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द्रोण पर्व · अध्याय 150

युधिष्ठिर द्वारा कृष्ण और अर्जुन का आलिंगन

कृष्ण और अर्जुन युधिष्ठिर के पास जाकर जयद्रथ के वध की सूचना देते हैं; राजा आनन्द के आँसुओं के साथ उन्हें गले लगाते हैं और कृष्ण को प्रत्येक विजय का मूल तथा परम पुरुष बताकर उनकी विस्तार से स्तुति करते हैं। कृष्ण उत्तर देते हैं कि यह कार्य युधिष्ठिर की तपस्या और अर्जुन के कौशल से सिद्ध हुआ, और युधिष्ठिर अर्जुन को सान्त्वना देते हैं। युधिष्ठिर कहते हैं कि कौरव कृष्ण के क्रोध से नष्ट हो रहे हैं, और भगवान उत्तर देते हैं कि युधिष्ठिर के क्रुद्ध होने से वे नष्ट होकर ही रहेंगे। फिर भीम और सात्यकि राजा को प्रणाम करते हैं, और वे द्रोण, कृतवर्मा, कर्ण तथा शल्य पर उनकी विजयों का अभिनन्दन करते हैं; सारी पाण्डव सेना हर्षित होकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाती है।

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.150.1)

ततो राजानमभ्येत्य धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । ववन्दे सम्प्रहृष्टात्मा हते पार्थेन सैन्धवे ॥

tato rājānamabhyetya dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | vavande samprahṛṣṭātmā hate pārthena saindhave

फिर पार्थ के हाथों सैन्धव के मारे जाने से अत्यन्त हर्षित मन से उसने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (7.150.2)

दिष्ट्या वर्धसि राजेन्द्र हतशत्रुर्नरोत्तम । दिष्ट्या निस्तीर्णवांश्चैव प्रतिज्ञामनुजस्तव ॥

diṣṭyā vardhasi rājendra hataśatrurnarottama | diṣṭyā nistīrṇavāṃścaiva pratijñāmanujastava

‘हे राजेन्द्र, सौभाग्य से आप बढ़ रहे हैं; हे नरश्रेष्ठ, आपका शत्रु मारा गया! सौभाग्य से आपके छोटे भाई ने अपनी प्रतिज्ञा पार कर ली।’

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (7.150.3)

स त्वेवमुक्तः कृष्णेन हृष्टः परपुरञ्जयः । ततो युधिष्ठिरो राजा रथादाप्लुत्य भारत । पर्यष्वजत्तदा कृष्णावानन्दाश्रुपरिप्लुतः ॥

sa tvevamuktaḥ kṛṣṇena hṛṣṭaḥ parapurañjayaḥ | tato yudhiṣṭhiro rājā rathādāplutya bhārata | paryaṣvajattadā kṛṣṇāvānandāśrupariplutaḥ

कृष्ण के इस प्रकार कहने पर शत्रुनगरों को जीतने वाले वे हर्षित हुए। तब हे भारत, राजा युधिष्ठिर रथ से कूदकर उतरे और आनन्द के आँसुओं से भीगे हुए दोनों कृष्णों को गले लगा लिया।

श्लोक 4 (7.150.4)

प्रमृज्य वदनं शुभ्रं पुण्डरीकसमप्रभम् । अब्रवीद्वासुदेवं च पाण्डवं च धनञ्जयम् ॥

pramṛjya vadanaṃ śubhraṃ puṇḍarīkasamaprabham | abravīdvāsudevaṃ ca pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam

श्वेत कमल के समान दीप्त अपने उज्ज्वल मुख को पोंछकर वे वासुदेव और पाण्डव धनञ्जय से बोले—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (7.150.5)

प्रियमेतदुपश्रुत्य त्वत्तः पुष्करलोचन । नान्तं गच्छामि हर्षस्य तितीर्षुरुदधेरिव ॥

priyametadupaśrutya tvattaḥ puṣkaralocana | nāntaṃ gacchāmi harṣasya titīrṣurudadheriva

हे कमलनयन, आपसे यह प्रिय समाचार सुनकर मैं अपने हर्ष का अन्त नहीं पाता, जैसे समुद्र पार करने की इच्छा रखने वाला उसका अन्त नहीं पाता।

श्लोक 6 (7.150.6)

अत्यद्भुतमिदं कृष्ण कृतं पार्थेन धीमता । दिष्ट्या पश्यामि सङ्ग्रामे तीर्णभारौ महारथौ ॥

atyadbhutamidaṃ kṛṣṇa kṛtaṃ pārthena dhīmatā | diṣṭyā paśyāmi saṅgrāme tīrṇabhārau mahārathau

हे कृष्ण, बुद्धिमान पार्थ ने यह अत्यन्त अद्भुत कार्य किया है। सौभाग्य से मैं युद्ध में अपने भार से पार हुए दोनों महारथियों को देख रहा हूँ।

