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द्रोण पर्व · अध्याय 15

भीम और शल्य का गदायुद्ध

धृतराष्ट्र कहते हैं कि द्वन्द्वयुद्धों को सुनकर उन्हें तृप्ति नहीं होती और वे शल्य तथा अभिमन्यु के युद्ध का वर्णन माँगते हैं। संजय बताते हैं कि सारथि के मारे जाने पर शल्य लोहे की गदा लेकर रथ से कूद पड़ता है; भीम अभिमन्यु को रोककर स्वयं शल्य का सामना करते हैं। दोनों का लम्बा और बराबरी का गदायुद्ध होता है, अन्त में दोनों चोट खाकर गिर पड़ते हैं; कृतवर्मा शल्य को रण से हटा ले जाता है, भीम फिर उठ खड़े होते हैं और कौरव-सेना पाण्डवों के आगे भागने लगती है।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.15.1)

बहूनि सुविचित्राणि द्वन्द्वयुद्धानि सञ्जय । त्वयोक्तानि निशम्याहं स्पृहयामि सचक्षुताम् ॥

bahūni suvicitrāṇi dvandvayuddhāni sañjaya | tvayoktāni niśamyāhaṃ spṛhayāmi sacakṣutām

संजय, तुम्हारे सुनाए हुए अनेक अत्यन्त विचित्र द्वन्द्वयुद्धों को सुनकर मेरे मन में आँखें पाने की लालसा जागती है।

श्लोक 2 (7.15.2)

न हि देवासुरं युद्धमीदृग्भूतं भवेदिति । चिन्तयामि च युद्धानि श्रुत्वा घोराणि सञ्जय ॥

na hi devāsuraṃ yuddhamīdṛgbhūtaṃ bhavediti | cintayāmi ca yuddhāni śrutvā ghorāṇi sañjaya

मैं समझता हूँ कि देवासुर-संग्राम भी ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। संजय, इन भयंकर युद्धों को सुनकर मैं बार-बार इन्हीं के विषय में सोचता रहता हूँ।

श्लोक 3 (7.15.3)

आश्चर्यभूतं लोकेषु कथयिष्यन्ति मानवाः । कुरुणां पाण्डवानां च युद्धं देवासुरोपमम् ॥

āścaryabhūtaṃ lokeṣu kathayiṣyanti mānavāḥ | kuruṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yuddhaṃ devāsuropamam

लोक में मनुष्य इसे आश्चर्य की बात कहकर सुनाएँगे: कौरवों और पाण्डवों का वह युद्ध देवासुर-संग्राम के समान था।

श्लोक 4 (7.15.4)

न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतो युद्धमुत्तमम् । तस्मादार्तायनेर्युद्धं सौभद्रस्य च शंस मे ॥

na hi me tṛptirastīha śṛṇvato yuddhamuttamam | tasmādārtāyaneryuddhaṃ saubhadrasya ca śaṃsa me

इस उत्तम युद्ध को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती। इसलिए आर्तायनि शल्य और सुभद्रापुत्र अभिमन्यु के युद्ध का वर्णन मुझे सुनाओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (7.15.5)

सादितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् । समुत्क्षिप्य नदन्कुद्धः प्रचस्कन्द रथोत्तमात् ॥

sāditaṃ prekṣya yantāraṃ śalyaḥ sarvāyasīṃ gadām | samutkṣipya nadankuddhaḥ pracaskanda rathottamāt

अपने सारथि को गिरा देखकर शल्य क्रोध में भर गया; वह सर्वथा लोहे की गदा उठाकर गर्जता हुआ अपने श्रेष्ठ रथ से कूद पड़ा।

श्लोक 6 (7.15.6)

तं दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम् । जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥

taṃ dīptamiva kālāgniṃ daṇḍahastamivāntakam | javenābhyapatadbhīmaḥ pragṛhya mahatīṃ gadām

प्रलयाग्नि के समान दीप्त और दण्डधारी यमराज के समान उस शल्य पर भीम अपनी विशाल गदा उठाकर वेग से टूट पड़े।

श्लोक 7 (7.15.7)

सौभद्रोऽप्यशनिप्रख्यां प्रगृह्य महतीं गदाम् । एह्येहीत्यव्रवीच्छल्यं यत्नाद्भीमेन वारितः ॥

saubhadro'pyaśaniprakhyāṃ pragṛhya mahatīṃ gadām | ehyehītyavravīcchalyaṃ yatnādbhīmena vāritaḥ

