द्रोण पर्व · अध्याय 154
पाण्डव-सेना पर दुर्योधन का आक्रमण; युधिष्ठिर के बाण से उसका मूर्च्छित होना
पाञ्चालों और कौरवों के बीच रक्त से लथपथ युद्ध छिड़ता है, और मारे गए जयद्रथ के शोक में, मरने का निश्चय किए हुए दुर्योधन पाण्डव-सेना में घुस पड़ता है। धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि कहीं उनके पुत्र ने पीठ तो नहीं दिखाई, और द्रोण, कर्ण, कृप तथा कृतवर्मा ने राजा को क्यों नहीं रोका। सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन दोपहर के सूर्य की तरह दमकता हुआ पाञ्चालों को खदेड़ता है और पाण्डव वीरों को एक-एक करके बींधता है। फिर युधिष्ठिर से उसका द्वन्द्व होता है, उसका ध्वज और धनुष कट जाते हैं, और युधिष्ठिर के बाण से वह मूर्च्छित-सा हो जाता है; तभी द्रोण प्रकट होते हैं और युद्ध फिर भड़क उठता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.154.1)
तदुदीर्णं रथाश्वौघं बलं तव जनाधिप । पाण्डुसेनामतिक्रम्य योधयामास सर्वतः ॥
tadudīrṇaṃ rathāśvaughaṃ balaṃ tava janādhipa | pāṇḍusenāmatikramya yodhayāmāsa sarvataḥ
हे जनाधिप, रथों और घोड़ों की बाढ़-सी वह उमड़ती हुई आपकी सेना पाण्डवों की सेना को लाँघकर चारों ओर लड़ने लगी।
श्लोक 2 (7.154.2)
पाञ्चालाः कुरवश्चैव योधयन्तः परस्परम् । यमराष्ट्राय महते परलोकाय दीक्षिताः ॥
pāñcālāḥ kuravaścaiva yodhayantaḥ parasparam | yamarāṣṭrāya mahate paralokāya dīkṣitāḥ
पाञ्चाल और कौरव एक-दूसरे से लड़ते हुए मानो यमराज के महान् राज्य, अर्थात् परलोक के लिए दीक्षित हो चुके थे।
श्लोक 3 (7.154.3)
शूराः शूरैः समागम्य शरतोमरशक्तिभिः । विव्यधुः समरेऽन्योन्यं निन्युश्चैव यमक्षयम् ॥
śūrāḥ śūraiḥ samāgamya śaratomaraśaktibhiḥ | vivyadhuḥ samare'nyonyaṃ ninyuścaiva yamakṣayam
शूरों ने शूरों से भिड़कर बाणों, तोमरों और शक्तियों से रण में एक-दूसरे को बींधा और यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 4 (7.154.4)
रथिनां रथिभिः सार्धं रुधिरस्रावदारुणम् । प्रावर्तत महद्युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ॥
rathināṃ rathibhiḥ sārdhaṃ rudhirasrāvadāruṇam | prāvartata mahadyuddhaṃ nighnatāmitaretaram
रथियों का रथियों के साथ, एक-दूसरे को मारते हुए, रक्त की धाराओं से भयंकर बना महान् युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 5 (7.154.5)
वारणाश्च महाराज समासाद्य परस्परम् । विषाणैर्दारयामासुः सुसङ्क्रुद्धा मदोत्कटाः ॥
