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द्रोण पर्व · अध्याय 165

द्रोण की रक्षा के लिए दुर्योधन की व्यवस्था

रणभूमि के प्रकाशित हो जाने पर दोनों सेनाएँ फिर भिड़ जाती हैं। धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अर्जुन के घुस आने पर द्रोण की रक्षा किसने की और द्रोण की मृत्यु कैसे हुई, और उलाहना देते हैं कि सञ्जय केवल उनके पक्ष की हानि ही बताते हैं। सञ्जय उत्तर देते हैं कि दुर्योधन ने कर्ण, शल्य, कृतवर्मा और बचे हुए त्रिगर्तों को द्रोण के पीछे, पहियों और आगे की रक्षा में नियुक्त किया, यह समझाया कि पाण्डवों पर विजय द्रोण पर ही टिकी है, और इस प्रकार रात का युद्ध फिर ऐसा भड़का जैसा पहले कभी देखा नहीं गया था।

अध्याय 164अध्याय-सूचीअध्याय 166

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.165.1)

प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसावृते । समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ॥

prakāśite tadā loke rajasā tamasāvṛte | samājagmuratho vīrāḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ

धूल और अन्धकार से घिरे होने पर भी जब संसार प्रकाशित हो गया, तब एक-दूसरे का वध चाहने वाले वीर आपस में आ भिड़े।

श्लोक 2 (7.165.2)

ते समेत्य रणे राजञ्शस्त्रप्रासासिधारिणः । परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागसः ॥

te sametya raṇe rājañśastraprāsāsidhāriṇaḥ | parasparamudaikṣanta parasparakṛtāgasaḥ

हे राजन्! तलवार, प्रास और भाले लिए हुए वे रण में मिलकर एक-दूसरे को घूरने लगे; सबने एक-दूसरे का अपराध किया था।

श्लोक 3 (7.165.3)

प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः । रत्नाचितैः स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिञ्चितैः ॥

pradīpānāṃ sahasraiśca dīpyamānaiḥ samantataḥ | ratnācitaiḥ svarṇadaṇḍairgandhatailāvasiñcitaiḥ

चारों ओर जलते हुए हजारों दीपों से, जो रत्नों से जड़े थे, सोने के दण्डों वाले थे और सुगन्धित तेल से भीगे हुए थे,

श्लोक 4 (7.165.4)

देवगन्धर्वदीपाद्यैः प्रभाभिरधिकोज्ज्वलैः । विरराज तदा भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव भारत ॥

devagandharvadīpādyaiḥ prabhābhiradhikojjvalaiḥ | virarāja tadā bhūmirgrahairdyauriva bhārata

तथा देवताओं और गन्धर्वों के अत्यन्त उज्ज्वल दीपों की प्रभा से पृथ्वी उस समय ऐसी शोभित हुई, हे भारत! जैसे ग्रहों से आकाश।

श्लोक 5 (7.165.5)

उल्काशतैः प्रज्वलितै रणभूमिर्व्यराजत । दह्यमानेव लोकानामभावे च वसुन्धरा ॥

ulkāśataiḥ prajvalitai raṇabhūmirvyarājata | dahyamāneva lokānāmabhāve ca vasundharā

सैकड़ों जलती हुई मशालों से रणभूमि ऐसी दमक रही थी मानो लोकों के प्रलय के समय पृथ्वी जल रही हो।

श्लोक 6 (7.165.6)

व्यदीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः । वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृता वृक्षा इवाबभुः ॥

vyadīpyanta diśaḥ sarvāḥ pradīpaistaiḥ samantataḥ | varṣāpradoṣe khadyotairvṛtā vṛkṣā ivābabhuḥ

उन दीपों से सब दिशाएँ चारों ओर जगमगा उठीं और वर्षा ऋतु की सन्ध्या में जुगनुओं से ढके वृक्षों की तरह शोभित हुईं।

