द्रोण पर्व · अध्याय 158
भीम द्वारा बाह्लीक का वध; युधिष्ठिर और द्रोण का अस्त्र-युद्ध
भीम और सात्यकि सोमदत्त से लड़ते हैं और भीम गदा से बाह्लीक को मार डालते हैं। फिर भीम धृतराष्ट्र के दस पुत्रों, शतचन्द्र और शकुनि के पाँच भाइयों को मार गिराते हैं। युधिष्ठिर कौरव-सेना को तहस-नहस करते हैं और द्रोण तथा युधिष्ठिर अस्त्र के बदले अस्त्र चलाते हुए ब्रह्मास्त्र तक पहुँच जाते हैं। फिर अर्जुन और भीम दोनों ओर से द्रोण पर टूटते हैं और अन्धकार में कौरव-सेना बिखर जाती है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.158.1)
द्रुपदस्यात्मजान्दृष्ट्वा कुन्तिभोजसुतांस्तथा । द्रोणपुत्रेण निहतान्राक्षसांश्च सहस्रशः ॥
drupadasyātmajāndṛṣṭvā kuntibhojasutāṃstathā | droṇaputreṇa nihatānrākṣasāṃśca sahasraśaḥ
द्रुपद के पुत्रों और कुन्तिभोज के पुत्रों को, तथा द्रोणपुत्र के हाथों हज़ारों की संख्या में मारे गए राक्षसों को देखकर,
श्लोक 2 (7.158.2)
युधिष्ठिरो भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । युयुधानश्च संयत्ता युद्धायैव मनो दधुः ॥
yudhiṣṭhiro bhīmaseno dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | yuyudhānaśca saṃyattā yuddhāyaiva mano dadhuḥ
युधिष्ठिर, भीमसेन, पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न और युयुधान, सब सावधान होकर, मन में केवल युद्ध का ही निश्चय करने लगे।
श्लोक 3 (7.158.3)
सोमदत्तः पुनः क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे । महता शरवर्षेण च्छादयामास भारत ॥
somadattaḥ punaḥ kruddho dṛṣṭvā sātyakimāhave | mahatā śaravarṣeṇa cchādayāmāsa bhārata
सोमदत्त ने युद्ध में सात्यकि को देखकर फिर क्रोध किया और, हे भारत, बाणों की भारी वर्षा से उसे ढक दिया।
श्लोक 4 (7.158.4)
ततः समभवद्युद्धमतीव भयवर्धनम् । त्वदीयानां परेषां च घोरं विजयकाङ्क्षिणाम् ॥
tataḥ samabhavadyuddhamatīva bhayavardhanam | tvadīyānāṃ pareṣāṃ ca ghoraṃ vijayakāṅkṣiṇām
तब तुम्हारे और शत्रुओं के योद्धाओं के बीच, जो सब विजय की आकांक्षा रखते थे, अत्यन्त भयवर्धक घोर युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 5 (7.158.5)
तं दृष्ट्वा समुपायान्तं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः । दशभिः सात्वतस्यार्थे भीमो विव्याध सायकैः ॥
taṃ dṛṣṭvā samupāyāntaṃ rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | daśabhiḥ sātvatasyārthe bhīmo vivyādha sāyakaiḥ
उसे आता देखकर भीम ने सात्यकि के लिए सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए दस बाणों से उसे बींध दिया।
श्लोक 6 (7.158.6)
सोमदत्तोऽपि तं वीरं शतेन प्रत्यविध्यत । सात्वतस्त्वभिसंक्रुद्धः पुत्राधिभिरभिप्लुतम् ॥
