द्रोण पर्व · अध्याय 167
भूरि का वध, अश्वत्थामा के प्रहार से घटोत्कच का गिरना, भीम के आगे दुर्योधन का पलायन
सात्यकि और भूरि के बीच बाण-युद्ध होता है, जिसमें सात्यकि की शक्ति से भूरि रथ से गिर पड़ता है। अश्वत्थामा सात्यकि पर टूट पड़ता है, पर उसके सामने घटोत्कच आ जाता है; रात के उस युद्ध में बाणों और दिव्यास्त्रों के आदान-प्रदान के बाद घटोत्कच उसे मूर्च्छित कर देता है, पर अश्वत्थामा सँभलकर एक ही बाण से राक्षस को अचेत कर देता है और उसका सारथि उसे दूर ले जाता है। फिर दुर्योधन भीम से लड़ता है और उनके एक के बाद एक धनुष काटता है; भीम की शक्ति के तीन टुकड़े हो जाते हैं, पर उनकी गदा दुर्योधन के घोड़ों, सारथि और रथ को कुचल देती है। राजा को मरा समझकर कौरव चीख उठते हैं, और अँधेरे में पाण्डवों के सहयोगी द्रोण की ओर बढ़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.167.1)
भूरिस्तु समरे राजञ्शैनेयं रथिनां वरम् । आपतन्तमपासेधत्प्रयाणादिव कुञ्जरम् ॥
bhūristu samare rājañśaineyaṃ rathināṃ varam | āpatantamapāsedhatprayāṇādiva kuñjaram
हे राजन्, युद्ध में भूरि ने रथियों में श्रेष्ठ शैनेय सात्यकि को, उन पर टूट पड़ते समय, उसी प्रकार रोक लिया जैसे कोई कूच करते हुए हाथी को रोक ले।
श्लोक 2 (7.167.2)
अथैनं सात्यकिः क्रुद्धः पञ्चभिर्निशितैः शरैः । विव्याध हृदये तस्य प्रास्रवत्तस्य शोणितम् ॥
athainaṃ sātyakiḥ kruddhaḥ pañcabhirniśitaiḥ śaraiḥ | vivyādha hṛdaye tasya prāsravattasya śoṇitam
तब क्रोध से भरे सात्यकि ने पाँच तीखे बाणों से उसकी छाती बींध दी, और घाव से रक्त बहने लगा।
श्लोक 3 (7.167.3)
तथैव कौरवो युद्धे शैनेयं युद्धदुर्मदम् । दशभिर्निशितैस्तीक्ष्णैरविध्यत भुजान्तरे ॥
tathaiva kauravo yuddhe śaineyaṃ yuddhadurmadam | daśabhirniśitaistīkṣṇairavidhyata bhujāntare
उसी प्रकार कुरुवंशी भूरि ने भी युद्ध में मदोन्मत्त शैनेय की छाती पर दस पैने और तीखे बाणों से वार किया।
श्लोक 4 (7.167.4)
तावन्योन्यं महाराज ततक्षाते शरैर्भृशम् । क्रोधसंरक्तनयनौ क्रोधाद्विष्फार्य कार्मुके ॥
tāvanyonyaṃ mahārāja tatakṣāte śarairbhṛśam | krodhasaṃraktanayanau krodhādviṣphārya kārmuke
हे महाराज, क्रोध से लाल आँखों वाले वे दोनों क्रोध में धनुष खींचकर एक-दूसरे को बाणों से बुरी तरह घायल करने लगे।
श्लोक 5 (7.167.5)
तयोरासीन्महाराज शस्त्रवृष्टिः सुदारुणा । क्रुद्धयोः सायकमुचोर्यमान्तकनिकाशयोः ॥
tayorāsīnmahārāja śastravṛṣṭiḥ sudāruṇā | kruddhayoḥ sāyakamucoryamāntakanikāśayoḥ
हे महाराज, यम और अन्तक के समान बाण छोड़ने वाले उन दोनों क्रुद्ध वीरों के बीच अस्त्रों की भयंकर वर्षा होने लगी।
श्लोक 6 (7.167.6)
तावन्योन्यं शरैः राजन्सञ्छाद्य समवस्थितौ । मुहूर्तं चैव तद्युद्धं समरूपमिवाभावत् ॥
tāvanyonyaṃ śaraiḥ rājansañchādya samavasthitau | muhūrtaṃ caiva tadyuddhaṃ samarūpamivābhāvat
हे राजन्, वे एक-दूसरे को बाणों से ढककर डटे रहे, और क्षण भर के लिए वह युद्ध बराबरी का-सा दिखाई दिया।
श्लोक 7 (7.167.7)
ततः क्रुद्धो महाराज शैनेयः प्रहसन्निव । धनुश्चिच्छेद समरे कौरव्यस्य महात्मनः ॥
