द्रोण पर्व · अध्याय 157
सात्यकि और सोमदत्त; अश्वत्थामा का घटोत्कच से युद्ध
अपने पुत्र भूरिश्रवा के शोक में सोमदत्त सात्यकि को धिक्कारता है और रात बीतने से पहले उसे मारने की शपथ लेता है; सात्यकि उसे उत्तर देता है, और घायल सोमदत्त को उसका सारथि रणभूमि से हटा ले जाता है। फिर द्रोण रात में पाण्डव-सेना पर टूट पड़ते हैं और अर्जुन तथा भीमसेन उनका सामना करने बढ़ते हैं। अश्वत्थामा सात्यकि पर चढ़ आता है और राक्षसों की सेना के साथ घटोत्कच उसके सामने आता है; अश्वत्थामा उसकी मायाओं को नष्ट करता है, उसके पुत्र अञ्जनपर्वा को मार डालता है, और लम्बे युद्ध में राक्षस-सेना को भस्म कर कई पाण्डव-राजकुमारों को मार गिराता है। अन्त में घटोत्कच बाण से गिरा दिया जाता है, धृष्टद्युम्न अपना रथ हटा ले जाता है और सभी प्राणी अश्वत्थामा का सम्मान करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.157.1)
प्रायोपविष्टे तु हते पुत्रे सात्यकिना तदा । सोमदत्तो भृशं क्रुद्धः सात्यकिं वाक्यमब्रवीत् ॥
prāyopaviṣṭe tu hate putre sātyakinā tadā | somadatto bhṛśaṃ kruddhaḥ sātyakiṃ vākyamabravīt
उस समय जब आमरण उपवास में बैठे हुए उसके पुत्र को सात्यकि ने मार डाला, तब सोमदत्त अत्यन्त क्रुद्ध होकर सात्यकि से बोला।
सोमदत्त उवाच
श्लोक 2 (7.157.2)
क्षत्रधर्मः परो दृष्टो यस्तु देवैर्महात्मभिः । तं त्वं सात्वत सन्त्यज्य दस्युधर्मे कथं रतः ॥
kṣatradharmaḥ paro dṛṣṭo yastu devairmahātmabhiḥ | taṃ tvaṃ sātvata santyajya dasyudharme kathaṃ rataḥ
"देवताओं और महात्माओं ने जिस क्षत्रिय-धर्म को सर्वश्रेष्ठ देखा है, हे सात्वत, उसे छोड़कर तुम दस्युओं के धर्म में कैसे रम गए?
श्लोक 3 (7.157.3)
पराङ्मुखाय दीनाय न्यस्तशस्त्राय याचते । क्षत्रधर्मरतः प्राज्ञः कथं नु प्रहरेद्रणे ॥
parāṅmukhāya dīnāya nyastaśastrāya yācate | kṣatradharmarataḥ prājñaḥ kathaṃ nu praharedraṇe
जो पीठ फेर चुका हो, दीन हो, शस्त्र रख चुका हो और याचना कर रहा हो, उस पर क्षत्रिय-धर्म में लगा कोई विवेकी पुरुष रण में कैसे प्रहार करेगा?
श्लोक 4 (7.157.4)
द्वावेव किल वृष्णीनां तत्र ख्यातौ महारथौ । प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं चैव युधि सात्वत ॥
dvāveva kila vṛṣṇīnāṃ tatra khyātau mahārathau | pradyumnaśca mahābāhustvaṃ caiva yudhi sātvata
वृष्णियों में केवल दो ही महारथी प्रसिद्ध थे — महाबाहु प्रद्युम्न और युद्ध में तुम, हे सात्वत।
श्लोक 5 (7.157.5)
कथं प्रायोपविष्टाय पार्थेन च्छिन्नबाहवे । नृशंसं बत दीनं च तादृशं कृतवानसि ॥
kathaṃ prāyopaviṣṭāya pārthena cchinnabāhave | nṛśaṃsaṃ bata dīnaṃ ca tādṛśaṃ kṛtavānasi
जो आमरण उपवास में बैठा था और जिसकी भुजा अर्जुन ने काट दी थी, उस दीन पर तुमने ऐसा क्रूर कर्म कैसे किया? हाय!
श्लोक 6 (7.157.6)
कर्मणस्तस्य दुर्वृत्त फलं प्राप्नुहि संयुगे । अद्य छेत्स्यामि ते मूढ शिरो विक्रम्य पत्रिणा ॥
karmaṇastasya durvṛtta phalaṃ prāpnuhi saṃyuge | adya chetsyāmi te mūḍha śiro vikramya patriṇā
हे दुराचारी, उस कर्म का फल युद्ध में भोगो। हे मूढ़, आज मैं पराक्रम दिखाकर बाण से तुम्हारा सिर काट डालूँगा।
श्लोक 7 (7.157.7)
शपे सात्वत पुत्राभ्यामिष्टेन सुकृतेन च । अनतीतामिमां रात्रिं यदि त्वां वीरमानिनम् ॥
śape sātvata putrābhyāmiṣṭena sukṛtena ca | anatītāmimāṃ rātriṃ yadi tvāṃ vīramāninam
हे सात्वत, मैं अपने दोनों पुत्रों की, अपने यज्ञ-दान आदि इष्टापूर्त की और अपने सुकर्मों की शपथ लेता हूँ — यदि इस रात के बीतने से पहले मैं तुझ वीरमानी को —
श्लोक 8 (7.157.8)
अरक्ष्यमाणं पार्थेन जिष्णुना ससुतानुजम् । न हन्यां नरके घोरे पतेयं वृष्णिपांसन ॥
arakṣyamāṇaṃ pārthena jiṣṇunā sasutānujam | na hanyāṃ narake ghore pateyaṃ vṛṣṇipāṃsana
जब अर्जुन तेरी रक्षा न कर रहा होगा, तब पुत्रों और छोटे भाइयों सहित न मार डालूँ, तो हे वृष्णिकुल के कलंक, मैं घोर नरक में गिरूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.157.9)
एवमुक्त्वा सुसङ्क्रुद्धः सोमदत्तो महाबलः । दध्मौ शङ्खं च तारेण सिंहनादं ननाद च ॥
evamuktvā susaṅkruddhaḥ somadatto mahābalaḥ | dadhmau śaṅkhaṃ ca tāreṇa siṃhanādaṃ nanāda ca
ऐसा कहकर महाबली सोमदत्त ने क्रोध से जलते हुए ऊँचे स्वर से शंख बजाया और सिंहनाद किया।
श्लोक 10 (7.157.10)
ततः कमलपत्राक्षः सिंहदंष्ट्रो दुरासदः । सात्यकिर्भृशसङ्क्रुद्धः सोमदत्तमथाब्रवीत् ॥
tataḥ kamalapatrākṣaḥ siṃhadaṃṣṭro durāsadaḥ | sātyakirbhṛśasaṅkruddhaḥ somadattamathābravīt
तब कमल जैसे नेत्रों वाले, सिंह जैसी दाढ़ों वाले, दुर्जेय सात्यकि ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर सोमदत्त को उत्तर दिया।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 11 (7.157.11)
कौरवेय न मे त्रासः कथञ्चिदपि विद्यते । त्वया सार्धमथान्यैश्च युध्यतो हृदि कश्चन ॥
kauraveya na me trāsaḥ kathañcidapi vidyate | tvayā sārdhamathānyaiśca yudhyato hṛdi kaścana
"हे कौरव, तुम्हारे साथ अथवा दूसरों के साथ भी लड़ते समय मेरे हृदय में किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
श्लोक 12 (7.157.12)
यदि सर्वेण सैन्येन गुप्तो मां योधयिष्यसि । तथापि न व्यथा काचित्त्वयि स्यान्मम कौरव ॥
yadi sarveṇa sainyena gupto māṃ yodhayiṣyasi | tathāpi na vyathā kācittvayi syānmama kaurava
यदि तुम अपनी पूरी सेना से रक्षित होकर मुझसे युद्ध करोगे, तब भी हे कौरव, तुमसे मुझे तनिक भी व्यथा न होगी।
श्लोक 13 (7.157.13)
युद्धसारेण वाक्येन असतां सम्मतेन च । नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते स्थितस्त्वया ॥
yuddhasāreṇa vākyena asatāṃ sammatena ca | nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyaḥ kṣatravṛtte sthitastvayā
जिसका सार केवल युद्ध है और जिसे दुष्ट लोग ही पसन्द करते हैं, ऐसे वचन से तुम मुझे डरा नहीं सकते, क्योंकि मैं क्षत्रिय-आचार में दृढ़ हूँ।
श्लोक 14 (7.157.14)
यदि तेऽस्ति युयुत्साऽद्य मया सह नराधिप । निर्दयो निशितैर्बाणैः प्रहर प्रहरामि ते ॥
yadi te'sti yuyutsā'dya mayā saha narādhipa | nirdayo niśitairbāṇaiḥ prahara praharāmi te
हे नरेश्वर, यदि आज मेरे साथ लड़ने की तुम्हारी इच्छा है, तो निर्दय होकर पैने बाणों से प्रहार करो; मैं भी तुम पर प्रहार करता हूँ।
श्लोक 15 (7.157.15)
हतो भूरिश्रवा वीरस्तव पुत्रो महारथः । शलश्चैव महाराज भ्रातृव्यसनकर्षितः ॥
hato bhūriśravā vīrastava putro mahārathaḥ | śalaścaiva mahārāja bhrātṛvyasanakarṣitaḥ
तुम्हारा पुत्र वीर महारथी भूरिश्रवा मारा गया, और हे महाराज, भाई की विपत्ति से खिंचा हुआ शल भी मारा गया।
श्लोक 16 (7.157.16)
त्वां चाप्यद्य वधिष्यामि सहपुत्रं सबान्धवम् । तिष्ठेदानीं रणे यत्तः कौरवोऽसि महारथः ॥
tvāṃ cāpyadya vadhiṣyāmi sahaputraṃ sabāndhavam | tiṣṭhedānīṃ raṇe yattaḥ kauravo'si mahārathaḥ
आज मैं तुम्हें भी पुत्र और बान्धवों सहित मार डालूँगा। अब सावधान होकर रण में डटो; तुम कुरुवंशी महारथी हो।
श्लोक 17 (7.157.17)
यस्मिन्दानं दमः शौचमहिंसा हीर्धृतिः क्षमा । अनपायानि सर्वाणि नित्यं राज्ञि युधिष्ठिरे ॥
yasmindānaṃ damaḥ śaucamahiṃsā hīrdhṛtiḥ kṣamā | anapāyāni sarvāṇi nityaṃ rājñi yudhiṣṭhire
राजा युधिष्ठिर में दान, दम, शौच, अहिंसा, लज्जा, धैर्य और क्षमा — ये सभी गुण सदा बने रहते हैं, कभी उनका साथ नहीं छोड़ते।
श्लोक 18 (7.157.18)
मृदङ्गकेतोस्तस्य त्वं तेजसा निहतः पुरा । सकर्णसौबलः सङ्ख्ये विनाशमुपयास्यसि ॥
mṛdaṅgaketostasya tvaṃ tejasā nihataḥ purā | sakarṇasaubalaḥ saṅkhye vināśamupayāsyasi
उन्हीं मृदंग-ध्वज वाले के तेज से तुम पहले ही मारे जा चुके हो; अब कर्ण और शकुनि के साथ तुम युद्ध में विनाश को प्राप्त होगे।
श्लोक 19 (7.157.19)
शपेऽहं कृष्णचरणैरिष्टापूर्तेन चैव ह । यदि त्वां ससुतं पापं न हन्यां युधि रोषितः ॥
śape'haṃ kṛṣṇacaraṇairiṣṭāpūrtena caiva ha | yadi tvāṃ sasutaṃ pāpaṃ na hanyāṃ yudhi roṣitaḥ
मैं कृष्ण के चरणों की तथा अपने यज्ञ और दान आदि पुण्य कर्मों की शपथ लेता हूँ — यदि क्रुद्ध होकर मैं युद्ध में तुझ पापी को पुत्र सहित न मार डालूँ —
श्लोक 20 (7.157.20)
अपयास्यसि चेत्त्यक्त्वा रणं मुक्तो भविष्यसि ॥
apayāsyasi cettyaktvā raṇaṃ mukto bhaviṣyasi
तो तू यदि रण छोड़कर भाग जाए, तभी छूट सकेगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (7.157.21)
एवमाभाष्य चान्योन्यं क्रोधसंरक्तलोचनौ । प्रवृत्तौ शरसम्पातं कर्तुं पुरुषसत्तमौ ॥
evamābhāṣya cānyonyaṃ krodhasaṃraktalocanau | pravṛttau śarasampātaṃ kartuṃ puruṣasattamau
इस प्रकार एक-दूसरे से कहकर क्रोध से लाल आँखों वाले वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 22 (7.157.22)
ततो रथसहस्रेण नागानामयुतेन च । दुर्योधनः सोमदत्तं परिवार्य व्यवस्थितः ॥
tato rathasahasreṇa nāgānāmayutena ca | duryodhanaḥ somadattaṃ parivārya vyavasthitaḥ
तब दुर्योधन एक हज़ार रथों और दस हज़ार हाथियों के साथ सोमदत्त को घेरकर डट गया।
श्लोक 23 (7.157.23)
शकुनिश्च सुसङ्क्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः । पुत्रपौत्रैः परिवृतो भ्रातृभिश्चेन्द्रविक्रमैः । श्यालस्तव महाबाहुर्वज्रसंहननो युवा ॥
