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द्रोण पर्व · अध्याय 148

वृद्धक्षत्र का वर और जयद्रथ के सिर का गिरना

कृष्ण बताते हैं कि जयद्रथ का सिर धरती पर क्यों नहीं गिरना चाहिए: उसके पिता वृद्धक्षत्र ने, जिन्होंने तपस्या से यह पुत्र पाया था, यह शाप-रूप वचन कहा था कि जो भी उनके पुत्र का सिर भूमि पर गिराएगा, उसका अपना सिर सौ टुकड़ों में फट जाएगा। अर्जुन के बाण वह सिर सन्ध्योपासना में बैठे वृद्धक्षत्र की गोद में गिरा देते हैं; वे उठते हैं तो सिर नीचे गिरता है और उनका अपना सिर फट जाता है। देवता चकित होते हैं, कृष्ण अन्धकार समेट लेते हैं, पाण्डव शंख बजाते हैं और सूर्यास्त के समय द्रोण से युद्ध फिर शुरू हो जाता है।

अध्याय 147अध्याय-सूचीअध्याय 149

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.148.1)

एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणे दिवाकरे । अब्रवीत्पाण्डवं तत्र त्वरमाणो जनार्दनः ॥

etasminneva kāle tu tvaramāṇe divākare | abravītpāṇḍavaṃ tatra tvaramāṇo janārdanaḥ

ठीक उसी समय, जब सूर्य शीघ्रता से अस्त होने की ओर जा रहा था, जनार्दन ने स्वयं जल्दी करते हुए पाण्डव से कहा:

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (7.148.2)

पार्थ पार्थ शिरो ह्येतद्यत्कृते न पतेद्भुवि । श्रूयतां तद्यथावृत्तं कारणं सैन्धवं प्रति ॥

pārtha pārtha śiro hyetadyatkṛte na patedbhuvi | śrūyatāṃ tadyathāvṛttaṃ kāraṇaṃ saindhavaṃ prati

"हे पार्थ! हे पार्थ! सैन्धव के विषय में वह कारण, जिसके चलते यह सिर धरती पर नहीं गिरना चाहिए, जैसा हुआ था वैसा सुनो।"

श्लोक 3 (7.148.3)

वृद्धक्षत्रः सैन्धवस्य पिता जगति विश्रुतः । स च घोरेण तपसा सैन्धवं प्राप्तवान्सुतम् ॥

vṛddhakṣatraḥ saindhavasya pitā jagati viśrutaḥ | sa ca ghoreṇa tapasā saindhavaṃ prāptavānsutam

"सैन्धव के पिता वृद्धक्षत्र जगत् में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने घोर तपस्या से सैन्धव नाम का यह पुत्र पाया था।"

श्लोक 4 (7.148.4)

जयद्रथममित्रघ्नं वागुवाचाशरीरिणी । नृपमन्तर्हिता वाणी मेघदुन्दुभिनिःस्वना ॥

jayadrathamamitraghnaṃ vāguvācāśarīriṇī | nṛpamantarhitā vāṇī meghadundubhiniḥsvanā

"शत्रुओं का नाश करने वाले जयद्रथ के विषय में राजा से एक देहरहित, अदृश्य वाणी ने कहा, जिसका स्वर मेघ और नगाड़े के समान गम्भीर था:"

श्लोक 5 (7.148.5)

तवात्मजो मनुष्येन्द्र कुलशीलदमादिभिः । गुणैर्भविष्यति विभो सदृशो वंशयोर्द्वयोः । क्षत्रियप्रवरो लोके नित्यं शूराभिसत्कृतः ॥

tavātmajo manuṣyendra kulaśīladamādibhiḥ | guṇairbhaviṣyati vibho sadṛśo vaṃśayordvayoḥ | kṣatriyapravaro loke nityaṃ śūrābhisatkṛtaḥ

"'हे मनुष्यों के स्वामी! तुम्हारा पुत्र कुल, शील, दम आदि गुणों में दोनों वंशों के अनुरूप होगा, हे विभो; वह लोक में क्षत्रियों में श्रेष्ठ और सदा शूरों से सम्मानित होगा।'"

श्लोक 6 (7.148.6)

शत्रुभिर्युध्यमानस्य सङ्ग्रामे त्वस्य धन्विनः । शिरश्छेत्स्यति सङ्क्रुद्धः शत्रुर्नालक्षितो भुवि ॥