श्लोक 7 (7.150.7)

दिष्ट्या च निहतः पापः सैन्धवः पुरुषाधमः । दिष्ट्या शत्रुगणाश्चैव निमग्नाः शोकसागरे ॥

diṣṭyā ca nihataḥ pāpaḥ saindhavaḥ puruṣādhamaḥ | diṣṭyā śatrugaṇāścaiva nimagnāḥ śokasāgare

सौभाग्य से नराधम पापी सैन्धव मारा गया, और सौभाग्य से शत्रुओं के दल शोक के सागर में डूब गए।

श्लोक 8 (7.150.8)

कृष्ण दिष्ट्या मम प्रीतिर्महती प्रतिपादिता । त्वया गुप्तेन गोविन्द घ्नता पापं जयद्रथम् ॥

kṛṣṇa diṣṭyā mama prītirmahatī pratipāditā | tvayā guptena govinda ghnatā pāpaṃ jayadratham

हे कृष्ण, सौभाग्य से मुझे बड़ा आनन्द मिला है — हे गोविन्द, आपसे रक्षित उस अर्जुन के द्वारा, जिसने पापी जयद्रथ को मारा।

श्लोक 9 (7.150.9)

किन्तु नात्यद्भुतं तेषां येषां नस्त्वं समाश्रयः । न तेषां दुष्करं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते । सर्वलोकगुरुर्येषां त्वं नाथो मधुसूदन ॥

kintu nātyadbhutaṃ teṣāṃ yeṣāṃ nastvaṃ samāśrayaḥ | na teṣāṃ duṣkaraṃ kiñcittriṣu lokeṣu vidyate | sarvalokagururyeṣāṃ tvaṃ nātho madhusūdana

फिर भी जिनके आप आश्रय हैं, उनके लिए यह बहुत अद्भुत नहीं है। हे मधुसूदन, जिनके नाथ समस्त लोकों के गुरु आप हैं, उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी कठिन नहीं।

श्लोक 10 (7.150.10)

त्वत्प्रसादाद्धि गोविन्द वयं जेष्यामहे रिपून् । यथा पुरा प्रसादात्ते दानवान्पाकशासनः ॥

tvatprasādāddhi govinda vayaṃ jeṣyāmahe ripūn | yathā purā prasādātte dānavānpākaśāsanaḥ

हे गोविन्द, आपकी कृपा से हम शत्रुओं को जीतेंगे, जैसे पूर्वकाल में आपकी कृपा से इन्द्र ने दानवों को जीता था।

श्लोक 11 (7.150.11)

पृथिव्या विजयो वापि त्रैलोक्यविजयोऽपि वा । ध्रुवो हि तेषां वार्ष्णेय येषां तुष्टोऽसि मानद ॥

pṛthivyā vijayo vāpi trailokyavijayo'pi vā | dhruvo hi teṣāṃ vārṣṇeya yeṣāṃ tuṣṭo'si mānada

हे मान देने वाले वृष्णिवंशी, जिन पर आप प्रसन्न हैं, उनके लिए पृथ्वी पर या तीनों लोकों पर विजय निश्चित है।

श्लोक 12 (7.150.12)

न तेषां विद्यते पापं सङ्ग्रामे वा पराजयः । त्रिदशेश्वर नाथस्त्वं येषां तुष्टोऽसि माधव ॥

na teṣāṃ vidyate pāpaṃ saṅgrāme vā parājayaḥ | tridaśeśvara nāthastvaṃ yeṣāṃ tuṣṭo'si mādhava

हे माधव, जिन पर आप प्रसन्न हैं, उन्हें न पाप लगता है, न युद्ध में पराजय होती है; हे देवेश्वर, आप उनके नाथ हैं।

श्लोक 13 (7.150.13)

त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शक्रः सुरगणेश्वरः । त्रैलोक्यविजयं श्रीमान्प्राप्तवान्रणमूर्धनि ॥

tvatprasādāddhṛṣīkeśa śakraḥ suragaṇeśvaraḥ | trailokyavijayaṃ śrīmānprāptavānraṇamūrdhani

हे हृषीकेश, आपकी कृपा से ही देवगणों के स्वामी श्रीमान् इन्द्र ने युद्ध के अग्रभाग में तीनों लोकों पर विजय पाई।

श्लोक 14 (7.150.14)

तव चैव प्रसादेन त्रिदशास्त्रिदशेश्वराः । अमरत्वं गताः कृष्ण लोकांश्चाश्नुवतेऽक्षयान् ॥

tava caiva prasādena tridaśāstridaśeśvarāḥ | amaratvaṃ gatāḥ kṛṣṇa lokāṃścāśnuvate'kṣayān

हे कृष्ण, आपकी कृपा से ही देवता और उनके स्वामी अमर हुए और अक्षय लोकों का भोग करते हैं।

श्लोक 15 (7.150.15)

