द्रोण पर्व · अध्याय 159
कर्ण की डींग और कृपाचार्य की फटकार
पाण्डव-सेना के उमड़ने पर दुर्योधन कर्ण से सेना की रक्षा करने को कहता है, और कर्ण इन्द्र की शक्ति से अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा करता है। कृप उसकी डींग का उपहास करते हैं, उसकी पुरानी पराजयें याद दिलाते हैं और पाण्डवों के वीरों और सहायकों की गिनती कराते हैं। कर्ण उत्तर देता है कि शूर गरज सकते हैं, विजय नीति और दैव पर टिकी है, और यदि कृप फिर पाण्डवों की स्तुति करेंगे तो उनकी जीभ काट देने की धमकी देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.159.1)
उदीर्यमाणं तद्दृष्ट्वा पाण्डवानां महद्बलम् । अविषह्यं च मन्वानः कर्णं दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥
udīryamāṇaṃ taddṛṣṭvā pāṇḍavānāṃ mahadbalam | aviṣahyaṃ ca manvānaḥ karṇaṃ duryodhano'bravīt
पाण्डवों की उस विशाल सेना को उमड़ते देखकर और उसे अजेय मानते हुए दुर्योधन ने कर्ण से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (7.159.2)
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल । त्रायस्व समरे कर्ण सर्वान्योधान्महारथान् ॥
ayaṃ sa kālaḥ samprāpto mitrāṇāṃ mitravatsala | trāyasva samare karṇa sarvānyodhānmahārathān
"हे मित्रों के प्रति स्नेह रखने वाले कर्ण, मित्रों पर यह वही समय आ पड़ा है। युद्ध में सब महारथी योद्धाओं की रक्षा करो।
श्लोक 3 (7.159.3)
पाञ्चालैर्मत्स्यकैकेयैः पाण्डवैश्च महारथैः । वृतान्समन्तात्सङ्क्रुद्धैर्निःश्वसद्भिरिवोरगैः ॥
pāñcālairmatsyakaikeyaiḥ pāṇḍavaiśca mahārathaiḥ | vṛtānsamantātsaṅkruddhairniḥśvasadbhirivoragaiḥ
पाञ्चालों, मत्स्यों, केकयों और महारथी पाण्डवों ने क्रोध से फुफकारते सर्पों की तरह उन्हें चारों ओर से घेर रखा है।
श्लोक 4 (7.159.4)
एते नदन्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः । शक्रोपमाश्च बहवः पाञ्चालानां रथव्रजाः ॥
ete nadanti saṃhṛṣṭāḥ pāṇḍavā jitakāśinaḥ | śakropamāśca bahavaḥ pāñcālānāṃ rathavrajāḥ
विजय के उल्लास में भरे ये पाण्डव गरज रहे हैं, और पाञ्चालों के इन्द्र-जैसे बहुत-से रथ-समूह भी गरज रहे हैं।"
कर्ण उवाच
श्लोक 5 (7.159.5)
परित्रातुमिह प्राप्तो यदि पार्थं पुरन्दरः । तमप्याशु पराजित्य ततो हन्ताऽस्मि पाण्डवम् ॥
paritrātumiha prāpto yadi pārthaṃ purandaraḥ | tamapyāśu parājitya tato hantā'smi pāṇḍavam
"यदि पुरन्दर इन्द्र भी पार्थ की रक्षा करने यहाँ आ गए हों, तो उन्हें भी शीघ्र हराकर मैं उस पाण्डव को मार डालूँगा।
श्लोक 6 (7.159.6)
सत्यं ते प्रतिजानामि समाश्वसिहि भारत । हन्तास्मि पाण्डुतनयान्पाञ्चालांश्च समागतान् ॥
satyaṃ te pratijānāmi samāśvasihi bhārata | hantāsmi pāṇḍutanayānpāñcālāṃśca samāgatān
हे भारत, मैं तुमसे सच कहता हूँ, धीरज रखो: मैं पाण्डुपुत्रों को और यहाँ एकत्र पाञ्चालों को मार डालूँगा।
श्लोक 7 (7.159.7)
जयं ते प्रतिदास्यामि वासवस्येव पावकिः । प्रियं तव मया कार्यमिति जीवामि पार्थिव ॥
jayaṃ te pratidāsyāmi vāsavasyeva pāvakiḥ | priyaṃ tava mayā kāryamiti jīvāmi pārthiva
जैसे पावकि ने वासव को विजय दिलाई थी, वैसे ही मैं तुम्हें विजय दिलाऊँगा। हे राजन्, मैं तुम्हारा प्रिय करने के लिए ही जीवित हूँ।
श्लोक 8 (7.159.8)
सर्वेषामेव पार्थानां फल्गुनो बलवत्तरः । तस्यामोघां विमोक्ष्यामि शक्तिं शक्रविनिर्मितां ॥
sarveṣāmeva pārthānāṃ phalguno balavattaraḥ | tasyāmoghāṃ vimokṣyāmi śaktiṃ śakravinirmitāṃ
पृथा के सब पुत्रों में फल्गुन सबसे बलवान् है; उस पर मैं शक्र की बनाई हुई अमोघ शक्ति छोड़ूँगा।
श्लोक 9 (7.159.9)
तस्मिन्हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद । तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुनः ॥
