द्रोण पर्व · अध्याय 170
नकुल से शकुनि की पराजय; रात्रि-युद्ध में कृप और शिखण्डी
रात्रि-युद्ध में शकुनि नकुल पर आक्रमण करता है; नकुल घायल होकर मूर्च्छित हो जाता है, पर सँभलकर शकुनि का धनुष और ध्वज काट देता है, एक बाण से उसकी जंघाएँ बींधकर उसे गिरा देता है, और शकुनि का सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है; फिर नकुल सारथि से द्रोण की सेना की ओर चलने को कहता है। कृप द्रोण की ओर बढ़ते शिखण्डी का सामना करते हैं, उसका धनुष काटते हैं, उसकी शक्ति को नष्ट करते हैं और उसे दबा लेते हैं; तब पांचाल और सोमक उसकी रक्षा को दौड़ते हैं और कौरव कृप की ओर। मशालों के उजाले में रात दिन-सी हो जाती है, और युद्ध इतना अव्यवस्थित हो जाता है कि पिता पुत्र को और मित्र मित्र को मार बैठता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.170.1)
नकुलं रभसं युद्धे निघ्नन्तं वाहिनीं तव । अभ्ययात्सौबलः क्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
nakulaṃ rabhasaṃ yuddhe nighnantaṃ vāhinīṃ tava | abhyayātsaubalaḥ kruddhastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
रण में तुम्हारी सेना का वेग से संहार करते हुए नकुल पर सुबलपुत्र शकुनि क्रुद्ध होकर टूट पड़ा और बोला, "ठहर! ठहर!"
श्लोक 2 (7.170.2)
कृतवैरौ तु तौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ । शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥
kṛtavairau tu tau vīrāvanyonyavadhakāṅkṣiṇau | śaraiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairanyonyamabhijaghnatuḥ
वैर बाँधे हुए वे दोनों वीर एक-दूसरे का वध चाहते हुए पूरी तरह खिंचे धनुषों से छोड़े गए बाणों से परस्पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 3 (7.170.3)
यथैव नकुलो राजञ्शरवर्षाण्यमुञ्चत । तथैव सौबलश्चापि शिक्षां सन्दर्शयन्युधि ॥
yathaiva nakulo rājañśaravarṣāṇyamuñcata | tathaiva saubalaścāpi śikṣāṃ sandarśayanyudhi
हे राजन्, जैसे नकुल बाणों की वर्षा कर रहा था, वैसे ही सुबलपुत्र ने भी युद्ध में अपनी कुशलता दिखाते हुए बाण बरसाए।
श्लोक 4 (7.170.4)
तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव ॥
tāvubhau samare śūrau śarakaṇṭakinau tadā | vyarājetāṃ mahārāja śvāvidhau śalalairiva
बाणों से काँटेदार हो उठे वे दोनों शूरवीर उस समय, हे महाराज, काँटों से भरे दो साही के समान शोभित हुए।
श्लोक 5 (7.170.5)
रुक्मपुङ्खैरजिह्माग्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे ॥
rukmapuṅkhairajihmāgraiḥ śaraiśchinnatanucchadau | rudhiraughapariklinnau vyabhrājetāṃ mahāmṛdhe
सुनहरे पंखों और सीधी नोकों वाले बाणों से उनके कवच कट गए थे; खून की धाराओं से भीगे वे दोनों उस महायुद्ध में शोभित हुए।
श्लोक 6 (7.170.6)
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविव द्रुमौ । किंशुकाविव चोत्फुल्लौ प्रकाशेते रणाजिरे ॥
tapanīyanibhau citrau kalpavṛkṣāviva drumau | kiṃśukāviva cotphullau prakāśete raṇājire
तपाए सोने के समान चमकते, विचित्र, दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो किंशुक वृक्षों की तरह वे दोनों रणभूमि में दमक उठे।
श्लोक 7 (7.170.7)
तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज कण्टकैरिव शाल्मली ॥
tāvubhau samare śūrau śarakaṇṭakinau tadā | vyarājetāṃ mahārāja kaṇṭakairiva śālmalī
बाणों से काँटेदार हो उठे वे दोनों शूरवीर उस समय, हे महाराज, काँटों से भरे सेमल के वृक्ष की तरह शोभित हुए।
श्लोक 8 (7.170.8)
सुजिह्मं प्रेक्षमाणौ च राजन्विवृतलोचनौ । क्रोधसंरक्तनयनौ निर्दहन्तौ परस्परम् ॥
sujihmaṃ prekṣamāṇau ca rājanvivṛtalocanau | krodhasaṃraktanayanau nirdahantau parasparam
हे राजन्, आँखें फाड़े, क्रोध से लाल नेत्रों से एक-दूसरे को तिरछी दृष्टि से देखते हुए वे मानो परस्पर जला रहे थे।
श्लोक 9 (7.170.9)
श्यालस्तु तव सङ्क्रुद्धो माद्रीपुत्रं हसन्निव । कर्णिनैकेन विव्याध हृदये निशितेन ह ॥
śyālastu tava saṅkruddho mādrīputraṃ hasanniva | karṇinaikena vivyādha hṛdaye niśitena ha
तुम्हारे साले शकुनि ने क्रोध में मानो हँसते हुए माद्री-पुत्र नकुल के हृदय में एक तीखे कर्णी नामक बाण से प्रहार किया।
श्लोक 10 (7.170.10)
नकुलस्तु भृशं विद्धः श्यालेन तव धन्विना । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाविशन्महत् ॥
nakulastu bhṛśaṃ viddhaḥ śyālena tava dhanvinā | niṣasāda rathopasthe kaśmalaṃ cāviśanmahat
तुम्हारे धनुर्धर साले से गहरा घायल होकर नकुल रथ के पिछले भाग में बैठ गया और उस पर भारी मूर्च्छा छा गई।
श्लोक 11 (7.170.11)
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं तथाऽऽगतम् । ननाद शकुनी राजंस्तपान्ते जलदो यथा ॥
atyantavairiṇaṃ dṛptaṃ dṛṣṭvā śatruṃ tathā''gatam | nanāda śakunī rājaṃstapānte jalado yathā
अपने अत्यन्त वैरी और अभिमानी शत्रु को ऐसी दशा में देखकर शकुनि, हे राजन्, ग्रीष्म के अन्त में गरजते मेघ की तरह दहाड़ उठा।
श्लोक 12 (7.170.12)
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां नकुलः पाण्डुनन्दनः । अभ्ययात्सौबलं भूयो व्यात्तानन इवान्तकः ॥
pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ nakulaḥ pāṇḍunandanaḥ | abhyayātsaubalaṃ bhūyo vyāttānana ivāntakaḥ
होश आने पर पाण्डुपुत्र नकुल मुँह फैलाए हुए यमराज की तरह फिर सुबलपुत्र पर झपटा।
श्लोक 13 (7.170.13)
सङ्क्रुद्धः शकुनिं षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ । पुनश्चैनं शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे ॥
saṅkruddhaḥ śakuniṃ ṣaṣṭyā vivyādha bharatarṣabha | punaścainaṃ śatenaiva nārācānāṃ stanāntare
हे भरतश्रेष्ठ, क्रोध में उसने शकुनि को साठ बाणों से बींधा, और फिर सौ नाराचों से उसकी छाती में प्रहार किया।
श्लोक 14 (7.170.14)
अथास्य सशरं चापं मुष्टिदेशेऽच्छिनत्तदा । ध्वजं च त्वरितं छित्त्वा रथाद्भूमावपातयत् ॥
athāsya saśaraṃ cāpaṃ muṣṭideśe'cchinattadā | dhvajaṃ ca tvaritaṃ chittvā rathādbhūmāvapātayat
फिर उसने मुट्ठी वाले स्थान पर बाण सहित उसका धनुष काट डाला, और उसकी ध्वजा को भी शीघ्र काटकर रथ से धरती पर गिरा दिया।
श्लोक 15 (7.170.15)
विशिखेन च तीक्ष्णेन पीतेन निशितेन च । ऊरू निर्भिद्य चैकेन नकुलः पाण्डुनन्दनः । श्येनं सपक्षं व्याधेन पातयामास तं तदा ॥
viśikhena ca tīkṣṇena pītena niśitena ca | ūrū nirbhidya caikena nakulaḥ pāṇḍunandanaḥ | śyenaṃ sapakṣaṃ vyādhena pātayāmāsa taṃ tadā
