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द्रोण पर्व · अध्याय 168

कर्ण द्वारा सहदेव की पराजय और उपेक्षा, शल्य से विराट की पराजय, अर्जुन द्वारा अलायुध का भगाया जाना

कर्ण सहदेव को रोककर उनके घोड़े, सारथि और एक-एक करके सारे शस्त्र नष्ट कर देता है, उनका उपहास करके उन्हें लौटा देता है, पर कुन्ती के वचन के स्मरण से उनके प्राण नहीं लेता; सहदेव जनमेजय के रथ पर चढ़ जाते हैं। शल्य विराट से लड़ता है, शतानीक को मार डालता है और विराट को मूर्च्छित कर देता है, जिससे पाण्डवों की सेना भाग खड़ी होती है। कृष्ण और अर्जुन शल्य की ओर बढ़ते हैं, पर राक्षस अलायुध भयंकर रथ में उनके सामने आता है; अर्जुन उसका ध्वज, सारथि, घोड़े, धनुष और तलवार नष्ट कर उसे भगा देते हैं, और कौरव-सेना के टूटने पर द्रोण की ओर बढ़ते हैं।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.168.1)

सहदेवमथायान्तं द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते । कर्णो वैकर्तनो युद्धे वारयामास भारत ॥

sahadevamathāyāntaṃ droṇaprepsuṃ viśāmpate | karṇo vaikartano yuddhe vārayāmāsa bhārata

हे राजन्, तब द्रोण तक पहुँचना चाहने वाले सहदेव को आते देख, हे भारत, वैकर्तन कर्ण ने युद्ध में उन्हें रोक लिया।

श्लोक 2 (7.168.2)

सहदेवस्तु राधेयं विद्ध्वा नवभिराशुगैः । पुनर्विव्याध दशभिर्विशिखैर्नतपर्वभिः ॥

sahadevastu rādheyaṃ viddhvā navabhirāśugaiḥ | punarvivyādha daśabhirviśikhairnataparvabhiḥ

सहदेव ने राधापुत्र को नौ वेगवान् बाणों से बींधा और फिर दस पैने नतपर्व बाणों से बींधा।

श्लोक 3 (7.168.3)

तं कर्णः प्रतिविव्याध शतेन नतपर्वणाम् । सज्यं चास्य धनुः शीघ्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् ॥

taṃ karṇaḥ prativivyādha śatena nataparvaṇām | sajyaṃ cāsya dhanuḥ śīghraṃ ciccheda laghuhastavat

कर्ण ने उन्हें सौ नतपर्व बाणों से बींधा और हल्के हाथ से उनका प्रत्यंचा चढ़ा धनुष तुरंत काट डाला।

श्लोक 4 (7.168.4)

ततोऽन्यद्धनुरादाय माद्रीपुत्रः प्रतापवान् । कर्णं विव्याध विंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tato'nyaddhanurādāya mādrīputraḥ pratāpavān | karṇaṃ vivyādha viṃśatyā tadadbhutamivābhavat

तब प्रतापी माद्रीपुत्र ने दूसरा धनुष लेकर कर्ण को बीस बाणों से बींधा; वह अद्भुत-सा लगा।

श्लोक 5 (7.168.5)

तस्य कर्णो हयान्हत्वा शरैः सन्नतपर्वभिः । सारथिं चास्य भल्लेन द्रुतं निन्ये यमक्षयम् ॥

tasya karṇo hayānhatvā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena drutaṃ ninye yamakṣayam

कर्ण ने अच्छी गाँठों वाले बाणों से उनके घोड़े मार डाले और एक भल्ल से उनके सारथि को शीघ्र यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 6 (7.168.6)

विरथः सहदेवस्तु खड्गं चर्म समाददे । तदप्यस्य शरैः कर्णो व्यधमत्प्रहसन्निव ॥

virathaḥ sahadevastu khaḍgaṃ carma samādade | tadapyasya śaraiḥ karṇo vyadhamatprahasanniva