श्लोक 7 (7.165.7)

असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक्पृथक् । नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगा हयसादिभिः । रथा रथवरैरेव समजग्मुर्मुदा युताः ॥

asajjanta tato vīrā vīreṣveva pṛthakpṛthak | nāgā nāgaiḥ samājagmusturagā hayasādibhiḥ | rathā rathavaraireva samajagmurmudā yutāḥ

तब वीर अलग-अलग वीरों से जा भिड़े; हाथी हाथियों से, घोड़े घुड़सवारों से और रथ श्रेष्ठ रथों से हर्ष के साथ टकराने लगे।

श्लोक 8 (7.165.8)

तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात् । चतुरङ्गस्य सैन्यस्य सम्पातश्च महानभूत् ॥

tasminrātrimukhe ghore tava putrasya śāsanāt | caturaṅgasya sainyasya sampātaśca mahānabhūt

रात के उस भयानक आरम्भ में तुम्हारे पुत्र की आज्ञा से चतुरंगिणी सेना का महान संघर्ष हुआ।

श्लोक 9 (7.165.9)

ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् । व्यधमत्त्वरया युक्तः क्षपयन्सर्वपार्थिवान् ॥

tato'rjuno mahārāja kauravāṇāmanīkinīm | vyadhamattvarayā yuktaḥ kṣapayansarvapārthivān

हे महाराज! तब अर्जुन ने शीघ्रता से सब राजाओं को नष्ट करते हुए कौरवों की सेना को तितर-बितर कर डाला।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 10 (7.165.10)

तस्मिन्प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम् । अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि वः ॥

tasminpraviṣṭe saṃrabdhe mama putrasya vāhinīm | amṛṣyamāṇe durdharṣe kathamāsīnmano hi vaḥ

जब वह क्रोध में भरा दुर्धर्ष वीर मेरे पुत्र की सेना में घुस आया, तब तुम लोगों के मन की क्या दशा थी?

श्लोक 11 (7.165.11)

किमकुर्वत सैन्यानि प्रविष्टे परपीडने । दुर्योधनश्च किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ॥

kimakurvata sainyāni praviṣṭe parapīḍane | duryodhanaśca kiṃ kṛtyaṃ prāptakālamamanyata

उस शत्रु-पीड़क के घुस आने पर सेनाओं ने क्या किया? और दुर्योधन ने समय के अनुसार क्या कर्तव्य समझा?

श्लोक 12 (7.165.12)

के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिन्दमाः । द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने ॥

ke cainaṃ samare vīraṃ pratyudyayurarindamāḥ | droṇaṃ ca ke vyarakṣanta praviṣṭe śvetavāhane

उस वीर के सामने रण में कौन-से शत्रु-दमन योद्धा गए? और श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन के घुस आने पर द्रोण की रक्षा किन्होंने की?

श्लोक 13 (7.165.13)

केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः । के पृष्ठतश्चाप्यभवन्वीरा वीरान्विनिघ्नतः । के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नन्तः शात्रवान्रणे ॥

ke'rakṣandakṣiṇaṃ cakraṃ ke ca droṇasya savyataḥ | ke pṛṣṭhataścāpyabhavanvīrā vīrānvinighnataḥ | ke purastādagacchanta nighnantaḥ śātravānraṇe

दाहिने चक्र की रक्षा किसने की, और द्रोण के बायीं ओर कौन थे? वीरों को मारते हुए द्रोण के पीछे कौन-से वीर थे? और रण में शत्रुओं को मारते हुए उनके आगे कौन चले?

