द्रोण पर्व · अध्याय 171
धृष्टद्युम्न का द्रोण पर आक्रमण; कर्ण और सात्यकि का संग्राम
रात्रि के युद्ध में धृष्टद्युम्न द्रोण पर टूट पड़ता है; कर्ण उसके घातक बाण को काट देता है और धृष्टद्युम्न द्रुमसेन को मार डालता है, फिर कर्ण तथा पाँच अन्य कौरव योद्धा उसे घेरने लगते हैं। सात्यकि उसकी सहायता को आकर कर्ण से भिड़ता है और कर्ण के पुत्र वृषसेन को मूर्च्छित कर देता है। गाण्डीव की टंकार सुनकर कर्ण दुर्योधन से कहता है कि अर्जुन के आने से पहले सात्यकि को मार डाला जाए; दुर्योधन शकुनि को विशाल सेना के साथ पाण्डवों पर भेजता है, कर्ण स्वयं सात्यकि की ओर बढ़ता है और द्रोण धृष्टद्युम्न के रथ की ओर जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.171.1)
तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयावहे । धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणमेवाभ्यवर्तत ॥
tasminsutumule yuddhe vartamāne bhayāvahe | dhṛṣṭadyumno mahārāja droṇamevābhyavartata
उस घमासान और भयानक युद्ध के चलते, हे महाराज, धृष्टद्युम्न सीधे द्रोण की ओर बढ़ा।
श्लोक 2 (7.171.2)
सन्दधानो धनुःश्रेष्ठं ज्यां विकुर्षन्पुनः पुनः । अभ्यद्रवत द्रोणस्य रथं रुक्मविभूषितम् ॥
sandadhāno dhanuḥśreṣṭhaṃ jyāṃ vikurṣanpunaḥ punaḥ | abhyadravata droṇasya rathaṃ rukmavibhūṣitam
श्रेष्ठ धनुष पर बाण चढ़ाकर और बार-बार प्रत्यंचा खींचते हुए वह द्रोण के स्वर्ण-भूषित रथ पर टूट पड़ा।
श्लोक 3 (7.171.3)
धृष्टद्युम्नमथायान्तं द्रोणस्यान्तचिकीर्षया । परिवव्रुर्महाराज पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥
dhṛṣṭadyumnamathāyāntaṃ droṇasyāntacikīrṣayā | parivavrurmahārāja pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha
द्रोण का अन्त करने की इच्छा से आते हुए धृष्टद्युम्न को, हे महाराज, पाण्डवों के साथ पाञ्चालों ने चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 4 (7.171.4)
तथा परिवृतं दृष्ट्वा द्रोणमाचार्यसत्तमम् । पुत्रास्ते सर्वतो यत्ता ररक्षुर्द्रोणमाहवे ॥
tathā parivṛtaṃ dṛṣṭvā droṇamācāryasattamam | putrāste sarvato yattā rarakṣurdroṇamāhave
आचार्यों में श्रेष्ठ द्रोण को इस प्रकार घिरा देखकर आपके पुत्रों ने सावधान होकर युद्ध में सब ओर से उनकी रक्षा की।
श्लोक 5 (7.171.5)
बलार्णवौ ततस्तौ तु समेयातां निशामुखे । वातोद्धूतौ क्षुब्धसत्वौ भैरवौ सागराविव ॥
balārṇavau tatastau tu sameyātāṃ niśāmukhe | vātoddhūtau kṣubdhasatvau bhairavau sāgarāviva
तब रात्रि के आरम्भ में वे दोनों सेनारूपी सागर आपस में जा भिड़े, मानो हवा से उछाले हुए, जल-जन्तुओं से क्षुब्ध दो भयंकर समुद्र हों।
श्लोक 6 (7.171.6)
ततो द्रोणं महाराज पाञ्चाल्यः पञ्चभिः शरैः । विव्याध हृदये तूर्णं सिंहनादं ननाद च ॥
tato droṇaṃ mahārāja pāñcālyaḥ pañcabhiḥ śaraiḥ | vivyādha hṛdaye tūrṇaṃ siṃhanādaṃ nanāda ca
तब, हे महाराज, पाञ्चाल राजकुमार ने पाँच बाणों से द्रोण की छाती में तुरन्त प्रहार किया और सिंहनाद किया।
श्लोक 7 (7.171.7)
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या विद्ध्वा भारत संयुगे । चिच्छेदान्येन भल्लेन धनुरस्य महास्वनम् ॥
