द्रोण पर्व · अध्याय 19
अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार
अर्जुन कृष्ण से संशप्तकों की ओर फिर रथ बढ़ाने को कहते हैं, और कृष्ण रथ को उनकी पंक्तियों के बीच घुमाते हैं। नारायण बाणों की झड़ी से दोनों को घेरकर छिपा देते हैं; अर्जुन शंख फूँकते हैं और त्वाष्ट्र अस्त्र का प्रयोग करते हैं, जिससे शत्रुओं को हज़ारों अर्जुन दिखाई देने लगते हैं और वे आपस में ही कट मरते हैं। "दोनों कृष्ण मारे गए" यह मानकर संशप्तक जब हर्ष मनाते हैं तब कृष्ण अर्जुन को पुकारते हैं; अर्जुन वायव्य अस्त्र से उनके बाणों और सैनिकों को उड़ा देते हैं और सेना को काट डालते हैं, यहाँ तक कि रणभूमि रुद्र की क्रीड़ा जैसी दिखने लगती है। इसी बीच अर्जुन के उलझे रहने पर द्रोणाचार्य युधिष्ठिर की ओर बढ़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.19.1)
दृष्ट्वा तु सन्निवृत्तांस्तान्संशप्तकगणान्पुनः । वासुदेवं महात्मानमर्जुनः समभाषत ॥
dṛṣṭvā tu sannivṛttāṃstānsaṃśaptakagaṇānpunaḥ | vāsudevaṃ mahātmānamarjunaḥ samabhāṣata
संशप्तकों के दलों को फिर लौटे हुए देखकर अर्जुन ने महात्मा वासुदेव से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (7.19.2)
चोदयाश्वान्हृषीकेश संशप्तकगणान्प्रति । नैते हास्यन्ति सङ्ग्रामं जीवन्त इति मे मतिः ॥
codayāśvānhṛṣīkeśa saṃśaptakagaṇānprati | naite hāsyanti saṅgrāmaṃ jīvanta iti me matiḥ
"हृषीकेश, घोड़ों को संशप्तकों के दलों की ओर बढ़ाओ। मेरा विचार है कि ये जीते-जी युद्ध नहीं छोड़ेंगे।"
श्लोक 3 (7.19.3)
पश्य मेऽस्त्रबलं घोरं बाह्वोरिष्वसनस्य च । अद्यैतान्पातयिष्यामि क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ॥
paśya me'strabalaṃ ghoraṃ bāhvoriṣvasanasya ca | adyaitānpātayiṣyāmi kruddho rudraḥ paśūniva
"मेरे अस्त्रों का, मेरी भुजाओं का और मेरे धनुष का भयंकर बल देखो। आज मैं इन्हें वैसे ही गिरा दूँगा जैसे क्रुद्ध रुद्र पशुओं को गिराते हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (7.19.4)
ततः कृष्णः स्मितं कृत्वा प्रतिनन्द्य शिवेन तम् । प्रावेशयत दुर्धर्षो यत्रयत्रैच्छदर्जुनः ॥
tataḥ kṛṣṇaḥ smitaṃ kṛtvā pratinandya śivena tam | prāveśayata durdharṣo yatrayatraicchadarjunaḥ
तब कृष्ण ने मुसकराकर मंगल वचनों से उनका अभिनन्दन किया और उस दुर्धर्ष वीर ने रथ को शत्रु-सेना में वहीं-वहीं प्रवेश कराया जहाँ-जहाँ अर्जुन चाहते थे।
श्लोक 5 (7.19.5)
स रथो भ्राजतेऽत्यर्थमुह्यमानो रणे तदा । उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ॥
sa ratho bhrājate'tyarthamuhyamāno raṇe tadā | uhyamānamivākāśe vimānaṃ pāṇḍurairhayaiḥ
श्वेत घोड़ों से खिंचता हुआ वह रथ उस समय रण में अत्यन्त शोभित हुआ, मानो आकाश में उड़ता हुआ कोई विमान हो।
श्लोक 6 (7.19.6)
मण्डलानि ततश्चक्रे गतप्रत्यागतानि च । यथा शक्ररथो राजन्युद्धे देवासुरे पुरा ॥
maṇḍalāni tataścakre gatapratyāgatāni ca | yathā śakraratho rājanyuddhe devāsure purā
फिर उन्होंने आगे जाते और लौटते हुए मण्डल बनाए, जैसे हे राजन्, पूर्वकाल के देवासुर-संग्राम में इन्द्र का रथ चला था।
श्लोक 7 (7.19.7)
अथ नारायणाः क्रुद्धा विविधायुधपाणयः । छादयन्तः शरव्रातैः परिवव्रुर्धनञ्जयम् ॥