सुभद्रापुत्र ने भी वज्र के समान चमकती हुई विशाल गदा उठाई और शल्य को पुकारा, “आओ, आओ!” परन्तु भीम ने यत्नपूर्वक उसे रोक लिया।

श्लोक 8 (7.15.8)

वारयित्वा तु सौभद्रं भीमसेनः प्रतापवान् । शल्यमासाद्य समरे तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥

vārayitvā tu saubhadraṃ bhīmasenaḥ pratāpavān | śalyamāsādya samare tasthau giririvācalaḥ

सुभद्रापुत्र को रोककर प्रतापी भीमसेन समरभूमि में शल्य के सामने जा पहुँचे और अचल पर्वत के समान खड़े हो गए।

श्लोक 9 (7.15.9)

तथैव मद्रराजोऽपि भीमं दृष्ट्वा महाबलम् । ससाराभिमुखस्तूर्णं शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥

tathaiva madrarājo'pi bhīmaṃ dṛṣṭvā mahābalam | sasārābhimukhastūrṇaṃ śārdūla iva kuñjaram

मद्रराज शल्य भी महाबली भीम को देखकर वैसे ही वेग से उनकी ओर बढ़ा, जैसे बाघ हाथी की ओर झपटता है।

श्लोक 10 (7.15.10)

तं दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् । जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥

taṃ dīptamiva kālāgniṃ pāśahastamivāntakam | javenābhyapatadbhīmaḥ pragṛhya mahatīṃ gadām

प्रलयाग्नि के समान दीप्त और पाशधारी यमराज के समान उस शल्य पर भीम अपनी विशाल गदा उठाकर वेग से टूट पड़े।

श्लोक 11 (7.15.11)

ततस्तूर्यनिनादाश्च शङ्खानां च सहस्रशः । सिंहनादाश्च संजज्ञुर्भेरीणां च महास्वनाः ॥

tatastūryaninādāśca śaṅkhānāṃ ca sahasraśaḥ | siṃhanādāśca saṃjajñurbherīṇāṃ ca mahāsvanāḥ

तब तुरहियों के नाद उठे, हज़ारों शंख बजे, सिंहनाद गूँजे और भेरियों की महाध्वनियाँ होने लगीं।

श्लोक 12 (7.15.12)

पश्यतां शतशो ह्यासीदन्योन्यमभिधावताम् । पाण्डवानां कुरुणां च साधुसाध्विति निः स्वनः ॥

paśyatāṃ śataśo hyāsīdanyonyamabhidhāvatām | pāṇḍavānāṃ kuruṇāṃ ca sādhusādhviti niḥ svanaḥ

एक-दूसरे की ओर दौड़ते उन दोनों को देखते हुए सैकड़ों पाण्डव और कौरव योद्धा “साधु, साधु!” पुकार उठे।

श्लोक 13 (7.15.13)

नहि मद्राधिपादन्यः सर्वराजसु भारत । सोढुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे ॥

nahi madrādhipādanyaḥ sarvarājasu bhārata | soḍhumutsahate vegaṃ bhīmasenasya saṃyuge

भरतवंशी राजन्, समस्त राजाओं में मद्रराज के सिवा दूसरा कोई नहीं है जो युद्ध में भीमसेन के वेग को सह सके।

श्लोक 14 (7.15.14)

तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः । सोढुमुत्सहते लोके युधि कोऽन्यो वृकोदरात् ॥

tathā madrādhipasyāpi gadāvegaṃ mahātmanaḥ | soḍhumutsahate loke yudhi ko'nyo vṛkodarāt

और उसी प्रकार, महात्मा मद्रराज की गदा के वेग को युद्ध में वृकोदर के सिवा संसार में दूसरा कौन सह सकता है?

श्लोक 15 (7.15.15)

पट्टैर्जाम्बूनदैर्बद्धा बभूव जनहर्षणी । प्रजज्वाल तदा विद्धा भीमेन महती गदा ॥

paṭṭairjāmbūnadairbaddhā babhūva janaharṣaṇī | prajajvāla tadā viddhā bhīmena mahatī gadā

जाम्बूनद स्वर्ण की पट्टियों से मढ़ी हुई, लोगों को हर्ष देनेवाली वह विशाल गदा भीम के प्रहार से जल उठी।

श्लोक 16 (7.15.16)

