛttapādaistathā'nyaiḥ kṛttasandhibhiḥ | niśceṣṭairvisphuradbhiśca śataśo'tha sahasraśaḥ

और दूसरे ऐसे थे जिनकी आँतें कट गई थीं, जिनके पैर और जोड़ कट गए थे, कोई निश्चेष्ट और कोई तड़पते हुए, सैकड़ों और हजारों की संख्या में।

श्लोक 27 (7.147.27)

मृत्योराघातललितं तत्पार्थायोधनं महत् । अपश्याम महीपाल भीरूणां भयवर्धनम् ॥

mṛtyorāghātalalitaṃ tatpārthāyodhanaṃ mahat | apaśyāma mahīpāla bhīrūṇāṃ bhayavardhanam

हे महीपाल! कायरों का भय बढ़ाने वाला, मृत्यु के संहार की क्रीड़ा-जैसा पार्थ का वह विशाल रणक्षेत्र हमने देखा।

श्लोक 28 (7.147.28)

आक्रीडमिव रुद्रस्य पुराभ्यर्दयतः पशून् । गजानां क्षुरनिर्मुक्तैः करैः सभुजगेव भूः ॥

ākrīḍamiva rudrasya purābhyardayataḥ paśūn | gajānāṃ kṣuranirmuktaiḥ karaiḥ sabhujageva bhūḥ

वह रुद्र की उस क्रीड़ास्थली-जैसा था जहाँ उन्होंने पूर्वकाल में पशुओं को सताया था; और उस्तरे-जैसे बाणों से कटी हुई हाथियों की सूँड़ों से पटी हुई पृथ्वी ऐसी लगती थी मानो सर्पों से भर गई हो।

श्लोक 29 (7.147.29)

क्वचिद्बभौ स्रग्विणीव वक्त्रपद्मैः समाचिता । विचित्रोष्णीषमुकुटैः केयूराङ्गदकुण्डलैः ॥

kvacidbabhau sragviṇīva vaktrapadmaiḥ samācitā | vicitroṣṇīṣamukuṭaiḥ keyūrāṅgadakuṇḍalaiḥ

कहीं-कहीं वह पृथ्वी कमल-जैसे मुखों से ढकी, मालाधारिणी स्त्री-सी शोभित होती थी, जहाँ रंग-बिरंगी पगड़ियाँ और मुकुट, केयूर, बाजूबन्द और कुण्डल बिखरे थे,

श्लोक 30 (7.147.30)

स्वर्णचित्रतनुत्रैश्च भाण्डैश्च गजवाजिनाम् । किरीटशतसङ्गीर्णा तत्र तत्र समाचिता । विरराज भृशं चित्रा मही नववधूरिव ॥

svarṇacitratanutraiśca bhāṇḍaiśca gajavājinām | kirīṭaśatasaṅgīrṇā tatra tatra samācitā | virarāja bhṛśaṃ citrā mahī navavadhūriva

सोने से जड़े रंग-बिरंगे कवच और हाथी-घोड़ों के साज-सामान पड़े थे, और सैकड़ों मुकुटों से जहाँ-तहाँ ढकी हुई वह विचित्र पृथ्वी नववधू के समान अत्यन्त सुशोभित हो रही थी।

श्लोक 31 (7.147.31)

मज्जामेदःकर्दमिनीं शोणितौघतरङ्गिणीम् । मर्मास्थिभिरगाधां च केशशैवलशाद्वलाम् ॥

majjāmedaḥkardaminīṃ śoṇitaughataraṅgiṇīm | marmāsthibhiragādhāṃ ca keśaśaivalaśādvalām

उसने एक ऐसी नदी बहा दी जिसमें मज्जा और चर्बी का कीचड़ था, रक्त के प्रवाहों की तरंगें थीं, मर्मस्थानों की हड्डियों से जो अथाह थी, और बाल ही जिसके सेवार और घास थे,

श्लोक 32 (7.147.32)

शिरोबाहूपलतटां रुग्णक्रोडास्थिसङ्कटाम् । चित्रध्वजपताकाढ्यां छत्रचापोर्मिमालिनीम् ॥

śirobāhūpalataṭāṃ rugṇakroḍāsthisaṅkaṭām | citradhvajapatākāḍhyāṃ chatracāpormimālinīm

