द्रोण पर्व · अध्याय 169
रात्रि के द्वन्द्व-युद्ध: शतानीक, वृषसेन और प्रतिविन्ध्य
आधी रात के युद्ध में नकुल का पुत्र शतानीक चित्रसेन का कवच उतार देता है और उसके रथ को नष्ट कर देता है, तब चित्रसेन कृतवर्मा के रथ पर चढ़ जाता है। कर्णपुत्र वृषसेन द्रुपद से लड़ता है, बाण से उन्हें मूर्च्छित कर देता है और सोमकों को भगा देता है, जो दीपों से जगमगाते रणक्षेत्र में भाग खड़े होते हैं। फिर वृषसेन युधिष्ठिर की ओर बढ़ता है, जबकि दुःशासन प्रतिविन्ध्य से भिड़कर उसके रथ और धनुष को नष्ट कर देता है, और कौरव-योद्धा दुःशासन को घेरकर आगे बढ़ते हैं तथा युद्ध और भयंकर हो उठता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.169.1)
शतानीकं शरैस्तूर्णं निर्दहन्तं चमूं तव । चित्रसेनस्तव सुतो वारयामास भारत ॥
śatānīkaṃ śaraistūrṇaṃ nirdahantaṃ camūṃ tava | citrasenastava suto vārayāmāsa bhārata
हे भारत, शतानीक अपने बाणों से तुम्हारी सेना को शीघ्रता से भस्म कर रहा था; तब तुम्हारे पुत्र चित्रसेन ने उसे रोक लिया।
श्लोक 2 (7.169.2)
नाकुलिश्चित्रसेनं तु विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः । स तु तं प्रतिविव्याध दशभिर्निशितैः शरैः ॥
nākuliścitrasenaṃ tu viddhvā pañcabhirāśugaiḥ | sa tu taṃ prativivyādha daśabhirniśitaiḥ śaraiḥ
नकुल-पुत्र शतानीक ने पाँच तीव्र बाणों से चित्रसेन को बींध दिया; और चित्रसेन ने भी बदले में दस तीखे बाणों से उसे घायल किया।
श्लोक 3 (7.169.3)
चित्रसेनो महाराज शतानीकं पुनर्युधि । नवभिर्निशितैर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥
citraseno mahārāja śatānīkaṃ punaryudhi | navabhirniśitairbāṇairājaghāna stanāntare
हे महाराज, चित्रसेन ने फिर युद्ध में नौ तीखे बाणों से शतानीक की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 4 (7.169.4)
नाकुलिस्तस्य विशिखैर्वर्म सन्नतपर्वभिः । गात्रात्सञ्चावयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥
nākulistasya viśikhairvarma sannataparvabhiḥ | gātrātsañcāvayāmāsa tadadbhutamivābhavat
नकुल-पुत्र ने अपने चिकनी गाँठों वाले बाणों से चित्रसेन के शरीर से कवच गिरा दिया, और यह एक अद्भुत दृश्य था।
श्लोक 5 (7.169.5)
सोपेतवर्मा पुत्रस्ते विरराज भृशं नृप । उत्सृज्य काले राजेन्द्र निर्मोकमिव पन्नगः ॥
sopetavarmā putraste virarāja bhṛśaṃ nṛpa | utsṛjya kāle rājendra nirmokamiva pannagaḥ
हे राजन्, कवच उतर जाने पर तुम्हारा पुत्र बहुत ही दीप्त दिखाई देने लगा, जैसे समय आने पर केंचुली छोड़ देने वाला सर्प, हे राजेन्द्र।
श्लोक 6 (7.169.6)
ततोऽस्य निशितैर्बाणैर्ध्वजं चिच्छेद नाकुलिः । धनुश्चैव महाराज यतमानस्य संयुगे ॥
tato'sya niśitairbāṇairdhvajaṃ ciccheda nākuliḥ | dhanuścaiva mahārāja yatamānasya saṃyuge
तब नकुल-पुत्र ने तीखे बाणों से उसकी ध्वजा काट डाली, और हे महाराज, युद्ध में जूझते हुए उसके धनुष को भी काट दिया।
श्लोक 7 (7.169.7)