पाण्डुपुत्र नकुल ने एक तीखे, चमकदार और धारदार बाण से उसकी दोनों जंघाएँ बींधकर उसे वैसे ही गिरा दिया, जैसे व्याध का बाण पंखों समेत बाज को गिरा देता है।
श्लोक 16 (7.170.16)
सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् । ध्वजयष्टिं परिक्लिश्य कामुकः कामिनीं यथा ॥
so'tividdho mahārāja rathopastha upāviśat | dhvajayaṣṭiṃ parikliśya kāmukaḥ kāminīṃ yathā
हे महाराज, गहरी चोट खाकर वह कष्ट सहते हुए ध्वजदण्ड को पकड़े रथ के पिछले भाग में बैठ गया, जैसे कोई कामी अपनी प्रिया को थामे हो।
श्लोक 17 (7.170.17)
तं विसंज्ञं निपतितं दृष्ट्वा श्यालं तवानघ । अपोवाह रथेनाशु सारथिर्ध्वजिनीमुखात् ॥
taṃ visaṃjñaṃ nipatitaṃ dṛṣṭvā śyālaṃ tavānagha | apovāha rathenāśu sārathirdhvajinīmukhāt
हे निष्पाप, तुम्हारे साले को अचेत होकर गिरा देख उसका सारथि उसे रथ में बैठाकर तुरन्त सेना के अग्रभाग से दूर ले गया।
श्लोक 18 (7.170.18)
ततः सञ्चुक्रुशुः पार्था ये च तेषां पदानुगाः ॥
tataḥ sañcukruśuḥ pārthā ye ca teṣāṃ padānugāḥ
तब पाण्डवों और उनके अनुगामियों ने जयघोष किया।
श्लोक 19 (7.170.19)
निर्जित्य च रणे शत्रुं नकुलः शत्रुतापनः । अब्रवीत्सारथिं क्रुद्धो द्रोणानीकाय मां वह ॥
nirjitya ca raṇe śatruṃ nakulaḥ śatrutāpanaḥ | abravītsārathiṃ kruddho droṇānīkāya māṃ vaha
रण में शत्रु को जीतकर शत्रुओं को तपाने वाले नकुल ने क्रोधपूर्वक सारथि से कहा, "मुझे द्रोण की सेना की ओर ले चलो।"
श्लोक 20 (7.170.20)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य सारथिः । प्रायात्तेन तदा राजन्यत्र द्रोणो व्यवस्थितः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā mādrīputrasya sārathiḥ | prāyāttena tadā rājanyatra droṇo vyavasthitaḥ
माद्री-पुत्र की यह बात सुनकर सारथि, हे राजन्, उसे वहाँ ले गया जहाँ द्रोण खड़े थे।
श्लोक 21 (7.170.21)
शिखण्डिनं तु समरे द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते । कृपः शारद्वतो यत्तः प्रत्यगच्छत्स वेगितः ॥
śikhaṇḍinaṃ tu samare droṇaprepsuṃ viśāmpate | kṛpaḥ śāradvato yattaḥ pratyagacchatsa vegitaḥ
और हे प्रजापालक, शरद्वान् के पुत्र कृप ने सावधान होकर द्रोण तक पहुँचने को आतुर शिखण्डी का वेग से सामना किया।
श्लोक 22 (7.170.22)
गौतमं द्रुतमायान्तं द्रोणानीकमरिन्दमम् । विव्याध नवभिर्भल्लैः शिखण्डी प्रहसन्निव ॥
gautamaṃ drutamāyāntaṃ droṇānīkamarindamam | vivyādha navabhirbhallaiḥ śikhaṇḍī prahasanniva
शत्रुओं का दमन करने वाले गौतम (कृप) द्रोण की सेना की ओर वेग से आ रहे थे कि शिखण्डी ने मानो हँसते हुए उन्हें नौ भल्लों से बींध दिया।
श्लोक 23 (7.170.23)
तमाचार्यो महाराज विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः । पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रियकृत्तव ॥
tamācāryo mahārāja viddhvā pañcabhirāśugaiḥ | punarvivyādha viṃśatyā putrāṇāṃ priyakṛttava
हे महाराज, आचार्य कृप ने, जो तुम्हारे पुत्रों का प्रिय करने वाले हैं, उसे पाँच तीव्र बाणों से बींधकर फिर बीस बाणों से घायल किया।
श्लोक 24 (7.170.24)