स्थितः सर्वात्मना नित्यं प्रियेषु च हितेषु च । त्वां चैवास्माभिराश्रित्य कृतः शस्त्रसमुद्यमः । सुरैरिवासुरवधे शक्रं शक्रानुजाहवे ॥

sthitaḥ sarvātmanā nityaṃ priyeṣu ca hiteṣu ca | tvāṃ caivāsmābhirāśritya kṛtaḥ śastrasamudyamaḥ | surairivāsuravadhe śakraṃ śakrānujāhave

आप सदा पूरे मन से हमारे प्रिय और हित में लगे रहे हैं; आपका आश्रय लेकर ही हमने शस्त्र उठाए, जैसे असुरों के वध के समय देवताओं ने इन्द्र का आश्रय लिया था — हे इन्द्र के अनुज, इस युद्ध में।

श्लोक 16 (7.150.16)

असंभाव्यमिदं कर्म देवैरपि जनार्दन । त्वद्बुद्धिबलवीर्येण कृतवानेष फल्गुनः ॥

asaṃbhāvyamidaṃ karma devairapi janārdana | tvadbuddhibalavīryeṇa kṛtavāneṣa phalgunaḥ

हे जनार्दन, यह कर्म तो देवताओं के लिए भी कल्पना से परे है; इस फल्गुन ने आपकी बुद्धि, बल और वीर्य से इसे कर दिखाया।

श्लोक 17 (7.150.17)

बाल्यात्प्रभृति ते कृष्ण कर्माणि श्रुतवानहम् । अमानुषाणि दिव्यानि महान्ति च बहूनि च । तदैवाज्ञासिषं शत्रून्हतान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥

bālyātprabhṛti te kṛṣṇa karmāṇi śrutavānaham | amānuṣāṇi divyāni mahānti ca bahūni ca | tadaivājñāsiṣaṃ śatrūnhatānprāptāṃ ca medinīm

हे कृष्ण, बचपन से ही मैं आपके अलौकिक, दिव्य, महान और अनेक कर्मों के विषय में सुनता आया हूँ। इसीलिए मैंने तभी जान लिया था कि शत्रु मारे जा चुके और पृथ्वी हमें मिल चुकी है।

श्लोक 18 (7.150.18)

त्वत्प्रसादसमुत्थेन विक्रमेणारिसूदन । सुरेशत्वं गतः शक्रो हत्वा दैत्यान्सहस्रशः ॥

tvatprasādasamutthena vikrameṇārisūdana | sureśatvaṃ gataḥ śakro hatvā daityānsahasraśaḥ

हे शत्रुसूदन, आपकी कृपा से उपजे पराक्रम से ही इन्द्र हजारों दैत्यों को मारकर देवताओं के स्वामी बने।

श्लोक 19 (7.150.19)

त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश जगत्स्थावरजङ्गमम् । स्ववर्त्मनि स्थितं वीर जपहोमेषु वर्तते ॥

tvatprasādāddhṛṣīkeśa jagatsthāvarajaṅgamam | svavartmani sthitaṃ vīra japahomeṣu vartate

हे वीर हृषीकेश, आपकी कृपा से ही यह चराचर जगत् अपने मार्ग पर स्थित है और जप-होम आदि में प्रवृत्त है।

श्लोक 20 (7.150.20)

एकार्णवमिदं पूर्वं सर्वमासीत्तमोमयम् । त्वत्प्रसादान्महाबाहो जगत्प्राप्तं नरोत्तम ॥

ekārṇavamidaṃ pūrvaṃ sarvamāsīttamomayam | tvatprasādānmahābāho jagatprāptaṃ narottama

पूर्वकाल में यह सब एकार्णव और अन्धकारमय था; हे महाबाहो, हे नरोत्तम, आपकी कृपा से ही जगत् अस्तित्व को प्राप्त हुआ।

श्लोक 21 (7.150.21)

स्रष्टारं सर्वलोकानां परमात्मानमव्ययम् । ये पश्यन्ति हृषीकेश न ते मुह्यन्ति कर्हिचित् ॥

sraṣṭāraṃ sarvalokānāṃ paramātmānamavyayam | ye paśyanti hṛṣīkeśa na te muhyanti karhicit

हे हृषीकेश, जो आपको सब लोकों का स्रष्टा और अविनाशी परमात्मा जानकर देखते हैं, वे कभी मोह में नहीं पड़ते।

श्लोक 22 (7.150.22)

पुराणं परमं देवं देवदेवं सनातनम् । ये प्रपन्नाः सुरगुरुं न ते मुह्यन्ति कर्हिचित् ॥

purāṇaṃ paramaṃ devaṃ devadevaṃ sanātanam | ye prapannāḥ suraguruṃ na te muhyanti karhicit

जो पुरातन, परम देव, देवों के भी देव, सनातन और देवताओं के गुरु की शरण लेते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते।

