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द्रोण पर्व · अध्याय 164

अँधेरे में दोनों सेनाओं द्वारा मशालें जलाना

चौदहवीं रात की धूल और अन्धकार में योद्धा एक-दूसरे को देख नहीं पाते और आपस में ही कटते-मरते हैं। धृतराष्ट्र पूछते हैं कि सेनाओं को प्रकाश कैसे मिला। सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन ने अपने पैदल सैनिकों को मशालें थामने का आदेश दिया, पाण्डवों ने भी वैसा ही किया, और देवता तथा दिव्य प्राणी भी इसमें सम्मिलित हो गए। अनगिनत दीपों से जगमगाता रणक्षेत्र स्वर्ग-सा दिखने लगा, और द्रोण उसके बीच सूर्य की तरह दमक उठे।

अध्याय 163अध्याय-सूचीअध्याय 165

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.164.1)

वर्तमाने यथा युद्धे घोररूपे भयावहे । तमसा संवृते लोके रजसा च महीपते ॥

vartamāne yathā yuddhe ghorarūpe bhayāvahe | tamasā saṃvṛte loke rajasā ca mahīpate

हे राजन्! जब वह भयंकर और भयावह युद्ध चल रहा था और संसार अन्धकार तथा धूल से ढका हुआ था,

श्लोक 2 (7.164.2)

नापश्यन्त रणे योधाः परस्परमवस्थिताः । अनुमानेन संज्ञाभिर्युद्धं तद्ववृधे महत् ॥

nāpaśyanta raṇe yodhāḥ parasparamavasthitāḥ | anumānena saṃjñābhiryuddhaṃ tadvavṛdhe mahat

रण में आमने-सामने खड़े योद्धा एक-दूसरे को देख नहीं पाते थे; अनुमान और संकेतों के सहारे ही वह महान युद्ध बढ़ता चला गया।

श्लोक 3 (7.164.3)

नरनागाश्वमथनं परमं रोमहर्षणम् । द्रोणकर्णकृपा वीरा भीमपार्षतसात्यकाः । अन्योन्यं क्षोभयामासुः सैन्यानि नृपसत्तम ॥

naranāgāśvamathanaṃ paramaṃ romaharṣaṇam | droṇakarṇakṛpā vīrā bhīmapārṣatasātyakāḥ | anyonyaṃ kṣobhayāmāsuḥ sainyāni nṛpasattama

मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों को कुचल डालने वाला वह अत्यन्त रोमांचकारी संग्राम चलता रहा; हे नृपश्रेष्ठ! द्रोण, कर्ण, कृप, भीम, पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न और सात्यकि जैसे वीर एक-दूसरे की सेनाओं को विचलित करते रहे।

श्लोक 4 (7.164.4)

वध्यमानानि सैन्यानि समन्तात्तैर्महारथैः । तमसा संवृते चैव समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ॥

vadhyamānāni sainyāni samantāttairmahārathaiḥ | tamasā saṃvṛte caiva samantādvipradudruvuḥ

उन महारथियों के हाथों चारों ओर से मारी जाती हुई और अन्धकार में घिरी हुई सेनाएँ सब दिशाओं में तितर-बितर होकर भागने लगीं।

श्लोक 5 (7.164.5)

ते सर्वतो विद्रवन्तो योधा विध्वस्तचेतनाः । अहन्यन्त महाराज धावमानाश्च संयुगे ॥

te sarvato vidravanto yodhā vidhvastacetanāḥ | ahanyanta mahārāja dhāvamānāśca saṃyuge

हे महाराज! सब ओर भागते हुए, होश खो बैठे वे योद्धा युद्ध में दौड़ते-दौड़ते ही मारे जाने लगे।

श्लोक 6 (7.164.6)

महारथसहस्राणि जघ्नुरन्योन्यमाहवे । अन्ये तमसि मूढानि पुत्रस्य तव मन्त्रिते ॥

mahārathasahasrāṇi jaghnuranyonyamāhave | anye tamasi mūḍhāni putrasya tava mantrite

