द्रोण पर्व · अध्याय 156
भीमसेन द्वारा दुर्मद, दुष्कर्ण आदि का वध
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि द्रोण के पाञ्चालों की सेना में घुसने पर रात के युद्ध में कौरवों और पाण्डवों ने क्या किया। सञ्जय बताते हैं कि द्रोण ने केकयों और शिबि को मार गिराया; भीम ने कलिङ्ग-राजकुमार और कर्ण के भाई द्रुम को मारा, जयरात और उसके सारथि को भूमि पर पटका, कर्ण की शक्ति पकड़ ली और अन्त में दुर्मद और दुष्कर्ण को पैरों तले कुचल डाला, जिससे राजा उसे रुद्र समझकर भाग खड़े हुए। पाण्डव भीम का सत्कार करते हैं और अँधेरे में दोनों पक्ष फिर आपस में भिड़ जाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.156.1)
तस्मिन्प्रविष्टे दुर्धर्षे सृञ्जयानमितौजसि । अमृष्यमाणे संरब्धे का वोऽभूद्वै मतिस्तदा ॥
tasminpraviṣṭe durdharṣe sṛñjayānamitaujasi | amṛṣyamāṇe saṃrabdhe kā vo'bhūdvai matistadā
जब वह दुर्धर्ष, अपार पराक्रमी योद्धा क्रोध से भरकर, उन्हें सहन न करता हुआ सृञ्जयों के बीच घुस गया, तब आप सबने क्या निश्चय किया?
श्लोक 2 (7.156.2)
दुर्योधनं तथा पुत्रमुक्त्वा शास्त्रातिगं मम । यत्प्राविशदमेयात्मा किं पार्थः प्रत्यपद्यत ॥
duryodhanaṃ tathā putramuktvā śāstrātigaṃ mama | yatprāviśadameyātmā kiṃ pārthaḥ pratyapadyata
मेरे शास्त्र की मर्यादा लाँघने वाले पुत्र दुर्योधन से कहकर जब वह अमेयात्मा भीतर घुस गया, तब पार्थ ने उसके उत्तर में क्या किया?
श्लोक 3 (7.156.3)
निहते सैन्धवे वीरे भूरिश्रवसि चैव ह । यदाऽभ्यगान्महातेजाः पाञ्चालानपराजितः ॥
nihate saindhave vīre bhūriśravasi caiva ha | yadā'bhyagānmahātejāḥ pāñcālānaparājitaḥ
जब वीर सैन्धव और भूरिश्रवा मारे जा चुके थे और वह अपराजित महातेजस्वी योद्धा पाञ्चालों की ओर बढ़ा,
श्लोक 4 (7.156.4)
किममन्यत दुर्धर्षे प्रविष्टे शत्रुतापने । दुर्योधनस्तु किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ॥
kimamanyata durdharṣe praviṣṭe śatrutāpane | duryodhanastu kiṃ kṛtyaṃ prāptakālamamanyata
तब उस दुर्धर्ष शत्रुतापन ने, भीतर घुसकर, क्या सोचा? और दुर्योधन ने उस समय के योग्य कर्तव्य किसे माना?
श्लोक 5 (7.156.5)
के च तं वरदं वीरमन्वयुर्द्विजसत्तमम् । के चास्य पृष्ठतोऽगच्छन्वीराः शूरस्य युध्यतः । के पुरस्तादवर्तन्त निघ्नन्तः शात्रवान्रणे ॥
ke ca taṃ varadaṃ vīramanvayurdvijasattamam | ke cāsya pṛṣṭhato'gacchanvīrāḥ śūrasya yudhyataḥ | ke purastādavartanta nighnantaḥ śātravānraṇe
वरदान देने वाले, द्विजश्रेष्ठ उस वीर के पीछे-पीछे कौन गए? लड़ते हुए उस शूर के पीछे कौन-कौन वीर चले? और रण में शत्रुओं को मारते हुए उसके आगे कौन थे?