महद्युद्धं तयोरासीद्धोररूपं भयानकम् । यथा देवासुरे युद्धे शम्बरामरराजयोः ॥
mahadyuddhaṃ tayorāsīddhorarūpaṃ bhayānakam | yathā devāsure yuddhe śambarāmararājayoḥ
उन दोनों के बीच भयानक और डरावना महान् युद्ध हुआ, जैसे देवासुर-संग्राम में शम्बर और देवराज इन्द्र के बीच हुआ था।
श्लोक 25 (7.170.25)
शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्तौ महारथौ । मेघाविव तपापाये वीरौ समरदुर्मदौ । प्रकृत्या घोररूपं तदासीद्धोरतरं पुनः ॥
śarajālāvṛtaṃ vyoma cakratustau mahārathau | meghāviva tapāpāye vīrau samaradurmadau | prakṛtyā ghorarūpaṃ tadāsīddhorataraṃ punaḥ
रण में मतवाले उन दोनों महारथी वीरों ने ग्रीष्म के अन्त के दो मेघों की तरह आकाश को बाणों के जाल से ढक दिया; जो दृश्य स्वभाव से ही भयानक था, वह और भी भयानक हो गया।
श्लोक 26 (7.170.26)
रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ योधानां युद्धशालिनाम् । कालरात्रिनिभा ह्यासीद्धोररूपा भयानका ॥
rātriśca bharataśreṣṭha yodhānāṃ yuddhaśālinām | kālarātrinibhā hyāsīddhorarūpā bhayānakā
हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध के लिए आतुर योद्धाओं के लिए वह रात्रि कालरात्रि के समान भयानक और डरावनी थी।
श्लोक 27 (7.170.27)
शिखण्डी तु महाराज गौतमस्य महद्धनुः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद सज्यं सविशिखं तदा ॥
śikhaṇḍī tu mahārāja gautamasya mahaddhanuḥ | ardhacandreṇa ciccheda sajyaṃ saviśikhaṃ tadā
हे महाराज, शिखण्डी ने अर्धचन्द्र बाण से गौतम (कृप) का प्रत्यंचा चढ़ा हुआ और बाण सहित विशाल धनुष काट डाला।
श्लोक 28 (7.170.28)
तस्य क्रुद्धः कृपो राजञ्शक्तिं चिक्षेप दारुणाम् । स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम् ॥
tasya kruddhaḥ kṛpo rājañśaktiṃ cikṣepa dāruṇām | svarṇadaṇḍāmakuṇṭhāgrāṃ karmāraparimārjitām
हे राजन्, तब कुपित कृप ने उस पर सुनहरे दण्ड और तेज़ नोक वाली, लोहार से माँजी हुई भयानक शक्ति फेंकी।
श्लोक 29 (7.170.29)
तामापतन्तीं चिच्छेद शिखण्डी बहुभिः शरैः । सापतन्मेदिनीं कृत्ता भासयन्ती महाप्रभा ॥
tāmāpatantīṃ ciccheda śikhaṇḍī bahubhiḥ śaraiḥ | sāpatanmedinīṃ kṛttā bhāsayantī mahāprabhā
शिखण्डी ने अपनी ओर आती उस शक्ति को बहुत-से बाणों से काट डाला; कटकर वह महान् आभा से चमकती हुई धरती पर गिर पड़ी।
श्लोक 30 (7.170.30)
अथान्यद्धनुरादाय गौतमो रथिनां वारः । प्राच्छादयच्छितैर्बाणैर्महाराज शिखण्डिनम् ॥
athānyaddhanurādāya gautamo rathināṃ vāraḥ | prācchādayacchitairbāṇairmahārāja śikhaṇḍinam
तब रथियों में श्रेष्ठ गौतम ने दूसरा धनुष लेकर, हे महाराज, तीखे बाणों से शिखण्डी को ढक दिया।
श्लोक 31 (7.170.31)
स च्छाद्यमानः समरे गौतमेन यशस्विना । न्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वरः ॥
sa cchādyamānaḥ samare gautamena yaśasvinā | nyaṣīdata rathopasthe śikhaṇḍī rathināṃ varaḥ
यशस्वी गौतम द्वारा युद्ध में ढक दिए जाने पर रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
श्लोक 32 (7.170.32)
सीदन्तं चैनमालोक्य कृपः शारद्वतो युधि । आजघ्ने बहुभिर्बाणैर्जिघांसन्निव भारत ॥
sīdantaṃ cainamālokya kṛpaḥ śāradvato yudhi | ājaghne bahubhirbāṇairjighāṃsanniva bhārata