सिर और भुजाएँ जिसके तटों के पत्थर थे, जो टूटी हुई छाती की हड्डियों से भरी थी, रंग-बिरंगे ध्वजों और पताकाओं से सजी थी, और छत्र तथा धनुष जिसकी लहरों की माला थे,

श्लोक 33 (7.147.33)

विगतासुमहाकायां गजदेहाभिसङ्कुलाम् । रथोडुपशताकीर्णां हयसङ्घातरोधसम् ॥

vigatāsumahākāyāṃ gajadehābhisaṅkulām | rathoḍupaśatākīrṇāṃ hayasaṅghātarodhasam

जो प्राणहीन विशाल शरीरों और हाथियों की देहों से पटी थी, सैकड़ों रथ-रूपी नावों से भरी थी, और घोड़ों के समूह जिसके किनारे थे,

श्लोक 34 (7.147.34)

रथचक्रयुगेषाक्षकूबरैरतिदुर्गमाम् । प्रासासिशक्तिपरशुविशिखाहिदुरासदाम् ॥

rathacakrayugeṣākṣakūbarairatidurgamām | prāsāsiśaktiparaśuviśikhāhidurāsadām

रथों के पहियों, जुओं, ईषाओं, धुरों और कूबरों के कारण जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, और प्रास, तलवार, शक्ति, फरसों तथा सर्पों-जैसे बाणों के कारण जिसके पास पहुँचना दुष्कर था,

श्लोक 35 (7.147.35)

बलकङ्कमहानक्रां गोमायुमकरोत्कटाम् । गृध्रोदग्रमहाग्राहां शिवाविरुतभैरवाम् ॥

balakaṅkamahānakrāṃ gomāyumakarotkaṭām | gṛdhrodagramahāgrāhāṃ śivāvirutabhairavām

बगुले और कंक पक्षी जिसके बड़े-बड़े घड़ियाल थे, सियार जिसके मगर थे, ऊँचे उड़ते गिद्ध जिसके विशाल ग्राह थे, और सियारिनों की चीख से जो भयानक थी,

श्लोक 36 (7.147.36)

नृत्यत्प्रेतपिशाचाद्यैर्भूताकीर्णां सहस्रशः । गतासुयोधनिश्चेष्टशरीरशतवाहिनीम् ॥

nṛtyatpretapiśācādyairbhūtākīrṇāṃ sahasraśaḥ | gatāsuyodhaniśceṣṭaśarīraśatavāhinīm

जो नाचते हुए प्रेतों, पिशाचों और अन्य भूतों से हज़ारों की संख्या में भरी हुई थी, और प्राणहीन योद्धाओं के सैकड़ों निश्चेष्ट शरीरों को बहाए लिए जा रही थी,

श्लोक 37 (7.147.37)

महाप्रतिभयां रौद्रां घोरां वैतरणीमिव । नदीं प्रवर्तयामास भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥

mahāpratibhayāṃ raudrāṃ ghorāṃ vaitaraṇīmiva | nadīṃ pravartayāmāsa bhīrūṇāṃ bhayavardhinīm

ऐसी महाभयंकर, रौद्र और घोर, वैतरणी-जैसी नदी, जो डरपोकों का भय बढ़ाती थी, उसने बहा दी।

श्लोक 38 (7.147.38)

तं दृष्ट्वा तस्य विक्रान्तमन्तकस्येव रूपिणः । अभूतपूर्वं कुरुषु भयमागाद्रणाजिरे ॥

taṃ dṛṣṭvā tasya vikrāntamantakasyeva rūpiṇaḥ | abhūtapūrvaṃ kuruṣu bhayamāgādraṇājire

मूर्तिमान् यमराज-जैसे उसके उस पराक्रम को देखकर रणभूमि में कौरवों को ऐसा भय हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ था।

श्लोक 39 (7.147.39)

तत आदाय वीराणामस्त्रैरस्त्राणि पाण्डवः । आत्मानं रौद्रमाचष्ट रौद्रकर्मण्यधिष्ठितः ॥

tata ādāya vīrāṇāmastrairastrāṇi pāṇḍavaḥ | ātmānaṃ raudramācaṣṭa raudrakarmaṇyadhiṣṭhitaḥ

तब पाण्डव ने वीरों के अस्त्रों को अपने अस्त्रों से पकड़कर अपने को रौद्र रूप में प्रकट किया; वह अपने उग्र कर्म में डटा हुआ था।

श्लोक 40 (7.147.40)