somadatto'pi taṃ vīraṃ śatena pratyavidhyata | sātvatastvabhisaṃkruddhaḥ putrādhibhirabhiplutam
सोमदत्त ने भी उस वीर को सौ बाणों से बींधा। इस पर सात्यकि ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसे, जो पुत्रों की चिन्ताओं से घिरा हुआ था,
श्लोक 7 (7.158.7)
वृद्धं वृद्धगुणैर्युक्तं ययातिमिव नाहुषम् । विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैर्वज्रनिपातनैः । शक्त्या चैनं विनिर्भिद्य पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥
vṛddhaṃ vṛddhaguṇairyuktaṃ yayātimiva nāhuṣam | vivyādha daśabhistīkṣṇaiḥ śarairvajranipātanaiḥ | śaktyā cainaṃ vinirbhidya punarvivyādha saptabhiḥ
जो वृद्ध था, वृद्धजनों के सब गुणों से युक्त था और नहुषपुत्र ययाति के समान था, वज्र की तरह गिरने वाले दस तीखे बाणों से बींध दिया; और शक्ति से उसे घायल करके फिर सात बाणों से बींधा।
श्लोक 8 (7.158.8)
ततस्तु सात्यकेरर्थे भीमसेनो नवं दृढम् । मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य मूर्धनि ॥
tatastu sātyakerarthe bhīmaseno navaṃ dṛḍham | mumoca parighaṃ ghoraṃ somadattasya mūrdhani
तब सात्यकि के लिए भीमसेन ने सोमदत्त के मस्तक पर एक नया, दृढ़ और भयंकर परिघ फेंका।
श्लोक 9 (7.158.9)
सात्वतोऽप्यग्निसङ्काशं मुमोच शरमुत्तमम् । सोमदत्तोरसि क्रुद्धः सुपत्रं निशितं युधि ॥
sātvato'pyagnisaṅkāśaṃ mumoca śaramuttamam | somadattorasi kruddhaḥ supatraṃ niśitaṃ yudhi
सात्यकि ने भी क्रुद्ध होकर युद्ध में सोमदत्त की छाती पर अग्नि के समान दहकता हुआ, सुन्दर पंखों वाला, तीखा उत्तम बाण छोड़ा।
श्लोक 10 (7.158.10)
युगपत्पेततुर्वीर घोरौ परिघमार्गणौ । शरीरे सोमदत्तस्य स पपात महारथः ॥
yugapatpetaturvīra ghorau parighamārgaṇau | śarīre somadattasya sa papāta mahārathaḥ
हे वीर, परिघ और बाण, दोनों भयंकर अस्त्र एक ही साथ सोमदत्त के शरीर पर गिरे और वह महारथी गिर पड़ा।
श्लोक 11 (7.158.11)
व्यामोहिते तु तनये बाह्लीकस्तमुपाद्रवत् । विसृजञ्छरवर्षाणि कालवर्षीव तोयदः ॥
vyāmohite tu tanaye bāhlīkastamupādravat | visṛjañcharavarṣāṇi kālavarṣīva toyadaḥ
अपने पुत्र के मूर्च्छित हो जाने पर बाह्लीक उस पर टूट पड़ा और समय पर बरसने वाले मेघ की तरह बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 12 (7.158.12)
भीमोऽथ सात्वतस्यार्थे बाह्लीकं नवभिः शरैः । प्रातिपेयं महात्मानं विव्याध रणमूर्धनि ॥
bhīmo'tha sātvatasyārthe bāhlīkaṃ navabhiḥ śaraiḥ | prātipeyaṃ mahātmānaṃ vivyādha raṇamūrdhani
तब भीम ने सात्यकि के लिए रणभूमि के अग्रभाग में प्रतीप के पुत्र महात्मा बाह्लीक को नौ बाणों से बींध दिया।
श्लोक 13 (7.158.13)
प्रातिपेयस्तु सङ्क्रुद्धः शक्तिं भीमस्य वक्षसि । निचखान महाबाहुः पुरन्दर इवाशनिम् ॥