हजारों महारथी युद्ध में एक-दूसरे को मारते रहे, और दूसरे अन्धकार में मोहित होकर तुम्हारे पुत्र की सलाह के अनुसार लड़ते रहे।

श्लोक 7 (7.164.7)

ततः सर्वाणि सैन्यानि सेनागोपाश्च भारत । व्यमुह्यन्त रणे तत्र तमसा संवृते सति ॥

tataḥ sarvāṇi sainyāni senāgopāśca bhārata | vyamuhyanta raṇe tatra tamasā saṃvṛte sati

हे भारत! तब अन्धकार से घिरे हुए सारे सैन्य-दल और उनके सेनापति उस युद्ध में मोहग्रस्त हो गए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 8 (7.164.8)

तेषां संलोड्यमानानां पाण्डवैर्विहतौजसाम् । अन्धे तमसि मग्नानामासीत्किं वो मनस्तदा ॥

teṣāṃ saṃloḍyamānānāṃ pāṇḍavairvihataujasām | andhe tamasi magnānāmāsītkiṃ vo manastadā

पाण्डवों के हाथों मथे जाते हुए, तेज खो चुके और घने अन्धकार में डूबे हुए उन लोगों के मन में उस समय क्या था?

श्लोक 9 (7.164.9)

कथं प्रकाशस्तेषां वा मम सैन्यस्य वा पुनः । बभूव लोके तमसा तथा सञ्जय संवृते ॥

kathaṃ prakāśasteṣāṃ vā mama sainyasya vā punaḥ | babhūva loke tamasā tathā sañjaya saṃvṛte

सञ्जय! जब संसार अन्धकार से ढका था, तब उन्हें, या मेरी सेना को, फिर प्रकाश कैसे मिला?

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (7.164.10)

ततः सर्वाणि सैन्यानि हतशिष्टानि यानि वै । सेनागोप्तॄनथादिश्य पुनर्व्यूहमकल्पयत् ॥

tataḥ sarvāṇi sainyāni hataśiṣṭāni yāni vai | senāgoptṝnathādiśya punarvyūhamakalpayat

तब उसने सेनापतियों को उनके स्थान बताकर, संहार के बाद बची हुई सारी सेनाओं की फिर से व्यूह-रचना की।

श्लोक 11 (7.164.11)

द्रोणः पुरस्ताज्जघने तु शल्यः । तथा द्रौणिः कृतवर्मा सौबलश्च । स्वयं तु सर्वाणि बलानि राजन् । राजाऽभ्ययाद्गोपयन्वै निशायाम् ॥

droṇaḥ purastājjaghane tu śalyaḥ | tathā drauṇiḥ kṛtavarmā saubalaśca | svayaṃ tu sarvāṇi balāni rājan | rājā'bhyayādgopayanvai niśāyām

द्रोण आगे थे; पीछे शल्य तथा उसी प्रकार द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, कृतवर्मा और सुबल-पुत्र शकुनि थे। हे राजन्! राजा दुर्योधन स्वयं रात में सारी सेनाओं की रक्षा करते हुए उनके बीच घूमते रहे।

श्लोक 12 (7.164.12)

उवाच सर्वांश्च पदातिसङ्घान् । दुर्योधनः पार्थिवसान्त्वपूर्वम् । उत्सृज्य सर्वे परमायुधानि । गृह्णीत हस्तैर्ज्वलितान्प्रदीपान् ॥

uvāca sarvāṃśca padātisaṅghān | duryodhanaḥ pārthivasāntvapūrvam | utsṛjya sarve paramāyudhāni | gṛhṇīta hastairjvalitānpradīpān

दुर्योधन ने राजा की भाँति पहले मीठे शब्दों से सान्त्वना देकर सब पैदल सैनिकों से कहा — "तुम सब अपने उत्तम शस्त्र छोड़ दो और हाथों में जलती हुई मशालें ले लो।"