śakuniśca susaṅkruddhaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | putrapautraiḥ parivṛto bhrātṛbhiścendravikramaiḥ | śyālastava mahābāhurvajrasaṃhanano yuvā
और अत्यन्त क्रुद्ध शकुनि भी, जो सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, तुम्हारा महाबाहु, वज्र के समान दृढ़ देह वाला तरुण साला है, पुत्रों-पौत्रों तथा इन्द्र के समान पराक्रमी भाइयों से घिरा हुआ —
श्लोक 24 (7.157.24)
साग्रं शतसहस्रं तु हयानां तस्य धीमतः । सोमदत्तं महेष्वासं समन्तात्पर्यरक्षत ॥
sāgraṃ śatasahasraṃ tu hayānāṃ tasya dhīmataḥ | somadattaṃ maheṣvāsaṃ samantātparyarakṣata
उस बुद्धिमान के एक लाख से अधिक घोड़ों ने चारों ओर से महाधनुर्धर सोमदत्त की रक्षा की।
श्लोक 25 (7.157.25)
रक्ष्यमाणश्च बलिभिश्छादयामास सात्यकिम् । तं छाद्यमानं विशिखैर्दृष्ट्वा सन्नतपर्वभिः ॥
rakṣyamāṇaśca balibhiśchādayāmāsa sātyakim | taṃ chādyamānaṃ viśikhairdṛṣṭvā sannataparvabhiḥ
बलवानों से रक्षित सोमदत्त ने सात्यकि को ढक दिया। झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उन्हें ढका जाता देखकर —
श्लोक 26 (7.157.26)
धृष्टद्युम्नोऽभ्ययात्क्रुद्धः प्रगृह्य महतीं चमूम् । अभ्यरक्षन्महाबाहुः सात्वतं सत्यविक्रमम् ॥
dhṛṣṭadyumno'bhyayātkruddhaḥ pragṛhya mahatīṃ camūm | abhyarakṣanmahābāhuḥ sātvataṃ satyavikramam
महाबाहु धृष्टद्युम्न क्रुद्ध होकर विशाल सेना साथ लिए आगे बढ़ा और उसने सत्यपराक्रमी सात्वत की रक्षा की।
श्लोक 27 (7.157.27)
चण्डवाताभिसृष्टानामुदधीनामिव स्वनः । आसीद्राजन्बलौघानामन्योन्यमभिनिघ्नताम् ॥
caṇḍavātābhisṛṣṭānāmudadhīnāmiva svanaḥ | āsīdrājanbalaughānāmanyonyamabhinighnatām
हे राजन्, परस्पर प्रहार करती हुई सेनाओं का कोलाहल प्रचण्ड आँधी से उछाले गए समुद्रों की गर्जना जैसा हुआ।
श्लोक 28 (7.157.28)
विव्याध सोमदत्तस्तु सात्वतं नवभिः शरैः । सात्यकिर्नवभिश्चैनमवधीत्कुरुपुङ्गवम् ॥
vivyādha somadattastu sātvataṃ navabhiḥ śaraiḥ | sātyakirnavabhiścainamavadhītkurupuṅgavam
सोमदत्त ने सात्वत को नौ बाणों से बेधा, और सात्यकि ने भी उस कुरुश्रेष्ठ को नौ बाणों से घायल किया।
श्लोक 29 (7.157.29)
सोऽतिविद्धो बलवता समरे दृढधन्विना । रथोपस्थं समासाद्य मुमोह गतचेतनः ॥
so'tividdho balavatā samare dṛḍhadhanvinā | rathopasthaṃ samāsādya mumoha gatacetanaḥ
उस बलवान और दृढ़ धनुषधारी के द्वारा रण में गहरा बिंधकर सोमदत्त रथ के पिछले भाग में जा गिरा और अचेत होकर मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 30 (7.157.30)
तं विमूढं समालक्ष्य सारथिस्त्वरयाऽन्वितः । अपोवाह रणाद्वीरं सोमदत्तं महारथम् ॥
taṃ vimūḍhaṃ samālakṣya sārathistvarayā'nvitaḥ | apovāha raṇādvīraṃ somadattaṃ mahāratham
उसे मूर्च्छित देखकर सारथि शीघ्रता से वीर महारथी सोमदत्त को रणभूमि से हटा ले गया।
श्लोक 31 (7.157.31)
तं विसंज्ञं समालक्ष्य युयुधानशरार्दितम् । अभ्यद्रवत्ततो द्रोणो यदुवीरजिघांसया ॥
taṃ visaṃjñaṃ samālakṣya yuyudhānaśarārditam | abhyadravattato droṇo yaduvīrajighāṃsayā
युयुधान के बाणों से पीड़ित उसे अचेत देखकर द्रोण यदुवंश के उस वीर को मारने की इच्छा से उस पर झपटे।
श्लोक 32 (7.157.32)
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरपुरोगमाः । परिवव्रुर्महात्मानं परीप्सन्तो यदूत्तमम् ॥
tamāyāntamabhiprekṣya yudhiṣṭhirapurogamāḥ | parivavrurmahātmānaṃ parīpsanto yadūttamam
उन्हें आते देखकर यदुश्रेष्ठ की रक्षा चाहने वाले युधिष्ठिर आदि ने महात्मा द्रोण को घेर लिया।
श्लोक 33 (7.157.33)
ततः प्रववृते युद्धं द्रोणस्य सह पाण्डवैः । बलेरिव सुरैः पूर्वं त्रैलोक्यजयकाङ्क्षया ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ droṇasya saha pāṇḍavaiḥ | baleriva suraiḥ pūrvaṃ trailokyajayakāṅkṣayā
तब द्रोण का पाण्डवों के साथ वैसा ही युद्ध छिड़ा, जैसा पूर्वकाल में तीनों लोकों को जीतने की इच्छा से बलि का देवताओं के साथ हुआ था।
श्लोक 34 (7.157.34)
ततः सायकजालेन पाण्डवानीकमावृणोत् । भारद्वाजो महातेजा विव्याध च युधिष्ठिरम् ॥
tataḥ sāyakajālena pāṇḍavānīkamāvṛṇot | bhāradvājo mahātejā vivyādha ca yudhiṣṭhiram
फिर महातेजस्वी भारद्वाज ने बाणों के जाल से पाण्डव-सेना को ढक दिया और युधिष्ठिर को बेध डाला।
श्लोक 35 (7.157.35)
सात्यकिं दशभिर्बाणैर्विंशत्या पार्षतं शरैः । भीमसेनं च नवभिर्नकुलं पञ्चभिस्तथा ॥
sātyakiṃ daśabhirbāṇairviṃśatyā pārṣataṃ śaraiḥ | bhīmasenaṃ ca navabhirnakulaṃ pañcabhistathā
उन्होंने सात्यकि को दस बाणों से, पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न को बीस से, भीमसेन को नौ से और नकुल को पाँच से बेधा।
श्लोक 36 (7.157.36)
सहदेवं तथाऽष्टाभिः शतेन च शिखण्डिनम् । द्रौपदेयान्महाबाहुः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥
sahadevaṃ tathā'ṣṭābhiḥ śatena ca śikhaṇḍinam | draupadeyānmahābāhuḥ pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ
सहदेव को आठ से, शिखण्डी को सौ से, और द्रौपदी के पुत्रों को उस महाबाहु ने पाँच-पाँच बाणों से बेधा।
श्लोक 37 (7.157.37)
विराटं मत्स्यमष्टाभिर्द्रुपदं दशभिः शरैः । युधामन्युं त्रिभिः षड्भिरुत्तमौजसमाहवे । अन्यांश्च सैनिकान्विद्ध्वा युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥
virāṭaṃ matsyamaṣṭābhirdrupadaṃ daśabhiḥ śaraiḥ | yudhāmanyuṃ tribhiḥ ṣaḍbhiruttamaujasamāhave | anyāṃśca sainikānviddhvā yudhiṣṭhiramupādravat
मत्स्यराज विराट को आठ से, द्रुपद को दस बाणों से, युधामन्यु को तीन से और उत्तमौजा को युद्ध में छः से बेधकर, तथा अन्य सैनिकों को भी बेधते हुए, वे युधिष्ठिर पर टूट पड़े।
श्लोक 38 (7.157.38)
ते वध्यमाना द्रोणेन पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः । प्राद्रवन्वै भयाद्राजन्सार्तनादा दिशो दश ॥
te vadhyamānā droṇena pāṇḍuputrasya sainikāḥ | prādravanvai bhayādrājansārtanādā diśo daśa
द्रोण की मार खाते हुए पाण्डुपुत्र के वे सैनिक, हे राजन्, भय से आर्तनाद करते हुए दसों दिशाओं में भाग चले।
श्लोक 39 (7.157.39)
काल्यमानं तु तत्सैन्यं दृष्ट्वा द्रोणेन फल्गुनः । किञ्चिदागतसंरम्भो गुरुं पार्थोऽभ्ययाद्द्रुतम् ॥
kālyamānaṃ tu tatsainyaṃ dṛṣṭvā droṇena phalgunaḥ | kiñcidāgatasaṃrambho guruṃ pārtho'bhyayāddrutam
द्रोण द्वारा खदेड़ी जाती उस सेना को देखकर अर्जुन का क्रोध कुछ जाग उठा और वे शीघ्र अपने गुरु की ओर बढ़े।
श्लोक 40 (7.157.40)
दृष्ट्वा द्रोणं तु बीभत्सुमभिधावन्तमाहवे । सन्न्यवर्तत तत्सैन्यं पुनर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥
dṛṣṭvā droṇaṃ tu bībhatsumabhidhāvantamāhave | sannyavartata tatsainyaṃ punaryaudhiṣṭhiraṃ balam
रण में अर्जुन को द्रोण पर टूटते देखकर युधिष्ठिर की वह सेना फिर लौट पड़ी।
श्लोक 41 (7.157.41)
ततो युद्धमभूद्भूयो भारद्वाजस्य पाण्डवैः ॥
tato yuddhamabhūdbhūyo bhāradvājasya pāṇḍavaiḥ
तब भारद्वाज का पाण्डवों के साथ फिर युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 42 (7.157.42)
द्रोणस्तव सुतै राजन्सर्वतः परिवारितः । व्यधमत्पाण्डुसैन्यानि तूलराशिमिवानलः ॥
droṇastava sutai rājansarvataḥ parivāritaḥ | vyadhamatpāṇḍusainyāni tūlarāśimivānalaḥ
हे राजन्, तुम्हारे पुत्रों से चारों ओर घिरे हुए द्रोण पाण्डवों की सेनाओं को वैसे ही नष्ट करने लगे जैसे आग रुई के ढेर को।
श्लोक 43 (7.157.43)
तं ज्वलन्तमिवादित्यं दीप्तानलसमद्युतिम् । राजन्ननिशमत्यन्तं दृष्ट्वा द्रोणं शरार्चिषम् ॥
taṃ jvalantamivādityaṃ dīptānalasamadyutim | rājannaniśamatyantaṃ dṛṣṭvā droṇaṃ śarārciṣam
हे राजन्, सूर्य के समान जलते हुए, दहकती आग जैसी दीप्ति वाले, बाणों की लपटों वाले उन द्रोण को निरन्तर अत्यन्त प्रचण्ड रूप में देखकर —
श्लोक 44 (7.157.44)
मण्डलीकृतधन्वानं तपन्तमिव भास्करम् । दहन्तमहितान्सैन्ये नैनं कश्चिदवारयत् ॥
maṇḍalīkṛtadhanvānaṃ tapantamiva bhāskaram | dahantamahitānsainye nainaṃ kaścidavārayat
जो धनुष को मण्डलाकार खींचे, तपते सूर्य की भाँति सेना में शत्रुओं को भस्म कर रहे थे — उन्हें कोई भी रोक न सका।
श्लोक 45 (7.157.45)
योयो हि प्रमुखे तस्य तस्थौ द्रोणस्य पूरुषः । तस्यतस्य शिरश्छित्त्वा ययुर्द्रोणशराः क्षितिम् ॥
yoyo hi pramukhe tasya tasthau droṇasya pūruṣaḥ | tasyatasya śiraśchittvā yayurdroṇaśarāḥ kṣitim
द्रोण के सामने जो-जो पुरुष खड़ा हुआ, उस-उसका सिर काटकर द्रोण के बाण पृथ्वी में जा गिरे।
श्लोक 46 (7.157.46)
एवं सा पाण्डवी सेना वध्यमाना महात्मना । प्रदुद्राव पुनर्भीता पश्यतः सव्यसाचिनः ॥
evaṃ sā pāṇḍavī senā vadhyamānā mahātmanā | pradudrāva punarbhītā paśyataḥ savyasācinaḥ
इस प्रकार उन महात्मा के हाथों मारी जाती हुई वह पाण्डव-सेना अर्जुन के देखते-देखते भयभीत होकर फिर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 47 (7.157.47)
सम्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा द्रोणेन निशि भारत । गोविन्दमब्रवीज्जिष्णुर्गच्छ द्रोणरथं प्रति ॥
samprabhagnaṃ balaṃ dṛṣṭvā droṇena niśi bhārata | govindamabravījjiṣṇurgaccha droṇarathaṃ prati
हे भारत, रात में द्रोण द्वारा सेना को तितर-बितर देखकर अर्जुन ने गोविन्द से कहा, "द्रोण के रथ की ओर चलो।"
श्लोक 48 (7.157.48)
