द्रोण पर्व · अध्याय 149
कृपाचार्य के लिए अर्जुन का पश्चात्ताप; कृष्ण द्वारा रणभूमि-दर्शन
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि जयद्रथ के मारे जाने पर उनके पुत्रों ने क्या किया, और सञ्जय बताते हैं कि कृप और अश्वत्थामा ने अर्जुन पर आक्रमण किया। अपने गुरुजनों को मारना न चाहने वाले अर्जुन केवल मन्द वेग के बाण चलाते हैं, यहाँ तक कि कृप मूर्च्छित हो जाते हैं और सारथि उन्हें हटा ले जाता है; तब अर्जुन गुरु पर प्रहार करने का पश्चात्ताप करते हैं और दुर्योधन के विषय में विदुर की चेतावनी याद करते हैं। कृष्ण उन्हें गले लगाकर उनके कर्म की प्रशंसा करते हैं और धीरे-धीरे रथ हाँकते हुए उन्हें मारे गए राजाओं, गिरे हुए हाथी-घोड़ों और बिखरे शस्त्रों-आभूषणों वाली रणभूमि दिखाते हैं, फिर दोनों युधिष्ठिर को जयद्रथ के वध की सूचना देने जाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.149.1)
तस्मिन्विनिहते वीरे सैन्धवे सव्यसाचिना । मामका यदकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
tasminvinihate vīre saindhave savyasācinā | māmakā yadakurvanta tanmamācakṣva sañjaya
सञ्जय, वीर सैन्धव (जयद्रथ) के सव्यसाची अर्जुन के हाथों मारे जाने पर मेरे पक्ष के लोगों ने क्या किया? वह मुझे बताओ।
श्लोक 2 (7.149.2)
पश्यतां सर्वसैन्यानां मामकानां महारणे । अहन्यत कथं युद्धे सैन्धवः सव्यसाचिना ॥
paśyatāṃ sarvasainyānāṃ māmakānāṃ mahāraṇe | ahanyata kathaṃ yuddhe saindhavaḥ savyasācinā
मेरी सारी सेनाओं के देखते-देखते उस महायुद्ध में सव्यसाची अर्जुन ने सैन्धव को कैसे मार डाला?
श्लोक 3 (7.149.3)
कथं द्रौणिकृपैर्गुप्तः कर्णेन च महारणे । फल्गुनाग्निमुखं घोरं प्रविष्टः साधु सैन्धवः ॥
kathaṃ drauṇikṛpairguptaḥ karṇena ca mahāraṇe | phalgunāgnimukhaṃ ghoraṃ praviṣṭaḥ sādhu saindhavaḥ
उस महायुद्ध में द्रोणपुत्र, कृपाचार्य और कर्ण से रक्षित होते हुए भी सैन्धव फल्गुन के उस भयंकर अग्निमुख में इतनी सरलता से कैसे जा पड़ा?
श्लोक 4 (7.149.4)
तस्मिन्हते महेष्वासे मन्दात्मा स सुयोधनः । भ्रातृभिः सहितः सूत किमकार्षीदनन्तरम् ॥
tasminhate maheṣvāse mandātmā sa suyodhanaḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sūta kimakārṣīdanantaram
हे सूत, उस महाधनुर्धर के मारे जाने पर मन्दबुद्धि सुयोधन ने अपने भाइयों के साथ उसके बाद क्या किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (7.149.5)
सैन्धवं निहतं दृष्ट्वा रणे पार्थेन भारत । अमर्षवशमापन्नः कृपः शारद्वतस्ततः ॥
saindhavaṃ nihataṃ dṛṣṭvā raṇe pārthena bhārata | amarṣavaśamāpannaḥ kṛpaḥ śāradvatastataḥ
हे भारत, रण में पार्थ के हाथों सैन्धव को मरा देखकर शरद्वान् के पुत्र कृप तब क्रोध के वश में आ गए।
श्लोक 6 (7.149.6)
महता शरवर्षेण पाण्डवं समवाकिरत् । द्रौणिश्चाभ्यद्रवद्राजन्रथमास्थाय फल्गुनम् ॥
mahatā śaravarṣeṇa pāṇḍavaṃ samavākirat | drauṇiścābhyadravadrājanrathamāsthāya phalgunam
उन्होंने पाण्डुपुत्र अर्जुन को बाणों की भारी वर्षा से ढक दिया। और हे राजन्, द्रोणपुत्र भी रथ पर चढ़कर फल्गुन पर टूट पड़ा।
श्लोक 7 (7.149.7)
तावेतौ रथिनां श्रेष्ठौ रथाभ्यां रथसत्तमौ । उभावुभयतस्तीक्ष्णैर्विशिखैरभ्यवर्षताम् ॥
tāvetau rathināṃ śreṣṭhau rathābhyāṃ rathasattamau | ubhāvubhayatastīkṣṇairviśikhairabhyavarṣatām