tasminhate maheṣvāse bhrātarastasya mānada | tava vaśyā bhaviṣyanti vanaṃ yāsyanti vā punaḥ
हे मान देने वाले, उस महाधनुर्धर के मारे जाने पर उसके भाई या तो तुम्हारे वश में हो जाएँगे या फिर वन को लौट जाएँगे।
श्लोक 10 (7.159.10)
मयि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् । अहं जेष्यामि समरे सहितान्सर्वपाण्डवान् ॥
mayi jīvati kauravya viṣādaṃ mā kṛthāḥ kvacit | ahaṃ jeṣyāmi samare sahitānsarvapāṇḍavān
हे कौरव्य, मेरे जीते-जी तुम कभी निराश न होना। मैं युद्ध में एकत्र हुए सब पाण्डवों को जीत लूँगा।
श्लोक 11 (7.159.11)
पाञ्चालान्केकयांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् । बाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ॥
pāñcālānkekayāṃścaiva vṛṣṇīṃścāpi samāgatān | bāṇaughaiḥ śakalīkṛtya tava dāsyāmi medinīm
मैं पाञ्चालों, केकयों और एकत्र वृष्णियों को बाणों की बौछार से टुकड़े-टुकड़े करके तुम्हें पृथ्वी दूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (7.159.12)
एवं ब्रुवाणं कर्णं तु कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् । स्मयन्निव महाबाहुः सूतपुत्रमिदं वचः ॥
evaṃ bruvāṇaṃ karṇaṃ tu kṛpaḥ śāradvato'bravīt | smayanniva mahābāhuḥ sūtaputramidaṃ vacaḥ
कर्ण के ऐसा कहने पर शरद्वान् के पुत्र महाबाहु कृप ने मानो मुसकराते हुए सूतपुत्र से यह बात कही:
कृप उवाच
श्लोक 13 (7.159.13)
शोभनं शोभनं कर्ण सनाथः कुरुपुङ्गवः । त्वया नाथेन राधेय वचसा यदि सिध्यति ॥
śobhanaṃ śobhanaṃ karṇa sanāthaḥ kurupuṅgavaḥ | tvayā nāthena rādheya vacasā yadi sidhyati
"वाह, वाह कर्ण! कुरुश्रेष्ठ को तो सचमुच नाथ मिल गया है, हे राधेय, यदि तुम जैसे रक्षक की बातों से ही सब कुछ सिद्ध हो जाता!
श्लोक 14 (7.159.14)
बहुशः कत्थसे कर्ण कौरवस्य समीपतः । न तु ते विक्रमः कश्चिद्दृश्यते फलमेव वा ॥
bahuśaḥ katthase karṇa kauravasya samīpataḥ | na tu te vikramaḥ kaściddṛśyate phalameva vā
कर्ण, तुम बार-बार कौरव के समीप डींग मारते हो, पर तुम्हारा कोई पराक्रम या उसका कोई फल कभी दिखाई नहीं देता।
श्लोक 15 (7.159.15)
समागमः पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते बहुशो युधि । सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन ॥
samāgamaḥ pāṇḍusutairdṛṣṭaste bahuśo yudhi | sarvatra nirjitaścāsi pāṇḍavaiḥ sūtanandana
तुम युद्ध में पाण्डुपुत्रों से कई बार मिल चुके हो, और हे सूतनन्दन, हर बार पाण्डवों ने तुम्हें हराया है।
श्लोक 16 (7.159.16)
ह्रियमाणे तदा कर्ण गन्धर्वैर्धृतराष्ट्रजे । तदाऽयुध्यन्त सैन्यानि त्वमेकोऽग्रेऽपलायिथाः ॥
hriyamāṇe tadā karṇa gandharvairdhṛtarāṣṭraje | tadā'yudhyanta sainyāni tvameko'gre'palāyithāḥ
हे कर्ण, जब धृतराष्ट्र के पुत्र को गन्धर्व हर ले जा रहे थे, तब सेनाएँ लड़ती रहीं और तुम अकेले सबसे आगे भाग खड़े हुए।
श्लोक 17 (7.159.17)
विराटनगरे चापि समेताः सर्वकौरवाः । पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुजः ॥
virāṭanagare cāpi sametāḥ sarvakauravāḥ | pārthena nirjitā yuddhe tvaṃ ca karṇa sahānujaḥ
और विराटनगर में भी एकत्र हुए सब कौरव पार्थ के हाथों युद्ध में हार गए, और हे कर्ण, तुम भी अपने भाई सहित।
श्लोक 18 (7.159.18)
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फल्गुनस्य रणाजिरे । कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान्सर्वपाण्डवान् ॥
ekasyāpyasamarthastvaṃ phalgunasya raṇājire | kathamutsahase jetuṃ sakṛṣṇānsarvapāṇḍavān
तुम तो रणभूमि में अकेले फल्गुन के सामने भी टिक नहीं सकते; फिर कृष्ण सहित सब पाण्डवों को जीतने का साहस कैसे करते हो?
