द्रोण पर्व · अध्याय 163
सात्यकि द्वारा सोमदत्त का वध; कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को द्रोण से हटाना
सात्यकि सोमदत्त पर टूट पड़ता है और दोनों कड़ा द्वन्द्व करते हैं, एक-दूसरे को घायल करते और धनुष काटते हैं। भीम की सहायता से सात्यकि सोमदत्त का धनुष तोड़ देता है, उसके घोड़े और सारथि मार डालता है और एक बाण से उसे मार गिराता है। फिर युधिष्ठिर द्रोण की सेना पर चढ़ाई करते हैं और द्रोण से बुरी तरह घिर जाते हैं; अर्जुन के प्रत्यस्त्र से द्रोण का अस्त्र रुकता है। कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे द्रोण को छोड़कर वहाँ जाएँ जहाँ भीम लड़ रहे हैं; युधिष्ठिर जाकर भीम के पृष्ठ-भाग की रक्षा करते हैं, और द्रोण रात्रि के आरम्भ में पाण्डव-पाञ्चाल सेनाओं का संहार करते रहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.163.1)
सोमदत्तं तु सम्प्रेक्ष्य विधुन्वानं महद्धनुः । सात्यकिः प्राह यन्तारं सोमदत्ताय मां वह ॥
somadattaṃ tu samprekṣya vidhunvānaṃ mahaddhanuḥ | sātyakiḥ prāha yantāraṃ somadattāya māṃ vaha
सोमदत्त को अपना विशाल धनुष हिलाते देखकर सात्यकि ने अपने सारथि से कहा, "मुझे सोमदत्त के पास ले चलो।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 2 (7.163.2)
न ह्यहत्वा रणे शत्रुं सोमदत्तं महाबलम् । निवर्तिष्ये रणात्सूत सत्यमेतद्वचो मम ॥
na hyahatvā raṇe śatruṃ somadattaṃ mahābalam | nivartiṣye raṇātsūta satyametadvaco mama
उस महाबली शत्रु सोमदत्त को युद्ध में मारे बिना मैं रण से नहीं लौटूँगा, सूत; मेरा यह वचन सत्य है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (7.163.3)
ततः सम्प्रैषयद्यन्ता सैन्धवांस्तान्मनोजवान् । तुरङ्गमाञ्छङ्खवर्णान्सर्वशब्दातिगान्रणे ॥
tataḥ sampraiṣayadyantā saindhavāṃstānmanojavān | turaṅgamāñchaṅkhavarṇānsarvaśabdātigānraṇe
तब सारथि ने मन के समान वेगवान्, शंख के समान श्वेत और रण में सब शब्दों को पीछे छोड़ने वाले उन सिन्धु देश के घोड़ों को आगे बढ़ाया।
श्लोक 4 (7.163.4)
तेऽवहन्युयुधानं तु मनोमारुतरंहसः । यथेन्द्रं हरयो राजन्पुरा दैत्यवधोद्यतम् ॥
te'vahanyuyudhānaṃ tu manomārutaraṃhasaḥ | yathendraṃ harayo rājanpurā daityavadhodyatam
मन और वायु के वेग से चलने वाले वे घोड़े युयुधान को वैसे ही ले चले, जैसे पूर्वकाल में दैत्यों के वध के लिए उद्यत इन्द्र को हरे घोड़े ले गए थे, हे राजन्।
श्लोक 5 (7.163.5)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य सात्वतं रभसं रणे । सोमदत्तो महाबाहुरसम्भ्रान्तो न्यवर्तत ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya sātvataṃ rabhasaṃ raṇe | somadatto mahābāhurasambhrānto nyavartata
सात्वत (सात्यकि) को रण में वेग से आता देखकर महाबाहु सोमदत्त निश्चल भाव से उसकी ओर मुड़ा।
श्लोक 6 (7.163.6)
विमुञ्चञ्छरवर्षाणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् । छादयामास शैनेयं जलदो भास्करं यथा ॥
vimuñcañcharavarṣāṇi parjanya iva vṛṣṭimān | chādayāmāsa śaineyaṃ jalado bhāskaraṃ yathā