taṃ droṇaḥ pañcaviṃśatyā viddhvā bhārata saṃyuge | cicchedānyena bhallena dhanurasya mahāsvanam
हे भारत, द्रोण ने युद्ध में उसे पच्चीस बाणों से बींधकर एक दूसरे भल्ल से उसका गूँजता हुआ धनुष काट डाला।
श्लोक 8 (7.171.8)
धृष्टद्युम्नस्तु निर्विद्धो द्रोणेन भरतर्षभ । उत्ससर्ज धनुस्तूर्णं सन्दश्य दशनच्छदम् ॥
dhṛṣṭadyumnastu nirviddho droṇena bharatarṣabha | utsasarja dhanustūrṇaṃ sandaśya daśanacchadam
हे भरतश्रेष्ठ, द्रोण से घायल हुए धृष्टद्युम्न ने होंठ चबाते हुए तुरन्त अपना धनुष फेंक दिया।
श्लोक 9 (7.171.9)
ततः क्रुद्धो महाराज धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । आददेऽन्यद्धनुःश्रेष्ठं द्रोणस्यान्तचिकीर्षया ॥
tataḥ kruddho mahārāja dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | ādade'nyaddhanuḥśreṣṭhaṃ droṇasyāntacikīrṣayā
तब, हे महाराज, प्रतापी धृष्टद्युम्न ने क्रोध में भरकर द्रोण का अन्त करने की इच्छा से दूसरा उत्तम धनुष उठा लिया।
श्लोक 10 (7.171.10)
विकृष्य च धनुश्चित्रमाकर्णात्परवीरहा । द्रोणस्यान्तकरं घोरं व्यसृजत्सायकं ततः ॥
vikṛṣya ca dhanuścitramākarṇātparavīrahā | droṇasyāntakaraṃ ghoraṃ vyasṛjatsāyakaṃ tataḥ
वीरों का संहार करने वाले उसने सुन्दर धनुष को कान तक खींचकर द्रोण का अन्त कर देने वाला एक भयंकर बाण छोड़ा।
श्लोक 11 (7.171.11)
स विसृष्टो बलवता शरो घोरो महामृधे । भासयामास तत्सैन्यं दिवाकर इवोदितः ॥
sa visṛṣṭo balavatā śaro ghoro mahāmṛdhe | bhāsayāmāsa tatsainyaṃ divākara ivoditaḥ
उस बलवान के छोड़े हुए उस घोर बाण ने महायुद्ध में सारी सेना को उदित सूर्य की भाँति प्रकाशित कर दिया।
श्लोक 12 (7.171.12)
तं तु दृष्ट्वा शरं घोरं देवगन्धर्वमानवाः । स्वस्त्यस्तु समरे राजन्द्रोणायेत्यब्रुवन्वचः ॥
taṃ tu dṛṣṭvā śaraṃ ghoraṃ devagandharvamānavāḥ | svastyastu samare rājandroṇāyetyabruvanvacaḥ
उस भयंकर बाण को देखकर देवता, गन्धर्व और मनुष्य बोल उठे — "हे राजन्, युद्ध में द्रोण का कल्याण हो!"
श्लोक 13 (7.171.13)
तं तु सायकमायान्तमाचार्यस्य रथं प्रति । कर्णो द्वादशधा राजंश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥
taṃ tu sāyakamāyāntamācāryasya rathaṃ prati | karṇo dvādaśadhā rājaṃściccheda kṛtahastavat
आचार्य के रथ की ओर आते हुए उस बाण को, हे राजन्, कर्ण ने निपुण हाथों से बारह टुकड़े करके काट डाला।
श्लोक 14 (7.171.14)
स च्छिन्नो बहुधा राजन्सूतपुत्रेण धन्विना । निपपात शरस्तूर्णं निर्विषो भुजगो यथा ॥
sa cchinno bahudhā rājansūtaputreṇa dhanvinā | nipapāta śarastūrṇaṃ nirviṣo bhujago yathā
हे राजन्, धनुर्धर सूतपुत्र के द्वारा अनेक टुकड़ों में कटा हुआ वह बाण विषहीन साँप की भाँति तुरन्त गिर पड़ा।
श्लोक 15 (7.171.15)
छित्त्वा तु समरे बाणं शरैः सन्नतपर्वभिः । धृष्टद्युम्नं ततः कर्णो विव्याध दशभिः शरैः ॥
chittvā tu samare bāṇaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | dhṛṣṭadyumnaṃ tataḥ karṇo vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ
युद्ध में झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उस बाण को काटकर कर्ण ने फिर धृष्टद्युम्न को दस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 16 (7.171.16)