ततो रजतगोक्षीरकुन्देन्दुसदृशप्रभान् । चोदयामास दाशार्हो हयान्द्रोणरथं प्रति ॥
tato rajatagokṣīrakundendusadṛśaprabhān | codayāmāsa dāśārho hayāndroṇarathaṃ prati
तब दशार्हवंशी कृष्ण ने चाँदी, गाय के दूध, कुन्द के फूल और चन्द्रमा जैसी आभा वाले घोड़ों को द्रोण के रथ की ओर हाँका।
श्लोक 49 (7.157.49)
भीमसेनोऽपि तं दृष्ट्वा यान्तं द्रोणाय फल्गुनम् । स्वसारथिमुवाचेदं द्रोणानीकाय मां वह ॥
bhīmaseno'pi taṃ dṛṣṭvā yāntaṃ droṇāya phalgunam | svasārathimuvācedaṃ droṇānīkāya māṃ vaha
अर्जुन को द्रोण की ओर जाते देखकर भीमसेन ने भी अपने सारथि से कहा, "मुझे द्रोण की सेना की ओर ले चलो।"
श्लोक 50 (7.157.50)
सोऽपि तस्य वचः श्रुत्वा विशोको वाहयद्धयान् । पृष्ठतः सत्यसन्धस्य जिष्णोर्भरतसत्तम ॥
so'pi tasya vacaḥ śrutvā viśoko vāhayaddhayān | pṛṣṭhataḥ satyasandhasya jiṣṇorbharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ, उसके वचन सुनकर विशोक ने भी सत्यप्रतिज्ञ अर्जुन के पीछे-पीछे घोड़े हाँके।
श्लोक 51 (7.157.51)
तौ दृष्ट्वा भ्रातरौ यत्तौ द्रोणानीकमभिद्रुतौ । पाञ्चालाः सृञ्जया मात्स्याश्चेदिकारूषकोसलाः । अन्वगच्छन्महाराज केकयाश्च महारथाः ॥
tau dṛṣṭvā bhrātarau yattau droṇānīkamabhidrutau | pāñcālāḥ sṛñjayā mātsyāścedikārūṣakosalāḥ | anvagacchanmahārāja kekayāśca mahārathāḥ
उन दोनों भाइयों को दृढ़ निश्चय से द्रोण की सेना पर टूटते देखकर पाञ्चाल, सृञ्जय, मत्स्य, चेदि, कारूष और कोसल (देश के योद्धा) उनके पीछे चल पड़े, हे महाराज, और केकय महारथी भी।
श्लोक 52 (7.157.52)
ततो राजन्नभूद्घोरः सङ्ग्रामो रोमहर्षणः ॥
tato rājannabhūdghoraḥ saṅgrāmo romaharṣaṇaḥ
तब, हे राजन्, रोंगटे खड़े कर देने वाला भयंकर संग्राम हुआ।
श्लोक 53 (7.157.53)
बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः । महद्भ्यां रथबृन्दाभ्यां बलं जगृहतुस्तव ॥
bībhatsurdakṣiṇaṃ pārśvamuttaraṃ ca vṛkodaraḥ | mahadbhyāṃ rathabṛndābhyāṃ balaṃ jagṛhatustava
अर्जुन ने दाहिने पार्श्व में और भीमसेन ने बायें में, दो विशाल रथ-समूहों के साथ तुम्हारी सेना को दबोच लिया।
श्लोक 54 (7.157.54)
तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ भीमसेनधनञ्जयौ । धृष्टद्युम्नोऽभ्ययाद्राजन्सात्यकिश्च महाबलः ॥
tau dṛṣṭvā puruṣavyāghrau bhīmasenadhanañjayau | dhṛṣṭadyumno'bhyayādrājansātyakiśca mahābalaḥ
उन दोनों पुरुषसिंहों, भीमसेन और धनञ्जय को देखकर, हे राजन्, धृष्टद्युम्न और महाबली सात्यकि भी आगे बढ़े।
श्लोक 55 (7.157.55)
चण्डवाताभिपन्नानामुदधीनामिव स्वनः । आसीद्राजन्बलौघानां तदाऽन्योन्यमभिघ्नतां ॥
caṇḍavātābhipannānāmudadhīnāmiva svanaḥ | āsīdrājanbalaughānāṃ tadā'nyonyamabhighnatāṃ
हे राजन्, तब परस्पर मार-काट करती सेनाओं का कोलाहल प्रचण्ड आँधी से टकराए समुद्रों के गर्जन जैसा हुआ।
श्लोक 56 (7.157.56)
सौमदत्तिवधात्क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे । द्रौणिरभ्यद्रवद्राजन्वधाय कृतनिश्चयः ॥
saumadattivadhātkruddho dṛṣṭvā sātyakimāhave | drauṇirabhyadravadrājanvadhāya kṛtaniścayaḥ
सोमदत्त के पुत्र के वध से क्रुद्ध द्रोणपुत्र, हे राजन्, रण में सात्यकि को देखकर उसे मारने का निश्चय करके उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 57 (7.157.57)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैनेयस्य रथं प्रति । भैमसेनिः सुसङ्क्रुद्धः प्रत्यमित्रमवारयत् ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya śaineyasya rathaṃ prati | bhaimaseniḥ susaṅkruddhaḥ pratyamitramavārayat
शैनेय के रथ की ओर आते हुए उसे देखकर भीमसेन के पुत्र ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस शत्रु को रोक लिया।
श्लोक 58 (7.157.58)
कार्ष्णायसं महाघोरमृक्षचर्मपरिच्छदम् । महान्तं रथमास्थाय त्रिंशन्नल्वान्तरान्तरम् ॥
kārṣṇāyasaṃ mahāghoramṛkṣacarmaparicchadam | mahāntaṃ rathamāsthāya triṃśannalvāntarāntaram
वह काले लोहे के बने, भयंकर, रीछ की खाल से मढ़े, तीस नल्व के विस्तार वाले विशाल रथ पर आरूढ़ होकर —
श्लोक 59 (7.157.59)
विक्षिप्तयन्त्रसन्नाहं महामेघौघनिःस्वनम् । युक्तं गजनिभैर्वाहैर्न हयैर्नापि वारणैः ॥
vikṣiptayantrasannāhaṃ mahāmeghaughaniḥsvanam | yuktaṃ gajanibhairvāhairna hayairnāpi vāraṇaiḥ
जिसके यन्त्र और कवच सजाकर रखे थे, जिसकी घरघराहट बड़े मेघ-समूह जैसी थी, और जिसमें हाथियों जैसे विशाल वाहन जुते थे — न घोड़े, न हाथी —
श्लोक 60 (7.157.60)
विक्षिप्तपक्षचरणविवृताक्षेण कूजता । ध्वजेनोच्छ्रितदण्डेन गृध्रराजेन राजितम् ॥
vikṣiptapakṣacaraṇavivṛtākṣeṇa kūjatā | dhvajenocchritadaṇḍena gṛdhrarājena rājitam
और ऊँचे दण्ड वाली उस ध्वजा से सुशोभित, जिस पर पंख और पैर फैलाए, आँखें खोले, चीत्कार करता हुआ गृध्रराज बना था —
श्लोक 61 (7.157.61)
लोहितार्द्रपताकं तु आन्त्रमालाविभूषितम् । अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय विपुलं रथम् ॥
lohitārdrapatākaṃ tu āntramālāvibhūṣitam | aṣṭacakrasamāyuktamāsthāya vipulaṃ ratham
जिसकी पताका रक्त से भीगी थी, जो आँतों की मालाओं से सजा था — आठ पहियों वाले उस विशाल रथ पर चढ़कर,
श्लोक 62 (7.157.62)
शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तया । रक्षसां घोररूपाणामक्षौहिण्या समावृतः ॥
śūlamudgaradhāriṇyā śailapādapahastayā | rakṣasāṃ ghorarūpāṇāmakṣauhiṇyā samāvṛtaḥ
वह शूल और मुद्गर धारण किए, हाथों में पर्वत-शिखर और वृक्ष लिए घोर रूप वाले राक्षसों की एक अक्षौहिणी सेना से घिरा हुआ था।
श्लोक 63 (7.157.63)
तमुद्यतमहाचापं निशाम्य व्यथिता नृपाः । युगान्तकालसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् ॥
tamudyatamahācāpaṃ niśāmya vyathitā nṛpāḥ | yugāntakālasamaye daṇḍahastamivāntakam
महान् धनुष उठाए उसे देखकर राजा लोग व्याकुल हो उठे, मानो युग के अन्त के समय दण्ड हाथ में लिए स्वयं यमराज हों।
श्लोक 64 (7.157.64)
ततस्तं गिरिशृङ्गाभं भीमरूपं भयावहम् । दंष्ट्राकरालोग्रमुखं शङ्कुकर्णं महाहनुम् ॥
tatastaṃ giriśṛṅgābhaṃ bhīmarūpaṃ bhayāvaham | daṃṣṭrākarālogramukhaṃ śaṅkukarṇaṃ mahāhanum
पर्वत-शिखर के समान, भीषण रूप वाले, भयावह, दाढ़ों से विकराल और उग्र मुख वाले, काँटे जैसे कानों और विशाल जबड़ों वाले उसको —
श्लोक 65 (7.157.65)
ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीप्तास्यं निम्नितोदरम् । महाश्वभ्रगलद्वारं किरीटच्छन्नमूर्धजम् ॥
ūrdhvakeśaṃ virūpākṣaṃ dīptāsyaṃ nimnitodaram | mahāśvabhragaladvāraṃ kirīṭacchannamūrdhajam
जिसके केश ऊपर को खड़े थे, आँखें विकृत थीं, मुख दहकता था, पेट धँसा हुआ था, गले का द्वार विशाल गड्ढे जैसा था और सिर के केश मुकुट से ढके थे,
श्लोक 66 (7.157.66)
त्रासनं सर्वभूतानां व्यात्ताननमिवान्तकम् । वीक्ष्य दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षोभकारिणम् ॥
trāsanaṃ sarvabhūtānāṃ vyāttānanamivāntakam | vīkṣya dīptamivāyāntaṃ ripuvikṣobhakāriṇam
जो सब प्राणियों को त्रास देने वाला और खुले मुँह वाले यमराज जैसा था — उसे जलते हुए-से आते और शत्रुओं में खलबली मचाते देखकर —
श्लोक 67 (7.157.67)
तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् । भयार्दिता प्रचुक्षोभ पुत्रस्य तव वाहिनी । वायुना क्षोभितावर्ता गङ्गेवोर्ध्वतरङ्गिणी ॥
tamudyatamahācāpaṃ rākṣasendraṃ ghaṭotkacam | bhayārditā pracukṣobha putrasya tava vāhinī | vāyunā kṣobhitāvartā gaṅgevordhvataraṅgiṇī
महान् धनुष उठाए उस राक्षसराज घटोत्कच को देखकर तुम्हारे पुत्र की सेना भय से पीड़ित होकर वैसे ही विक्षुब्ध हो उठी, जैसे वायु से भँवरें उठाती ऊँची लहरों वाली गंगा।
श्लोक 68 (7.157.68)
घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः । प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ॥
ghaṭotkacaprayuktena siṃhanādena bhīṣitāḥ | prasusruvurgajā mūtraṃ vivyathuśca narā bhṛśam
घटोत्कच के छोड़े हुए सिंहनाद से डरकर हाथी मूत्र करने लगे और मनुष्य बहुत व्याकुल हो गए।
श्लोक 69 (7.157.69)
ततोऽश्मवृष्टिरत्यर्थमासीत्तत्र समन्ततः । सन्ध्याकालाधिकबलैः प्रयुक्ता राक्षसैः क्षितौ ॥
tato'śmavṛṣṭiratyarthamāsīttatra samantataḥ | sandhyākālādhikabalaiḥ prayuktā rākṣasaiḥ kṣitau
तब वहाँ चारों ओर पत्थरों की अत्यन्त भीषण वर्षा होने लगी, जो सन्ध्या के समय अधिक बलवान हो जाने वाले राक्षसों ने पृथ्वी पर बरसाई थी।
श्लोक 70 (7.157.70)
आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः प्रासतोमराः । पतन्त्यविरताः शूलाः शतघ्न्यः पट्टसास्तथा ॥
āyasāni ca cakrāṇi bhuśuṇḍyaḥ prāsatomarāḥ | patantyaviratāḥ śūlāḥ śataghnyaḥ paṭṭasāstathā
लोहे के चक्र, भुशुण्डियाँ, प्रास, तोमर, शूल, शतघ्नियाँ और पट्टस निरन्तर गिरने लगे।
श्लोक 71 (7.157.71)
तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः । तनयास्तव कर्णश्च व्यथिताः प्राद्रवन्दिशः ॥
tadugramatiraudraṃ ca dṛṣṭvā yuddhaṃ narādhipāḥ | tanayāstava karṇaśca vyathitāḥ prādravandiśaḥ
उस उग्र और अति भयंकर युद्ध को देखकर राजा लोग, तुम्हारे पुत्र और कर्ण व्याकुल होकर दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 72 (7.157.72)
तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी द्रौणिर्मानी न विव्यथे । व्यधमच्च शरैर्मायां घटोत्कचविनिर्मिताम् ॥