ततो रथवरान्राजन्नत्यतिक्रामदर्जुनः ॥

tato rathavarānrājannatyatikrāmadarjunaḥ

तब, हे राजन्, अर्जुन उन श्रेष्ठ रथियों को पार कर गया।

श्लोक 41 (7.147.41)

मध्यन्दिनगतं सूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे । न शेकुः सर्वभूतानि पाण्डवं प्रतिवीक्षितुम् ॥

madhyandinagataṃ sūryaṃ pratapantamivāmbare | na śekuḥ sarvabhūtāni pāṇḍavaṃ prativīkṣitum

आकाश में तपते हुए मध्याह्न के सूर्य के समान उस पाण्डव की ओर कोई भी प्राणी देख नहीं सका।

श्लोक 42 (7.147.42)

प्रसृतांस्तस्य गाण्डीवाच्छरव्रातान्महात्मनः । सङ्ग्रामे सम्प्रपश्यामो हंसपङ्क्तिरिवाम्बरे ॥

prasṛtāṃstasya gāṇḍīvāccharavrātānmahātmanaḥ | saṅgrāme samprapaśyāmo haṃsapaṅktirivāmbare

उस महात्मा के गाण्डीव से छूटे हुए बाणों के झुण्डों को हमने युद्ध में आकाश में हंसों की पंक्तियों की तरह फैलते देखा।

श्लोक 43 (7.147.43)

विनिवार्य स वीराणामस्त्रैरस्त्राणि सर्वतः । दर्शयन्रौद्रमात्मानमुग्रे कर्मणि धिष्ठितः ॥

vinivārya sa vīrāṇāmastrairastrāṇi sarvataḥ | darśayanraudramātmānamugre karmaṇi dhiṣṭhitaḥ

वीरों के अस्त्रों को अपने अस्त्रों से सब ओर रोककर वह अपना रौद्र रूप दिखाता हुआ उग्र कर्म में जुटा रहा।

श्लोक 44 (7.147.44)

स तान्रथवरान्राजन्नत्याक्रामत्तदाऽर्जुनः । मोहयन्निव नाराचैर्जयद्रथवधेप्सया ॥

sa tānrathavarānrājannatyākrāmattadā'rjunaḥ | mohayanniva nārācairjayadrathavadhepsayā

तब, हे राजन्, जयद्रथ के वध की इच्छा से अर्जुन नाराच बाणों से उन श्रेष्ठ रथियों को मानो मोहित करता हुआ उनसे आगे निकल गया।

श्लोक 45 (7.147.45)

विसृजन्दिक्षु सर्वासु शरानच्युतसारथिः । सरथो व्यचरत्तूर्णं प्रेक्षणीयो धनञ्जयः ॥

visṛjandikṣu sarvāsu śarānacyutasārathiḥ | saratho vyacarattūrṇaṃ prekṣaṇīyo dhanañjayaḥ

अच्युत जिसके सारथि थे, वह धनञ्जय सब दिशाओं में बाण बरसाता हुआ रथ पर तेज़ी से विचरता रहा; वह दर्शनीय था।

श्लोक 46 (7.147.46)

भ्रमन्त इव शूरस्य शरव्राताः महात्मनः । अदृश्यन्तान्तरिक्षस्थाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

bhramanta iva śūrasya śaravrātāḥ mahātmanaḥ | adṛśyantāntarikṣasthāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

उस महात्मा शूर के बाणों के समूह घूमते-से लगते थे; वे सैकड़ों-हजारों की संख्या में आकाश में दिखाई देते थे।

श्लोक 47 (7.147.47)

आददानं महेष्वासं सन्दधानं च सायकम् । विसृजन्तं च कौन्तेयं नानुपश्याम वै तदा ॥

ādadānaṃ maheṣvāsaṃ sandadhānaṃ ca sāyakam | visṛjantaṃ ca kaunteyaṃ nānupaśyāma vai tadā

उस महाधनुर्धर कुन्तीपुत्र को बाण उठाते, चढ़ाते और छोड़ते हुए हम उस समय देख नहीं पाते थे।

श्लोक 48 (7.147.48)

तथा सर्वा दिशो राजन्सर्वांश्च रथिनो रणे । आकुलीकृत्य कौन्तेयो जयद्रथमुपाद्रवत् । विव्याध च चतुःषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ॥

tathā sarvā diśo rājansarvāṃśca rathino raṇe | ākulīkṛtya kaunteyo jayadrathamupādravat | vivyādha ca catuḥṣaṣṭyā śarāṇāṃ nataparvaṇām