prātipeyastu saṅkruddhaḥ śaktiṃ bhīmasya vakṣasi | nicakhāna mahābāhuḥ purandara ivāśanim
क्रुद्ध हुए महाबाहु प्रतीपपुत्र ने भीम की छाती में शक्ति गाड़ दी, मानो पुरन्दर इन्द्र ने वज्र मारा हो।
श्लोक 14 (7.158.14)
स तथाऽभिहतो भीमश्चकम्पे च मुमोह च । प्राप्य चेतश्च बलवान्गदामस्मै ससर्ज ह ॥
sa tathā'bhihato bhīmaścakampe ca mumoha ca | prāpya cetaśca balavāngadāmasmai sasarja ha
इस प्रकार आहत होकर भीम काँपे और मूर्च्छित हो गए; फिर चेतना पाकर उस बलवान् ने उस पर अपनी गदा फेंकी।
श्लोक 15 (7.158.15)
सा पाण्डवेन प्रहिता बाह्लीकस्य शिरोऽहरत् । स पपात हतः पृथ्व्यां वज्राहत इवाद्रिराट् ॥
sā pāṇḍavena prahitā bāhlīkasya śiro'harat | sa papāta hataḥ pṛthvyāṃ vajrāhata ivādrirāṭ
पाण्डुपुत्र की फेंकी हुई उस गदा ने बाह्लीक का सिर काट डाला और वह वज्र से मारे गए पर्वतराज की तरह मरकर धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 16 (7.158.16)
तस्मिन्विनिहते वीरे बाह्लीके पुरुषर्षभ । पुत्रास्तेऽभ्यर्दयन्भीमं दश दाशरथेः समाः ॥
tasminvinihate vīre bāhlīke puruṣarṣabha | putrāste'bhyardayanbhīmaṃ daśa dāśaratheḥ samāḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, उस वीर बाह्लीक के मारे जाने पर, दाशरथि राम के समान पराक्रमी तुम्हारे दस पुत्रों ने भीम को घेरकर पीड़ित किया:
श्लोक 17 (7.158.17)
नागदत्तो दृढरथो महाबाहुरयोभुजः । दृढः सुहस्तो विरजाः प्रमाथ्युग्रोऽनुयाय्यपि ॥
nāgadatto dṛḍharatho mahābāhurayobhujaḥ | dṛḍhaḥ suhasto virajāḥ pramāthyugro'nuyāyyapi
नागदत्त, दृढरथ, महाबाहु, अयोभुज, दृढ, सुहस्त, विरज, प्रमाथी, उग्र और अनुयायी।
श्लोक 18 (7.158.18)
तान्दृष्ट्वा चुक्रुधे भीमो जगृहे भारसाधनान् । एकमेकं समुद्दिश्य पातयामास मर्मसु ॥
tāndṛṣṭvā cukrudhe bhīmo jagṛhe bhārasādhanān | ekamekaṃ samuddiśya pātayāmāsa marmasu
उन्हें देखकर भीम क्रुद्ध हो उठे और अपने भारी, कार्यसाधक बाण हाथ में लेकर एक-एक को लक्ष्य बनाकर उसके मर्मस्थानों में गिराने लगे।
श्लोक 19 (7.158.19)
ते विद्धा व्यसवः पेतुः स्यन्दनेभ्यो हतौजसः । चण्डवातप्रभग्नास्तु पर्वताग्रान्महीरुहाः ॥
te viddhā vyasavaḥ petuḥ syandanebhyo hataujasaḥ | caṇḍavātaprabhagnāstu parvatāgrānmahīruhāḥ
बींधे जाने पर प्राणहीन और तेजहीन होकर वे रथों से ऐसे गिर पड़े जैसे प्रचण्ड आँधी से टूटे हुए वृक्ष पर्वत की चोटी से गिरते हैं।
श्लोक 20 (7.158.20)
नाराचैर्दशभिर्भीमस्तान्निहत्य तवात्मजान् । कर्णस्य दयितं पुत्रं वृषसेनमवाकिरत् ॥
nārācairdaśabhirbhīmastānnihatya tavātmajān | karṇasya dayitaṃ putraṃ vṛṣasenamavākirat
भीम ने दस नाराचों से तुम्हारे उन पुत्रों को मारकर कर्ण के प्रिय पुत्र वृषसेन पर बाणों की बौछार कर दी।