vāraṇāśca mahārāja samāsādya parasparam | viṣāṇairdārayāmāsuḥ susaṅkruddhā madotkaṭāḥ
हे महाराज, मद से उन्मत्त और अत्यन्त क्रुद्ध हाथी भी एक-दूसरे से भिड़कर अपने दाँतों से परस्पर चीरने लगे।
श्लोक 6 (7.154.6)
हयारोहान्हयारोहाः प्रासशक्तिपरश्वथैः । बिभिदुस्तुमुले युद्धे प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥
hayārohānhayārohāḥ prāsaśaktiparaśvathaiḥ | bibhidustumule yuddhe prārthayanto mahadyaśaḥ
उस घमासान युद्ध में घुड़सवार घुड़सवारों को प्रासों, शक्तियों और फरसों से काट रहे थे; सभी बड़ा यश पाना चाहते थे।
श्लोक 7 (7.154.7)
पत्तयश्च महाबाहो शतशः शस्त्रपाणयः । अन्योन्यमार्दयन्राजन्नित्यं यत्ताः पराक्रमे ॥
pattayaśca mahābāho śataśaḥ śastrapāṇayaḥ | anyonyamārdayanrājannityaṃ yattāḥ parākrame
हे महाबाहो, सैकड़ों पैदल सैनिक हाथों में शस्त्र लिए, पराक्रम दिखाने में सदा तत्पर रहकर, हे राजन्, एक-दूसरे को कुचल रहे थे।
श्लोक 8 (7.154.8)
गोत्राणां नामधेयानां कुलानां चैव मारिष । श्रवणाद्धि विजानीमः पाञ्चालान्कुरुभिः सह ॥
gotrāṇāṃ nāmadheyānāṃ kulānāṃ caiva māriṣa | śravaṇāddhi vijānīmaḥ pāñcālānkurubhiḥ saha
हे मान्यवर, कौन पाञ्चाल हैं और कौन कौरव, यह हम केवल उनके गोत्र, नाम और कुल सुनकर ही जान पाते थे।
श्लोक 9 (7.154.9)
तेऽन्योन्यं समरे योधाः शरशक्तिपरश्वथैः । प्रैषयन्परलोकाय विचरन्तो ह्यभीतवत् ॥
te'nyonyaṃ samare yodhāḥ śaraśaktiparaśvathaiḥ | praiṣayanparalokāya vicaranto hyabhītavat
वे योद्धा रण में बाणों, शक्तियों और फरसों से एक-दूसरे को परलोक भेजते हुए निर्भय-से होकर विचर रहे थे।
श्लोक 10 (7.154.10)
शरैर्दश दिशो राजंस्तेषां मुक्तैः सहस्रशः । न भ्राजन्ते यथा पूर्वं भास्करस्य च नाशनात् ॥
śarairdaśa diśo rājaṃsteṣāṃ muktaiḥ sahasraśaḥ | na bhrājante yathā pūrvaṃ bhāskarasya ca nāśanāt
हे राजन्, उनके छोड़े हुए हज़ारों बाणों से दसों दिशाएँ पहले की तरह चमक नहीं रही थीं, मानो सूर्य नष्ट हो गया हो।
श्लोक 11 (7.154.11)
तथा प्रयुध्यमानेषु पाण्डवेयेषु भारत । दुर्योधनो महाराज व्यवागाहत तद्बलम् ॥
tathā prayudhyamāneṣu pāṇḍaveyeṣu bhārata | duryodhano mahārāja vyavāgāhata tadbalam
हे भारत, पाण्डव जब इस प्रकार लड़ रहे थे, तब हे महाराज, दुर्योधन उस सेना में घुस पड़ा।
श्लोक 12 (7.154.12)
सैन्धवस्य वधेनैव भृशं दुःखसमन्वितः । मर्तव्यमिति संचिन्त्य प्राविशच्च द्विषद्बलम् ॥
