द्रोण पर्व · अध्याय 172
सात्यकि से दुर्योधन की पराजय; अर्जुन का शकुनि और उलूक से युद्ध
कौरव योद्धा सात्यकि को घेर लेते हैं, पर वह उन्हें बड़ी संख्या में काट गिराता है। दुर्योधन उस पर चढ़ता है, किन्तु अपने घोड़े, सारथि और धनुष खोकर कृतवर्मा के रथ पर भाग जाता है। शकुनि हज़ारों रथों, हाथियों और घोड़ों के साथ अर्जुन को घेरता है; अर्जुन उन्हें पीछे धकेलता है और जब शकुनि तथा उसका पुत्र उलूक एक ही रथ से लड़ते हैं तो वह सारी सेना को भगा देता है, फिर कृष्ण और अर्जुन शंख बजाते हैं। उधर धृष्टद्युम्न और द्रोण बाण-वर्षा करते हैं, दोनों सेनाओं के बीच रक्त की नदी बह निकलती है, और दुर्योधन, कर्ण, द्रोण तथा अश्वत्थामा के देखते-देखते पाण्डव विजय का सिंहनाद करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.172.1)
ततस्ते प्राद्रवन्सर्वे त्वरिता युद्धदुर्मदाः । अमृष्यमाणाः संरब्धा युयुधानरथं प्रति ॥
tataste prādravansarve tvaritā yuddhadurmadāḥ | amṛṣyamāṇāḥ saṃrabdhā yuyudhānarathaṃ prati
तब वे सब, युद्ध के मद में चूर, उसे सह न पाने के कारण क्रोध से भरे हुए, तेज़ी से युयुधान के रथ की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 2 (7.172.2)
ते रथैः कल्पितै राजन्हेमरूप्यविभूषितैः । सादिभिश्च गजैश्चैव परिवव्रुः समन्ततः ॥
te rathaiḥ kalpitai rājanhemarūpyavibhūṣitaiḥ | sādibhiśca gajaiścaiva parivavruḥ samantataḥ
हे राजन्, सोने-चाँदी से सजे सुसज्जित रथों, घुड़सवारों और हाथियों के साथ उन्होंने उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 3 (7.172.3)
अथैनं कोष्ठकीकृत्य सर्वतस्ते महारथाः । सिंहनादांस्ततश्चक्रुस्तर्जयन्ति स्म सात्यकिम् ॥
athainaṃ koṣṭhakīkṛtya sarvataste mahārathāḥ | siṃhanādāṃstataścakrustarjayanti sma sātyakim
उसे चारों ओर से घेरकर उन महारथियों ने सिंहनाद किए और सात्यकि को धमकाया।
श्लोक 4 (7.172.4)
तेऽभ्यवर्षञ्छरैस्तीक्ष्णैः सात्यकिं सत्यविक्रमम् । त्वरमाणा महावीरा माधवस्य वधैषिणः ॥
te'bhyavarṣañcharaistīkṣṇaiḥ sātyakiṃ satyavikramam | tvaramāṇā mahāvīrā mādhavasya vadhaiṣiṇaḥ
माधव का वध करने की इच्छा से वे महावीर उतावले होकर सत्य-पराक्रमी सात्यकि पर तीखे बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 5 (7.172.5)
तान्दृष्ट्वा पततस्तूर्णं शैनेयः परवीरहा । प्रत्यगृह्णान्महाबाहुः प्रमुञ्चन्विशिखान्बहून् ॥
tāndṛṣṭvā patatastūrṇaṃ śaineyaḥ paravīrahā | pratyagṛhṇānmahābāhuḥ pramuñcanviśikhānbahūn
उन्हें तेज़ी से टूट पड़ते देखकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले महाबाहु शैनेय ने बहुत-से बाण छोड़ते हुए उनका सामना किया।
श्लोक 6 (7.172.6)
तत्र वीरो महेष्वासः सात्यकिर्युद्धदुर्मदः । निचकर्त शिरांस्युग्रैः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
tatra vīro maheṣvāsaḥ sātyakiryuddhadurmadaḥ | nicakarta śirāṃsyugraiḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ
वहाँ युद्ध-मद से उन्मत्त महाधनुर्धर वीर सात्यकि ने झुकी हुई गाँठों वाले उग्र बाणों से उनके सिर काट डाले।