पञ्चभिर्द्रोणपुत्रस्तु स्वयं द्रोणस्तु सप्तभिः । शल्यश्च दशभिर्बाणैस्त्रिभिर्दुःशासनस्तथा ॥
pañcabhirdroṇaputrastu svayaṃ droṇastu saptabhiḥ | śalyaśca daśabhirbāṇaistribhirduḥśāsanastathā
द्रोणपुत्र ने पाँच से, स्वयं द्रोण ने सात से, शल्य ने दस बाणों से और दुःशासन ने तीन से उसे बींधा।
श्लोक 17 (7.171.17)
दुर्योधनस्तु विंशत्या शकुनिश्चापि पञ्चभिः । पाञ्चाल्यं त्वरयाऽविध्यन्सर्व एव महारथाः ॥
duryodhanastu viṃśatyā śakuniścāpi pañcabhiḥ | pāñcālyaṃ tvarayā'vidhyansarva eva mahārathāḥ
दुर्योधन ने बीस से और शकुनि ने पाँच से — इस प्रकार सभी महारथियों ने शीघ्रता से पाञ्चाल राजकुमार को बींधा।
श्लोक 18 (7.171.18)
स विद्धः सप्तभिर्घोरैर्द्रोणस्यार्थे महाहवे । सर्वानसम्भ्रमाद्राजन्प्रत्यविध्यत्त्रिभिस्त्रिभिः । द्रोणं द्रौणिं च कर्णं च विव्याध च तवात्मजम् ॥
sa viddhaḥ saptabhirghorairdroṇasyārthe mahāhave | sarvānasambhramādrājanpratyavidhyattribhistribhiḥ | droṇaṃ drauṇiṃ ca karṇaṃ ca vivyādha ca tavātmajam
द्रोण के लिए लड़े जा रहे उस महायुद्ध में उन सात भयंकर योद्धाओं से बिंधकर भी उसने, हे राजन्, तनिक घबराए बिना उन सबको तीन-तीन बाणों से बदले में बींध दिया; उसने द्रोण, द्रोणपुत्र, कर्ण और आपके पुत्र को भी बींधा।
श्लोक 19 (7.171.19)
ते भिन्ना धन्विना तेन धृष्टद्युम्नं पुनर्मृधे । विव्यधुः पञ्चभिस्तूर्णमेकैको रथिनां वरः ॥
te bhinnā dhanvinā tena dhṛṣṭadyumnaṃ punarmṛdhe | vivyadhuḥ pañcabhistūrṇamekaiko rathināṃ varaḥ
उस धनुर्धर से घायल हुए रथियों में श्रेष्ठ वे योद्धा, एक-एक करके, रणभूमि में फिर तुरन्त पाँच-पाँच बाणों से धृष्टद्युम्न को बींधने लगे।
श्लोक 20 (7.171.20)
द्रुमसेनस्तु सङ्क्रुद्धो राजन्विव्याध पत्रिणा । त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
drumasenastu saṅkruddho rājanvivyādha patriṇā | tribhiścānyaiḥ śaraistūrṇaṃ tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt
तब द्रुमसेन ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हे राजन्, एक बाण से और तीन अन्य बाणों से उसे बींधा और कहा — "ठहर, ठहर!"
श्लोक 21 (7.171.21)
स तु तं प्रतिविव्याध त्रिभिस्तीक्ष्णैरजिह्मगैः । स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैः प्राणान्तकरणैर्युधि ॥
sa tu taṃ prativivyādha tribhistīkṣṇairajihmagaiḥ | svarṇapuṅkhaiḥ śilādhautaiḥ prāṇāntakaraṇairyudhi
उसने बदले में युद्ध में उसे तीन तीखे, सीधे जाने वाले, सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए प्राणघातक बाणों से बींध दिया।
श्लोक 22 (7.171.22)
भल्लेनान्येन तु पुनः सुवर्णोज्ज्वलकुण्डलम् । निचकर्त शिरः कायाद्द्रुमसेनस्य वीर्यवान् ॥
bhallenānyena tu punaḥ suvarṇojjvalakuṇḍalam | nicakarta śiraḥ kāyāddrumasenasya vīryavān
फिर उस पराक्रमी ने एक दूसरे भल्ल से द्रुमसेन के सोने के चमकते कुण्डलों वाले सिर को धड़ से काट डाला।
श्लोक 23 (7.171.23)
तच्छिरो न्यपतद्भूमौ सन्दष्टौष्ठपुटं रणे । महावातसमुद्धूतं पक्वं तालफलं यथा ॥
tacchiro nyapatadbhūmau sandaṣṭauṣṭhapuṭaṃ raṇe | mahāvātasamuddhūtaṃ pakvaṃ tālaphalaṃ yathā
