द्रोण पर्व · अध्याय 17
संशप्तकों की शपथ और अर्जुन का प्रस्थान
शिविर लौटकर द्रोण दुर्योधन से कहते हैं कि जब तक अर्जुन रक्षा कर रहा है, युधिष्ठिर को नहीं पकड़ा जा सकता, किन्तु अर्जुन को हटा दिया जाए तो वह उनके हाथ आ जाएगा। त्रिगर्तों के राजा सुशर्मा और उसके भाई अर्जुन को दूर खींच ले जाने का बीड़ा उठाते हैं। अपने सहयोगी रथियों के साथ वे अग्नि के सामने शपथ लेते हैं कि अर्जुन को मारे बिना लौटें तो उन्हें घोर पापियों के लोक मिलें, और दक्षिण दिशा की ओर जाकर उसे ललकारते हैं। ललकार को न टालने के अपने व्रत से बँधा अर्जुन युधिष्ठिर से जाने की आज्ञा माँगता है; राजा उसे द्रोण की योजना से सावधान करते हैं, और अर्जुन राजा की रक्षा का भार सत्यजित् को सौंपकर चला जाता है। दुर्योधन की सेना हर्षित होकर राजा को पकड़ने के लिए आगे बढ़ती है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.17.1)
ते सेने शिबिरं गत्वा न्यविशेतां विशाम्पते । यथाभागं यथान्यायं यथागुल्मं च सर्वशः ॥
te sene śibiraṃ gatvā nyaviśetāṃ viśāmpate | yathābhāgaṃ yathānyāyaṃ yathāgulmaṃ ca sarvaśaḥ
हे प्रजापालक, दोनों सेनाएँ शिविरों में जाकर यथाभाग, यथाविधि और टुकड़ी-टुकड़ी के अनुसार सब ओर ठहर गईं।
श्लोक 2 (7.17.2)
कृत्वाऽवहारं सैन्यानां द्रोणः परमदुर्मनाः । दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य सव्रीडमिदमब्रवीत् ॥
kṛtvā'vahāraṃ sainyānāṃ droṇaḥ paramadurmanāḥ | duryodhanamabhiprekṣya savrīḍamidamabravīt
सेनाओं को लौटाकर अत्यन्त उदास द्रोण ने दुर्योधन की ओर देखकर लज्जा के साथ यह कहा:
द्रोण उवाच
श्लोक 3 (7.17.3)
उक्तमेतन्मया पूर्वं न तिष्ठति धनञ्जये । शक्यो ग्रहीतुं सङ्ग्रामे देवैरपि युधिष्ठिरः ॥
uktametanmayā pūrvaṃ na tiṣṭhati dhanañjaye | śakyo grahītuṃ saṅgrāme devairapi yudhiṣṭhiraḥ
"मैंने पहले ही कहा था कि जब तक धनञ्जय समीप है, तब तक देवता भी युद्ध में युधिष्ठिर को नहीं पकड़ सकते।
श्लोक 4 (7.17.4)
इति तद्वः प्रयततां कृतं पार्थेन संयुगे । मा विशङ्कीर्वचो मह्यमजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥
iti tadvaḥ prayatatāṃ kṛtaṃ pārthena saṃyuge | mā viśaṅkīrvaco mahyamajeyau kṛṣṇapāṇḍavau
तुम सबके प्रयत्न करते रहने पर भी पार्थ ने युद्ध में यही कर दिखाया। मेरी बात पर शंका मत करो; कृष्ण और अर्जुन अजेय हैं।
श्लोक 5 (7.17.5)
अपनीते तु योगेन केनचिच्छ्वेतवाहने । तत एष्यति ते राजन्वशमेष युधिष्ठिरः ॥
apanīte tu yogena kenacicchvetavāhane | tata eṣyati te rājanvaśameṣa yudhiṣṭhiraḥ
किन्तु यदि श्वेतवाहन अर्जुन को किसी उपाय से हटा दिया जाए, तो हे राजन्, यह युधिष्ठिर तुम्हारे वश में आ जाएगा।
श्लोक 6 (7.17.6)
कश्चिदाहूय तं सङ्ख्ये देशमन्यं प्रकर्षतु । तमजित्वा न कौन्तेयो निवर्तेत कथञ्चन ॥