tataḥ kruddho mahārāja śaineyaḥ prahasanniva | dhanuściccheda samare kauravyasya mahātmanaḥ
तब हे महाराज, शिनिवंशी सात्यकि ने क्रुद्ध होकर, मानो हँसते हुए, युद्ध में उस महात्मा कुरुवंशी का धनुष काट डाला।
श्लोक 8 (7.167.8)
अथैनं छिन्नधन्वानं नवभिर्निशितैः शरैः । विव्याध हृदये तूर्णं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
athainaṃ chinnadhanvānaṃ navabhirniśitaiḥ śaraiḥ | vivyādha hṛdaye tūrṇaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
फिर धनुष कट जाने पर, "ठहरो, ठहरो" कहते हुए सात्यकि ने उसकी छाती को शीघ्र ही नौ तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 9 (7.167.9)
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः । धनुरन्यत्समादाय सात्वतं प्रत्यविध्यत ॥
so'tividdho balavatā śatruṇā śatrutāpanaḥ | dhanuranyatsamādāya sātvataṃ pratyavidhyata
बलवान् शत्रु से बहुत घायल हुए उस शत्रु-संतापक ने दूसरा धनुष लेकर सात्वत को फिर बाणों से बींधा।
श्लोक 10 (7.167.10)
स विद्ध्वा सात्वतं बाणैस्त्रिभिरेव विशाम्पते । धनुश्चिच्छेद भल्लेन सुतीक्ष्णेन हसन्निव ॥
sa viddhvā sātvataṃ bāṇaistribhireva viśāmpate | dhanuściccheda bhallena sutīkṣṇena hasanniva
हे प्रजानाथ, उसने सात्वत को केवल तीन बाणों से बींधकर, मानो हँसते हुए, एक अति तीखे भल्ल से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 11 (7.167.11)
छिन्नधन्वा महाराज सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः । प्रजहार महावेगां शक्तिं तस्य महोरसि ॥
chinnadhanvā mahārāja sātyakiḥ krodhamūrcchitaḥ | prajahāra mahāvegāṃ śaktiṃ tasya mahorasi
हे महाराज, धनुष कट जाने पर क्रोध से मूर्च्छित-से सात्यकि ने उसकी विशाल छाती पर अत्यन्त वेग वाली शक्ति फेंकी।
श्लोक 12 (7.167.12)
स तु शक्त्या विभिन्नाङ्गो निपपात रथोत्तमात् । लोहिताङ्ग इवाकाशाद्दीप्तरश्मिर्यदृच्छया ॥
sa tu śaktyā vibhinnāṅgo nipapāta rathottamāt | lohitāṅga ivākāśāddīptaraśmiryadṛcchayā
उस शक्ति से अंग विदीर्ण होने पर वह श्रेष्ठ रथ से ऐसे गिरा, जैसे प्रज्वलित किरणों वाला लाल अंगारक ग्रह संयोग से आकाश से गिर पड़े।
श्लोक 13 (7.167.13)
तं तु दृष्ट्वा हतं शूरमश्वत्थामा महारथः । अभ्यधावत वेगेन शैनेयं प्रति संयुगे ॥
taṃ tu dṛṣṭvā hataṃ śūramaśvatthāmā mahārathaḥ | abhyadhāvata vegena śaineyaṃ prati saṃyuge
उस वीर को मरा हुआ देखकर महारथी अश्वत्थामा युद्ध में वेग से शैनेय पर टूट पड़ा।
श्लोक 14 (7.167.14)
तिष्ठतिष्ठेति चाभाष्य शैनेयं स नराधिप । अभ्यवर्षच्छरौघेण मेरुं वृष्ट्या यथाम्बुदः ॥
tiṣṭhatiṣṭheti cābhāṣya śaineyaṃ sa narādhipa | abhyavarṣaccharaugheṇa meruṃ vṛṣṭyā yathāmbudaḥ
हे नराधिप, "ठहरो, ठहरो" कहकर उसने शैनेय पर बाणों की बाढ़ बरसा दी, जैसे बादल मेरु पर्वत पर जल बरसाता है।
श्लोक 15 (7.167.15)
तमापतन्तं संरब्धं शैनेयस्य रथं प्रति । घटोत्कचोऽब्रवीद्राजन्नादं मुक्त्वा महारथः ॥
tamāpatantaṃ saṃrabdhaṃ śaineyasya rathaṃ prati | ghaṭotkaco'bravīdrājannādaṃ muktvā mahārathaḥ
