द्रोण पर्व · अध्याय 18
संशप्तकों का अर्जुन से सामना
संशप्तक अर्धचन्द्र व्यूह बनाकर खड़े हैं और अर्जुन को आता देख गर्जना करते हैं। अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि ये त्रिगर्त जहाँ रोना चाहिए वहाँ हर्षित हैं; वे उनकी सेना के निकट पहुँचकर देवदत्त शंख फूँकते हैं, जिससे उनकी सेना भय से जड़ हो जाती है। बाणों के पहले आदान-प्रदान के बाद सुबाहु, सुशर्मा और अन्य त्रिगर्त-वीर मिलकर अर्जुन पर टूटते हैं; अर्जुन उनके धनुष, ध्वजाएँ और योद्धा काट डालते हैं और सुधन्वा का सिर उड़ा देते हैं। सेना टूटने लगती है तो त्रिगर्तराज उनकी शपथों की याद दिलाकर उन्हें ललकारता है, और संशप्तक तथा नारायण लौटकर फिर लड़ने लगते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.18.1)
ततः संशप्तका राजन्समे देशे व्यवस्थिताः । व्यूढानीकै रथैरेव चन्द्रार्धाख्यैर्मुदा युताः ॥
tataḥ saṃśaptakā rājansame deśe vyavasthitāḥ | vyūḍhānīkai rathaireva candrārdhākhyairmudā yutāḥ
हे राजन्, तब संशप्तक समतल भूमि पर अपने रथों की अर्धचन्द्र नामक व्यूह-रचना करके हर्ष से भरे हुए डट गए।
श्लोक 2 (7.18.2)
ते किरीटिनमायान्तं दृष्ट्वा हर्षेण मारिष । अतीव सम्प्रहृष्टास्ते ह्युपलक्ष्य धनञ्जयम् । उदक्रोशन्नरव्याघ्राः शब्देन महता तदा ॥
te kirīṭinamāyāntaṃ dṛṣṭvā harṣeṇa māriṣa | atīva samprahṛṣṭāste hyupalakṣya dhanañjayam | udakrośannaravyāghrāḥ śabdena mahatā tadā
हे मान्यवर, किरीटधारी अर्जुन को आते देखकर वे हर्ष से भर उठे। धनञ्जय को पहचानकर अत्यन्त आनन्दित हुए उन नरश्रेष्ठों ने उस समय बड़े ज़ोर से गर्जना की।
श्लोक 3 (7.18.3)
स दिशः प्रदिशः सर्वा नभश्चैव समावृणोत् । आवृतत्वाच्च लोकस्य नासीत्तत्र प्रतिस्वनः ॥
sa diśaḥ pradiśaḥ sarvā nabhaścaiva samāvṛṇot | āvṛtatvācca lokasya nāsīttatra pratisvanaḥ
उस नाद ने सब दिशाओं, उपदिशाओं और आकाश को भर दिया; और जगत् के उससे भर जाने के कारण वहाँ कोई प्रतिध्वनि सुनाई नहीं दी।
श्लोक 4 (7.18.4)
सोऽतीव संप्रहृष्टांस्तानुपलभ्य धनञ्जयः । किञ्चिदभ्युत्स्मयन्कृष्णमिदं वचनमब्रवीत् ॥
so'tīva saṃprahṛṣṭāṃstānupalabhya dhanañjayaḥ | kiñcidabhyutsmayankṛṣṇamidaṃ vacanamabravīt
उन्हें इस प्रकार अत्यन्त हर्षित देखकर धनञ्जय ने थोड़ा मुसकराकर कृष्ण से यह वचन कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 5 (7.18.5)
देवकीपुत्र पश्येमान्मुमूर्षूनद्य संयुगे । भ्रातॄंस्त्रैगर्तकानेतान्रोदितव्ये प्रहर्षितान् ॥
devakīputra paśyemānmumūrṣūnadya saṃyuge | bhrātṝṃstraigartakānetānroditavye praharṣitān
"हे देवकीपुत्र, इन त्रिगर्त-भाइयों को देखो, जो आज युद्ध में मरने वाले हैं, फिर भी जहाँ रोना चाहिए वहाँ हर्ष मना रहे हैं।"
श्लोक 6 (7.18.6)