kaścidāhūya taṃ saṅkhye deśamanyaṃ prakarṣatu | tamajitvā na kaunteyo nivarteta kathañcana
कोई उसे युद्ध में ललकारकर किसी दूसरे स्थान पर खींच ले जाए; उसे जीते बिना कुन्तीपुत्र किसी प्रकार नहीं लौटेगा।
श्लोक 7 (7.17.7)
एतस्मिन्नन्तरे शून्येधर्मराजमहं नृप । ग्रहीष्यामि चमूं भित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥
etasminnantare śūnyedharmarājamahaṃ nṛpa | grahīṣyāmi camūṃ bhittvā dhṛṣṭadyumnasya paśyataḥ
हे राजन्, इसी बीच स्थान सूना हो जाने पर मैं सेना को भेदकर धृष्टद्युम्न के देखते-देखते धर्मराज को पकड़ लूँगा।
श्लोक 8 (7.17.8)
अर्जुनेन परित्यक्तो न चेत्त्रासात्पलायते । मामुपायान्तमालोक्य गृहीतं विद्धि पाण्डवम् ॥
arjunena parityakto na cettrāsātpalāyate | māmupāyāntamālokya gṛhītaṃ viddhi pāṇḍavam
यदि अर्जुन से छूटा हुआ वह भय से न भागा, तो मुझे पास आता देखकर उस पाण्डव को पकड़ा हुआ ही समझो।
श्लोक 9 (7.17.9)
एवं तेऽहं महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । समानेष्यामि सगणं वशमद्य न संशयः ॥
evaṃ te'haṃ mahārāja dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | samāneṣyāmi sagaṇaṃ vaśamadya na saṃśayaḥ
हे महाराज, इस प्रकार मैं धर्मपुत्र युधिष्ठिर को उसके दल सहित आज तुम्हारे वश में ले आऊँगा; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 10 (7.17.10)
यदि तिष्ठति सङ्ग्रामे मुहूर्तमपि पाण्डवः । अथापयाति सङ्ग्रामाद्विजयात्तद्विशिष्यते ॥
yadi tiṣṭhati saṅgrāme muhūrtamapi pāṇḍavaḥ | athāpayāti saṅgrāmādvijayāttadviśiṣyate
यदि पाण्डव युद्ध में एक मुहूर्त भी ठहरता है, अथवा युद्ध से हट जाता है, तो वह भी विजय से बढ़कर होगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 11 (7.17.11)
द्रोणस्य तद्वचः श्रुत्वा त्रिगर्ताधिपतिस्तदा । भ्रातृभिः सहितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
droṇasya tadvacaḥ śrutvā trigartādhipatistadā | bhrātṛbhiḥ sahito rājannidaṃ vacanamabravīt
द्रोण की वह बात सुनकर, हे राजन्, त्रिगर्तों के अधिपति ने अपने भाइयों के साथ यह वचन कहा:
सुशर्मोवाच
श्लोक 12 (7.17.12)
वयं विनिकृता राजन्सदा गाण्डीवधन्वना । अनागःस्वपि चागस्तत्कृतमस्मासु तेन वै ॥
vayaṃ vinikṛtā rājansadā gāṇḍīvadhanvanā | anāgaḥsvapi cāgastatkṛtamasmāsu tena vai
"हे राजन्, गाण्डीवधारी ने सदा हमारा अपमान किया है; हम निरपराध थे, फिर भी उसने हमारे प्रति अपराध किए।
श्लोक 13 (7.17.13)
ते वयं स्मरमाणास्तान्विनिकारान्पृथग्विधान् । क्रोधाग्निना दह्यमाना ह्यशेमहि सदा निशि ॥
te vayaṃ smaramāṇāstānvinikārānpṛthagvidhān | krodhāgninā dahyamānā hyaśemahi sadā niśi
उन नाना प्रकार के अपमानों को याद करते हुए हम क्रोध की अग्नि में जलते हुए सदा रात-रात भर पड़े रहते हैं।
श्लोक 14 (7.17.14)