वर्षा करने वाले मेघ की तरह बाणों की वर्षा करते हुए उसने शैनेय को वैसे ही ढक दिया, जैसे बादल सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 7 (7.163.7)
असम्भ्रान्तश्च समरे सात्यकिः कुरुपुङ्गवम् । छादयामास बाणौघैः समन्ताद्भरतर्षभ ॥
asambhrāntaśca samare sātyakiḥ kurupuṅgavam | chādayāmāsa bāṇaughaiḥ samantādbharatarṣabha
और हे भरतश्रेष्ठ! युद्ध में अविचलित सात्यकि ने उस कुरुश्रेष्ठ को चारों ओर से बाणों की बाढ़ से ढक दिया।
श्लोक 8 (7.163.8)
सोमदत्तस्तु तं षष्ट्या विव्याधोरसि माधवम् । सात्यकिश्चापि तं राजन्नविध्यत्सायकैः शितैः ॥
somadattastu taṃ ṣaṣṭyā vivyādhorasi mādhavam | sātyakiścāpi taṃ rājannavidhyatsāyakaiḥ śitaiḥ
सोमदत्त ने माधव (सात्यकि) की छाती में साठ बाण मारे, और हे राजन्! सात्यकि ने भी उसे तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 9 (7.163.9)
तावन्योन्यं शरैः कृत्तौ व्यराजेतां नरर्षभौ । सुपुष्पौ पुष्पसमये पुष्पिताविव किंशुकौ ॥
tāvanyonyaṃ śaraiḥ kṛttau vyarājetāṃ nararṣabhau | supuṣpau puṣpasamaye puṣpitāviva kiṃśukau
एक-दूसरे के बाणों से कटे हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ वसन्त में सुन्दर फूलों से लदे, खिले हुए दो किंशुक वृक्षों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 10 (7.163.10)
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ कुरुवृष्णियशस्करौ । परस्परमवेक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ॥
rudhirokṣitasarvāṅgau kuruvṛṣṇiyaśaskarau | parasparamavekṣetāṃ dahantāviva locanaiḥ
सारे अंग रक्त से भीगे हुए, कुरुओं और वृष्णियों का यश बढ़ाने वाले वे दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे मानो आँखों से जला रहे हों।
श्लोक 11 (7.163.11)
रथमण्डलमार्गेषु चरन्तावरिमर्दनौ । घोररूपौ हि तावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥
rathamaṇḍalamārgeṣu carantāvarimardanau | ghorarūpau hi tāvāstāṃ vṛṣṭimantāvivāmbudau
रथों के मण्डलाकार मार्गों पर घूमते हुए शत्रुओं को कुचलने वाले वे दोनों वर्षा करने वाले दो बादलों की तरह सचमुच भयंकर रूप वाले थे।
श्लोक 12 (7.163.12)
शरसम्भिन्नगात्रौ तु सर्वतः शकलीकृतौ । श्वाविधाविव राजेन्द्र दृश्येतां शरविक्षतौ ॥
śarasambhinnagātrau tu sarvataḥ śakalīkṛtau | śvāvidhāviva rājendra dṛśyetāṃ śaravikṣatau
बाणों से बिंधे हुए और सब ओर से टुकड़े-टुकड़े हुए शरीरों वाले वे दोनों, हे राजेन्द्र, बाणों से घायल दो साही की तरह दिखाई देते थे।
श्लोक 13 (7.163.13)
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिराचितौ तौ व्यराजताम् । खद्योतैरावृतौ राजन्प्रावृषीव वनस्पती ॥
suvarṇapuṅkhairiṣubhirācitau tau vyarājatām | khadyotairāvṛtau rājanprāvṛṣīva vanaspatī
सोने के पंखों वाले बाणों से भरे हुए वे दोनों, हे राजन्, वर्षा ऋतु में जुगनुओं से ढके हुए दो वृक्षों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 14 (7.163.14)
सम्प्रदीपितसर्वाङ्गौ सायकैस्तैर्महारथौ । अदृश्येतां रणे क्रुद्धावुल्काभिरिव कुञ्जरौ ॥