अथ वा हर्षकालोऽयं त्रैगर्तानामसंशयम् । कुनरैर्दुरवापान्हि लोकान्प्राप्स्यन्त्यनुत्तमान् ॥
atha vā harṣakālo'yaṃ traigartānāmasaṃśayam | kunarairduravāpānhi lokānprāpsyantyanuttamān
"अथवा त्रिगर्तों के लिए यह निस्सन्देह हर्ष का ही समय है, क्योंकि वे उन सर्वोत्तम लोकों को पाएँगे जिन्हें नीच मनुष्य कठिनाई से ही पा सकते हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (7.18.7)
एवमुक्त्वा महाबाहुर्हृषीकेशं ततोऽर्जुनः । आससाद रणे व्यूढां त्रिगर्तानामनीकिनीम् ॥
evamuktvā mahābāhurhṛṣīkeśaṃ tato'rjunaḥ | āsasāda raṇe vyūḍhāṃ trigartānāmanīkinīm
हृषीकेश से ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुन रणभूमि में त्रिगर्तों की व्यूह-बद्ध सेना के निकट जा पहुँचे।
श्लोक 8 (7.18.8)
स देवदत्तमादाय शङ्खं हेमपरिष्कृतम् । दध्मौ वेगेन महता घोषेणापूरयन्दिशः ॥
sa devadattamādāya śaṅkhaṃ hemapariṣkṛtam | dadhmau vegena mahatā ghoṣeṇāpūrayandiśaḥ
सोने से सजे अपने देवदत्त शंख को लेकर उन्होंने बड़े वेग से फूँका और उसकी ध्वनि से दिशाओं को भर दिया।
श्लोक 9 (7.18.9)
तेन शब्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी । विचेष्टाऽवस्थिता सङ्ख्ये ह्यश्मसारमयी यथा ॥
tena śabdena vitrastā saṃśaptakavarūthinī | viceṣṭā'vasthitā saṅkhye hyaśmasāramayī yathā
उस ध्वनि से भयभीत होकर संशप्तकों की सेना युद्ध में निश्चेष्ट खड़ी रह गई, मानो वह पत्थर की बनी हो।
श्लोक 10 (7.18.10)
सा सेना भरतश्रेष्ठ निश्चेष्टा शुशुभे तदा । चित्रे पटे यथा न्यस्ता कुशलैः शिल्पिभिर्नरैः ॥
sā senā bharataśreṣṭha niśceṣṭā śuśubhe tadā | citre paṭe yathā nyastā kuśalaiḥ śilpibhirnaraiḥ
हे भरतश्रेष्ठ, वह सेना उस समय निश्चल खड़ी होकर ऐसी शोभित हुई जैसे कुशल शिल्पियों ने चित्रपट पर कोई चित्र रचा हो।
श्लोक 11 (7.18.11)
स्वनेन तेन सैन्यानां दिवमावृण्वता तदा । सस्वना पृथिवी सर्वा तथैव च महोदधिः । स्वनेन तेन सैन्यानां कर्णास्तु बधिरीकृताः ॥
svanena tena sainyānāṃ divamāvṛṇvatā tadā | sasvanā pṛthivī sarvā tathaiva ca mahodadhiḥ | svanena tena sainyānāṃ karṇāstu badhirīkṛtāḥ
सेनाओं के उस घोष ने आकाश को भर दिया; सारी पृथ्वी गूँज उठी, और महासागर भी; और सेनाओं के उस घोष से कान बहरे हो गए।
श्लोक 12 (7.18.12)
वाहास्तेषां विवृत्ताक्षाः स्तब्धकर्णशिरोधराः । विष्टब्धचरणा मूत्रं रुधिरं च प्रसुस्रुवुः । ततो व्युपारमच्छब्दः प्रहृष्टास्ते ततोऽभवन् ॥
vāhāsteṣāṃ vivṛttākṣāḥ stabdhakarṇaśirodharāḥ | viṣṭabdhacaraṇā mūtraṃ rudhiraṃ ca prasusruvuḥ | tato vyupāramacchabdaḥ prahṛṣṭāste tato'bhavan
उनके घोड़ों की आँखें उलट गईं, कान और गर्दन अकड़ गए, पैर जड़ हो गए और वे मूत्र तथा रक्त बहाने लगे। फिर वह शब्द थम गया और वे सब फिर से उत्साहित हो उठे।