saindhavasya vadhenaiva bhṛśaṃ duḥkhasamanvitaḥ | martavyamiti saṃcintya prāviśacca dviṣadbalam
सिन्धुराज के वध से वह अत्यन्त दुःखी था; "मुझे मरना ही है" ऐसा सोचकर वह शत्रु-सेना में घुस गया।
श्लोक 13 (7.154.13)
नादयन्रथघोषेण कम्पयन्निव मेदिनीम् । अभ्यवर्तत पुत्रस्ते पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
nādayanrathaghoṣeṇa kampayanniva medinīm | abhyavartata putraste pāṇḍavānāmanīkinīm
रथ की घरघराहट से गर्जना करता हुआ, मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ, आपका पुत्र पाण्डवों की सेना पर टूट पड़ा।
श्लोक 14 (7.154.14)
स सन्निपातस्तुमुलस्तस्य तेषां च भारत । अभवत्सर्वसैन्यानामभावकरणो महान् ॥
sa sannipātastumulastasya teṣāṃ ca bhārata | abhavatsarvasainyānāmabhāvakaraṇo mahān
हे भारत, उसके और उन सबके बीच जो भीषण मुठभेड़ हुई, वह सारी सेनाओं के विनाश का कारण बन गई।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 15 (7.154.15)
तथा हतेषु सैन्येषु तथा कृच्छ्रगतः स्वयम् । कच्चिद्दुर्योधनः सूत नाकार्षीत्पृष्ठतो रणम् ॥
tathā hateṣu sainyeṣu tathā kṛcchragataḥ svayam | kaccidduryodhanaḥ sūta nākārṣītpṛṣṭhato raṇam
हे सूत, सेनाओं के इस प्रकार मारे जाने पर और स्वयं ऐसे संकट में पड़कर, क्या दुर्योधन ने रण में कभी पीठ तो नहीं दिखाई?
श्लोक 16 (7.154.16)
एकस्य च बहूनां च सन्निपातो महानभूत् । विशेषतो हि नृपतेर्विषमं प्रतिभाति मे ॥
ekasya ca bahūnāṃ ca sannipāto mahānabhūt | viśeṣato hi nṛpaterviṣamaṃ pratibhāti me
एक का बहुतों से बड़ा भारी संघर्ष हुआ; मुझे तो राजा के लिए यह विशेष रूप से विषम जान पड़ता है।
श्लोक 17 (7.154.17)
सोऽत्यन्तसुखसंवृद्धो रक्ष्यो लोकस्य चेश्वरः । एको बहून्समासाद्य कच्चिन्नासीत्पराङ्मुखः ॥
so'tyantasukhasaṃvṛddho rakṣyo lokasya ceśvaraḥ | eko bahūnsamāsādya kaccinnāsītparāṅmukhaḥ
जो अत्यन्त सुख में पला है और जगत् का स्वामी होने से जिसकी रक्षा होनी चाहिए, वह अकेला बहुतों से भिड़कर कहीं मुँह तो नहीं मोड़ गया?
श्लोक 18 (7.154.18)
द्रोणः कर्णः कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । नावारयन्कथं युद्धे राजानं राज्यकाङ्क्षिणः ॥
droṇaḥ karṇaḥ kṛpaścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ | nāvārayankathaṃ yuddhe rājānaṃ rājyakāṅkṣiṇaḥ
राज्य की कामना रखने वाले द्रोण, कर्ण, कृप और सात्वत कृतवर्मा ने युद्ध में राजा को क्यों नहीं रोका?