sampradīpitasarvāṅgau sāyakaistairmahārathau | adṛśyetāṃ raṇe kruddhāvulkābhiriva kuñjarau
उन बाणों से सारे अंग जले हुए वे दोनों क्रुद्ध महारथी रण में जलती मशालों से सताए गए दो हाथियों की तरह दिखाई देते थे।
श्लोक 15 (7.163.15)
ततो युधि महाराज सोमदत्तो महारथः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद माधवस्य महद्धनुः ॥
tato yudhi mahārāja somadatto mahārathaḥ | ardhacandreṇa ciccheda mādhavasya mahaddhanuḥ
तब, हे महाराज, महारथी सोमदत्त ने युद्ध में अर्धचन्द्र बाण से माधव का विशाल धनुष काट डाला।
श्लोक 16 (7.163.16)
अथैनं पञ्चविंशत्या सायकानां समार्पयत् । त्वरमाणस्त्वराकाले पुनश्च दशभिः शरैः ॥
athainaṃ pañcaviṃśatyā sāyakānāṃ samārpayat | tvaramāṇastvarākāle punaśca daśabhiḥ śaraiḥ
फिर उतावली के समय जल्दी करते हुए उसने उसे पच्चीस बाणों से मारा और फिर दस बाणों से।
श्लोक 17 (7.163.17)
अथान्यद्धनुरादाय सात्यकिर्वेगवत्तरम् । पञ्चभिः सायकैस्तूर्णं सोमदत्तमविध्यत ॥
athānyaddhanurādāya sātyakirvegavattaram | pañcabhiḥ sāyakaistūrṇaṃ somadattamavidhyata
तब सात्यकि ने दूसरा और अधिक वेग वाला धनुष लेकर शीघ्र ही सोमदत्त को पाँच बाणों से बेध दिया।
श्लोक 18 (7.163.18)
ततोऽपरेण भल्लेन ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् । बाह्लीकस्य रणे राजन्सात्यकिः प्रहसन्निव ॥
tato'pareṇa bhallena dhvajaṃ ciccheda kāñcanam | bāhlīkasya raṇe rājansātyakiḥ prahasanniva
फिर हे राजन्! सात्यकि ने मानो हँसते हुए एक दूसरे भल्ल से रण में बाह्लीक (सोमदत्त) का सुनहरा ध्वज काट गिराया।
श्लोक 19 (7.163.19)
सोमदत्तस्त्वसम्भ्रान्तो दृष्ट्वा केतुं निपातितम् । शैनेयं पञ्चविंशत्या सायकानां समाचिनोत् ॥
somadattastvasambhrānto dṛṣṭvā ketuṃ nipātitam | śaineyaṃ pañcaviṃśatyā sāyakānāṃ samācinot
परन्तु सोमदत्त अपना ध्वज गिरा देखकर भी विचलित नहीं हुआ और उसने शैनेय पर पच्चीस बाणों की झड़ी लगा दी।
श्लोक 20 (7.163.20)
सात्वतोऽपि रणे क्रुद्धः सोमदत्तस्य धन्विनः । धनुश्चिच्छेद भल्लेन क्षुरप्रेण शितेन ह ॥
sātvato'pi raṇe kruddhaḥ somadattasya dhanvinaḥ | dhanuściccheda bhallena kṣurapreṇa śitena ha
सात्वत ने भी रण में क्रुद्ध होकर धनुर्धर सोमदत्त का धनुष एक तीखे क्षुरप्र नामक भल्ल से काट दिया।
श्लोक 21 (7.163.21)
अथैनं रुक्मपुङ्खानां शतेन नतपर्वणाम् । आचिनोद्बहुधा राजन्भग्नदंष्ट्रमिव द्विपम् ॥
athainaṃ rukmapuṅkhānāṃ śatena nataparvaṇām | ācinodbahudhā rājanbhagnadaṃṣṭramiva dvipam
फिर हे राजन्! उसने सोने के पंखों और सीधी गाँठों वाले सौ बाणों से उसे अनेक प्रकार से बेध डाला, जैसे टूटे दाँत वाले हाथी को।
श्लोक 22 (7.163.22)
अथान्यद्धनुरादाय सोमदत्तो महारथः । सात्यकिं छादयामास शरवृष्ट्या महाबलः ॥
athānyaddhanurādāya somadatto mahārathaḥ | sātyakiṃ chādayāmāsa śaravṛṣṭyā mahābalaḥ
तब महाबली महारथी सोमदत्त ने दूसरा धनुष लेकर सात्यकि को बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 23 (7.163.23)
सोमदत्तं तु सङ्क्रुद्धो रणे विव्याध सात्यकिः । सात्यकिं शरजालेन सोमदत्तोऽप्यपीडयत् ॥