रथहीन सहदेव ने तलवार और ढाल उठा ली; कर्ण ने मानो हँसते हुए उसे भी बाणों से तोड़ डाला।

श्लोक 7 (7.168.7)

अथ गुर्वीं महाघोरां हेमचित्रां महागदाम् । प्रेषयामास सङ्क्रुद्धो वैकर्तनरथं प्रति ॥

atha gurvīṃ mahāghorāṃ hemacitrāṃ mahāgadām | preṣayāmāsa saṅkruddho vaikartanarathaṃ prati

तब क्रोध से भरकर उन्होंने सोने से चित्रित एक भारी, अत्यन्त भयंकर विशाल गदा वैकर्तन के रथ की ओर फेंकी।

श्लोक 8 (7.168.8)

तामापतन्तीं सहसा सहदेवप्रचोदिताम् । व्यष्टम्भयच्छरैः कर्णो भूमौ चैनामपातयत् ॥

tāmāpatantīṃ sahasā sahadevapracoditām | vyaṣṭambhayaccharaiḥ karṇo bhūmau caināmapātayat

सहदेव की चलाई वह गदा अचानक आती देख कर्ण ने बाणों से उसे रोक दिया और भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 9 (7.168.9)

गदां विनिहतां दृष्ट्वा सहदेवस्त्वरान्वितः । शक्तिं चिक्षेप कर्णाय तामप्यस्याच्छिनच्छरैः ॥

gadāṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā sahadevastvarānvitaḥ | śaktiṃ cikṣepa karṇāya tāmapyasyācchinaccharaiḥ

गदा को गिरी हुई देख सहदेव ने शीघ्रता से कर्ण पर शक्ति फेंकी; कर्ण ने उसे भी बाणों से काट डाला।

श्लोक 10 (7.168.10)

ससम्भ्रमं ततस्तूर्णमवप्लुत्य रथोत्तमात् । सहदेवो महाराज दृष्ट्वा कर्णं व्यवस्थितम् ॥

sasambhramaṃ tatastūrṇamavaplutya rathottamāt | sahadevo mahārāja dṛṣṭvā karṇaṃ vyavasthitam

हे महाराज, तब सहदेव घबराहट में अपने श्रेष्ठ रथ से झट कूद पड़े, यह देखकर कि कर्ण डटा हुआ है,

श्लोक 11 (7.168.11)

रथचक्रं प्रगृह्याजौ मुमोचाधिरथं प्रति । तदापतद्वै सहसा कालचक्रमिवोद्यतम् । शरैरनेकसाहस्रैराच्छिनत्सूतनन्दनः ॥

rathacakraṃ pragṛhyājau mumocādhirathaṃ prati | tadāpatadvai sahasā kālacakramivodyatam | śarairanekasāhasrairācchinatsūtanandanaḥ

और रथ का पहिया उठाकर युद्ध में अधिरथ के पुत्र पर फेंका। कालचक्र के समान उठे उस आते हुए पहिये को सूतपुत्र ने हजारों बाणों से काट डाला।

श्लोक 12 (7.168.12)

तस्मिंस्तु निहते चक्रे सूतजेन महात्मना । ईषादण्डकयोक्त्रांश्च युगानि विविधानि च ॥

tasmiṃstu nihate cakre sūtajena mahātmanā | īṣādaṇḍakayoktrāṃśca yugāni vividhāni ca

महात्मा सूतपुत्र के द्वारा उस पहिये के नष्ट कर दिए जाने पर सहदेव ने रथ के ईषादण्ड, जोतने की रस्सियाँ और तरह-तरह के जुए उठाए,

श्लोक 13 (7.168.13)

हस्त्यङ्गानि तथाश्वांश्च मृतांश्च पुरुषान्बहून् । चिक्षेप कर्णमुद्दिश्य कर्णस्तान्व्यधमच्छरैः ॥

hastyaṅgāni tathāśvāṃśca mṛtāṃśca puruṣānbahūn | cikṣepa karṇamuddiśya karṇastānvyadhamaccharaiḥ