श्लोक 6 (7.156.6)
मन्येऽहं पाण्डवान्सर्वान्भारद्वाजशरार्दितान् । शिशिरे कम्पमाना वै कृशा गाव इव प्रभो ॥
manye'haṃ pāṇḍavānsarvānbhāradvājaśarārditān | śiśire kampamānā vai kṛśā gāva iva prabho
मैं समझता हूँ कि भारद्वाज के बाणों से पीड़ित सभी पाण्डव शिशिर में काँपती दुबली गायों के समान हो गए होंगे, हे प्रभो।
श्लोक 7 (7.156.7)
प्रविश्य स महेष्वासः पाञ्चालानरिमर्दनः । कथं नु पुरुषव्याघ्रः पञ्चत्वमुपजग्मिवान् ॥
praviśya sa maheṣvāsaḥ pāñcālānarimardanaḥ | kathaṃ nu puruṣavyāghraḥ pañcatvamupajagmivān
पाञ्चालों में घुसकर वह महाधनुर्धर, शत्रुओं को कुचलने वाला पुरुषव्याघ्र मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ?
श्लोक 8 (7.156.8)
सर्वेषु योधेषु च सङ्गतेषु । रात्रौ समेतेषु महारथेषु । संलोड्यमानेषु पृथग्बलेषु । के वस्तदानीं मतिमन्त आसन् ॥
sarveṣu yodheṣu ca saṅgateṣu | rātrau sameteṣu mahāratheṣu | saṃloḍyamāneṣu pṛthagbaleṣu | ke vastadānīṃ matimanta āsan
जब सभी योद्धा एकत्र हो गए थे, रात में महारथी आ जुटे थे और अलग-अलग सेनाएँ उथल-पुथल में पड़ी थीं, तब तुम लोगों में कौन बुद्धिमान बना रहा?
श्लोक 9 (7.156.9)
हतांश्चैव विषक्तांश्च पराभूतांश्च शंससि । रथिनो विरथांश्चैव कृतान्युद्धेषु मामकान् ॥
hatāṃścaiva viṣaktāṃśca parābhūtāṃśca śaṃsasi | rathino virathāṃścaiva kṛtānyuddheṣu māmakān
तुम बताते हो कि मेरे योद्धा मारे गए, उलझ गए, पराजित हो गए और युद्धों में रथी रथहीन कर दिए गए।
श्लोक 10 (7.156.10)
तेषां संलोड्यमानानां पाण्डवैर्हतचेतसाम् । अन्धे तमसि मग्नानामभवत्का मतिस्तदा ॥
teṣāṃ saṃloḍyamānānāṃ pāṇḍavairhatacetasām | andhe tamasi magnānāmabhavatkā matistadā
पाण्डवों के हाथों होश खो बैठे, घने अन्धकार में डूबे और उथल-पुथल में पड़े उन योद्धाओं का तब क्या निश्चय रहा?
श्लोक 11 (7.156.11)
प्रहृष्टांश्चाप्युदग्रांश्च सन्तुष्टांश्चैव पाण्डवान् । शंससीहाप्रहृष्टांश्च विभ्रष्टांश्चैव मामकान् ॥
prahṛṣṭāṃścāpyudagrāṃśca santuṣṭāṃścaiva pāṇḍavān | śaṃsasīhāprahṛṣṭāṃśca vibhraṣṭāṃścaiva māmakān
तुम पाण्डवों को प्रसन्न, उत्साह से भरे और सन्तुष्ट बताते हो, और मेरे योद्धाओं को उदास तथा भ्रष्ट।
श्लोक 12 (7.156.12)
कथमेषां तदा तत्र पार्थानामपलायिनाम् । प्रकाशमभवद्रात्रौ कथं कुरुषु सञ्जय ॥
kathameṣāṃ tadā tatra pārthānāmapalāyinām | prakāśamabhavadrātrau kathaṃ kuruṣu sañjaya
तब रात में न भागने वाले उन पार्थों को प्रकाश कैसे मिला? और कुरुओं में क्या दशा रही, सञ्जय?