रथियों में श्रेष्ठ और रथ-योद्धाओं में उत्तम वे दोनों अपने-अपने रथ से दोनों ओर से अर्जुन पर तीखे बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 8 (7.149.8)
स तथा शरवर्षाभ्यां सुमहद्भ्यां महाभुजः । पीड्यमानः परामार्तिमगमद्रथिनां वरः ॥
sa tathā śaravarṣābhyāṃ sumahadbhyāṃ mahābhujaḥ | pīḍyamānaḥ parāmārtimagamadrathināṃ varaḥ
उन दोनों की उस भारी बाण-वर्षा से पीड़ित होकर रथियों में श्रेष्ठ वह महाबाहु अर्जुन अत्यन्त कष्ट में पड़ गया।
श्लोक 9 (7.149.9)
सोऽजिघांसुर्गुरुं सङ्ख्ये गुरोस्तनयमेव च । चकाराचार्यकं तत्र कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥
so'jighāṃsurguruṃ saṅkhye gurostanayameva ca | cakārācāryakaṃ tatra kuntīputro dhanañjayaḥ
परन्तु कुन्तीपुत्र धनञ्जय ने युद्ध में अपने गुरु और गुरुपुत्र को मारने की इच्छा न रखते हुए वहाँ गुरुजनों के योग्य आदर ही निभाया।
श्लोक 10 (7.149.10)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्रौणेः शारद्वतस्य च । मन्दवेगानिषूंस्ताभ्यामजिघांसुरवासृजत् ॥
astrairastrāṇi saṃvārya drauṇeḥ śāradvatasya ca | mandavegāniṣūṃstābhyāmajighāṃsuravāsṛjat
उसने अपने अस्त्रों से द्रोणपुत्र और शरद्वान् के पुत्र के अस्त्रों को रोककर, उन्हें मारने की इच्छा न रखते हुए, उन दोनों पर मन्द वेग के बाण छोड़े।
श्लोक 11 (7.149.11)
तेन नातिभृशं त्रस्तौ विशिखैर्भृशपीडितौ । बहुत्वात्तु परामार्तिं शराणां तावगच्छताम् ॥
tena nātibhṛśaṃ trastau viśikhairbhṛśapīḍitau | bahutvāttu parāmārtiṃ śarāṇāṃ tāvagacchatām
उन बाणों से वे दोनों बहुत भयभीत तो नहीं हुए, यद्यपि बुरी तरह घायल हुए; पर बाणों की बहुतायत के कारण उन्हें भारी पीड़ा हुई।
श्लोक 12 (7.149.12)
अथ शारद्वतो राजन्कौन्तेयशरपीडितः । अवासीदद्रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ॥
atha śāradvato rājankaunteyaśarapīḍitaḥ | avāsīdadrathopasthe mūrcchāmabhijagāma ha
तब हे राजन्, कुन्तीपुत्र के बाणों से पीड़ित शरद्वान् के पुत्र रथ के पिछले भाग में बैठ गए और मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 13 (7.149.13)
विह्वलं तमभिज्ञाय भर्तारं शरपीडितम् । हतोऽयमिति च ज्ञात्वा सारथिस्तमपावहत् ॥
vihvalaṃ tamabhijñāya bhartāraṃ śarapīḍitam | hato'yamiti ca jñātvā sārathistamapāvahat
अपने स्वामी को बाणों से पीड़ित और अचेत जानकर तथा ‘यह मारा गया’ ऐसा समझकर सारथि उन्हें रण से हटा ले गया।
श्लोक 14 (7.149.14)
तस्मिन्भग्ने महाराज कृपे शारद्वते युधि । अश्वत्थामाप्यपायासीत्पाण्डवेयाद्रथान्तरम् ॥
tasminbhagne mahārāja kṛpe śāradvate yudhi | aśvatthāmāpyapāyāsītpāṇḍaveyādrathāntaram
हे महाराज, युद्ध में शरद्वान् के पुत्र कृप के हट जाने पर अश्वत्थामा भी पाण्डुपुत्र के रथ के सामने से हटकर दूसरे रथ की ओर चला गया।
श्लोक 15 (7.149.15)
दृष्ट्वा शारद्वतं पार्थो मूर्च्छितं शरपीडितम् । धिग्धिङ्मामिति चैवोक्त्वा कृपणं पर्यदेवयत् । अश्रुपूर्णमुखो दीनो वचनं चेदमब्रवीत् ॥
dṛṣṭvā śāradvataṃ pārtho mūrcchitaṃ śarapīḍitam | dhigdhiṅmāmiti caivoktvā kṛpaṇaṃ paryadevayat | aśrupūrṇamukho dīno vacanaṃ cedamabravīt
शरद्वान् के पुत्र को बाणों से पीड़ित और मूर्च्छित देखकर पार्थ ‘मुझे धिक्कार है, धिक्कार है’ कहकर दीन भाव से विलाप करने लगे। आँसुओं से भीगे मुख वाले उन दुःखी अर्जुन ने यह वचन कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 16 (7.149.16)