श्लोक 19 (7.159.19)
अब्रुवन्कर्ण युध्यस्व कत्थसे बहु सूतज । अनुक्त्वा विक्रमेद्यस्तु तद्वै सत्पुरुषव्रतम् ॥
abruvankarṇa yudhyasva katthase bahu sūtaja | anuktvā vikramedyastu tadvai satpuruṣavratam
कर्ण, बोलो मत, लड़ो! हे सूतपुत्र, तुम बहुत डींग मारते हो। जो बिना कहे ही पराक्रम दिखाता है, वही सज्जनों का व्रत है।
श्लोक 20 (7.159.20)
गर्जित्वा सूतपुत्र त्वं शारदाभ्र इवाजलः । निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न बुध्यते ॥
garjitvā sūtaputra tvaṃ śāradābhra ivājalaḥ | niṣphalo dṛśyase karṇa tacca rājā na budhyate
हे सूतपुत्र, शरद् ऋतु के जलहीन बादल की तरह तुम गरजकर भी निष्फल दिखाई देते हो, कर्ण; और राजा यह बात समझते नहीं।
श्लोक 21 (7.159.21)
तावद्गर्जस्व राधेय यावत्पार्थं न पश्यसि । आरात्पार्थं हि ते दृष्ट्वा दुर्लभं गर्जितं पुनः ॥
tāvadgarjasva rādheya yāvatpārthaṃ na paśyasi | ārātpārthaṃ hi te dṛṣṭvā durlabhaṃ garjitaṃ punaḥ
राधेय, जब तक पार्थ को नहीं देखते, तभी तक गरज लो। पार्थ को पास आया देखकर फिर तुम्हारा गरजना दुर्लभ हो जाएगा।
श्लोक 22 (7.159.22)
त्वमनासाद्य तान्बाणान्फल्गुनस्य विगर्जसि । पार्थसायकविद्धस्य दुर्लभं गर्जितं तव ॥
tvamanāsādya tānbāṇānphalgunasya vigarjasi | pārthasāyakaviddhasya durlabhaṃ garjitaṃ tava
तुमने अभी फल्गुन के बाणों का सामना नहीं किया है, इसलिए गरज रहे हो। पार्थ के बाणों से बिंधने पर तुम्हारा गरजना दुर्लभ हो जाएगा।
श्लोक 23 (7.159.23)
बाहुभिः क्षत्रियाः शूरा वाग्भिः शूरा द्विजातयः । धनुषा फल्गुनः शूरः कर्णः शूरो मनोरथैः । तोषितो येन रुद्रोऽपि कः पार्थं प्रतिघातयेत् ॥
bāhubhiḥ kṣatriyāḥ śūrā vāgbhiḥ śūrā dvijātayaḥ | dhanuṣā phalgunaḥ śūraḥ karṇaḥ śūro manorathaiḥ | toṣito yena rudro'pi kaḥ pārthaṃ pratighātayet
क्षत्रिय अपनी भुजाओं से शूर होते हैं, ब्राह्मण वाणी से शूर होते हैं; फल्गुन धनुष से शूर है, और कर्ण केवल मनोरथों में शूर है। जिससे रुद्र भी प्रसन्न हुए, उस पार्थ का सामना कौन कर सकता है?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (7.159.24)
एवं संरुषितस्तेन तदा शारद्वतेन ह । कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः कृपं वाक्यमथाब्रवीत् ॥
evaṃ saṃruṣitastena tadā śāradvatena ha | karṇaḥ praharatāṃ śreṣṭhaḥ kṛpaṃ vākyamathābravīt
शरद्वान् के पुत्र के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ कर्ण ने कृप से कहा:
कर्ण उवाच
श्लोक 25 (7.159.25)
शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव वलाहकाः । फलं चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमनूषरे ॥
śūrā garjanti satataṃ prāvṛṣīva valāhakāḥ | phalaṃ cāśu prayacchanti bījamuptamanūṣare
"शूर वर्षा ऋतु के बादलों की तरह निरन्तर गरजते हैं, और अच्छी भूमि में बोए बीज की तरह शीघ्र फल भी देते हैं।
श्लोक 26 (7.159.26)
दोषमत्र न पश्यामि शूराणां रणमूर्धनि । तत्तद्विकत्थमानानां भारं चोद्वहतां मृधे ॥
doṣamatra na paśyāmi śūrāṇāṃ raṇamūrdhani | tattadvikatthamānānāṃ bhāraṃ codvahatāṃ mṛdhe
रणभूमि के अग्रभाग में जो शूर तरह-तरह की डींग हाँकते हैं और फिर युद्ध में उस भार को उठाते भी हैं, उनमें मुझे कोई दोष नहीं दिखता।
श्लोक 27 (7.159.27)