स च्छिन्नधन्वा समरे विवर्मा च महारथः । धनुरन्यन्महाराज जग्राहारिविदारणम् ॥
sa cchinnadhanvā samare vivarmā ca mahārathaḥ | dhanuranyanmahārāja jagrāhārividāraṇam
धनुष कट जाने और कवच न रहने पर भी उस महारथी ने, हे महाराज, शत्रुओं को चीर डालने वाला दूसरा धनुष उठा लिया।
श्लोक 8 (7.169.8)
ततस्तूर्णं चित्रसेनो नाकुलिं नवभिः शरैः । विव्याध समरे क्रुद्धो भरतानां महारथः ॥
tatastūrṇaṃ citraseno nākuliṃ navabhiḥ śaraiḥ | vivyādha samare kruddho bharatānāṃ mahārathaḥ
तब भरतवंशियों के महारथी चित्रसेन ने क्रोध में युद्ध के बीच शीघ्र ही नकुल-पुत्र को नौ बाणों से बींध दिया।
श्लोक 9 (7.169.9)
शतानीकोऽथ सङ्क्रुद्धश्चित्रसेनस्य मारिष । जघान चतुरो वाहान्सारथिं च नरोत्तमः ॥
śatānīko'tha saṅkruddhaścitrasenasya māriṣa | jaghāna caturo vāhānsārathiṃ ca narottamaḥ
तब शतानीक ने अत्यन्त कुपित होकर, हे मान्यवर, नरश्रेष्ठ चित्रसेन के चारों घोड़ों और सारथि को मार डाला।
श्लोक 10 (7.169.10)
अवप्लुत्य रथात्तस्माच्चित्रसेनो महारथः । नाकुलिं पञ्चविंशत्या शराणामार्दयद्बली ॥
avaplutya rathāttasmāccitraseno mahārathaḥ | nākuliṃ pañcaviṃśatyā śarāṇāmārdayadbalī
उस रथ से कूदकर बलवान् महारथी चित्रसेन ने पच्चीस बाणों से नकुल-पुत्र को पीड़ित किया।
श्लोक 11 (7.169.11)
तस्य तत्कुर्वतः कर्म नकुलस्य सुतो रणे । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद चापं रत्नविभूषितम् ॥
tasya tatkurvataḥ karma nakulasya suto raṇe | ardhacandreṇa ciccheda cāpaṃ ratnavibhūṣitam
जब वह ऐसा कर रहा था, तब नकुल के पुत्र ने युद्ध में अर्धचन्द्र बाण से उसका रत्नजटित धनुष काट डाला।
श्लोक 12 (7.169.12)
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । आरुरोह रथं तूर्णं हार्दिक्यस्य महात्मनः ॥
sa cchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ hārdikyasya mahātmanaḥ
धनुष कट जाने, रथ, घोड़े और सारथि के नष्ट हो जाने पर वह शीघ्र ही महात्मा हार्दिक्य (कृतवर्मा) के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 13 (7.169.13)
द्रुपदं तु सहानीकं द्रोणप्रेप्सुं महारथम् । वृषसेनोऽभ्ययात्तूर्णं किरञ्शरशतैस्तदा ॥
drupadaṃ tu sahānīkaṃ droṇaprepsuṃ mahāratham | vṛṣaseno'bhyayāttūrṇaṃ kirañśaraśataistadā
उधर वृषसेन सैकड़ों बाण बरसाता हुआ, सेना सहित द्रोण तक पहुँचने को उत्सुक महारथी द्रुपद की ओर शीघ्र बढ़ा।
श्लोक 14 (7.169.14)
यज्ञसेनस्तु समरे कर्णपुत्रं महारथम् । षष्ट्या शराणां विव्याध बाह्वोरुरसि चानघ ॥
yajñasenastu samare karṇaputraṃ mahāratham | ṣaṣṭyā śarāṇāṃ vivyādha bāhvorurasi cānagha
हे निष्पाप, यज्ञसेन (द्रुपद) ने युद्ध में महारथी कर्णपुत्र को साठ बाणों से भुजाओं और छाती में बींध दिया।
श्लोक 15 (7.169.15)
वृषसेनस्तु सङ्क्रुद्धो यज्ञसेनं रथे स्थितम् । बहुभिः सायकैस्तीक्ष्णैराजघान स्तनान्तरे ॥
vṛṣasenastu saṅkruddho yajñasenaṃ rathe sthitam | bahubhiḥ sāyakaistīkṣṇairājaghāna stanāntare