हे राजन्! इस प्रकार रणभूमि में सब दिशाओं और सब रथियों को व्याकुल करके कुन्तीपुत्र जयद्रथ पर टूट पड़ा। उसने चिकनी गाँठों वाले चौंसठ बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 49 (7.147.49)

सैन्धवाभिमुखं यान्तं योधाः सम्प्रेक्ष्य पाण्डवम् । न्यवर्तन्त रणाद्वीरा निराशास्तस्य जीविते ॥

saindhavābhimukhaṃ yāntaṃ yodhāḥ samprekṣya pāṇḍavam | nyavartanta raṇādvīrā nirāśāstasya jīvite

सिन्धुराज की ओर बढ़ते हुए पाण्डव को देखकर वे योद्धा अपने प्राणों की आशा छोड़कर रणभूमि से लौट पड़े।

श्लोक 50 (7.147.50)

यो योऽभ्यधावदाक्रन्दे तावकः पाण्डवं रणे । तस्यतस्यान्तगा बाणाः शरीरे न्यपतन्प्रभो ॥

yo yo'bhyadhāvadākrande tāvakaḥ pāṇḍavaṃ raṇe | tasyatasyāntagā bāṇāḥ śarīre nyapatanprabho

हे प्रभो! आपके पक्ष का जो-जो योद्धा उस कोलाहल में पाण्डव पर दौड़ा, उस-उसके शरीर पर काल-रूप बाण आ गिरे।

श्लोक 51 (7.147.51)

कबन्धसङ्कुलं चक्रे तव सैन्यं महारथः । अर्जुनो जयतां श्रेष्ठः शरैरग्न्यंशुसन्निभैः ॥

kabandhasaṅkulaṃ cakre tava sainyaṃ mahārathaḥ | arjuno jayatāṃ śreṣṭhaḥ śarairagnyaṃśusannibhaiḥ

विजयियों में श्रेष्ठ उस महारथी अर्जुन ने अग्नि और सूर्य की किरणों जैसे बाणों से आपकी सेना को कबन्धों से भर दिया।

श्लोक 52 (7.147.52)

एवं तत्तव राजेन्द्र चतुरङ्गबलं तदा । व्याकुलीकृत्य कौन्तेयो जयद्रथमुपाद्रवत् ॥

evaṃ tattava rājendra caturaṅgabalaṃ tadā | vyākulīkṛtya kaunteyo jayadrathamupādravat

हे राजेन्द्र! इस प्रकार आपकी चतुरंगिणी सेना को व्याकुल करके कुन्तीपुत्र उस समय जयद्रथ पर टूट पड़ा।

श्लोक 53 (7.147.53)

द्रौणिं पञ्चाशताऽविध्यद्वृषसेनं त्रिभिः शरैः । कृपायमाणः कौन्तेयः कृपं नवभिरार्दयत् ॥

drauṇiṃ pañcāśatā'vidhyadvṛṣasenaṃ tribhiḥ śaraiḥ | kṛpāyamāṇaḥ kaunteyaḥ kṛpaṃ navabhirārdayat

उसने द्रोणपुत्र को पचास बाणों से और वृषसेन को तीन बाणों से बींधा; और दया दिखाते हुए कुन्तीपुत्र ने कृप को नौ बाणों से पीड़ित किया।

श्लोक 54 (7.147.54)

शल्यं षोडशभिर्बाणैः कर्णं द्वात्रिंशता शरैः । सैन्धवं तु चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत् ॥

śalyaṃ ṣoḍaśabhirbāṇaiḥ karṇaṃ dvātriṃśatā śaraiḥ | saindhavaṃ tu catuḥṣaṣṭyā viddhvā siṃha ivānadat

शल्य को सोलह बाणों से, कर्ण को बत्तीस बाणों से और सैन्धव को चौंसठ बाणों से बींधकर वह सिंह की तरह गरजा।

श्लोक 55 (7.147.55)

सैन्धवस्तु तथा विद्धः शरैर्गाण्डीवधन्वना । न चक्षमे सुसङ्क्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥

saindhavastu tathā viddhaḥ śarairgāṇḍīvadhanvanā | na cakṣame susaṅkruddhastotrārdita iva dvipaḥ

गाण्डीवधारी के बाणों से इस प्रकार बींधा हुआ सैन्धव अत्यन्त क्रोध में आकर उसे सह न सका, जैसे अंकुश से पीड़ित हाथी।