सञ्जय उवाच
श्लोक 13 (7.156.13)
रात्रियुद्धे तदा राजन्वर्तमाने सुदारुणे । द्रोणमभ्यद्रवन्सर्वे पाण्डवाः सह सोमकैः ॥
rātriyuddhe tadā rājanvartamāne sudāruṇe | droṇamabhyadravansarve pāṇḍavāḥ saha somakaiḥ
हे राजन्, जब वह भयानक रात्रियुद्ध चल रहा था, तब सोमकों सहित सभी पाण्डव द्रोण पर टूट पड़े।
श्लोक 14 (7.156.14)
ततो द्रोणः केकयांश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजान् । सम्प्रैषयत्प्रेतलोकं सर्वानिषुभिराशुगैः ॥
tato droṇaḥ kekayāṃśca dhṛṣṭadyumnasya cātmajān | sampraiṣayatpretalokaṃ sarvāniṣubhirāśugaiḥ
तब द्रोण ने केकयों को और धृष्टद्युम्न के पुत्रों को, सबको अपने तीव्र बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 15 (7.156.15)
तस्य प्रमुखतो राजन्येऽवर्तन्त महारथाः । तान्सर्वान्प्रेषयामास पितृलोकं स भारत ॥
tasya pramukhato rājanye'vartanta mahārathāḥ | tānsarvānpreṣayāmāsa pitṛlokaṃ sa bhārata
हे राजन्, जो-जो महारथी उसके सामने डटे थे, उन सबको उसने पितृलोक भेज दिया, हे भारत।
श्लोक 16 (7.156.16)
प्रमथ्नन्तं तदा वीरान्भारद्वाजं महारथम् । अभ्यवर्तत सङ्क्रुद्धः शिबी राजा प्रतापवान् ॥
pramathnantaṃ tadā vīrānbhāradvājaṃ mahāratham | abhyavartata saṅkruddhaḥ śibī rājā pratāpavān
जब महारथी भारद्वाज वीरों को मथ रहा था, तब प्रतापी राजा शिबि क्रोध से भरकर उसके सामने बढ़ा।
श्लोक 17 (7.156.17)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य पाण्डवानां महारथम् । विव्याध दशभिर्द्रोणः सर्वपारशवैः शितैः ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya pāṇḍavānāṃ mahāratham | vivyādha daśabhirdroṇaḥ sarvapāraśavaiḥ śitaiḥ
पाण्डवों के उस महारथी को अपनी ओर आते देखकर द्रोण ने उसे दस तीखे, पूर्णतः लोहे के बने बाणों से बींध दिया।
श्लोक 18 (7.156.18)
तं शिबिः प्रतिविव्याध त्रिंशता निशितैः शरैः । सारथिं चास्य भुल्लेन स्मयमानो न्यपातयत् ॥
taṃ śibiḥ prativivyādha triṃśatā niśitaiḥ śaraiḥ | sārathiṃ cāsya bhullena smayamāno nyapātayat
शिबि ने तीस तीखे बाणों से उसे उत्तर में बींधा और मुस्कराते हुए एक भल्ल से उसके सारथि को गिरा दिया।
श्लोक 19 (7.156.19)
तस्य द्रोणो हयान्हत्वा सारथिं च महात्मनः । अथाऽस्य सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ॥
tasya droṇo hayānhatvā sārathiṃ ca mahātmanaḥ | athā'sya saśirastrāṇaṃ śiraḥ kāyādapāharat
द्रोण ने उस महात्मा के घोड़ों और सारथि को मारकर शिरस्त्राण सहित उसका सिर धड़ से उतार लिया।
श्लोक 20 (7.156.20)
ततोऽस्य सारथिं क्षिप्रमन्यं दुर्योधनोऽदिशत् । स तेन सङ्गृहीताश्वः पुनरभ्यद्रवद्रिपून् ॥
tato'sya sārathiṃ kṣipramanyaṃ duryodhano'diśat | sa tena saṅgṛhītāśvaḥ punarabhyadravadripūn
तब दुर्योधन ने तुरन्त उसके लिए दूसरा सारथि नियुक्त किया, और उसके द्वारा घोड़े सँभाले जाने पर वह फिर शत्रुओं पर टूट पड़ा।