श्लोक 14 (7.165.14)

यत्प्राविशन्महेष्वासः पाञ्चालानपराजितः । नृत्यन्निव नरव्याघ्रो रथमार्गेषु वीर्यवान् ॥

yatprāviśanmaheṣvāsaḥ pāñcālānaparājitaḥ | nṛtyanniva naravyāghro rathamārgeṣu vīryavān

वह महान धनुर्धर, अपराजित, पुरुषों में व्याघ्र के समान पराक्रमी वीर, रथों के मार्गों पर मानो नाचता हुआ पाञ्चालों में घुस गया,

श्लोक 15 (7.165.15)

यो ददाह शरैर्द्रोणः पाञ्चालानां रथव्रजान् । धूमकेतुरिव क्रुद्धः कथं मृत्युमुपेयिवान् ॥

yo dadāha śarairdroṇaḥ pāñcālānāṃ rathavrajān | dhūmaketuriva kruddhaḥ kathaṃ mṛtyumupeyivān

जिन द्रोण ने क्रुद्ध धूमकेतु की तरह अपने बाणों से पाञ्चालों के रथ-समूहों को जला डाला, वे मृत्यु को कैसे प्राप्त हुए?

श्लोक 16 (7.165.16)

अव्यग्रानेव हि परान्कथयस्यपराजितान् । हृष्टानुदीर्णान्सङ्ग्रामे न तथा सूत मामकान् ॥

avyagrāneva hi parānkathayasyaparājitān | hṛṣṭānudīrṇānsaṅgrāme na tathā sūta māmakān

सूत! तुम शत्रुओं को ही अविचल और अपराजित बताते हो; मेरे योद्धाओं को युद्ध में वैसा हर्षित और उत्साही नहीं बताते।

श्लोक 17 (7.165.17)

हतांश्चैव विदीर्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि । रथिनो विरथांश्चैव कृतान्युद्धेषु मामकान् ॥

hatāṃścaiva vidīrṇāṃśca viprakīrṇāṃśca śaṃsasi | rathino virathāṃścaiva kṛtānyuddheṣu māmakān

तुम मेरे योद्धाओं को मरे हुए, छिन्न-भिन्न और बिखरे हुए बताते हो, और युद्धों में रथियों को रथहीन किया हुआ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 18 (7.165.18)

द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् । दुर्योधनो महाराज वश्यान्भ्रातॄनुवाच ह ॥

droṇasya matamājñāya yoddhukāmasya tāṃ niśām | duryodhano mahārāja vaśyānbhrātṝnuvāca ha

हे महाराज! उस रात युद्ध करने की इच्छा वाले द्रोण का मत जानकर दुर्योधन ने अपने आज्ञाकारी भाइयों से कहा।

श्लोक 19 (7.165.19)

कर्णं च वृषसेनं च मद्रराजं च कौरव । दुर्धर्षं दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ॥

karṇaṃ ca vṛṣasenaṃ ca madrarājaṃ ca kaurava | durdharṣaṃ dīrghabāhuṃ ca ye ca teṣāṃ padānugāḥ

हे कौरव! उसने कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, दीर्घबाहु और उनके अनुयायियों से कहा —

श्लोक 20 (7.165.20)

द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षन्तु पृष्ठतः । हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ॥

droṇaṃ yattāḥ parākrāntāḥ sarve rakṣantu pṛṣṭhataḥ | hārdikyo dakṣiṇaṃ cakraṃ śalyaścaivottaraṃ tathā

"तुम सब सावधान और पराक्रमी होकर पीछे से द्रोण की रक्षा करो। हार्दिक्य दाहिने चक्र की रक्षा करे और शल्य उसी प्रकार बायें की।"

श्लोक 21 (7.165.21)

त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथाः । तांश्चैव पुरतः सर्वान्पुत्रस्ते समचोदयत् ॥

trigartānāṃ ca ye śūrā hataśiṣṭā mahārathāḥ | tāṃścaiva purataḥ sarvānputraste samacodayat

और तुम्हारे पुत्र ने त्रिगर्तों के जो महारथी बचे थे, उन सबको आगे नियुक्त कर दिया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 22 (7.165.22)

आचार्यो हि सुसंयत्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः । तं रक्षत सुसंयत्ता निघ्नन्तं शात्रवान्रणे ॥