उसे निढाल होते देख शरद्वान् के पुत्र कृप ने, हे भारत, मानो उसे मार डालना चाहते हुए युद्ध में बहुत-से बाणों से उस पर प्रहार किया।
श्लोक 33 (7.170.33)
विमुखं तु रणे दृष्ट्वा याज्ञसेनिं महारथम् । पाञ्चालाः सोमकाश्चैव परिवव्रुः समन्ततः ॥
vimukhaṃ tu raṇe dṛṣṭvā yājñaseniṃ mahāratham | pāñcālāḥ somakāścaiva parivavruḥ samantataḥ
यज्ञसेन के पुत्र महारथी शिखण्डी को युद्ध से विमुख देख पांचालों और सोमकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 34 (7.170.34)
तथैव तव पुत्राश्च परिवव्रुर्द्विजोत्तमम् । महत्या सेनया सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥
tathaiva tava putrāśca parivavrurdvijottamam | mahatyā senayā sārdhaṃ tato yuddhamavartata
इसी प्रकार तुम्हारे पुत्रों ने भी उन द्विजश्रेष्ठ को घेर लिया, और विशाल सेना के साथ फिर युद्ध होने लगा।
श्लोक 35 (7.170.35)
रथानां च रणे राजन्नन्योन्यमभिधावताम् । बभूव तुमुलः शब्दो मेघानां गर्जतामिव ॥
rathānāṃ ca raṇe rājannanyonyamabhidhāvatām | babhūva tumulaḥ śabdo meghānāṃ garjatāmiva
हे राजन्, रण में एक-दूसरे पर टूटते रथों का भीषण कोलाहल बादलों की गर्जना की तरह उठा।
श्लोक 36 (7.170.36)
द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशाम्पते । अन्योन्यमभितो राजन्क्रूरमायोधनं बभौ ॥
dravatāṃ sādināṃ caiva gajānāṃ ca viśāmpate | anyonyamabhito rājankrūramāyodhanaṃ babhau
हे प्रजापालक, एक-दूसरे की ओर दौड़ते घुड़सवारों और हाथियों से, हे राजन्, वह रणभूमि भयंकर दिखाई देने लगी।
श्लोक 37 (7.170.37)
पत्तीनां द्रवतां चैव पादशब्देन मेदिनी । अकम्पत महाराज भयत्रस्तेव चाङ्गना ॥
pattīnāṃ dravatāṃ caiva pādaśabdena medinī | akampata mahārāja bhayatrasteva cāṅganā
हे महाराज, दौड़ते पैदल सैनिकों की पदध्वनि से धरती भय से त्रस्त स्त्री की तरह काँप उठी।
श्लोक 38 (7.170.38)
रथिनो रथमारुह्य प्रद्रुता वेगवत्तरम् । अगृह्णन्बहवो राजञ्शलभान्वायसा इव ॥
rathino rathamāruhya pradrutā vegavattaram | agṛhṇanbahavo rājañśalabhānvāyasā iva
हे राजन्, बहुत-से रथी रथों पर चढ़कर और भी तेज़ी से दौड़ते हुए शत्रुओं को वैसे ही दबोचने लगे जैसे कौए टिड्डियों को।
श्लोक 39 (7.170.39)
तथा गजान्प्रभिन्नांश्च सम्प्रभिन्ना महागजाः । तस्मिन्नेव पदे यत्ता निगृह्णन्ति स्म भारत ॥
tathā gajānprabhinnāṃśca samprabhinnā mahāgajāḥ | tasminneva pade yattā nigṛhṇanti sma bhārata
इसी प्रकार, हे भारत, मद में चूर विशाल हाथी उत्साह से उसी स्थान पर मदमत्त हाथियों को रोक-रोककर थामने लगे।
श्लोक 40 (7.170.40)
सादी सादिनमासाद्य पत्तयश्च पदातिनम् । समासाद्य रणेऽन्योन्यं संरब्धा नातिचक्रमुः ॥
sādī sādinamāsādya pattayaśca padātinam | samāsādya raṇe'nyonyaṃ saṃrabdhā nāticakramuḥ
घुड़सवार घुड़सवार से और पैदल पैदल से भिड़कर, रण में एक-दूसरे का सामना करके क्रोध में भरे हुए वे एक-दूसरे को लाँघकर आगे नहीं बढ़े।
श्लोक 41 (7.170.41)
धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि । बभूव तत्र सैन्यानां शब्दः सुविपुलो निशि ॥
dhāvatāṃ dravatāṃ caiva punarāvartatāmapi | babhūva tatra sainyānāṃ śabdaḥ suvipulo niśi
