Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 153

कर्ण द्रोण का बचाव करता और दैव को दोष देता है

द्रोण के उकसाने पर दुर्योधन युद्ध के लिए तत्पर होकर कर्ण से शिकायत करता है कि द्रोण ने अर्जुन को व्यूह के भीतर जाने दिया और जयद्रथ की सच्ची रक्षा नहीं की। कर्ण वृद्ध आचार्य का बचाव करता है, कहता है कि युवा और दिव्य अस्त्रों से सज्जित अर्जुन बस उन्हें लाँघकर निकल गया, और यह भी कि मनुष्य का प्रयत्न दैव के आगे हार जाता है। बातें करते-करते पाण्डवों की सेनाएँ सामने आ जाती हैं और घोर युद्ध छिड़ जाता है।

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.153.1)

ततो दुर्योधनो राजा द्रोणेनैवं प्रचोदितः । अमर्षवशमापन्नो युद्धायैव मनो दधे । अब्रवीच्च तदा कर्णं पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥

tato duryodhano rājā droṇenaivaṃ pracoditaḥ | amarṣavaśamāpanno yuddhāyaiva mano dadhe | abravīcca tadā karṇaṃ putro duryodhanastava

तब राजा दुर्योधन ने द्रोण से इस प्रकार प्रेरित होकर क्रोध के वश में आकर युद्ध का ही निश्चय किया; और आपके पुत्र दुर्योधन ने उस समय कर्ण से कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 2 (7.153.2)

पश्य कृष्णसहायेन पाण्डवेन किरीटिना । आचार्यविहितं व्यूहं भित्त्वा देवैः सुदुर्भिदम् ॥

paśya kṛṣṇasahāyena pāṇḍavena kirīṭinā | ācāryavihitaṃ vyūhaṃ bhittvā devaiḥ sudurbhidam

देखो, कृष्ण की सहायता पाए हुए पाण्डव किरीटी ने आचार्य के रचे हुए, देवताओं के लिए भी दुर्भेद्य उस व्यूह को तोड़ डाला।

श्लोक 3 (7.153.3)

तव व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः । मिषतां योधमुख्यानां सैन्धवो विनिपातितः ॥

tava vyāyacchamānasya droṇasya ca mahātmanaḥ | miṣatāṃ yodhamukhyānāṃ saindhavo vinipātitaḥ

तुम और महात्मा द्रोण के प्रयत्न करते रहते हुए, प्रमुख योद्धाओं की आँखों के सामने सैन्धव मार गिराया गया।

श्लोक 4 (7.153.4)

पश्य राधेय पृथ्वीशाः पृथिव्यां प्रवरा युधि । पार्थेनैकेन निहताः सिंहेनेवेतरे मृगाः ॥

paśya rādheya pṛthvīśāḥ pṛthivyāṃ pravarā yudhi | pārthenaikena nihatāḥ siṃhenevetare mṛgāḥ

राधेय, देखो, पृथ्वी के श्रेष्ठ राजाओं को अकेले पार्थ ने युद्ध में उसी प्रकार मार डाला जैसे सिंह दूसरे पशुओं को मार डालता है।

श्लोक 5 (7.153.5)

मम व्यायच्छमानस्य समरे शत्रुसूदन । अल्पावशेषं सैन्यं मे कृतं शक्रात्मजेन ह ॥

mama vyāyacchamānasya samare śatrusūdana | alpāvaśeṣaṃ sainyaṃ me kṛtaṃ śakrātmajena ha

हे शत्रुसूदन, मेरे युद्ध में प्रयत्न करते रहने पर भी इन्द्रपुत्र अर्जुन ने मेरी सेना को थोड़ी-सी ही शेष रहने दिया।

श्लोक 6 (7.153.6)

कथं वै युध्यमानस्य द्रोणस्य युधि फल्गुनः । भिन्द्यात्सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संयुगे ॥

kathaṃ vai yudhyamānasya droṇasya yudhi phalgunaḥ | bhindyātsudurbhidaṃ vyūhaṃ yatamāno'pi saṃyuge

द्रोण के लड़ते रहते फल्गुन चाहे जितना प्रयत्न करता, उस अत्यन्त दुर्भेद्य व्यूह को युद्ध में कैसे तोड़ सकता था?