श्लोक 19 (7.154.19)
सर्वोपायैर्हि युद्धेषु रक्षितव्यो महीपतिः । एषा नीतिः परा युद्धे दृष्टा तत्र मनीषिभिः ॥
sarvopāyairhi yuddheṣu rakṣitavyo mahīpatiḥ | eṣā nītiḥ parā yuddhe dṛṣṭā tatra manīṣibhiḥ
युद्धों में राजा की रक्षा सभी उपायों से करनी चाहिए; विचारशील पुरुषों ने युद्ध में यही सबसे बड़ी नीति देखी है।
श्लोक 20 (7.154.20)
प्रविष्टे वै मम सुते परेषां वै महद्बलम् । मामका रथिनां श्रेष्ठाः किमकुर्वत सञ्जय ॥
praviṣṭe vai mama sute pareṣāṃ vai mahadbalam | māmakā rathināṃ śreṣṭhāḥ kimakurvata sañjaya
जब मेरा पुत्र शत्रुओं की विशाल सेना में घुस गया, तब हे सञ्जय, मेरे श्रेष्ठ रथियों ने क्या किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (7.154.21)
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं पुत्रस्य तव भारत । एकस्य च बहूनां च शृणु मे ब्रुवतो ध्रुवम् ॥
rājansaṅgrāmamāścaryaṃ putrasya tava bhārata | ekasya ca bahūnāṃ ca śṛṇu me bruvato dhruvam
हे राजन्, हे भारत, आपके पुत्र के उस अद्भुत संग्राम को, जो एक का बहुतों से हुआ, मैं सच-सच कहता हूँ; सुनिए।
श्लोक 22 (7.154.22)
द्रोणेन वार्यमाणोऽसौ कर्णेन च कृपेण च । प्राविशत्पाण्डवीं सेनां मकरः सागरं यथा ॥
droṇena vāryamāṇo'sau karṇena ca kṛpeṇa ca | prāviśatpāṇḍavīṃ senāṃ makaraḥ sāgaraṃ yathā
द्रोण, कर्ण और कृप के रोकने पर भी वह पाण्डवों की सेना में वैसे ही घुस गया, जैसे मकर समुद्र में घुसता है।
श्लोक 23 (7.154.23)
किरन्निषुसहस्राणि तत्रतत्र तथातथा । पाञ्चालान्पाण्डवांश्चैव विव्याध निशितैः शरैः ॥
kiranniṣusahasrāṇi tatratatra tathātathā | pāñcālānpāṇḍavāṃścaiva vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ
इधर-उधर, जहाँ-तहाँ हज़ारों बाण बरसाते हुए उसने पाञ्चालों और पाण्डवों को तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 24 (7.154.24)
यथोदयगतः सूर्यो रश्मिभिर्नाशयेत्तमः । तथा पुत्रस्तव बलं नाशयत्तन्महाबलः ॥
yathodayagataḥ sūryo raśmibhirnāśayettamaḥ | tathā putrastava balaṃ nāśayattanmahābalaḥ
जैसे उदित होता सूर्य अपनी किरणों से अन्धकार को नष्ट कर देता है, वैसे ही आपके महाबली पुत्र ने उस सेना का नाश कर दिया।
श्लोक 25 (7.154.25)
यथा मध्यन्दिने सूर्यं प्रतपन्तं गभस्तिभिः । तथा तव सुतं मध्ये प्रतपन्तं शरार्चिभिः । न शेकुर्भारतं युद्धे पाण्डवाः समुदीक्षितुम् ॥
yathā madhyandine sūryaṃ pratapantaṃ gabhastibhiḥ | tathā tava sutaṃ madhye pratapantaṃ śarārcibhiḥ | na śekurbhārataṃ yuddhe pāṇḍavāḥ samudīkṣitum
जैसे दोपहर में अपनी किरणों से तपते सूर्य की ओर कोई देख नहीं सकता, वैसे ही युद्ध के बीच अपने बाणों की ज्वालाओं से तपते आपके पुत्र भरतवंशी की ओर पाण्डव आँख उठाकर न देख सके।
श्लोक 26 (7.154.26)