श्लोक 56 (7.147.56)

स वराहध्वजस्तूर्णं गार्ध्रपत्रानजिह्मगान् । क्रुद्धाशीविषसङ्काशान्कर्मारपरिमार्जितान् ॥

sa varāhadhvajastūrṇaṃ gārdhrapatrānajihmagān | kruddhāśīviṣasaṅkāśānkarmāraparimārjitān

तब वराह की ध्वजा वाले ने झटपट गिद्ध के पंखों वाले, सीधे जाने वाले, कुपित विषधर सर्पों जैसे और लोहार के हाथों माँजे हुए बाण लिए,

श्लोक 57 (7.147.57)

आकर्णपूर्णांश्चिक्षेप फल्गुनस्य रथं प्रति । त्रिभिस्तु विद्ध्वा गोविन्दं नाराचैः षड्भिरर्जुनम् ॥

ākarṇapūrṇāṃścikṣepa phalgunasya rathaṃ prati | tribhistu viddhvā govindaṃ nārācaiḥ ṣaḍbhirarjunam

और कान तक खींचकर उन्हें फल्गुन के रथ की ओर छोड़ा। उसने तीन नाराचों से गोविन्द को और छह से अर्जुन को बींध दिया।

श्लोक 58 (7.147.58)

अष्टभिर्वाजिनोऽविध्यद्ध्वजं चैकेन पत्रिणा । भूयश्चैवार्जुनं सङ्ख्ये शरवर्षैरवाकिरत् ॥

aṣṭabhirvājino'vidhyaddhvajaṃ caikena patriṇā | bhūyaścaivārjunaṃ saṅkhye śaravarṣairavākirat

आठ बाणों से घोड़ों को और एक पंखदार बाण से ध्वज को बींधा; और फिर युद्ध में बाणों की वर्षा से अर्जुन को ढक दिया।

श्लोक 59 (7.147.59)

स विक्षिप्यार्जुनस्तूर्णं सैन्धवप्रहिताञ्शरान् । युगपत्तस्य चिच्छेद शराभ्यां सैन्धवस्य ह । सारथेश्च शिरः कायाद्ध्वजं च समलङ्कृतम् ॥

sa vikṣipyārjunastūrṇaṃ saindhavaprahitāñśarān | yugapattasya ciccheda śarābhyāṃ saindhavasya ha | sāratheśca śiraḥ kāyāddhvajaṃ ca samalaṅkṛtam

अर्जुन ने सैन्धव के छोड़े हुए बाणों को शीघ्र ही बिखेरकर दो बाणों से एक साथ सैन्धव के सारथि का सिर धड़ से और उसकी सजी हुई ध्वजा काट गिराई।

श्लोक 60 (7.147.60)

स च्छिन्नयष्टिः सुमहान्धनञ्जयशराहतः । वराहः सिन्धुराजस्य पपातेन्दुसमप्रभः ॥

sa cchinnayaṣṭiḥ sumahāndhanañjayaśarāhataḥ | varāhaḥ sindhurājasya papātendusamaprabhaḥ

डंडी कट जाने पर धनञ्जय के बाणों से आहत सिन्धुराज की चन्द्रमा-जैसी कान्ति वाली वह विशाल वराह-ध्वजा गिर पड़ी।

श्लोक 61 (7.147.61)

आदित्यं प्रेक्षमाणस्तु बीभत्सुः सृक्विणी लिहन् । अपश्यन्नान्तरं तस्य रक्षिभिः संवृतस्य वै ॥

ādityaṃ prekṣamāṇastu bībhatsuḥ sṛkviṇī lihan | apaśyannāntaraṃ tasya rakṣibhiḥ saṃvṛtasya vai

सूर्य की ओर देखता हुआ बीभत्सु अपने होंठों के कोने चाट रहा था। रक्षकों से घिरे उस जयद्रथ पर उसे प्रहार का कोई अवसर नहीं दिखाई दिया।

श्लोक 62 (7.147.62)

अभवत्क्रोधरक्ताक्षो व्यात्तानन इवान्तकः । अथाब्रवीद्वासुदेवः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥

abhavatkrodharaktākṣo vyāttānana ivāntakaḥ | athābravīdvāsudevaḥ kuntīputraṃ dhanañjayam

क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गईं, और वह मुँह फाड़े हुए यमराज-सा लग रहा था। तब वासुदेव ने कुन्तीपुत्र धनञ्जय से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 63 (7.147.63)