दाँतों तले होंठ दबाए हुए वह सिर रणभूमि में पृथ्वी पर ऐसे गिरा, जैसे प्रचण्ड आँधी से झड़ा हुआ पका ताड़-फल।
श्लोक 24 (7.171.24)
तान्स विद्ध्वा पुनर्योधान्वीरः सुनिशितैः शरैः । राधेयस्याच्छिनद्भल्लैः कार्मुकं चित्रयोधिनः ॥
tānsa viddhvā punaryodhānvīraḥ suniśitaiḥ śaraiḥ | rādheyasyācchinadbhallaiḥ kārmukaṃ citrayodhinaḥ
उन योद्धाओं को भी फिर अत्यन्त तीखे बाणों से बींधकर उस वीर ने भल्लों से अद्भुत युद्ध करने वाले राधापुत्र का धनुष काट डाला।
श्लोक 25 (7.171.25)
न तु तन्ममृषे कर्णो धनुषश्छेदनं तथा । निकर्तनमिवात्युग्रं लाङ्गूलस्य महाहरिः ॥
na tu tanmamṛṣe karṇo dhanuṣaśchedanaṃ tathā | nikartanamivātyugraṃ lāṅgūlasya mahāhariḥ
परन्तु कर्ण से अपने धनुष का कटना सहा न गया — जैसे महान सिंह से अपनी पूँछ का भयंकर कटना नहीं सहा जाता।
श्लोक 26 (7.171.26)
सोऽन्यद्धनुः समादाय क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् । अभ्यद्रवच्छरौघैस्तं धृष्टद्युम्नं महाबलम् ॥
so'nyaddhanuḥ samādāya krodharaktekṣaṇaḥ śvasan | abhyadravaccharaughaistaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ mahābalam
क्रोध से लाल आँखें किए, हाँफते हुए उसने दूसरा धनुष लेकर बाणों की झड़ी के साथ महाबली धृष्टद्युम्न पर आक्रमण किया।
श्लोक 27 (7.171.27)
दृष्ट्वा कर्णं तु संरब्धं ते वीराः षड्रथर्षभाः । पाञ्चाल्यपुत्रं त्वरिताः परिवव्रुर्जिघांसया ॥
dṛṣṭvā karṇaṃ tu saṃrabdhaṃ te vīrāḥ ṣaḍratharṣabhāḥ | pāñcālyaputraṃ tvaritāḥ parivavrurjighāṃsayā
कर्ण को क्रोध में भरा देखकर वे छह रथी-श्रेष्ठ वीर पाञ्चाल-पुत्र को मार डालने की इच्छा से तुरन्त उसे घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 28 (7.171.28)
षण्णां योधप्रवीराणां तावकानां पुरस्कृतम् । मृत्योरास्यमनुप्राप्तं धृष्टद्युम्नमममंस्महि ॥
ṣaṇṇāṃ yodhapravīrāṇāṃ tāvakānāṃ puraskṛtam | mṛtyorāsyamanuprāptaṃ dhṛṣṭadyumnamamamaṃsmahi
आपके पक्ष के छह श्रेष्ठ योद्धाओं के सामने पड़े धृष्टद्युम्न को हमने मृत्यु के मुख में पहुँचा हुआ ही मान लिया।
श्लोक 29 (7.171.29)
एतस्मिन्नेव काले तु दाशार्हो विकिरञ्छरान् । धृष्टद्युम्नं पराक्रान्तं सात्यकिः प्रत्यपद्यत ॥
etasminneva kāle tu dāśārho vikirañcharān | dhṛṣṭadyumnaṃ parākrāntaṃ sātyakiḥ pratyapadyata
ठीक उसी समय बाणों की वर्षा करता हुआ दाशार्ह सात्यकि पराक्रमी धृष्टद्युम्न के पास आ पहुँचा।
श्लोक 30 (7.171.30)
तमायान्तं महेष्वासं सात्यकिं युद्धदुर्मदम् । राधेयो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदजिह्मगैः ॥
tamāyāntaṃ maheṣvāsaṃ sātyakiṃ yuddhadurmadam | rādheyo daśabhirbāṇaiḥ pratyavidhyadajihmagaiḥ
युद्ध में उन्मत्त उस महाधनुर्धर सात्यकि को आते देखकर राधापुत्र ने दस सीधे जाने वाले बाणों से उसे बींधा।
श्लोक 31 (7.171.31)
तं सात्यकिर्महाराज विव्याध दशभिः शरैः । पश्यतां सर्ववीराणां मा गास्तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
taṃ sātyakirmahārāja vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ | paśyatāṃ sarvavīrāṇāṃ mā gāstiṣṭheti cābravīt
हे महाराज, सात्यकि ने भी सब वीरों के देखते-देखते उसे दस बाणों से बींध दिया और कहा — "भागना मत, ठहर!"