पश्यन्निदं महाप्राज्ञः क्षत्ता राजानमुक्तवान् । कुलान्तकरणे पापे जातमात्रे सुयोधने ॥
paśyannidaṃ mahāprājñaḥ kṣattā rājānamuktavān | kulāntakaraṇe pāpe jātamātre suyodhane
यही देखते हुए महाप्राज्ञ क्षत्ता विदुर ने राजा से तब कहा था, जब कुल का नाश करने वाला पापी सुयोधन अभी जन्मा ही था—
श्लोक 17 (7.149.17)
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः । अस्माद्धि कुरुमुख्यानां महदुत्पत्स्यते भयम् ॥
nīyatāṃ paralokāya sādhvayaṃ kulapāṃsanaḥ | asmāddhi kurumukhyānāṃ mahadutpatsyate bhayam
‘इस कुलकलंक को परलोक भेज दिया जाए, यही उचित है; क्योंकि इससे प्रमुख कुरुओं पर बड़ा भय आएगा।’
श्लोक 18 (7.149.18)
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः । तत्कृते ह्यद्य पश्यामि शरतल्पगतं गुरुम् ॥
tadidaṃ samanuprāptaṃ vacanaṃ satyavādinaḥ | tatkṛte hyadya paśyāmi śaratalpagataṃ gurum
उस सत्यवादी का वही वचन आज सच हो गया है; क्योंकि उसी के कारण आज मैं अपने गुरु को बाणशय्या पर पड़ा देख रहा हूँ।
श्लोक 19 (7.149.19)
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम् । को हि ब्राह्मणमाचार्यमभिद्रुह्येत मादृशः ॥
dhigastu kṣātramācāraṃ dhigastu balapauruṣam | ko hi brāhmaṇamācāryamabhidruhyeta mādṛśaḥ
क्षत्रिय के आचार को धिक्कार है, बल और पुरुषार्थ को धिक्कार है! मुझ जैसा कौन अपने ब्राह्मण आचार्य से द्रोह करेगा?
श्लोक 20 (7.149.20)
ऋषिपुत्रो ममाचार्यो द्रोणस्य परमः सखा । एष शेते रथोपस्थे कृपो मद्बाणपीडितः ॥
ṛṣiputro mamācāryo droṇasya paramaḥ sakhā | eṣa śete rathopasthe kṛpo madbāṇapīḍitaḥ
ऋषिपुत्र, मेरे आचार्य, द्रोण के परम मित्र ये कृप मेरे बाणों से पीड़ित होकर रथ के पिछले भाग में पड़े हैं।
श्लोक 21 (7.149.21)
अकामयानेन मया विशिखैरर्दितो भृशम् । अवसीदन्रथोपस्थे प्राणान्पीडयतीव मे ॥
akāmayānena mayā viśikhairardito bhṛśam | avasīdanrathopasthe prāṇānpīḍayatīva me
मेरी इच्छा न होते हुए भी मेरे बाणों से बुरी तरह घायल होकर रथ में निढाल पड़े ये मानो मेरे प्राणों को ही पीड़ा दे रहे हैं।
श्लोक 22 (7.149.22)
पुत्रशोकाभितप्तेन शरैरभ्यर्दितेन च । अभ्यस्तो बहुभिर्बाणैर्दशधर्मगतेन वै ॥
putraśokābhitaptena śarairabhyarditena ca | abhyasto bahubhirbāṇairdaśadharmagatena vai
पुत्र के शोक से जलते हुए, बाणों से पीड़ित और अन्तिम दुर्दशा को पहुँचे हुए मैंने उन पर बहुत-से बाणों से बार-बार प्रहार किया।
श्लोक 23 (7.149.23)
शरार्दितः स हि मया प्रेक्षमाणो महाद्युतिः । शोचयत्येष नियतं भूयः पुत्रवधाद्धि माम् । कृपणं स्वरथे सन्नं पश्य कृष्ण यथागतम् ॥
śarārditaḥ sa hi mayā prekṣamāṇo mahādyutiḥ | śocayatyeṣa niyataṃ bhūyaḥ putravadhāddhi mām | kṛpaṇaṃ svarathe sannaṃ paśya kṛṣṇa yathāgatam
बाणों से पीड़ित वह महातेजस्वी पुरुष, जिसे मैं देखता रह गया, मुझे निश्चय ही पुत्र के वध से भी अधिक शोक में डाल रहा है। हे कृष्ण, देखो, अपने रथ में पड़े इन बेचारे कृप की कैसी दशा हो गई है।
श्लोक 24 (7.149.24)
उपाकृत्य तु वै विद्यामाचार्येभ्यो नरर्षभाः । प्रयच्छन्तीह ये कामान्देवत्वमुपयान्ति ते ॥
upākṛtya tu vai vidyāmācāryebhyo nararṣabhāḥ | prayacchantīha ye kāmāndevatvamupayānti te
हे नरश्रेष्ठो, जो लोग आचार्यों से विद्या पाकर उन्हें उनकी इच्छित वस्तुएँ देते हैं, वे देवत्व को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 25 (7.149.25)