हाथियों के अंग, घोड़े और बहुत-से मरे हुए मनुष्य कर्ण की ओर फेंके; कर्ण ने उन सबको बाणों से तोड़ डाला।

श्लोक 14 (7.168.14)

स निरायुधमात्मानं ज्ञात्वा माद्रवतीसुतः । वार्यमाणस्तु विशिखैः सहदेवो रणं जहौ ॥

sa nirāyudhamātmānaṃ jñātvā mādravatīsutaḥ | vāryamāṇastu viśikhaiḥ sahadevo raṇaṃ jahau

अपने को निरस्त्र जानकर माद्रीपुत्र सहदेव बाणों से रोके जाने पर रणभूमि छोड़ गए।

श्लोक 15 (7.168.15)

तमभिद्रुत्य राधेयो मुहूर्ताद्भरतर्षभ । अब्रवीत्प्रहसन्वाक्यं सहदेवं विशाम्पते ॥

tamabhidrutya rādheyo muhūrtādbharatarṣabha | abravītprahasanvākyaṃ sahadevaṃ viśāmpate

हे भरतश्रेष्ठ, राधापुत्र ने क्षण भर में उनका पीछा करके हँसते हुए सहदेव से कहा, हे प्रजानाथ।

कर्ण उवाच

श्लोक 16 (7.168.16)

मा युध्यस्व रणेऽधीर विशिष्टै रथिभिः सह ॥

mā yudhyasva raṇe'dhīra viśiṣṭai rathibhiḥ saha

"अरे अधीर, रण में श्रेष्ठ रथियों के साथ मत लड़ो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (7.168.17)

सदृशैर्युध्य माद्रेय वचो मे मा विशङ्किथाः । अथैनं धनुषोग्रेण तुदन्भूयोऽब्रवीद्वचः ॥

sadṛśairyudhya mādreya vaco me mā viśaṅkithāḥ | athainaṃ dhanuṣogreṇa tudanbhūyo'bravīdvacaḥ

हे माद्रीपुत्र, अपने बराबर वालों से लड़ो; मेरी बात पर शंका मत करो।" फिर अपने उग्र धनुष से उन्हें कोंचते हुए उसने फिर कहा —

कर्ण उवाच

श्लोक 18 (7.168.18)

एषोऽर्जुनो रणे तूर्णं युध्यते कुरुभिः सह । तत्र गच्छस्व माद्रेय गृहं वा यदि मन्यसे ॥

eṣo'rjuno raṇe tūrṇaṃ yudhyate kurubhiḥ saha | tatra gacchasva mādreya gṛhaṃ vā yadi manyase

"वह अर्जुन रणभूमि में कौरवों से तेज़ी से लड़ रहा है। हे माद्रीपुत्र, वहाँ जाओ, या यदि ठीक समझो तो घर लौट जाओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 19 (7.168.19)

एवमुक्त्वा तु तं कर्णो रथेन रथिनां वरः । प्रायात्पाञ्चालपाण्डूनां सैन्यानि प्रदहन्निव ॥

evamuktvā tu taṃ karṇo rathena rathināṃ varaḥ | prāyātpāñcālapāṇḍūnāṃ sainyāni pradahanniva

ऐसा कहकर रथियों में श्रेष्ठ कर्ण अपने रथ से पाञ्चालों और पाण्डवों की सेनाओं को मानो जलाता हुआ आगे बढ़ गया।

श्लोक 20 (7.168.20)

वधं प्राप्तं तु माद्रेयं नावधीत्समरेऽरिहा । कुन्त्याःस्मृत्वा वचो राजन्सत्यसन्धो महायशाः ॥

vadhaṃ prāptaṃ tu mādreyaṃ nāvadhītsamare'rihā | kuntyāḥsmṛtvā vaco rājansatyasandho mahāyaśāḥ