श्लोक 7 (7.172.7)
हस्तिहस्तान्हयग्रीवान् बाहूनपि च सायुधान् । क्षुरप्रैः शातयामास तावकानां स माधवः ॥
hastihastānhayagrīvān bāhūnapi ca sāyudhān | kṣurapraiḥ śātayāmāsa tāvakānāṃ sa mādhavaḥ
उस माधव ने क्षुरप्र बाणों से आपके योद्धाओं के हाथियों की सूँड़ें, घोड़ों की गर्दनें और शस्त्रसहित भुजाएँ काट गिराईं।
श्लोक 8 (7.172.8)
पतितैश्चामरैश्चैव श्वेतच्छत्रैश्च भारत । बभूव धरणी पूर्णा नक्षत्रैर्द्यौरिव प्रभो ॥
patitaiścāmaraiścaiva śvetacchatraiśca bhārata | babhūva dharaṇī pūrṇā nakṣatrairdyauriva prabho
हे भारत, हे प्रभो, गिरे हुए चँवरों और श्वेत छत्रों से पृथ्वी ऐसी भर गई जैसे आकाश नक्षत्रों से भरा हो।
श्लोक 9 (7.172.9)
एतेषां युयुधानेन युध्यतां युधि भारत । बभूव तुमुलः शब्दः प्रेतानां क्रन्दतामिव ॥
eteṣāṃ yuyudhānena yudhyatāṃ yudhi bhārata | babhūva tumulaḥ śabdaḥ pretānāṃ krandatāmiva
हे भारत, युद्ध में युयुधान से लड़ते हुए उन योद्धाओं का ऐसा भयंकर कोलाहल उठा, मानो प्रेत विलाप कर रहे हों।
श्लोक 10 (7.172.10)
तेन शब्देन महता पूरिताऽभूद्वसुन्धरा । रात्रिः समभवच्चैव तीव्ररूपा भयावहा ॥
tena śabdena mahatā pūritā'bhūdvasundharā | rātriḥ samabhavaccaiva tīvrarūpā bhayāvahā
उस भारी कोलाहल से पृथ्वी भर गई और रात्रि अत्यन्त उग्र तथा भयावनी हो गई।
श्लोक 11 (7.172.11)
दीर्यमाणं बलं दृष्ट्वा युयुधानशराहतम् । श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे रोमहर्षणे ॥
dīryamāṇaṃ balaṃ dṛṣṭvā yuyudhānaśarāhatam | śrutvā ca vipulaṃ nādaṃ niśīthe romaharṣaṇe
युयुधान के बाणों से आहत अपनी सेना को बिखरते देखकर और मध्यरात्रि में रोमांच उठा देने वाला वह भारी शब्द सुनकर,
श्लोक 12 (7.172.12)
सुतस्तवाब्रवीद्राजन्सारथिं रथिनां वरः । यत्रैष शब्दस्तत्राश्वांश्चोदयेति पुनःपुनः ॥
sutastavābravīdrājansārathiṃ rathināṃ varaḥ | yatraiṣa śabdastatrāśvāṃścodayeti punaḥpunaḥ
हे राजन्, रथियों में श्रेष्ठ आपके पुत्र ने सारथि से बार-बार कहा, "जहाँ यह शब्द हो रहा है, वहीं घोड़े हाँको।"
श्लोक 13 (7.172.13)
तेन सञ्चोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् । सूतः सञ्चोदयामास युयुधानरथं प्रति ॥
tena sañcodyamānastu tatastāṃsturagottamān | sūtaḥ sañcodayāmāsa yuyudhānarathaṃ prati
इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर सारथि ने उन उत्तम घोड़ों को युयुधान के रथ की ओर हाँका।
श्लोक 14 (7.172.14)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दृढधन्वा जितक्लमः । शीघ्रहस्तश्चित्रयोधी युयुधानमुपाद्रवत् ॥
tato duryodhanaḥ kruddho dṛḍhadhanvā jitaklamaḥ | śīghrahastaścitrayodhī yuyudhānamupādravat
तब दृढ़ धनुष वाला, थकान को जीत चुका, फुर्तीले हाथों वाला, अद्भुत ढंग से लड़ने वाला दुर्योधन क्रुद्ध होकर युयुधान पर झपटा।
श्लोक 15 (7.172.15)
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः शोणितभोजनैः । दुर्योधनं द्वादशभिर्माधवः प्रत्यविध्यत ॥