श्लोक 21 (7.158.21)
ततो वृकरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः । जघान भीमं नाराचैस्तमप्यभ्यद्रवद्बली ॥
tato vṛkaratho nāma bhrātā karṇasya viśrutaḥ | jaghāna bhīmaṃ nārācaistamapyabhyadravadbalī
तब कर्ण के प्रसिद्ध भाई वृकरथ ने नाराचों से भीम पर प्रहार किया; बलवान् भीम उस पर भी टूट पड़े।
श्लोक 22 (7.158.22)
ततः सप्तरथान्वीरः श्यालानां तव भारत । निहत्य भीमो नाराचैः शतचन्द्रमपोथयत् ॥
tataḥ saptarathānvīraḥ śyālānāṃ tava bhārata | nihatya bhīmo nārācaiḥ śatacandramapothayat
फिर वीर भीम ने, हे भारत, तुम्हारे सालों में से सात रथियों को नाराचों से मारकर शतचन्द्र को भी मार गिराया।
श्लोक 23 (7.158.23)
अमर्षयन्तो निहतं शतचन्द्रं महारथम् । शकुनेर्भ्रातरो वीरा गवाक्षः शरभो विभुः ॥
amarṣayanto nihataṃ śatacandraṃ mahāratham | śakunerbhrātaro vīrā gavākṣaḥ śarabho vibhuḥ
महारथी शतचन्द्र का मारा जाना न सह सकने वाले शकुनि के वीर भाई गवाक्ष, शरभ और विभु,
श्लोक 24 (7.158.24)
सुभगो भानुदत्तश्च शूराः पञ्च महारथाः । अभिद्रुत्य शरैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनमताडयन् ॥
subhago bhānudattaśca śūrāḥ pañca mahārathāḥ | abhidrutya śaraistīkṣṇairbhīmasenamatāḍayan
सुभग और भानुदत्त के साथ, ये पाँच शूर महारथी भीमसेन पर टूट पड़े और तीखे बाणों से उन्हें मारने लगे।
श्लोक 25 (7.158.25)
स ताड्यमानो नाराचैर्वृष्टिवेगैरिवाचलः । जघान पञ्चभिर्बाणैः पञ्चैवातिरथान्बली ॥
sa tāḍyamāno nārācairvṛṣṭivegairivācalaḥ | jaghāna pañcabhirbāṇaiḥ pañcaivātirathānbalī
नाराचों से पीटे जाते हुए भी, वर्षा के वेग से पीटे जाते पर्वत की तरह अटल उस बलवान् भीम ने पाँच बाणों से उन पाँचों अतिरथियों को मार डाला।
श्लोक 26 (7.158.26)
तान्दृष्ट्वा निहतान्वीरान्विचेलुर्नृपसत्तमाः ॥
tāndṛṣṭvā nihatānvīrānvicelurnṛpasattamāḥ
उन वीरों को मरा हुआ देखकर श्रेष्ठ राजा विचलित हो उठे।
श्लोक 27 (7.158.27)
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धस्तवानीकमशातयत् । मिषतः कुम्भयोनेस्तु पुत्राणां तव चानघ ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ kruddhastavānīkamaśātayat | miṣataḥ kumbhayonestu putrāṇāṃ tava cānagha
तब क्रुद्ध युधिष्ठिर, हे निष्पाप, द्रोण और तुम्हारे पुत्रों के देखते-देखते तुम्हारी सेना को छिन्न-भिन्न करने लगे।
श्लोक 28 (7.158.28)
अम्बष्ठान्मालवाञ्छूरांस्त्रिगर्तान्सशिबीनपि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो युद्धे युधिष्ठिरः ॥
ambaṣṭhānmālavāñchūrāṃstrigartānsaśibīnapi | prāhiṇonmṛtyulokāya kruddho yuddhe yudhiṣṭhiraḥ
युद्ध में क्रुद्ध युधिष्ठिर ने अम्बष्ठों, मालवों, शूर त्रिगर्तों और शिबियों को भी मृत्युलोक भेज दिया।