यं भारं पुरुषो वोढुं मनसा हि व्यवस्यति । दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय्यायोपपद्यते ॥
yaṃ bhāraṃ puruṣo voḍhuṃ manasā hi vyavasyati | daivamasya dhruvaṃ tatra sāhāyyāyopapadyate
जिस भार को उठाने का मनुष्य मन में निश्चय कर लेता है, उसमें दैव निश्चय ही उसकी सहायता करने आ पहुँचता है।
श्लोक 28 (7.159.28)
व्यवसायद्वितीयोऽहं मनसा भारमुद्वहन् । हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सकृष्णान्सहसात्वतान् । गर्जामि यद्यहं विप्र तव किं तत्र नश्यति ॥
vyavasāyadvitīyo'haṃ manasā bhāramudvahan | hatvā pāṇḍusutānājau sakṛṣṇānsahasātvatān | garjāmi yadyahaṃ vipra tava kiṃ tatra naśyati
निश्चय को ही अपना साथी बनाकर और मन में भार उठाए हुए मैं गरजता हूँ कि युद्ध में कृष्ण और सात्वतों सहित पाण्डुपुत्रों को मारूँगा। हे विप्र, यदि मैं ऐसा गरजता हूँ तो इसमें तुम्हारी क्या हानि होती है?
श्लोक 29 (7.159.29)
वृथा शूरा न गर्जन्ति सजला इव तोयदाः । सामर्थ्यमात्मनो ज्ञात्वा ततो गर्जन्ति पण्डिताः ॥
vṛthā śūrā na garjanti sajalā iva toyadāḥ | sāmarthyamātmano jñātvā tato garjanti paṇḍitāḥ
जल से भरे बादलों की तरह शूर व्यर्थ नहीं गरजते; अपना सामर्थ्य जानकर ही समझदार लोग गरजते हैं।
श्लोक 30 (7.159.30)
सोऽहमद्य रणे यत्तौ सहितौ कृष्णपाण्डवौ । उत्सहामि रणे जेतुं ततो गर्जामि गौतम ॥
so'hamadya raṇe yattau sahitau kṛṣṇapāṇḍavau | utsahāmi raṇe jetuṃ tato garjāmi gautama
इसलिए आज रण में एक साथ तैयार खड़े कृष्ण और पाण्डव को मैं जीत सकता हूँ, इसी कारण, हे गौतम, मैं गरजता हूँ।
श्लोक 31 (7.159.31)
पश्य त्वं गर्जितस्यास्य फलं मे विप्र सानुगान् । हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सहकृष्णान्ससात्वतान् । दुर्योधनाय दास्यामि पृथिवीं हतकण्टकाम् ॥
paśya tvaṃ garjitasyāsya phalaṃ me vipra sānugān | hatvā pāṇḍusutānājau sahakṛṣṇānsasātvatān | duryodhanāya dāsyāmi pṛthivīṃ hatakaṇṭakām
हे विप्र, मेरी इस गर्जना का फल देखना: युद्ध में अनुचरों सहित, कृष्ण और सात्वतों के साथ, पाण्डुपुत्रों को मारकर मैं दुर्योधन को निष्कण्टक पृथ्वी दूँगा।"
कृप उवाच
श्लोक 32 (7.159.32)
मनोरथप्रलापा मे न ग्राह्यास्तव सूतज ॥
manorathapralāpā me na grāhyāstava sūtaja
"हे सूतपुत्र, तुम्हारे मनोरथ-भरे प्रलाप को मैं गम्भीरता से नहीं ले सकता,
श्लोक 33 (7.159.33)
सदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् । ध्रुवस्तत्र जयः कर्ण यत्र युद्धविशारदौ ॥
sadā kṣipasi vai kṛṣṇau dharmarājaṃ ca pāṇḍavam | dhruvastatra jayaḥ karṇa yatra yuddhaviśāradau
क्योंकि तुम सदा दोनों कृष्णों और पाण्डव धर्मराज की निन्दा करते रहते हो। कर्ण, जहाँ वे दोनों युद्ध-विशारद हैं, वहीं विजय निश्चित है।
श्लोक 34 (7.159.34)
देवगन्धर्वयक्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् । दंशितानामपि रणे अजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥
devagandharvayakṣāṇāṃ manuṣyoragarakṣasām | daṃśitānāmapi raṇe ajeyau kṛṣṇapāṇḍavau
कृष्ण और पाण्डव अर्जुन को युद्ध में देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, नाग और राक्षस कवच पहनकर भी नहीं जीत सकते।
श्लोक 35 (7.159.35)