śatrubhiryudhyamānasya saṅgrāme tvasya dhanvinaḥ | śiraśchetsyati saṅkruddhaḥ śatrurnālakṣito bhuvi

"'जब यह धनुर्धर युद्ध में शत्रुओं से लड़ रहा होगा, तब कोई क्रुद्ध शत्रु, पृथ्वी पर बिना पहचाना रहकर, इसका सिर काट देगा।'"

श्लोक 7 (7.148.7)

एतच्छ्रुत्वा सिन्धुराजो ध्यात्वा चिरमरिन्दमः । ज्ञातीन्सर्वानुवाचेदं पुत्रस्नेहाभिचोदितः ॥

etacchrutvā sindhurājo dhyātvā ciramarindamaḥ | jñātīnsarvānuvācedaṃ putrasnehābhicoditaḥ

"यह सुनकर शत्रुओं का दमन करने वाले सिन्धुराज ने बहुत देर तक सोचा और पुत्र के स्नेह से प्रेरित होकर सब जाति-बन्धुओं से यह कहा:"

श्लोक 8 (7.148.8)

सङ्ग्रामे युध्यमानस्य वहतो महतीं धुरम् । धरण्यां मम पुत्रस्य पातयिष्यति यः शिरः ॥

saṅgrāme yudhyamānasya vahato mahatīṃ dhuram | dharaṇyāṃ mama putrasya pātayiṣyati yaḥ śiraḥ

"'युद्ध में भारी बोझ उठाते हुए मेरे पुत्र का सिर जो कोई भूमि पर गिराएगा,'"

श्लोक 9 (7.148.9)

तस्यापि शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः । यदि चेदस्ति मे लाभस्तपसो वा दमस्य वा ॥

tasyāpi śatadhā mūrdhā phaliṣyati na saṃśayaḥ | yadi cedasti me lābhastapaso vā damasya vā

"'उसका भी सिर निस्सन्देह सौ टुकड़े हो जाएगा, यदि मुझे तप या दम का कोई फल मिला है।'"

श्लोक 10 (7.148.10)

एवमुक्त्वा ततो राज्ये स्थापयित्वा जयद्रथम् । वृद्धक्षत्रो वनं यातस्तपश्चोग्रं समास्थितः ॥

evamuktvā tato rājye sthāpayitvā jayadratham | vṛddhakṣatro vanaṃ yātastapaścograṃ samāsthitaḥ

"ऐसा कहकर और जयद्रथ को राज्य पर बैठाकर वृद्धक्षत्र वन में चले गए और वहाँ उग्र तप में लग गए।"

श्लोक 11 (7.148.11)

सोऽयं तप्यति तेजस्वी तपो घोरं दुरासदम् । स्यमन्तपञ्चकादस्माद्बहिर्वानरकेतन ॥

so'yaṃ tapyati tejasvī tapo ghoraṃ durāsadam | syamantapañcakādasmādbahirvānaraketana

"हे वानरध्वज! वही तेजस्वी वृद्धक्षत्र इस स्यमन्तपञ्चक के बाहर घोर और दुर्धर्ष तप कर रहे हैं।"

श्लोक 12 (7.148.12)

तस्माज्जयद्रथस्य त्वं शिरश्छित्त्वा महामृधे । दिव्येनास्त्रेण रिपुहन्घोरेणाद्भुतकर्मणा ॥

tasmājjayadrathasya tvaṃ śiraśchittvā mahāmṛdhe | divyenāstreṇa ripuhanghoreṇādbhutakarmaṇā

"इसलिए, हे शत्रुनाशक! तुम इस महायुद्ध में उग्र और अद्भुत कर्म वाले दिव्य अस्त्र से जयद्रथ का सिर काटकर,"

श्लोक 13 (7.148.13)

सकुण्डलं सिन्धुपतेः प्रभञ्जनसुतानुज । उत्सङ्गे पातयस्वास्य वृद्धक्षत्रस्य भारत ॥

sakuṇḍalaṃ sindhupateḥ prabhañjanasutānuja | utsaṅge pātayasvāsya vṛddhakṣatrasya bhārata

"हे पवनपुत्र के छोटे भाई! हे भारत! कुण्डलों सहित सिन्धुराज के उस सिर को वृद्धक्षत्र की गोद में गिरा दो।"

श्लोक 14 (7.148.14)