ये च विद्यामुपादाय गुरुभ्यः पुरुषाधमाः । घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तास्ते वै निरयगामिनः ॥
ye ca vidyāmupādāya gurubhyaḥ puruṣādhamāḥ | ghnanti tāneva durvṛttāste vai nirayagāminaḥ
पर जो अधम पुरुष गुरुओं से विद्या लेकर उन्हीं को मारते हैं, वे दुराचारी नरक में जाने वाले होते हैं।
श्लोक 26 (7.149.26)
तदिदं नरकायाद्य कृतं कर्म मया ध्रुवम् । आचार्यं शरवर्षेण रथे सादयता कृपम् ॥
tadidaṃ narakāyādya kṛtaṃ karma mayā dhruvam | ācāryaṃ śaravarṣeṇa rathe sādayatā kṛpam
इस प्रकार रथ में अपने आचार्य कृप को बाणों की वर्षा से गिराकर मैंने आज निश्चय ही नरक में ले जाने वाला कर्म किया है।
श्लोक 27 (7.149.27)
यत्तत्पूर्वमुपाकुर्वन्नस्त्रं मामब्रवीत्कृपः । न कथञ्चन कौरव्य प्रहर्तव्यं गुराविति ॥
yattatpūrvamupākurvannastraṃ māmabravītkṛpaḥ | na kathañcana kauravya prahartavyaṃ gurāviti
जब कृप ने पहले मुझे अस्त्रविद्या सिखाई थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था—‘हे कुरुवंशी, गुरु पर किसी भी प्रकार प्रहार नहीं करना चाहिए।’
श्लोक 28 (7.149.28)
तदिदं वचनं साधोराचार्यस्य महात्मनः । नानुष्ठितं तमेवाजौ विशिखैरभिवर्षता ॥
tadidaṃ vacanaṃ sādhorācāryasya mahātmanaḥ | nānuṣṭhitaṃ tamevājau viśikhairabhivarṣatā
अपने उन साधु और महात्मा आचार्य के उस वचन का मैंने पालन नहीं किया, क्योंकि रण में मैंने उन्हीं पर बाण बरसाए।
श्लोक 29 (7.149.29)
नमस्तस्मै सुपूज्याय गौतमायापलायिने । धिगस्तु मम वार्ष्णेय यदस्मै प्रहराम्यहम् ॥
namastasmai supūjyāya gautamāyāpalāyine | dhigastu mama vārṣṇeya yadasmai praharāmyaham
कभी पीछे न हटने वाले उन परम पूज्य गौतम को नमस्कार है। हे वार्ष्णेय, मुझे धिक्कार है, जो मैं उन पर प्रहार करता हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (7.149.30)
तथा विलपमाने तु सव्यसाचिनि तं प्रति । ततो राजन्हृषीकेशः सङ्ग्रामशिरसि स्थितम् । तीर्णप्रतिज्ञं बीभत्सुं परिष्वज्यैनमब्रवीत् ॥
tathā vilapamāne tu savyasācini taṃ prati | tato rājanhṛṣīkeśaḥ saṅgrāmaśirasi sthitam | tīrṇapratijñaṃ bībhatsuṃ pariṣvajyainamabravīt
सव्यसाची जब उनके विषय में इस प्रकार विलाप कर रहे थे, तब हे राजन्, हृषीकेश ने युद्ध के अग्रभाग में खड़े, प्रतिज्ञा पूरी कर चुके बीभत्सु को गले लगाकर उनसे कहा—
वासुदेव उवाच
श्लोक 31 (7.149.31)
दिष्ट्या सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वया । दिष्ट्या विनिहतः पापो वृद्धक्षत्रः सहात्मजः ॥
diṣṭyā sampāditā jiṣṇo pratijñā mahatī tvayā | diṣṭyā vinihataḥ pāpo vṛddhakṣatraḥ sahātmajaḥ
हे जिष्णु, सौभाग्य से तुमने अपनी महान प्रतिज्ञा पूरी कर ली। सौभाग्य से पापी वृद्धक्षत्र अपने पुत्र सहित मारा गया।
श्लोक 32 (7.149.32)
धार्तराष्ट्रबलं प्राप्य देवसेनापि भारत । सीदेत समरे जिष्णो नात्र कार्या विचारणा ॥
dhārtarāṣṭrabalaṃ prāpya devasenāpi bhārata | sīdeta samare jiṣṇo nātra kāryā vicāraṇā
हे भारत, धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेना से भिड़कर देवताओं की सेना भी युद्ध में डगमगा जाती — हे जिष्णु, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 33 (7.149.33)
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तयन्पुरुषं क्वचित् । त्वदृते पुरुषव्याघ्र य एतद्योधयेद्बलम् ॥