वृषसेन ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर रथ पर खड़े यज्ञसेन की छाती में बहुत-से तीखे बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 16 (7.169.16)
तावुभौ शरनुन्नाङ्गौ शरकण्टकितौ रणे । व्यभ्राजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव ॥
tāvubhau śaranunnāṅgau śarakaṇṭakitau raṇe | vyabhrājetāṃ mahārāja śvāvidhau śalalairiva
हे महाराज, बाणों से बिंधे अंगों वाले और रणभूमि में बाणों के काँटों से भरे वे दोनों योद्धा काँटों से भरे दो साही के समान शोभित हुए।
श्लोक 17 (7.169.17)
रुक्मपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे ॥
rukmapuṅkhaiḥ prasannāgraiḥ śaraiśchinnatanucchadau | rudhiraughapariklinnau vyabhrājetāṃ mahāmṛdhe
सुनहरे पंखों और चमकती नोकों वाले बाणों से उनके कवच कट गए थे; खून की धाराओं से भीगे हुए वे दोनों उस महायुद्ध में शोभित हुए।
श्लोक 18 (7.169.18)
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविवाद्भुतौ । किंशुकाविव चोत्फुल्लौ व्यकाशेतां रणाजिरे ॥
tapanīyanibhau citrau kalpavṛkṣāvivādbhutau | kiṃśukāviva cotphullau vyakāśetāṃ raṇājire
तपाए हुए सोने के समान चमकते, विचित्र और अद्भुत, दो कल्पवृक्षों तथा खिले हुए दो किंशुक (पलाश) वृक्षों की तरह वे दोनों रणभूमि में सुशोभित हुए।
श्लोक 19 (7.169.19)
वृषसेनस्ततो राजन्द्रुपदं नवभिः शरैः । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥
vṛṣasenastato rājandrupadaṃ navabhiḥ śaraiḥ | viddhvā vivyādha saptatyā punaranyaistribhistribhiḥ
हे राजन्, तब वृषसेन ने द्रुपद को नौ बाणों से बींधकर फिर सत्तर बाणों से घायल किया, और फिर तीन-तीन अन्य बाणों से भी बींधा।
श्लोक 20 (7.169.20)
ततः शरसहस्राणि विमुञ्चन्विबभौ तदा । कर्णपुत्रो महाराज वर्षमाण इवाम्बुदः ॥
tataḥ śarasahasrāṇi vimuñcanvibabhau tadā | karṇaputro mahārāja varṣamāṇa ivāmbudaḥ
तब हज़ारों बाण छोड़ता हुआ कर्णपुत्र, हे महाराज, वर्षा करते मेघ के समान शोभित हुआ।
श्लोक 21 (7.169.21)
द्रुपदस्तु ततः क्रुद्धो वृषसेनस्य कार्मुकम् । द्विधा चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥
drupadastu tataḥ kruddho vṛṣasenasya kārmukam | dvidhā ciccheda bhallena pītena niśitena ca
तब कुपित द्रुपद ने तीक्ष्ण और चमकदार भल्ल से वृषसेन के धनुष के दो टुकड़े कर दिए।
श्लोक 22 (7.169.22)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय रुक्मबद्धं नवं दृढम् । तूणादाकृष्य विमलं भल्लं पीतं शितं दृढम् ॥
so'nyatkārmukamādāya rukmabaddhaṃ navaṃ dṛḍham | tūṇādākṛṣya vimalaṃ bhallaṃ pītaṃ śitaṃ dṛḍham
उसने सोने से मढ़ा हुआ दूसरा नया और मज़बूत धनुष उठाया, और तरकश से एक निर्मल, तीखा और दृढ़ भल्ल खींचकर,
श्लोक 23 (7.169.23)
कार्मुके योजयित्वा तं द्रुपदं सन्निरीक्ष्य च । आकर्णपूर्णं मुमुचे त्रासयन्सर्वसोमकान् ॥