अथ त्वमस्य मूर्धानं पातयिष्यसि भूतले । तवापि शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥

atha tvamasya mūrdhānaṃ pātayiṣyasi bhūtale | tavāpi śatadhā mūrdhā phaliṣyati na saṃśayaḥ

"यदि तुम उसका सिर धरती पर गिराओगे, तो निस्सन्देह तुम्हारा भी सिर सौ टुकड़े हो जाएगा।"

श्लोक 15 (7.148.15)

यथा चेदं न जानीयात्स राजा तपसि स्थितः । तथा कुरु कुरुश्रेष्ठ दिव्यमस्त्रमुपाश्रितः ॥

yathā cedaṃ na jānīyātsa rājā tapasi sthitaḥ | tathā kuru kuruśreṣṭha divyamastramupāśritaḥ

"हे कुरुश्रेष्ठ! दिव्य अस्त्र का आश्रय लेकर ऐसा करो कि तप में स्थित वह राजा इसे न जान सके।"

श्लोक 16 (7.148.16)

न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते तव किञ्चन । समस्तेष्वपि लोकेषु त्रिषु वासवनन्दन ॥

na hyasādhyamakāryaṃ vā vidyate tava kiñcana | samasteṣvapi lokeṣu triṣu vāsavanandana

"हे इन्द्रपुत्र! तीनों लोकों में तुम्हारे लिए कुछ भी असाध्य या अकरणीय नहीं है।"

श्लोक 17 (7.148.17)

यथैतत्सैन्धवशिरः शरैरेव धनञ्जय । वृद्धक्षत्रे पतत्येव तथा नीतिर्विधीयताम् ॥

yathaitatsaindhavaśiraḥ śaraireva dhanañjaya | vṛddhakṣatre patatyeva tathā nītirvidhīyatām

"'हे धनञ्जय! ऐसी युक्ति करो कि सैन्धव का यह सिर बाणों से ही वृद्धक्षत्र पर जा गिरे।'"

सञ्जय उवाच

श्लोक 18 (7.148.18)

ततः सुमहदाश्चर्यं तत्रापश्याम भारत । स्यमन्तपञ्चकाद्बाह्यं शिरो यद्व्यहरत्ततः ॥

tataḥ sumahadāścaryaṃ tatrāpaśyāma bhārata | syamantapañcakādbāhyaṃ śiro yadvyaharattataḥ

हे भारत! तब हमने वहाँ बड़ा आश्चर्य देखा कि उसने वहाँ से उस सिर को उड़ाकर स्यमन्तपञ्चक के बाहर पहुँचा दिया।

श्लोक 19 (7.148.19)

एतस्मिन्नेव काले तु वृद्धक्षत्रो महीपतिः । सन्ध्यामुपास्ते तेजस्वी सम्बन्धी तव मारिष ॥

etasminneva kāle tu vṛddhakṣatro mahīpatiḥ | sandhyāmupāste tejasvī sambandhī tava māriṣa

हे मान्य! उसी समय आपके सम्बन्धी, तेजस्वी राजा वृद्धक्षत्र सन्ध्योपासना कर रहे थे।

श्लोक 20 (7.148.20)

उपासीनस्य तस्याथ कृष्णकेशं सकुण्डलम् । सिन्धुराजस्य मूर्धानमुत्सङ्गे समपातयत् ॥

upāsīnasya tasyātha kṛṣṇakeśaṃ sakuṇḍalam | sindhurājasya mūrdhānamutsaṅge samapātayat

जब वे उपासना कर रहे थे, तब अर्जुन ने सिन्धुराज के काले केशों और कुण्डलों वाले उस सिर को उनकी गोद में गिरा दिया।

श्लोक 21 (7.148.21)

तस्योत्सङ्गे निपतितं शिरस्तच्चारुकुण्डलम् । वृद्धक्षत्रस्य नृपतेरलक्षितमरिन्दम ॥

tasyotsaṅge nipatitaṃ śirastaccārukuṇḍalam | vṛddhakṣatrasya nṛpateralakṣitamarindama

हे शत्रुदमन! राजा वृद्धक्षत्र की गोद में गिरा हुआ सुन्दर कुण्डलों वाला वह सिर उनकी जानकारी में नहीं आया।

श्लोक 22 (7.148.22)