श्लोक 13 (7.18.13)
उपलभ्य ततः संज्ञामवस्थाप्य च वाहिनीम् । युगपत्पाण्डुपुत्राय चिक्षिपुः कङ्कपत्रिणः ॥
upalabhya tataḥ saṃjñāmavasthāpya ca vāhinīm | yugapatpāṇḍuputrāya cikṣipuḥ kaṅkapatriṇaḥ
होश सँभालकर और अपनी सेना को व्यवस्थित करके उन्होंने एक साथ पाण्डुपुत्र पर कंकपत्र लगे बाण बरसाए।
श्लोक 14 (7.18.14)
तानर्जुनः सहस्राणि दशपञ्चभिराशुगैः । अनागतानेव शरैश्चिच्छेदाशु पराक्रमी ॥
tānarjunaḥ sahasrāṇi daśapañcabhirāśugaiḥ | anāgatāneva śaraiścicchedāśu parākramī
पराक्रमी अर्जुन ने अपने दस और पाँच तीव्र बाणों से उन हज़ारों बाणों को उनके पहुँचने से पहले ही काट डाला।
श्लोक 15 (7.18.15)
ततोऽर्जुनं शितैर्बाणैर्दशभिर्दशभिः पुनः । प्राविध्यन्त ततः पार्थस्तानविध्यत्त्रिभिस्त्रिभिः ॥
tato'rjunaṃ śitairbāṇairdaśabhirdaśabhiḥ punaḥ | prāvidhyanta tataḥ pārthastānavidhyattribhistribhiḥ
तब उन्होंने फिर दस-दस तीखे बाणों से अर्जुन को बींधा, और पार्थ ने उनमें से हर एक को तीन-तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 16 (7.18.16)
एकैकस्तु ततः पार्थं राजन्विव्याध पञ्चभिः । स च तान्प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमी ॥
ekaikastu tataḥ pārthaṃ rājanvivyādha pañcabhiḥ | sa ca tānprativivyādha dvābhyāṃ dvābhyāṃ parākramī
हे राजन्, तब उनमें से हर एक ने पार्थ को पाँच-पाँच बाणों से बींधा, और उस पराक्रमी ने भी उन्हें दो-दो बाणों से बदले में बींध दिया।
श्लोक 17 (7.18.17)
भूय एव तु सङ्क्रुद्धास्त्वर्जुनं सहकेशवम् । आपूरयञ्शरैस्तीक्ष्णैस्तटाकमिव वृष्टिभिः ॥
bhūya eva tu saṅkruddhāstvarjunaṃ sahakeśavam | āpūrayañśaraistīkṣṇaistaṭākamiva vṛṣṭibhiḥ
क्रोध में भरकर उन्होंने फिर अर्जुन और केशव को तीखे बाणों से भर दिया, जैसे वर्षा की धाराएँ तालाब को भर देती हैं।
श्लोक 18 (7.18.18)
ततः शरसहस्राणि प्रापतन्नर्जुनं प्रति । भ्रमराणामिव व्राताः फुल्लं द्रुमगणं वने ॥
tataḥ śarasahasrāṇi prāpatannarjunaṃ prati | bhramarāṇāmiva vrātāḥ phullaṃ drumagaṇaṃ vane
तब हज़ारों बाण अर्जुन पर टूट पड़े, जैसे वन में फूले हुए वृक्ष-समूह पर भौंरों के झुंड टूट पड़ते हैं।
श्लोक 19 (7.18.19)
ततः सुबाहुस्त्रिंशद्भिरद्रिसारमयैः शरैः । अविध्यदिषुभिर्गाढं किरीटे सव्यसाचिनम् ॥
tataḥ subāhustriṃśadbhiradrisāramayaiḥ śaraiḥ | avidhyadiṣubhirgāḍhaṃ kirīṭe savyasācinam
तब सुबाहु ने लोहे के बने तीस बाणों से सव्यसाची के किरीट पर गहरा प्रहार किया।
श्लोक 20 (7.18.20)
तैः किरीटि किरीटस्थैर्हेमपुङ्खैरजिह्मगैः । शातकुम्भमयापीडो बभौ यूप इवोच्छ्रितः ॥
taiḥ kirīṭi kirīṭasthairhemapuṅkhairajihmagaiḥ | śātakumbhamayāpīḍo babhau yūpa ivocchritaḥ