ब्रह्मण्यः सत्यवाग्दान्तो गुरुदैवतपूजकः । नित्यं धर्मरतश्चैव कृतास्त्रश्च विशेषतः ॥
brahmaṇyaḥ satyavāgdānto gurudaivatapūjakaḥ | nityaṃ dharmarataścaiva kṛtāstraśca viśeṣataḥ
युधिष्ठिर ब्राह्मणों के हितैषी, सत्यवादी, संयमी, गुरुजनों और देवताओं के पूजक, सदा धर्म में रत और विशेष रूप से अस्त्रविद्या में निपुण हैं,
श्लोक 36 (7.159.36)
धृतिमांश्च कृतज्ञश्च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातरश्चास्य बलिनः सर्वास्त्रेषु कृतश्रमाः ॥
dhṛtimāṃśca kṛtajñaśca dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | bhrātaraścāsya balinaḥ sarvāstreṣu kṛtaśramāḥ
धैर्यवान् और कृतज्ञ हैं, वे धर्म के पुत्र हैं। और उनके भाई बलवान् हैं तथा सभी अस्त्रों में परिश्रम कर चुके हैं,
श्लोक 37 (7.159.37)
गुरुवृत्तिरताः प्राज्ञा धर्मनित्या यशस्विनः । सम्बन्धिनश्चेन्द्रवीर्याः स्वनुरक्ताः प्रहारिणः ॥
guruvṛttiratāḥ prājñā dharmanityā yaśasvinaḥ | sambandhinaścendravīryāḥ svanuraktāḥ prahāriṇaḥ
वे गुरुजनों की सेवा में लगे रहने वाले, बुद्धिमान्, सदा धर्मपरायण और यशस्वी हैं; और उनके सम्बन्धी इन्द्र के समान वीर्यवान्, उनके प्रति अत्यन्त अनुरक्त और उत्तम प्रहार करने वाले हैं:
श्लोक 38 (7.159.38)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च दौर्मुखिर्जनमेजयः । चन्द्रसेनो रुद्रसेनः कीर्तिधर्मा ध्रुवो धरः ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca daurmukhirjanamejayaḥ | candraseno rudrasenaḥ kīrtidharmā dhruvo dharaḥ
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, दौर्मुखि, जनमेजय, चन्द्रसेन, रुद्रसेन, कीर्तिधर्मा, ध्रुव, धर,
श्लोक 39 (7.159.39)
वसुचन्द्रो दामचन्द्रः सिंहचन्द्रः सुतेजनः । द्रुपदस्य तथा पुत्रा द्रुपदश्च महास्त्रवित् ॥
vasucandro dāmacandraḥ siṃhacandraḥ sutejanaḥ | drupadasya tathā putrā drupadaśca mahāstravit
वसुचन्द्र, दामचन्द्र, सिंहचन्द्र, सुतेजन, द्रुपद के पुत्र, और महान् अस्त्रों के ज्ञाता स्वयं द्रुपद,
श्लोक 40 (7.159.40)
येषामर्थाय संयत्तो मत्स्यराजः सहानुजः । शतानीकः सूर्यदत्तः श्रुतानीकः श्रुतध्वजः ॥
yeṣāmarthāya saṃyatto matsyarājaḥ sahānujaḥ | śatānīkaḥ sūryadattaḥ śrutānīkaḥ śrutadhvajaḥ
जिनके लिए अपने छोटे भाइयों सहित मत्स्यराज विराट डटे हुए हैं: शतानीक, सूर्यदत्त, श्रुतानीक, श्रुतध्वज,
श्लोक 41 (7.159.41)
बलानीको जयानीको जयाश्वो रथवाहनः । चन्द्रोदयः समरथो विराटभ्रातरः शुभाः ॥
balānīko jayānīko jayāśvo rathavāhanaḥ | candrodayaḥ samaratho virāṭabhrātaraḥ śubhāḥ
बलानीक, जयानीक, जयाश्व, रथवाहन, चन्द्रोदय और समरथ, विराट के ये शुभ भाई,
श्लोक 42 (7.159.42)
यमौ च द्रौपदेयाश्च राक्षसश्च घटोत्कचः । येषामर्थाय युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षयः ॥
yamau ca draupadeyāśca rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | yeṣāmarthāya yudhyante na teṣāṃ vidyate kṣayaḥ
दोनों जुड़वाँ, द्रौपदी के पुत्र और राक्षस घटोत्कच, जिनके लिए ये लोग लड़ रहे हैं, उनका कभी विनाश नहीं होता।
श्लोक 43 (7.159.43)
एते चान्ये च बहवो गणाः पाण्डुसुतस्य वै ॥
ete cānye ca bahavo gaṇāḥ pāṇḍusutasya vai
ये और भी बहुत-से गण पाण्डुपुत्र के पक्ष में हैं।
श्लोक 44 (7.159.44)