श्लोक 32 (7.171.32)
स सात्यकेस्तु बलिनः कर्णस्य च महात्मनः । आसीत्समागमो राजन्बलिवासवयोरिव ॥
sa sātyakestu balinaḥ karṇasya ca mahātmanaḥ | āsītsamāgamo rājanbalivāsavayoriva
हे राजन्, बलवान सात्यकि और महात्मा कर्ण की वह भिड़न्त बलि और इन्द्र की भिड़न्त के समान थी।
श्लोक 33 (7.171.33)
त्रासयन्रथघोषेण क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः । राजीवलोचनं कर्णं सात्यकिः प्रत्यविध्यत ॥
trāsayanrathaghoṣeṇa kṣatriyānkṣatriyarṣabhaḥ | rājīvalocanaṃ karṇaṃ sātyakiḥ pratyavidhyata
रथ की घर्घराहट से क्षत्रियों को भयभीत करते हुए क्षत्रियश्रेष्ठ सात्यकि ने कमलनयन कर्ण को बींधा।
श्लोक 34 (7.171.34)
कम्पयन्निव घोषेण धनुषो वसुधां बली । सूतपुत्रो महाराज सात्यकिं प्रत्ययोधयत् ॥
kampayanniva ghoṣeṇa dhanuṣo vasudhāṃ balī | sūtaputro mahārāja sātyakiṃ pratyayodhayat
धनुष की टंकार से मानो पृथ्वी को कँपाते हुए बलवान सूतपुत्र ने, हे महाराज, सात्यकि से लोहा लिया।
श्लोक 35 (7.171.35)
विपाठकर्णिनाराचैर्वत्सदन्तैः क्षुरैरपि । कर्णः शरशतैश्चापि शैनेयं प्रत्यविध्यत ॥
vipāṭhakarṇinārācairvatsadantaiḥ kṣurairapi | karṇaḥ śaraśataiścāpi śaineyaṃ pratyavidhyata
कर्ण ने शैनेय को विपाठ, कर्णि, नाराच, वत्सदन्त और क्षुर नामक बाणों के सैकड़ों प्रहारों से बींधा।
श्लोक 36 (7.171.36)
तथैव युध्यमानोऽपि वृष्णीनां प्रवरो युधि । अभ्यवर्षच्छरैः कर्णं तद्युद्धमभवत्समम् ॥
tathaiva yudhyamāno'pi vṛṣṇīnāṃ pravaro yudhi | abhyavarṣaccharaiḥ karṇaṃ tadyuddhamabhavatsamam
वैसे ही वृष्णियों में श्रेष्ठ सात्यकि ने भी लड़ते हुए कर्ण पर बाणों की वर्षा की, और वह युद्ध बराबरी का रहा।
श्लोक 37 (7.171.37)
तावकाश्च महाराज कर्णपुत्रश्च दंशितः । सात्यकिं विव्यधुस्तूर्णं समन्तान्निशितैः शरैः ॥
tāvakāśca mahārāja karṇaputraśca daṃśitaḥ | sātyakiṃ vivyadhustūrṇaṃ samantānniśitaiḥ śaraiḥ
हे महाराज, आपके योद्धाओं और कवचधारी कर्णपुत्र ने सब ओर से तीखे बाणों द्वारा तुरन्त सात्यकि को बींधा।
श्लोक 38 (7.171.38)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां कर्णस्य वा विभो । अविध्यत्सात्यकिः क्रुद्धो वृषसेनं स्तनान्तरे ॥
astrairastrāṇi saṃvārya teṣāṃ karṇasya vā vibho | avidhyatsātyakiḥ kruddho vṛṣasenaṃ stanāntare
हे विभो, अपने अस्त्रों से उनके और कर्ण के अस्त्रों को रोककर क्रुद्ध सात्यकि ने वृषसेन की छाती के बीच बाण मारा।
श्लोक 39 (7.171.39)
तेन बाणेन निर्विद्धो वृषसेनो विशाम्पते । न्यपतत्स रथे मूढो धनुरुत्सृज्य वीर्यवान् ॥
tena bāṇena nirviddho vṛṣaseno viśāmpate | nyapatatsa rathe mūḍho dhanurutsṛjya vīryavān
हे प्रजापालक, उस बाण से बिंधा हुआ पराक्रमी वृषसेन धनुष छोड़कर मूर्च्छित हो रथ में गिर पड़ा।
श्लोक 40 (7.171.40)
ततः कर्णो हतं मत्वा वृषसेनं महारथम् । पुत्रशोकाभिसन्तप्तः सात्यकिं प्रत्यपीडयत् ॥
tataḥ karṇo hataṃ matvā vṛṣasenaṃ mahāratham | putraśokābhisantaptaḥ sātyakiṃ pratyapīḍayat
तब महारथी वृषसेन को मरा हुआ मानकर कर्ण पुत्रशोक से जल उठा और सात्यकि को और कसकर पीड़ित करने लगा।
श्लोक 41 (7.171.41)
पीड्यमानस्तु कर्णेन युयुधानो महारथः । विव्याध बहुभिः कर्णं त्वरमाणः पुनःपुनः ॥
pīḍyamānastu karṇena yuyudhāno mahārathaḥ | vivyādha bahubhiḥ karṇaṃ tvaramāṇaḥ punaḥpunaḥ
कर्ण से पीड़ित किया जाता हुआ महारथी युयुधान फुर्ती से बार-बार अनेक बाणों से कर्ण को बींधने लगा।
श्लोक 42 (7.171.42)
स कर्णं दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं च सप्तभिः । स हस्तावापधनुषी तयोश्चिच्छेद सात्वतः ॥