हे राजन्, शैनेय के रथ की ओर क्रोध से टूट पड़ते हुए उस अश्वत्थामा से महारथी घटोत्कच ने गर्जना करके कहा —
घटोत्कच उवाच
श्लोक 16 (7.167.16)
तिष्ठतिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि । एष त्वां निहनिष्यामि महिषं मृगराडिव ॥
tiṣṭhatiṣṭha na me jīvandroṇaputra gamiṣyasi | eṣa tvāṃ nihaniṣyāmi mahiṣaṃ mṛgarāḍiva
"हे द्रोणपुत्र, ठहरो, ठहरो! तुम मेरे हाथ से जीवित बचकर नहीं जाओगे। जैसे सिंह भैंसे को मारता है, वैसे ही आज मैं तुम्हें मार डालूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (7.167.17)
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे । इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो राक्षसः परवीरहा । द्रोणिमभ्यद्रवत्क्रुद्धो गजेन्द्रमिव केसरी ॥
yuddhaśraddhāmahaṃ te'dya vineṣyāmi raṇājire | ityuktvā krodhatāmrākṣo rākṣasaḥ paravīrahā | droṇimabhyadravatkruddho gajendramiva kesarī
आज इस रणभूमि में मैं तुम्हारी युद्ध की साध मिटा दूँगा।" इतना कहकर क्रोध से लाल आँखों वाला, शत्रु-वीरों का संहारक वह राक्षस क्रुद्ध होकर द्रोणपुत्र पर ऐसे झपटा, जैसे सिंह किसी गजराज पर झपटता है।
श्लोक 18 (7.167.18)
रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद्धटोत्कचः । रथिनामृषभं द्रौणिं धाराभिरिव तोयदः ॥
rathākṣamātrairiṣubhirabhyavarṣaddhaṭotkacaḥ | rathināmṛṣabhaṃ drauṇiṃ dhārābhiriva toyadaḥ
घटोत्कच ने रथ की धुरी जितने लम्बे बाणों से रथियों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र पर वैसी ही वर्षा की, जैसे बादल जल की धाराएँ बरसाता है।
श्लोक 19 (7.167.19)
शरवृष्टिं तु तां प्राप्तां शरैराशीविषोपमैः । शातयामास समरे तरसा द्रौणिरुत्स्मयन् ॥
śaravṛṣṭiṃ tu tāṃ prāptāṃ śarairāśīviṣopamaiḥ | śātayāmāsa samare tarasā drauṇirutsmayan
द्रोणपुत्र ने मुस्कुराते हुए, विषैले साँपों के समान बाणों से, अपने ऊपर आई उस बाण-वर्षा को युद्ध में वेग से काट गिराया।
श्लोक 20 (7.167.20)
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिराशुगैः । समाचिनोद्राक्षसेन्द्रं घटोत्कचमरिन्दमम् ॥
tataḥ śaraśataistīkṣṇairmarmabhedibhirāśugaiḥ | samācinodrākṣasendraṃ ghaṭotkacamarindamam
फिर उसने मर्मस्थलों को बींधने वाले सैकड़ों तीखे, वेगवान् बाणों से शत्रुदमन राक्षसराज घटोत्कच को ढक दिया।
श्लोक 21 (7.167.21)
स शरैराचितस्तेन राक्षसो रणमूर्धनि । व्यकाशत महाराज श्वाविच्छललतो यथा ॥
sa śarairācitastena rākṣaso raṇamūrdhani | vyakāśata mahārāja śvāvicchalalato yathā
हे महाराज, उसके बाणों से बिंधा हुआ वह राक्षस रणभूमि के अग्रभाग में काँटों से भरे साही के समान शोभित हुआ।
श्लोक 22 (7.167.22)
ततः क्रोधसमाविष्टो भैमसेनिः प्रतापवान् । शरैरवचकर्तोग्रैर्द्रौणिं वज्राशनिप्रभैः ॥
tataḥ krodhasamāviṣṭo bhaimaseniḥ pratāpavān | śarairavacakartograirdrauṇiṃ vajrāśaniprabhaiḥ
तब क्रोध से भरे हुए प्रतापी भीमपुत्र ने वज्र और बिजली जैसी कान्ति वाले भयंकर बाणों से द्रोणपुत्र को घायल कर दिया।