somadattaṃ tu saṅkruddho raṇe vivyādha sātyakiḥ | sātyakiṃ śarajālena somadatto'pyapīḍayat
अत्यन्त क्रुद्ध सात्यकि ने रण में सोमदत्त को बेध दिया, और सोमदत्त ने भी बाणों के जाल से सात्यकि को पीड़ित किया।
श्लोक 24 (7.163.24)
दशभिः सात्वतस्यार्थे भीमोऽहन्बाह्लिकात्मजम् । सोमदत्तोऽप्यसम्भ्रान्तो भीममार्च्छच्छितैः शरैः ॥
daśabhiḥ sātvatasyārthe bhīmo'hanbāhlikātmajam | somadatto'pyasambhrānto bhīmamārcchacchitaiḥ śaraiḥ
सात्वत के पक्ष में भीम ने बाह्लीक के पुत्र को दस बाणों से मारा, और सोमदत्त ने भी अविचलित रहकर भीम को तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 25 (7.163.25)
ततस्तु सात्वतस्यार्थे भीमसेनो नवं दृढम् । मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य वक्षसि ॥
tatastu sātvatasyārthe bhīmaseno navaṃ dṛḍham | mumoca parighaṃ ghoraṃ somadattasya vakṣasi
फिर सात्वत की सहायता के लिए भीमसेन ने सोमदत्त की छाती पर एक नया, दृढ़ और भयंकर लोहे का परिघ फेंका।
श्लोक 26 (7.163.26)
तमापतन्तं वेगेन परिघं घोरदर्शनम् । द्विधा चिच्छेद समरे प्रहसन्निव कौरवः ॥
tamāpatantaṃ vegena parighaṃ ghoradarśanam | dvidhā ciccheda samare prahasanniva kauravaḥ
वेग से आते हुए उस भयानक दीखने वाले परिघ को कुरुवंशी सोमदत्त ने मानो हँसते हुए रण में दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 27 (7.163.27)
स पपात द्विधा च्छिन्न आयसः परिघो महान् । महीधरस्येव महच्छिखरं वज्रदारितम् ॥
sa papāta dvidhā cchinna āyasaḥ parigho mahān | mahīdharasyeva mahacchikharaṃ vajradāritam
दो टुकड़े हुआ वह विशाल लोहे का परिघ वज्र से फटे हुए पर्वत के बड़े शिखर की तरह गिर पड़ा।
श्लोक 28 (7.163.28)
ततस्तु सात्यकी राजन्सोमदत्तस्य संयुगे । धनुश्चिच्छेद भल्लेन हस्तावापं च पञ्चभिः ॥
tatastu sātyakī rājansomadattasya saṃyuge | dhanuściccheda bhallena hastāvāpaṃ ca pañcabhiḥ
तब, हे राजन्, सात्यकि ने युद्ध में भल्ल से सोमदत्त का धनुष काट डाला और पाँच बाणों से उसका दस्ताना भी।
श्लोक 29 (7.163.29)
ततश्चतुर्भिश्च शरैस्तूर्णं तांस्तुरगोत्तमान् । समीपं प्रेषयामास प्रेतराजस्य भारत ॥
tataścaturbhiśca śaraistūrṇaṃ tāṃsturagottamān | samīpaṃ preṣayāmāsa pretarājasya bhārata
फिर चार बाणों से उसने शीघ्र ही उन उत्तम घोड़ों को प्रेतराज (यम) के पास भेज दिया, हे भारत।
श्लोक 30 (7.163.30)
सारथेश्च शिरः कायाद्भल्लेन नतपर्वणा । जहार नरशार्दूलः प्रहसञ्छिनिपुङ्गवः ॥
sāratheśca śiraḥ kāyādbhallena nataparvaṇā | jahāra naraśārdūlaḥ prahasañchinipuṅgavaḥ
और शिनिवंश के उस वृषभ, नरशार्दूल ने हँसते हुए झुकी गाँठ वाले भल्ल से सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 31 (7.163.31)
ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । मुमोच सात्वतो राजन्स्वर्णपुङ्गं शिलाशितम् ॥
tataḥ śaraṃ mahāghoraṃ jvalantamiva pāvakam | mumoca sātvato rājansvarṇapuṅgaṃ śilāśitam
तब सात्वत ने, हे राजन्, आग की तरह जलता हुआ, सोने के पंखों वाला और शिला पर तेज किया हुआ अत्यन्त भयंकर बाण छोड़ा।