tataḥ pūrṇāyatotsṛṣṭaiḥ śaraiḥ śoṇitabhojanaiḥ | duryodhanaṃ dvādaśabhirmādhavaḥ pratyavidhyata
तब माधव ने पूरी तरह खींचकर छोड़े गए रक्त पीने वाले बारह बाणों से दुर्योधन को बींध दिया।
श्लोक 16 (7.172.16)
दुर्योधनस्तेन तथा पूर्वमेवार्दितः शरैः । शैनेयं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदमर्षितः ॥
duryodhanastena tathā pūrvamevārditaḥ śaraiḥ | śaineyaṃ daśabhirbāṇaiḥ pratyavidhyadamarṣitaḥ
पहले ही उन बाणों से पीड़ित दुर्योधन ने क्रोध में आकर बदले में शैनेय को दस बाणों से बींधा।
श्लोक 17 (7.172.17)
ततः समभवद्युद्धं तुमुलं भरतर्षभ । पाञ्चालानां च सर्वेषां भरतानां च दारुणम् ॥
tataḥ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ bharatarṣabha | pāñcālānāṃ ca sarveṣāṃ bharatānāṃ ca dāruṇam
हे भरतश्रेष्ठ, तब पाञ्चालों और भरतों के बीच भयंकर, घमासान युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 18 (7.172.18)
शैनेयस्तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं महारथम् । सायकानामशीत्या तु विव्याधोरसि भारत ॥
śaineyastu raṇe kruddhastava putraṃ mahāratham | sāyakānāmaśītyā tu vivyādhorasi bhārata
हे भारत, रण में क्रुद्ध शैनेय ने आपके महारथी पुत्र की छाती में अस्सी बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 19 (7.172.19)
ततोऽस्य वाहान्समरे शरैर्निन्ये यमक्षयम् । सारथिं च रथात्तूर्णं पातयामास पत्रिणा ॥
tato'sya vāhānsamare śarairninye yamakṣayam | sārathiṃ ca rathāttūrṇaṃ pātayāmāsa patriṇā
फिर उसने बाणों से उसके घोड़ों को यमलोक भेज दिया और एक बाण से उसके सारथि को शीघ्र ही रथ से गिरा दिया।
श्लोक 20 (7.172.20)
हताश्वे तु रथेऽतिष्ठन्पुत्रस्तव विशाम्पते । मुमोच निशितान्बाणाञ्शैनेयस्य रथं प्रति ॥
hatāśve tu rathe'tiṣṭhanputrastava viśāmpate | mumoca niśitānbāṇāñśaineyasya rathaṃ prati
हे प्रजापालक, घोड़ों के मारे जाने पर भी रथ पर खड़े आपके पुत्र ने शैनेय के रथ पर तीखे बाण छोड़े।
श्लोक 21 (7.172.21)
शरान्पञ्चशतांस्तस्मै शैनेयः कृतहस्तवत् । चिच्छेद समरे राजन्प्रेषितांस्तनयेन ते ॥
śarānpañcaśatāṃstasmai śaineyaḥ kṛtahastavat | ciccheda samare rājanpreṣitāṃstanayena te
हे राजन्, शैनेय ने निपुण हाथों से आपके पुत्र के चलाए हुए उन पाँच सौ बाणों को युद्ध में काट डाला।
श्लोक 22 (7.172.22)
अथापरेण भल्लेन मुष्टिदेशे महद्धनुः । चिच्छेद तरसा युद्धे तव पुत्रस्य माधवः ॥
athāpareṇa bhallena muṣṭideśe mahaddhanuḥ | ciccheda tarasā yuddhe tava putrasya mādhavaḥ
फिर माधव ने एक दूसरे भल्ल से युद्ध में आपके पुत्र के विशाल धनुष को मुट्ठी वाले स्थान पर वेग से काट डाला।
श्लोक 23 (7.172.23)
विरथो विधनुष्कश्च सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । आरुरोह रथं तूर्णं भास्वरं कृतवर्मणः ॥
viratho vidhanuṣkaśca sarvalokeśvaraḥ prabhuḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ bhāsvaraṃ kṛtavarmaṇaḥ
रथहीन और धनुषहीन हो जाने पर समस्त लोक का वह प्रभु शीघ्र ही कृतवर्मा के चमकते रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 24 (7.172.24)