श्लोक 23 (7.167.23)
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च नाराचैः सशिलीमुखैः । वराहकर्णैर्नालीकैर्विकर्णैश्चाभ्यवीवृषत् ॥
kṣuraprairardhacandraiśca nārācaiḥ saśilīmukhaiḥ | varāhakarṇairnālīkairvikarṇaiścābhyavīvṛṣat
उसने क्षुरप्र, अर्धचन्द्र, नाराच, शिलीमुख, वराहकर्ण, नालीक और विकर्णी नामक बाणों की भी उस पर वर्षा की।
श्लोक 24 (7.167.24)
तां शस्त्रवृष्टिमतुलां वज्राशनिसमस्वनाम् । पतन्तीमुपरि क्रुद्धो द्रौणिरव्यथितेन्द्रियः ॥
tāṃ śastravṛṣṭimatulāṃ vajrāśanisamasvanām | patantīmupari kruddho drauṇiravyathitendriyaḥ
वज्र और बिजली के समान गड़गड़ाती हुई उस अनुपम शस्त्र-वर्षा को अपने ऊपर गिरते देख द्रोणपुत्र क्रुद्ध तो हुआ, पर उसकी इन्द्रियाँ विचलित नहीं हुईं,
श्लोक 25 (7.167.25)
सुदुःसहां शरैर्घोरैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः । व्यधमत्सुमहातेजा महाभ्राणीव मारुतः ॥
suduḥsahāṃ śarairghorairdivyāstrapratimantritaiḥ | vyadhamatsumahātejā mahābhrāṇīva mārutaḥ
और अत्यन्त तेजस्वी उसने दिव्यास्त्रों के मन्त्र से अभिमन्त्रित भयंकर बाणों से उस दुःसह वर्षा को वैसे ही बिखेर दिया, जैसे वायु बड़े-बड़े बादलों को उड़ा देती है।
श्लोक 26 (7.167.26)
ततोऽन्तरिक्षे बाणानां सङ्ग्रामोऽन्य इवाभवत् । घोररूपो महाराज योधानां हर्षवर्धनः ॥
tato'ntarikṣe bāṇānāṃ saṅgrāmo'nya ivābhavat | ghorarūpo mahārāja yodhānāṃ harṣavardhanaḥ
तब हे महाराज, आकाश में बाणों का मानो एक दूसरा ही संग्राम होने लगा, भयंकर रूप वाला, जो योद्धाओं का हर्ष बढ़ा रहा था।
श्लोक 27 (7.167.27)
ततोऽस्त्रसन्धर्षकृतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः । बभौ निशामुखे व्योम खद्योतैरिव संवृतम् ॥
tato'strasandharṣakṛtairvisphuliṅgaiḥ samantataḥ | babhau niśāmukhe vyoma khadyotairiva saṃvṛtam
फिर अस्त्रों की रगड़ से चारों ओर उठती चिनगारियों से रात के आरम्भ में आकाश ऐसा शोभित हुआ, मानो जुगनुओं से भर गया हो।
श्लोक 28 (7.167.28)
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वतः । प्रियार्थं तव पुत्राणां राक्षसं समवाकिरत् ॥
sa mārgaṇagaṇairdrauṇirdiśaḥ pracchādya sarvataḥ | priyārthaṃ tava putrāṇāṃ rākṣasaṃ samavākirat
द्रोणपुत्र ने बाणों के समूहों से सभी दिशाओं को ढककर, आपके पुत्रों का प्रिय करने के लिए राक्षस पर चारों ओर से बाण बरसाए।
श्लोक 29 (7.167.29)
ततः प्रववृते युद्धं द्रौणिराक्षसयोर्मृधे । विगाढे रजनीमध्ये शक्रप्रह्लादयोरिव ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ drauṇirākṣasayormṛdhe | vigāḍhe rajanīmadhye śakraprahlādayoriva
तब गहरी रात के बीच द्रोणपुत्र और राक्षस के बीच वैसा ही युद्ध छिड़ गया, जैसा इन्द्र और प्रह्लाद के बीच हुआ था।
श्लोक 30 (7.167.30)
ततो घटोत्कचो बाणैर्दशभिर्द्रौणिमाहवे । जघानोरसि सङ्क्रुद्धः कालज्वलनसन्निभैः ॥
tato ghaṭotkaco bāṇairdaśabhirdrauṇimāhave | jaghānorasi saṅkruddhaḥ kālajvalanasannibhaiḥ