कृतजप्यस्य तस्याथ वृद्धक्षत्रस्य भारत । प्रोत्तिष्ठतस्तत्सहसा शिरोऽगच्छद्धरातलम् ॥

kṛtajapyasya tasyātha vṛddhakṣatrasya bhārata | prottiṣṭhatastatsahasā śiro'gacchaddharātalam

हे भारत! जप समाप्त करके वृद्धक्षत्र ज्योंही अचानक उठे, वह सिर धरती पर जा गिरा।

श्लोक 23 (7.148.23)

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य पुत्रमूर्धनि भूतले । गते तस्यापि शतधा मूर्धाऽगच्छदरिन्दम ॥

tatastasya narendrasya putramūrdhani bhūtale | gate tasyāpi śatadhā mūrdhā'gacchadarindama

तब उस राजा के पुत्र का सिर धरती पर पहुँचते ही, हे शत्रुदमन, उसका अपना सिर भी सौ टुकड़े हो गया।

श्लोक 24 (7.148.24)

ततः सर्वाणि सैन्यानि विस्मयं जग्मुरुत्तमम् । वासुदेवश्च बीभत्सुं प्रशशंस महारथम् ॥

tataḥ sarvāṇi sainyāni vismayaṃ jagmuruttamam | vāsudevaśca bībhatsuṃ praśaśaṃsa mahāratham

तब सब सेनाएँ परम विस्मय में पड़ गईं, और वासुदेव ने महारथी बीभत्सु की प्रशंसा की।

श्लोक 25 (7.148.25)

ततो दृष्ट्वा विनिहतं सिन्धुराजं जयद्रथम् । कर्मणा तेन पार्थस्य विस्मिताः सर्वदेवताः ॥

tato dṛṣṭvā vinihataṃ sindhurājaṃ jayadratham | karmaṇā tena pārthasya vismitāḥ sarvadevatāḥ

सिन्धुराज जयद्रथ को मरा हुआ देखकर, पार्थ के उस कर्म से सब देवता चकित हो गए।

श्लोक 26 (7.148.26)

सर्वदा समरे यस्य गोप्ता नित्यं जनार्दनः । कथं तस्य जयो न स्यादिति भूतानि मेनिरे ॥

sarvadā samare yasya goptā nityaṃ janārdanaḥ | kathaṃ tasya jayo na syāditi bhūtāni menire

प्राणियों ने सोचा: "जिसके रक्षक रणभूमि में सदा जनार्दन हैं, उसकी विजय कैसे न होगी?"

श्लोक 27 (7.148.27)

एतदर्थं शिरस्तस्य च्यावयामास पाण्डवः । स्यमन्तपञ्चकाद्बाह्यं शरैरेव यथाक्रमम् ॥

etadarthaṃ śirastasya cyāvayāmāsa pāṇḍavaḥ | syamantapañcakādbāhyaṃ śaraireva yathākramam

इसी कारण पाण्डव ने बाणों से ही क्रम-क्रम से उसके सिर को स्यमन्तपञ्चक के बाहर भेजा।

श्लोक 28 (7.148.28)

कृत्वा तच्च महत्कर्म निहत्य च जयद्रथम् । अस्त्रं पाशुपतं पार्थः संहर्तुमुपचक्रमे ॥

kṛtvā tacca mahatkarma nihatya ca jayadratham | astraṃ pāśupataṃ pārthaḥ saṃhartumupacakrame

वह महान् कर्म करके और जयद्रथ का वध करके पार्थ ने पाशुपत अस्त्र को लौटाना आरम्भ किया।

श्लोक 29 (7.148.29)

संहरत्यपि कौन्तेये तदस्त्रं तत्र भारत । ववौ शीतः सुगन्धश्च पवनो ह्लादयन्निव ॥

saṃharatyapi kaunteye tadastraṃ tatra bhārata | vavau śītaḥ sugandhaśca pavano hlādayanniva

हे भारत! कुन्तीपुत्र के उस अस्त्र को लौटाते समय वहाँ मानो आनन्द देता हुआ शीतल, सुगन्धित पवन बहने लगा।

श्लोक 30 (7.148.30)

संहारं च प्रमोक्षं च दृष्ट्वा तत्र दिवौकसः । विस्मयं परमं जग्मुः प्रशशंसुश्च पाण्डवम् ॥

saṃhāraṃ ca pramokṣaṃ ca dṛṣṭvā tatra divaukasaḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmuḥ praśaśaṃsuśca pāṇḍavam