कामं खलु जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् । सयक्षराक्षसगणं सभूतभुजगद्विपम् । निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्वाते भीमफल्गुनौ ॥
kāmaṃ khalu jagatsarvaṃ sadevāsuramānuṣam | sayakṣarākṣasagaṇaṃ sabhūtabhujagadvipam | niḥśeṣamastravīryeṇa kurvāte bhīmaphalgunau
चाहें तो भीम और फल्गुन अपने अस्त्रों के बल से देवता, असुर और मनुष्यों, यक्षों और राक्षसों के गणों, भूतों, नागों और हाथियों सहित सारे जगत् को निःशेष कर दें।
श्लोक 45 (7.159.45)
युधिष्ठिरश्च पृथिवीं निर्दहेद्धोरचक्षुषा ॥
yudhiṣṭhiraśca pṛthivīṃ nirdaheddhoracakṣuṣā
और युधिष्ठिर अपनी भयंकर दृष्टि से पृथ्वी को भस्म कर सकते हैं।
श्लोक 46 (7.159.46)
अप्रमेयबलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः । कथं तान्संयुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् ॥
aprameyabalaḥ śauriryeṣāmarthe ca daṃśitaḥ | kathaṃ tānsaṃyuge karṇa jetumutsahase parān
हे कर्ण, जिनके लिए अप्रमेय बलवान् शौरि कवच पहनकर खड़े हैं, उन शत्रुओं को तुम युद्ध में जीतने का साहस कैसे करते हो?
श्लोक 47 (7.159.47)
महानपनयस्त्वेष नित्यं हि तव सूतज । यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह ॥
mahānapanayastveṣa nityaṃ hi tava sūtaja | yastvamutsahase yoddhuṃ samare śauriṇā saha
हे सूतपुत्र, यह तुम्हारी सदा की बड़ी भूल है कि तुम रण में शौरि के साथ युद्ध करने का साहस करते हो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 48 (7.159.48)
एवमुक्तस्तु राधेयः प्रहसन्भरतर्षभ । अब्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम् ॥
evamuktastu rādheyaḥ prahasanbharatarṣabha | abravīcca tadā karṇo guruṃ śāradvataṃ kṛpam
ऐसा कहे जाने पर, हे भरतश्रेष्ठ, राधेय कर्ण ने हँसकर अपने गुरु शरद्वान् के पुत्र कृप से कहा:
कर्ण उवाच
श्लोक 49 (7.159.49)
सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन्पाण्डवान्प्रति यद्वचः । एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतेषु वै ॥
satyamuktaṃ tvayā brahmanpāṇḍavānprati yadvacaḥ | ete cānye ca bahavo guṇāḥ pāṇḍusuteṣu vai
"हे ब्राह्मण, पाण्डवों के विषय में तुमने जो कहा, वह सत्य है। पाण्डुपुत्रों में ये और ऐसे ही बहुत-से अन्य गुण हैं।
श्लोक 50 (7.159.50)
अजय्याश्च रणे पार्था देवैरपि सवासवैः । सदैत्ययक्षगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ॥
ajayyāśca raṇe pārthā devairapi savāsavaiḥ | sadaityayakṣagandharvaiḥ piśācoragarākṣasaiḥ
पृथा के पुत्र रण में वासव सहित देवताओं से भी, दैत्यों, यक्षों, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों और राक्षसों से भी नहीं जीते जा सकते।
श्लोक 51 (7.159.51)
तथापि पार्थाञ्जेष्यामि शक्त्या वासवदत्तया । मम ह्यमोघा दत्तेयं शक्तिः शक्रेण वै द्विज । एतया निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे ॥
tathāpi pārthāñjeṣyāmi śaktyā vāsavadattayā | mama hyamoghā datteyaṃ śaktiḥ śakreṇa vai dvija | etayā nihaniṣyāmi savyasācinamāhave
फिर भी मैं वासव की दी हुई शक्ति से पृथा के पुत्रों को जीत लूँगा। हे द्विज, शक्र ने मुझे भी यह अमोघ शक्ति दी है; इससे मैं युद्ध में सव्यसाची को मार डालूँगा।
श्लोक 52 (7.159.52)