तब क्रोध में भरे घटोत्कच ने प्रलयाग्नि के समान दस बाणों से युद्ध में द्रोणपुत्र की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 31 (7.167.31)
स तैरभ्यायतैर्विद्धो राक्षसेन महाबलः । चचाल समरे द्रौणिर्वातनुन्न इव द्रुमः ॥
sa tairabhyāyatairviddho rākṣasena mahābalaḥ | cacāla samare drauṇirvātanunna iva drumaḥ
महाबली राक्षस के चलाए उन बाणों से बिंधकर द्रोणपुत्र युद्ध में वायु से हिलाए गए वृक्ष की तरह डगमगा गया।
श्लोक 32 (7.167.32)
स मोहं समरे प्राप्तो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥
sa mohaṃ samare prāpto dhvajayaṣṭiṃ samāśritaḥ
युद्ध में मूर्च्छा को प्राप्त होकर वह ध्वजदण्ड का सहारा लिए रह गया।
श्लोक 33 (7.167.33)
ततो हाहाकृतं सैन्यं तव सर्वं जनाधिप । हतं स्म मेनिरे सर्वे द्रोणसूनुं जनाधिपाः ॥
tato hāhākṛtaṃ sainyaṃ tava sarvaṃ janādhipa | hataṃ sma menire sarve droṇasūnuṃ janādhipāḥ
हे जनाधिप, तब आपकी सारी सेना हाहाकार कर उठी, और सभी राजाओं ने द्रोणपुत्र को मरा हुआ मान लिया।
श्लोक 34 (7.167.34)
तं तु दृष्ट्वा तथावस्थमश्वत्थामानमाहवे । पाञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ॥
taṃ tu dṛṣṭvā tathāvasthamaśvatthāmānamāhave | pāñcālāḥ sṛñjayāścaiva siṃhanādaṃ pracakrire
युद्ध में अश्वत्थामा को उस दशा में देखकर पाञ्चालों और सृञ्जयों ने सिंहनाद किया।
श्लोक 35 (7.167.35)
प्रतिलभ्य ततः संज्ञामश्वत्थामा महाबलः । धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ॥
pratilabhya tataḥ saṃjñāmaśvatthāmā mahābalaḥ | dhanuḥ prapīḍya vāmena kareṇāmitrakarśanaḥ
फिर होश आने पर महाबली, शत्रुओं को सताने वाले अश्वत्थामा ने बाएँ हाथ से धनुष को दबाकर,
श्लोक 36 (7.167.36)
मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् । यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ॥
mumocākarṇapūrṇena dhanuṣā śaramuttamam | yamadaṇḍopamaṃ ghoramuddiśyāśu ghaṭotkacam
कान तक खींचे हुए धनुष से यमदण्ड के समान भयंकर एक उत्तम बाण घटोत्कच की ओर शीघ्रता से छोड़ा।
श्लोक 37 (7.167.37)
स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य शरोत्तमः । विवेश वसुधामुग्रः सपुङ्खः पृथिवीपते ॥
sa bhittvā hṛdayaṃ tasya rākṣasasya śarottamaḥ | viveśa vasudhāmugraḥ sapuṅkhaḥ pṛthivīpate
हे पृथ्वीपति, वह उत्तम, उग्र, पंखदार बाण राक्षस का हृदय भेदकर पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 38 (7.167.38)
सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् । राक्षसेन्द्रः सुबलवान्द्रौणिना रणशालिना ॥
so'tividdho mahārāja rathopastha upāviśat | rākṣasendraḥ subalavāndrauṇinā raṇaśālinā
हे महाराज, गहरी चोट खाकर वह बलवान् राक्षसराज, रण में शोभा पाने वाले द्रोणपुत्र के प्रहार से रथ के भीतर बैठ गया।
श्लोक 39 (7.167.39)
दृष्ट्वा विमूढं हैडिम्बं सारथिस्तु रणाजिरात् । द्रौणेः सकाशात्सम्भ्रान्तस्त्वपनिन्येत्वरान्वितः ॥
dṛṣṭvā vimūḍhaṃ haiḍimbaṃ sārathistu raṇājirāt | drauṇeḥ sakāśātsambhrāntastvapaninyetvarānvitaḥ