kārmuke yojayitvā taṃ drupadaṃ sannirīkṣya ca | ākarṇapūrṇaṃ mumuce trāsayansarvasomakān
उसे धनुष पर चढ़ाया, द्रुपद को लक्ष्य करके कान तक खींचकर छोड़ा, जिससे सभी सोमक भयभीत हो उठे।
श्लोक 24 (7.169.24)
हृदयं तस्य भित्त्वा च जगाम वसुधातलम् । कश्मलं प्राविशद्राजा वृषसेनशराहतः ॥
hṛdayaṃ tasya bhittvā ca jagāma vasudhātalam | kaśmalaṃ prāviśadrājā vṛṣasenaśarāhataḥ
वह बाण द्रुपद का हृदय भेदकर धरती में जा धँसा, और वृषसेन के बाण से आहत राजा द्रुपद मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 25 (7.169.25)
सारथिस्तमपोवाह स्मरन्सारथिचेष्टितम् । तस्मिन्प्रभग्ने राजेन्द्र पाञ्चालानां महारथे ॥
sārathistamapovāha smaransārathiceṣṭitam | tasminprabhagne rājendra pāñcālānāṃ mahārathe
सारथि के कर्तव्य को स्मरण करते हुए उनका सारथि उन्हें रणभूमि से हटा ले गया। हे राजेन्द्र, पांचालों के उस महारथी के इस प्रकार भग्न हो जाने पर,
श्लोक 26 (7.169.26)
ततस्तु द्रुपदानीकं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् । सम्प्राद्रवद्रणाद्राजन्निशीथे भैरवे सति ॥
tatastu drupadānīkaṃ śaraiśchinnatanucchadam | samprādravadraṇādrājanniśīthe bhairave sati
हे राजन्, उस भयानक आधी रात में बाणों से कवच कटी हुई द्रुपद की सेना युद्ध से भाग निकली।
श्लोक 27 (7.169.27)
प्रदीपैरपरित्यक्तैर्ज्वलद्भिस्तैः समन्ततः । व्यराजद्वसुधा तत्र वीताभ्रा द्यौरिव ग्रहैः ॥
pradīpairaparityaktairjvaladbhistaiḥ samantataḥ | vyarājadvasudhā tatra vītābhrā dyauriva grahaiḥ
चारों ओर पड़े हुए जलते दीपों से वहाँ की भूमि ग्रहों से जगमगाते बादल-रहित आकाश की तरह शोभित हो उठी।
श्लोक 28 (7.169.28)
तथाङ्गदैर्निपतितैर्व्यराजत वसुन्धरा । प्रावृट्काले महाराज विद्युद्भिरिव तोयदः ॥
tathāṅgadairnipatitairvyarājata vasundharā | prāvṛṭkāle mahārāja vidyudbhiriva toyadaḥ
हे महाराज, गिरे हुए भुजबन्धों से भूमि वैसी ही शोभित हुई जैसे वर्षा ऋतु में बिजलियों से भरा मेघ।
श्लोक 29 (7.169.29)
ततः कर्णसुतात्त्रस्ताः सोमका विप्रदुद्रुवुः । यथेन्द्रभयवित्रस्ता दानवास्तारकामये ॥
tataḥ karṇasutāttrastāḥ somakā vipradudruvuḥ | yathendrabhayavitrastā dānavāstārakāmaye
कर्णपुत्र से डरे हुए सोमक चारों ओर भाग खड़े हुए, जैसे तारकामय संग्राम में इन्द्र के भय से त्रस्त दानव भागे थे।
श्लोक 30 (7.169.30)
तेनार्द्यमानाः समरे द्रवमाणाश्च सोमकाः । व्यराजन्त महाराज प्रदीपैरवभासिताः ॥
tenārdyamānāḥ samare dravamāṇāśca somakāḥ | vyarājanta mahārāja pradīpairavabhāsitāḥ
हे महाराज, युद्ध में उसके द्वारा सताए जाकर भागते हुए सोमक दीपों के प्रकाश से जगमगा उठे।
श्लोक 31 (7.169.31)
तांस्तु निर्जित्य समरे कर्णपुत्रो व्यरोचत । मध्यन्दिनमनुप्राप्तो घर्मांशुरिव भारत ॥
tāṃstu nirjitya samare karṇaputro vyarocata | madhyandinamanuprāpto gharmāṃśuriva bhārata