श्लोक 21 (7.156.21)
कलिङ्गानामनीकेन कालिङ्गस्य सुतो रणे । पूर्वं पितृवधात्क्रुद्धो भीमसेनमुपाद्रवत् ॥
kaliṅgānāmanīkena kāliṅgasya suto raṇe | pūrvaṃ pitṛvadhātkruddho bhīmasenamupādravat
कलिङ्गराज का पुत्र, अपने पिता के पहले हुए वध से क्रुद्ध होकर, कलिङ्ग सेना के साथ रण में भीमसेन पर चढ़ आया।
श्लोक 22 (7.156.22)
स भीमं पञ्चभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः । विशोकं त्रिभिरानर्च्छद्ध्वजमेकेन पत्रिणा ॥
sa bhīmaṃ pañcabhirviddhvā punarvivyādha saptabhiḥ | viśokaṃ tribhirānarcchaddhvajamekena patriṇā
उसने भीम को पाँच बाणों से बींधकर फिर सात से बींधा, विशोक को तीन से और ध्वज को एक बाण से मारा।
श्लोक 23 (7.156.23)
कलिङ्गानां तु तं शूरं क्रुद्धं क्रुद्धो वृकोदरः । रथाद्रथमभिद्रुत्य मुष्टिनाऽभिजघान ह ॥
kaliṅgānāṃ tu taṃ śūraṃ kruddhaṃ kruddho vṛkodaraḥ | rathādrathamabhidrutya muṣṭinā'bhijaghāna ha
तब क्रुद्ध वृकोदर ने कलिङ्गों के उस क्रुद्ध शूर पर रथ से रथ की ओर दौड़कर मुक्के से प्रहार किया।
श्लोक 24 (7.156.24)
तस्य मुष्टिहतस्याजौ पाण्डवेन बलीयसा । सर्वाण्यस्थीनि सहसा प्रापतन्वै पृथक्पृथक् ॥
tasya muṣṭihatasyājau pāṇḍavena balīyasā | sarvāṇyasthīni sahasā prāpatanvai pṛthakpṛthak
बलवान् पाण्डव के मुक्के की चोट खाते ही युद्ध में उसकी सारी हड्डियाँ एक साथ अलग-अलग बिखर गईं।
श्लोक 25 (7.156.25)
तस्मिन्हते तदा तेन सिंहनादो महानभूत् । पाञ्चालानां महाराज साधुसाध्विति पाण्डवम् ॥
tasminhate tadā tena siṃhanādo mahānabhūt | pāñcālānāṃ mahārāja sādhusādhviti pāṇḍavam
हे महाराज, उसके मारे जाने पर पाञ्चालों ने पाण्डव के लिए "साधु, साधु" कहते हुए बड़ा सिंहनाद किया।
श्लोक 26 (7.156.26)
तं कर्णो भ्रातरश्चास्य नामृष्यन्त परन्तप । ते भीमसेनं नाराचैर्जघ्नुराशीविषोपमैः ॥
taṃ karṇo bhrātaraścāsya nāmṛṣyanta parantapa | te bhīmasenaṃ nārācairjaghnurāśīviṣopamaiḥ
हे परन्तप, कर्ण और उसके भाई इसे सहन न कर सके। उन्होंने विषैले सर्पों के समान नाराचों से भीमसेन को घायल किया।
श्लोक 27 (7.156.27)
ततः शत्रुरथं त्यक्त्वा भीमो द्रुमरथं गतः । द्रुमं चास्यन्तमनिशं मुष्टिना समपोथयत् ॥
tataḥ śatrurathaṃ tyaktvā bhīmo drumarathaṃ gataḥ | drumaṃ cāsyantamaniśaṃ muṣṭinā samapothayat
तब भीम शत्रु का रथ छोड़कर द्रुम के रथ पर जा पहुँचा, और निरन्तर बाण चलाते हुए द्रुम को उसने मुक्के से कुचल डाला।
श्लोक 28 (7.156.28)
यथा काचमणिर्न्यस्तो मुष्टिनैकेन लीलया । स हतः सर्वथा चूर्णो रक्तमेवोदपद्यत ॥
yathā kācamaṇirnyasto muṣṭinaikena līlayā | sa hataḥ sarvathā cūrṇo raktamevodapadyata
जैसे रखा हुआ काँच का मणि एक मुक्के से खेल-खेल में चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही वह मारा जाकर पूरी तरह चूर्ण हो गया और केवल रक्त ही रक्त रह गया;
श्लोक 29 (7.156.29)