अस्त्र के छोड़े जाने और लौटाए जाने को देखकर स्वर्गवासी परम विस्मय में पड़ गए और उन्होंने पाण्डव की प्रशंसा की।

श्लोक 31 (7.148.31)

एवमस्त्रेण तान्वीरो योधयित्वा धनञ्जयः । जयद्रथशिरः पश्चाद्च्यावयामास पाण्डवः ॥

evamastreṇa tānvīro yodhayitvā dhanañjayaḥ | jayadrathaśiraḥ paścādcyāvayāmāsa pāṇḍavaḥ

इस प्रकार उस अस्त्र से उन योद्धाओं को लड़ाई में उलझाकर वीर पाण्डव धनञ्जय ने बाद में जयद्रथ के सिर को दूर भेज दिया।

श्लोक 32 (7.148.32)

तच्छिरश्च्यावमानं तु ददृशुस्तावका युधि । शल्यकर्णकृपा राजन्मोहिताः सव्यसाचिना ॥

tacchiraścyāvamānaṃ tu dadṛśustāvakā yudhi | śalyakarṇakṛpā rājanmohitāḥ savyasācinā

हे राजन्! आपके पक्ष के लोगों ने युद्ध में उस सिर को ले जाए जाते देखा; शल्य, कर्ण और कृप सव्यसाची से मोहित हो गए थे।

श्लोक 33 (7.148.33)

शिरसि च्याविते तस्य शरैराशीविषोपमैः । पश्चात्कायोऽपतद्भूमिं शोचयन्सर्वपार्थिवान् ॥

śirasi cyāvite tasya śarairāśīviṣopamaiḥ | paścātkāyo'patadbhūmiṃ śocayansarvapārthivān

जब विषधर सर्पों जैसे बाणों से उसका सिर हटा दिया गया, तब बाद में धड़ धरती पर गिरा और उसने सब राजाओं को शोक में डाल दिया।

श्लोक 34 (7.148.34)

दृष्ट्वा तु निहतं सङ्ख्ये सिन्धुराजं महारथम् । पुत्राणां तव नेत्रेभ्यो दुःखादास्रं प्रवर्तत ॥

dṛṣṭvā tu nihataṃ saṅkhye sindhurājaṃ mahāratham | putrāṇāṃ tava netrebhyo duḥkhādāsraṃ pravartata

महारथी सिन्धुराज को युद्ध में मरा देखकर आपके पुत्रों की आँखों से दुःख के कारण आँसू बह निकले।

श्लोक 35 (7.148.35)

ततो विनिहते राजन्सिन्धुराजे किरीटिना । तमस्तद्वासुदेवेन संहृतं भरतर्षभ ॥

tato vinihate rājansindhurāje kirīṭinā | tamastadvāsudevena saṃhṛtaṃ bharatarṣabha

हे राजन्! तब किरीटी द्वारा सिन्धुराज के मारे जाने पर, हे भरतश्रेष्ठ, वासुदेव ने वह अन्धकार समेट लिया।

श्लोक 36 (7.148.36)

पश्चाज्ज्ञातं महीपाल तव पुत्रैः सहानुगैः । वासुदेवप्रयुक्तेयं मायेति नृपसत्तम ॥

paścājjñātaṃ mahīpāla tava putraiḥ sahānugaiḥ | vāsudevaprayukteyaṃ māyeti nṛpasattama

हे महीपाल! हे नृपश्रेष्ठ! बाद में आपके पुत्रों और उनके अनुचरों ने जाना कि यह वासुदेव की रची हुई माया थी।

श्लोक 37 (7.148.37)

एवं स निहतो राजन्पार्थेनामिततेजसा । अक्षौहिणीरष्ट हत्वा जामाता तव सैन्धवः ॥

evaṃ sa nihato rājanpārthenāmitatejasā | akṣauhiṇīraṣṭa hatvā jāmātā tava saindhavaḥ

हे राजन्! इस प्रकार अमित तेज वाले पार्थ ने आपके जामाता सैन्धव को मारा, आठ अक्षौहिणी सेना के संहार के बाद।

श्लोक 38 (7.148.38)

हतं जयद्रथं दृष्ट्वा तव पुत्रा नराधिप । दुःखादश्रूणि मुमुचुर्निराशाश्चाभवञ्जये ॥

hataṃ jayadrathaṃ dṛṣṭvā tava putrā narādhipa | duḥkhādaśrūṇi mumucurnirāśāścābhavañjaye