स नो दिष्ट्याऽस्त्रसम्पन्नश्चक्षुर्विषयमागतः । कर्तारः स्म वयं कर्म यच्चिकीर्षाम हृद्गतम् ॥
sa no diṣṭyā'strasampannaścakṣurviṣayamāgataḥ | kartāraḥ sma vayaṃ karma yaccikīrṣāma hṛdgatam
सौभाग्य से वह अस्त्रों से सम्पन्न हमारी आँखों के सामने आ गया है। हम अपने हृदय की इच्छा का वह कार्य अवश्य करेंगे।
श्लोक 15 (7.17.15)
भवतश्च प्रियं यत्स्यादस्माकं च यशस्करम् । वयमेनं हनिष्यामो निकृष्यायोधनाद्बहिः ॥
bhavataśca priyaṃ yatsyādasmākaṃ ca yaśaskaram | vayamenaṃ haniṣyāmo nikṛṣyāyodhanādbahiḥ
जो आपको प्रिय हो और हमारे लिए यशवर्धक हो, वही हम करेंगे; हम उसे युद्धभूमि से बाहर खींचकर मार डालेंगे।
श्लोक 16 (7.17.16)
अद्यास्त्वनर्जुना भूमिरत्रिगर्ताथ वा पुनः । सत्यं ते प्रतिजानीमो नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥
adyāstvanarjunā bhūmiratrigartātha vā punaḥ | satyaṃ te pratijānīmo naitanmithyā bhaviṣyati
आज या तो पृथ्वी अर्जुन से रहित हो जाएगी, या फिर त्रिगर्तों से। हम आपके सामने सत्य प्रतिज्ञा करते हैं; यह मिथ्या नहीं होगी।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (7.17.17)
एवं सत्यरथश्चोक्त्वा सत्यवर्मा च भारत । सत्यव्रतश्च सत्येषुः सत्यकर्मा तथैव च ॥
evaṃ satyarathaścoktvā satyavarmā ca bhārata | satyavrataśca satyeṣuḥ satyakarmā tathaiva ca
हे भरतवंशी, ऐसा कहकर सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु और सत्यकर्मा,
श्लोक 18 (7.17.18)
सहिता भ्रातरः पञ्च रथानामयुतेन च । न्यवर्तन्त महाराज कृत्वा शपथमाहवे ॥
sahitā bhrātaraḥ pañca rathānāmayutena ca | nyavartanta mahārāja kṛtvā śapathamāhave
ये पाँचों भाई दस हज़ार रथों के साथ, हे महाराज, युद्ध में शपथ लेकर आगे बढ़े।
श्लोक 19 (7.17.19)
मालवास्तुण्डिकेराश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः । सुशर्मा च नरव्याघ्रस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः ॥
mālavāstuṇḍikerāśca rathānāmayutaistribhiḥ | suśarmā ca naravyāghrastrigartaḥ prasthalādhipaḥ
मालव और तुण्डिकेर तीस हज़ार रथों के साथ, और पुरुषव्याघ्र सुशर्मा, जो प्रस्थल के त्रिगर्त-अधिपति थे,
श्लोक 20 (7.17.20)
मावेल्लकैर्ललित्थैश्च सहितो मद्रकैरपि । रथानामयुतेनैव सोऽगमद्धातृभिः सह ॥
māvellakairlalitthaiśca sahito madrakairapi | rathānāmayutenaiva so'gamaddhātṛbhiḥ saha
मावेल्लक, ललित्थ और मद्रकों के साथ, दस हज़ार रथों सहित अपने भाइयों के साथ चला।
श्लोक 21 (7.17.21)
नानाजनपदेभ्यश्च रथानामयुतं पुनः । समुत्थितं विशिष्टानां शपथार्थमुपागमत् ॥
nānājanapadebhyaśca rathānāmayutaṃ punaḥ | samutthitaṃ viśiṣṭānāṃ śapathārthamupāgamat
नाना जनपदों से उठे हुए चुने हुए योद्धाओं के दस हज़ार रथ और भी शपथ लेने के लिए आ पहुँचे।
श्लोक 22 (7.17.22)