श्लोक 7 (7.153.7)

प्रतिज्ञाया गतः पारं हत्वा सैन्धवमर्जुनः ॥

pratijñāyā gataḥ pāraṃ hatvā saindhavamarjunaḥ

अर्जुन सैन्धव को मारकर अपनी प्रतिज्ञा के पार पहुँच गया।

श्लोक 8 (7.153.8)

पश्य राधेय पृथ्वीशान्पृथिव्यां पातितान्बहून् । पार्थेन निहतान्सङ्ख्ये महेन्द्रोपमविक्रमान् ॥

paśya rādheya pṛthvīśānpṛthivyāṃ pātitānbahūn | pārthena nihatānsaṅkhye mahendropamavikramān

राधेय, देखो, पृथ्वी पर पड़े हुए उन बहुत-से राजाओं को, जो महेन्द्र के समान पराक्रमी थे और जिन्हें पार्थ ने युद्ध में मार डाला।

श्लोक 9 (7.153.9)

अनिच्छतः कथं वीर द्रोणस्य युधि पाण्डवः । भिन्द्यात्सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानस्य शुष्मिणः ॥

anicchataḥ kathaṃ vīra droṇasya yudhi pāṇḍavaḥ | bhindyātsudurbhidaṃ vyūhaṃ yatamānasya śuṣmiṇaḥ

हे वीर, यदि द्रोण न चाहते, तो बलवान द्रोण के प्रयत्न करते रहते हुए पाण्डव अर्जुन उस अत्यन्त दुर्भेद्य व्यूह को कैसे तोड़ सकता था?

श्लोक 10 (7.153.10)

दयितः फल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः । ततोऽस्य दत्तवान्द्वारमयुद्धेनैव शत्रुहन् ॥

dayitaḥ phalguno nityamācāryasya mahātmanaḥ | tato'sya dattavāndvāramayuddhenaiva śatruhan

महात्मा आचार्य को फल्गुन सदा प्रिय रहा है; इसलिए हे शत्रुहन्ता, उन्होंने बिना युद्ध के ही उसे मार्ग दे दिया।

श्लोक 11 (7.153.11)

अभयं सिन्धुराजाय दत्त्वा द्रोणः परन्तपः । प्रादात्किरीटिने द्वारं पश्यन्निर्गुणतां मयि ॥

abhayaṃ sindhurājāya dattvā droṇaḥ parantapaḥ | prādātkirīṭine dvāraṃ paśyannirguṇatāṃ mayi

परंतप द्रोण ने सिन्धुराज को अभय देकर भी किरीटी को मार्ग दे दिया; वे मुझमें गुणहीनता देखते रहे।

श्लोक 12 (7.153.12)

यद्यदास्यदनुज्ञां वै पूर्वमेव गृहान्प्रति । प्रस्थातुं सिन्धुराजस्य न भवेज्जीवितक्षयः ॥

yadyadāsyadanujñāṃ vai pūrvameva gṛhānprati | prasthātuṃ sindhurājasya na bhavejjīvitakṣayaḥ

यदि वे पहले ही सिन्धुराज को घर लौटने की अनुमति दे देते, तो उसके प्राण न जाते।

श्लोक 13 (7.153.13)

जयद्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान्प्रति । मयाऽनार्येण संरुद्धो द्रोणात्प्राप्याभयं रणे ॥

jayadratho jīvitārthī gacchamāno gṛhānprati | mayā'nāryeṇa saṃruddho droṇātprāpyābhayaṃ raṇe