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये । पर्यधावन्त पाञ्चाला वध्यमाना महात्मना ॥
palāyanakṛtotsāhā nirutsāhā dviṣajjaye | paryadhāvanta pāñcālā vadhyamānā mahātmanā
जिनका उत्साह भाग निकलने में था और शत्रु को जीतने का उत्साह मर चुका था, वे पाञ्चाल उस महात्मा के हाथों मारे जाते हुए चारों ओर भागने लगे।
श्लोक 27 (7.154.27)
रुक्मपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैस्तव पुत्रेण धन्विना । अर्द्यमानाः शरैस्तूर्णं न्यपतन्पाण्डुसैनिकाः ॥
rukmapuṅkhaiḥ prasannāgraistava putreṇa dhanvinā | ardyamānāḥ śaraistūrṇaṃ nyapatanpāṇḍusainikāḥ
सुनहरे पंखों और चमकती नोकों वाले बाणों से आपके धनुर्धर पुत्र द्वारा पीड़ित होकर पाण्डव सैनिक शीघ्र ही गिरने लगे।
श्लोक 28 (7.154.28)
व्यद्रवंश्च भयाद्योधा दृष्ट्वा तं परमाहवे । व्यात्ताननमिव प्राप्तमन्तकं प्राणहारिणम् ॥
vyadravaṃśca bhayādyodhā dṛṣṭvā taṃ paramāhave | vyāttānanamiva prāptamantakaṃ prāṇahāriṇam
उस महायुद्ध में उसे मुँह फाड़े आए प्राणहारी यमराज के समान देखकर योद्धा भय से भाग खड़े हुए।
श्लोक 29 (7.154.29)
न तादृशं रणे कर्म कृतवन्तस्तु तावकाः । यादृशं कृतवान्राजा पुत्रस्तव विशाम्पते ॥
na tādṛśaṃ raṇe karma kṛtavantastu tāvakāḥ | yādṛśaṃ kṛtavānrājā putrastava viśāmpate
हे विशाम्पते, आपके पुत्र राजा ने जैसा कर्म किया, वैसा रण में आपके योद्धाओं ने नहीं किया।
श्लोक 30 (7.154.30)
पुत्रेण तव सा सेना पाण्डवी मथिता रणे । नलिनी द्विरदेनेव समन्तात्फुल्लपङ्कजा ॥
putreṇa tava sā senā pāṇḍavī mathitā raṇe | nalinī dviradeneva samantātphullapaṅkajā
आपके पुत्र ने रण में उस पाण्डव सेना को वैसे ही मथ डाला, जैसे हाथी चारों ओर खिले कमलों वाली कमलिनी को मथ डालता है।
श्लोक 31 (7.154.31)
क्षीणतोयानिलार्काभ्यां हतत्विडिव पद्मिनी । बभूव पाण्डवी सेना तव पुत्रस्य तेजसा ॥
kṣīṇatoyānilārkābhyāṃ hatatviḍiva padminī | babhūva pāṇḍavī senā tava putrasya tejasā
आपके पुत्र के तेज से पाण्डव सेना जल, वायु और सूर्य से सूखी हुई, कान्तिहीन कमलिनी के समान हो गई।
श्लोक 32 (7.154.32)
पाण्डुसेनां हतां दृष्ट्वा तव पुत्रेण भारत । भीमसेनपुरोगास्तु पाञ्चालाः समुपाद्रवन् ॥
pāṇḍusenāṃ hatāṃ dṛṣṭvā tava putreṇa bhārata | bhīmasenapurogāstu pāñcālāḥ samupādravan
हे भारत, आपके पुत्र के हाथों पाण्डव सेना को मारी जाती देखकर भीमसेन को आगे करके पाञ्चाल उस पर टूट पड़े।
श्लोक 33 (7.154.33)
स भीमसेनं दशभिर्माद्रीपुत्रौ त्रिभिस्त्रिभिः । विराटद्रुपदौ षड्भिः शतेन च शिखण्डिनम् ॥
sa bhīmasenaṃ daśabhirmādrīputrau tribhistribhiḥ | virāṭadrupadau ṣaḍbhiḥ śatena ca śikhaṇḍinam
उसने भीमसेन को दस, दोनों माद्रीपुत्रों को तीन-तीन, विराट और द्रुपद को छह-छह, और शिखण्डी को सौ बाणों से बींधा।