हे भारत, उन्हें युद्ध में हराकर कर्णपुत्र मध्याह्न के सूर्य की तरह चमक उठा।
श्लोक 32 (7.169.32)
तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु परेषु च । एक एव ज्वलंस्तस्थौ वृषसेनः प्रतापवान् ॥
teṣu rājasahasreṣu tāvakeṣu pareṣu ca | eka eva jvalaṃstasthau vṛṣasenaḥ pratāpavān
तुम्हारे और शत्रुओं के उन हज़ारों राजाओं के बीच प्रतापी वृषसेन अकेला ही प्रज्वलित-सा खड़ा रहा।
श्लोक 33 (7.169.33)
स विजित्य रणे शूरान्सोमकानां महारथान् । जगाम त्वरितस्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥
sa vijitya raṇe śūrānsomakānāṃ mahārathān | jagāma tvaritastatra yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ
रण में सोमकों के शूर महारथियों को जीतकर वह तुरन्त वहाँ गया जहाँ राजा युधिष्ठिर थे।
श्लोक 34 (7.169.34)
प्रतिविन्ध्यमथ क्रुद्धं प्रदहन्तं रणे रिपून् । दुःशासनस्तव सुतः प्रत्यगच्छन्महारथः ॥
prativindhyamatha kruddhaṃ pradahantaṃ raṇe ripūn | duḥśāsanastava sutaḥ pratyagacchanmahārathaḥ
उधर क्रुद्ध प्रतिविन्ध्य रण में शत्रुओं को जला रहा था; तब तुम्हारे पुत्र महारथी दुःशासन ने उसका सामना किया।
श्लोक 35 (7.169.35)
तयोः समागमो राजंश्चित्ररूपो बभूव ह । व्यपेतजलदे व्योम्नि बुधभास्करयोरिव ॥
tayoḥ samāgamo rājaṃścitrarūpo babhūva ha | vyapetajalade vyomni budhabhāskarayoriva
हे राजन्, उन दोनों का मिलन विचित्र दृश्य था, जैसे बादल-रहित आकाश में बुध और सूर्य का मिलन हो।
श्लोक 36 (7.169.36)
प्रतिविन्ध्यं तु समरे कुर्वाणं कर्म दुष्करम् । अपूजयन्महाराज तव सैन्ये महारथाः । दुःशासनस्त्रिभिर्बाणैर्ललाटे समविध्यत ॥
prativindhyaṃ tu samare kurvāṇaṃ karma duṣkaram | apūjayanmahārāja tava sainye mahārathāḥ | duḥśāsanastribhirbāṇairlalāṭe samavidhyata
रण में प्रतिविन्ध्य को कठिन पराक्रम करते देख, दुःशासन ने उसके माथे में तीन बाण मारे, और हे महाराज, तुम्हारी सेना के महारथियों ने उसकी सराहना की।
श्लोक 37 (7.169.37)
सोऽतिविद्धो बलवता तव पुत्रेण धन्विना । विरराज महाबाहुः सशृङ्ग इव पर्वतः ॥
so'tividdho balavatā tava putreṇa dhanvinā | virarāja mahābāhuḥ saśṛṅga iva parvataḥ
तुम्हारे बलवान् धनुर्धर पुत्र से गहरी चोट खाकर महाबाहु प्रतिविन्ध्य शिखरों वाले पर्वत के समान शोभित हुआ।
श्लोक 38 (7.169.38)
दुःशासनं तु समरे प्रतिविन्ध्यो महारथः । नवभिः सायकैर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥
duḥśāsanaṃ tu samare prativindhyo mahārathaḥ | navabhiḥ sāyakairviddhvā punarvivyādha saptabhiḥ
महारथी प्रतिविन्ध्य ने युद्ध में दुःशासन को नौ बाणों से बींधकर फिर सात बाणों से घायल किया।
श्लोक 39 (7.169.39)
तत्र भारत पुत्रस्ते कृतवान्कर्म दुष्करम् । प्रतिविन्ध्यहयानुग्रैः पातयामास सायकैः ॥
tatra bhārata putraste kṛtavānkarma duṣkaram | prativindhyahayānugraiḥ pātayāmāsa sāyakaiḥ
तब, हे भारत, तुम्हारे पुत्र ने कठिन कार्य कर दिखाया: उसने उग्र बाणों से प्रतिविन्ध्य के घोड़ों को गिरा दिया।