श्लोक 13 (7.164.13)

ते चोदिताः पार्थिवसत्तमेन । ततः प्रहृष्टा जगृहुः प्रदीपान् ॥

te coditāḥ pārthivasattamena | tataḥ prahṛṣṭā jagṛhuḥ pradīpān

श्रेष्ठ राजा के इस प्रकार प्रेरित करने पर उन्होंने प्रसन्न होकर मशालें उठा लीं।

श्लोक 14 (7.164.14)

देवर्षिगन्धर्वसुरर्षिसङ्घा । विद्याधराश्चाप्सरसां गणाश्च । नागाः सयक्षोरगकिन्नराश्च । हृष्टा दिविस्था जगृहुः प्रदीपान् ॥

devarṣigandharvasurarṣisaṅghā | vidyādharāścāpsarasāṃ gaṇāśca | nāgāḥ sayakṣoragakinnarāśca | hṛṣṭā divisthā jagṛhuḥ pradīpān

देवर्षियों, गन्धर्वों और सुरर्षियों के समूह, विद्याधर और अप्सराओं के गण, यक्षों, उरगों और किन्नरों सहित नाग — सब आकाश में स्थित रहकर प्रसन्नता से मशालें लेने लगे।

श्लोक 15 (7.164.15)

दिग्दैवतेभ्यश्च समापतन्तः । अदृश्यन्त दीपाः ससुगन्धितैलाः । विशेषतो नारदपर्वताभ्यां । सम्बोध्यमानाः कुरुपाण्डवार्थम् ॥

digdaivatebhyaśca samāpatantaḥ | adṛśyanta dīpāḥ sasugandhitailāḥ | viśeṣato nāradaparvatābhyāṃ | sambodhyamānāḥ kurupāṇḍavārtham

दिशाओं के देवताओं से सुगन्धित तेल वाले दीप उतरते दिखाई दिए, जिन्हें विशेषकर नारद और पर्वत ने कौरवों और पाण्डवों के हित के लिए प्रज्वलित किया था।

श्लोक 16 (7.164.16)

सा भूय एव ध्वजिनी विभक्ता । व्यरोचताग्निप्रभया निशायाम् । महाधनैराभरणैश्च दिव्यैः । शस्त्रैश्च दीप्तैरपि सम्पतद्भिः ॥

sā bhūya eva dhvajinī vibhaktā | vyarocatāgniprabhayā niśāyām | mahādhanairābharaṇaiśca divyaiḥ | śastraiśca dīptairapi sampatadbhiḥ

फिर से टुकड़ियों में बँटी हुई वह सेना रात में अग्नि की आभा से, बहुमूल्य दिव्य आभूषणों से और चमकते हुए, इधर-उधर झपटते शस्त्रों से दमक उठी।

श्लोक 17 (7.164.17)

रथेरथे पञ्च विदीपकास्तु । प्रदीपकास्तत्र गजे त्रयश्च । प्रत्यश्वमेकश्च महाप्रदीपः । कृतास्तु तैः पाण्डवैः कौरवेयैः ॥

ratherathe pañca vidīpakāstu | pradīpakāstatra gaje trayaśca | pratyaśvamekaśca mahāpradīpaḥ | kṛtāstu taiḥ pāṇḍavaiḥ kauraveyaiḥ

हर रथ पर पाँच दीपक-धारी, हर हाथी पर तीन दीपक-धारी और हर घोड़े के लिए एक बड़ी मशाल — इस प्रकार पाण्डवों और कौरवों ने दीप लगाए।

श्लोक 18 (7.164.18)

क्षणेन सर्वे विहिताः प्रदीपा । व्यादीपयन्तो ध्वजिनीं तदाशु ॥

kṣaṇena sarve vihitāḥ pradīpā | vyādīpayanto dhvajinīṃ tadāśu

क्षण भर में सारे दीप लगा दिए गए, और उन्होंने तुम्हारी सेना को चारों ओर से जगमगा दिया।