श्लोक 34 (7.154.34)
धृष्टद्युम्नं च सप्तत्या धर्मपुत्रं च सप्तभिः । केकयांश्चैव चेदींश्च बहुभिर्निशितैः शरैः ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ ca saptatyā dharmaputraṃ ca saptabhiḥ | kekayāṃścaiva cedīṃśca bahubhirniśitaiḥ śaraiḥ
फिर धृष्टद्युम्न को सत्तर, धर्मपुत्र को सात, और केकयों तथा चेदियों को बहुत-से तीखे बाणों से बींधा।
श्लोक 35 (7.154.35)
सात्वतं पञ्चभिर्विद्ध्वा द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः । घटोत्कचं च समरे विद्ध्वा सिंह इवानदत् ॥
sātvataṃ pañcabhirviddhvā draupadeyāṃstribhistribhiḥ | ghaṭotkacaṃ ca samare viddhvā siṃha ivānadat
सात्वत को पाँच और द्रौपदी के पुत्रों को तीन-तीन बाणों से बींधकर तथा रण में घटोत्कच को भी बींधकर वह सिंह की तरह गरजा।
श्लोक 36 (7.154.36)
शतशश्चापरान्योधान्सद्विपांश्च महारणे । शरैरवचकर्तोग्रैः क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ॥
śataśaścāparānyodhānsadvipāṃśca mahāraṇe | śarairavacakartograiḥ kruddho'ntaka iva prajāḥ
उस महायुद्ध में उसने सैकड़ों और योद्धाओं को, हाथियों-सहित, उग्र बाणों से काट डाला, जैसे क्रुद्ध अन्तक प्रजा को काट डालता है।
श्लोक 37 (7.154.37)
सा तेन पाण्डवी सेना वध्यमाना शिलीमुखैः । तव पुत्रेण सङ्ग्रामे विदुद्राव नराधिप ॥
sā tena pāṇḍavī senā vadhyamānā śilīmukhaiḥ | tava putreṇa saṅgrāme vidudrāva narādhipa
हे नराधिप, उसके बाणों से मारी जाती वह पाण्डव सेना आपके पुत्र के सामने रण में भाग खड़ी हुई।
श्लोक 38 (7.154.38)
तं तपन्तमिवादित्यं कुरुराजं महाहवे । नाशकन्वीक्षितुं राजन्पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥
taṃ tapantamivādityaṃ kururājaṃ mahāhave | nāśakanvīkṣituṃ rājanpāṇḍuputrasya sainikāḥ
हे राजन्, उस महायुद्ध में तपते सूर्य के समान उस कुरुराज की ओर पाण्डुपुत्र के सैनिक देख न सके।
श्लोक 39 (7.154.39)
ततो युधिष्ठिरो राजा कुपितो राजसत्तम । अभ्यधावत्कुरुपतिं तव पुत्रं जिघांसया ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā kupito rājasattama | abhyadhāvatkurupatiṃ tava putraṃ jighāṃsayā
तब हे राजश्रेष्ठ, राजा युधिष्ठिर कुपित होकर आपके पुत्र कुरुपति को मार डालने की इच्छा से उसकी ओर दौड़े।
श्लोक 40 (7.154.40)
तावुभौ युधि कौरव्यौ समीयतुररिन्दमौ । स्वार्थहेतोः पराक्रान्तौ दुर्योधनयुधिष्ठिरौ ॥
tāvubhau yudhi kauravyau samīyaturarindamau | svārthahetoḥ parākrāntau duryodhanayudhiṣṭhirau
वे दोनों कुरुवंशी शत्रुदमन, दुर्योधन और युधिष्ठिर, अपने-अपने स्वार्थ के लिए पराक्रम करते हुए युद्ध में आमने-सामने आ गए।
श्लोक 41 (7.154.41)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धः शरैः सन्नतपर्वभिः । विव्याध दशभिस्तूर्णं ध्वजं चिच्छेद चेषुणा ॥