na taṃ paśyāmi lokeṣu cintayanpuruṣaṃ kvacit | tvadṛte puruṣavyāghra ya etadyodhayedbalam
हे पुरुषव्याघ्र, सोचने पर भी मुझे लोकों में तुम्हारे सिवा कोई ऐसा पुरुष कहीं नहीं दिखता जो इस सेना से युद्ध कर सके।
श्लोक 34 (7.149.34)
महाप्रभावा बहवस्त्वया तुल्याधिकापि वा । समेताः पृथिवीपाला धार्तराष्ट्रस्य कारणात् ॥
mahāprabhāvā bahavastvayā tulyādhikāpi vā | sametāḥ pṛthivīpālā dhārtarāṣṭrasya kāraṇāt
धृतराष्ट्र के पुत्र के लिए बहुत-से महाप्रभावशाली राजा, जो तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर थे, एकत्र हुए थे।
श्लोक 35 (7.149.35)
ते त्वां प्राप्य रणे क्रुद्धा नाभ्यवर्तन्त दंशिताः । तव वीर्यं बलं चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् ॥
te tvāṃ prāpya raṇe kruddhā nābhyavartanta daṃśitāḥ | tava vīryaṃ balaṃ caiva rudraśakrāntakopamam
फिर भी कवच पहने हुए और क्रुद्ध होकर भी वे रण में तुम्हारे सामने टिक न सके। तुम्हारा पराक्रम और बल रुद्र, इन्द्र और यम के समान है।
श्लोक 36 (7.149.36)
नेदृशं शक्नुयात्कश्चिद्रणे कर्तुं पराक्रमम् । यादृशं कृतवानद्य त्वमेकः शत्रुतापनः ॥
nedṛśaṃ śaknuyātkaścidraṇe kartuṃ parākramam | yādṛśaṃ kṛtavānadya tvamekaḥ śatrutāpanaḥ
शत्रुओं को तपाने वाले तुम अकेले ने आज रण में जैसा पराक्रम किया है, वैसा कोई और नहीं कर सकता।
श्लोक 37 (7.149.37)
एवमेव हते कर्णे सानुबन्धे दुरात्मनि । वर्धयिष्यामि भूयस्त्वां विजितारिं हतद्विषम् ॥
evameva hate karṇe sānubandhe durātmani | vardhayiṣyāmi bhūyastvāṃ vijitāriṃ hatadviṣam
इसी प्रकार जब दुरात्मा कर्ण अपने बन्धुओं सहित मारा जाएगा, तब शत्रुओं को जीते और मारे हुए तुम्हारा मैं फिर अभिनन्दन करूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (7.149.38)
तमर्जुनः प्रत्युवाच प्रसादात्तव माधव । प्रतिज्ञेयं मया तीर्णा विबुधैरपि दुस्तरा ॥
tamarjunaḥ pratyuvāca prasādāttava mādhava | pratijñeyaṃ mayā tīrṇā vibudhairapi dustarā
अर्जुन ने उन्हें उत्तर दिया—‘हे माधव, आपकी कृपा से मैंने यह प्रतिज्ञा पार कर ली, जिसे पार करना देवताओं के लिए भी कठिन है।’
अर्जुन उवाच
श्लोक 39 (7.149.39)
अनाश्चर्यो जयस्तेषां येषां नाथोऽसि केशव । त्वत्प्रसादान्महीं कृत्स्नां संप्राप्स्यति युधिष्ठिरः ॥
anāścaryo jayasteṣāṃ yeṣāṃ nātho'si keśava | tvatprasādānmahīṃ kṛtsnāṃ saṃprāpsyati yudhiṣṭhiraḥ
हे केशव, जिनके आप स्वामी हैं, उनकी जय में कोई आश्चर्य नहीं। आपकी कृपा से युधिष्ठिर सारी पृथ्वी प्राप्त करेंगे।
श्लोक 40 (7.149.40)
तवैष भारो धार्ष्णेय तवैव विजयः प्रभो । वर्धनीयास्तव वयं प्रेष्याश्च मधुसूदन ॥
tavaiṣa bhāro dhārṣṇeya tavaiva vijayaḥ prabho | vardhanīyāstava vayaṃ preṣyāśca madhusūdana
हे धार्ष्णेय, यह भार आपका है, और विजय भी आपकी ही है, प्रभो। हे मधुसूदन, हम आपके पालनीय और आपके सेवक हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 41 (7.149.41)
एवमुक्तस्ततः कृष्णः शनकैर्वाहयन्हयान् । दर्शयामास पार्थाय क्रूरमायोधनं महत् ॥
evamuktastataḥ kṛṣṇaḥ śanakairvāhayanhayān | darśayāmāsa pārthāya krūramāyodhanaṃ mahat
ऐसा कहे जाने पर कृष्ण घोड़ों को धीरे-धीरे हाँकते हुए पार्थ को वह विशाल और भयानक रणभूमि दिखाने लगे।
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 42 (7.149.42)