श्लोक 19 (7.164.19)

सर्वास्तु सेना व्यतिसेव्यमानाः । पदातिभिः पावकतैलहस्तैः । प्रकाश्यमाना ददृशुर्निशायां । यथान्तरिक्षे जलदास्तडिद्भिः ॥

sarvāstu senā vyatisevyamānāḥ | padātibhiḥ pāvakatailahastaiḥ | prakāśyamānā dadṛśurniśāyāṃ | yathāntarikṣe jaladāstaḍidbhiḥ

अग्नि और तेल हाथ में लिए पैदल सैनिकों से भरी हुई सारी सेनाएँ रात में ऐसी दिखाई दीं जैसे आकाश में बिजली से चमकते बादल।

श्लोक 20 (7.164.20)

प्रकाशितायां तु ततो ध्वजिन्यां । द्रोणोऽग्निकल्पः प्रतपन्सपत्नान् । रराज राजेन्द्र सुवर्णवर्मा । मध्यं गतः सूर्य इवांशुमाली ॥

prakāśitāyāṃ tu tato dhvajinyāṃ | droṇo'gnikalpaḥ pratapansapatnān | rarāja rājendra suvarṇavarmā | madhyaṃ gataḥ sūrya ivāṃśumālī

सेना के प्रकाशित हो जाने पर, अग्नि के समान तेजस्वी और शत्रुओं को तपाते हुए द्रोण, हे राजेन्द्र! सोने के कवच में आकाश के मध्य पहुँचे हुए किरणों वाले सूर्य की तरह शोभित हुए।

श्लोक 21 (7.164.21)

जाम्बूनदेष्वाभरणेषु चैव । निष्केषु शुद्धेषु शरासनेषु । पीतेषु शस्त्रेषु च पावकस्य । प्रतिप्रभास्तत्र तदा बभूवुः ॥

jāmbūnadeṣvābharaṇeṣu caiva | niṣkeṣu śuddheṣu śarāsaneṣu | pīteṣu śastreṣu ca pāvakasya | pratiprabhāstatra tadā babhūvuḥ

सोने के आभूषणों में, शुद्ध स्वर्ण के निष्कों में, धनुषों में और अग्नि में तपाए हुए शस्त्रों में वहाँ प्रतिबिम्बित आभाएँ चमक उठीं।

श्लोक 22 (7.164.22)

गदाश्च शैक्याः परिघाश्च शुभ्रा । रथेषु शक्त्यश्च विवर्तमानाः । प्रतिप्रभारश्मिभिराजमीढ । पुनःपुनः सञ्जनयन्ति दीपान् ॥

gadāśca śaikyāḥ parighāśca śubhrā | ratheṣu śaktyaśca vivartamānāḥ | pratiprabhāraśmibhirājamīḍha | punaḥpunaḥ sañjanayanti dīpān

हे अजमीढ-वंशी! रथों पर लोहे की गदाएँ, चमकते परिघ और घूमती हुई शक्तियाँ अपनी प्रतिबिम्बित किरणों से बार-बार दीपों को प्रज्वलित कर रही थीं।

श्लोक 23 (7.164.23)

छत्राणि वालव्यजनानि खड्गा । दीप्ता महोल्काश्च तथैव राजन् । व्याघूर्णमानाश्च सुवर्णमाला । व्यायच्छतां तत्र तदा विरेजुः ॥

chatrāṇi vālavyajanāni khaḍgā | dīptā maholkāśca tathaiva rājan | vyāghūrṇamānāśca suvarṇamālā | vyāyacchatāṃ tatra tadā virejuḥ

हे राजन्! छत्र, चँवर, तलवारें, दहकती बड़ी मशालें और घूमती हुई स्वर्ण-मालाएँ लड़ने वालों के बीच वहाँ शोभित हो रही थीं।

श्लोक 24 (7.164.24)