जयद्रथ अपने प्राण बचाने की इच्छा से घर जा रहा था; मुझ अनार्य ने उसे रोक लिया, यह मानकर कि द्रोण से उसे युद्ध में अभय मिल चुका है।

श्लोक 14 (7.153.14)

रक्षामि सैन्धवं युद्धे नैनं प्राप्स्यति फल्गुनः । मम सैन्यविनाशाय रुद्धो विप्रेण सैन्धवः ॥

rakṣāmi saindhavaṃ yuddhe nainaṃ prāpsyati phalgunaḥ | mama sainyavināśāya ruddho vipreṇa saindhavaḥ

मैं युद्ध में सैन्धव की रक्षा करता हूँ, फल्गुन उस तक नहीं पहुँच सकेगा; मेरी सेना के विनाश के लिए सैन्धव को ब्राह्मण (द्रोण) ने रोके रखा।

श्लोक 15 (7.153.15)

तस्य मे मन्दभाग्यस्य यतमानस्य संयुगे । हतानि सर्वसैन्यानि हतो राजा जयद्रथः ॥

tasya me mandabhāgyasya yatamānasya saṃyuge | hatāni sarvasainyāni hato rājā jayadrathaḥ

मुझ अभागे के युद्ध में प्रयत्न करते रहने पर भी सारी सेनाएँ नष्ट हो गईं और राजा जयद्रथ मारा गया।

श्लोक 16 (7.153.16)

पश्य योधवरान्कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । पार्थनामाङ्कितैर्वाणैः सर्वे नीता यमक्षयम् ॥

paśya yodhavarānkarṇa śataśo'tha sahasraśaḥ | pārthanāmāṅkitairvāṇaiḥ sarve nītā yamakṣayam

कर्ण, देखो, सैकड़ों-हज़ारों श्रेष्ठ योद्धा पार्थ के नाम से अंकित बाणों द्वारा यमलोक पहुँचा दिए गए हैं।

श्लोक 17 (7.153.17)

कथमेकरथेनाजौ बहूनां नः प्रपश्यताम् । विपन्नः सैन्धवो राजा योधाश्चैव सहस्रशः ॥

kathamekarathenājau bahūnāṃ naḥ prapaśyatām | vipannaḥ saindhavo rājā yodhāścaiva sahasraśaḥ

हम सबके देखते-देखते एक ही रथी ने युद्ध में राजा सैन्धव को और हज़ारों योद्धाओं को कैसे नष्ट कर दिया?

श्लोक 18 (7.153.18)

अद्य मे भ्रातरः क्षीणाश्चित्रसेनादयो रणे । भीमसेनं समासाद्य पश्यतां नोदुरात्मनाम् ॥

adya me bhrātaraḥ kṣīṇāścitrasenādayo raṇe | bhīmasenaṃ samāsādya paśyatāṃ nodurātmanām

आज मेरे भाई चित्रसेन आदि युद्ध में भीमसेन के सामने पहुँचकर नष्ट हो गए, और हम दुरात्मा देखते ही रह गए।

कर्ण उवाच

श्लोक 19 (7.153.19)

आचार्यं मा विगर्हस्व शक्त्याऽसौ युध्यते द्विजः । यथाबलं यथोत्साहं त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥

ācāryaṃ mā vigarhasva śaktyā'sau yudhyate dvijaḥ | yathābalaṃ yathotsāhaṃ tyaktvā jīvitamātmanaḥ

आचार्य की निन्दा मत करो; वे ब्राह्मण अपनी शक्ति भर, यथाबल और यथोत्साह, अपने प्राणों की परवाह छोड़कर लड़ रहे हैं।

श्लोक 20 (7.153.20)

यद्येनं समतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः । नात्र सूक्ष्मोऽपि दोषःस्यादाचार्यस्य कथञ्चन ॥

yadyenaṃ samatikramya praviṣṭaḥ śvetavāhanaḥ | nātra sūkṣmo'pi doṣaḥsyādācāryasya kathañcana