हते तु पाण्डवे कृष्णे भ्रातरश्चास्य सोदराः । अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथञ्चन ॥
hate tu pāṇḍave kṛṣṇe bhrātaraścāsya sodarāḥ | anarjunā na śakṣyanti mahīṃ bhoktuṃ kathañcana
श्याम वर्ण पाण्डव अर्जुन के मारे जाने पर उसके सगे भाई अर्जुन के बिना किसी प्रकार भी पृथ्वी का भोग नहीं कर सकेंगे।
श्लोक 53 (7.159.53)
तेषु नष्टेषु सर्वेषु पृथिवीयं ससागरा । अयत्नात्कौरवेन्द्रस्य वशे स्थास्यति गौतम ॥
teṣu naṣṭeṣu sarveṣu pṛthivīyaṃ sasāgarā | ayatnātkauravendrasya vaśe sthāsyati gautama
उन सबके नष्ट हो जाने पर समुद्रों सहित यह पृथ्वी, हे गौतम, बिना प्रयत्न के कौरवराज के वश में रहेगी।
श्लोक 54 (7.159.54)
सुनीतैरिह सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः । एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो गर्जामि गौतम ॥
sunītairiha sarvārthāḥ sidhyante nātra saṃśayaḥ | etamarthamahaṃ jñātvā tato garjāmi gautama
उत्तम नीति से यहाँ सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं। यह बात जानकर ही, हे गौतम, मैं गरजता हूँ।
श्लोक 55 (7.159.55)
त्वं तु विप्रश्च वृद्धश्च अशक्तश्चापि संयुगे । कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ॥
tvaṃ tu vipraśca vṛddhaśca aśaktaścāpi saṃyuge | kṛtasnehaśca pārtheṣu mohānmāmavamanyase
पर तुम ब्राह्मण हो, बूढ़े हो और युद्ध में असमर्थ हो, और पृथा के पुत्रों के प्रति स्नेह रखते हो; इसी मोह से तुम मेरा अनादर करते हो।
श्लोक 56 (7.159.56)
यद्येवं वक्ष्यसे भूयो ममाप्रियमिह द्विज । ततस्ते खड्गमुद्यम्य जिह्वां छेत्स्यामि दुर्मते ॥
yadyevaṃ vakṣyase bhūyo mamāpriyamiha dvija | tataste khaḍgamudyamya jihvāṃ chetsyāmi durmate
हे द्विज, यदि तुम फिर मुझसे ऐसी अप्रिय बात कहोगे, तो हे दुर्बुद्धि, मैं खड्ग उठाकर तुम्हारी जीभ काट डालूँगा।
श्लोक 57 (7.159.57)
यच्चापि पाण्डवान्विप्र स्तोतुमिच्छसि संयुगे । भीषयन्सर्वसैन्यानि कौरवेयांश्च दुर्मते ॥
yaccāpi pāṇḍavānvipra stotumicchasi saṃyuge | bhīṣayansarvasainyāni kauraveyāṃśca durmate
और हे दुर्बुद्धि, युद्ध में पाण्डवों की स्तुति करने की जो तुम्हारी इच्छा है, जिससे तुम सारी सेनाओं को और कौरवों को डराते हो,
श्लोक 58 (7.159.58)
अत्रापि शृणु मे वाक्यं यथावद्ब्रुवतो द्विज । दुर्योधनश्च द्रोणश्च शकुनिर्दुर्मुखो जयः ॥
atrāpi śṛṇu me vākyaṃ yathāvadbruvato dvija | duryodhanaśca droṇaśca śakunirdurmukho jayaḥ
इस विषय में भी, हे द्विज, मेरी यथार्थ बात सुनो: दुर्योधन, द्रोण, शकुनि, दुर्मुख, जय,
श्लोक 59 (7.159.59)
दुःशासनो वृषसेनो मद्रराजस्त्वमेव च । सोमदत्तश्च भूरिश्च तथा द्रौणिर्विविंशतिः ॥
duḥśāsano vṛṣaseno madrarājastvameva ca | somadattaśca bhūriśca tathā drauṇirviviṃśatiḥ
दुःशासन, वृषसेन, मद्रराज शल्य और तुम स्वयं, सोमदत्त, भूरि, द्रोणपुत्र और विविंशति:
श्लोक 60 (7.159.60)
तिष्ठेयुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः । जयेदेतान्नरः को नु शक्रतुल्यबलोऽप्यरिः ॥
tiṣṭheyurdaṃśitā yatra sarve yuddhaviśāradāḥ | jayedetānnaraḥ ko nu śakratulyabalo'pyariḥ
यदि ये सब कवचधारी युद्ध-विशारद एक साथ डटे हों, तो शक्र के समान बलवान् कौन-सा शत्रु इन्हें जीत सकता है?