ācāryo hi susaṃyatto bhṛśaṃ yattāśca pāṇḍavāḥ | taṃ rakṣata susaṃyattā nighnantaṃ śātravānraṇe

आचार्य पूरी तरह सावधान हैं और पाण्डव भी अत्यन्त सतर्क हैं। रण में शत्रुओं को मारते हुए उनकी तुम पूरी सावधानी से रक्षा करो।

श्लोक 23 (7.165.23)

द्रोणो हि बलवान्युद्धे क्षिप्रहस्तः प्रतापवान् । निर्जयेत्त्रिदशान्युद्धे किमु पार्थान्ससोमकान् ॥

droṇo hi balavānyuddhe kṣiprahastaḥ pratāpavān | nirjayettridaśānyuddhe kimu pārthānsasomakān

द्रोण युद्ध में बलवान, फुर्तीले हाथों वाले और प्रतापी हैं; वे देवताओं को भी जीत सकते हैं, फिर सोमकों सहित पार्थों की तो बात ही क्या।

श्लोक 24 (7.165.24)

ते यूयं सहिताः सर्वे भृशं यत्ता महारथाः । द्रोणं रक्षत पाञ्चालाद्धृष्टद्युम्नान्महारथात् ॥

te yūyaṃ sahitāḥ sarve bhṛśaṃ yattā mahārathāḥ | droṇaṃ rakṣata pāñcālāddhṛṣṭadyumnānmahārathāt

इसलिए तुम सब महारथी एक साथ रहकर पूरी सावधानी से पाञ्चाल-राजकुमार महारथी धृष्टद्युम्न से द्रोण की रक्षा करो।

श्लोक 25 (7.165.25)

पाण्डवीयेषु सैन्येषु न तं पश्याम कञ्चन । यो योधयेद्रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते पुमान् ॥

pāṇḍavīyeṣu sainyeṣu na taṃ paśyāma kañcana | yo yodhayedraṇe droṇaṃ dhṛṣṭadyumnādṛte pumān

पाण्डवों की सेनाओं में हमें धृष्टद्युम्न को छोड़कर ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखाई देता जो रण में द्रोण से लड़ सके।

श्लोक 26 (7.165.26)

तस्मात्सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् । सुगुप्तः पाण्डवान्हन्यात्सृञ्जयांश्च ससोमकान् ॥

tasmātsarvātmanā manye bhāradvājasya rakṣaṇam | suguptaḥ pāṇḍavānhanyātsṛñjayāṃśca sasomakān

इसलिए मैं सब प्रकार से भारद्वाज-पुत्र द्रोण की रक्षा को ही आवश्यक समझता हूँ; भली-भाँति सुरक्षित रहने पर वे पाण्डवों और सोमकों सहित सृञ्जयों को मार डालेंगे।

श्लोक 27 (7.165.27)

सृञ्जयेष्वथ सर्वेषु निहतेषु चमूमुखे । धृष्टद्युम्नं रणे द्रौणिर्हनिष्यति न संशयः ॥

sṛñjayeṣvatha sarveṣu nihateṣu camūmukhe | dhṛṣṭadyumnaṃ raṇe drauṇirhaniṣyati na saṃśayaḥ

सेना के अग्रभाग में सब सृञ्जयों के मारे जाने पर द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा रण में निःसन्देह धृष्टद्युम्न को मार डालेगा।

श्लोक 28 (7.165.28)

तथाऽर्जुनं च राधेयो हनिष्यति महारथः । भीमसेनमहं चापि युद्धे जेष्यामि दीक्षितः । शेषांश्च पाण्डवान्योधाः प्रसभं हीनतेजसः ॥

tathā'rjunaṃ ca rādheyo haniṣyati mahārathaḥ | bhīmasenamahaṃ cāpi yuddhe jeṣyāmi dīkṣitaḥ | śeṣāṃśca pāṇḍavānyodhāḥ prasabhaṃ hīnatejasaḥ