tato duryodhanaḥ kruddhaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | vivyādha daśabhistūrṇaṃ dhvajaṃ ciccheda ceṣuṇā
तब क्रुद्ध दुर्योधन ने झुकी हुई गाँठों वाले दस बाणों से उन्हें शीघ्र बींध दिया और एक बाण से उनका ध्वज काट डाला।
श्लोक 42 (7.154.42)
इन्द्रसेनं त्रिभिश्चैव ललाटे जघ्निवान्नृप । सारथिं दयितं राज्ञः पाण्डवस्य महात्मनः ॥
indrasenaṃ tribhiścaiva lalāṭe jaghnivānnṛpa | sārathiṃ dayitaṃ rājñaḥ pāṇḍavasya mahātmanaḥ
हे राजन्, उसने तीन बाणों से इन्द्रसेन के ललाट पर भी प्रहार किया, जो महात्मा पाण्डव राजा का प्रिय सारथि था।
श्लोक 43 (7.154.43)
धनुश्च पुनरन्येन चकर्तास्य महारथः । चतुर्भिश्चतुरश्चैव बाणैर्विव्याध वाजिनः ॥
dhanuśca punaranyena cakartāsya mahārathaḥ | caturbhiścaturaścaiva bāṇairvivyādha vājinaḥ
उस महारथी ने दूसरे बाण से उनका धनुष फिर काट दिया और चार बाणों से उनके चारों घोड़ों को बींध दिया।
श्लोक 44 (7.154.44)
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धो निमेषादिव कार्मुकम् । अन्यदादाय वेगेन कौरवं प्रत्यवारयत् ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ kruddho nimeṣādiva kārmukam | anyadādāya vegena kauravaṃ pratyavārayat
तब क्रुद्ध युधिष्ठिर ने पलक झपकते ही दूसरा धनुष लेकर वेग से कौरव को रोक दिया।
श्लोक 45 (7.154.45)
तस्य तान्निघ्नतः शत्रून्रुक्मपृष्ठं महद्धनुः । भल्लाभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्त्रिधा चिच्छेद मारिष ॥
tasya tānnighnataḥ śatrūnrukmapṛṣṭhaṃ mahaddhanuḥ | bhallābhyāṃ pāṇḍavo jyeṣṭhastridhā ciccheda māriṣa
हे मान्यवर, शत्रुओं को मारते हुए उस दुर्योधन के सोने की पीठ वाले विशाल धनुष को ज्येष्ठ पाण्डव ने दो भल्लों से तीन टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 46 (7.154.46)
विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शितैः शरैः । मर्म भित्त्वा तु ते सर्वे संलग्नाः क्षितिमाविशन् ॥
vivyādha cainaṃ daśabhiḥ samyagastaiḥ śitaiḥ śaraiḥ | marma bhittvā tu te sarve saṃlagnāḥ kṣitimāviśan
फिर उन्होंने ठीक चलाए हुए दस तीखे बाणों से उसे बींधा; मर्मस्थान को भेदकर वे सब बाण उसमें धँसे रहे और पृथ्वी में समा गए।
श्लोक 47 (7.154.47)
ततः परिवृता योधाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् । वृत्रेण सह युध्यन्तं यद्वद्देवाः शतक्रतुम् ॥
tataḥ parivṛtā yodhāḥ parivavruryudhiṣṭhiram | vṛtreṇa saha yudhyantaṃ yadvaddevāḥ śatakratum
तब चारों ओर से घिरकर आए योद्धाओं ने युधिष्ठिर को घेर लिया, जैसे वृत्र से लड़ते हुए इन्द्र को देवताओं ने घेर लिया था।
श्लोक 48 (7.154.48)