श्लोक 23 (7.150.23)

अनादिनिधनं देवं लोककर्तारमव्ययम् । ये भक्तास्त्वां हृषीकेश दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

anādinidhanaṃ devaṃ lokakartāramavyayam | ye bhaktāstvāṃ hṛṣīkeśa durgāṇyatitaranti te

हे हृषीकेश, अनादि-अनन्त, लोकों के रचयिता, अविनाशी देव आपके जो भक्त हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 24 (7.150.24)

परं पुराणं पुरुषं पराणां परमं च यत् । प्रपद्यतस्तत्परमं परा भूतिर्विधीयते ॥

paraṃ purāṇaṃ puruṣaṃ parāṇāṃ paramaṃ ca yat | prapadyatastatparamaṃ parā bhūtirvidhīyate

जो परम पुराण पुरुष है, श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ है, उसकी शरण लेने वाले को परम कल्याण प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (7.150.25)

गायन्ति चतुरो वेदा यश्च देवेषु गीयते । तं प्रपद्य महात्मानं भूतिमश्नाम्यनुत्तमाम् ॥

gāyanti caturo vedā yaśca deveṣu gīyate | taṃ prapadya mahātmānaṃ bhūtimaśnāmyanuttamām

चारों वेद जिसका गान करते हैं और जो देवताओं में भी गाया जाता है, उस महात्मा की शरण लेकर मैं परम कल्याण पाता हूँ।

श्लोक 26 (7.150.26)

परमेश परेशेश तिर्यगीश नरेश्वर । सर्वेश्वरेश्वरेशेश नमस्ते पुरुषोत्तम ॥

parameśa pareśeśa tiryagīśa nareśvara | sarveśvareśvareśeśa namaste puruṣottama

हे परमेश्वर, ईशों के भी ईश, पशुओं के स्वामी, नरेश्वर, सब ईश्वरों के भी ईश — हे पुरुषोत्तम, आपको नमस्कार है।

श्लोक 27 (7.150.27)

त्वमीशेशेश्वरेशान प्रभो वर्धस्व माधव । प्रभवाप्यय सर्वस्य सर्वात्मन्पृथुलोचन ॥

tvamīśeśeśvareśāna prabho vardhasva mādhava | prabhavāpyaya sarvasya sarvātmanpṛthulocana

आप ईशों और ईश्वरों के भी शासक हैं; हे प्रभो माधव, आप बढ़ते रहें। आप सबकी उत्पत्ति और लय के कारण, सबके आत्मा और विशाललोचन हैं।

श्लोक 28 (7.150.28)

धनञ्जयसखा यश्च धनञ्जयहितश्च यः । धनञ्जयस्य गोप्ता तं प्रपद्य सुखमेधते ॥

dhanañjayasakhā yaśca dhanañjayahitaśca yaḥ | dhanañjayasya goptā taṃ prapadya sukhamedhate

जो अर्जुन के सखा और हितैषी हैं, अर्जुन के रक्षक हैं, उनकी शरण लेकर मनुष्य सुख से बढ़ता है।

श्लोक 29 (7.150.29)

मार्कण्डेयः पुराणर्षिश्चरितज्ञस्तवानघ । माहात्म्यमनुभावं पुरा कीर्तितवान्मुनिः ॥

mārkaṇḍeyaḥ purāṇarṣiścaritajñastavānagha | māhātmyamanubhāvaṃ purā kīrtitavānmuniḥ

हे निष्पाप, आपके चरित को जानने वाले पुरातन ऋषि मार्कण्डेय ने पूर्वकाल में आपके माहात्म्य और प्रभाव का वर्णन किया था।

श्लोक 30 (7.150.30)

असितो देवलश्चैव नारदश्च महातपाः । पितामहश्च मे व्यासस्त्वामाहुर्विधिमुत्तमम् ॥

asito devalaścaiva nāradaśca mahātapāḥ | pitāmahaśca me vyāsastvāmāhurvidhimuttamam

असित, देवल, महातपस्वी नारद और मेरे पितामह व्यास आपको सर्वोत्तम विधाता कहते हैं।

श्लोक 31 (7.150.31)

त्वं तेजस्त्वं परं ब्रह्म त्वं सत्यं त्वं महत्तपः । त्वं श्रेयस्त्वं यशश्चाग्र्यं कारणं जगतस्तथा ॥

tvaṃ tejastvaṃ paraṃ brahma tvaṃ satyaṃ tvaṃ mahattapaḥ | tvaṃ śreyastvaṃ yaśaścāgryaṃ kāraṇaṃ jagatastathā

आप तेज हैं, आप परब्रह्म हैं; आप सत्य हैं, आप महान तप हैं; आप श्रेय हैं, आप श्रेष्ठ यश हैं, और आप ही जगत् के कारण हैं।

श्लोक 32 (7.150.32)