किरीट में गड़े उन सुनहरे पंखों वाले, सीधे जाने वाले बाणों से स्वर्ण-मुकुट से सजे किरीटी ऐसे शोभित हुए जैसे खड़ा किया हुआ यज्ञ-स्तम्भ हो।
श्लोक 21 (7.18.21)
हस्तावापं सुबाहोस्तु भल्लेन युधि पाण्डवः । चिच्छेद तं चैव पुनः शरवर्षैरवाकिरत् ॥
hastāvāpaṃ subāhostu bhallena yudhi pāṇḍavaḥ | ciccheda taṃ caiva punaḥ śaravarṣairavākirat
युद्ध में पाण्डुपुत्र ने भल्ल से सुबाहु का हस्तत्राण काट डाला और फिर उसे बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 22 (7.18.22)
ततः सुशर्मा दशभिः सुरथस्तु किरीटिनम् । सुधर्मा सुधनुश्चैव सुबाहुश्च समार्पयन् ॥
tataḥ suśarmā daśabhiḥ surathastu kirīṭinam | sudharmā sudhanuścaiva subāhuśca samārpayan
तब सुशर्मा ने दस बाणों से, और सुरथ, सुधर्मा, सुधन्वा तथा सुबाहु ने भी किरीटी पर प्रहार किया।
श्लोक 23 (7.18.23)
तांस्तु सर्वान्पृथग्बाणैर्वानरप्रवरध्वजः । प्रत्यविध्यद्ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद सायकान् ॥
tāṃstu sarvānpṛthagbāṇairvānarapravaradhvajaḥ | pratyavidhyaddhvajāṃścaiṣāṃ bhallaiściccheda sāyakān
कपिश्रेष्ठ की ध्वजा वाले अर्जुन ने उन सबको अलग-अलग बाणों से बींधा, और भल्लों से उनकी ध्वजाएँ तथा बाण काट डाले।
श्लोक 24 (7.18.24)
सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हयांश्चास्यावधीच्छरैः । अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः कायादपातयत् ॥
sudhanvano dhanuśchittvā hayāṃścāsyāvadhīccharaiḥ | athāsya saśirastrāṇaṃ śiraḥ kāyādapātayat
उन्होंने सुधन्वा का धनुष काटकर बाणों से उसके घोड़ों को मार डाला और फिर टोप सहित उसका सिर धड़ से गिरा दिया।
श्लोक 25 (7.18.25)
जहार पार्थः सैन्येषु सहस्रे द्वे च योधिनाम् । तस्मिन्निपतिते वीरे त्रस्तास्तस्य पदानुगाः ॥
jahāra pārthaḥ sainyeṣu sahasre dve ca yodhinām | tasminnipatite vīre trastāstasya padānugāḥ
पार्थ ने सेना में से दो हज़ार योद्धाओं को यमलोक पहुँचा दिया। उस वीर के गिरते ही उसके अनुयायी भयभीत हो गए,
श्लोक 26 (7.18.26)
भूयिष्ठं प्रतिरुद्धा ये हतैर्योधैर्यशस्विनः । व्यद्रवन्त भयाद्भीता यत्र दौर्योधनं बलम् ॥
bhūyiṣṭhaṃ pratiruddhā ye hatairyodhairyaśasvinaḥ | vyadravanta bhayādbhītā yatra dauryodhanaṃ balam
और अपने मरे हुए योद्धाओं से घिरे हुए वे यशस्वी वीर भय से घबराकर उस ओर भागे जहाँ दुर्योधन की सेना थी।
श्लोक 27 (7.18.27)
ततो जघान सङ्क्रुद्धो वासविस्तां महाचमूम् । शरजालैरविच्छिन्नैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥
tato jaghāna saṅkruddho vāsavistāṃ mahācamūm | śarajālairavicchinnaistamaḥ sūrya ivāṃśubhiḥ