श्लोक 29 (7.158.29)
अभीषाहाञ्छूरसेनान्बाह्लीकान्सवसातिकान् । निहत्य पृथिवीं राजा चक्रे शोणितकर्दमाम् ॥
abhīṣāhāñchūrasenānbāhlīkānsavasātikān | nihatya pṛthivīṃ rājā cakre śoṇitakardamām
अभीषाहों, शूरसेनों, बाह्लीकों और वसातियों को मारकर राजा ने पृथ्वी को रक्त का कीचड़ बना दिया।
श्लोक 30 (7.158.30)
यौधेयान्मालवान्राजन्मद्रकाणां गणान्युधि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय शूरान्बाणैर्युधिष्ठिरः ॥
yaudheyānmālavānrājanmadrakāṇāṃ gaṇānyudhi | prāhiṇonmṛtyulokāya śūrānbāṇairyudhiṣṭhiraḥ
हे राजन्, यौधेयों, मालवों और मद्रों के गणों के शूरों को भी युधिष्ठिर ने बाणों से मृत्युलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 31 (7.158.31)
हताहरत गृह्णीत विध्यत व्यवकृन्तत । इत्यासीत्तुमुलः शब्दो युधिष्ठिररथं प्रति ॥
hatāharata gṛhṇīta vidhyata vyavakṛntata | ityāsīttumulaḥ śabdo yudhiṣṭhirarathaṃ prati
"मारो! पकड़ो! ले लो! बींध दो! काट डालो!" इस प्रकार का भीषण कोलाहल युधिष्ठिर के रथ के चारों ओर उठा।
श्लोक 32 (7.158.32)
सैन्यानि द्रावयन्तं तं द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् । चोदितस्तव पुत्रेण सायकैरभ्यवाकिरत् ॥
sainyāni drāvayantaṃ taṃ droṇo dṛṣṭvā yudhiṣṭhiram | coditastava putreṇa sāyakairabhyavākirat
सेनाओं को भगाते हुए युधिष्ठिर को देखकर तुम्हारे पुत्र की प्रेरणा से द्रोण ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 33 (7.158.33)
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वायव्यास्त्रेण पार्थिवम् । विव्याध सोऽपि तद्दिव्यमस्त्रमस्त्रेण जघ्निवान् ॥
droṇastu paramakruddho vāyavyāstreṇa pārthivam | vivyādha so'pi taddivyamastramastreṇa jaghnivān
अत्यन्त क्रुद्ध द्रोण ने राजा युधिष्ठिर को वायव्यास्त्र से बींधा, किन्तु युधिष्ठिर ने भी उस दिव्य अस्त्र को अपने अस्त्र से नष्ट कर दिया।
श्लोक 34 (7.158.34)
तस्मिन्विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे । वारुणं याम्यमाग्नेयं त्वाष्ट्रं सावित्रमेव च । चिक्षेप परमक्रुद्धो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥
tasminvinihate cāstre bhāradvājo yudhiṣṭhire | vāruṇaṃ yāmyamāgneyaṃ tvāṣṭraṃ sāvitrameva ca | cikṣepa paramakruddho jighāṃsuḥ pāṇḍunandanam
उस अस्त्र के नष्ट हो जाने पर भरद्वाज के पुत्र द्रोण ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाण्डुपुत्र को मारने की इच्छा से युधिष्ठिर पर वारुण, याम्य, आग्नेय, त्वाष्ट्र और सावित्र अस्त्र छोड़े।
श्लोक 35 (7.158.35)
क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मजः । जघानास्त्रैर्महाबाहुः कुम्भयोनेरवित्रसन् ॥