त्वया सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । प्रलये समनुप्राप्ते त्वां वै निविशते पुनः ॥

tvayā sṛṣṭamidaṃ sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam | pralaye samanuprāpte tvāṃ vai niviśate punaḥ

यह सारा चराचर जगत् आपसे रचा गया है, और प्रलय आने पर यह फिर आप में ही प्रवेश कर जाता है।

श्लोक 33 (7.150.33)

अनादिनिधनं देवं विश्वस्येशं जगत्पते । धातारमजमव्यक्तमाहुर्वेदविदो जनाः ॥

anādinidhanaṃ devaṃ viśvasyeśaṃ jagatpate | dhātāramajamavyaktamāhurvedavido janāḥ

हे जगत्पते, आपको अनादि-अनन्त, विश्व के स्वामी देव और धाता, अजन्मा तथा अव्यक्त वेदवेत्ता लोग कहते हैं—

श्लोक 34 (7.150.34)

भूतात्मानं महात्मानमनन्तं विश्वतोमुखम् । अपि देवा न जानन्ति गुह्यमाद्यं जगत्पतिम् । नारायणं परं देवं परमात्मानमीश्वरम् ॥

bhūtātmānaṃ mahātmānamanantaṃ viśvatomukham | api devā na jānanti guhyamādyaṃ jagatpatim | nārāyaṇaṃ paraṃ devaṃ paramātmānamīśvaram

आप भूतों के आत्मा, महात्मा, अनन्त और सब ओर मुख वाले हैं, ऐसा वे कहते हैं। आदि, गुह्य जगत्पति, परम देव, परमात्मा और ईश्वर नारायण को तो देवता भी नहीं जानते—

श्लोक 35 (7.150.35)

ज्ञानयोनिं हरिं विष्णुं मुमुक्षूणां परायणम् । परं पुराणं पुरुषं पुराणानां परं च यत् ॥

jñānayoniṃ hariṃ viṣṇuṃ mumukṣūṇāṃ parāyaṇam | paraṃ purāṇaṃ puruṣaṃ purāṇānāṃ paraṃ ca yat

जो ज्ञान के स्रोत, हरि, विष्णु, मुमुक्षुओं के परम आश्रय और परम पुराण पुरुष हैं, जो पुरातनों से भी परे हैं।

श्लोक 36 (7.150.36)

एवमादिगुणानां ते कर्मणां दिवि चेह च । अतीतभूतभव्यानां सङ्ख्याताऽत्र न विद्यते ॥

evamādiguṇānāṃ te karmaṇāṃ divi ceha ca | atītabhūtabhavyānāṃ saṅkhyātā'tra na vidyate

आपके इस प्रकार के गुणों वाले, स्वर्ग और पृथ्वी पर किए गए, बीते, वर्तमान और आगे होने वाले कर्मों की यहाँ गिनती नहीं हो सकती।

श्लोक 37 (7.150.37)

सर्वतो रक्षणीयाः स्म शक्रेणेव दिवौकसः । यैस्त्वं सर्वगुणोपेतः सुहृन्न उपपादितः ॥

sarvato rakṣaṇīyāḥ sma śakreṇeva divaukasaḥ | yaistvaṃ sarvaguṇopetaḥ suhṛnna upapāditaḥ

जैसे इन्द्र से स्वर्गवासी देवता रक्षित होते हैं, वैसे ही हम सब ओर से रक्षा के योग्य हैं — हम, जिन्होंने सर्वगुणसम्पन्न आपको अपना सुहृद् पाया है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (7.150.38)

इत्येवं धर्मराजेन हरिरुक्तो महायशाः । अनुरूपमिदं वाक्यं प्रत्युवाच जनार्दनः ॥

ityevaṃ dharmarājena harirukto mahāyaśāḥ | anurūpamidaṃ vākyaṃ pratyuvāca janārdanaḥ

धर्मराज के इस प्रकार कहने पर महायशस्वी हरि जनार्दन ने यह उचित उत्तर दिया—

वासुदेव उवाच

श्लोक 39 (7.150.39)

भवता तपसोग्रेण धर्मेण परमेण च । साधुत्वादार्जवाच्चैव हतः पापो जयद्रथः ॥

bhavatā tapasogreṇa dharmeṇa parameṇa ca | sādhutvādārjavāccaiva hataḥ pāpo jayadrathaḥ

आपकी उग्र तपस्या, परम धर्म, साधुता और सरलता के कारण ही पापी जयद्रथ मारा गया।

श्लोक 40 (7.150.40)

अयं च पुरुषव्याघ्र त्वदनुध्यानसंवृतः । हत्वा योधसहस्राणि न्यहञ्जिष्णुर्जयद्रथम् ॥

ayaṃ ca puruṣavyāghra tvadanudhyānasaṃvṛtaḥ | hatvā yodhasahasrāṇi nyahañjiṣṇurjayadratham