श्लोक 32 (7.163.32)
स विमुक्तो बलवता शैनेयेन शरोत्तमः । घोरस्तस्योरसि विभो निपपाताशु भारत ॥
sa vimukto balavatā śaineyena śarottamaḥ | ghorastasyorasi vibho nipapātāśu bhārata
बलवान् शैनेय का छोड़ा हुआ वह भयंकर श्रेष्ठ बाण, हे प्रभो, शीघ्र ही उसकी छाती पर आ गिरा।
श्लोक 33 (7.163.33)
सोऽतिविद्धो महाराज सात्वतेन महारथः । सोमदत्तो महाबाहुर्निपपात ममार च ॥
so'tividdho mahārāja sātvatena mahārathaḥ | somadatto mahābāhurnipapāta mamāra ca
हे महाराज! सात्वत के द्वारा गहरा बिंधकर महाबाहु महारथी सोमदत्त गिर पड़ा और मर गया।
श्लोक 34 (7.163.34)
तं दृष्ट्वा निहतं तत्र सोमदत्तं महारथाः । महता शरवर्षेण युयुधानमुपाद्रवन् ॥
taṃ dṛṣṭvā nihataṃ tatra somadattaṃ mahārathāḥ | mahatā śaravarṣeṇa yuyudhānamupādravan
सोमदत्त को वहाँ मरा हुआ देखकर महारथी बाणों की भारी वर्षा के साथ युयुधान पर टूट पड़े।
श्लोक 35 (7.163.35)
छाद्यमानं शरैर्दृष्ट्वा युयुधानं युधिष्ठिरः । पाण्डवाश्च महाराज सह सर्वैः प्रभद्रकैः । महत्या सेनया सार्धं द्रोणानीकमुपाद्रवन् ॥
chādyamānaṃ śarairdṛṣṭvā yuyudhānaṃ yudhiṣṭhiraḥ | pāṇḍavāśca mahārāja saha sarvaiḥ prabhadrakaiḥ | mahatyā senayā sārdhaṃ droṇānīkamupādravan
युयुधान को बाणों से ढका हुआ देखकर, हे महाराज, युधिष्ठिर और पाण्डव सब प्रभद्रकों तथा विशाल सेना के साथ द्रोण की सेना पर चढ़ दौड़े।
श्लोक 36 (7.163.36)
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धस्तावकानां महाबलम् । शरैर्विद्रावयामास भारद्वाजस्य पश्यतः ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ kruddhastāvakānāṃ mahābalam | śarairvidrāvayāmāsa bhāradvājasya paśyataḥ
तब क्रुद्ध युधिष्ठिर ने भारद्वाज (द्रोण) के देखते-देखते आपकी विशाल सेना को बाणों से खदेड़ दिया।
श्लोक 37 (7.163.37)
सैन्यानि द्रावयन्तं तु द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् । अभिदुद्राव वेगेन क्रोधसंरक्तलोचनः ॥
sainyāni drāvayantaṃ tu droṇo dṛṣṭvā yudhiṣṭhiram | abhidudrāva vegena krodhasaṃraktalocanaḥ
सेनाओं को भगाते हुए युधिष्ठिर को देखकर क्रोध से लाल आँखों वाले द्रोण वेग से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 38 (7.163.38)
ततः सुनिशितैर्बाणैः पार्थं विव्याध सप्तभिः । युधिष्ठिरोऽपि सङ्क्रुद्धः प्रतिविव्याध पञ्चभिः ॥
tataḥ suniśitairbāṇaiḥ pārthaṃ vivyādha saptabhiḥ | yudhiṣṭhiro'pi saṅkruddhaḥ prativivyādha pañcabhiḥ
तब उन्होंने अत्यन्त तीखे सात बाणों से पार्थ (युधिष्ठिर) को बेधा, और युधिष्ठिर ने भी क्रुद्ध होकर उन्हें पाँच बाणों से बदले में बेध दिया।
श्लोक 39 (7.163.39)
सोऽतिविद्धो महाबाहुः सृक्विणी परिसंलिहन् । युधिष्ठिरस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च ॥
so'tividdho mahābāhuḥ sṛkviṇī parisaṃlihan | yudhiṣṭhirasya ciccheda dhvajaṃ kārmukameva ca
गहरी चोट खाए हुए महाबाहु द्रोण ने होंठों के कोने चाटते हुए युधिष्ठिर का ध्वज और धनुष काट डाला।
श्लोक 40 (7.163.40)