kṣiptāni kṣipyamāṇāni tāni cāstrāṇi dharmajaḥ | jaghānāstrairmahābāhuḥ kumbhayoneravitrasan
जब-जब वे अस्त्र छोड़े जाते, तब-तब धर्मपुत्र महाबाहु युधिष्ठिर निडर होकर कुम्भयोनि द्रोण के विरुद्ध अपने अस्त्रों से उन्हें काट देते थे।
श्लोक 36 (7.158.36)
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां कुम्भसम्भवः ॥
satyāṃ cikīrṣamāṇastu pratijñāṃ kumbhasambhavaḥ
अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करना चाहते हुए कुम्भ से उत्पन्न द्रोण ने,
श्लोक 37 (7.158.37)
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमैन्द्रं वै प्राजापत्यं च भारत । जिघांसुर्धर्मतनयं तव पुत्रहिते रतः ॥
prāduścakre'stramaindraṃ vai prājāpatyaṃ ca bhārata | jighāṃsurdharmatanayaṃ tava putrahite rataḥ
हे भारत, धर्मपुत्र को मारने की इच्छा से और तुम्हारे पुत्र के हित में लगे रहकर इन्द्र का अस्त्र और प्रजापति का अस्त्र प्रकट किया।
श्लोक 38 (7.158.38)
पतिः कुरूणां गजसिंहगामी । विशालवक्षाः पृथुलोहिताक्षः । प्रादुश्चकारास्त्रमहीनतेजा । माहेन्द्रमस्त्रं स जघान तेन ॥
patiḥ kurūṇāṃ gajasiṃhagāmī | viśālavakṣāḥ pṛthulohitākṣaḥ | prāduścakārāstramahīnatejā | māhendramastraṃ sa jaghāna tena
हाथी और सिंह की-सी चाल वाले, विशाल छाती और बड़ी लाल आँखों वाले, अक्षीण तेजस्वी कुरुपति युधिष्ठिर ने भी एक अस्त्र प्रकट किया और उसी से उस माहेन्द्र अस्त्र को काट दिया।
श्लोक 39 (7.158.39)
विहन्यमानेष्वस्त्रेषु द्रोणः क्रोधसमन्वितः । युधिष्ठिरवधं प्रेप्सुर्ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ॥
vihanyamāneṣvastreṣu droṇaḥ krodhasamanvitaḥ | yudhiṣṭhiravadhaṃ prepsurbrāhmamastramudairayat
अपने अस्त्रों के नष्ट होते जाने पर क्रोध से भरे द्रोण ने युधिष्ठिर का वध करने की इच्छा से ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
श्लोक 40 (7.158.40)
ततो नाज्ञासिषं किञ्चिद्धोरेण तमसाऽऽवृते । सर्वभूतानि च परं त्रासं जग्मुर्महीपते ॥
tato nājñāsiṣaṃ kiñciddhoreṇa tamasā''vṛte | sarvabhūtāni ca paraṃ trāsaṃ jagmurmahīpate
तब घोर अन्धकार से घिर जाने पर, हे पृथ्वीपति, मुझे कुछ भी नहीं सूझा और सब प्राणी अत्यन्त भय में पड़ गए।
श्लोक 41 (7.158.41)
ब्रह्मास्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥
brahmāstramudyataṃ dṛṣṭvā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | brahmāstreṇaiva rājendra tadastraṃ pratyavārayat
ब्रह्मास्त्र को उठा देखकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने, हे राजेन्द्र, ब्रह्मास्त्र से ही उस अस्त्र को रोक दिया।
श्लोक 42 (7.158.42)
ततः सैनिकमुख्यास्ते प्रशशंसुर्नरर्षभौ । द्रोणपार्थौ महेष्वासौ सर्वयुद्धविशारदौ ॥