और हे पुरुषव्याघ्र, आपके ध्यान से घिरे इस अर्जुन ने हजारों योद्धाओं को मारकर जयद्रथ को मार गिराया।

श्लोक 41 (7.150.41)

कृतित्वे बाहुवीर्ये च तथैवासम्भ्रमेऽपि च । शीघ्रतामोधबुद्धित्वे नास्ति पार्थसमः क्वचित् ॥

kṛtitve bāhuvīrye ca tathaivāsambhrame'pi ca | śīghratāmodhabuddhitve nāsti pārthasamaḥ kvacit

कुशलता, बाहुबल, निर्भीकता, शीघ्रता और अचूक बुद्धि में पार्थ के समान कोई कहीं नहीं है।

श्लोक 42 (7.150.42)

तदयं भरतश्रेष्ठ भ्राता तेऽद्य यदर्जुनः । सैन्यक्षयं रणे कृत्वा सिन्धुराजशिरोऽहरत् ॥

tadayaṃ bharataśreṣṭha bhrātā te'dya yadarjunaḥ | sainyakṣayaṃ raṇe kṛtvā sindhurājaśiro'harat

हे भरतश्रेष्ठ, इसीलिए आज आपके भाई अर्जुन ने रण में सेना का संहार करके सिन्धुराज का सिर काट डाला।

सञ्जय उवाच

श्लोक 43 (7.150.43)

ततो धर्मसुतो जिष्णुं परिष्वज्य विशाम्पते । प्रमृज्य वदनं तस्य पर्याश्वासयत प्रभुः ॥

tato dharmasuto jiṣṇuṃ pariṣvajya viśāmpate | pramṛjya vadanaṃ tasya paryāśvāsayata prabhuḥ

हे प्रजापालक, तब धर्मपुत्र ने जिष्णु को गले लगाया, उसका मुख पोंछा और प्रभु ने उसे आश्वासन दिया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 44 (7.150.44)

अतीव सुमहत्कर्म कृतवानसि फल्गुन । असह्यं चाविषह्यं च देवैरपि सवासवैः ॥

atīva sumahatkarma kṛtavānasi phalguna | asahyaṃ cāviṣahyaṃ ca devairapi savāsavaiḥ

फल्गुन, तुमने बहुत बड़ा कर्म किया है, जो इन्द्र सहित देवताओं के लिए भी असह्य और दुःसाध्य था।

श्लोक 45 (7.150.45)

दिष्ट्या निस्तीर्णभारोऽसि हतारिश्चासि शत्रुहन् । दिष्ट्या सत्या प्रतिज्ञेयं कृता हत्वा जयद्रथम् ॥

diṣṭyā nistīrṇabhāro'si hatāriścāsi śatruhan | diṣṭyā satyā pratijñeyaṃ kṛtā hatvā jayadratham

हे शत्रुहन्ता, सौभाग्य से तुम अपने भार से पार हो गए और शत्रु को मार चुके; सौभाग्य से जयद्रथ को मारकर तुम्हारी यह प्रतिज्ञा सत्य हुई।

सञ्जय उवाच

श्लोक 46 (7.150.46)

एवमुक्त्वा गुडाकेशं धर्मराजो महायशाः । पस्पर्श पुण्यगन्धेन पृष्ठे हस्तेन पार्थिवः ॥

evamuktvā guḍākeśaṃ dharmarājo mahāyaśāḥ | pasparśa puṇyagandhena pṛṣṭhe hastena pārthivaḥ

गुडाकेश से यों कहकर महायशस्वी धर्मराज राजा ने पवित्र सुगन्ध वाले अपने हाथ से उसकी पीठ का स्पर्श किया।

श्लोक 47 (7.150.47)

एवमुक्तौ महात्मानावुभौ केशवपाण्डवौ । तावब्रूतां तदा कृष्णौ राजानं पृथिवीपतिम् ॥

evamuktau mahātmānāvubhau keśavapāṇḍavau | tāvabrūtāṃ tadā kṛṣṇau rājānaṃ pṛthivīpatim

यों कहे जाने पर वे दोनों महात्मा, केशव और पाण्डव, दोनों कृष्ण, पृथ्वी के स्वामी राजा से बोले—

कृष्णार्जुनावूचतुः

श्लोक 48 (7.150.48)

तव कोपाग्निना दग्धः पापो राजञ्जयद्रथः । उत्तीर्णं चापि सुमहद्धार्तराष्ट्रबलं रणे ॥

tava kopāgninā dagdhaḥ pāpo rājañjayadrathaḥ | uttīrṇaṃ cāpi sumahaddhārtarāṣṭrabalaṃ raṇe

हे राजन्, आपकी क्रोधाग्नि से पापी जयद्रथ जल गया, और धृतराष्ट्र के पुत्रों की विशाल सेना भी रण में पार कर ली गई।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 49 (7.150.49)