शस्त्रप्रभाभिश्च विराजमानं । दीपप्रभाभिश्च तदा बलं तत् । प्रकाशितं चाभरणप्रभाभिः । भृशं प्रकाशं नृपते बभूव ॥

śastraprabhābhiśca virājamānaṃ | dīpaprabhābhiśca tadā balaṃ tat | prakāśitaṃ cābharaṇaprabhābhiḥ | bhṛśaṃ prakāśaṃ nṛpate babhūva

शस्त्रों की चमक और दीपों की प्रभा से शोभित तथा आभूषणों की आभा से प्रकाशित वह सेना, हे राजन्! अत्यन्त जगमगा उठी।

श्लोक 25 (7.164.25)

पीतानि शस्त्राण्यसृगुक्षितानि । वीरावधूतानि तनुच्छदानि । दीप्तां प्रभां प्राजनयन्त तत्र । तपात्यये विद्युदिवान्तरिक्षे ॥

pītāni śastrāṇyasṛgukṣitāni | vīrāvadhūtāni tanucchadāni | dīptāṃ prabhāṃ prājanayanta tatra | tapātyaye vidyudivāntarikṣe

रक्त से सने तथा खूब रक्त पिए हुए शस्त्र और वीरों द्वारा उतारे हुए कवच वहाँ ग्रीष्म के अन्त में आकाश में कौंधती बिजली की तरह दहकती आभा बिखेर रहे थे।

श्लोक 26 (7.164.26)

प्रकम्पितानामभिधातवेगैः । अभिघ्नतां चापततां जवेन । वक्राण्यकाशन्त तदा नराणां । वाय्वीरितानीव महाम्बुजानि ॥

prakampitānāmabhidhātavegaiḥ | abhighnatāṃ cāpatatāṃ javena | vakrāṇyakāśanta tadā narāṇāṃ | vāyvīritānīva mahāmbujāni

प्रहारों के वेग से काँपते हुए और तेजी से झपटकर वार करते मनुष्यों के मुख उस समय वायु से हिलते बड़े कमलों की तरह चमक रहे थे।

श्लोक 27 (7.164.27)

महावने दारुमये प्रदीप्ते । यथा प्रभा भास्करस्यापि नश्येत् । तथा तदाऽऽसीद्ध्वजिनी प्रदीप्ता । महाभया भारत भीमरूपा ॥

mahāvane dārumaye pradīpte | yathā prabhā bhāskarasyāpi naśyet | tathā tadā''sīddhvajinī pradīptā | mahābhayā bhārata bhīmarūpā

जैसे लकड़ी के विशाल वन में आग लग जाने पर सूर्य की भी प्रभा मन्द पड़ जाए, वैसे ही हे भारत! उस समय वह दहकती हुई सेना अत्यन्त भयानक और विकराल रूप वाली हो गई।

श्लोक 28 (7.164.28)

तत्संप्रदीप्तं बलमस्मदीयं । निशाम्य पार्थास्त्वरितास्तथैव । सर्वेषु सैन्येषु पदातिसङ्घान् । अचोदयंस्तेऽपि चक्रुः प्रदीपान् ॥

tatsaṃpradīptaṃ balamasmadīyaṃ | niśāmya pārthāstvaritāstathaiva | sarveṣu sainyeṣu padātisaṅghān | acodayaṃste'pi cakruḥ pradīpān

हमारी सेना को प्रज्वलित देखकर पाण्डवों ने भी शीघ्रता से अपनी सब सेनाओं में पैदल सैनिकों को प्रेरित किया, और उन्होंने भी मशालें लगा दीं।

श्लोक 29 (7.164.29)

गजेगजे सप्त कृताः प्रदीपा । रथेरथे चैव दश प्रदीपाः । द्वावश्वपृष्ठे परिपार्श्वतोऽन्ये । ध्वजेषु चान्ये जघनेषु चान्ये ॥

gajegaje sapta kṛtāḥ pradīpā | ratherathe caiva daśa pradīpāḥ | dvāvaśvapṛṣṭhe paripārśvato'nye | dhvajeṣu cānye jaghaneṣu cānye