ततो ज्वलनमानर्च्य हुत्वा सर्वे पृथक्पृथक् । जगृहुः कुशचीराणि चित्राणि कवचानि च ॥
tato jvalanamānarcya hutvā sarve pṛthakpṛthak | jagṛhuḥ kuśacīrāṇi citrāṇi kavacāni ca
तब उन सबने अलग-अलग अग्नि की पूजा कर आहुति दी, और कुश के चीर तथा विचित्र कवच धारण किए।
श्लोक 23 (7.17.23)
ते च बद्धतनुत्राणा घृताक्ताः कुशचीरिणः । मौर्वीमेखलिनो वीराः सहस्रशतदक्षिणाः ॥
te ca baddhatanutrāṇā ghṛtāktāḥ kuśacīriṇaḥ | maurvīmekhalino vīrāḥ sahasraśatadakṣiṇāḥ
कवच बाँधे, घी से चुपड़े, कुश के चीर पहने और मौर्वी की मेखला बाँधे हुए वे वीर सैकड़ों और हज़ारों की दक्षिणा देने वाले थे।
श्लोक 24 (7.17.24)
यज्वानः पुत्रिणो लोक्याः कृतकृत्यास्तनुत्यजः । योक्ष्यमाणास्तदाऽऽत्मानं यशसा विजयेन च ॥
yajvānaḥ putriṇo lokyāḥ kṛtakṛtyāstanutyajaḥ | yokṣyamāṇāstadā''tmānaṃ yaśasā vijayena ca
वे यज्ञ कर चुके थे, पुत्रवान् थे, पुण्यलोकों के अधिकारी थे, कृतकृत्य थे और शरीर त्यागने को तैयार थे; अब वे अपने को यश और विजय से जोड़ने जा रहे थे।
श्लोक 25 (7.17.25)
ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । प्राप्याँल्लोकान्सुयुद्धेन क्षिप्रमेव यियासवः ॥
brahmacaryaśrutimukhaiḥ kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ | prāpyām̐llokānsuyuddhena kṣiprameva yiyāsavaḥ
ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन प्रधान अनुष्ठानों तथा पूरी दक्षिणा वाले यज्ञों के द्वारा, वे उत्तम युद्ध से प्राप्त होने वाले लोकों में शीघ्र ही जाना चाहते थे।
श्लोक 26 (7.17.26)
ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च निष्कान्दत्वा पृथक्पृथक् । गाश्च वासांसि च पुनः समाभाष्य परस्परम् ॥
brāhmaṇāṃstarpayitvā ca niṣkāndatvā pṛthakpṛthak | gāśca vāsāṃsi ca punaḥ samābhāṣya parasparam
उन्होंने अलग-अलग निष्क (स्वर्ण-मुद्राएँ), गौएँ और वस्त्र देकर ब्राह्मणों को तृप्त किया और आपस में बातचीत की;
श्लोक 27 (7.17.27)
द्विजमुख्यैः समुदितैः कृतस्वस्त्ययनाशिषः । मुदिताश्च प्रहृष्टाश्च जलं संस्पृश्य निर्मलम् ॥
dvijamukhyaiḥ samuditaiḥ kṛtasvastyayanāśiṣaḥ | muditāśca prahṛṣṭāśca jalaṃ saṃspṛśya nirmalam
श्रेष्ठ द्विजों के एकत्र होने पर उनसे स्वस्तिवाचन और आशीर्वाद पाकर, हर्षित और प्रसन्न होकर, निर्मल जल का स्पर्श (आचमन) करके,
श्लोक 28 (7.17.28)
प्रज्वाल्य कृष्णवर्त्मानमुपागम्य रणव्रतम् । तस्मिन्नग्नौ तदा चक्रुः प्रतिज्ञां दृढनिश्चयाः ॥
prajvālya kṛṣṇavartmānamupāgamya raṇavratam | tasminnagnau tadā cakruḥ pratijñāṃ dṛḍhaniścayāḥ
उन दृढ़निश्चयी वीरों ने कृष्णवर्त्मा अग्नि को प्रज्वलित कर, रणव्रत स्वीकार करते हुए, उसी अग्नि के सामने प्रतिज्ञा की।
श्लोक 29 (7.17.29)
शृण्वतां सर्वभूतानामुच्चैर्वाचो बभाषिरे । सर्वे धनञ्जयवधे प्रतिज्ञां चापि चक्रिरे ॥