यदि श्वेतवाहन (अर्जुन) उन्हें लाँघकर भीतर घुस गया, तो इसमें आचार्य का कहीं ज़रा-सा भी दोष नहीं है।

श्लोक 21 (7.153.21)

कृती दक्षो युवा शूरः कृतास्त्रो लघुविक्रमः । दिव्यास्त्रयुक्तमास्थाय रथं वानरलक्षणम् ॥

kṛtī dakṣo yuvā śūraḥ kṛtāstro laghuvikramaḥ | divyāstrayuktamāsthāya rathaṃ vānaralakṣaṇam

वह कुशल, चतुर, युवा, शूर, अस्त्रविद् और फुर्तीले पराक्रम वाला है; वानर के चिह्न वाले, दिव्य अस्त्रों से सज्जित रथ पर बैठकर—

श्लोक 22 (7.153.22)

कृष्णेन च गृहीताश्वमभेद्यकवचावृतः । गाण्डीवमजरं दिव्यं धनुरादाय वीर्यवान् ॥

kṛṣṇena ca gṛhītāśvamabhedyakavacāvṛtaḥ | gāṇḍīvamajaraṃ divyaṃ dhanurādāya vīryavān

जिसके घोड़ों को कृष्ण ने थाम रखा है, जो अभेद्य कवच पहने है और अजर दिव्य गाण्डीव धनुष लेकर पराक्रमी—

श्लोक 23 (7.153.23)

प्रवर्षन्निशितान्बाणान्बाहुद्रविणदर्पितः । यदर्जुनोऽभ्ययाद्द्रोणमुपपन्नं हि तस्य तत् ॥

pravarṣanniśitānbāṇānbāhudraviṇadarpitaḥ | yadarjuno'bhyayāddroṇamupapannaṃ hi tasya tat

भुजाओं के बल के गर्व से तीखे बाणों की वर्षा करता हुआ अर्जुन जो द्रोण पर चढ़ आया, यह उसके लिए उचित ही था।

श्लोक 24 (7.153.24)

आचार्यः स्थविरो राजञ्शीघ्रयाने तथाऽक्षमः । बाहुव्यायामचेष्टायामशक्तस्तु नराधिप ॥

ācāryaḥ sthaviro rājañśīghrayāne tathā'kṣamaḥ | bāhuvyāyāmaceṣṭāyāmaśaktastu narādhipa

राजन्, आचार्य वृद्ध हैं और शीघ्र गति करने में असमर्थ हैं, और हे नराधिप, भुजाओं के श्रम और चेष्टा में भी अशक्त हैं।

श्लोक 25 (7.153.25)

तेनैवमभ्यतिक्रान्तः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । तस्य दोषं न पश्यामि द्रोणस्यानेन हेतुना ॥

tenaivamabhyatikrāntaḥ śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ | tasya doṣaṃ na paśyāmi droṇasyānena hetunā

इसीलिए श्वेताश्व, कृष्ण-सारथि अर्जुन उन्हें लाँघकर आगे निकल गया; इस कारण मैं द्रोण का कोई दोष नहीं देखता।

श्लोक 26 (7.153.26)

अजय्यान्पाण्डवान्मन्ये द्रोणेनास्त्रविदा मृधे । तथा ह्येनमतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः ॥

ajayyānpāṇḍavānmanye droṇenāstravidā mṛdhe | tathā hyenamatikramya praviṣṭaḥ śvetavāhanaḥ

मैं समझता हूँ कि अस्त्रविद् द्रोण से भी पाण्डव युद्ध में अजेय हैं; तभी तो श्वेतवाहन उन्हें लाँघकर भीतर घुस गया।

श्लोक 27 (7.153.27)