तब इन्द्रपुत्र अर्जुन ने क्रुद्ध होकर अपने अटूट बाण-जालों से उस विशाल सेना को नष्ट कर दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणों से अन्धकार को मिटा देता है।
श्लोक 28 (7.18.28)
ततो भग्ने बले तस्मिन्विप्रलीने समन्ततः । सव्यसाचिनि सङ्क्रुद्धे त्रैगर्तान्भयमाविशत् ॥
tato bhagne bale tasminvipralīne samantataḥ | savyasācini saṅkruddhe traigartānbhayamāviśat
जब वह सेना टूटकर चारों ओर बिखर गई और सव्यसाची क्रोध से भरे हुए थे, तब त्रिगर्तों के मन में भय समा गया।
श्लोक 29 (7.18.29)
ते वध्यमानाः पार्थेन शरैः सन्नतपर्वभिः । अमुह्यंस्तत्रतत्रैव त्रस्ता मृगगणा इव ॥
te vadhyamānāḥ pārthena śaraiḥ sannataparvabhiḥ | amuhyaṃstatratatraiva trastā mṛgagaṇā iva
पार्थ के झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से मारे जाते हुए वे वहीं-वहीं घबराकर हक्के-बक्के रह गए, जैसे भयभीत मृगों के झुंड।
श्लोक 30 (7.18.30)
ततस्त्रिगर्तराट् क्रुद्धस्तानुवाच महारथान् । अलं द्रुतेन वः शूरा न भयं कर्तुमर्हथ ॥
tatastrigartarāṭ kruddhastānuvāca mahārathān | alaṃ drutena vaḥ śūrā na bhayaṃ kartumarhatha
तब क्रुद्ध त्रिगर्तराज ने उन महारथियों से कहा — "शूरवीरो, बहुत भाग लिए; तुम्हें भय नहीं करना चाहिए।"
सुशर्मोवाच
श्लोक 31 (7.18.31)
शप्त्वाऽथ शपथान्घोरान्सर्वसैन्यस्य पश्यतः । गत्वा दौर्योधनं सैन्यं किं वै वक्ष्यथ मुख्यशः ॥
śaptvā'tha śapathānghorānsarvasainyasya paśyataḥ | gatvā dauryodhanaṃ sainyaṃ kiṃ vai vakṣyatha mukhyaśaḥ
"सारी सेना के देखते हुए भयंकर शपथें खाकर, हे प्रमुख वीरो, दुर्योधन की सेना में लौटकर तुम क्या कहोगे?"
श्लोक 32 (7.18.32)
नावहास्याः कथं लोके कर्मणाऽनेन संयुगे । भवेम सहिताः सर्वे निवर्तध्वं यथाबलम् ॥
nāvahāsyāḥ kathaṃ loke karmaṇā'nena saṃyuge | bhavema sahitāḥ sarve nivartadhvaṃ yathābalam
"युद्ध में इस आचरण से हम सब मिलकर संसार में उपहास का पात्र बनने से कैसे बचेंगे? अब अपने-अपने बल के अनुसार लौट पड़ो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 33 (7.18.33)
एवमुक्तास्तु ते राजन्नुदक्रोशन्मुहुर्मुहुः । शङ्खांश्च दध्मिरे वीरा हर्षयन्तः परस्परम् ॥
evamuktāstu te rājannudakrośanmuhurmuhuḥ | śaṅkhāṃśca dadhmire vīrā harṣayantaḥ parasparam
हे राजन्, इस प्रकार कहे जाने पर उन वीरों ने बार-बार गर्जना की और एक-दूसरे को हर्षित करते हुए शंख बजाए।
श्लोक 34 (7.18.34)
ततस्ते सन्न्यवर्तन्त संशप्तकगणाः पुनः । नारायणाश्च गोपाला मृत्युं कृत्वाऽनिवर्तनम् ॥
tataste sannyavartanta saṃśaptakagaṇāḥ punaḥ | nārāyaṇāśca gopālā mṛtyuṃ kṛtvā'nivartanam
तब संशप्तकों के दल फिर लौट पड़े, और उनके साथ नारायण तथा गोपाल भी, जिन्होंने पीछे हटने के बजाय मृत्यु को ही अपना निश्चय बना लिया था।