प्रार्थयन्तो जये युद्धे प्रथितं च महद्यशः । पृथिव्यां शेरते शूराः पार्थिवास्त्वच्छरैर्हताः ॥
prārthayanto jaye yuddhe prathitaṃ ca mahadyaśaḥ | pṛthivyāṃ śerate śūrāḥ pārthivāstvaccharairhatāḥ
युद्ध में विजय और महान यश की इच्छा रखने वाले राजा आपके बाणों से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं।
श्लोक 43 (7.149.43)
विकीर्णशस्त्राभरणा विपन्नाश्वरथद्विपाः । सञ्छिन्नभिन्नमर्माणो वैक्लव्यं परमं गताः ॥
vikīrṇaśastrābharaṇā vipannāśvarathadvipāḥ | sañchinnabhinnamarmāṇo vaiklavyaṃ paramaṃ gatāḥ
उनके शस्त्र और आभूषण बिखरे हुए हैं, घोड़े, रथ और हाथी नष्ट हो गए हैं, मर्मस्थान कट-फट गए हैं और वे अत्यन्त विवशता को पहुँच गए हैं।
श्लोक 44 (7.149.44)
ससत्वा गतसत्वाश्च प्रभया परया युताः । सजीवा इव लक्ष्यन्ते गतसत्वा नराधिपाः ॥
sasatvā gatasatvāśca prabhayā parayā yutāḥ | sajīvā iva lakṣyante gatasatvā narādhipāḥ
कुछ में अभी प्राण हैं, कुछ प्राणहीन हैं, फिर भी परम कान्ति से युक्त वे मरे हुए नरेश जीवित-से दिखाई देते हैं।
श्लोक 45 (7.149.45)
तेषां शरैः स्वर्णपुङ्खैः शस्त्रैश्च विविधैः शितैः । वाहनैरायुधैश्चैव सम्पूर्णां पश्य मेदिनीम् ॥
teṣāṃ śaraiḥ svarṇapuṅkhaiḥ śastraiśca vividhaiḥ śitaiḥ | vāhanairāyudhaiścaiva sampūrṇāṃ paśya medinīm
उनके सोने के पंखों वाले बाणों, तरह-तरह के तीखे शस्त्रों, वाहनों और हथियारों से भरी हुई पृथ्वी को देखो,
श्लोक 46 (7.149.46)
वर्मभिश्चर्मभिर्हारैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । उष्णीषैर्मकुटैः स्रग्भिश्चूडामणिभिरम्बरैः ॥
varmabhiścarmabhirhāraiḥ śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | uṣṇīṣairmakuṭaiḥ sragbhiścūḍāmaṇibhirambaraiḥ
कवचों, ढालों, हारों, कुण्डलों सहित कटे सिरों, पगड़ियों, मुकुटों, मालाओं, चूड़ामणियों और वस्त्रों से भरी,
श्लोक 47 (7.149.47)
कण्ठसूत्रैरङ्गदैश्च निष्कैरपि च सप्रभैः । अन्यैश्चाभरणैश्चित्रैर्भाति भारत मेदिनी ॥
kaṇṭhasūtrairaṅgadaiśca niṣkairapi ca saprabhaiḥ | anyaiścābharaṇaiścitrairbhāti bhārata medinī
कण्ठहारों, भुजबन्दों, चमकते निष्कों और अन्य विचित्र आभूषणों से, हे भारत, यह पृथ्वी शोभित हो रही है।
श्लोक 48 (7.149.48)
अनुकर्षैरुपासङ्गैः पताकाभिर्ध्वजैस्तथा । उपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकबन्धुरैः ॥
anukarṣairupāsaṅgaiḥ patākābhirdhvajaistathā | upaskarairadhiṣṭhānairīṣādaṇḍakabandhuraiḥ
रथ के निचले काठों और तरकसों, पताकाओं और ध्वजों, साज-सामान और आसनों तथा सुन्दर ईषादण्डों से,
श्लोक 49 (7.149.49)
चक्रैः प्रमथितैश्चित्रैरक्षैश्च बहुधा रणे । युगैर्योक्त्रैः कलापैश्च धनुर्भिः सायकैस्तथा ॥
cakraiḥ pramathitaiścitrairakṣaiśca bahudhā raṇe | yugairyoktraiḥ kalāpaiśca dhanurbhiḥ sāyakaistathā
रण में टूटे हुए तरह-तरह के पहियों और कई प्रकार से टूटी धुरियों, जुओं, रस्सियों और तरकसों, धनुषों और बाणों से,
श्लोक 50 (7.149.50)
परिस्तोमैः कुथाभिश्च परिघैरङ्कुशैस्तथा । शक्तिभिर्भिण्डिपालैश्च तूणैः शूलैः परश्वथैः ॥
paristomaiḥ kuthābhiśca parighairaṅkuśaistathā | śaktibhirbhiṇḍipālaiśca tūṇaiḥ śūlaiḥ paraśvathaiḥ
हाथियों की झूलों और घोड़ों की चादरों, परिघों और अंकुशों, शक्तियों और भिन्दिपालों, तरकसों, शूलों और फरसों से,