हन्यन्ते निहताश्चैव विनङ्क्ष्यन्ति च केशव । तव क्रोधहता ह्येते कौरवाः शत्रुसूदन ॥

hanyante nihatāścaiva vinaṅkṣyanti ca keśava | tava krodhahatā hyete kauravāḥ śatrusūdana

हे केशव, ये मारे जा रहे हैं, मारे जा चुके हैं और आगे नष्ट होंगे। हे शत्रुसूदन, आपके क्रोध से ही ये कौरव मर रहे हैं।

श्लोक 50 (7.150.50)

त्वां हि चक्षुर्हणं वीर कोपयित्वा सुयोधनः । समित्रबन्धुः समरे प्राणांस्त्यक्ष्यति दुर्मतिः ॥

tvāṃ hi cakṣurhaṇaṃ vīra kopayitvā suyodhanaḥ | samitrabandhuḥ samare prāṇāṃstyakṣyati durmatiḥ

हे वीर, दृष्टिमात्र से मार देने वाले आपको क्रुद्ध करके मूर्ख सुयोधन मित्रों और बन्धुओं सहित रण में प्राण त्यागेगा।

श्लोक 51 (7.150.51)

तव क्रोधहतः पूर्वं देवैरपि सुदुर्जयः । शरतल्पगतः शेते भीष्मः कुरुपितामहः ॥

tava krodhahataḥ pūrvaṃ devairapi sudurjayaḥ | śaratalpagataḥ śete bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ

आपके क्रोध से ही पहले देवताओं के लिए भी अजेय कुरुपितामह भीष्म मारे जाकर बाणशय्या पर लेटे हैं।

श्लोक 52 (7.150.52)

दुर्लभो विजयस्तेषां सङ्ग्रामे रिपुघातिनाम् । याता मृत्युवशं ते वै येषां क्रुद्धोऽपि माधव ॥

durlabho vijayasteṣāṃ saṅgrāme ripughātinām | yātā mṛtyuvaśaṃ te vai yeṣāṃ kruddho'pi mādhava

हे माधव, जिन शत्रुघातियों पर आप क्रुद्ध हैं, उनके लिए युद्ध में विजय दुर्लभ है; वे निश्चय ही मृत्यु के वश में चले गए।

श्लोक 53 (7.150.53)

राज्यं प्राणाः श्रियः पुत्राः सौख्यानि विविधानि च । अचिरात्तस्य नश्यन्ति येषां क्रुद्धोऽसि मानद ॥

rājyaṃ prāṇāḥ śriyaḥ putrāḥ saukhyāni vividhāni ca | acirāttasya naśyanti yeṣāṃ kruddho'si mānada

हे मान देने वाले, जिन पर आप क्रुद्ध होते हैं, उनके राज्य, प्राण, लक्ष्मी, पुत्र और नाना प्रकार के सुख शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

भगवानुवाच

श्लोक 54 (7.150.54)

विनष्टान्कौरवान्मन्ये सपुत्रपशुबान्धवान् । राजधर्मपरे नित्यं त्वयि क्रुद्धे परन्तप ॥

vinaṣṭānkauravānmanye saputrapaśubāndhavān | rājadharmapare nityaṃ tvayi kruddhe parantapa

हे परन्तप, राजधर्म में सदा लगे आप जब क्रुद्ध हैं, तब मैं मानता हूँ कि कौरव पुत्रों, पशुओं और बन्धुओं सहित नष्ट हो गए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 55 (7.150.55)

ततो भीमो महाबाहुः सात्यकिश्च महारथः । अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं मार्गणैः क्षतविक्षतौ । स्थितावास्तां महेष्वासौ पाञ्चाल्यपरिवारितौ ॥

tato bhīmo mahābāhuḥ sātyakiśca mahārathaḥ | abhivādya guruṃ jyeṣṭhaṃ mārgaṇaiḥ kṣatavikṣatau | sthitāvāstāṃ maheṣvāsau pāñcālyaparivāritau

तब महाबाहु भीम और महारथी सात्यकि, जो बाणों से क्षत-विक्षत थे, अपने ज्येष्ठ गुरु का अभिवादन करके पाञ्चालों से घिरे हुए खड़े हुए, वे दोनों महान धनुर्धर।

श्लोक 56 (7.150.56)

तौ दृष्ट्वा मुदितो वीरौ प्राञ्जली चाग्रतः स्थितौ । अभ्यनन्दत कौन्तेयस्तावुभौ भीमसात्यकी ॥

tau dṛṣṭvā mudito vīrau prāñjalī cāgrataḥ sthitau | abhyanandata kaunteyastāvubhau bhīmasātyakī

उन दोनों वीरों को हाथ जोड़े सामने खड़ा देखकर कौन्तेय ने प्रसन्न होकर भीम और सात्यकि दोनों का अभिनन्दन किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 57 (7.150.57)