वध के योग्य हो चुके माद्रीपुत्र को भी उस शत्रुनाशक, सत्यप्रतिज्ञ, महायशस्वी कर्ण ने कुन्ती का वचन स्मरण कर रण में नहीं मारा।

श्लोक 21 (7.168.21)

सहदेवस्ततो राजन्विमनाः शरपीडितः । कर्णवाक्शरतप्तश्च जीवितान्निरविद्यत ॥

sahadevastato rājanvimanāḥ śarapīḍitaḥ | karṇavākśarataptaśca jīvitānniravidyata

तब हे राजन्, सहदेव उदास हो गए; बाणों से पीड़ित और कर्ण के वचन-बाणों से तपे हुए उन्हें अपने जीवन से विरक्ति हो गई।

श्लोक 22 (7.168.22)

आरुरोह रथं चापि पाञ्चाल्यस्य महात्मनः । जनमेजयस्य समरे त्वरायुक्तो महारथः ॥

āruroha rathaṃ cāpi pāñcālyasya mahātmanaḥ | janamejayasya samare tvarāyukto mahārathaḥ

फिर वे महारथी उतावले होकर रण में महात्मा पाञ्चाल जनमेजय के रथ पर जा चढ़े।

श्लोक 23 (7.168.23)

विराटं सहसेनं तु द्रोणार्थे द्रुतमागतम् । मद्रराजः शरौघेण च्छादयामास धन्विनम् ॥

virāṭaṃ sahasenaṃ tu droṇārthe drutamāgatam | madrarājaḥ śaraugheṇa cchādayāmāsa dhanvinam

इधर द्रोण के लिए सेना सहित शीघ्र आए धनुर्धर विराट को मद्रराज शल्य ने बाणों की बाढ़ से ढक दिया।

श्लोक 24 (7.168.24)

तयोः समभवद्युद्धं समरे दृढधन्विनोः । यादृशं ह्यभवद्राजञ्जम्भवासवयोः पुरा ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ samare dṛḍhadhanvinoḥ | yādṛśaṃ hyabhavadrājañjambhavāsavayoḥ purā

उन दोनों दृढ़ धनुर्धरों के बीच रण में वैसा ही युद्ध हुआ, जैसा पहले जम्भ और इन्द्र के बीच हुआ था।

श्लोक 25 (7.168.25)

मद्रराजो महाराज विराटं वाहिनीपतिम् । आजघ्ने त्वरितस्तूर्णं शतेन नतपर्वणाम् ॥

madrarājo mahārāja virāṭaṃ vāhinīpatim | ājaghne tvaritastūrṇaṃ śatena nataparvaṇām

हे महाराज, मद्रराज ने सेनापति विराट को तुरंत सौ नतपर्व बाणों से मारा।

श्लोक 26 (7.168.26)

प्रतिविव्याध तं राजन्नवभिर्निशितैः शरैः । पुनश्चैनं त्रिसप्तत्या भूयश्चैव शतेन तु ॥

prativivyādha taṃ rājannavabhirniśitaiḥ śaraiḥ | punaścainaṃ trisaptatyā bhūyaścaiva śatena tu

हे राजन्, विराट ने उसे नौ तीखे बाणों से बींधा, फिर तिहत्तर से, और फिर एक सौ से।

श्लोक 27 (7.168.27)

तस्य मद्राधिपो हत्वा चतुरो रथवाजिनः । सूतं ध्वजं च समरे शराभ्यां सन्न्यपातयत् ॥

tasya madrādhipo hatvā caturo rathavājinaḥ | sūtaṃ dhvajaṃ ca samare śarābhyāṃ sannyapātayat

मद्रराज ने उनके चारों रथ-घोड़ों को मारकर दो बाणों से सारथि और ध्वज को गिरा दिया।

श्लोक 28 (7.168.28)

हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य महारथः । तस्थौ विष्फारयंश्चापं विमुञ्चंश्च शिताञ्छरान् ॥

hatāśvāttu rathāttūrṇamavaplutya mahārathaḥ | tasthau viṣphārayaṃścāpaṃ vimuñcaṃśca śitāñcharān