साग्निदीप्ता महारौद्रा गदा सा शुशुभे तदा ॥

sāgnidīptā mahāraudrā gadā sā śuśubhe tadā

अग्नि से दीप्त और अत्यन्त भयंकर वह गदा उस समय चमक उठी।

श्लोक 17 (7.15.17)

तथैव चरतो मार्गान्मण्डलानि च सर्वशः । महाविद्युत्प्रतीकाशा शल्यस्य शुशुभे गदा ॥

tathaiva carato mārgānmaṇḍalāni ca sarvaśaḥ | mahāvidyutpratīkāśā śalyasya śuśubhe gadā

इसी प्रकार मार्गों में और चारों ओर मण्डल बाँधकर घूमते हुए शल्य की गदा महाविद्युत् के समान चमक रही थी।

श्लोक 18 (7.15.18)

तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतुः । आवर्तितगदशृङ्गावुभौ शल्यवृकोदरौ ॥

tau vṛṣāviva nardantau maṇḍalāni viceratuḥ | āvartitagadaśṛṅgāvubhau śalyavṛkodarau

दो साँड़ों की तरह गरजते हुए शल्य और वृकोदर दोनों अपनी गदाओं के सिरे घुमाते हुए मण्डल बाँधकर विचरने लगे।

श्लोक 19 (7.15.19)

क्रोधताम्रेक्षणौ वीरौ शत्रुसङ्घविमर्दनौ । महामात्रौ महोत्साहौ गदायुद्धविशारदौ ॥

krodhatāmrekṣaṇau vīrau śatrusaṅghavimardanau | mahāmātrau mahotsāhau gadāyuddhaviśāradau

क्रोध से उनकी आँखें लाल हो रही थीं; वे दोनों वीर शत्रुसमूहों को कुचलनेवाले, विशालकाय, महान् उत्साहवाले और गदायुद्ध में निपुण थे।

श्लोक 20 (7.15.20)

मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च । निर्विशेषमभूद्युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥

maṇḍalāvartamārgeṣu gadāviharaṇeṣu ca | nirviśeṣamabhūdyuddhaṃ tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ

मण्डलाकार घूमने के मार्गों में और गदा चलाने की क्रीड़ाओं में उन दोनों पुरुषसिंहों का युद्ध बराबरी का रहा।

श्लोक 21 (7.15.21)

ताडिता भीमसेनेन शल्यस्य महती गदा । साग्निज्वाला महारौद्रा तदा तूर्णमशीर्यत ॥

tāḍitā bhīmasenena śalyasya mahatī gadā | sāgnijvālā mahāraudrā tadā tūrṇamaśīryata

भीमसेन के प्रहार से शल्य की विशाल गदा, जो अग्निज्वाला से युक्त और अत्यन्त भयंकर थी, तुरन्त टूट-फूट गई।

श्लोक 22 (7.15.22)

तथैव भीमसेनस्य द्विषताऽभिहता गदा । वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृतो वृक्ष इवावभौ ॥

tathaiva bhīmasenasya dviṣatā'bhihatā gadā | varṣāpradoṣe khadyotairvṛto vṛkṣa ivāvabhau

इसी प्रकार शत्रु के प्रहार से आहत भीमसेन की गदा वर्षा ऋतु की सन्ध्या में जुगनुओं से घिरे वृक्ष के समान शोभित हुई।

श्लोक 23 (7.15.23)

गदा क्षिप्ता तु समरे मद्रराजेन भारत । व्योम दीपयमाना सा ससृजे पावकं मुहुः ॥

gadā kṣiptā tu samare madrarājena bhārata | vyoma dīpayamānā sā sasṛje pāvakaṃ muhuḥ

भरतवंशी राजन्, मद्रराज की फेंकी हुई गदा आकाश को प्रकाशित करती हुई बार-बार आग उगलती थी।

श्लोक 24 (7.15.24)

तथैव भीमसेनेन द्विषते प्रेषिता गदा । तापयामास तत्सैन्यं महोल्का पतती यथा ॥

tathaiva bhīmasenena dviṣate preṣitā gadā | tāpayāmāsa tatsainyaṃ maholkā patatī yathā

इसी प्रकार भीमसेन द्वारा शत्रु पर फेंकी हुई गदा गिरती हुई महान् उल्का की भाँति उस सेना को तपाने लगी।

श्लोक 25 (7.15.25)

ते गदे गदिनां श्रेष्ठे समासाद्य परस्परम् । श्वसन्त्यौ नागकन्येव ससृजाते विभावसुम् ॥

te gade gadināṃ śreṣṭhe samāsādya parasparam | śvasantyau nāgakanyeva sasṛjāte vibhāvasum