तथा चूर्णमभूत्तत्र कर्णभ्राता द्रुमस्तथा । स तदा पाण्डुपुत्रेण बलिनाऽभिहतोऽपतत् ॥
tathā cūrṇamabhūttatra karṇabhrātā drumastathā | sa tadā pāṇḍuputreṇa balinā'bhihato'patat
वैसे ही कर्ण का भाई द्रुम वहाँ चूर्ण हो गया। बलवान् पाण्डुपुत्र के प्रहार से मारा जाकर वह उस समय गिर पड़ा।
श्लोक 30 (7.156.30)
तं निहत्य महाराज भीमसेनो महाबलः । जयरातरथं प्राप्य मुहुः सिंह इवानदत् ॥
taṃ nihatya mahārāja bhīmaseno mahābalaḥ | jayarātarathaṃ prāpya muhuḥ siṃha ivānadat
हे महाराज, उसे मारकर महाबली भीमसेन जयरात के रथ पर पहुँचा और बार-बार सिंह के समान गरजा।
श्लोक 31 (7.156.31)
जयरातं तु चरणे गृह्य भीमो महाबलः । सूतं चास्य महाबाहुर्गृह्य राजंस्तथैव च ॥
jayarātaṃ tu caraṇe gṛhya bhīmo mahābalaḥ | sūtaṃ cāsya mahābāhurgṛhya rājaṃstathaiva ca
महाबली भीम ने जयरात को पैर से पकड़ लिया, और हे राजन्, उस महाबाहु ने उसके सारथि को भी उसी तरह पकड़ लिया;
श्लोक 32 (7.156.32)
पादयोर्गृह्य तौ वीरौ भीमः कर्णस्य पश्यतः । भूमावाविद्ध्य जघ्ने स तौ च प्राणैर्व्ययुज्यताम् ॥
pādayorgṛhya tau vīrau bhīmaḥ karṇasya paśyataḥ | bhūmāvāviddhya jaghne sa tau ca prāṇairvyayujyatām
और उन दोनों वीरों को पैरों से पकड़कर, कर्ण के देखते-देखते भीम ने उन्हें घुमाकर भूमि पर पटक दिया और मार डाला; वे दोनों प्राणों से वियुक्त हो गए।
श्लोक 33 (7.156.33)
कर्णस्तु पाण्डवे शक्तिं काञ्चनीं समवासृजत् । ततस्तामेव जग्राह प्रहसन्पाण्डुनन्दनः ॥
karṇastu pāṇḍave śaktiṃ kāñcanīṃ samavāsṛjat | tatastāmeva jagrāha prahasanpāṇḍunandanaḥ
कर्ण ने पाण्डव पर सोने की शक्ति छोड़ी, और पाण्डुनन्दन ने हँसते हुए उसी शक्ति को पकड़ लिया।
श्लोक 34 (7.156.34)
कर्णायैव च दुर्धर्षश्चिक्षेपाजौ वृकोदरः । तामापतन्तीं चिच्छेद शकुनिस्तैलपायिना ॥
karṇāyaiva ca durdharṣaścikṣepājau vṛkodaraḥ | tāmāpatantīṃ ciccheda śakunistailapāyinā
दुर्धर्ष वृकोदर ने उसे रण में कर्ण पर ही फेंका, किन्तु आती हुई उस शक्ति को शकुनि ने तेल से चमकाए हुए शस्त्र से काट डाला।
श्लोक 35 (7.156.35)
एतत्कृत्वा महत्कर्म रणेऽद्भुतपराक्रमः । पुनः स्वरथमास्थाय दुद्राव तव वाहिनीम् ॥
etatkṛtvā mahatkarma raṇe'dbhutaparākramaḥ | punaḥ svarathamāsthāya dudrāva tava vāhinīm
रण में यह अद्भुत पराक्रम का महान् कार्य करके वह फिर अपने रथ पर चढ़कर आपकी सेना पर दौड़ पड़ा।
श्लोक 36 (7.156.36)
तमायान्तं जिघांसन्तं भीमं क्रुद्धमिवान्तकम् । न्यवारयन्महाबाहुं तव पुत्रा विशाम्पते । महता शरवर्षेण च्छादयन्तो महारथाः ॥
tamāyāntaṃ jighāṃsantaṃ bhīmaṃ kruddhamivāntakam | nyavārayanmahābāhuṃ tava putrā viśāmpate | mahatā śaravarṣeṇa cchādayanto mahārathāḥ
हे प्रजापति, मारने की इच्छा से क्रुद्ध यम के समान आते हुए उस महाबाहु भीम को आपके पुत्रों ने रोका; वे महारथी बाणों की बड़ी वर्षा से उसे ढकने लगे।