tatraiko'strabalaślāghī drauṇirmānī na vivyathe | vyadhamacca śarairmāyāṃ ghaṭotkacavinirmitām
वहाँ अस्त्र-बल का गर्व करने वाला मानी द्रोणपुत्र अकेला ही विचलित नहीं हुआ; उसने बाणों से घटोत्कच की रची हुई माया को नष्ट कर दिया।
श्लोक 73 (7.157.73)
विहतायां तु मायायाममर्षी स घटोत्कचः । विससर्ज शरान्घोरांस्तेऽश्वत्थामानमाविशन् । भुजङ्गा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्च्छिताः ॥
vihatāyāṃ tu māyāyāmamarṣī sa ghaṭotkacaḥ | visasarja śarānghorāṃste'śvatthāmānamāviśan | bhujaṅgā iva vegena valmīkaṃ krodhamūrcchitāḥ
माया के नष्ट होने पर क्रोधित घटोत्कच ने भयानक बाण छोड़े, जो अश्वत्थामा में वैसे ही वेग से घुस गए जैसे क्रोध से भरे साँप बाँबी में घुसते हैं।
श्लोक 74 (7.157.74)
ते शरा रुधिराक्ताङ्गा भित्त्वा शारद्वतीसुतम् । विविशुर्धरणीं शीघ्रा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ॥
te śarā rudhirāktāṅgā bhittvā śāradvatīsutam | viviśurdharaṇīṃ śīghrā rukmapuṅkhāḥ śilāśitāḥ
रक्त से सने, सोने के पंख वाले और पत्थर पर तेज किए हुए वे बाण शारद्वती के पुत्र को बेधकर शीघ्र पृथ्वी में धँस गए।
श्लोक 75 (7.157.75)
अश्वत्थामा तु सङ्क्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् । घटोत्कचमभिक्रुद्धं बिभेद दशभिः शरैः ॥
aśvatthāmā tu saṅkruddho laghuhastaḥ pratāpavān | ghaṭotkacamabhikruddhaṃ bibheda daśabhiḥ śaraiḥ
परन्तु फुर्तीले हाथों वाले प्रतापी अश्वत्थामा ने क्रुद्ध होकर कुपित घटोत्कच को दस बाणों से बेध दिया।
श्लोक 76 (7.157.76)
घटोत्कचोऽतिविद्धस्तु द्रोणपुत्रेण मर्मसु । चक्रं शतसहस्रारमगृह्णाद्व्यथितो भृशम् ॥
ghaṭotkaco'tividdhastu droṇaputreṇa marmasu | cakraṃ śatasahasrāramagṛhṇādvyathito bhṛśam
द्रोणपुत्र के बाणों से मर्मस्थानों में गहरा बिंधकर घटोत्कच ने अत्यन्त पीड़ित होकर सौ हज़ार तीलियों वाला चक्र उठा लिया।
श्लोक 77 (7.157.77)
क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिवज्रविभूषितम् । अश्वत्थाम्नि स चिक्षेप भैमसेनिर्जिघांसया ॥
kṣurāntaṃ bālasūryābhaṃ maṇivajravibhūṣitam | aśvatthāmni sa cikṣepa bhaimasenirjighāṃsayā
छुरे की धार वाले, उगते सूर्य जैसे चमकते, मणियों और हीरों से सजे उस चक्र को भीमसेन के पुत्र ने अश्वत्थामा को मारने की इच्छा से फेंका।
श्लोक 78 (7.157.78)
वेगेन महता गच्छद्विक्षिप्तं द्रौणिना शरैः । अभाग्यस्येव सङ्कल्पस्तन्मोघमपतद्भुवि ॥
vegena mahatā gacchadvikṣiptaṃ drauṇinā śaraiḥ | abhāgyasyeva saṅkalpastanmoghamapatadbhuvi
बड़े वेग से जाते हुए उस चक्र को द्रोणपुत्र ने बाणों से गिरा दिया, और वह अभागे के संकल्प की तरह निष्फल होकर भूमि पर जा गिरा।
श्लोक 79 (7.157.79)
घटोत्कचस्ततस्तूर्णं दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् । द्रौणिं प्राच्छादयद्बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥
ghaṭotkacastatastūrṇaṃ dṛṣṭvā cakraṃ nipātitam | drauṇiṃ prācchādayadbāṇaiḥ svarbhānuriva bhāskaram
तब चक्र को गिरा देखकर घटोत्कच ने तुरंत द्रोणपुत्र को बाणों से ढक दिया, जैसे राहु सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 80 (7.157.80)
घटोत्कचसुतः श्रीमान्भिन्नाञ्जनचयोपमः । रुरोध द्रौणिमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् ॥
ghaṭotkacasutaḥ śrīmānbhinnāñjanacayopamaḥ | rurodha drauṇimāyāntaṃ prabhañjanamivādrirāṭ
तब घटोत्कच के तेजस्वी पुत्र ने, जो पिसे हुए अञ्जन के ढेर जैसा काला था, आते हुए द्रोणपुत्र को वैसे ही रोक लिया जैसे पर्वतराज वायु को रोकता है।
श्लोक 81 (7.157.81)
पौत्रेण भीमसेनस्य शरैरञ्जनपर्वणा । बभौ मेघेन धाराभिर्गिरिर्मेरुरिवावृतः ॥
pautreṇa bhīmasenasya śarairañjanaparvaṇā | babhau meghena dhārābhirgirirmerurivāvṛtaḥ
भीमसेन के पौत्र अञ्जनपर्वा के बाणों से घिरा हुआ अश्वत्थामा वैसा ही शोभित हुआ जैसे धाराएँ बरसाते मेघ से घिरा मेरु पर्वत।
श्लोक 82 (7.157.82)
अश्वत्थामा त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः । ध्वजमेकेन बाणेन चिच्छेदाञ्जनपर्वणः ॥
aśvatthāmā tvasambhrānto rudropendrendravikramaḥ | dhvajamekena bāṇena cicchedāñjanaparvaṇaḥ
रुद्र, उपेन्द्र और इन्द्र के समान पराक्रमी अश्वत्थामा ने विचलित हुए बिना एक बाण से अञ्जनपर्वा की ध्वजा काट दी।
श्लोक 83 (7.157.83)
द्वाभ्यां तु रथयन्तारौ त्रिभिश्चास्य त्रिवेणुकम् । धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
dvābhyāṃ tu rathayantārau tribhiścāsya triveṇukam | dhanurekena ciccheda caturbhiścaturo hayān
दो बाणों से उसके दोनों रथ हाँकने वालों को, तीन से रथ के त्रिवेणु को, एक से धनुष को और चार से चारों घोड़ों को उसने काट डाला।
श्लोक 84 (7.157.84)
विरथस्योद्यतं हस्ताद्धेमबिन्दुभिराचितम् । विशिखेन सतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाऽकरोत् ॥
virathasyodyataṃ hastāddhemabindubhirācitam | viśikhena satīkṣṇena khaḍgamasya dvidhā'karot
रथहीन हुए उसके हाथ में उठी, सोने की बूँदों से जड़ी तलवार को उसने अत्यन्त तीक्ष्ण बाण से दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 85 (7.157.85)
गदा हेमाङ्गदा राजंस्तूर्णं हैडिम्बिसूनुना । भ्राम्योत्क्षिप्ता शरैः सापि द्रौणिनाभ्याहताऽपतत् ॥
gadā hemāṅgadā rājaṃstūrṇaṃ haiḍimbisūnunā | bhrāmyotkṣiptā śaraiḥ sāpi drauṇinābhyāhatā'patat
हे राजन्, हिडिम्बा के पौत्र ने सोने के बाजूबन्दों से सजी गदा तुरंत घुमाकर फेंकी; पर द्रोणपुत्र के बाणों से टकराकर वह भी गिर पड़ी।
श्लोक 86 (7.157.86)
ततोऽन्तरिक्षमुत्प्लुत्य कालमेघ इवोन्नदन् । ववर्षाञ्जनपर्वा स द्रुमवर्षं नभस्तलात् ॥
tato'ntarikṣamutplutya kālamegha ivonnadan | vavarṣāñjanaparvā sa drumavarṣaṃ nabhastalāt
तब आकाश में उछलकर काले मेघ की तरह गरजते हुए अञ्जनपर्वा ने आकाश से वृक्षों की वर्षा की।
श्लोक 87 (7.157.87)
ततो मायाधरं द्रौणिर्घटोत्कचसुतं दिवि । मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ॥
tato māyādharaṃ drauṇirghaṭotkacasutaṃ divi | mārgaṇairabhivivyādha ghanaṃ sūrya ivāṃśubhiḥ
तब द्रोणपुत्र ने आकाश में माया रचने वाले घटोत्कच-पुत्र को बाणों से वैसे ही बेध दिया जैसे सूर्य किरणों से बादल को बेधता है।
श्लोक 88 (7.157.88)
सोऽवतीर्य पुरस्तस्थौ रथे हेमविभूषिते । महीगत इवात्युग्रः श्रीमानञ्जनपर्वतः ॥
so'vatīrya purastasthau rathe hemavibhūṣite | mahīgata ivātyugraḥ śrīmānañjanaparvataḥ
फिर उतरकर वह सोने से सजे रथ पर सामने आ खड़ा हुआ, पृथ्वी पर खड़े अत्यन्त उग्र और शोभायमान अञ्जन-पर्वत के समान।
श्लोक 89 (7.157.89)
तमयस्मयवर्माणं द्रौणिर्भीमात्मजात्मजम् । जघानाञ्जनपर्वाणं महेश्वर इवान्धकम् ॥
tamayasmayavarmāṇaṃ drauṇirbhīmātmajātmajam | jaghānāñjanaparvāṇaṃ maheśvara ivāndhakam
लोहे का कवच पहने भीम के उस पौत्र अञ्जनपर्वा को द्रोणपुत्र ने वैसे ही मार डाला जैसे महेश्वर ने अन्धक को मारा था।
श्लोक 90 (7.157.90)
अथ दृष्ट्वा हतं पुत्रमश्वत्थाम्ना महाबलम् । द्रौणेः सकाशमभ्येत्य रोषात्प्रस्फुरिताधरः ॥
atha dṛṣṭvā hataṃ putramaśvatthāmnā mahābalam | drauṇeḥ sakāśamabhyetya roṣātprasphuritādharaḥ
तब अपने महाबली पुत्र को अश्वत्थामा के हाथों मरा देखकर, क्रोध से होंठ फड़कते हुए, वह द्रोणपुत्र के पास आया,
श्लोक 91 (7.157.91)
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तो वीरं शारद्वतीसुतम् । दहन्तं पाण्डवानीकं वनमग्निमिवोच्छ्रितम् ॥
prāha vākyamasambhrānto vīraṃ śāradvatīsutam | dahantaṃ pāṇḍavānīkaṃ vanamagnimivocchritam
और जंगल को जलाती ऊँची लपटों वाली आग की तरह पाण्डव-सेना को जलाते हुए उस वीर शारद्वती-पुत्र से शान्त भाव से बोला।
घटोत्कच उवाच
श्लोक 92 (7.157.92)
तिष्ठतिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि । त्वामद्य निहनिष्यामि क्रौञ्चमग्निसुतो यथा ॥
tiṣṭhatiṣṭha na me jīvandroṇaputra gamiṣyasi | tvāmadya nihaniṣyāmi krauñcamagnisuto yathā
"ठहर, ठहर! हे द्रोणपुत्र, तू मेरे हाथ से जीवित बचकर नहीं जाएगा। आज मैं तुझे वैसे ही मार डालूँगा जैसे अग्नि-पुत्र ने क्रौञ्च को मारा था।"
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 93 (7.157.93)
गच्छ वत्स सहान्यैस्त्वं युध्यस्वामरविक्रम । न हि पुत्रेण हैडिम्ब पिता न्याय्यः प्रबाधितुम् ॥
gaccha vatsa sahānyaistvaṃ yudhyasvāmaravikrama | na hi putreṇa haiḍimba pitā nyāyyaḥ prabādhitum
"जाओ वत्स, देवताओं जैसे पराक्रमी, दूसरों के साथ युद्ध करो। हे हैडिम्ब, पुत्र के द्वारा पिता को सताना उचित नहीं है।
श्लोक 94 (7.157.94)
कामं खलु न रोषो मे हैडिम्बे विद्यते त्वयि । किं तु रोषान्वितो जन्तुर्हन्यादात्मानमप्युत ॥
kāmaṃ khalu na roṣo me haiḍimbe vidyate tvayi | kiṃ tu roṣānvito janturhanyādātmānamapyuta
हे हिडिम्बापुत्र, तुम पर मुझे सचमुच क्रोध नहीं है; किन्तु क्रोध से भरा प्राणी अपने-आपको भी मार बैठता है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 95 (7.157.95)
श्रुत्वैतत्क्रोधताम्राक्षः पुत्रशोकसमन्वितः । अश्वत्थामानमायस्तो भैमसेनिरभाषत ॥
śrutvaitatkrodhatāmrākṣaḥ putraśokasamanvitaḥ | aśvatthāmānamāyasto bhaimasenirabhāṣata