गदाधारियों में श्रेष्ठ उन दोनों की गदाएँ आपस में टकराकर दो नागकन्याओं की तरह फुफकारती हुई आग उगलने लगीं।

श्लोक 26 (7.15.26)

नखैरिव महाव्याघ्रौ दन्तैरिव महागजौ । तौ विचेरतुरासाद्य गदाग्र्याभ्यां परस्परम् ॥

nakhairiva mahāvyāghrau dantairiva mahāgajau | tau viceraturāsādya gadāgryābhyāṃ parasparam

जैसे दो महाव्याघ्र नखों से और दो महागज दाँतों से लड़ते हैं, वैसे ही वे दोनों अपनी श्रेष्ठ गदाओं से एक-दूसरे से भिड़कर विचरने लगे।

श्लोक 27 (7.15.27)

ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ । ददृशाते महात्मानौ किंशुकाविव पुष्पितौ ॥

tato gadāgrābhihatau kṣaṇena rudhirokṣitau | dadṛśāte mahātmānau kiṃśukāviva puṣpitau

तब गदाओं के अग्रभाग से आहत होकर क्षण भर में लहू से भीगे हुए वे दोनों महात्मा खिले हुए दो किंशुक वृक्षों के समान दिखाई देने लगे।

श्लोक 28 (7.15.28)

शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः । गदाभिघातसंह्रादः शक्राशनिरवोपमः ॥

śuśruve dikṣu sarvāsu tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | gadābhighātasaṃhrādaḥ śakrāśaniravopamaḥ

उन दोनों पुरुषसिंहों की गदाओं के प्रहार का घोर नाद इन्द्र के वज्र की गड़गड़ाहट के समान सब दिशाओं में सुनाई देने लगा।

श्लोक 29 (7.15.29)

गदया मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहतः । नाकम्पत तदा भीमो भिद्यमान इवाचलः ॥

gadayā madrarājena savyadakṣiṇamāhataḥ | nākampata tadā bhīmo bhidyamāna ivācalaḥ

मद्रराज की गदा से बायीं और दायीं ओर चोट खाकर भी भीम काँपे नहीं, जैसे फटता हुआ पर्वत अपनी जगह से नहीं हिलता।

श्लोक 30 (7.15.30)

तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो महाबलः । धैर्यान्मद्राधिपस्तस्थौ वज्रैर्गिरिरिवाहतः ॥

tathā bhīmagadāvegaistāḍyamāno mahābalaḥ | dhairyānmadrādhipastasthau vajrairgiririvāhataḥ

उसी प्रकार भीम की गदा के वेगवान् प्रहार सहता हुआ महाबली मद्रराज वज्रों से आहत पर्वत की भाँति धैर्य से डटा रहा।

श्लोक 31 (7.15.31)

आपेततुर्महावेगौ समुच्छ्रितगदावुभौ । पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ॥

āpetaturmahāvegau samucchritagadāvubhau | punarantaramārgasthau maṇḍalāni viceratuḥ

अत्यन्त वेगवान् वे दोनों अपनी विशाल गदाएँ उठाए एक-दूसरे पर टूट पड़े और फिर भीतरी मार्गों में रहकर मण्डल बाँधकर घूमने लगे।

श्लोक 32 (7.15.32)

अथाप्लुत्य पदान्यष्टौ सन्निपत्य गजाविव । सहसा लोहदण्डाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥

athāplutya padānyaṣṭau sannipatya gajāviva | sahasā lohadaṇḍābhyāmanyonyamabhijaghnatuḥ

फिर आठ पग कूदकर, दो हाथियों की तरह भिड़कर, उन्होंने अचानक अपने लोहे के दण्डों से एक-दूसरे पर प्रहार किया।

श्लोक 33 (7.15.33)

तौ परस्परवेगाच्च गदाभ्यां च भृशाहतौ । युगपत्पेततुर्वीरौ क्षिताविन्द्रध्वजाविव ॥

tau parasparavegācca gadābhyāṃ ca bhṛśāhatau | yugapatpetaturvīrau kṣitāvindradhvajāviva

एक-दूसरे के वेग से और गदाओं से भारी चोट खाकर वे दोनों वीर एक ही क्षण भूमि पर गिर पड़े, जैसे इन्द्रध्वज के दो स्तम्भ गिर पड़े हों।