और महारथी राधेय अर्जुन को मारेगा, और मैं दीक्षित होकर युद्ध में भीमसेन को जीतूँगा; शेष पाण्डव योद्धा तेजहीन होकर बलपूर्वक परास्त हो जाएँगे।

श्लोक 29 (7.165.29)

सोऽयं मम जयो व्यक्तो दीर्घकालं भविष्यति । तस्माद्रक्षत सङ्ग्रामे द्रोणमेव महारथम् ॥

so'yaṃ mama jayo vyakto dīrghakālaṃ bhaviṣyati | tasmādrakṣata saṅgrāme droṇameva mahāratham

मेरी यह विजय स्पष्ट ही दीर्घकाल तक टिकने वाली होगी। इसलिए तुम रण में केवल महारथी द्रोण की रक्षा करो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 30 (7.165.30)

इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव । व्यादिदेश तथा सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥

ityuktvā bharataśreṣṭha putro duryodhanastava | vyādideśa tathā sainyaṃ tasmiṃstamasi dāruṇe

हे भरतश्रेष्ठ! यह कहकर तुम्हारे पुत्र दुर्योधन ने उस भयंकर अन्धकार में सेना को आदेश दिया।

श्लोक 31 (7.165.31)

ततः प्रववृते युद्धं रात्रौ भरतसत्तम । उभयोः सेनयोर्घोरं परस्परजिगीषया ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ rātrau bharatasattama | ubhayoḥ senayorghoraṃ parasparajigīṣayā

हे भरतसत्तम! तब उस रात दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें दोनों एक-दूसरे को जीतना चाहती थीं।

श्लोक 32 (7.165.32)

अर्जुनः कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवाः । नानाशस्त्रसमावापैरन्योन्यं समपीडयन् ॥

arjunaḥ kauravaṃ sainyamarjunaṃ cāpi kauravāḥ | nānāśastrasamāvāpairanyonyaṃ samapīḍayan

अर्जुन कौरव-सेना को और कौरव अर्जुन को अनेक प्रकार के शस्त्रों की बौछार से एक-दूसरे को पीड़ित करने लगे।

श्लोक 33 (7.165.33)

द्रौणिः पाञ्चालराजं च भारद्वाजश्च सृञ्जयान् । छादयांचक्रिरे सङ्ख्ये शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

drauṇiḥ pāñcālarājaṃ ca bhāradvājaśca sṛñjayān | chādayāṃcakrire saṅkhye śaraiḥ sannataparvabhiḥ

द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा ने पाञ्चाल-राज को और भारद्वाज द्रोण ने सृञ्जयों को युद्ध में झुकी गाँठों वाले बाणों से ढक दिया।

श्लोक 34 (7.165.34)

पाण्डुपाञ्चालसैन्यानां कौरवाणां च भारत । आसीन्निष्टानको घोरो निघ्नतामितरेतरम् ॥

pāṇḍupāñcālasainyānāṃ kauravāṇāṃ ca bhārata | āsīnniṣṭānako ghoro nighnatāmitaretaram

हे भारत! एक-दूसरे को मारते हुए पाण्डवों-पाञ्चालों और कौरवों की सेनाओं में भयंकर कोलाहल मच गया।

श्लोक 35 (7.165.35)

नैवास्माभिस्तथा पूर्वैर्दृष्टपूर्वं तथाविधम् । युद्धं यादृशमेवासीत्तां रात्रिं सुभयावहम् ॥

naivāsmābhistathā pūrvairdṛṣṭapūrvaṃ tathāvidham | yuddhaṃ yādṛśamevāsīttāṃ rātriṃ subhayāvaham

वह रात का युद्ध ऐसा अत्यन्त भयावह था कि न हमने, न हमारे पूर्वजों ने पहले कभी वैसा युद्ध देखा था।

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