सततं चेष्टमानानां निकृत्या विक्रमेण च । दैवादिष्टोऽन्यथाभावो न मन्ये विद्यते क्वचित् ॥

satataṃ ceṣṭamānānāṃ nikṛtyā vikrameṇa ca | daivādiṣṭo'nyathābhāvo na manye vidyate kvacit

छल और पराक्रम से निरन्तर चेष्टा करते रहने पर भी हमारे लिए यह पलटाव दैव का ठहराया हुआ है; मैं नहीं मानता कि यह कभी और प्रकार का हो सकता है।

श्लोक 28 (7.153.28)

यतो नो युध्यमानानां परं शक्त्या सुयोधन । सैन्धवो निहतो युद्धे दैवमत्र परं स्मृतम् ॥

yato no yudhyamānānāṃ paraṃ śaktyā suyodhana | saindhavo nihato yuddhe daivamatra paraṃ smṛtam

सुयोधन, हम पूरी शक्ति से लड़ते रहे, फिर भी सैन्धव युद्ध में मारा गया; इसमें दैव ही प्रधान कारण माना गया है।

श्लोक 29 (7.153.29)

परं यत्नं कुर्वतां च त्वया सार्धं रणाजिरे । हत्वाऽस्माकं पौरुषं वै दैवं पश्चात्करोति नः ॥

paraṃ yatnaṃ kurvatāṃ ca tvayā sārdhaṃ raṇājire | hatvā'smākaṃ pauruṣaṃ vai daivaṃ paścātkaroti naḥ

तुम्हारे साथ रणभूमि में परम प्रयत्न करते रहने पर भी दैव हमारे पुरुषार्थ को नष्ट करके बाद में हमारे साथ मनचाहा करता है।

श्लोक 30 (7.153.30)

दैवोपसृष्टपुरुषो यत्कर्म कुरुते क्वचित् । कृतं कृतं हि तत्तस्य दैवेन विनिपात्यते ॥

daivopasṛṣṭapuruṣo yatkarma kurute kvacit | kṛtaṃ kṛtaṃ hi tattasya daivena vinipātyate

दैव से ग्रस्त पुरुष कभी जो भी कर्म करता है, उसका किया-कराया सब दैव से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 31 (7.153.31)

यत्कर्तव्यं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । तत्कार्यमविशङ्केन सिद्धिर्दैवे प्रतिष्ठिता ॥

yatkartavyaṃ manuṣyeṇa vyavasāyavatā sadā | tatkāryamaviśaṅkena siddhirdaive pratiṣṭhitā

मनुष्य को दृढ़ निश्चय के साथ जो करना चाहिए, उसे वह सदा बिना हिचक करे; सिद्धि दैव में स्थित है।

श्लोक 32 (7.153.32)

निकृत्या वञ्चिताः पार्था विषयोगैश्च भारत । दग्धा जतुगृहे चापि द्यूतेन च पराजिताः ॥

nikṛtyā vañcitāḥ pārthā viṣayogaiśca bhārata | dagdhā jatugṛhe cāpi dyūtena ca parājitāḥ

हे भारत, पाण्डवों को छल से और विष-प्रयोगों से ठगा गया, लाक्षागृह में जलाया गया और जुए में हराया गया।

श्लोक 33 (7.153.33)

राजनीतिं समाश्रित्य प्रहिताश्चैव काननम् । यत्नेन च कृतं तत्तद्दैवेन विनिपातितम् ॥

rājanītiṃ samāśritya prahitāścaiva kānanam | yatnena ca kṛtaṃ tattaddaivena vinipātitam

राजनीति का सहारा लेकर उन्हें वन भेज दिया गया; और जो-जो कार्य प्रयत्नपूर्वक किया गया, वह सब दैव ने गिरा दिया।

श्लोक 34 (7.153.34)