स च्छिन्नधन्वा त्वरितस्त्वराकाले नृपोत्तमः । अन्यदादत्त वेगेन कार्मुकं समरे दृढम् ॥
sa cchinnadhanvā tvaritastvarākāle nṛpottamaḥ | anyadādatta vegena kārmukaṃ samare dṛḍham
धनुष कट जाने पर नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने उतावली के उस क्षण शीघ्र ही रण में दूसरा दृढ़ धनुष उठा लिया।
श्लोक 41 (7.163.41)
ततः शरसहस्रेण द्रोणं विव्याध पार्थिवः । साश्वसूतध्वजरथं तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tataḥ śarasahasreṇa droṇaṃ vivyādha pārthivaḥ | sāśvasūtadhvajarathaṃ tadadbhutamivābhavat
तब राजा ने घोड़े, सारथि, ध्वज और रथ सहित द्रोण को हज़ार बाणों से बेध दिया; वह एक अद्भुत-सी बात हुई।
श्लोक 42 (7.163.42)
ततो मुहूर्तं व्यथितः शरपातप्रपीडितः । निषसाद रथोपस्थे द्रोणो भरतसत्तम ॥
tato muhūrtaṃ vyathitaḥ śarapātaprapīḍitaḥ | niṣasāda rathopasthe droṇo bharatasattama
तब, हे भरतश्रेष्ठ! बाणों की चोट से पीड़ित और व्यथित द्रोण क्षण भर के लिए रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
श्लोक 43 (7.163.43)
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां मुहूर्ताद्द्विजसत्तमः । क्रोधेन महताऽऽविष्टो वायव्यास्त्रमवासृजत् ॥
pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ muhūrtāddvijasattamaḥ | krodhena mahatā''viṣṭo vāyavyāstramavāsṛjat
क्षण भर में चेत लौटने पर द्विजश्रेष्ठ द्रोण ने बड़े क्रोध में भरकर वायव्यास्त्र छोड़ा।
श्लोक 44 (7.163.44)
असम्भ्रान्तस्ततः पार्थो वायव्येनैव वीर्यवान् । तदस्त्रमस्त्रेण रणे स्तम्भयामास भारत ॥
asambhrāntastataḥ pārtho vāyavyenaiva vīryavān | tadastramastreṇa raṇe stambhayāmāsa bhārata
तब पराक्रमी पार्थ ने विचलित हुए बिना वायव्यास्त्र से ही उस अस्त्र को रण में रोक दिया, हे भारत।
श्लोक 45 (7.163.45)
चिच्छेद च धनुर्दीर्घं ब्राह्मणस्य च पाण्डवः । ततोऽन्यद्धनुरादत्त द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । तदप्यस्य शितैर्भल्लैश्चिच्छेद कुरुपुङ्गवः ॥
ciccheda ca dhanurdīrghaṃ brāhmaṇasya ca pāṇḍavaḥ | tato'nyaddhanurādatta droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ | tadapyasya śitairbhallaiściccheda kurupuṅgavaḥ
और पाण्डव ने ब्राह्मण का लम्बा धनुष काट डाला। तब क्षत्रियों को कुचलने वाले द्रोण ने दूसरा धनुष उठाया, और उसे भी कुरुश्रेष्ठ ने तीखे भल्लों से काट दिया।
श्लोक 46 (7.163.46)
ततोऽब्रवीद्वासुदेवः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
tato'bravīdvāsudevaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram
तब वासुदेव ने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से कहा—
वासुदेव उवाच
श्लोक 47 (7.163.47)
युधिष्ठिर महाबाहो यत्त्वां वक्ष्यामि तच्छ्रणु । उपारमस्व युद्धे त्वं द्रोणाद्भरतसत्तम ॥
yudhiṣṭhira mahābāho yattvāṃ vakṣyāmi tacchraṇu | upāramasva yuddhe tvaṃ droṇādbharatasattama
"हे महाबाहु युधिष्ठिर! मैं जो कहता हूँ उसे सुनो। हे भरतश्रेष्ठ! तुम द्रोण से युद्ध करना छोड़ दो।
श्लोक 48 (7.163.48)