śṛṇvatāṃ sarvabhūtānāmuccairvāco babhāṣire | sarve dhanañjayavadhe pratijñāṃ cāpi cakrire
सब प्राणियों के सुनते हुए उन्होंने ऊँचे स्वर में कहा, और सबने धनञ्जय के वध की प्रतिज्ञा भी की:
संशप्तका ऊचुः
श्लोक 30 (7.17.30)
ये वै लोकाश्चाव्रतिनां ये चैव ब्रह्मघातिनाम् । मद्यपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च ॥
ye vai lokāścāvratināṃ ye caiva brahmaghātinām | madyapasya ca ye lokā gurudāraratasya ca
"जो लोक व्रतहीनों के हैं, ब्रह्महत्यारों के हैं, मद्य पीने वाले के हैं और गुरुपत्नी में आसक्त के हैं,
श्लोक 31 (7.17.31)
ब्रह्मस्वहारिणश्चैव राजपिण्डापहारिणः । शरणागतं च त्यजतो याचमानं तथा घ्नतः ॥
brahmasvahāriṇaścaiva rājapiṇḍāpahāriṇaḥ | śaraṇāgataṃ ca tyajato yācamānaṃ tathā ghnataḥ
जो ब्राह्मण का धन हरने वालों के हैं, राजा का अन्न छीनने वालों के हैं, शरणागत को त्यागने वाले और याचक को मारने वाले के हैं,
श्लोक 32 (7.17.32)
अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि । अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्विषामपि ॥
agāradāhināṃ caiva ye ca gāṃ nighnatāmapi | apakāriṇāṃ ca ye lokā ye ca brahmadviṣāmapi
जो घर जलाने वालों के हैं, गौ को मारने वालों के हैं, दूसरों का अपकार करने वालों के हैं और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों के हैं,
श्लोक 33 (7.17.33)
स्वभार्यामृतुकालेषु मोहाद्वै नाभिगच्छताम् । श्राद्धमैथुनिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम् ॥
svabhāryāmṛtukāleṣu mohādvai nābhigacchatām | śrāddhamaithunikānāṃ ca ye cāpyātmāpahāriṇām
जो मोहवश ऋतुकाल में अपनी पत्नी के पास नहीं जाते, जो श्राद्ध के दिन मैथुन करते हैं और जो अपनी जाति को छिपाते हैं, उनके लोक,
श्लोक 34 (7.17.34)
न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशयतां च ये । क्लीबेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम् ॥
nyāsāpahāriṇāṃ ye ca śrutaṃ nāśayatāṃ ca ye | klībena yudhyamānānāṃ ye ca nīcānusāriṇām
जो धरोहर हड़पने वालों के हैं, अपनी प्रतिज्ञा को नष्ट करने वालों के हैं, नपुंसक के साथ लड़ने वालों के हैं और जो नीचों का अनुसरण करते हैं, उनके लोक,
श्लोक 35 (7.17.35)
नास्तिकानां च ये लोका येऽग्निमातृपितृत्यजाम् । तानाप्नुयामहे लोकान्ये च पापकृतामपि ॥
nāstikānāṃ ca ye lokā ye'gnimātṛpitṛtyajām | tānāpnuyāmahe lokānye ca pāpakṛtāmapi
जो नास्तिकों के हैं, अग्नि, माता और पिता को त्यागने वालों के हैं और जो पापियों के भी हैं, उन लोकों को हम पाएँ,
श्लोक 36 (7.17.36)
यद्यहत्वा वयं युद्धे निवर्तेम धनञ्जयम् । तेन चाभ्यर्दितास्त्रासाद्भवेमहि पराङ्मुखाः ॥
yadyahatvā vayaṃ yuddhe nivartema dhanañjayam | tena cābhyarditāstrāsādbhavemahi parāṅmukhāḥ