नैव शक्यस्त्वया हन्तुं निर्व्याजं भरतर्षभ । स्रक्ष्याम्यहमुपायं तमादित्यस्यापवारणे । ततोऽस्तं गतमादित्यं मंस्यते सिन्धुराडिह ॥

naiva śakyastvayā hantuṃ nirvyājaṃ bharatarṣabha | srakṣyāmyahamupāyaṃ tamādityasyāpavāraṇe | tato'staṃ gatamādityaṃ maṃsyate sindhurāḍiha

"हे भरतश्रेष्ठ! तुम छल-कौशल के बिना इसे नहीं मार सकते। मैं सूर्य को ढकने का उपाय रचूँगा। तब सिन्धुराज यहाँ मान लेगा कि सूर्य अस्त हो गया।"

श्लोक 64 (7.147.64)

ततोऽस्य विस्मयः पार्थ हर्षश्चैव भविष्यति । आत्मजीवितलाभाच्च प्रतिज्ञायाश्च नाशनात् ॥

tato'sya vismayaḥ pārtha harṣaścaiva bhaviṣyati | ātmajīvitalābhācca pratijñāyāśca nāśanāt

"फिर, हे पार्थ, अपने प्राण बच जाने और तुम्हारी प्रतिज्ञा के नष्ट होने की बात सोचकर उसे विस्मय भी होगा और हर्ष भी।"

श्लोक 65 (7.147.65)

अस्तङ्गतमिवादित्यं दृष्ट्वा मोहेन बालिशः । न हि शक्ष्यत्यथाऽऽत्मानं रक्षितुं हर्षसम्भवात् ॥

astaṅgatamivādityaṃ dṛṣṭvā mohena bāliśaḥ | na hi śakṣyatyathā''tmānaṃ rakṣituṃ harṣasambhavāt

"सूर्य को मानो अस्त हुआ देखकर वह मूर्ख मोह में पड़कर, उमड़ते हर्ष के कारण, अपनी रक्षा नहीं कर पाएगा।"

श्लोक 66 (7.147.66)

एतस्मिन्नेव काले तु प्रहर्तव्यं धनञ्जय । जयद्रथस्य क्षुद्रस्य सवितुर्दर्शनार्थिनः ॥

etasminneva kāle tu prahartavyaṃ dhanañjaya | jayadrathasya kṣudrasya saviturdarśanārthinaḥ

"हे धनञ्जय! ठीक उसी समय सूर्य को देखने के इच्छुक उस नीच जयद्रथ पर तुम्हें प्रहार करना है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 67 (7.147.67)

एवमुक्त्वा ततः पार्थं क्षिप्रमेवाहरत्प्रभाम् । जनार्दनेन सृष्टं वै तम आदित्यनाशनम् ॥

evamuktvā tataḥ pārthaṃ kṣipramevāharatprabhām | janārdanena sṛṣṭaṃ vai tama ādityanāśanam

इस प्रकार पार्थ से कहकर उसने तुरन्त सूर्य की प्रभा हर ली; जनार्दन द्वारा रचा हुआ वह अन्धकार सूर्य को ढक देने वाला था।

श्लोक 68 (7.147.68)

पार्थस्य बलमज्ञानात्तमो दृष्ट्वा सुदुःखितम् । अभवंस्तावका योधा हर्षसङ्कुलचेतसः ॥

pārthasya balamajñānāttamo dṛṣṭvā suduḥkhitam | abhavaṃstāvakā yodhā harṣasaṅkulacetasaḥ

अज्ञान के कारण उस अँधेरे को देखकर पार्थ की सेना बहुत दुःखी हो गई, और आपके योद्धा हर्ष से भरे चित्त वाले हो गए।

श्लोक 69 (7.147.69)

ते प्रहृष्टा रणे राजन्नापश्यन्सैनिका रविम् । उन्नाम्य वक्त्राणि तदा स च राजा जयद्रथः ॥

te prahṛṣṭā raṇe rājannāpaśyansainikā ravim | unnāmya vaktrāṇi tadā sa ca rājā jayadrathaḥ

हे राजन्! वे हर्षित सैनिक रणभूमि में मुँह ऊपर उठाए सूर्य को देख नहीं पा रहे थे, और राजा जयद्रथ भी नहीं।

श्लोक 70 (7.147.70)