श्लोक 51 (7.149.51)
प्रासैश्च तोमरैश्चैव कुन्तैर्यष्टिभिरेव च । शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभिः खङ्गैः परशुभिस्तथा ॥
prāsaiśca tomaraiścaiva kuntairyaṣṭibhireva ca | śataghnībhirbhuśuṇḍībhiḥ khaṅgaiḥ paraśubhistathā
प्रासों, तोमरों, कुन्तों और लाठियों, शतघ्नियों और भुशुण्डियों, तलवारों और कुल्हाड़ियों से,
श्लोक 52 (7.149.52)
मुसलैर्मुद्गरैश्चैव गदाभिः कुणपैस्तथा । सुवर्णविकृताभिश्च कशाभिर्भरतर्षभ ॥
musalairmudgaraiścaiva gadābhiḥ kuṇapaistathā | suvarṇavikṛtābhiśca kaśābhirbharatarṣabha
मूसलों, मुद्गरों, गदाओं और कुणपों तथा हे भरतश्रेष्ठ, सोने से मढ़े कोड़ों से,
श्लोक 53 (7.149.53)
घण्टाभिश्च गजेन्द्राणां भाण्डैश्च विविधैरपि । स्रग्भिश्च नानाभरणैर्वस्त्रैश्चैव महाधनैः । अपविद्धैर्बभौ भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव शारदी ॥
ghaṇṭābhiśca gajendrāṇāṃ bhāṇḍaiśca vividhairapi | sragbhiśca nānābharaṇairvastraiścaiva mahādhanaiḥ | apaviddhairbabhau bhūmirgrahairdyauriva śāradī
गजराजों के घण्टों और नाना प्रकार के साज-सामान, मालाओं, विविध आभूषणों और बहुमूल्य वस्त्रों से — इन सब बिखरी वस्तुओं से पृथ्वी ग्रहों से भरे शरद् ऋतु के आकाश की तरह शोभित हुई।
श्लोक 54 (7.149.54)
पृथिव्यां पृथिवीहेतोः पृथिवीपतयो हताः । पृथिवीमुपगुह्याङ्गैः सुप्ताः कान्तामिव प्रियाम् ॥
pṛthivyāṃ pṛthivīhetoḥ pṛthivīpatayo hatāḥ | pṛthivīmupaguhyāṅgaiḥ suptāḥ kāntāmiva priyām
पृथ्वी के लिए, पृथ्वी पर, पृथ्वी के स्वामी मारे गए हैं; अपने अंगों से पृथ्वी का आलिंगन किए वे ऐसे सोये हैं जैसे प्रिय पत्नी को गले लगाए हों।
श्लोक 55 (7.149.55)
इमांश्च गिरिकूटाभान्नागानैरावतोपमान् । क्षरतः शोणितं भूरि शस्त्रच्छेददरीमुखैः । दरीमुखैरिव गिरीन्गैरिकाम्बुपरिस्रवान् ॥
imāṃśca girikūṭābhānnāgānairāvatopamān | kṣarataḥ śoṇitaṃ bhūri śastracchedadarīmukhaiḥ | darīmukhairiva girīngairikāmbuparisravān
पर्वत-शिखरों जैसे, ऐरावत के समान इन हाथियों को भी देखो, जिनके शस्त्रों से कटे घावों के मुखों से बहुत रक्त बह रहा है, मानो गुफाओं के मुखों से गेरू-मिला जल बहाते पर्वत हों।
श्लोक 56 (7.149.56)
तांश्च बाणहतान्वीर पश्य निष्टनतः क्षितौ । हयांश्च पतितान्पश्य स्वर्णभाण्डविभूषितान् ॥
tāṃśca bāṇahatānvīra paśya niṣṭanataḥ kṣitau | hayāṃśca patitānpaśya svarṇabhāṇḍavibhūṣitān
हे वीर, बाणों से मारे गए उन्हें भी देखो जो धरती पर कराह रहे हैं, और सोने के साज से सजे गिरे हुए घोड़ों को भी देखो।
श्लोक 57 (7.149.57)
गन्धर्वनगराकारान्रथांश्च निहतेश्वरान् । छिन्नध्वजपताकाक्षान्विचक्रान्हतसारथीन् ॥
gandharvanagarākārānrathāṃśca nihateśvarān | chinnadhvajapatākākṣānvicakrānhatasārathīn
गन्धर्वनगरों जैसे उन रथों को देखो जिनके स्वामी मारे गए, जिनके ध्वज, पताकाएँ और धुरियाँ कट गई हैं, जो पहियों से हीन हैं और जिनके सारथि मर चुके हैं,
श्लोक 58 (7.149.58)
निकृत्तकूबरयुगान्भग्नेषान्बन्धुरान्प्रभो । पश्य पार्थ हयान्भूमौ विमानोपमदर्शनान् ॥
nikṛttakūbarayugānbhagneṣānbandhurānprabho | paśya pārtha hayānbhūmau vimānopamadarśanān
जिनके कूबर और जुए कट गए और ईषादण्ड टूट गए, फिर भी जो सुन्दर हैं। हे प्रभो, हे पार्थ, विमानों जैसे सुन्दर दिखने वाले घोड़ों को भी धरती पर पड़ा देखो।
श्लोक 59 (7.149.59)