श्लोक 37 (7.156.37)
दुर्मदस्य ततो भीमः प्रहसन्निव संयुगे । सारथिं च हयांश्चैव शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥
durmadasya tato bhīmaḥ prahasanniva saṃyuge | sārathiṃ ca hayāṃścaiva śarairninye yamakṣayam
तब रण में मानो हँसते हुए भीम ने बाणों से दुर्मद के सारथि और घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 38 (7.156.38)
दुर्मदस्तु ततो यानं दुष्कर्णस्यावचक्रमे । तावेकरथमारूढौ भ्रातरौ परतापनौ ॥
durmadastu tato yānaṃ duṣkarṇasyāvacakrame | tāvekarathamārūḍhau bhrātarau paratāpanau
तब दुर्मद दुष्कर्ण के रथ पर चला गया, और शत्रुओं को तपाने वाले वे दोनों भाई एक ही रथ पर सवार हो गए।
श्लोक 39 (7.156.39)
सङ्ग्रामशिरसो मध्ये भीमं द्वावप्यधावताम् । यथाम्बुपतिमित्रौ हि तारकं दैत्यसत्तमम् ॥
saṅgrāmaśiraso madhye bhīmaṃ dvāvapyadhāvatām | yathāmbupatimitrau hi tārakaṃ daityasattamam
युद्ध के अग्रभाग में वे दोनों भीम पर दौड़ पड़े, जैसे जलपति के दो मित्र दैत्यश्रेष्ठ तारक पर झपटे हों।
श्लोक 40 (7.156.40)
ततस्तु दुर्मदश्चैव दुष्कर्णश्च तवात्मजौ । रथमेकं समारुह्य भीमं बाणैरविध्यताम् ॥
tatastu durmadaścaiva duṣkarṇaśca tavātmajau | rathamekaṃ samāruhya bhīmaṃ bāṇairavidhyatām
तब आपके पुत्र दुर्मद और दुष्कर्ण एक ही रथ पर चढ़कर भीम को बाणों से बींधने लगे।
श्लोक 41 (7.156.41)
ततः कर्णस्य मिषतो द्रौणेर्दुर्योधनस्य च । कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च पाण्डवः ॥
tataḥ karṇasya miṣato drauṇerduryodhanasya ca | kṛpasya somadattasya bāhlīkasya ca pāṇḍavaḥ
तब कर्ण, द्रोणपुत्र, दुर्योधन, कृप, सोमदत्त और बाह्लीक के देखते-देखते वह पाण्डव,
श्लोक 42 (7.156.42)
दुर्मदस्य च वीरस्य दुष्कर्णस्य च तं रथम् । पादप्रहारेण धरां प्रावेशयदरिन्दमः ॥
durmadasya ca vīrasya duṣkarṇasya ca taṃ ratham | pādaprahāreṇa dharāṃ prāveśayadarindamaḥ
शत्रुओं का दमन करने वाला भीम, वीर दुर्मद और दुष्कर्ण के उस रथ को पैर के प्रहार से धरती में धँसा बैठा।
श्लोक 43 (7.156.43)
ततः सुतौ ते बलिनौ शूरौ दुष्कर्णदुर्मदौ । मुष्टिनाऽऽहत्य सङ्क्रुद्धो ममर्द चरणेन ह ॥
tataḥ sutau te balinau śūrau duṣkarṇadurmadau | muṣṭinā''hatya saṅkruddho mamarda caraṇena ha
तब क्रुद्ध होकर उसने आपके दोनों बलवान् शूर पुत्रों दुष्कर्ण और दुर्मद को मुक्के से मारकर पैर से कुचल डाला।
श्लोक 44 (7.156.44)
ततो हाहाकृते सैन्ये दृष्ट्वा भीमं नृपाऽब्रुवन् । रुद्रोऽयं भीमरूपेण धार्तराष्ट्रेषु युध्यति ॥
tato hāhākṛte sainye dṛṣṭvā bhīmaṃ nṛpā'bruvan | rudro'yaṃ bhīmarūpeṇa dhārtarāṣṭreṣu yudhyati
तब सेना में हाहाकार मच गया, और भीम को देखकर राजा लोग बोले, "भीम के रूप में यह रुद्र ही धृतराष्ट्र के पुत्रों के बीच लड़ रहा है।"
श्लोक 45 (7.156.45)
एवमुक्त्वा पलायन्ते सर्वे भारत पार्थिवाः । विसंज्ञा वाहयन्वाहान्न च द्वौ सह धावतः ॥