दुर्योधने परावृत्ते शैनेयस्तव वाहिनीम् । द्रावयामास विशिखैर्निशामध्ये विशाम्पते ॥
duryodhane parāvṛtte śaineyastava vāhinīm | drāvayāmāsa viśikhairniśāmadhye viśāmpate
दुर्योधन के लौट जाने पर, हे प्रजापालक, शैनेय ने आधी रात में अपने बाणों से आपकी सेना को भगा दिया।
श्लोक 25 (7.172.25)
शकुनिश्चार्जुनं राजन्परिवार्य समन्ततः । रथैरनेकसाहस्रैर्गजैश्चापि सहस्रशः । तथा हयसहस्रैश्च नानाशस्त्रैरवाकिरत् ॥
śakuniścārjunaṃ rājanparivārya samantataḥ | rathairanekasāhasrairgajaiścāpi sahasraśaḥ | tathā hayasahasraiśca nānāśastrairavākirat
हे राजन्, शकुनि ने अनेक हज़ार रथों, हज़ारों हाथियों और हज़ारों घोड़ों के साथ अर्जुन को चारों ओर से घेरकर उस पर तरह-तरह के शस्त्रों की बौछार कर दी।
श्लोक 26 (7.172.26)
ते महास्त्राणि सर्वाणि विकिरन्तोऽर्जुनं प्रति । अर्जुनं योधयन्ति स्म क्षत्रियाः कालचोदिताः ॥
te mahāstrāṇi sarvāṇi vikiranto'rjunaṃ prati | arjunaṃ yodhayanti sma kṣatriyāḥ kālacoditāḥ
सभी महान् अस्त्रों की अर्जुन पर वर्षा करते हुए वे क्षत्रिय, काल से प्रेरित होकर, उससे युद्ध करने लगे।
श्लोक 27 (7.172.27)
तान्यर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् । प्रत्यवारयदायस्तः प्रकुर्वन्विपुलं क्षयम् ॥
tānyarjunaḥ sahasrāṇi rathavāraṇavājinām | pratyavārayadāyastaḥ prakurvanvipulaṃ kṣayam
भारी विनाश करते हुए अर्जुन ने बिना थके रथों, हाथियों और घोड़ों के उन हज़ारों को रोक लिया।
श्लोक 28 (7.172.28)
ततस्तु समरे शूरः शकुनिः सौबलस्तदा । विव्याध निशितैर्बाणैरर्जुनं प्रहसन्निव ॥
tatastu samare śūraḥ śakuniḥ saubalastadā | vivyādha niśitairbāṇairarjunaṃ prahasanniva
तब रण में शूर सौबल शकुनि ने मानो हँसते हुए तीखे बाणों से अर्जुन को बींधा।
श्लोक 29 (7.172.29)
पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम् ॥
punaścaiva śatenāsya saṃrurodha mahāratham
और फिर सौ और बाणों से उसने उस महारथी को रोक लिया।
श्लोक 30 (7.172.30)
तमर्जुनस्तु विंशत्या विव्याध युधि भारत । अथेतरान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत ॥
tamarjunastu viṃśatyā vivyādha yudhi bhārata | athetarānmaheṣvāsāṃstribhistribhiravidhyata
हे भारत, अर्जुन ने युद्ध में उसे बीस बाणों से बींधा और अन्य महाधनुर्धरों को तीन-तीन से बींधा।
श्लोक 31 (7.172.31)
निवार्य तान्बाणगणैर्युधि राजन्धनञ्जयः । जघान तावकान्योधान्वज्रपाणिरिवासुरान् ॥
nivārya tānbāṇagaṇairyudhi rājandhanañjayaḥ | jaghāna tāvakānyodhānvajrapāṇirivāsurān
हे राजन्, युद्ध में बाणों की झड़ी से उन्हें रोककर धनंजय ने आपके योद्धाओं को ऐसे मारा जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों को मारता है।
श्लोक 32 (7.172.32)
भुजैश्छिन्नैर्महीपाल हस्तिहस्तोपमैर्मृधे । समाकीर्णा मही भाति पञ्चास्यैरिव पन्नगैः ॥
bhujaiśchinnairmahīpāla hastihastopamairmṛdhe | samākīrṇā mahī bhāti pañcāsyairiva pannagaiḥ