ततो युधिष्ठिरो राजा तव पुत्रस्य मारिष । शरं च सूर्यरश्म्याभमत्युग्रमनिवारणम् । हा हतोऽसीति राजानमुक्त्वाऽमुञ्चद्युधिष्ठिरः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā tava putrasya māriṣa | śaraṃ ca sūryaraśmyābhamatyugramanivāraṇam | hā hato'sīti rājānamuktvā'muñcadyudhiṣṭhiraḥ
तब हे मान्यवर, राजा युधिष्ठिर ने सूर्य की किरण के समान दमकता, अत्यन्त उग्र, अनिवार्य बाण आपके पुत्र पर "हाय, तू मारा गया!" कहकर छोड़ा।
श्लोक 49 (7.154.49)
स तेनाकर्णमुक्तेन विद्धो बाणेन कौरवः । निषसाद रथोपस्थे भृशं सम्मूढचेतनः ॥
sa tenākarṇamuktena viddho bāṇena kauravaḥ | niṣasāda rathopasthe bhṛśaṃ sammūḍhacetanaḥ
कान तक खिंचे धनुष से छूटे उस बाण से बिंधकर कौरव अत्यन्त मूढ़-चित्त होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
श्लोक 50 (7.154.50)
ततः पाञ्चाल्यसेनानां भृशमासीद्रवो महान् । हतो राजेति राजेन्द्र मुदितानां समन्ततः ॥
tataḥ pāñcālyasenānāṃ bhṛśamāsīdravo mahān | hato rājeti rājendra muditānāṃ samantataḥ
हे राजेन्द्र, तब "राजा मारा गया!" कहकर हर्षित होते हुए पाञ्चाल सेनाओं में चारों ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 51 (7.154.51)
बाणशब्दरवश्चोग्रः शुश्रुवे तत्र मारिष । अथ द्रोणो द्रुतं तत्र प्रत्यदृश्यत संयुगे ॥
bāṇaśabdaravaścograḥ śuśruve tatra māriṣa | atha droṇo drutaṃ tatra pratyadṛśyata saṃyuge
हे मान्यवर, वहाँ बाणों की ध्वनि के साथ उग्र कोलाहल सुनाई दिया, और उसी समय द्रोण रणभूमि में शीघ्रता से दिखाई दिए।
श्लोक 52 (7.154.52)
हृष्टो दुर्योधनश्चापि दृढमादाय कार्मुकम् । तिष्ठतिष्ठेति राजानं ब्रुवन्पाण्डवमभ्ययात् ॥
hṛṣṭo duryodhanaścāpi dṛḍhamādāya kārmukam | tiṣṭhatiṣṭheti rājānaṃ bruvanpāṇḍavamabhyayāt
दुर्योधन भी प्रसन्न होकर दृढ़ता से धनुष उठाकर "ठहर, ठहर!" कहता हुआ पाण्डव राजा की ओर बढ़ा।
श्लोक 53 (7.154.53)
प्रत्युद्ययुस्तं त्वरिताः पाञ्चाला जयगृद्धिनः । तान्द्रोणः प्रतिजग्राह परीप्सन्कुरुसत्तमम् । चण्डवातः समुद्धूतो मेघानम्बुमुचो यथा ॥
pratyudyayustaṃ tvaritāḥ pāñcālā jayagṛddhinaḥ | tāndroṇaḥ pratijagrāha parīpsankurusattamam | caṇḍavātaḥ samuddhūto meghānambumuco yathā
विजय के लोभी पाञ्चाल तेज़ी से उसकी ओर बढ़े, और कुरुश्रेष्ठ को बचाना चाहने वाले द्रोण ने उन्हें रोक लिया, जैसे उठी हुई प्रचण्ड आँधी जल बरसाने वाले मेघों का सामना करती है।
श्लोक 54 (7.154.54)
ततो राजन्महानासीत्सङ्ग्रामो भूरिवर्धनः । तावकानां परेषां च समेतानां युयुत्सया ॥
tato rājanmahānāsītsaṅgrāmo bhūrivardhanaḥ | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca sametānāṃ yuyutsayā
तब हे राजन्, युद्ध की इच्छा से भिड़े हुए आपके और शत्रुओं के सैनिकों के बीच बढ़ता हुआ भारी संग्राम छिड़ गया।