यह सुनकर क्रोध से लाल आँखों वाले, पुत्र-शोक से भरे भीमसेन-पुत्र ने उद्विग्न होकर अश्वत्थामा से कहा।
घटोत्कच उवाच
श्लोक 96 (7.157.96)
किमहं कातरो द्रौणे पृथग्जन इवाहवे । यन्मां भीषयसे वाग्भिरसदेतद्वचस्तव ॥
kimahaṃ kātaro drauṇe pṛthagjana ivāhave | yanmāṃ bhīṣayase vāgbhirasadetadvacastava
“द्रोणपुत्र, क्या मैं युद्ध में किसी साधारण मनुष्य की भाँति डरपोक हूँ, जो तुम मुझे बातों से डराते हो? तुम्हारा यह कथन खोखला है।”
श्लोक 97 (7.157.97)
भीमात्खलु समुत्पन्नः कुरूणां विपुले कुले । पाण्डवानामहं पुत्रः समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥
bhīmātkhalu samutpannaḥ kurūṇāṃ vipule kule | pāṇḍavānāmahaṃ putraḥ samareṣvanivartinām
“मैं कुरुओं के विशाल कुल में भीम से उत्पन्न हुआ हूँ; मैं उन पाण्डवों का पुत्र हूँ जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते।”
श्लोक 98 (7.157.98)
रक्षसामधिराजोऽहं दशग्रीवसमो बले । तिष्ठतिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि ॥
rakṣasāmadhirājo'haṃ daśagrīvasamo bale | tiṣṭhatiṣṭha na me jīvandroṇaputra gamiṣyasi
“मैं राक्षसों का अधिराज हूँ और बल में दशग्रीव रावण के समान हूँ। ठहरो, ठहरो! द्रोणपुत्र, तुम मेरे हाथ से जीवित नहीं जाओगे।”
श्लोक 99 (7.157.99)
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ॥
yuddhaśraddhāmahaṃ te'dya vineṣyāmi raṇājire
“आज इस रणभूमि में मैं तुम्हारी युद्ध की लालसा निकाल दूँगा।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 100 (7.157.100)
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो राक्षसः सुमहाबलः । द्रौणिमभ्यद्रवत्क्रुद्धो गजेन्द्रमिव केसरी ॥
ityuktvā krodhatāmrākṣo rākṣasaḥ sumahābalaḥ | drauṇimabhyadravatkruddho gajendramiva kesarī
यह कहकर अत्यन्त बलवान् वह राक्षस क्रोध से लाल आँखें किए हुए द्रोणपुत्र पर टूट पड़ा, जैसे सिंह गजराज पर झपटता है।
श्लोक 101 (7.157.101)
रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद्धटोत्कचः । रथिनामृषभं द्रौणिं धाराभिरिव तोयदः ॥
rathākṣamātrairiṣubhirabhyavarṣaddhaṭotkacaḥ | rathināmṛṣabhaṃ drauṇiṃ dhārābhiriva toyadaḥ
घटोत्कच ने रथियों में श्रेष्ठ द्रौणि पर रथ की धुरी जितने मोटे बाणों की वर्षा की, जैसे मेघ धाराओं में जल बरसाता है।
श्लोक 102 (7.157.102)
शरवृष्टिं शरैर्द्रौणिरप्राप्तां तां व्यशातयत् । ततोन्तरिक्षे बाणानां सङ्ग्रामोऽन्य इवाभवत् ॥
śaravṛṣṭiṃ śarairdrauṇiraprāptāṃ tāṃ vyaśātayat | tatontarikṣe bāṇānāṃ saṅgrāmo'nya ivābhavat
द्रौणि ने उस बाण-वर्षा को अपने बाणों से अपने तक पहुँचने से पहले ही काट डाला; तब आकाश में बाणों का मानो एक दूसरा ही युद्ध होने लगा।
श्लोक 103 (7.157.103)
अथास्त्रसम्मर्दकृतैर्विस्फुलिङ्गैस्तदा बभौ । विभावरीमुखे व्योम खद्योतैरिव चित्रितम् ॥
athāstrasammardakṛtairvisphuliṅgaistadā babhau | vibhāvarīmukhe vyoma khadyotairiva citritam
तब अस्त्रों के टकराने से उठी चिनगारियों से आकाश ऐसा चमक उठा, मानो रात के आरम्भ में जुगनुओं से चित्रित हो गया हो।
श्लोक 104 (7.157.104)
निशाम्य निहतां मायां द्रौणिना रणमानिना । घटोत्कचस्ततो मायां ससर्जान्तर्हितः पुनः ॥
niśāmya nihatāṃ māyāṃ drauṇinā raṇamāninā | ghaṭotkacastato māyāṃ sasarjāntarhitaḥ punaḥ
रण का अभिमान रखने वाले द्रौणि के द्वारा अपनी माया नष्ट हुई देखकर घटोत्कच अन्तर्धान हो गया और उसने फिर एक माया रची।
श्लोक 105 (7.157.105)
सोऽभवद्गिरिरत्युच्चः शिखरैस्तरुसङ्कटैः । शूलप्रासासिमुसलजलप्रस्रवणो महान् ॥
so'bhavadgiriratyuccaḥ śikharaistarusaṅkaṭaiḥ | śūlaprāsāsimusalajalaprasravaṇo mahān
वह एक विशाल और अत्यन्त ऊँचा पर्वत बन गया, जिसकी चोटियाँ वृक्षों से घनी थीं और जिससे शूल, प्रास, तलवारें और मूसल झरनों की तरह बरस रहे थे।
श्लोक 106 (7.157.106)
तमञ्जनगिरिप्रख्यं द्रौणिर्दृष्ट्वा महीधरम् । प्रपतद्भिश्च बहुभिः शस्त्रसङ्घैर्न विव्यथे ॥
tamañjanagiriprakhyaṃ drauṇirdṛṣṭvā mahīdharam | prapatadbhiśca bahubhiḥ śastrasaṅghairna vivyathe
अंजन पर्वत के समान उस पर्वत को देखकर भी द्रौणि विचलित नहीं हुआ, यद्यपि उस पर शस्त्रों की अनेक बौछारें गिर रही थीं।
श्लोक 107 (7.157.107)
ततो हसन्निव द्रौणिर्वज्रमस्त्रमुदैरयत् । स तेनास्त्रेण शैलेन्द्रः क्षिप्तः क्षिप्रं व्यनश्यत ॥
tato hasanniva drauṇirvajramastramudairayat | sa tenāstreṇa śailendraḥ kṣiptaḥ kṣipraṃ vyanaśyata
तब द्रौणि ने मानो हँसते हुए वज्रास्त्र चलाया; उस अस्त्र से आहत होकर वह पर्वतराज शीघ्र ही लुप्त हो गया।
श्लोक 108 (7.157.108)
ततः स तोयदो भूत्वा नीलः सेन्द्रायुधो दिवि । अश्मवृष्टिभिरत्युग्रो द्रौणिमाच्छादयद्रणे ॥
tataḥ sa toyado bhūtvā nīlaḥ sendrāyudho divi | aśmavṛṣṭibhiratyugro drauṇimācchādayadraṇe
तब वह आकाश में इन्द्रधनुष से युक्त काला बादल बनकर रण में अत्यन्त उग्र रूप से द्रौणि पर पत्थरों की वर्षा से छा गया।
श्लोक 109 (7.157.109)
अथ सन्धाय वायव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः । व्यधमद्द्रोणतनयो नीलमेघं समुत्थितम् ॥
atha sandhāya vāyavyamastramastravidāṃ varaḥ | vyadhamaddroṇatanayo nīlameghaṃ samutthitam
तब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र ने वायव्यास्त्र का सन्धान करके उठे हुए उस काले मेघ को छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 110 (7.157.110)
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वशः । शतं रथसहस्राणां जघान द्विपदां वरः ॥
sa mārgaṇagaṇairdrauṇirdiśaḥ pracchādya sarvaśaḥ | śataṃ rathasahasrāṇāṃ jaghāna dvipadāṃ varaḥ
सब दिशाओं को बाण-समूहों से ढककर नरश्रेष्ठ द्रौणि ने एक लाख रथों को मार गिराया।
श्लोक 111 (7.157.111)
स दृष्ट्वा पुनरायान्तं रथेनायतकार्मुकम् । घटोत्कचमसम्भ्रान्तं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥
sa dṛṣṭvā punarāyāntaṃ rathenāyatakārmukam | ghaṭotkacamasambhrāntaṃ rākṣasairbahubhirvṛtam
उसने देखा कि घटोत्कच फिर लम्बा धनुष खींचे रथ पर चला आ रहा है, निर्भय है और बहुत-से राक्षसों से घिरा हुआ है;
श्लोक 112 (7.157.112)
सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तद्विरदविक्रमैः । गजस्थैश्च रथस्थैश्च वाजिपृष्ठगतैरपि ॥
siṃhaśārdūlasadṛśairmattadviradavikramaiḥ | gajasthaiśca rathasthaiśca vājipṛṣṭhagatairapi
वे राक्षस सिंहों और बाघों के समान थे, मतवाले हाथियों जैसा पराक्रम रखते थे; कोई हाथियों पर, कोई रथों पर और कोई घोड़ों की पीठ पर था,
श्लोक 113 (7.157.113)
विकृतास्यशिरोग्रीवैर्हिडिम्बानुचरैः सह । पौलस्त्यैर्यातुधानैश्च तामसैश्चेन्द्रविक्रमैः ॥
vikṛtāsyaśirogrīvairhiḍimbānucaraiḥ saha | paulastyairyātudhānaiśca tāmasaiścendravikramaiḥ
उनके मुख, सिर और गर्दनें विकृत थीं; वे हिडिम्बा के अनुचर, पुलस्त्य-वंशी, यातुधान और तामसी स्वभाव के थे, और इन्द्र के समान पराक्रमी थे,
श्लोक 114 (7.157.114)
नानाशस्त्रधरैर्वीरैर्नानाकवचभूषणैः । महाबलैर्भीमरवैः संरम्भोद्वृत्तलोचनैः ॥
nānāśastradharairvīrairnānākavacabhūṣaṇaiḥ | mahābalairbhīmaravaiḥ saṃrambhodvṛttalocanaiḥ
अनेक प्रकार के शस्त्र धारण किए, अनेक प्रकार के कवच और आभूषणों से सजे, महाबली, भयंकर गर्जना करने वाले और क्रोध से आँखें घुमाते हुए वीर थे।
श्लोक 115 (7.157.115)
उपस्थितैस्ततो युद्धे राक्षसैर्युद्धदुर्मदैः । विषण्णमभिसम्प्रेक्ष्य पुत्रं ते द्रौणिरब्रवीत् ॥
upasthitaistato yuddhe rākṣasairyuddhadurmadaiḥ | viṣaṇṇamabhisamprekṣya putraṃ te drauṇirabravīt
जब युद्ध के मद में चूर वे राक्षस रण में सन्नद्ध खड़े हो गए, तब आपके पुत्र को विषाद में डूबा देखकर द्रौणि ने उससे कहा:
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 116 (7.157.116)
तिष्ठ दुर्योधनाद्य त्वं न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया । सहैभिर्भ्रातृभिर्वीरैः पार्थिवैश्चेन्द्रविक्रमैः ॥
tiṣṭha duryodhanādya tvaṃ na kāryaḥ sambhramastvayā | sahaibhirbhrātṛbhirvīraiḥ pārthivaiścendravikramaiḥ
“दुर्योधन, आज तुम स्थिर रहो; तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम अपने इन वीर भाइयों और इन्द्र के समान पराक्रमी राजाओं के साथ हो।
श्लोक 117 (7.157.117)
निहनिष्याम्यमित्रांस्ते न तवास्ति पराजयः । सत्यं ते प्रतिजानामि पर्याश्वासय वाहिनीम् ॥
nihaniṣyāmyamitrāṃste na tavāsti parājayaḥ | satyaṃ te pratijānāmi paryāśvāsaya vāhinīm
मैं तुम्हारे शत्रुओं का संहार करूँगा; तुम्हारी पराजय नहीं होगी। मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; अपनी सेना को आश्वासन दो।”
दुर्योधन उवाच
श्लोक 118 (7.157.118)
न त्वेतदद्भुतं मन्ये यत्ते महदिदं मनः । अस्मासु च परा भक्तिस्तव गौतमिनन्दन ॥
na tvetadadbhutaṃ manye yatte mahadidaṃ manaḥ | asmāsu ca parā bhaktistava gautaminandana
“गौतमी के पुत्र, मुझे यह आश्चर्य नहीं लगता कि तुम्हारा मन इतना महान् है और हम पर तुम्हारी भक्ति इतनी अधिक है।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 119 (7.157.119)
अश्वत्थामानमुक्त्वैवं ततः सौबलमब्रवीत् । वृतं रथसहस्रेण हयानां रणशोभिनाम् ॥