हिडिम्बा के पुत्र को मूर्च्छित देखकर उसका सारथि घबराकर, तेज़ी से उसे रणभूमि से द्रोणपुत्र के पास से दूर ले गया।
श्लोक 40 (7.167.40)
तथा तु समरे विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् । ननाद सुमहानादं द्रोणपुत्रो महारथः ॥
tathā tu samare viddhvā rākṣasendraṃ ghaṭotkacam | nanāda sumahānādaṃ droṇaputro mahārathaḥ
इस प्रकार युद्ध में राक्षसराज घटोत्कच को बींधकर महारथी द्रोणपुत्र ने बड़ी भारी गर्जना की।
श्लोक 41 (7.167.41)
पूजितस्तव पुत्रैश्च सर्वयोधैश्च भारत । वपुषाऽतिप्रजज्वाल मध्याह्न इव भास्करः ॥
pūjitastava putraiśca sarvayodhaiśca bhārata | vapuṣā'tiprajajvāla madhyāhna iva bhāskaraḥ
हे भारत, आपके पुत्रों और सब योद्धाओं से सम्मानित होकर वह दोपहर के सूर्य की तरह अपने तेज से दमक उठा।
श्लोक 42 (7.167.42)
भीमसेनं तु युध्यन्तं भारद्वाजरथं प्रति । स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥
bhīmasenaṃ tu yudhyantaṃ bhāradvājarathaṃ prati | svayaṃ duryodhano rājā pratyavidhyacchitaiḥ śaraiḥ
इधर जब भीमसेन द्रोण के रथ की ओर लड़ते हुए बढ़ रहे थे, तब राजा दुर्योधन ने स्वयं तीखे बाणों से उन पर प्रहार किया।
श्लोक 43 (7.167.43)
तं भीमसेनो दशभिः शरैर्विव्याध मारिष । दुर्योधनोऽपि विंशत्या शराणां प्रत्यविध्यत ॥
taṃ bhīmaseno daśabhiḥ śarairvivyādha māriṣa | duryodhano'pi viṃśatyā śarāṇāṃ pratyavidhyata
हे आर्य, भीमसेन ने उसे दस बाणों से बींधा, और दुर्योधन ने भी बीस बाणों से उसका उत्तर दिया।
श्लोक 44 (7.167.44)
तौ सायकैरवच्छिन्नावदृश्येतां रणाजिरे । मेघजालसमाच्छन्नौ नभसीवेन्दुभास्करौ ॥
tau sāyakairavacchinnāvadṛśyetāṃ raṇājire | meghajālasamācchannau nabhasīvendubhāskarau
बाणों से ढके हुए वे दोनों रणभूमि में दिखाई नहीं दे रहे थे, जैसे आकाश में बादलों के जाल से ढके चन्द्रमा और सूर्य।
श्लोक 45 (7.167.45)
अथ दुर्योधनो राजा भीमं विव्याध पत्रिभिः । पञ्चभिर्भरतश्रेष्ठ तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
atha duryodhano rājā bhīmaṃ vivyādha patribhiḥ | pañcabhirbharataśreṣṭha tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
तब राजा दुर्योधन ने भीम को पाँच बाणों से बींधा और कहा, "ठहरो, ठहरो", हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 46 (7.167.46)
तस्य भीमो धनुश्छित्त्वा ध्वजं च दशभिः शरैः । विव्याध कौरवश्रेष्ठं नवत्या नतपर्वणाम् ॥
tasya bhīmo dhanuśchittvā dhvajaṃ ca daśabhiḥ śaraiḥ | vivyādha kauravaśreṣṭhaṃ navatyā nataparvaṇām
भीम ने दस बाणों से उसका धनुष और ध्वज काट दिया और कुरुश्रेष्ठ को नब्बे नतपर्व बाणों से बींध डाला।
श्लोक 47 (7.167.47)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो धनुरन्यन्महत्तरम् । गृहीत्वा भरतश्रेष्ठो भीमसेनं शितैः शरैः । अपीडयद्रणमुखे पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥
tato duryodhanaḥ kruddho dhanuranyanmahattaram | gṛhītvā bharataśreṣṭho bhīmasenaṃ śitaiḥ śaraiḥ | apīḍayadraṇamukhe paśyatāṃ sarvadhanvinām