यदि हम धनञ्जय को मारे बिना युद्ध से लौट आएँ, अथवा उससे पीड़ित होकर भय से पीठ दिखाएँ।
श्लोक 37 (7.17.37)
यदि त्वसुकरं लोके कर्म कुर्याम संयुगे । इष्टाँल्लोकान्प्राप्नुयामो वयमद्य न संशयः ॥
yadi tvasukaraṃ loke karma kuryāma saṃyuge | iṣṭām̐llokānprāpnuyāmo vayamadya na saṃśayaḥ
किन्तु यदि हम युद्ध में ऐसा कर्म कर दिखाएँ जो संसार में दुष्कर है, तो आज हम अपने इष्ट लोकों को निस्संदेह प्राप्त करेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (7.17.38)
एवमुक्त्वा तदा राजंस्तेऽभ्यवर्तन्त संयुगे । आह्वयन्तोऽर्जुनं वीराः पितृजुष्टां दिशं प्रति ॥
evamuktvā tadā rājaṃste'bhyavartanta saṃyuge | āhvayanto'rjunaṃ vīrāḥ pitṛjuṣṭāṃ diśaṃ prati
हे राजन्, ऐसा कहकर वे वीर अर्जुन को ललकारते हुए पितृजुष्ट (दक्षिण) दिशा की ओर युद्ध के लिए बढ़े।
श्लोक 39 (7.17.39)
आहूतस्तैर्नरव्याघ्रैः पार्थः परपुरञ्जयः । धर्मराजमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥
āhūtastairnaravyāghraiḥ pārthaḥ parapurañjayaḥ | dharmarājamidaṃ vākyamapadāntaramabravīt
उन पुरुषव्याघ्रों द्वारा ललकारे जाने पर शत्रुनगरों को जीतने वाले पार्थ ने तुरन्त धर्मराज से यह बात कही:
अर्जुन उवाच
श्लोक 40 (7.17.40)
आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् । संशप्तकाश्च मां राजन्नाह्वयन्ति महामृधे ॥
āhūto na nivarteyamiti me vratamāhitam | saṃśaptakāśca māṃ rājannāhvayanti mahāmṛdhe
"ललकारे जाने पर मैं पीछे नहीं हटूँगा, यह मेरा व्रत निश्चित है। और हे राजन्, संशप्तक इस महायुद्ध में मुझे ललकार रहे हैं।
श्लोक 41 (7.17.41)
एष च भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयते रणे । वधाय सगणस्यास्य मामनुज्ञातुमर्हसि ॥
eṣa ca bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ suśarmā''hvayate raṇe | vadhāya sagaṇasyāsya māmanujñātumarhasi
यह सुशर्मा भी अपने भाइयों के साथ युद्ध में मुझे बुला रहा है। इसे इसके दलबल सहित मारने के लिए आप मुझे आज्ञा दें।
श्लोक 42 (7.17.42)
नैतच्छक्नोमि संसोढुमाह्वानं पुरुषर्षभ । सत्यं ते प्रतिजानामि हतान्विद्धि परान्युधि ॥
naitacchaknomi saṃsoḍhumāhvānaṃ puruṣarṣabha | satyaṃ te pratijānāmi hatānviddhi parānyudhi
हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं यह ललकार सहन नहीं कर सकता। मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ: युद्ध में शत्रुओं को मरा हुआ ही समझिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 43 (7.17.43)
श्रुतं ते तत्त्वतस्तात यद्द्रोणस्य चिकीर्षितम् । यथा तदनृतं तस्य भवेत्तत्त्वं समाचर ॥
śrutaṃ te tattvatastāta yaddroṇasya cikīrṣitam | yathā tadanṛtaṃ tasya bhavettattvaṃ samācara