वीक्षमाणे ततस्तस्मिन्सिन्धुराजे दिवाकरम् । उन्नमय्य शिरोग्रीवां वीक्षते सूर्यमण्डलम् । तस्य शीघ्रं पृषत्केन कायाच्छीर्षमपाहर ॥

vīkṣamāṇe tatastasminsindhurāje divākaram | unnamayya śirogrīvāṃ vīkṣate sūryamaṇḍalam | tasya śīghraṃ pṛṣatkena kāyācchīrṣamapāhara

जब सिन्धुराज सूर्य को देख रहा था, तब, "वह गर्दन और सिर ऊपर उठाकर सूर्यमण्डल को देख रहा है! शीघ्र ही बाण से इसका सिर धड़ से अलग कर दो!"

श्लोक 71 (7.147.71)

केशवेनैवमुक्तः सन्नमर्षाद्रक्तलोचनः । उद्बबर्ह शरं तीक्ष्णममरैरपि दुःसहम् ॥

keśavenaivamuktaḥ sannamarṣādraktalocanaḥ | udbabarha śaraṃ tīkṣṇamamarairapi duḥsaham

केशव के इस प्रकार कहने पर अर्जुन ने क्रोध से लाल नेत्र किए और एक पैना बाण निकाला, जिसे देवता भी नहीं सह सकते थे।

श्लोक 72 (7.147.72)

एवं तूणीशयं घोरमिन्द्राशनिसमप्रभम् । वर्मभेदिनमत्यर्थं गन्धमाल्यार्चितं सदा । विससर्ज ततस्तूर्णं सैन्धवस्य रथं प्रति ॥

evaṃ tūṇīśayaṃ ghoramindrāśanisamaprabham | varmabhedinamatyarthaṃ gandhamālyārcitaṃ sadā | visasarja tatastūrṇaṃ saindhavasya rathaṃ prati

तब उसने तरकश में रखे हुए, इन्द्र के वज्र-जैसी कान्ति वाले, कवच को अत्यन्त भेदने वाले, सदा गन्ध और मालाओं से पूजित उस भयंकर बाण को तुरन्त सैन्धव के रथ की ओर छोड़ दिया।

श्लोक 73 (7.147.73)

स तु गाण्डीवनिर्मुक्तः शरः श्येन इवाशुगः । शकुन्तमिव वृक्षाग्रात्सैन्धवस्याहरच्छिरः ॥

sa tu gāṇḍīvanirmuktaḥ śaraḥ śyena ivāśugaḥ | śakuntamiva vṛkṣāgrātsaindhavasyāharacchiraḥ

गाण्डीव से छूटा हुआ वह बाण बाज की तरह तेज़ी से गया और जैसे वृक्ष की चोटी से पक्षी को ले जाया जाए, वैसे सैन्धव का सिर हर ले गया।

श्लोक 74 (7.147.74)

प्रपतिष्यति शीर्षे तु कृष्णोऽर्जुनमथाब्रवीत् । पार्थ पार्थ शिरो ह्येतद्यथा नेयान्महीतलम् । तथा कुरु कुरुश्रेष्ठ वक्ष्ये तस्यापि कारणम् ॥

prapatiṣyati śīrṣe tu kṛṣṇo'rjunamathābravīt | pārtha pārtha śiro hyetadyathā neyānmahītalam | tathā kuru kuruśreṣṭha vakṣye tasyāpi kāraṇam

सिर के गिरने को था कि कृष्ण ने अर्जुन से कहा: "हे पार्थ! हे पार्थ! ऐसा करो कि यह सिर धरती पर न पहुँचे। हे कुरुश्रेष्ठ! ऐसा ही करो; मैं इसका कारण भी बताऊँगा।"

श्लोक 75 (7.147.75)

श्रुत्वा तु वचनं तस्य त्वरमाणोऽस्त्रमायया । तथाऽहरच्छिरस्तस्य शरैरूर्ध्वं धनञ्जयः । दुर्हृदामपहर्षाय सुहृदां हर्षणाय च ॥

śrutvā tu vacanaṃ tasya tvaramāṇo'stramāyayā | tathā'haracchirastasya śarairūrdhvaṃ dhanañjayaḥ | durhṛdāmapaharṣāya suhṛdāṃ harṣaṇāya ca

उसकी बात सुनकर अस्त्र-माया से शीघ्रता करते हुए धनञ्जय ने बाणों से उसके सिर को फिर ऊपर ही उठा लिया, शत्रुओं का हर्ष हरने और मित्रों को प्रसन्न करने के लिए।