दौड़ती, भागती और फिर लौटती सेनाओं का वहाँ रात में बहुत भारी कोलाहल उठा।
श्लोक 42 (7.170.42)
दीप्यमानाः प्रदीपाश्च रथवारणवाजिषु । अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युताः ॥
dīpyamānāḥ pradīpāśca rathavāraṇavājiṣu | adṛśyanta mahārāja maholkā iva khāccyutāḥ
हे महाराज, रथों, हाथियों और घोड़ों पर जलती मशालें आकाश से गिरी हुई बड़ी उल्काओं की तरह दिखाई देती थीं।
श्लोक 43 (7.170.43)
सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपैरवभासिता । दिवसप्रतिमा राजन्बभूव रणमूर्धनि ॥
sā niśā bharataśreṣṭha pradīpairavabhāsitā | divasapratimā rājanbabhūva raṇamūrdhani
हे भरतश्रेष्ठ, हे राजन्, मशालों से प्रकाशित वह रात युद्ध के अग्रभाग में दिन के समान हो गई।
श्लोक 44 (7.170.44)
आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति । तथा नष्टं तमो घोरं दीपैर्दीप्तैरितस्ततः ॥
ādityena yathā vyāptaṃ tamo loke praṇaśyati | tathā naṣṭaṃ tamo ghoraṃ dīpairdīptairitastataḥ
जैसे सूर्य के फैल जाने पर संसार में छाया अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही जलते दीपों से वह घोर अंधकार जहाँ-तहाँ नष्ट हो गया।
श्लोक 45 (7.170.45)
दिवं च पृथिवीं चैव दिशश्च प्रदिशस्तथा । रजसा तमसा व्याप्ता द्योतिताः प्रभया पुनः ॥
divaṃ ca pṛthivīṃ caiva diśaśca pradiśastathā | rajasā tamasā vyāptā dyotitāḥ prabhayā punaḥ
धूल और अँधेरे से ढके हुए आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ और उपदिशाएँ उस प्रभा से फिर आलोकित हो उठीं।
श्लोक 46 (7.170.46)
अस्त्राणां कवचानां च मणीनां च महात्मनाम् । अन्तर्दधुः प्रभाः सर्वा दीपैस्तैरवभासिताः ॥
astrāṇāṃ kavacānāṃ ca maṇīnāṃ ca mahātmanām | antardadhuḥ prabhāḥ sarvā dīpaistairavabhāsitāḥ
उन महात्माओं के अस्त्रों, कवचों और मणियों की सारी चमक उन दीपों के प्रकाश के आगे ओझल हो गई।
श्लोक 47 (7.170.47)
तस्मिन्कोलाहले युद्धे वर्तमाने निशामुखे । न किञ्चिद्विदुरात्मानमयमस्मीति भारत ॥
tasminkolāhale yuddhe vartamāne niśāmukhe | na kiñcidvidurātmānamayamasmīti bhārata
रात्रि के आरम्भ में चल रहे उस कोलाहल-भरे युद्ध में, हे भारत, कोई अपने को भी न पहचान पाता था कि "यह मैं हूँ।"
श्लोक 48 (7.170.48)
अवधीत्समरे पुत्रं पिता भरतसत्तम । पुत्रश्च पितरं मोहात्सखायं च सखा तथा । स्वस्रीयं मातुलश्चापि स्वस्रीयश्चापि मातुलम् ॥
avadhītsamare putraṃ pitā bharatasattama | putraśca pitaraṃ mohātsakhāyaṃ ca sakhā tathā | svasrīyaṃ mātulaścāpi svasrīyaścāpi mātulam
हे भरतश्रेष्ठ, उस युद्ध में मोहवश पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मारा; मित्र ने मित्र को मारा, और भानजे ने मामा को तथा मामा ने भानजे को मार डाला।
श्लोक 49 (7.170.49)
स्वे स्वान्परे परांश्चापि निजघ्नुरितरेतरम् । निर्मर्यादमभूद्युद्धं रात्रौ भीरुभयानकम् ॥
sve svānpare parāṃścāpi nijaghnuritaretaram | nirmaryādamabhūdyuddhaṃ rātrau bhīrubhayānakam
अपने लोगों ने अपनों को और शत्रुओं ने शत्रुओं को भी मारा; वे एक-दूसरे को मारते रहे। डरपोकों को भयभीत करने वाला वह युद्ध रात में सब मर्यादा तोड़ बैठा।