हे महीपाल, हाथी की सूँड़ जैसी कटी हुई भुजाओं से ढकी हुई पृथ्वी मानो पाँच फनों वाले सर्पों से भरी हुई-सी शोभित हुई।
श्लोक 33 (7.172.33)
शिरोभिः सकिरीटैश्च सुनसैश्चारुकुण्डलैः । सन्दष्टौष्ठपुटैः क्रुद्धैस्तथैवोद्वृत्तलोचनैः ॥
śirobhiḥ sakirīṭaiśca sunasaiścārukuṇḍalaiḥ | sandaṣṭauṣṭhapuṭaiḥ kruddhaistathaivodvṛttalocanaiḥ
किरीट पहने, सुन्दर नाक और मनोहर कुण्डलों वाले, क्रोध में दाँतों तले होंठ दबाए और उलटी चढ़ी आँखों वाले सिरों से —
श्लोक 34 (7.172.34)
निष्कचूडामणिधरैः क्षत्रियाणां प्रियंवदैः । पङ्कजैरिव विन्यस्तैः पर्वतैर्विबभौ मही ॥
niṣkacūḍāmaṇidharaiḥ kṣatriyāṇāṃ priyaṃvadaiḥ | paṅkajairiva vinyastaiḥ parvatairvibabhau mahī
क्षत्रियों के उन मधुरभाषी सिरों से, जो सोने के निष्क और चूड़ामणि धारण किए हुए कमलों की तरह बिखरे थे, पृथ्वी ऐसी शोभित हुई मानो कमलों से सजे पर्वतों से भरी हो।
श्लोक 35 (7.172.35)
कृत्वा तत्कर्म बीभत्सुरुग्रमुग्रपराक्रमः । विव्याध शकुनिं भूयः पञ्चभिर्नतपर्वभिः ॥
kṛtvā tatkarma bībhatsurugramugraparākramaḥ | vivyādha śakuniṃ bhūyaḥ pañcabhirnataparvabhiḥ
उस उग्र कर्म को करके उग्र पराक्रमी बीभत्सु ने फिर शकुनि को झुकी हुई गाँठों वाले पाँच बाणों से बींधा।
श्लोक 36 (7.172.36)
अताडयदुलूकं च त्रिभिरेव तथा शरैः । उलूकं पुनराजघ्ने त्रिभिरेव महायशाः ॥
atāḍayadulūkaṃ ca tribhireva tathā śaraiḥ | ulūkaṃ punarājaghne tribhireva mahāyaśāḥ
उसने उलूक को भी तीन बाणों से मारा, और उस यशस्वी ने उलूक पर फिर तीन बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 37 (7.172.37)
स तु तेन समाविद्धः क्रोधाद्द्विगुणविक्रमः । शरैरनेकसाहस्रैः सोऽर्जुनं प्रत्यविध्यत ॥
sa tu tena samāviddhaḥ krodhāddviguṇavikramaḥ | śarairanekasāhasraiḥ so'rjunaṃ pratyavidhyata
उससे इस प्रकार बिंधकर क्रोध से दुगुने पराक्रम वाला वह अनेक हज़ार बाणों से अर्जुन को बदले में बींधने लगा।
श्लोक 38 (7.172.38)
तमुलूकस्तथा विद्ध्वा वासुदेवमताडयत् । ननाद च महानादं पूरयन्निव मेदिनीम् ॥
tamulūkastathā viddhvā vāsudevamatāḍayat | nanāda ca mahānādaṃ pūrayanniva medinīm
इस प्रकार अर्जुन को बींधकर उलूक ने वासुदेव पर भी प्रहार किया और पृथ्वी को मानो भरते हुए बड़ा भारी गर्जन किया।
श्लोक 39 (7.172.39)
अर्जुनः शकुनेश्चापं सायकैरच्छिनद्रणे । निन्ये च चतुरो वाहान्यमस्य सदनं प्रति ॥
arjunaḥ śakuneścāpaṃ sāyakairacchinadraṇe | ninye ca caturo vāhānyamasya sadanaṃ prati
अर्जुन ने रण में बाणों से शकुनि का धनुष काट डाला और उसके चारों घोड़ों को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 40 (7.172.40)
ततो रथादवप्लुत्य सौबलो भरतर्षभ । उलूकस्य रथं तूर्णमारुरोह विशाम्पते ॥
tato rathādavaplutya saubalo bharatarṣabha | ulūkasya rathaṃ tūrṇamāruroha viśāmpate
तब, हे भरतश्रेष्ठ, सौबल रथ से कूदकर, हे प्रजापालक, शीघ्र ही उलूक के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 41 (7.172.41)