tataḥ sainikamukhyāste praśaśaṃsurnararṣabhau | droṇapārthau maheṣvāsau sarvayuddhaviśāradau
तब प्रमुख सैनिकों ने उन दोनों नरश्रेष्ठ, महाधनुर्धर और सब प्रकार के युद्ध में निपुण द्रोण और पार्थ की प्रशंसा की।
श्लोक 43 (7.158.43)
ततः प्रमुच्य कौन्तेयं द्रोणो द्रुपदवाहिनीम् । व्यधमत्क्रोधताम्राक्षो वायव्यास्त्रेण भारत ॥
tataḥ pramucya kaunteyaṃ droṇo drupadavāhinīm | vyadhamatkrodhatāmrākṣo vāyavyāstreṇa bhārata
तब द्रोण ने कुन्तीपुत्र को छोड़कर, क्रोध से लाल आँखें किए, हे भारत, वायव्यास्त्र से द्रुपद की सेना को तितर-बितर कर दिया।
श्लोक 44 (7.158.44)
ते हन्यमाना द्रोणेन पाञ्चालाः प्राद्रवन्भयात् । पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥
te hanyamānā droṇena pāñcālāḥ prādravanbhayāt | paśyato bhīmasenasya pārthasya ca mahātmanaḥ
द्रोण के हाथों मारे जाते हुए पाञ्चाल भय से भाग खड़े हुए, और भीमसेन तथा महात्मा पार्थ यह देखते रहे।
श्लोक 45 (7.158.45)
ततः किरीटी भीमश्च सहसा सन्न्यवर्तताम् । महद्भ्यां रथवंशाभ्यां परिगृह्य बलं तदा ॥
tataḥ kirīṭī bhīmaśca sahasā sannyavartatām | mahadbhyāṃ rathavaṃśābhyāṃ parigṛhya balaṃ tadā
तब किरीटी अर्जुन और भीम सहसा लौट पड़े और दो विशाल रथ-पंक्तियों से उस सेना को घेर लिया।
श्लोक 46 (7.158.46)
बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः । भारद्वाजं शरौघाभ्यां महद्भ्यामभ्यवर्षताम् ॥
bībhatsurdakṣiṇaṃ pārśvamuttaraṃ ca vṛkodaraḥ | bhāradvājaṃ śaraughābhyāṃ mahadbhyāmabhyavarṣatām
दाहिनी ओर से बीभत्सु और बायीं ओर से वृकोदर ने भरद्वाज के पुत्र द्रोण पर बाणों की बड़ी-बड़ी धाराएँ बरसाईं।
श्लोक 47 (7.158.47)
केकयाः सृञ्जयाश्चैव पाञ्चालाश्च महौजसः । अन्वगच्छन्महाराज मात्स्याश्च सह सात्वतैः ॥
kekayāḥ sṛñjayāścaiva pāñcālāśca mahaujasaḥ | anvagacchanmahārāja mātsyāśca saha sātvataiḥ
हे महाराज, केकय, सृञ्जय और महातेजस्वी पाञ्चाल उनके पीछे चले, और मत्स्य भी सात्वतों के साथ।
श्लोक 48 (7.158.48)
ततः सा भारती सेना वध्यमाना किरीटिना । तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत ॥
tataḥ sā bhāratī senā vadhyamānā kirīṭinā | tamasā nidrayā caiva punareva vyadīryata
तब किरीटी अर्जुन के हाथों मारी जाती हुई भरतों की वह सेना अन्धकार और नींद के कारण फिर बिखर गई।
श्लोक 49 (7.158.49)
द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च । नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा ॥
droṇena vāryamāṇāste svayaṃ tava sutena ca | nāśakyanta mahārāja yodhā vārayituṃ tadā
द्रोण ने और स्वयं तुम्हारे पुत्र ने भी उन्हें रोकना चाहा, पर हे महाराज, उस समय वे योद्धा रोके न जा सके।