sa karṇaṃ daśabhirviddhvā vṛṣasenaṃ ca saptabhiḥ | sa hastāvāpadhanuṣī tayościccheda sātvataḥ
सात्वत सात्यकि ने कर्ण को दस और वृषसेन को सात बाणों से बींधकर उन दोनों के हस्तत्राण-सहित धनुष काट डाले।
श्लोक 43 (7.171.43)
तावन्ये धनुषी सज्जे कृत्वा शत्रुभयङ्करे । युयुधानमाविध्येतां समन्तान्निशितैः शरैः ॥
tāvanye dhanuṣī sajje kṛtvā śatrubhayaṅkare | yuyudhānamāvidhyetāṃ samantānniśitaiḥ śaraiḥ
शत्रुओं को भयभीत करने वाले दूसरे धनुषों पर डोरी चढ़ाकर उन दोनों ने सब ओर से तीखे बाणों द्वारा युयुधान को बींधा।
श्लोक 44 (7.171.44)
वर्तमाने तु सङ्ग्रमे तस्मिन्वीरवरक्षये । अतीव शुश्रुवे राजन्गाण्डीवस्य महास्वनः ॥
vartamāne tu saṅgrame tasminvīravarakṣaye | atīva śuśruve rājangāṇḍīvasya mahāsvanaḥ
वीरों में श्रेष्ठों का संहार करने वाले उस संग्राम के चलते, हे राजन्, गाण्डीव की भारी टंकार अत्यन्त ज़ोर से सुनाई दी।
श्लोक 45 (7.171.45)
श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निःस्वनम् । सूतपुत्रोऽब्रवीद्राजन्दुर्योधनमिदं वचः ॥
śrutvā tu rathanirghoṣaṃ gāṇḍīvasya ca niḥsvanam | sūtaputro'bravīdrājanduryodhanamidaṃ vacaḥ
रथ की घर्घराहट और गाण्डीव की टंकार सुनकर, हे राजन्, सूतपुत्र ने दुर्योधन से यह बात कही।
कर्ण उवाच
श्लोक 46 (7.171.46)
एष सर्वां चमूं हत्वा मुख्यांश्चैव नरर्षभान् । पौरवांश्च महेष्वासो विक्षिपन्नुत्तमं धनुः ॥
eṣa sarvāṃ camūṃ hatvā mukhyāṃścaiva nararṣabhān | pauravāṃśca maheṣvāso vikṣipannuttamaṃ dhanuḥ
यह महान धनुर्धर समस्त सेना को, प्रमुख नरश्रेष्ठों को और पौरवों को भी मारकर अपना उत्तम धनुष घुमाता हुआ चला आ रहा है।
श्लोक 47 (7.171.47)
पार्थो विजयते तत्र गाण्डीवनिनदो महान् । श्रूयते रथघोषश्च वासवस्येव नर्दतः ॥
pārtho vijayate tatra gāṇḍīvaninado mahān | śrūyate rathaghoṣaśca vāsavasyeva nardataḥ
वहाँ पार्थ विजय पा रहा है; गाण्डीव का भारी निनाद सुनाई दे रहा है और गरजते हुए इन्द्र के समान उसके रथ की घर्घराहट भी।
श्लोक 48 (7.171.48)
करोति पाण्डवो व्यक्तं कर्मौपयिकमात्मनः । एषा विदार्यते राजन्बहुधा भारती चमूः ॥
karoti pāṇḍavo vyaktaṃ karmaupayikamātmanaḥ | eṣā vidāryate rājanbahudhā bhāratī camūḥ
पाण्डव स्पष्ट ही अपने योग्य कार्य कर रहा है; हे राजन्, यह भरतों की सेना अनेक प्रकार से चीरी जा रही है।
श्लोक 49 (7.171.49)
विप्रकीर्णान्यनीकानि न हि तिष्ठन्ति कर्हिचित् । वातेनेव समुद्धूतमभ्रजालं विदीर्यते ॥
viprakīrṇānyanīkāni na hi tiṣṭhanti karhicit | vāteneva samuddhūtamabhrajālaṃ vidīryate
बिखरी हुई टुकड़ियाँ कहीं भी टिक नहीं पातीं; वे हवा से उड़ाए गए बादलों के समूह की तरह छिन्न-भिन्न हो रही हैं।
श्लोक 50 (7.171.50)
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे ॥
savyasācinamāsādya bhinnā nauriva sāgare
सव्यसाची के सामने पहुँचकर यह सेना समुद्र में टूटी नाव की तरह बिखर गई है।
श्लोक 51 (7.171.51)
द्रवतां योधमुख्यानां गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । विद्धानां शतशो राजञ्श्रूयते निःस्वनो महान् ॥
dravatāṃ yodhamukhyānāṃ gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥ | viddhānāṃ śataśo rājañśrūyate niḥsvano mahān
हे राजन्, गाण्डीव से छोड़े गए बाणों से सैकड़ों की संख्या में बिंधे हुए भागते प्रमुख योद्धाओं का भारी कोलाहल सुनाई दे रहा है।
श्लोक 52 (7.171.52)
शृणु दुन्दुभिनिर्घोषमर्जुनस्य रथं प्रति । निशीथे राजशार्दूल स्तनयित्नोरिवाम्बरे ॥
śṛṇu dundubhinirghoṣamarjunasya rathaṃ prati | niśīthe rājaśārdūla stanayitnorivāmbare