श्लोक 61 (7.159.61)
शूराश्च हि कृतास्त्राश्च बलिनः स्वर्गलिप्सवः । धर्मज्ञा युद्धकुशला हन्युर्युद्धे सुरानपि ॥
śūrāśca hi kṛtāstrāśca balinaḥ svargalipsavaḥ | dharmajñā yuddhakuśalā hanyuryuddhe surānapi
ये शूर हैं, अस्त्रविद्या में निपुण हैं, बलवान् हैं, स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, धर्म को जानते हैं और युद्ध में कुशल हैं; ये युद्ध में देवताओं को भी मार सकते हैं।
श्लोक 62 (7.159.62)
एते स्थास्यन्ति सङ्ग्रामे पाण्डवानां वधार्थिनः । जयमाकाङ्क्षमाणा हि कौरवेयस्य दंशिताः ॥
ete sthāsyanti saṅgrāme pāṇḍavānāṃ vadhārthinaḥ | jayamākāṅkṣamāṇā hi kauraveyasya daṃśitāḥ
कवच पहने ये सब कौरव की विजय की आकांक्षा से पाण्डवों का वध करने की इच्छा रखते हुए युद्ध में डटे रहेंगे।
श्लोक 63 (7.159.63)
दैवायत्तमहं मन्ये जयं सुबलिनामपि । यत्र भीष्मो महाबाहुः शेते शरशताचितः ॥
daivāyattamahaṃ manye jayaṃ subalināmapi | yatra bhīṣmo mahābāhuḥ śete śaraśatācitaḥ
मैं मानता हूँ कि अत्यन्त बलवानों की भी विजय दैव के अधीन है, जब महाबाहु भीष्म सैकड़ों बाणों से ढके हुए शरशय्या पर पड़े हैं।
श्लोक 64 (7.159.64)
विकर्णश्चित्रसेनश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । भूरिश्रवा जयश्चैव जलसन्धः सुदक्षिणः ॥
vikarṇaścitrasenaśca bāhlīko'tha jayadrathaḥ | bhūriśravā jayaścaiva jalasandhaḥ sudakṣiṇaḥ
विकर्ण, चित्रसेन, बाह्लीक, जयद्रथ, भूरिश्रवा, जय, जलसन्ध, सुदक्षिण,
श्लोक 65 (7.159.65)
शलश्च रथिनां श्रेष्ठो भगदत्तश्च वीर्यवान् । एते चान्ये च राजानो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥
śalaśca rathināṃ śreṣṭho bhagadattaśca vīryavān | ete cānye ca rājāno devairapi sudurjayāḥ
रथियों में श्रेष्ठ शल और पराक्रमी भगदत्त: ये और दूसरे राजा, जो देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्जय थे,
श्लोक 66 (7.159.66)
निहताः समरे शूराः पाण्डवैर्बलवत्तराः । किमन्यद्दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम ॥
nihatāḥ samare śūrāḥ pāṇḍavairbalavattarāḥ | kimanyaddaivasaṃyogānmanyase puruṣādhama
पाण्डवों से अधिक बलवान् होते हुए भी रण में उनके हाथों मारे गए। हे नराधम, इसे दैव के संयोग के सिवा और क्या मानते हो?
श्लोक 67 (7.159.67)
यांश्च तांस्तौषि सततं दुर्योधनरिपून्द्विज । तेषामपि हताः शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
yāṃśca tāṃstauṣi satataṃ duryodhanaripūndvija | teṣāmapi hatāḥ śūrāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
और हे द्विज, दुर्योधन के जिन शत्रुओं की तुम सदा स्तुति करते हो, उनके भी सैकड़ों और हज़ारों शूर मारे जा चुके हैं।
श्लोक 68 (7.159.68)
क्षीयन्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह । प्रभावं नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथञ्चन ॥
kṣīyante sarvasainyāni kurūṇāṃ pāṇḍavaiḥ saha | prabhāvaṃ nātra paśyāmi pāṇḍavānāṃ kathañcana
कौरवों की सब सेनाएँ पाण्डवों की सेनाओं के साथ-साथ क्षीण हो रही हैं; मैं यहाँ पाण्डवों में कोई विशेष प्रभाव नहीं देखता।
श्लोक 69 (7.159.69)
यस्तान्बलवतो नित्यं मन्यसे त्वं द्विजाधम । यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संयुगे । दुर्योधनहितार्थाय जयो दैवे प्रतिष्ठितः ॥
yastānbalavato nityaṃ manyase tvaṃ dvijādhama | yatiṣye'haṃ yathāśakti yoddhuṃ taiḥ saha saṃyuge | duryodhanahitārthāya jayo daive pratiṣṭhitaḥ
हे अधम ब्राह्मण, जिन्हें तुम सदा इतना बलवान् मानते हो, उनसे मैं दुर्योधन के हित के लिए यथाशक्ति युद्ध करने का प्रयत्न करूँगा। विजय तो दैव पर टिकी है।"