यतते हि सदा द्रोणो ग्रहणे तव संयुगे । नानुरूपमहं मन्ये युद्धमस्य त्वया सह ॥
yatate hi sadā droṇo grahaṇe tava saṃyuge | nānurūpamahaṃ manye yuddhamasya tvayā saha
द्रोण सदा युद्ध में तुम्हें पकड़ने का यत्न करते रहते हैं। मैं नहीं मानता कि तुम्हारे साथ लड़ना उनके योग्य है।
श्लोक 49 (7.163.49)
योऽस्य सृष्टो विनाशाय स एवैनं हनिष्यति । परिवर्ज्य गुरुं याहि यत्र राजा सुयोधनः ॥
yo'sya sṛṣṭo vināśāya sa evainaṃ haniṣyati | parivarjya guruṃ yāhi yatra rājā suyodhanaḥ
जो इनके विनाश के लिए उत्पन्न किया गया है, वही इन्हें मारेगा। तुम गुरु को छोड़कर वहाँ जाओ जहाँ राजा सुयोधन है।
श्लोक 50 (7.163.50)
राजा राज्ञा हि योद्धव्यो नाराज्ञा युद्धमिष्यते । तत्र त्वं गच्छ कौन्तेय हस्त्यश्वरथसंवृतः ॥
rājā rājñā hi yoddhavyo nārājñā yuddhamiṣyate | tatra tvaṃ gaccha kaunteya hastyaśvarathasaṃvṛtaḥ
राजा को राजा से ही लड़ना चाहिए; जो राजा नहीं है, उसके साथ युद्ध उचित नहीं माना जाता। हे कुन्तीपुत्र! तुम हाथी, घोड़े और रथों से घिरकर वहीं जाओ।
श्लोक 51 (7.163.51)
यावन्मात्रेण च मया सहायेन धनञ्जयः । भीमश्च रथशार्दूलो युध्यते कौरवैः सह ॥
yāvanmātreṇa ca mayā sahāyena dhanañjayaḥ | bhīmaśca rathaśārdūlo yudhyate kauravaiḥ saha
जितनी मेरी सहायता पहुँचती है, उतने से अर्जुन और रथियों में सिंह भीम कौरवों से लड़ रहे हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 52 (7.163.52)
वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु ततो दारुणमाहवम् ॥
vāsudevavacaḥ śrutvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | muhūrtaṃ cintayitvā tu tato dāruṇamāhavam
वासुदेव की बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने क्षण भर उस भयानक युद्ध के विषय में विचार किया,
श्लोक 53 (7.163.53)
प्रायाद्द्रुतममित्रघ्नो यत्र भीमो व्यवस्थितः । विनिघ्नंस्तावकान्योधान्व्यादितास्य इवान्तकः ॥
prāyāddrutamamitraghno yatra bhīmo vyavasthitaḥ | vinighnaṃstāvakānyodhānvyāditāsya ivāntakaḥ
और शत्रुओं का संहार करने वाले वे शीघ्र ही वहाँ गए जहाँ भीम खड़े थे, जो आपके योद्धाओं को मुँह फैलाए हुए यमराज की तरह मार रहे थे।
श्लोक 54 (7.163.54)
रथघोषेण महता नादयन्वसुधातलम् । पर्जन्य इव घर्मान्ते नादयन्वै दिशो दश । भीमस्य निघ्नतः शत्रून्पार्ष्णिं जग्राह पाण्डवः ॥
rathaghoṣeṇa mahatā nādayanvasudhātalam | parjanya iva gharmānte nādayanvai diśo daśa | bhīmasya nighnataḥ śatrūnpārṣṇiṃ jagrāha pāṇḍavaḥ
अपने रथ की भारी घरघराहट से पृथ्वी को गुँजाते हुए, ग्रीष्म के अन्त में बादल की तरह दसों दिशाओं को गुँजाते हुए पाण्डव (युधिष्ठिर) ने शत्रुओं को मारते हुए भीम के पृष्ठ-भाग को सँभाल लिया।
श्लोक 55 (7.163.55)
द्रोणोऽपि पाण्डुपाञ्चालान्व्यधमद्रजनीमुखे । नादयंस्तलघोषेण तव सैन्यानि मारिष ॥
droṇo'pi pāṇḍupāñcālānvyadhamadrajanīmukhe | nādayaṃstalaghoṣeṇa tava sainyāni māriṣa
और द्रोण ने भी रात के आरम्भ में पाण्डवों और पाञ्चालों को काट डाला, और हथेली की थाप से आपकी सेनाओं को गुँजाते रहे, हे प्रभो।