श्लोक 34 (7.15.34)

ततो विह्वलमानं तं निः श्वसन्तं पुनः पुनः । शल्यमभ्यपतत्तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥

tato vihvalamānaṃ taṃ niḥ śvasantaṃ punaḥ punaḥ | śalyamabhyapatattūrṇaṃ kṛtavarmā mahārathaḥ

तब महारथी कृतवर्मा, लड़खड़ाते और बार-बार हाँफते हुए शल्य के पास तुरन्त जा पहुँचा।

श्लोक 35 (7.15.35)

दृष्ट्वा चैनं महाराज गदयाऽभिनिपीडितम् । विचेष्टन्तं यथा नागं मूर्च्छयाऽभिपरिप्लुतम् ॥

dṛṣṭvā cainaṃ mahārāja gadayā'bhinipīḍitam | viceṣṭantaṃ yathā nāgaṃ mūrcchayā'bhipariplutam

महाराज, उसे गदा से कुचला हुआ और मूर्छा से घिरे सर्प की भाँति तड़पता देखकर,

श्लोक 36 (7.15.36)

ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामधिपं रणे । अपोवाह रणात्तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥

tataḥ svarathamāropya madrāṇāmadhipaṃ raṇe | apovāha raṇāttūrṇaṃ kṛtavarmā mahārathaḥ

महारथी कृतवर्मा मद्रराज को अपने रथ पर चढ़ाकर शीघ्र ही रणभूमि से बाहर ले गया।

श्लोक 37 (7.15.37)

क्षीववद्विह्वलो वीरो निमेषात्पुनरुत्थितः । भीमोऽपि सुमहाबाहुर्गदापाणिरदृश्यत ॥

kṣīvavadvihvalo vīro nimeṣātpunarutthitaḥ | bhīmo'pi sumahābāhurgadāpāṇiradṛśyata

मतवाले की तरह चकराता हुआ वह वीर क्षण भर में फिर उठ खड़ा हुआ; महाबाहु भीम भी हाथ में गदा लिए दिखाई दिए।

श्लोक 38 (7.15.38)

ततो मद्राधिपं दृष्ट्वा तव पुत्राः पराङ्मुखम् । सनागपत्त्यश्वरथाः समकम्पन्त मारिष ॥

tato madrādhipaṃ dṛṣṭvā tava putrāḥ parāṅmukham | sanāgapattyaśvarathāḥ samakampanta māriṣa

तब मद्रराज को पीठ फेरे देखकर, हे आर्य, आपके पुत्र हाथियों, पैदलों, घोड़ों और रथों के साथ काँप उठे।

श्लोक 39 (7.15.39)

ते पाण्डवैरर्द्यमानास्तावका जितकाशिभिः । भीता दिशोऽन्वपद्यन्त वातनुन्ना घना इव ॥

te pāṇḍavairardyamānāstāvakā jitakāśibhiḥ | bhītā diśo'nvapadyanta vātanunnā ghanā iva

विजय से उल्लसित पाण्डवों से पीड़ित होकर आपके योद्धा भयभीत हो हवा से उड़ाए गए बादलों की तरह सब दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 40 (7.15.40)

निर्जित्य धार्तराष्ट्रांस्तु पाण्डवेया महारथाः । व्यरोचन्त रणे राजन्दीप्यमाना इवाग्नयः ॥

nirjitya dhārtarāṣṭrāṃstu pāṇḍaveyā mahārathāḥ | vyarocanta raṇe rājandīpyamānā ivāgnayaḥ

धृतराष्ट्र के पुत्रों को जीतकर महारथी पाण्डव, हे राजन्, रणभूमि में जलती हुई अग्नियों के समान शोभित हुए।

श्लोक 41 (7.15.41)

अथ मड्डुकभेरिमहामुरजाः पणवानकदुन्दुभिनिर्झरिभिः । विनदन्ति भृशं सहशङ्खरवैर्विविधैश्च नरोत्तम सिंहरवैः ॥

atha maḍḍukabherimahāmurajāḥ paṇavānakadundubhinirjharibhiḥ | vinadanti bhṛśaṃ sahaśaṅkharavairvividhaiśca narottama siṃharavaiḥ

तब मड्डुक, भेरी, महामुरज, पणव, आनक, दुन्दुभि और निर्झरी आदि वाद्य शंखों की ध्वनि तथा नाना प्रकार के सिंहनादों के साथ, हे नरश्रेष्ठ, ज़ोर से गूँज उठे।

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