घोड़ों के मर जाने पर वह महारथी रथ से झट कूदकर धनुष की टंकार करता और तीखे बाण छोड़ता हुआ खड़ा रहा।

श्लोक 29 (7.168.29)

शतानीकस्ततो दृष्ट्वा भ्रातरं हतवाहनम् । रथेनाभ्यपतत्तूर्णं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥

śatānīkastato dṛṣṭvā bhrātaraṃ hatavāhanam | rathenābhyapatattūrṇaṃ sarvalokasya paśyataḥ

तब अपने भाई के रथ को घोड़ों से रहित देख शतानीक सबके देखते-देखते तेज़ी से रथ पर चढ़कर उधर लपका।

श्लोक 30 (7.168.30)

शतानीकमथायान्तं मद्रराजो महामृधे । विशिखैर्बहुभिर्विद्ध्वा ततो निन्ये यमक्षयम् ॥

śatānīkamathāyāntaṃ madrarājo mahāmṛdhe | viśikhairbahubhirviddhvā tato ninye yamakṣayam

उस महायुद्ध में आते हुए शतानीक को मद्रराज ने बहुत-से बाणों से बींधकर यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 31 (7.168.31)

तस्मिंस्तु निहते वीरे विराटो रथसत्तमः । आरुरोह रथं तूर्णं तमेव ध्वजमालिनम् ॥

tasmiṃstu nihate vīre virāṭo rathasattamaḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ tameva dhvajamālinam

उस वीर के मारे जाने पर रथियों में श्रेष्ठ विराट शीघ्र उसी ध्वजमालाओं वाले रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 32 (7.168.32)

ततो विष्फार्य नयने क्रोधाद्द्विगुणविक्रमः । मद्रराजरथं तूर्णं छादयामास पत्रिभिः ॥

tato viṣphārya nayane krodhāddviguṇavikramaḥ | madrarājarathaṃ tūrṇaṃ chādayāmāsa patribhiḥ

फिर क्रोध से आँखें फाड़कर, दुगुने पराक्रम के साथ, उन्होंने मद्रराज के रथ को शीघ्र बाणों से ढक दिया।

श्लोक 33 (7.168.33)

ततो मद्राधिपः क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा । आजघानोरसि दृढं विराटं वाहिनीपतिम् ॥

tato madrādhipaḥ kruddhaḥ śareṇānataparvaṇā | ājaghānorasi dṛḍhaṃ virāṭaṃ vāhinīpatim

तब क्रुद्ध मद्रराज ने एक नतपर्व बाण से सेनापति विराट की छाती पर कसकर प्रहार किया।

श्लोक 34 (7.168.34)

सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् । कश्मलं चाविशत्तीव्रं विराटो भरतर्षभ । सारथिस्तमपोवाह समरे शरविक्षतम् ॥

so'tividdho mahārāja rathopastha upāviśat | kaśmalaṃ cāviśattīvraṃ virāṭo bharatarṣabha | sārathistamapovāha samare śaravikṣatam

हे महाराज, गहरी चोट खाकर विराट रथ में बैठ गए; हे भरतश्रेष्ठ, उन्हें गहरी मूर्च्छा ने घेर लिया, और बाणों से घायल उन्हें सारथि रणभूमि से हटा ले गया।

श्लोक 35 (7.168.35)

ततः सा महती सेना प्राद्रवन्निशि भारत । वध्यमाना शरशतैः शल्येनाहवशोभिना ॥

tataḥ sā mahatī senā prādravanniśi bhārata | vadhyamānā śaraśataiḥ śalyenāhavaśobhinā

हे भारत, तब रण में शोभा पाने वाले शल्य के सैकड़ों बाणों से मारी जाती हुई वह विशाल सेना रात में भाग खड़ी हुई।

श्लोक 36 (7.168.36)