हे नराधिप! जयद्रथ को मरा देखकर आपके पुत्रों ने दुःख से आँसू बहाए और विजय की आशा छोड़ दी।

श्लोक 39 (7.148.39)

ततो जयद्रथे राजन्हते पार्थेन केशवः । दध्मौ शङ्खं महाबाहुरर्जुनश्च परन्तपः ॥

tato jayadrathe rājanhate pārthena keśavaḥ | dadhmau śaṅkhaṃ mahābāhurarjunaśca parantapaḥ

हे राजन्! तब पार्थ द्वारा जयद्रथ के मारे जाने पर केशव ने और शत्रुओं को तपाने वाले महाबाहु अर्जुन ने भी अपना शंख बजाया।

श्लोक 40 (7.148.40)

भीमश्च वृष्णिसिंहश्च युधामन्युश्च भारत । उत्तमौजाश्च विक्रान्तः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥

bhīmaśca vṛṣṇisiṃhaśca yudhāmanyuśca bhārata | uttamaujāśca vikrāntaḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak

हे भारत! भीम, वृष्णियों के सिंह, युधामन्यु और पराक्रमी उत्तमौजा, इन सबने अलग-अलग शंख बजाए।

श्लोक 41 (7.148.41)

श्रुत्वा महान्तं तं शब्दं धर्मराजो युधिष्ठिरः । सैन्धवं निहतं मेने फल्गुनेन महात्मना ॥

śrutvā mahāntaṃ taṃ śabdaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | saindhavaṃ nihataṃ mene phalgunena mahātmanā

उस महान् शब्द को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने माना कि महात्मा फल्गुन ने सैन्धव को मार डाला है।

श्लोक 42 (7.148.42)

ततो वादित्रघोषेण स्वान्योधान्पर्यहर्षयत् । अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे भारद्वाजं युयुत्सया ॥

tato vāditraghoṣeṇa svānyodhānparyaharṣayat | abhyavartata saṅgrāme bhāradvājaṃ yuyutsayā

तब वाद्यों की ध्वनि से अपने योद्धाओं को हर्षित करता हुआ वह भारद्वाज से लड़ने की इच्छा से युद्ध में बढ़ा।

श्लोक 43 (7.148.43)

ततः प्रववृते राजन्नस्तं गच्छति भास्करे । द्रोणस्य सोमकैः सार्धं सङ्ग्रामो रोमहर्षणः ॥

tataḥ pravavṛte rājannastaṃ gacchati bhāskare | droṇasya somakaiḥ sārdhaṃ saṅgrāmo romaharṣaṇaḥ

हे राजन्! तब सूर्य के अस्त होते-होते द्रोण का सोमकों के साथ रोंगटे खड़े कर देने वाला संग्राम आरम्भ हुआ।

श्लोक 44 (7.148.44)

ते तु सर्वे प्रयत्नेन भारद्वाजं जिघांसवः । सैन्धवे निहते राजन्नयुध्यन्त महारथाः ॥

te tu sarve prayatnena bhāradvājaṃ jighāṃsavaḥ | saindhave nihate rājannayudhyanta mahārathāḥ

हे राजन्! सैन्धव के मारे जाने पर वे सभी महारथी भारद्वाज को मार डालने की इच्छा से पूरे प्रयत्न से लड़े।

श्लोक 45 (7.148.45)

पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा सैन्धवं विनिहत्य च । अयोधयंस्तु ते द्रोणं जयोन्मत्तास्ततस्ततः ॥

pāṇḍavāstu jayaṃ labdhvā saindhavaṃ vinihatya ca | ayodhayaṃstu te droṇaṃ jayonmattāstatastataḥ

पाण्डव विजय पाकर और सैन्धव को मारकर, विजय के मद में चूर होकर, यहाँ-वहाँ द्रोण से युद्ध करते रहे।

श्लोक 46 (7.148.46)

अर्जुनोऽपि ततो योधांस्तावकान्रथसत्तमान् । अयोधयन्महाबाहुर्हत्वा सैन्धवकं नृपम् ॥

arjuno'pi tato yodhāṃstāvakānrathasattamān | ayodhayanmahābāhurhatvā saindhavakaṃ nṛpam

सैन्धव राजा को मारकर महाबाहु अर्जुन भी तब आपके श्रेष्ठ रथियों से युद्ध करने लगा।

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