हर हाथी पर सात, हर रथ पर दस, घोड़े की पीठ पर दो, और दूसरे उसके दोनों बगल, ध्वजाओं पर तथा पीछे के भाग में दीप लगाए गए।

श्लोक 30 (7.164.30)

सेनासु सर्वासु च पार्श्वतोऽन्ये । पश्चात्पुरस्ताच्च समन्ततश्च । मध्ये तथाऽन्ये ज्वलिताग्निहस्ता । व्यदीपयन्पाण्डुसुतस्य सेनाम् ॥

senāsu sarvāsu ca pārśvato'nye | paścātpurastācca samantataśca | madhye tathā'nye jvalitāgnihastā | vyadīpayanpāṇḍusutasya senām

दूसरे सब सेनाओं में बगल में, पीछे, आगे और चारों ओर खड़े थे; और कुछ बीच में जलती मशालें हाथ में लिए पाण्डु-पुत्र की सेना को प्रकाशित कर रहे थे।

श्लोक 31 (7.164.31)

मध्ये तथाऽन्ये ज्वलिताग्निहस्ताः । सेनाद्वयेऽपि स्म नरा विचेरुः ॥

madhye tathā'nye jvalitāgnihastāḥ | senādvaye'pi sma narā viceruḥ

और दूसरे बीच में जलती मशालें हाथ में लिए थे; इस प्रकार दोनों सेनाओं में मनुष्य घूम रहे थे।

श्लोक 32 (7.164.32)

सर्वेषु सैन्येषु पदातिसङ्घा । विमिश्रिता हस्तिरथाश्वबृन्दैः । व्यदीपयंस्ते ध्वजिनीं प्रदीप्ताः । तथा बलं पाण्डवेयाभिगुप्तम् ॥

sarveṣu sainyeṣu padātisaṅghā | vimiśritā hastirathāśvabṛndaiḥ | vyadīpayaṃste dhvajinīṃ pradīptāḥ | tathā balaṃ pāṇḍaveyābhiguptam

सब सेनाओं में हाथियों, रथों और घोड़ों के समूहों में मिले हुए पैदल सैनिकों के दल स्वयं दहकते हुए सेना को प्रकाशित करने लगे, और उसी प्रकार पाण्डवों द्वारा रक्षित सेना को भी।

श्लोक 33 (7.164.33)

तेन प्रदीप्तेन तथा प्रदीप्तं । बलं तवासीद्बलवद्बलेन । भाः कुर्वता भानुमता ग्रहेण । दिवाकरेणाग्निरिवाभिगुप्तः ॥

tena pradīptena tathā pradīptaṃ | balaṃ tavāsīdbalavadbalena | bhāḥ kurvatā bhānumatā graheṇa | divākareṇāgnirivābhiguptaḥ

उस प्रदीप्त आभा से प्रकाशित तुम्हारी सेना उस तेज से अत्यन्त चमक उठी, जैसे प्रकाश करने वाले दीप्तिमान ग्रह सूर्य, दिवाकर, से रक्षित अग्नि।

श्लोक 34 (7.164.34)

तयोः प्रभाः पृथिवीमन्तरिक्षं । सर्वा व्यतिक्रम्य दिशश्च वृद्धाः । तेन प्रकाशेन भृशं प्रकाशं । बभूव तेषां तव चैव सैन्यम् ॥

tayoḥ prabhāḥ pṛthivīmantarikṣaṃ | sarvā vyatikramya diśaśca vṛddhāḥ | tena prakāśena bhṛśaṃ prakāśaṃ | babhūva teṣāṃ tava caiva sainyam

उन दोनों की प्रभा पृथ्वी, अन्तरिक्ष और सब दिशाओं को लाँघकर बढ़ गई; उस प्रकाश से पाण्डवों की और तुम्हारी, दोनों सेनाएँ अत्यन्त प्रकाशित हो उठीं।

श्लोक 35 (7.164.35)