तां दृष्ट्वा विद्रुतां सेनां वासुदेवधनञ्जयौ । प्रयातौ तत्र राजेन्द्र यत्र शल्यो व्यवस्थितः ॥

tāṃ dṛṣṭvā vidrutāṃ senāṃ vāsudevadhanañjayau | prayātau tatra rājendra yatra śalyo vyavasthitaḥ

उस सेना को भागती देख हे राजेन्द्र, वासुदेव और धनंजय वहाँ गए जहाँ शल्य डटा हुआ था।

श्लोक 37 (7.168.37)

तौ तु प्रत्युद्ययौ राजन्राक्षसेन्द्रो ह्यलायुधः । अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय प्रवरं रथम् ॥

tau tu pratyudyayau rājanrākṣasendro hyalāyudhaḥ | aṣṭacakrasamāyuktamāsthāya pravaraṃ ratham

हे राजन्, उन दोनों के सामने आठ पहियों वाले उत्तम रथ पर चढ़कर राक्षसराज अलायुध आया,

श्लोक 38 (7.168.38)

तुरङ्गममुखैर्युक्तं पिशाचैर्घोरदर्शनैः । लोहितार्द्रपताकं तं रक्तमाल्यविभूषितम् । कार्ष्णायसमयं घोरमृक्षचर्मसमावृतम् ॥

turaṅgamamukhairyuktaṃ piśācairghoradarśanaiḥ | lohitārdrapatākaṃ taṃ raktamālyavibhūṣitam | kārṣṇāyasamayaṃ ghoramṛkṣacarmasamāvṛtam

जो घोड़े के मुख वाले भयंकर पिशाचों से जुता था, जिसकी पताका रक्त से भीगी थी, जो लाल मालाओं से सजा, काले लोहे का बना, भयानक और रीछ की खाल से ढका था;

श्लोक 39 (7.168.39)

रौद्रेण चित्रपक्षेण विवृताक्षेण कूजता । ध्वजेनोच्छ्रितदण्डेन गृध्रराजेन राजता । स बभौ राक्षसो राजन्भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥

raudreṇa citrapakṣeṇa vivṛtākṣeṇa kūjatā | dhvajenocchritadaṇḍena gṛdhrarājena rājatā | sa babhau rākṣaso rājanbhinnāñjanacayopamaḥ

उसकी ऊँचे दण्ड वाली ध्वजा पर रंग-बिरंगे पंखों वाला, खुली आँखों वाला, चीखता हुआ रौद्र गृध्रराज चमक रहा था; हे राजन्, वह राक्षस कुचले हुए अंजन के ढेर-सा शोभित हुआ।

श्लोक 40 (7.168.40)

रुरोधार्जुनमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् । किरन्बाणगणान्राजञ्शतशोऽर्जुनमूर्धनि ॥

rurodhārjunamāyāntaṃ prabhañjanamivādrirāṭ | kiranbāṇagaṇānrājañśataśo'rjunamūrdhani

वह आते हुए अर्जुन को वैसे ही रोकने लगा जैसे पर्वतराज आँधी को रोकता है, और हे राजन्, अर्जुन के सिर पर सैकड़ों बाणों के समूह बरसाने लगा।

श्लोक 41 (7.168.41)

अतितीव्रं महद्युद्धं नरराक्षसयोस्तदा । द्रष्टॄणां प्रीतिजननं सर्वेषां तत्र भारत । गृध्रकाकबलोलूककङ्कगोमायुहर्षणम् ॥

atitīvraṃ mahadyuddhaṃ nararākṣasayostadā | draṣṭṝṇāṃ prītijananaṃ sarveṣāṃ tatra bhārata | gṛdhrakākabalolūkakaṅkagomāyuharṣaṇam

तब मनुष्य और राक्षस के बीच बड़ा ही तीव्र और भारी युद्ध हुआ, हे भारत, जो वहाँ के सब देखने वालों को आनन्द देने वाला था और गिद्धों, कौओं, सारसों, उल्लुओं, कंक पक्षियों और सियारों को हर्षित करने वाला था।