evamuktvā palāyante sarve bhārata pārthivāḥ | visaṃjñā vāhayanvāhānna ca dvau saha dhāvataḥ
यह कहकर हे भारत, सभी राजा बेसुध होकर अपने वाहनों को हाँकते हुए भाग चले; दो भी एक साथ नहीं भाग रहे थे।
श्लोक 46 (7.156.46)
ततो बले भृशलुलिते निशामुखे । सुपूजितो नृपवृषभैर्वृकोदरः । महाबलः कमलविबुद्धलोचनो । युधिष्ठिरं नृपतिमपूजयद्बली ॥
tato bale bhṛśalulite niśāmukhe | supūjito nṛpavṛṣabhairvṛkodaraḥ | mahābalaḥ kamalavibuddhalocano | yudhiṣṭhiraṃ nṛpatimapūjayadbalī
तब रात्रि के आरम्भ में सेना के अत्यन्त विचलित हो जाने पर, राजाओं में श्रेष्ठ वीरों से खूब सम्मानित, खिले कमल के समान नेत्रों वाले महाबली वृकोदर ने राजा युधिष्ठिर का अभिवादन किया।
श्लोक 47 (7.156.47)
ततो यमौ द्रुपदविराटकेकया । युधिष्ठिरश्चापि परां मुदं ययुः । वृकोदरं भृशमनुपूजयंश्च ते । यथान्धके प्रतिनिहते हरं सुराः ॥
tato yamau drupadavirāṭakekayā | yudhiṣṭhiraścāpi parāṃ mudaṃ yayuḥ | vṛkodaraṃ bhṛśamanupūjayaṃśca te | yathāndhake pratinihate haraṃ surāḥ
तब दोनों जुड़वाँ भाई, द्रुपद, विराट, केकय और युधिष्ठिर भी परम आनन्द को प्राप्त हुए, और उन्होंने वृकोदर का वैसा ही बड़ा सत्कार किया जैसा अन्धक के मारे जाने पर देवताओं ने हर का किया था।
श्लोक 48 (7.156.48)
ततः सुतास्ते वरुणात्मजोपमा । रुषान्विताः सह गुरुणा महात्मना । वृकोदरं सरथपदातिकुञ्जरा । युयुत्सवो भृशमभिपर्यवारयन् ॥
tataḥ sutāste varuṇātmajopamā | ruṣānvitāḥ saha guruṇā mahātmanā | vṛkodaraṃ sarathapadātikuñjarā | yuyutsavo bhṛśamabhiparyavārayan
तब वरुण के पुत्रों के समान आपके पुत्र रोष से भरकर, महात्मा गुरु द्रोण के साथ, रथों, पैदलों और हाथियों सहित, युद्ध की इच्छा से वृकोदर को चारों ओर से घेरने लगे।
श्लोक 49 (7.156.49)
ततो यमौ द्रुपदसुताः ससैनिका । युधिष्ठिरद्रुपदविराटसात्वताः । घटोत्कचो जयविजयौ द्रुमो वृकः । ससृञ्जयास्तव तनयानवारयन् ॥
tato yamau drupadasutāḥ sasainikā | yudhiṣṭhiradrupadavirāṭasātvatāḥ | ghaṭotkaco jayavijayau drumo vṛkaḥ | sasṛñjayāstava tanayānavārayan
तब दोनों जुड़वाँ भाइयों, सेना सहित द्रुपद के पुत्रों, युधिष्ठिर, द्रुपद, विराट और सात्वतों, घटोत्कच, जय और विजय, द्रुम और वृक ने सृञ्जयों सहित आपके पुत्रों को रोक लिया।
श्लोक 50 (7.156.50)
ततोऽभवत्तिमिरघनैरिवावृते । महाभये भयदमतीव दारुणम् । निशामुखे वृकबलगृध्रमोदनं । महात्मनाम् नृपवर युद्धमद्भुतम् ॥
tato'bhavattimiraghanairivāvṛte | mahābhaye bhayadamatīva dāruṇam | niśāmukhe vṛkabalagṛdhramodanaṃ | mahātmanām nṛpavara yuddhamadbhutam
तब मानो अन्धकार के घने बादलों से ढका हुआ, महाभयानक, भय देने वाला और अत्यन्त दारुण वह रात्रि के आरम्भ का युद्ध, भेड़ियों और गिद्धों को आनन्द देने वाला हो उठा; हे नृपश्रेष्ठ, महात्माओं का वह युद्ध अद्भुत था।