"तात, द्रोण का जो अभिप्राय है, वह तुमने ठीक-ठीक सुन लिया है। अब ऐसा उचित कार्य करो कि उनका वह अभिप्राय असफल हो जाए।
श्लोक 44 (7.17.44)
द्रोणो हि बलवाञ्शूरः कृतास्त्रश्च जितश्रमः । प्रतिज्ञातं च तेनैतद्ग्रहणं मे महारथ ॥
droṇo hi balavāñśūraḥ kṛtāstraśca jitaśramaḥ | pratijñātaṃ ca tenaitadgrahaṇaṃ me mahāratha
द्रोण बलवान् हैं, शूर हैं, अस्त्रविद्या में निपुण हैं और थकते नहीं; हे महारथी, मुझे पकड़ने की उन्होंने प्रतिज्ञा भी की है।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 45 (7.17.45)
अयं वै सत्यजिद्राजन्नद्य त्वां रक्षिता युधि । ध्रियमाणे च पाञ्चाल्ये नाचार्यः काममाप्स्यति ॥
ayaṃ vai satyajidrājannadya tvāṃ rakṣitā yudhi | dhriyamāṇe ca pāñcālye nācāryaḥ kāmamāpsyati
"हे राजन्, ये सत्यजित् आज युद्ध में आपकी रक्षा करेंगे। जब तक यह पाञ्चाल जीवित है, तब तक आचार्य अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाएँगे।
श्लोक 46 (7.17.46)
हते तु पुरुषव्याघ्रे रणे सत्यजिति प्रभो । सर्वैरपि समेतैर्वा न स्थातव्यं कथंचन ॥
hate tu puruṣavyāghre raṇe satyajiti prabho | sarvairapi sametairvā na sthātavyaṃ kathaṃcana
किन्तु, हे प्रभु, यदि पुरुषव्याघ्र सत्यजित् युद्ध में मारे जाएँ, तो फिर चाहे सब लोग साथ ही क्यों न हों, आप किसी प्रकार वहाँ न ठहरें।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (7.17.47)
अनुज्ञातस्ततो राज्ञा परिष्वक्तश्च फल्गुनः । प्रेम्णा दृष्टश्च बहुधा ह्याशिषश्चास्य योजिताः ॥
anujñātastato rājñā pariṣvaktaśca phalgunaḥ | premṇā dṛṣṭaśca bahudhā hyāśiṣaścāsya yojitāḥ
तब राजा की अनुमति पाकर, उनके आलिंगन में बँधकर, प्रेम से बहुत बार देखे जाकर और आशीर्वाद पाकर अर्जुन चला।
श्लोक 48 (7.17.48)
विहायैनं ततः पार्थस्त्रिगर्तान्प्रत्ययाद्बली । क्षुधितः क्षुद्विघातार्थं सिंहो मृगगणानिव ॥
vihāyainaṃ tataḥ pārthastrigartānpratyayādbalī | kṣudhitaḥ kṣudvighātārthaṃ siṃho mṛgagaṇāniva
उन्हें छोड़कर बलशाली पार्थ भरोसे के साथ त्रिगर्तों की ओर चल पड़ा, जैसे भूखा सिंह अपनी भूख मिटाने के लिए मृगों के झुण्डों की ओर जाता है।
श्लोक 49 (7.17.49)
ततो दौर्योधनं सैन्यं मुदा परमया युतम् । ऋतेऽर्जुनं भृशं क्रुद्धं धर्मराजस्य निग्रहे ॥
tato dauryodhanaṃ sainyaṃ mudā paramayā yutam | ṛte'rjunaṃ bhṛśaṃ kruddhaṃ dharmarājasya nigrahe
तब अर्जुन के चले जाने पर दुर्योधन की सेना अत्यन्त हर्ष से भर गई और धर्मराज को पकड़ने के लिए बहुत उग्र हो उठी।
श्लोक 50 (7.17.50)
ततोऽन्योन्येन ते सैन्ये समाजग्मतुरोजसा । गङ्गासरय्वौ वेगेन प्रावृषीवोल्बणोदके ॥
tato'nyonyena te sainye samājagmaturojasā | gaṅgāsarayvau vegena prāvṛṣīvolbaṇodake
फिर वे दोनों सेनाएँ वर्षा ऋतु में उफनते जल वाली गंगा और सरयू के समान बड़े वेग से एक-दूसरे से टकराईं।