पत्तींश्च निहतान्वीर शतशोऽथ सहस्रशः । धनुर्भृतश्चर्मभृतः शयानान्रुधिरोक्षितान् ॥
pattīṃśca nihatānvīra śataśo'tha sahasraśaḥ | dhanurbhṛtaścarmabhṛtaḥ śayānānrudhirokṣitān
हे वीर, धनुष और ढाल धारण किए, रक्त से लथपथ पड़े सैकड़ों-हजारों मारे गए पैदल सैनिकों को देखो,
श्लोक 60 (7.149.60)
महीमालिङ्ग्य सर्वाङ्गैः पांसुध्वस्तशिरोरुहान् । पश्य योधान्महाबाहो त्वच्छरैर्भिन्नविग्रहान् ॥
mahīmāliṅgya sarvāṅgaiḥ pāṃsudhvastaśiroruhān | paśya yodhānmahābāho tvaccharairbhinnavigrahān
जो सारे अंगों से पृथ्वी का आलिंगन किए हैं और जिनके केश धूल से भर गए हैं। हे महाबाहो, अपने बाणों से छिन्न-भिन्न शरीर वाले उन योद्धाओं को देखो।
श्लोक 61 (7.149.61)
निपातितद्विपरथाजिसङ्कुलम् । असृग्वसापिशितसमृद्धकर्दमम् । निशाचरश्ववृकपिशाचमोदनं । महीतलं नरवर पश्य दुर्दृशम् ॥
nipātitadviparathājisaṅkulam | asṛgvasāpiśitasamṛddhakardamam | niśācaraśvavṛkapiśācamodanaṃ | mahītalaṃ naravara paśya durdṛśam
हे नरश्रेष्ठ, गिरे हुए हाथियों और रथों से रणभूमि में पटी हुई, रक्त, चर्बी और मांस से गाढ़े कीचड़ वाली तथा रात्रिचर राक्षसों, कुत्तों, भेड़ियों और पिशाचों का भोज बनी इस भयावह भूमि को देखो।
श्लोक 62 (7.149.62)
इदं महत्त्वय्युपपद्यते प्रभो । रणाजिरे कर्म यशोऽभिवर्धनम् । शतक्रतौ चापि च देवसत्तमे । महाहवे जघ्नुषि दैत्यदानवान् ॥
idaṃ mahattvayyupapadyate prabho | raṇājire karma yaśo'bhivardhanam | śatakratau cāpi ca devasattame | mahāhave jaghnuṣi daityadānavān
हे प्रभो, रणभूमि में यश बढ़ाने वाला यह महान कर्म तुम्हीं से सम्भव है, जैसे देवश्रेष्ठ शतक्रतु इन्द्र से महायुद्ध में दैत्यों और दानवों को मारते समय हुआ था।
सञ्जय उवाच
श्लोक 63 (7.149.63)
एवं सन्दर्शयन्कृष्णो रणभूमिं किरीटिने । स्वैः समेतः समुदितैः पाञ्चजन्यं व्यनादयत् ॥
evaṃ sandarśayankṛṣṇo raṇabhūmiṃ kirīṭine | svaiḥ sametaḥ samuditaiḥ pāñcajanyaṃ vyanādayat
इस प्रकार किरीटी अर्जुन को रणभूमि दिखाते हुए कृष्ण ने अपने प्रसन्न साथियों के साथ मिलकर पाञ्चजन्य शंख बजाया।
श्लोक 64 (7.149.64)
सात्यकिः पार्थमभ्यायाद्भीमसेनश्च पाण्डवः । युधामन्यूत्तमौजौ च पाञ्चालस्यात्मजावुभौ ॥
sātyakiḥ pārthamabhyāyādbhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | yudhāmanyūttamaujau ca pāñcālasyātmajāvubhau
सात्यकि पार्थ के पास आया, पाण्डव भीमसेन भी आया, और पाञ्चाल राजा के दोनों पुत्र युधामन्यु और उत्तमौजा भी आए।
श्लोक 65 (7.149.65)
ते निवार्य शरैर्द्रौणिं कर्णं च सह भूमिपैः । आगच्छन्रथिनश्चैव यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥
te nivārya śarairdrauṇiṃ karṇaṃ ca saha bhūmipaiḥ | āgacchanrathinaścaiva yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ
वे रथी द्रोणपुत्र और कर्ण को राजाओं सहित बाणों से रोककर वहाँ चल पड़े जहाँ राजा युधिष्ठिर थे।
श्लोक 66 (7.149.66)
स दर्शयन्नेव किरीटिनेऽरिहा । जनार्दनस्तामरिभूमिमञ्जसा । अजातशत्रुं समुपेत्य पाण्डवं । निवेदयामास हतं जयद्रथम् ॥
sa darśayanneva kirīṭine'rihā | janārdanastāmaribhūmimañjasā | ajātaśatruṃ samupetya pāṇḍavaṃ | nivedayāmāsa hataṃ jayadratham
शत्रुहन्ता जनार्दन ने किरीटी अर्जुन को वह शत्रु-भूमि इस प्रकार दिखाते हुए शीघ्र अजातशत्रु पाण्डव युधिष्ठिर के पास पहुँचकर उन्हें जयद्रथ के मारे जाने की सूचना दी।