aśvatthāmānamuktvaivaṃ tataḥ saubalamabravīt | vṛtaṃ rathasahasreṇa hayānāṃ raṇaśobhinām
अश्वत्थामा से इस प्रकार कहकर उसने फिर सौबल शकुनि से कहा, जो एक हज़ार रथों और रणभूमि की शोभा बढ़ाने वाले घोड़ों से घिरा हुआ था:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 120 (7.157.120)
षष्ट्या रथसहस्रैश्च प्रयाहि त्वं धनञ्जयम् । कर्णश्च वृषसेनश्च कृपो नीलस्तथैव च ॥
ṣaṣṭyā rathasahasraiśca prayāhi tvaṃ dhanañjayam | karṇaśca vṛṣasenaśca kṛpo nīlastathaiva ca
“साठ हज़ार रथों के साथ तुम धनंजय पर चढ़ाई करो। कर्ण, वृषसेन, कृप और नील भी,
श्लोक 121 (7.157.121)
उदीच्याः कृतवर्मा च पुरुमित्रः सुतापनः । दुःशासनो निकुम्भश्च कुण्डभेदी पराक्रमः ॥
udīcyāḥ kṛtavarmā ca purumitraḥ sutāpanaḥ | duḥśāsano nikumbhaśca kuṇḍabhedī parākramaḥ
उत्तर देश के योद्धा और कृतवर्मा, पुरुमित्र, सुतापन, दुःशासन, निकुम्भ और पराक्रमी कुण्डभेदी,
श्लोक 122 (7.157.122)
पूरञ्जयो दृढरथः पताकी हेमकम्पनः । शल्यारुणीन्द्रसेनाश्च सञ्जयो विजयो जयः ॥
pūrañjayo dṛḍharathaḥ patākī hemakampanaḥ | śalyāruṇīndrasenāśca sañjayo vijayo jayaḥ
पुरंजय, दृढरथ, पताकी, हेमकम्पन, शल्य, अरुणि और इन्द्रसेन, सञ्जय, विजय और जय,
श्लोक 123 (7.157.123)
कमलाक्षः परक्राथी जयवर्मा सुदर्शनः । एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तीनामयुतानि षट् ॥
kamalākṣaḥ parakrāthī jayavarmā sudarśanaḥ | ete tvāmanuyāsyanti pattīnāmayutāni ṣaṭ
कमलाक्ष, परक्राथी, जयवर्मा और सुदर्शन: ये सब छह अयुत, अर्थात् साठ हज़ार पैदल सैनिकों के साथ तुम्हारे पीछे चलेंगे।
श्लोक 124 (7.157.124)
जहि भीमं यमौ चोभौ धर्मराजं च मातुल । असुरानिव देवेन्द्रो जयाशा मे त्वयि स्थिता ॥
jahi bhīmaṃ yamau cobhau dharmarājaṃ ca mātula | asurāniva devendro jayāśā me tvayi sthitā
मामा, भीम को, दोनों जुड़वाँ भाइयों को और धर्मराज को मार डालो, जैसे देवराज इन्द्र असुरों को मारते हैं। मेरी विजय की आशा तुम्हीं पर टिकी है।”
श्लोक 125 (7.157.125)
दारितान्द्रौणिना बाणैर्भृशं विक्षतविग्रहान् । जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ॥
dāritāndrauṇinā bāṇairbhṛśaṃ vikṣatavigrahān | jahi mātula kaunteyānasurāniva pāvakiḥ
“मामा, द्रौणि के बाणों से चीरे गए और शरीर से बुरी तरह घायल कुन्ती के पुत्रों को तुम मार डालो, जैसे अग्नि-पुत्र स्कन्द ने असुरों को मारा था।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 126 (7.157.126)
एवमुक्तो ययौ शीघ्रं पुत्रेण तव सौबलः । पिप्रीषुस्ते सुतान्राजन्दिधक्षुश्चैव पाण्डवान् ॥
evamukto yayau śīghraṃ putreṇa tava saubalaḥ | piprīṣuste sutānrājandidhakṣuścaiva pāṇḍavān
आपके पुत्र के इस प्रकार कहने पर सौबल शीघ्र चल पड़ा, हे राजन्; वह आपके पुत्रों को प्रसन्न करना और पाण्डवों को जला डालना चाहता था।
श्लोक 127 (7.157.127)
अथ प्रववृते युद्धं द्रौणिराक्षसयोर्मृधे । विभावर्यां सुतुमुलं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥
atha pravavṛte yuddhaṃ drauṇirākṣasayormṛdhe | vibhāvaryāṃ sutumulaṃ śakraprahlādayoriva
तब रात में द्रौणि और राक्षस के बीच अत्यन्त भयंकर और घमासान युद्ध छिड़ा, जैसे इन्द्र और प्रह्लाद के बीच हुआ था।
श्लोक 128 (7.157.128)
ततो घटोत्कचो बाणैर्दशभिर्गौतमीसुतम् । जघानोरसि सङ्क्रुद्धो विषाग्निप्रतिमैर्दृढैः ॥
tato ghaṭotkaco bāṇairdaśabhirgautamīsutam | jaghānorasi saṅkruddho viṣāgnipratimairdṛḍhaiḥ
तब अत्यन्त क्रुद्ध घटोत्कच ने विष और अग्नि के समान दस दृढ़ बाणों से गौतमी-पुत्र की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 129 (7.157.129)
स तैरभ्याहतो गाढं शरैर्भीमसुतेरितैः । चचाल रथमध्यस्थो वातोद्धूत इव द्रुमः ॥
sa tairabhyāhato gāḍhaṃ śarairbhīmasuteritaiḥ | cacāla rathamadhyastho vātoddhūta iva drumaḥ
भीमसेन के पुत्र के छोड़े उन बाणों से गहरी चोट खाकर वह रथ के बीच में हवा से हिले वृक्ष की तरह डगमगा गया।
श्लोक 130 (7.157.130)
भूयश्चाञ्जलिकेनाथ मार्गणेन महाप्रभम् । द्रौणिहस्तस्थितं चापं चिच्छेदाशु घटोत्कचः ॥
bhūyaścāñjalikenātha mārgaṇena mahāprabham | drauṇihastasthitaṃ cāpaṃ cicchedāśu ghaṭotkacaḥ
फिर घटोत्कच ने अंजलिक नामक बाण से द्रौणि के हाथ में स्थित उसके तेजस्वी धनुष को शीघ्र काट डाला।
श्लोक 131 (7.157.131)
ततोऽन्यद्द्रौणिरादाय धनुर्भारसहं महत् । ववर्ष विशिखांस्तीक्ष्णान्वारिधारा इवाम्बुदः ॥
tato'nyaddrauṇirādāya dhanurbhārasahaṃ mahat | vavarṣa viśikhāṃstīkṣṇānvāridhārā ivāmbudaḥ
तब द्रौणि ने भारी तनाव सह सकने वाला दूसरा विशाल धनुष लेकर मेघ की जलधाराओं की भाँति तीखे बाणों की वर्षा की।
श्लोक 132 (7.157.132)
ततः शारद्वतीपुत्रः प्रेषयामास भारत । सुवर्णपुङ्खाञ्छत्रुघ्नान्खचरान्खचरं प्रति ॥
tataḥ śāradvatīputraḥ preṣayāmāsa bhārata | suvarṇapuṅkhāñchatrughnānkhacarānkhacaraṃ prati
तब हे भारत, शारद्वती के पुत्र ने सोने के पंखों वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले और आकाश में उड़ने वाले बाण आकाशचारी राक्षस की ओर चलाए।
श्लोक 133 (7.157.133)
तद्बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥
tadbāṇairarditaṃ yūthaṃ rakṣasāṃ pīnavakṣasām | siṃhairiva babhau mattaṃ gajānāmākulaṃ kulam
उन बाणों से पीड़ित चौड़ी छाती वाले राक्षसों का वह झुंड ऐसा लगा, जैसे सिंहों द्वारा व्याकुल किया हुआ मतवाले हाथियों का समूह हो।
श्लोक 134 (7.157.134)
विधम्य राक्षसान्बाणैः साश्वसूतरथद्विपान् । ददाह भगवान्वह्निर्भूतानीव युगक्षये ॥
vidhamya rākṣasānbāṇaiḥ sāśvasūtarathadvipān | dadāha bhagavānvahnirbhūtānīva yugakṣaye
घोड़ों, सारथियों, रथों और हाथियों सहित राक्षसों को बाणों से छिन्न-भिन्न करके उसने उन्हें इस प्रकार भस्म कर दिया, जैसे युग के अन्त में भगवान् अग्नि सब प्राणियों को भस्म करते हैं।
श्लोक 135 (7.157.135)
स दग्ध्वाऽक्षौहिणीं बाणैर्नैर्ऋतीं रुरुचे नृप । पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ॥
sa dagdhvā'kṣauhiṇīṃ bāṇairnairṛtīṃ ruruce nṛpa | pureva tripuraṃ dagdhvā divi devo maheśvaraḥ
हे राजन्, राक्षसों की उस अक्षौहिणी को बाणों से जलाकर वह ऐसे शोभित हुआ, जैसे पूर्वकाल में त्रिपुर को जलाकर आकाश में देव महेश्वर शोभित हुए थे।
श्लोक 136 (7.157.136)
युगान्ते सर्वभूतानि दग्ध्वेव वसुरुल्बणः । रराज जयतां श्रेष्ठो द्रोणपुत्रस्तवाहितान् ॥
yugānte sarvabhūtāni dagdhveva vasurulbaṇaḥ | rarāja jayatāṃ śreṣṭho droṇaputrastavāhitān
युग के अन्त में सब प्राणियों को जलाती हुई प्रचण्ड अग्नि के समान, विजेताओं में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र आपके शत्रुओं को जलाता हुआ शोभित हुआ।
श्लोक 137 (7.157.137)
ततो घटोत्कचः क्रुद्धो रक्षसां भीमकर्मणाम् । द्रौणिं हतेति महतीं चोदयामास तां चमूम् ॥
tato ghaṭotkacaḥ kruddho rakṣasāṃ bhīmakarmaṇām | drauṇiṃ hateti mahatīṃ codayāmāsa tāṃ camūm
तब क्रुद्ध घटोत्कच ने भयंकर कर्म करने वाले राक्षसों की उस विशाल सेना को “द्रौणि को मार डालो” कहकर उकसाया।
श्लोक 138 (7.157.138)
घटोत्कचस्य तामाज्ञां प्रतिगृह्याथ राक्षसाः । दंष्ट्रोज्ज्वला महावक्त्रा घोररूपा भयानकाः ॥
ghaṭotkacasya tāmājñāṃ pratigṛhyātha rākṣasāḥ | daṃṣṭrojjvalā mahāvaktrā ghorarūpā bhayānakāḥ
घटोत्कच की उस आज्ञा को पाकर राक्षस, जिनकी दाढ़ें चमक रही थीं, मुँह विशाल थे और रूप घोर और भयानक थे,
श्लोक 139 (7.157.139)
व्यात्तानना घोरजिह्वाः क्रोधताम्रेक्षणा भृशम् । सिंहनादेन महता नादयन्तो वसुन्धराम् ॥
vyāttānanā ghorajihvāḥ krodhatāmrekṣaṇā bhṛśam | siṃhanādena mahatā nādayanto vasundharām
खुले मुखों और भयंकर जीभों वाले, क्रोध से अत्यन्त लाल आँखों वाले, सिंह की महान् गर्जना से पृथ्वी को गुँजाते हुए,
श्लोक 140 (7.157.140)
हन्तुमभ्यद्रवन्द्रौणिं नानाप्रहरणायुधाः । शक्तीः शतघ्नीः परिघानशनीः शूलपट्टशान् ॥
hantumabhyadravandrauṇiṃ nānāpraharaṇāyudhāḥ | śaktīḥ śataghnīḥ parighānaśanīḥ śūlapaṭṭaśān
नाना प्रकार के शस्त्र लिए द्रौणि को मारने दौड़े: शक्तियाँ, शतघ्नियाँ, परिघ, अशनियाँ, शूल और पट्टिश,
श्लोक 141 (7.157.141)
खड्गान्गदाभिण्डिपालान्मुसलानि परश्वथान् । प्रासानसींस्तोमरांश्च कणपान्कम्पनाञ्छितान् ॥
khaḍgāngadābhiṇḍipālānmusalāni paraśvathān | prāsānasīṃstomarāṃśca kaṇapānkampanāñchitān
खड्ग, गदाएँ, भिण्डिपाल, मूसल, फरसे, प्रास, तलवारें, तोमर, कणप और तीखे कम्पन,
श्लोक 142 (7.157.142)
स्थूलान्भुशुण्ड्यश्मगदास्थूणान्कार्ष्ण्यायसांस्तथा । मुद्गराँश्च महाघोरान्समरे शत्रुदारणान् ॥
sthūlānbhuśuṇḍyaśmagadāsthūṇānkārṣṇyāyasāṃstathā | mudgarām̐śca mahāghorānsamare śatrudāraṇān
मोटी भुशुण्डियाँ, पत्थर की गदाएँ, खम्भे, काले लोहे के शस्त्र तथा युद्ध में शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले अत्यन्त भयंकर मुद्गर।
श्लोक 143 (7.157.143)
द्रौणिमूर्धन्यसन्त्रस्ता राक्षसा भीमविक्रमाः । चिक्षिपुः क्रोधताम्राक्षाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
drauṇimūrdhanyasantrastā rākṣasā bhīmavikramāḥ | cikṣipuḥ krodhatāmrākṣāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