तावेकरथमारूढौ पितापुत्रौ महारथौ । पार्थं सिषिचतुर्बाणैर्गिरिं मेघाविवाम्बुभिः ॥
tāvekarathamārūḍhau pitāputrau mahārathau | pārthaṃ siṣicaturbāṇairgiriṃ meghāvivāmbubhiḥ
एक ही रथ पर चढ़े वे दोनों महारथी, पिता और पुत्र, पार्थ पर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे दो मेघ पर्वत पर जल बरसाते हैं।
श्लोक 42 (7.172.42)
तौ तु विद्ध्वा महाराज पाण्डवो निशितैः शरैः । विद्रावयंस्तव चमूं शतशो व्यधमच्छरैः ॥
tau tu viddhvā mahārāja pāṇḍavo niśitaiḥ śaraiḥ | vidrāvayaṃstava camūṃ śataśo vyadhamaccharaiḥ
हे महाराज, उन दोनों को तीखे बाणों से बींधकर पाण्डव ने आपकी सेना को खदेड़ दिया और सैकड़ों को बाणों से काट गिराया।
श्लोक 43 (7.172.43)
अनिलेन यथाऽभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः । विच्छिन्नानि तथा राजन्बलान्यासन्विशाम्पते ॥
anilena yathā'bhrāṇi vicchinnāni samantataḥ | vicchinnāni tathā rājanbalānyāsanviśāmpate
हे राजन्, हे प्रजापालक, जैसे हवा से बादल सब ओर बिखर जाते हैं, वैसे ही आपकी सेनाएँ छिन्न-भिन्न हो गईं।
श्लोक 44 (7.172.44)
तद्बलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं तदा निशि । प्रदुद्राव दिशः सर्वा वीक्षमाणं भयार्दितम् ॥
tadbalaṃ bharataśreṣṭha vadhyamānaṃ tadā niśi | pradudrāva diśaḥ sarvā vīkṣamāṇaṃ bhayārditam
हे भरतश्रेष्ठ, रात में इस प्रकार मारी जाती हुई वह सेना भय से पीड़ित होकर इधर-उधर देखती हुई सब दिशाओं में भाग खड़ी हुई।
श्लोक 45 (7.172.45)
उत्सृज्य वाहान्समरे चोदयन्तस्तथाऽपरे । सम्भ्रान्ताः पर्यधावन्त तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥
utsṛjya vāhānsamare codayantastathā'pare | sambhrāntāḥ paryadhāvanta tasmiṃstamasi dāruṇe
कोई युद्ध में अपने वाहनों को छोड़ गए, तो कुछ दूसरे उन्हें हाँकते रहे; घबराए हुए वे उस भयानक अँधेरे में इधर-उधर दौड़ते रहे।
श्लोक 46 (7.172.46)
विजित्य समरे योधांस्तावकान्भरतर्षभ । दध्मतुर्मुदितौ शङ्खौ वासुदेवधनञ्जयौ ॥
vijitya samare yodhāṃstāvakānbharatarṣabha | dadhmaturmuditau śaṅkhau vāsudevadhanañjayau
हे भरतश्रेष्ठ, रण में आपके योद्धाओं को जीतकर वासुदेव और धनंजय ने आनन्द से शंख बजाए।
श्लोक 47 (7.172.47)
धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः । चिच्छेद धनुषस्तूर्णं ज्यां शरेण शितेन ह ॥
dhṛṣṭadyumno mahārāja droṇaṃ viddhvā tribhiḥ śaraiḥ | ciccheda dhanuṣastūrṇaṃ jyāṃ śareṇa śitena ha
हे महाराज, धृष्टद्युम्न ने द्रोण को तीन बाणों से बींधकर एक तीखे बाण से तुरन्त उनके धनुष की डोरी काट दी।
श्लोक 48 (7.172.48)
तन्निधाय धनुर्भूमौ द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । आददेऽन्यद्धनुः शूरो वेगवत्सारवत्तरम् ॥
tannidhāya dhanurbhūmau droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ | ādade'nyaddhanuḥ śūro vegavatsāravattaram
उस धनुष को भूमि पर रखकर क्षत्रियों का मर्दन करने वाले शूर द्रोण ने दूसरा, अधिक वेगवान और अधिक सुदृढ़ धनुष उठा लिया।
श्लोक 49 (7.172.49)
धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । सारथिं पञ्चभिर्बाणै राजन्विव्याध संयुगे ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tato droṇo viddhvā saptabhirāśugaiḥ | sārathiṃ pañcabhirbāṇai rājanvivyādha saṃyuge
तब द्रोण ने धृष्टद्युम्न को सात शीघ्रगामी बाणों से बींधकर, हे राजन्, युद्ध में उसके सारथि को पाँच बाणों से बींधा।
श्लोक 50 (7.172.50)
तं निवार्य शरैस्तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः । व्यधमत्कौरवीं सेनामासुरीं मघवानिव ॥
taṃ nivārya śaraistūrṇaṃ dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | vyadhamatkauravīṃ senāmāsurīṃ maghavāniva
बाणों से उसे रोककर महारथी धृष्टद्युम्न ने तुरन्त कौरवों की सेना को ऐसे चीर डाला, जैसे इन्द्र असुरों की सेना को चीरता है।
श्लोक 51 (7.172.51)
वध्यमाने बले तस्मिंस्तव पुत्रस्य मारिष । प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी ॥
vadhyamāne bale tasmiṃstava putrasya māriṣa | prāvartata nadī ghorā śoṇitaughataraṅgiṇī
हे मारिष, आपके पुत्र की सेना के इस प्रकार कटते जाने पर रक्त की धाराओं की लहरों वाली एक भयंकर नदी बह निकली।
श्लोक 52 (7.172.52)
उभयोः सेनयोर्मध्ये नराश्वद्विपवाहिनी । तथा वैतरणी राजन्यमराजपुरं प्रति ॥
ubhayoḥ senayormadhye narāśvadvipavāhinī | tathā vaitaraṇī rājanyamarājapuraṃ prati
दोनों सेनाओं के बीच मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को बहाने वाली वह नदी, हे राजन्, यमराज के नगर की ओर जाती वैतरणी जैसी थी।
श्लोक 53 (7.172.53)
द्रावयित्वा तु तत्सैन्यं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । अभ्यराजत तेजस्वी शक्रो देवगणेष्विव ॥
drāvayitvā tu tatsainyaṃ dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | abhyarājata tejasvī śakro devagaṇeṣviva
उस सेना को भगाकर प्रतापी, तेजस्वी धृष्टद्युम्न ऐसा शोभित हुआ जैसे देवताओं के समूह में इन्द्र।
श्लोक 54 (7.172.54)
अथ दध्मुर्महाशङ्खान्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । यमौ च युयुधानश्च पाण्डवश्च वृकोदरः ॥
atha dadhmurmahāśaṅkhāndhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau | yamau ca yuyudhānaśca pāṇḍavaśca vṛkodaraḥ
तब धृष्टद्युम्न और शिखण्डी ने, दोनों जुड़वाँ भाइयों ने, युयुधान ने और पाण्डव वृकोदर ने बड़े शंख बजाए।
श्लोक 55 (7.172.55)
जित्वा रथसहस्राणि तावकानां महारथाः । सिंहनादरवांश्चक्रुः पाण्डवा जितकाशिनः ॥
jitvā rathasahasrāṇi tāvakānāṃ mahārathāḥ | siṃhanādaravāṃścakruḥ pāṇḍavā jitakāśinaḥ
आपके हज़ारों रथों को जीतकर विजय से दीप्त उन महारथी पाण्डवों ने सिंहनाद किए,
श्लोक 56 (7.172.56)
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च रणोत्कटाः । तथा द्रोणस्य शूरस्य द्रौणेश्चैव विशाम्पते ॥
paśyatastava putrasya karṇasya ca raṇotkaṭāḥ | tathā droṇasya śūrasya drauṇeścaiva viśāmpate
हे प्रजापालक, रण में उग्र वे वीर तब ऐसा कर रहे थे जब आपके पुत्र, कर्ण, वीर द्रोण और द्रोणपुत्र देखते ही रह गए।