हे राजाओं में सिंह, अर्जुन के रथ की ओर की दुन्दुभियों की ध्वनि सुनिए — मध्यरात्रि में आकाश में गरजते बादल की तरह।
श्लोक 53 (7.171.53)
हाहाकाररवांश्चैव सिंहनादांश्च पुष्कलान् । शृणु शब्दान्बहुविधानर्जुनस्य रथं प्रति ॥
hāhākāraravāṃścaiva siṃhanādāṃśca puṣkalān | śṛṇu śabdānbahuvidhānarjunasya rathaṃ prati
अर्जुन के रथ की ओर उठते हाहाकार, बहुत-से सिंहनादों और भाँति-भाँति की आवाज़ों को सुनिए।
श्लोक 54 (7.171.54)
अयं मध्ये स्थितोऽस्माकं सात्यकिः सात्वतां वरः । इह चेल्लभ्यते लक्ष्यं कृत्स्नाञ्जेष्यामहे परान् ॥
ayaṃ madhye sthito'smākaṃ sātyakiḥ sātvatāṃ varaḥ | iha cellabhyate lakṣyaṃ kṛtsnāñjeṣyāmahe parān
हमारे बीच यह सात्वतों में श्रेष्ठ सात्यकि खड़ा है; यदि यह निशाना हाथ आ जाए तो हम सब शत्रुओं को जीत लेंगे।
श्लोक 55 (7.171.55)
एष पाञ्चालराजस्य पुत्रो द्रोणेन सङ्गतः । सर्वतः संवृतो योधैः शूरैश्च रथसत्तमैः ॥
eṣa pāñcālarājasya putro droṇena saṅgataḥ | sarvataḥ saṃvṛto yodhaiḥ śūraiśca rathasattamaiḥ
यह पाञ्चाल राजा का पुत्र द्रोण से भिड़ा हुआ है और चारों ओर से योद्धाओं, शूरों तथा श्रेष्ठ रथियों से घिरा है।
श्लोक 56 (7.171.56)
सात्यकिं यदि हन्याम धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । असंशयं महाराज ध्रुवो नो विजयो भवेत् ॥
sātyakiṃ yadi hanyāma dhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | asaṃśayaṃ mahārāja dhruvo no vijayo bhavet
हे महाराज, यदि हम सात्यकि और पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न को मार दें, तो निस्सन्देह हमारी विजय निश्चित होगी।
श्लोक 57 (7.171.57)
सौभद्रवदिमौ वीरौ परिवार्य महारथौ । प्रयतामो महाराज निहन्तुं वृष्णिपार्षतौ ॥
saubhadravadimau vīrau parivārya mahārathau | prayatāmo mahārāja nihantuṃ vṛṣṇipārṣatau
हे महाराज, सौभद्र की तरह इन दोनों वीर महारथियों को घेरकर हम वृष्णि और पार्षत को मार डालने का प्रयत्न करें।
श्लोक 58 (7.171.58)
सव्यसाची पुरोऽभ्येति द्रोणानीकाय भारत । संसक्तं सात्यकिं ज्ञात्वा बहुभिः कुरुपुङ्गवैः ॥
savyasācī puro'bhyeti droṇānīkāya bhārata | saṃsaktaṃ sātyakiṃ jñātvā bahubhiḥ kurupuṅgavaiḥ
हे भारत, अनेक कुरुश्रेष्ठों से सात्यकि को घिरा जानकर सव्यसाची द्रोण की सेना की ओर आगे बढ़ रहा है।
श्लोक 59 (7.171.59)
तत्र गच्छन्तु बहवः प्रवरा रथसत्तमाः । यावत्पार्थो न जानाति सात्यकिं बहुभिर्वृतम् ॥
tatra gacchantu bahavaḥ pravarā rathasattamāḥ | yāvatpārtho na jānāti sātyakiṃ bahubhirvṛtam
इसलिए अनेक श्रेष्ठ रथी वहाँ जाएँ, इससे पहले कि पार्थ जाने कि सात्यकि बहुतों से घिरा है।
श्लोक 60 (7.171.60)
ते त्वरध्वं तथा शूराः शराणां मोक्षणे भृशम् । यथा त्विह व्रजत्येष परलोकाय माधवः । तथा कुरु महाराज सुनीत्या सुप्रयुक्तया ॥
te tvaradhvaṃ tathā śūrāḥ śarāṇāṃ mokṣaṇe bhṛśam | yathā tviha vrajatyeṣa paralokāya mādhavaḥ | tathā kuru mahārāja sunītyā suprayuktayā
हे शूरो, बाण छोड़ने में खूब शीघ्रता करो, जिससे यह माधव यहीं परलोक चला जाए; और हे महाराज, आप भी उत्तम नीति के भली-भाँति प्रयोग से यही कीजिए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 61 (7.171.61)
कर्णस्य मतमास्थाय पुत्रस्ते प्राह सौबलम् । यथेन्द्रः समरे राजन्प्राह विष्णुं यशस्विनम् ॥
karṇasya matamāsthāya putraste prāha saubalam | yathendraḥ samare rājanprāha viṣṇuṃ yaśasvinam
कर्ण की सम्मति मानकर आपके पुत्र ने सौबल से वैसे ही कहा, जैसे युद्ध में इन्द्र ने यशस्वी विष्णु से कहा था, हे राजन्।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 62 (7.171.62)