भयंकर पराक्रम वाले, निर्भय और क्रोध से लाल आँखों वाले उन राक्षसों ने ये सब शस्त्र सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में द्रौणि के सिर पर फेंके।
श्लोक 144 (7.157.144)
तच्छस्त्रवर्षं सुमहद्द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि । पतमानं समीक्ष्याऽथ योधास्ते व्यथिताऽभवन् ॥
tacchastravarṣaṃ sumahaddroṇaputrasya mūrdhani | patamānaṃ samīkṣyā'tha yodhāste vyathitā'bhavan
द्रोणपुत्र के सिर पर गिरती हुई उस विशाल शस्त्र-वर्षा को देखकर वे योद्धा व्यथित हो उठे।
श्लोक 145 (7.157.145)
द्रोणपुत्रस्तु विक्रान्तस्तद्वर्षं घोरमुच्छ्रितम् । शरैर्विध्वंसयामास वज्रकल्पैः शिलाशितैः ॥
droṇaputrastu vikrāntastadvarṣaṃ ghoramucchritam | śarairvidhvaṃsayāmāsa vajrakalpaiḥ śilāśitaiḥ
किन्तु पराक्रमी द्रोणपुत्र ने पत्थर पर तेज किए हुए वज्र-समान बाणों से उठी हुई उस भयंकर वर्षा को नष्ट कर दिया।
श्लोक 146 (7.157.146)
ततोऽन्यैर्विशिखैस्तूर्णं स्वर्णपुङ्खैर्महामनाः । निजघ्ने राक्षसान्द्रौणिर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥
tato'nyairviśikhaistūrṇaṃ svarṇapuṅkhairmahāmanāḥ | nijaghne rākṣasāndrauṇirdivyāstrapratimantritaiḥ
फिर महामना द्रौणि ने दिव्यास्त्रों के मन्त्रों से अभिमन्त्रित अन्य सोने के पंखों वाले बाणों से शीघ्र ही राक्षसों को मार डाला।
श्लोक 147 (7.157.147)
तद्बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥
tadbāṇairarditaṃ yūthaṃ rakṣasāṃ pīnavakṣasām | siṃhairiva babhau mattaṃ gajānāmākulaṃ kulam
उसके बाणों से पीड़ित चौड़ी छाती वाले राक्षसों का वह झुंड ऐसा लगा, जैसे सिंहों द्वारा व्याकुल किया हुआ मतवाले हाथियों का समूह हो।
श्लोक 148 (7.157.148)
ते राक्षसाः सुसङ्क्रुद्धा द्रोणपुत्रेण ताडिताः । क्रुद्धाः स्म प्राद्रवन्द्रौणिं जिघांसन्तो महाबलाः ॥
te rākṣasāḥ susaṅkruddhā droṇaputreṇa tāḍitāḥ | kruddhāḥ sma prādravandrauṇiṃ jighāṃsanto mahābalāḥ
द्रोणपुत्र से मारे गए वे महाबली राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसे मार डालने की इच्छा से द्रौणि पर टूट पड़े।
श्लोक 149 (7.157.149)
तत्राद्भुतमिमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् । अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ॥
tatrādbhutamimaṃ drauṇirdarśayāmāsa vikramam | aśakyaṃ kartumanyena sarvabhūteṣu bhārata
तब द्रौणि ने यह अद्भुत पराक्रम दिखाया, हे भारत, जिसे सब प्राणियों में दूसरा कोई नहीं कर सकता था:
श्लोक 150 (7.157.150)
यदेको राक्षसीं सेनां क्षणाद्द्रौणिर्महास्त्रवित् । ददाह ज्वलितैर्बाणै राक्षसेन्द्रस्य पश्यतः ॥
yadeko rākṣasīṃ senāṃ kṣaṇāddrauṇirmahāstravit | dadāha jvalitairbāṇai rākṣasendrasya paśyataḥ
कि उस महान् अस्त्रवेत्ता ने अकेले ही क्षणभर में राक्षसों की सेना को, राक्षसराज के देखते-देखते, जलते हुए बाणों से भस्म कर दिया।
श्लोक 151 (7.157.151)
स हत्वा राक्षसानीकं रराज द्रौणिराहवे । युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः ॥
sa hatvā rākṣasānīkaṃ rarāja drauṇirāhave | yugānte sarvabhūtāni saṃvartaka ivānalaḥ
राक्षसों की सेना को मारकर द्रौणि युद्ध में ऐसा शोभित हुआ, जैसे युग के अन्त में सब प्राणियों को जलाने वाली संवर्तक अग्नि।
श्लोक 152 (7.157.152)
तं दहन्तमनीकानि शरैराशीविषोपमैः । तेषु राजसहस्रेषु पाण्डवेयेषु भारत ॥
taṃ dahantamanīkāni śarairāśīviṣopamaiḥ | teṣu rājasahasreṣu pāṇḍaveyeṣu bhārata
जब वह विषैले सर्पों के समान बाणों से सेनाओं को जला रहा था, तब पाण्डवों के पक्ष के उन हज़ारों राजाओं में, हे भारत,
श्लोक 153 (7.157.153)
नैनं निरीक्षितुं कश्चिदशक्नोद्द्रौणिमाहवे । ऋते घटोत्कचाद्वीराद्राक्षसेन्द्रान्महाबलात् ॥
nainaṃ nirīkṣituṃ kaścidaśaknoddrauṇimāhave | ṛte ghaṭotkacādvīrādrākṣasendrānmahābalāt
युद्ध में द्रौणि की ओर देख सकने का साहस किसी को नहीं हुआ, केवल वीर घटोत्कच को छोड़कर, जो अत्यन्त बलवान् राक्षसराज था।
श्लोक 154 (7.157.154)
स पुनर्भरतश्रेष्ठ क्रोधादुद्भ्रान्तलोचनः । तलं तलेन संहत्य सन्दश्य दशनच्छदम् ॥
sa punarbharataśreṣṭha krodhādudbhrāntalocanaḥ | talaṃ talena saṃhatya sandaśya daśanacchadam
फिर हे भरतश्रेष्ठ, क्रोध से आँखें घुमाते हुए, हथेली से हथेली पीटकर और होंठ चबाकर,
श्लोक 155 (7.157.155)
स्वसूतमब्रवीत्क्रुद्धो द्रोणपुत्राय मां वह । स ययौ घोररूपेण सुपताकेन भास्वता ॥
svasūtamabravītkruddho droṇaputrāya māṃ vaha | sa yayau ghorarūpeṇa supatākena bhāsvatā
उसने क्रोध में अपने सारथी से कहा, “मुझे द्रोणपुत्र के पास ले चल।” और वह सुन्दर पताका से युक्त अपने भयंकर, चमकते रथ में चल पड़ा,
श्लोक 156 (7.157.156)
द्वैरथं द्रोणपुत्रेण पुनरप्यरिसूदनः । स विनद्य महानादं सिंहवद्भीमविक्रमः ॥
dvairathaṃ droṇaputreṇa punarapyarisūdanaḥ | sa vinadya mahānādaṃ siṃhavadbhīmavikramaḥ
फिर द्रोणपुत्र से रथ-युद्ध करने के लिए, वह शत्रुसूदन। सिंह की भाँति महान् गर्जना करके वह भयंकर पराक्रमी राक्षस,
श्लोक 157 (7.157.157)
चिक्षेपाविद्ध्य सङ्ग्रामे द्रोणपुत्राय राक्षसः । अष्टघण्टां महाघोरामशनिं देवनिर्मिताम् ॥
cikṣepāviddhya saṅgrāme droṇaputrāya rākṣasaḥ | aṣṭaghaṇṭāṃ mahāghorāmaśaniṃ devanirmitām
उसे घुमाकर युद्ध में द्रोणपुत्र पर फेंका: देवताओं की बनाई हुई, आठ घण्टियों वाली अत्यन्त भयंकर अशनि।
श्लोक 158 (7.157.158)
तामवप्लुत्य जग्राह द्रौणिर्न्यस्य रथे धनुः । चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात्सोऽवपुप्लुवे ॥
tāmavaplutya jagrāha drauṇirnyasya rathe dhanuḥ | cikṣepa caināṃ tasyaiva syandanātso'vapupluve
द्रौणि ने उछलकर उसे पकड़ लिया, रथ में धनुष रख दिया और उसे उसी पर वापस फेंक दिया; घटोत्कच अपने रथ से कूद गया।
श्लोक 159 (7.157.159)
साश्वसूतध्वजं यानं भस्म कृत्वा महाप्रभा । विवेश वसुधां भित्त्वा साऽशनिर्भृशदारुणा ॥
sāśvasūtadhvajaṃ yānaṃ bhasma kṛtvā mahāprabhā | viveśa vasudhāṃ bhittvā sā'śanirbhṛśadāruṇā
घोड़ों, सारथी और ध्वज सहित रथ को भस्म करके वह महातेजस्वी और अत्यन्त भयंकर अशनि पृथ्वी को चीरकर उसमें समा गई।
श्लोक 160 (7.157.160)
द्रौणेस्तत्कर्म दृष्ट्वा तु सर्वभूतान्यपूजयन् । यदप्लुत्य जग्राह घोरां शङ्करनिर्मिताम् ॥
drauṇestatkarma dṛṣṭvā tu sarvabhūtānyapūjayan | yadaplutya jagrāha ghorāṃ śaṅkaranirmitām
द्रोणपुत्र का वह कर्म देखकर, कि उसने उछलकर शंकर की बनाई उस भयंकर अशनि को पकड़ लिया, सब प्राणियों ने उसकी प्रशंसा की।
श्लोक 161 (7.157.161)
धृष्टद्युम्नरथं गत्वा भैमसेनिस्ततो नृप । धनुर्घोरं समादाय महदिन्द्रायुधोपमम् । मुमोच निशितान्बाणान्पुनर्द्रौणेर्महोरसि ॥
dhṛṣṭadyumnarathaṃ gatvā bhaimasenistato nṛpa | dhanurghoraṃ samādāya mahadindrāyudhopamam | mumoca niśitānbāṇānpunardrauṇermahorasi
तब हे राजन्, भीमपुत्र धृष्टद्युम्न के रथ के पास गया और इन्द्रधनुष के समान विशाल, भयंकर धनुष लेकर उसने द्रोणपुत्र की चौड़ी छाती पर फिर तीखे बाण छोड़े।
श्लोक 162 (7.157.162)
धृष्टद्युम्नस्त्वसम्भ्रान्तो मुमोचाशीविषोपमान् । सुवर्णपुङ्खान्विशिखान्द्रोणपुत्रस्य वक्षसि ॥
dhṛṣṭadyumnastvasambhrānto mumocāśīviṣopamān | suvarṇapuṅkhānviśikhāndroṇaputrasya vakṣasi
धृष्टद्युम्न ने भी निर्भय होकर द्रोणपुत्र की छाती पर विषैले सर्पों के समान सोने के पंखों वाले बाण छोड़े।
श्लोक 163 (7.157.163)
ततो मुमोच नाराचान्द्रौणिस्तांश्च सहस्रशः । तावप्यग्निशिखप्रख्यैर्जघ्नतुस्तस्य मार्गणान् ॥
tato mumoca nārācāndrauṇistāṃśca sahasraśaḥ | tāvapyagniśikhaprakhyairjaghnatustasya mārgaṇān
तब द्रौणि ने हज़ारों नाराच छोड़े, और उन दोनों ने भी अग्नि की लपटों के समान बाणों से उसके बाणों को काट गिराया।
श्लोक 164 (7.157.164)
अतितीव्रं महद्युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । योधानां प्रीतिजननं द्रौणेश्च भरतर्षभ ॥
atitīvraṃ mahadyuddhaṃ tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | yodhānāṃ prītijananaṃ drauṇeśca bharatarṣabha
उन दोनों पुरुषसिंहों का वह महान् युद्ध अत्यन्त तीव्र था; हे भरतश्रेष्ठ, वह योद्धाओं को और द्रोणपुत्र को भी आनन्द देने वाला था।
श्लोक 165 (7.157.165)
ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतैस्त्रिभिः । षड्भिर्वाजिसहस्रैश्च भीमस्तं देशमागमत् ॥
tato rathasahasreṇa dviradānāṃ śataistribhiḥ | ṣaḍbhirvājisahasraiśca bhīmastaṃ deśamāgamat
तब भीम एक हज़ार रथों, तीन सौ हाथियों और छह हज़ार घोड़ों के साथ उस स्थान पर आ पहुँचा।
श्लोक 166 (7.157.166)
ततो भीमात्मजं रक्षो धृष्टद्युम्नं च सानुगम् । अयोधयत धर्मात्मा द्रौणिरक्लिष्टविक्रमः ॥
tato bhīmātmajaṃ rakṣo dhṛṣṭadyumnaṃ ca sānugam | ayodhayata dharmātmā drauṇirakliṣṭavikramaḥ
तब धर्मात्मा और अक्लान्त पराक्रम वाले द्रौणि ने भीम के राक्षस-पुत्र और धृष्टद्युम्न से उनके अनुचरों सहित युद्ध किया।
श्लोक 167 (7.157.167)
तत्राद्भुततमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् । अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ॥
tatrādbhutatamaṃ drauṇirdarśayāmāsa vikramam | aśakyaṃ kartumanyena sarvabhūteṣu bhārata
वहाँ द्रौणि ने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम दिखाया, हे भारत, जिसे सब प्राणियों में दूसरा कोई नहीं कर सकता था:
श्लोक 168 (7.157.168)
निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् । अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्बाणैरशातयत् ॥
nimeṣāntaramātreṇa sāśvasūtarathadvipām | akṣauhiṇīṃ rākṣasānāṃ śitairbāṇairaśātayat
पलक झपकने भर में उसने घोड़ों, सारथियों, रथों और हाथियों सहित राक्षसों की एक अक्षौहिणी को तीखे बाणों से काट गिराया,
श्लोक 169 (7.157.169)
मिषतो भीमसेनस्य हैडिम्बेः पार्षतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य विजयस्याच्युतस्य च ॥
miṣato bhīmasenasya haiḍimbeḥ pārṣatasya ca | yamayordharmaputrasya vijayasyācyutasya ca
भीमसेन, हिडिम्बा के पुत्र, पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न, दोनों यमज भाइयों, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, विजय अर्जुन और अच्युत कृष्ण के देखते-देखते।
श्लोक 170 (7.157.170)
प्रगाढमञ्जोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः । निपेतुर्द्विरदा भूमौ सशृङ्गा इव पर्वताः ॥
pragāḍhamañjogatibhirnārācairabhitāḍitāḥ | nipeturdviradā bhūmau saśṛṅgā iva parvatāḥ
सीधे उड़ने वाले, गहरे धँसने वाले नाराचों से घायल हाथी शिखरों वाले पर्वतों की भाँति धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 171 (7.157.171)
निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः । रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ॥
nikṛttairhastihastaiśca vicaladbhiritastataḥ | rarāja vasudhā kīrṇā visarpadbhirivoragaiḥ
इधर-उधर तड़पती हुई कटी हाथियों की सूँड़ों से बिछी पृथ्वी ऐसी शोभित हुई, मानो रेंगते हुए सर्पों से भर गई हो।
श्लोक 172 (7.157.172)
क्षिप्तैः काञ्चनदण्डैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्बभौ । द्यौरिवोदितचन्द्रार्का ग्रहाकीर्णा युगक्षये ॥
kṣiptaiḥ kāñcanadaṇḍaiśca nṛpacchatraiḥ kṣitirbabhau | dyaurivoditacandrārkā grahākīrṇā yugakṣaye
फेंके हुए सोने की डण्डियों वाले राजाओं के छत्रों से बिछी भूमि ऐसी चमकी, जैसे युग के अन्त में ग्रहों से भरा वह आकाश, जिसमें चन्द्रमा और सूर्य एक साथ उदित हों।
श्लोक 173 (7.157.173)
प्रवृद्धध्वजमण्डूकां भेरीविस्तीर्णकच्छपाम् । छत्रहंसावलीजुष्टां फेनचामरमालिनीम् ॥
pravṛddhadhvajamaṇḍūkāṃ bherīvistīrṇakacchapām | chatrahaṃsāvalījuṣṭāṃ phenacāmaramālinīm
वह एक नदी थी, जिसके मेंढक ऊँचे ध्वज थे, कछुए बड़े नगाड़े थे, जिसे छत्र-रूपी हंसों की पंक्तियाँ सेवित कर रही थीं और जो चँवरों की माला को फेन की तरह पहने थी,
श्लोक 174 (7.157.174)
कङ्कगृघ्रमहाग्राहां नैकायुधझषाकुलाम् । विस्तीर्णगजपाषाणां हताश्वमकराकुलाम् ॥
kaṅkagṛghramahāgrāhāṃ naikāyudhajhaṣākulām | vistīrṇagajapāṣāṇāṃ hatāśvamakarākulām
जिसके बड़े ग्राह कंक और गिद्ध थे, मछलियाँ अनेक प्रकार के शस्त्र थे, विशाल हाथी चट्टानें थे और मरे घोड़े मगरमच्छ थे,
श्लोक 175 (7.157.175)
रथक्षिप्तमहावप्रां पताकारुचिरद्रुमाम् । शरमीनां महारौद्रां प्रासशक्त्यृष्टिडुण्डुभाम् ॥
rathakṣiptamahāvaprāṃ patākāruciradrumām | śaramīnāṃ mahāraudrāṃ prāsaśaktyṛṣṭiḍuṇḍubhām
जिसके बड़े तट उलटे रथ थे, सुन्दर वृक्ष पताकाएँ थीं, मछलियाँ बाण थे, जो अत्यन्त भयानक थी और जिसके जल-सर्प प्रास, शक्तियाँ और ऋष्टियाँ थीं,
श्लोक 176 (7.157.176)
मज्जामांसमहापङ्कां कबन्धावर्जितोडुपाम् । केशशैवलकल्माषां भीरूणां कश्मलावहाम् ॥
majjāmāṃsamahāpaṅkāṃ kabandhāvarjitoḍupām | keśaśaivalakalmāṣāṃ bhīrūṇāṃ kaśmalāvahām
जिसमें मज्जा और मांस गहरा कीचड़ था, कबन्ध बेड़ों की तरह बह रहे थे, केश काई की तरह उसे काला कर रहे थे और जो डरपोकों को मूर्छित करने वाली थी,
श्लोक 177 (7.157.177)
नागेन्द्रहययोधानां शरीरव्ययसम्भवाम् । शोणितौघमहाघोरां द्रौणिः प्रावर्तयन्नदीम् ॥
nāgendrahayayodhānāṃ śarīravyayasambhavām | śoṇitaughamahāghorāṃ drauṇiḥ prāvartayannadīm
हाथियों, घोड़ों और योद्धाओं के शरीरों के नाश से उत्पन्न, रक्त के प्रवाह से अत्यन्त भयंकर ऐसी नदी द्रौणि ने बहा दी,
श्लोक 178 (7.157.178)
योधार्तरवनिर्घोषां क्षतजोर्मिसमाकुलाम् । प्रयान्तीं सुमहाघोरां यमराष्ट्रमहोदधिम् ॥
yodhārtaravanirghoṣāṃ kṣatajormisamākulām | prayāntīṃ sumahāghorāṃ yamarāṣṭramahodadhim
जो घायल योद्धाओं की चीत्कारों से गूँज रही थी, रक्त की लहरों से भरी थी और अत्यन्त भयानक रूप से यमलोक रूपी महासागर की ओर बह रही थी।
श्लोक 179 (7.157.179)
निहत्य राक्षसान्बाणैर्द्रौणिर्हैडिम्बिमार्दयत् । पुनरप्यतिसङ्क्रुद्धः सवृकोदरपार्षतान् ॥
nihatya rākṣasānbāṇairdrauṇirhaiḍimbimārdayat | punarapyatisaṅkruddhaḥ savṛkodarapārṣatān
बाणों से राक्षसों को मारकर द्रौणि ने हिडिम्बा के पुत्र को पीड़ित किया और फिर अत्यन्त क्रुद्ध होकर भीम और पृषत-पुत्र को भी।
श्लोक 180 (7.157.180)
स नाराचगणैः पार्थान्द्रौणिर्विद्ध्वा महाबलः । जघान सुरथं नाम द्रुपदस्य सुतं विभुः ॥
sa nārācagaṇaiḥ pārthāndrauṇirviddhvā mahābalaḥ | jaghāna surathaṃ nāma drupadasya sutaṃ vibhuḥ
नाराचों की वर्षा से पाण्डवों को बींधकर महाबली और सामर्थ्यवान् द्रौणि ने द्रुपद के पुत्र सुरथ को मार डाला।
श्लोक 181 (7.157.181)
पुनः शत्रुञ्जयं नाम द्रुपदस्यात्मजं रणे । बलानीकं जयानीकं जयाश्वं चाभिजघ्निवान् ॥
punaḥ śatruñjayaṃ nāma drupadasyātmajaṃ raṇe | balānīkaṃ jayānīkaṃ jayāśvaṃ cābhijaghnivān
फिर रण में उसने द्रुपद के एक और पुत्र शत्रुंजय को, तथा बलानीक, जयानीक और जयाश्व को भी मार गिराया,
श्लोक 182 (7.157.182)
श्रुताह्वयं च राजानं द्रौणिर्निन्ये यमक्षयम् । त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खैर्हेममालिनम् ॥
śrutāhvayaṃ ca rājānaṃ drauṇirninye yamakṣayam | tribhiścānyaiḥ śaraistīkṣṇaiḥ supuṅkhairhemamālinam
और श्रुताह्वय राजा को यमलोक पहुँचा दिया, तथा तीन और तीखे, सुन्दर पंखों वाले बाणों से
श्लोक 183 (7.157.183)
जघान स पृषध्रं च चन्द्रसेनं च मारिष । कुन्तिभोजसुतांश्चासौ दशभिर्दश जघ्निवान् ॥
jaghāna sa pṛṣadhraṃ ca candrasenaṃ ca māriṣa | kuntibhojasutāṃścāsau daśabhirdaśa jaghnivān
उसने स्वर्ण-माला पहने हुए को और पृषध्र तथा चन्द्रसेन को मार डाला, हे मान्यवर; और कुन्तिभोज के दस पुत्रों को दस बाणों से गिरा दिया।
श्लोक 184 (7.157.184)
अश्वत्थामा सुसङ्क्रुद्धः सन्धायोग्रमजिह्मगम् । मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् । यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ॥
aśvatthāmā susaṅkruddhaḥ sandhāyogramajihmagam | mumocākarṇapūrṇena dhanuṣā śaramuttamam | yamadaṇḍopamaṃ ghoramuddiśyāśu ghaṭotkacam
अश्वत्थामा ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक उग्र, सीधे जाने वाला बाण चढ़ाया और कान तक खींचे धनुष से यमदण्ड के समान भयंकर उस उत्तम बाण को शीघ्र घटोत्कच को लक्ष्य करके छोड़ा।
श्लोक 185 (7.157.185)
स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य महाशरः । विवेश वसुधां शीघ्रं सपुङ्खः पृथिवीपते ॥
sa bhittvā hṛdayaṃ tasya rākṣasasya mahāśaraḥ | viveśa vasudhāṃ śīghraṃ sapuṅkhaḥ pṛthivīpate
हे पृथ्वीपति, उस राक्षस का हृदय बींधकर वह महान् बाण पंखों सहित शीघ्र पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 186 (7.157.186)
तं हतं पतितं ज्ञात्वा धृष्टद्युम्नो महारथः । द्रौणेः सकाशाद्राजेन्द्र व्यपनिन्ये रथोत्तमम् ॥
taṃ hataṃ patitaṃ jñātvā dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | drauṇeḥ sakāśādrājendra vyapaninye rathottamam
उसे मरा और गिरा हुआ जानकर महारथी धृष्टद्युम्न, हे राजेन्द्र, अपने श्रेष्ठ रथ को द्रोणपुत्र के सामने से हटा ले गया।
श्लोक 187 (7.157.187)
ततः पराङ्मुखनृपं सैन्यं यौधिष्ठिरं नृप । पराजित्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो ननाद ह । पूजितः सर्वभूतेषु तव पुत्रैश्च भारत ॥
tataḥ parāṅmukhanṛpaṃ sainyaṃ yaudhiṣṭhiraṃ nṛpa | parājitya raṇe vīro droṇaputro nanāda ha | pūjitaḥ sarvabhūteṣu tava putraiśca bhārata
तब हे राजन्, जिसके राजा पीठ फेर चुके थे, उस युधिष्ठिर की सेना को रण में हराकर वीर द्रोणपुत्र ने गर्जना की; हे भारत, सब प्राणियों ने और आपके पुत्रों ने उसका सम्मान किया।
श्लोक 188 (7.157.188)
अथ शरशतभिन्नकृत्तदेहैर् । हतपतितैः क्षणदाचरैः समन्तात् । निधनमुपगतैर्मही कृताऽभूद् । गिरिशिखरैरिव दुर्गमाऽतिरौद्रा ॥
atha śaraśatabhinnakṛttadehair | hatapatitaiḥ kṣaṇadācaraiḥ samantāt | nidhanamupagatairmahī kṛtā'bhūd | giriśikharairiva durgamā'tiraudrā
तब सैकड़ों बाणों से कटे-फटे शरीरों वाले, मरकर गिरे हुए निशाचरों से चारों ओर पटी हुई पृथ्वी पर्वत-शिखरों के समान दुर्गम और अत्यन्त भयंकर हो गई।
श्लोक 189 (7.157.189)
तं सिद्धगन्धर्वपिशाचसङ्घा । नागाः सुपर्णाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च द्रौणिम् । अपूजयन्नप्सरसः सुराश्च ॥
taṃ siddhagandharvapiśācasaṅghā | nāgāḥ suparṇāḥ pitaro vayāṃsi | rakṣogaṇā bhūtagaṇāśca drauṇim | apūjayannapsarasaḥ surāśca
सिद्ध, गन्धर्व और पिशाचों के समूह, नाग, सुपर्ण, पितर, पक्षी, राक्षसों के गण और भूतों के गण, अप्सराएँ और देवता, सबने द्रौणि का सम्मान किया।