श्लोक 40 (7.169.40)
सारथिं चास्य भल्लेन ध्वजं च समपातयत् । रथं च तिलशो राजन्व्यधमत्तस्य धन्विनः ॥
sārathiṃ cāsya bhallena dhvajaṃ ca samapātayat | rathaṃ ca tilaśo rājanvyadhamattasya dhanvinaḥ
उसने भल्ल से सारथि और ध्वज को गिरा दिया, और हे राजन्, उस धनुर्धर के रथ को टुकड़े-टुकड़े कर डाला।
श्लोक 41 (7.169.41)
पताकाश्च सतूणीरा रश्मीन्योक्राणि च प्रभो । चिच्छेद तिलशः क्रुद्धः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
patākāśca satūṇīrā raśmīnyokrāṇi ca prabho | ciccheda tilaśaḥ kruddhaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ
हे प्रभो, क्रोध में उसने चिकनी गाँठों वाले बाणों से उसकी पताकाएँ, तरकश, लगामें और जुए की रस्सियाँ टुकड़े-टुकड़े कर डालीं।
श्लोक 42 (7.169.42)
विरथः स तु धर्मात्मा धनुष्पाणिरवस्थितः । अयोधयत्तव सुतं किरञ्शरशतान्बहून् ॥
virathaḥ sa tu dharmātmā dhanuṣpāṇiravasthitaḥ | ayodhayattava sutaṃ kirañśaraśatānbahūn
रथहीन हो जाने पर भी वह धर्मात्मा हाथ में धनुष लिए खड़ा रहा और सैकड़ों बाण बरसाता हुआ तुम्हारे पुत्र से लड़ता रहा।
श्लोक 43 (7.169.43)
क्षुरप्रेण धनुस्तस्य चिच्छेद तनयस्तव । अथैनं दशभिर्बाणैश्छिन्नधन्वानमार्दयत् ॥
kṣurapreṇa dhanustasya ciccheda tanayastava | athainaṃ daśabhirbāṇaiśchinnadhanvānamārdayat
तुम्हारे पुत्र ने क्षुरप्र बाण से उसका धनुष काट दिया, और फिर धनुष कट जाने पर उसे दस बाणों से पीड़ित किया।
श्लोक 44 (7.169.44)
तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भ्रातरोऽस्य महारथाः । अन्ववर्तन्त सङ्ग्रामे महत्या सेनया सह ॥
taṃ dṛṣṭvā virathaṃ tatra bhrātaro'sya mahārathāḥ | anvavartanta saṅgrāme mahatyā senayā saha
उसे रथहीन देखकर उसके महारथी भाई विशाल सेना के साथ संग्राम में उसके पीछे-पीछे आए।
श्लोक 45 (7.169.45)
आप्लुतः स ततो यानं सुतसोमस्य भास्वरम् । धनुर्गृह्य महाराज विव्याध तनयं तव ॥
āplutaḥ sa tato yānaṃ sutasomasya bhāsvaram | dhanurgṛhya mahārāja vivyādha tanayaṃ tava
तब वह सुतसोम के चमकते रथ पर कूद गया और, हे महाराज, धनुष लेकर तुम्हारे पुत्र को बींध दिया।
श्लोक 46 (7.169.46)
ततस्तु तावकाः सर्वे परिवार्य सुतं तव । अभ्यवर्तन्त वेगेन महत्या सेनया वृताः ॥
tatastu tāvakāḥ sarve parivārya sutaṃ tava | abhyavartanta vegena mahatyā senayā vṛtāḥ
तब तुम्हारे सब योद्धा विशाल सेना से घिरे हुए तुम्हारे पुत्र को घेरकर वेग से आगे बढ़े।
श्लोक 47 (7.169.47)
ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां च भारत । निशीथे दारुणे काले यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tava teṣāṃ ca bhārata | niśīthe dāruṇe kāle yamarāṣṭravivardhanam
तब, हे भारत, उस भयंकर आधी रात के समय तुम्हारे और उनके योद्धाओं के बीच यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला युद्ध छिड़ गया।