युध्यस्व यत्नमास्थाय दैवं कृत्वा निरर्थकम् । यततस्तव तेषां च दैवं मार्गेण यास्यति ॥

yudhyasva yatnamāsthāya daivaṃ kṛtvā nirarthakam | yatatastava teṣāṃ ca daivaṃ mārgeṇa yāsyati

प्रयत्न का आश्रय लेकर युद्ध करो और दैव को निरर्थक मानकर चलो; तुम्हारे और उनके प्रयत्न करते रहने पर दैव अपने ही मार्ग से चलेगा।

श्लोक 35 (7.153.35)

न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित् । दुष्कृतं तव वा वीर बुद्ध्या हीनं कुरूद्वह ॥

na teṣāṃ matipūrvaṃ hi sukṛtaṃ dṛśyate kvacit | duṣkṛtaṃ tava vā vīra buddhyā hīnaṃ kurūdvaha

हे वीर, हे कुरुश्रेष्ठ, उनका कोई शुभ कर्म कभी जान-बूझकर किया हुआ नहीं दिखता, और तुम्हारा कोई अशुभ कर्म बुद्धि के अभाव में किया हुआ नहीं दिखता।

श्लोक 36 (7.153.36)

दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा । अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि । तेन युक्तो हि पुरुषः कार्याकार्ये नियुज्यते ॥

daivaṃ pramāṇaṃ sarvasya sukṛtasyetarasya vā | ananyakarma daivaṃ hi jāgarti svapatāmapi | tena yukto hi puruṣaḥ kāryākārye niyujyate

शुभ या अशुभ—सबका प्रमाण दैव है। दैव बिना किसी दूसरे के सहारे काम करता है; सोते हुओं के बीच भी वह जागता रहता है। उससे जुड़ा हुआ पुरुष ही करने और न करने योग्य कार्यों में लगाया जाता है।

श्लोक 37 (7.153.37)

बहूनि तव सैन्यानि योधाश्च बहवस्तव । न तथा पाण्डुपुत्राणामेवं युद्धमवर्तत ॥

bahūni tava sainyāni yodhāśca bahavastava | na tathā pāṇḍuputrāṇāmevaṃ yuddhamavartata

तुम्हारी सेनाएँ बहुत हैं और तुम्हारे योद्धा भी बहुत हैं; पाण्डवों के पास इतने नहीं हैं, फिर भी युद्ध इसी प्रकार चला।

श्लोक 38 (7.153.38)

तैरल्पैर्बहवो यूयं क्षयं नीताः प्रहारिणः । शङ्के दैवस्य तत्कर्म पौरुषं येन नाशितम् ॥

tairalpairbahavo yūyaṃ kṣayaṃ nītāḥ prahāriṇaḥ | śaṅke daivasya tatkarma pauruṣaṃ yena nāśitam

उन थोड़ों ने तुम बहुतेरे प्रहारकर्ताओं को विनाश तक पहुँचा दिया। मुझे लगता है कि यह दैव का ही कर्म है, जिसने पुरुषार्थ को नष्ट कर दिया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (7.153.39)

एवं संभाषमाणानां बहु तत्तज्जनाधिप । पाण्डवानामनीकानि समदृश्यन्त संयुगे ॥

evaṃ saṃbhāṣamāṇānāṃ bahu tattajjanādhipa | pāṇḍavānāmanīkāni samadṛśyanta saṃyuge

हे जनाधिप, इस प्रकार उनके बहुत कुछ बातें करते रहते हुए युद्ध में पाण्डवों की सेनाएँ दिखाई दीं।

श्लोक 40 (7.153.40)

ततः प्रववृते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् । तावकानां परैः सार्धं राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ vyatiṣaktarathadvipam | tāvakānāṃ paraiḥ sārdhaṃ rājandurmantrite tava

तब राजन्, आपकी दुर्मन्त्रणा के कारण आपकी सेना और शत्रुओं के बीच रथों और हाथियों के उलझ जाने वाला युद्ध छिड़ गया।

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154