तेन प्रकाशेन दिवं गतेन । सम्बोधिता देवगणाश्च राजन् । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः । समागमन्नप्सरसश्च सर्वाः ॥

tena prakāśena divaṃ gatena | sambodhitā devagaṇāśca rājan | gandharvayakṣāsurasiddhasaṅghāḥ | samāgamannapsarasaśca sarvāḥ

हे राजन्! स्वर्ग तक पहुँचे उस प्रकाश से देवताओं के गण जाग उठे; गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह तथा सभी अप्सराएँ वहाँ आ पहुँचीं।

श्लोक 36 (7.164.36)

तद्देवगन्धर्वसमाकुलं च । यक्षासुरेन्द्राप्सरसां गणैश्च । हतैश्च शूरैर्दिवमारुहद्भिः । आयोधनं दिव्यकल्पं बभूव ॥

taddevagandharvasamākulaṃ ca | yakṣāsurendrāpsarasāṃ gaṇaiśca | hataiśca śūrairdivamāruhadbhiḥ | āyodhanaṃ divyakalpaṃ babhūva

देवताओं और गन्धर्वों से, यक्षों, असुरेन्द्रों और अप्सराओं के समूहों से तथा स्वर्ग को चढ़ते हुए मारे गए शूरवीरों से भरा हुआ वह रणक्षेत्र देवलोक जैसा हो गया।

श्लोक 37 (7.164.37)

रथाश्वनागाकुलदीपदीप्तं । संरब्धयोधं हतविद्रुताश्वम् । महद्बलं व्यूढरथाश्वनागं । सुरासुरव्यूहसमं बभूव ॥

rathāśvanāgākuladīpadīptaṃ | saṃrabdhayodhaṃ hatavidrutāśvam | mahadbalaṃ vyūḍharathāśvanāgaṃ | surāsuravyūhasamaṃ babhūva

रथों, घोड़ों और हाथियों से भरी, दीपों से जगमगाती वह विशाल सेना, जिसके योद्धा क्रोध में थे और घोड़े मारे जाकर भाग रहे थे, रथ, अश्व और हाथियों के व्यूह में सजकर देवासुर-व्यूह के समान हो गई।

श्लोक 38 (7.164.38)

तच्छक्तिसङ्घाकुलचण्डवातं । महारथाभ्रं गजवाजिघोषम् । शस्त्रौगवर्षं रुधिराम्बुधारं । निशि प्रवृत्तं रथदुर्दिनं तत् ॥

tacchaktisaṅghākulacaṇḍavātaṃ | mahārathābhraṃ gajavājighoṣam | śastraugavarṣaṃ rudhirāmbudhāraṃ | niśi pravṛttaṃ rathadurdinaṃ tat

रात में चलता वह रथों का युद्ध मानो आँधी-तूफान का दिन बन गया: शक्तियों के समूह उसकी प्रचण्ड वायु थे, महारथी उसके बादल, हाथी-घोड़ों का शोर उसकी गर्जना, शस्त्रों की वर्षा उसकी बौछार और रक्त की धाराएँ उसका जल।

श्लोक 39 (7.164.39)

तस्मिन्महाग्निप्रतिमो महात्मा । सन्तापयन्पाण्डवान्विप्रमुख्यः । गभस्तिभिर्मध्यगतो यथाऽर्को । वर्षात्यये तद्वदभून्नरेन्द्र ॥

tasminmahāgnipratimo mahātmā | santāpayanpāṇḍavānvipramukhyaḥ | gabhastibhirmadhyagato yathā'rko | varṣātyaye tadvadabhūnnarendra

हे नरेन्द्र! उस युद्ध में महान अग्नि के समान तेजस्वी महात्मा ब्राह्मण-श्रेष्ठ द्रोण, पाण्डवों को सन्तप्त करते हुए, वर्षा के अन्त में अपनी किरणों के बीच स्थित सूर्य की भाँति बीच में विराजमान थे।

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