वृतः सहस्रैर्दशभिर्गजानामनिवर्तिनाम् । रथैश्च दशसाहस्रैस्तूर्णं याहि धनञ्जयम् ॥
vṛtaḥ sahasrairdaśabhirgajānāmanivartinām | rathaiśca daśasāhasraistūrṇaṃ yāhi dhanañjayam
कभी पीछे न हटने वाले दस हज़ार हाथियों और दस हज़ार रथों से घिरे हुए आप शीघ्र धनंजय पर चढ़ाई कीजिए।
श्लोक 63 (7.171.63)
दुःशासनो दुर्विषहः सुबाहुर्दुः प्रधर्षणः । एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तिभिर्बहुभिर्वृताः ॥
duḥśāsano durviṣahaḥ subāhurduḥ pradharṣaṇaḥ | ete tvāmanuyāsyanti pattibhirbahubhirvṛtāḥ
दुःशासन, दुर्विषह, सुबाहु और दुष्प्रधर्षण — ये अनेक पैदल सैनिकों से घिरे हुए आपके पीछे चलेंगे।
श्लोक 64 (7.171.64)
जहि कृष्णौ महाबाहो धर्मराजं च मातुल । नकुलं सहदेवं च भीमसेनं तथैव च ॥
jahi kṛṣṇau mahābāho dharmarājaṃ ca mātula | nakulaṃ sahadevaṃ ca bhīmasenaṃ tathaiva ca
हे महाबाहु मामा, दोनों कृष्णों को, धर्मराज को और नकुल, सहदेव तथा भीमसेन को भी मार डालिए।
श्लोक 65 (7.171.65)
देवानामिव देवेन्द्रे जयाशा त्वयि मे स्थिता । जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ॥
devānāmiva devendre jayāśā tvayi me sthitā | jahi mātula kaunteyānasurāniva pāvakiḥ
जैसे देवताओं की विजय की आशा इन्द्र पर टिकी होती है, वैसे ही मेरी विजय की आशा आप पर टिकी है; हे मामा, कुन्ती के पुत्रों को वैसे मार डालिए जैसे अग्निपुत्र स्कन्द ने असुरों को मारा था।
सञ्जय उवाच
श्लोक 66 (7.171.66)
एवमुक्तो ययौ पार्थान्पुत्रेण तव सौबलः । महत्या सेनया सार्धं सह पुत्रैश्च ते विभो ॥
evamukto yayau pārthānputreṇa tava saubalaḥ | mahatyā senayā sārdhaṃ saha putraiśca te vibho
आपके पुत्र के यों कहने पर सौबल, हे विभो, एक विशाल सेना और आपके पुत्रों के साथ पार्थों पर चढ़ गया।
श्लोक 67 (7.171.67)
प्रियार्थं तव पुत्राणां दिधक्षुः पाण्डुनन्दनान् । ततः प्रववृते युद्धं तावकानां परैः सह ॥
priyārthaṃ tava putrāṇāṃ didhakṣuḥ pāṇḍunandanān | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tāvakānāṃ paraiḥ saha
आपके पुत्रों का हित करने के लिए पाण्डुपुत्रों को भस्म कर डालने की इच्छा से वह चला; तब आपके योद्धाओं का शत्रुओं के साथ युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 68 (7.171.68)
प्रयाते सौबले राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् । बलेन महता युक्तः सूतपुत्रस्तु सात्वतम् ॥
prayāte saubale rājanpāṇḍavānāmanīkinīm | balena mahatā yuktaḥ sūtaputrastu sātvatam
हे राजन्, सौबल के पाण्डव-सेना की ओर चल पड़ने पर सूतपुत्र भी विशाल बल के साथ सात्वत सात्यकि की ओर बढ़ा,
श्लोक 69 (7.171.69)
अभ्ययात्त्वरितो युद्धे किरञ्शरशतान्बहून् । तथैव पार्थिवाः सर्वे सात्यकिं पर्यवारयन् ॥
abhyayāttvarito yuddhe kirañśaraśatānbahūn | tathaiva pārthivāḥ sarve sātyakiṃ paryavārayan
युद्ध में तेज़ी से सैकड़ों बाण बरसाता हुआ; और उसी प्रकार सभी राजाओं ने सात्यकि को घेर लिया।
श्लोक 70 (7.171.70)
भारद्वाजस्ततो गत्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति । महद्युद्धं तदासीत्तु द्रोणस्य निशि भारत । धृष्टद्युम्नेन वीरेण पाञ्चालैश्च सहाद्भुतम् ॥
bhāradvājastato gatvā dhṛṣṭadyumnarathaṃ prati | mahadyuddhaṃ tadāsīttu droṇasya niśi bhārata | dhṛṣṭadyumnena vīreṇa pāñcālaiśca sahādbhutam
फिर भारद्वाज (द्रोण) धृष्टद्युम्न के रथ की ओर गए; और हे भारत, रात में द्रोण का वीर धृष्टद्युम्न तथा पाञ्चालों के साथ वह महान् अद्भुत युद्ध हुआ।