दिष्ट्या पश्यामि वां शूरौ विमुक्तौ सैन्यसागरात् । द्रोणग्राहदुराधर्षाद्धार्दिक्यमकरालयात् ॥

diṣṭyā paśyāmi vāṃ śūrau vimuktau sainyasāgarāt | droṇagrāhadurādharṣāddhārdikyamakarālayāt

सौभाग्य से मैं तुम दोनों शूरों को उस सेना-सागर से छूटा हुआ देख रहा हूँ, जो द्रोणरूपी ग्राह और हार्दिक्यरूपी मकरों के निवास से दुर्धर्ष था।

श्लोक 58 (7.150.58)

दिष्ट्या विनिर्जिताः सङ्ख्ये पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः । युवां विजयिनौ चापि दिष्ट्या पश्यामि संयुगे ॥

diṣṭyā vinirjitāḥ saṅkhye pṛthivyāṃ sarvapārthivāḥ | yuvāṃ vijayinau cāpi diṣṭyā paśyāmi saṃyuge

सौभाग्य से पृथ्वी के सब राजा युद्ध में जीत लिए गए, और सौभाग्य से मैं तुम दोनों को रण में विजयी देख रहा हूँ।

श्लोक 59 (7.150.59)

दिष्ट्या द्रोणो जितः सङ्ख्ये हार्दिक्यश्च महाबलः । दिष्ट्या विकर्णिभिः कर्णोरणे नीतः पराभवम् ॥

diṣṭyā droṇo jitaḥ saṅkhye hārdikyaśca mahābalaḥ | diṣṭyā vikarṇibhiḥ karṇoraṇe nītaḥ parābhavam

सौभाग्य से युद्ध में द्रोण और महाबली हार्दिक्य हार गए, और सौभाग्य से कर्ण तुम्हारे कंटीले बाणों से रण में पराजय को पहुँचा।

श्लोक 60 (7.150.60)

विमुखश्च कृतः शल्यो युवाभ्यां पुरुषर्षभौ । दिष्ट्या युवां कुशलिनौ सङ्ग्रामात्पुनरागतौ । पश्यामि रथिनां श्रेष्ठावुभौ युद्धविशारदौ ॥

vimukhaśca kṛtaḥ śalyo yuvābhyāṃ puruṣarṣabhau | diṣṭyā yuvāṃ kuśalinau saṅgrāmātpunarāgatau | paśyāmi rathināṃ śreṣṭhāvubhau yuddhaviśāradau

हे पुरुषश्रेष्ठो, तुमने शल्य को भी युद्ध से विमुख कर दिया। सौभाग्य से तुम दोनों कुशल से संग्राम से लौटे हो; मैं रथियों में श्रेष्ठ, युद्धकुशल तुम दोनों को देख रहा हूँ।

श्लोक 61 (7.150.61)

मम वाक्यकरौ वीरौ मम गौरवयन्त्रितौ । सैन्यार्णवं समुत्तीर्णौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ॥

mama vākyakarau vīrau mama gauravayantritau | sainyārṇavaṃ samuttīrṇau diṣṭyā paśyāmi vāmaham

मेरी आज्ञा मानने वाले, मेरे प्रति आदर से बँधे वीरो, सेना-सागर को पार किए तुम दोनों को सौभाग्य से मैं देख रहा हूँ।

श्लोक 62 (7.150.62)

समरश्लाघिनौ वीरौ समरेष्वपराजितौ । मम वाक्यसमौ चैव दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ॥

samaraślāghinau vīrau samareṣvaparājitau | mama vākyasamau caiva diṣṭyā paśyāmi vāmaham

युद्ध पर गर्व करने वाले, युद्धों में अपराजित, मेरे वचन के अनुरूप चलने वाले वीरो, तुम दोनों को सौभाग्य से मैं देख रहा हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 63 (7.150.63)

इत्युक्त्वा पाण्डवो राजन्युयुधानवृकोदरौ । सस्वजे पुरुषव्याघ्रौ हर्षाद्बाष्पं मुमोच ह ॥

ityuktvā pāṇḍavo rājanyuyudhānavṛkodarau | sasvaje puruṣavyāghrau harṣādbāṣpaṃ mumoca ha

यों कहकर हे राजन्, पाण्डव राजा ने पुरुषव्याघ्र सात्यकि और वृकोदर को गले लगाया और हर्ष के आँसू बहाए।

श्लोक 64 (7.150.64)

ततः प्रमुदितं सर्वं बलमासीद्विशाम्पते । पाण्डवानां रणे हृष्टं युद्धाय तु मनो दधे ॥

tataḥ pramuditaṃ sarvaṃ balamāsīdviśāmpate | pāṇḍavānāṃ raṇe hṛṣṭaṃ yuddhāya tu mano dadhe

तब हे प्रजापालक, पाण्डवों की सारी सेना हर्ष से भर गई और रण में उत्साहित होकर उसने फिर युद्ध का मन बनाया।

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