तब क्रुद्ध भरतश्रेष्ठ दुर्योधन ने एक और बड़ा धनुष लेकर सब धनुर्धरों के देखते-देखते रणभूमि के अग्रभाग में पैने बाणों से भीमसेन को पीड़ित किया।
श्लोक 48 (7.167.48)
तान्निहत्य शरान्भीमो दुर्योधनधनुश्च्युतान् । कौरवं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥
tānnihatya śarānbhīmo duryodhanadhanuścyutān | kauravaṃ pañcaviṃśatyā kṣudrakāṇāṃ samārpayat
भीम ने दुर्योधन के धनुष से छूटे उन बाणों को काटकर कौरव पर पच्चीस छोटे बाण चलाए।
श्लोक 49 (7.167.49)
दुर्योधनस्तु सङ्क्रुद्धो भीमसेनस्य मारिष । क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा दशभिः प्रत्यविध्यत ॥
duryodhanastu saṅkruddho bhīmasenasya māriṣa | kṣurapreṇa dhanuśchittvā daśabhiḥ pratyavidhyata
हे आर्य, क्रुद्ध दुर्योधन ने क्षुरप्र से भीमसेन का धनुष काट दिया और दस बाणों से उसे घायल किया।
श्लोक 50 (7.167.50)
अथान्यद्धनुरादाय भीमसेनो महाबलः । विव्याध नृपतिं तूर्णं सप्तभिर्निशितैः शरैः ॥
athānyaddhanurādāya bhīmaseno mahābalaḥ | vivyādha nṛpatiṃ tūrṇaṃ saptabhirniśitaiḥ śaraiḥ
तब महाबली भीमसेन ने दूसरा धनुष लेकर सात तीखे बाणों से राजा को तुरंत बींध दिया।
श्लोक 51 (7.167.51)
तदप्यस्य धनुः क्षिप्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् । द्वितीयं च तृतीयं च चतुर्थं पञ्चमं तथा ॥
tadapyasya dhanuḥ kṣipraṃ ciccheda laghuhastavat | dvitīyaṃ ca tṛtīyaṃ ca caturthaṃ pañcamaṃ tathā
उसने उस धनुष को भी हल्के हाथ से झट काट डाला, और फिर दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें को भी।
श्लोक 52 (7.167.52)
आत्तमात्तं महाराज भीमस्य धनुराच्छिनत् । तव पुत्रो महाराज जितकाशी मदोत्कटः ॥
āttamāttaṃ mahārāja bhīmasya dhanurācchinat | tava putro mahārāja jitakāśī madotkaṭaḥ
हे महाराज, भीम जो-जो धनुष उठाता, उसे आपका पुत्र काट डालता, जो विजय के गर्व से भरा और मद में चूर था।
श्लोक 53 (7.167.53)
स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः । शक्तिं चिक्षेप समरे सर्वपारशवीं शुभाम् ॥
sa tathā bhidyamāneṣu kārmukeṣu punaḥ punaḥ | śaktiṃ cikṣepa samare sarvapāraśavīṃ śubhām
इस प्रकार बार-बार धनुष कट जाने पर भीम ने युद्ध में पूरी लोहे की बनी एक सुन्दर शक्ति फेंकी,
श्लोक 54 (7.167.54)
मृत्योरिव स्वसारं हि दीप्तां वह्निशिखामिव । सीमन्तमिव कुर्वन्तीं नभसोऽग्निसमप्रभाम् ॥
mṛtyoriva svasāraṃ hi dīptāṃ vahniśikhāmiva | sīmantamiva kurvantīṃ nabhaso'gnisamaprabhām
जो मृत्यु की बहन-सी थी, जलती हुई अग्निशिखा-सी, और आकाश में मानो माँग निकालती हुई अग्नि के तेज से दीप्त थी।
श्लोक 55 (7.167.55)
अप्राप्तामेव तां शक्तिं त्रिधा चिच्छेद कौरवः । पश्यतः सर्वलोकस्य भीमस्य च महात्मनः ॥
aprāptāmeva tāṃ śaktiṃ tridhā ciccheda kauravaḥ | paśyataḥ sarvalokasya bhīmasya ca mahātmanaḥ
उस शक्ति के अपने तक पहुँचने से पहले ही कौरव ने, सारे संसार और महात्मा भीम के देखते-देखते, उसके तीन टुकड़े कर दिए।
श्लोक 56 (7.167.56)
ततो भीमो महाराज गदां गुर्वीं महाप्रभाम् । चिक्षेपाविध्य वेगेन दुर्योधनरथं प्रति ॥