श्लोक 42 (7.168.42)

तमर्जुनः शतेनैव पत्रिणां समताडयत् । नवभिश्च शितैर्बाणैर्ध्वजं चिच्छेद भारत ॥

tamarjunaḥ śatenaiva patriṇāṃ samatāḍayat | navabhiśca śitairbāṇairdhvajaṃ ciccheda bhārata

अर्जुन ने उसे सौ बाणों से मारा और, हे भारत, नौ तीखे बाणों से उसका ध्वज काट दिया।

श्लोक 43 (7.168.43)

सारथिं च त्रिभिर्बाणैस्त्रिभिरेव त्रिवेणुकम् । धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥

sārathiṃ ca tribhirbāṇaistribhireva triveṇukam | dhanurekena ciccheda caturbhiścaturo hayān

तीन बाणों से सारथि को, तीन से त्रिवेणुक को, एक से धनुष को और चार से उसके चारों घोड़ों को काट डाला।

श्लोक 44 (7.168.44)

पुनः सज्यं कृतं चापं तदप्यस्य द्विधाऽच्छिनत् । विरथस्योद्यतं खड्गं शरेणास्य द्विधाऽकरोत् ॥

punaḥ sajyaṃ kṛtaṃ cāpaṃ tadapyasya dvidhā'cchinat | virathasyodyataṃ khaḍgaṃ śareṇāsya dvidhā'karot

उसने फिर प्रत्यंचा चढ़ाया हुआ धनुष उठाया, तो अर्जुन ने उसे भी दो टुकड़े कर दिया; और रथहीन हुए उसकी उठी तलवार को भी एक बाण से दो खण्ड कर दिया।

श्लोक 45 (7.168.45)

अथैनं निशितैर्बाणैश्चतुर्भिर्भरतर्षभ । पार्थोऽविध्यद्राक्षसेन्द्रं स विद्धः प्राद्रवद्भयात् ॥

athainaṃ niśitairbāṇaiścaturbhirbharatarṣabha | pārtho'vidhyadrākṣasendraṃ sa viddhaḥ prādravadbhayāt

हे भरतश्रेष्ठ, फिर पार्थ ने चार पैने बाणों से राक्षसराज को बींधा, और घायल होकर वह भय से भाग गया।

श्लोक 46 (7.168.46)

तं विजित्यार्जुनस्तूर्णं द्रोणान्तिकमुपाययौ । किरञ्शरगणान्राजन्नरवारणवाजिषु ॥

taṃ vijityārjunastūrṇaṃ droṇāntikamupāyayau | kirañśaragaṇānrājannaravāraṇavājiṣu

उसे जीतकर अर्जुन शीघ्र द्रोण के निकट गए, हे राजन्, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों पर बाणों के समूह बरसाते हुए।

श्लोक 47 (7.168.47)

वध्यमाना महाराज पाण्डवेन यशस्विना । सैनिका न्यपतन्नुर्व्यां वातनुन्ना इव द्रुमाः ॥

vadhyamānā mahārāja pāṇḍavena yaśasvinā | sainikā nyapatannurvyāṃ vātanunnā iva drumāḥ

हे महाराज, यशस्वी पाण्डव के हाथों मारे जाते सैनिक आँधी से झूमते वृक्षों की तरह धरती पर गिरने लगे।

श्लोक 48 (7.168.48)

तेषु तूत्साद्यमानेषु फल्गुनेन महात्मना । सम्प्राद्रवद्बलं सर्वं पुत्राणां ते विशाम्पते ॥

teṣu tūtsādyamāneṣu phalgunena mahātmanā | samprādravadbalaṃ sarvaṃ putrāṇāṃ te viśāmpate

हे प्रजानाथ, महात्मा फल्गुन के द्वारा उनके इस तरह उखाड़े जाने पर आपके पुत्रों की सारी सेना भाग खड़ी हुई।

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