श्लोक 76 (7.147.76)

तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव पुनरूर्ध्वमथापि च । दीर्घकालमवाक्चैव सम्प्रक्रीडन्निवार्जुनः ॥

tiryagūrdhvamadhaścaiva punarūrdhvamathāpi ca | dīrghakālamavākcaiva samprakrīḍannivārjunaḥ

तिरछा, ऊपर, नीचे और फिर ऊपर, बहुत देर तक और नीचे की ओर भी, अर्जुन मानो उससे खेलता रहा।

श्लोक 77 (7.147.77)

तत्सैन्यं सर्वतोऽपश्यन्महदाश्चर्यमद्भुतम् । प्रापयत्स शिरो यस्माद्योधयन्नेव पार्थिवान् ॥

tatsainyaṃ sarvato'paśyanmahadāścaryamadbhutam | prāpayatsa śiro yasmādyodhayanneva pārthivān

उस सेना ने चारों ओर यह महान् और अद्भुत आश्चर्य देखा कि वह राजाओं से लड़ता हुआ ही उस सिर को आगे पहुँचाता गया।

श्लोक 78 (7.147.78)

शरैः कन्दुकवत्कृत्वा तस्यालोकाय पाण्डवः । स्यमन्तपञ्चकाद्बाह्ये शिरस्तदहरच्छरैः ॥

śaraiḥ kandukavatkṛtvā tasyālokāya pāṇḍavaḥ | syamantapañcakādbāhye śirastadaharaccharaiḥ

बाणों से उसे गेंद की तरह उछालते हुए, कि वह दिखाई दे, पाण्डव ने बाणों से ही उस सिर को स्यमन्तपञ्चक के बाहर पहुँचा दिया।

श्लोक 79 (7.147.79)

जयद्रथस्यार्जुनबाणनालं । मुखारविन्दं रुधिराम्बुसिक्तम् । दृष्टं नरैश्चोपरिवर्तमानं । विद्याधरोत्सृष्टमिवैकपद्मम् ॥

jayadrathasyārjunabāṇanālaṃ | mukhāravindaṃ rudhirāmbusiktam | dṛṣṭaṃ naraiścoparivartamānaṃ | vidyādharotsṛṣṭamivaikapadmam

अर्जुन का बाण जिसकी नाल था, रक्त-जल से सिंचा हुआ जयद्रथ का वह मुख-कमल ऊपर जाता हुआ लोगों को ऐसा दिखा, मानो विद्याधर द्वारा उछाला गया कोई अकेला कमल हो।

श्लोक 80 (7.147.80)

स देवशत्रूनिव देवराजः । किरीटमाली व्यधमत्सपत्नान् । यथा तमांस्यभ्युदितस्तमोघ्नः । पूर्णां प्रतिज्ञां स समाप्य वीरः ॥

sa devaśatrūniva devarājaḥ | kirīṭamālī vyadhamatsapatnān | yathā tamāṃsyabhyuditastamoghnaḥ | pūrṇāṃ pratijñāṃ sa samāpya vīraḥ

किरीटधारी उस वीर ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके शत्रुओं को वैसे ही बिखेर दिया, जैसे देवराज देवशत्रुओं को और उदित हुआ तमोनाशक सूर्य अन्धकारों को बिखेर देता है।

श्लोक 81 (7.147.81)

अथाब्रवीत्केशवं पाण्डवेयः । कियन्तमध्वानमिदं हरामि । किमर्थमेतन्न निपात्यमुर्व्याम् । क्व च प्रयातव्यमिदं च शंस । शक्नोम्यहं यत्र भवान्ब्रवीति । तं भूमिदेशं च शिरो विनेतुम् ॥

athābravītkeśavaṃ pāṇḍaveyaḥ | kiyantamadhvānamidaṃ harāmi | kimarthametanna nipātyamurvyām | kva ca prayātavyamidaṃ ca śaṃsa | śaknomyahaṃ yatra bhavānbravīti | taṃ bhūmideśaṃ ca śiro vinetum

तब पाण्डुपुत्र ने केशव से कहा: "मैं इसे कितनी दूर ले जाऊँ? इसे धरती पर क्यों नहीं गिराना है? इसे कहाँ पहुँचाना है? यह बताइए। आप जहाँ कहें, मैं इस सिर को उसी स्थान तक ले जा सकता हूँ।"

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