tato bhīmo mahārāja gadāṃ gurvīṃ mahāprabhām | cikṣepāvidhya vegena duryodhanarathaṃ prati
तब हे महाराज, भीम ने अपनी भारी, तेजस्वी गदा को घुमाकर वेग से दुर्योधन के रथ की ओर फेंका।
श्लोक 57 (7.167.57)
ततः सा सहसा वाहांस्तव पुत्रस्य संयुगे । सारथिं च गदा गुर्वी ममर्दास्य रथं पुनः ॥
tataḥ sā sahasā vāhāṃstava putrasya saṃyuge | sārathiṃ ca gadā gurvī mamardāsya rathaṃ punaḥ
उस भारी गदा ने रणभूमि में अचानक आपके पुत्र के घोड़ों और सारथि को कुचल डाला, और फिर उसके रथ को भी।
श्लोक 58 (7.167.58)
पुत्रस्तु तव राजेन्द्र भीमाद्भीतः प्रणश्य च । आरुरोह रथं चान्यं नन्दकस्य महात्मनः ॥
putrastu tava rājendra bhīmādbhītaḥ praṇaśya ca | āruroha rathaṃ cānyaṃ nandakasya mahātmanaḥ
हे राजेन्द्र, आपका पुत्र भीम से डरकर चुपके से हट गया और महात्मा नन्दक के दूसरे रथ पर जा चढ़ा।
श्लोक 59 (7.167.59)
ततो भीमो हतं मत्वा तव पुत्रं महारथम् । सिंहनादं महच्चक्रे तर्जयन्निशि कौरवान् ॥
tato bhīmo hataṃ matvā tava putraṃ mahāratham | siṃhanādaṃ mahaccakre tarjayanniśi kauravān
तब भीम ने आपके महारथी पुत्र को मरा हुआ समझकर रात में कौरवों को धमकाते हुए बड़ा सिंहनाद किया।
श्लोक 60 (7.167.60)
तावकाः सैनिकाश्चापि मेनिरे निहतं नृपम् । ततोऽतिचुक्रुशुः सर्वे ते हाहेति समन्ततः ॥
tāvakāḥ sainikāścāpi menire nihataṃ nṛpam | tato'ticukruśuḥ sarve te hāheti samantataḥ
आपके सैनिकों ने भी राजा को मरा हुआ मान लिया, और सब ओर "हाय! हाय!" कहकर चीख उठे।
श्लोक 61 (7.167.61)
तेषां तु निनदं श्रुत्वा त्रस्तानां सर्वयोधिनाम् । भीमसेनस्य नादं च श्रुत्वा राजन्महात्मनः ॥
teṣāṃ tu ninadaṃ śrutvā trastānāṃ sarvayodhinām | bhīmasenasya nādaṃ ca śrutvā rājanmahātmanaḥ
हे राजन्, भयभीत हुए उन सब योद्धाओं का कोलाहल और महात्मा भीमसेन की गर्जना सुनकर,
श्लोक 62 (7.167.62)
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा सुयोधनम् । अभ्यवर्तत वेगेन यत्र पार्थो वृकोदरः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā hataṃ matvā suyodhanam | abhyavartata vegena yatra pārtho vṛkodaraḥ
राजा युधिष्ठिर, सुयोधन को मरा हुआ मानकर, वेग से वहाँ पहुँचे जहाँ पृथापुत्र वृकोदर भीम थे।
श्लोक 63 (7.167.63)
पाञ्चालाः केकया मात्स्याः सृञ्जयाश्च विशाम्पते । सर्वोद्योगेनाभिजग्मुद्रोणमेव युयुत्सया ॥
pāñcālāḥ kekayā mātsyāḥ sṛñjayāśca viśāmpate | sarvodyogenābhijagmudroṇameva yuyutsayā
हे प्रजानाथ, पाञ्चाल, केकय, मत्स्य और सृञ्जय सब अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध की इच्छा से केवल द्रोण की ओर बढ़े।
श्लोक 64 (7.167.64)
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं द्रोणस्याथ परैः सह । घोरे तमसि मग्नानां निघ्नतामितरेतरम् ॥
tatrāsītsumahadyuddhaṃ droṇasyātha paraiḥ saha | ghore tamasi magnānāṃ nighnatāmitaretaram
वहाँ घने अँधेरे में डूबे हुए, एक-दूसरे को मारते योद्धाओं के साथ द्रोण का और उनके शत्रुओं का बड़ा भारी युद्ध हुआ।