atha nārāyaṇāḥ kruddhā vividhāyudhapāṇayaḥ | chādayantaḥ śaravrātaiḥ parivavrurdhanañjayam
तब क्रुद्ध नारायणों ने, जिनके हाथों में नाना प्रकार के शस्त्र थे, बाणों की बौछार से ढकते हुए धनञ्जय को घेर लिया।
श्लोक 8 (7.19.8)
अदृश्यं च मुहूर्तेन चक्रुस्ते भरतर्षभ । कृष्णेन सहितं युद्धे कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥
adṛśyaṃ ca muhūrtena cakruste bharatarṣabha | kṛṣṇena sahitaṃ yuddhe kuntīputraṃ dhanañjayam
हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने पल भर में युद्ध में कृष्ण सहित कुन्तीपुत्र अर्जुन को अदृश्य कर दिया।
श्लोक 9 (7.19.9)
क्रुद्धस्तु फल्गुनः सङ्ख्ये द्विगुणीकृतविक्रमः । गाण्डीवं धनुरामृज्य तूर्णं जग्राह संयुगे ॥
kruddhastu phalgunaḥ saṅkhye dviguṇīkṛtavikramaḥ | gāṇḍīvaṃ dhanurāmṛjya tūrṇaṃ jagrāha saṃyuge
तब क्रुद्ध फल्गुन ने, जिनका पराक्रम दुगुना हो गया था, गाण्डीव धनुष को सहलाकर युद्ध में तुरन्त उठा लिया।
श्लोक 10 (7.19.10)
बद्ध्वा च भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य प्रतिलक्षणम् । देवदत्तं महाशङ्खं पूरयामास पाण्डवः ॥
baddhvā ca bhrukuṭiṃ vaktre krodhasya pratilakṣaṇam | devadattaṃ mahāśaṅkhaṃ pūrayāmāsa pāṇḍavaḥ
मुख पर क्रोध के चिह्न-स्वरूप भौंहें चढ़ाकर पाण्डुपुत्र ने देवदत्त नामक महान् शंख फूँका।
श्लोक 11 (7.19.11)
अथास्त्रमरिसङ्घघ्नं त्वाष्ट्रमभ्यस्यदर्जुनः । ततो रूपसहस्राणि प्रादुरासन्पृथक्पृथक् ॥
athāstramarisaṅghaghnaṃ tvāṣṭramabhyasyadarjunaḥ | tato rūpasahasrāṇi prādurāsanpṛthakpṛthak
तब अर्जुन ने शत्रु-समूहों का नाश करने वाले त्वाष्ट्र अस्त्र का प्रयोग किया, और उससे अलग-अलग हज़ारों रूप प्रकट हो गए।
श्लोक 12 (7.19.12)
अर्जुनप्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः । अन्योन्येनार्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ॥
arjunapratirūpaistairnānārūpairvimohitāḥ | anyonyenārjunaṃ matvā svamātmānaṃ ca jaghnire
अर्जुन के समान दिखने वाले उन नाना रूपों से मोहित होकर वे एक-दूसरे को अर्जुन समझकर आपस में और अपने आप को भी मारने लगे।
श्लोक 13 (7.19.13)
अयमर्जुनोऽयं गोविन्द इमौ पाण्डवयादवौ । इति ब्रुवाणाः संमूढा जघ्नुरन्योन्यमाहवे ॥
ayamarjuno'yaṃ govinda imau pāṇḍavayādavau | iti bruvāṇāḥ saṃmūḍhā jaghnuranyonyamāhave
"यह अर्जुन है! यह गोविन्द है! ये दोनों पाण्डव और यादव हैं!" — यह कहते हुए वे मोह में पड़कर युद्ध में एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 14 (7.19.14)
अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तावका भरतर्षभ । मोहिताः परमास्त्रेण क्षयं जग्मुः परस्परम् ॥
anyonyaṃ samare jaghnustāvakā bharatarṣabha | mohitāḥ paramāstreṇa kṣayaṃ jagmuḥ parasparam
हे भरतश्रेष्ठ, आपके योद्धा युद्ध में एक-दूसरे को मारने लगे; उस परम अस्त्र से मोहित होकर वे आपस में ही नाश को प्राप्त हुए।
श्लोक 15 (7.19.15)
रुधिरोक्षितगात्रास्ते प्रेक्षमाणाः परस्परम् । अशोभन्त रणे योधाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥
rudhirokṣitagātrāste prekṣamāṇāḥ parasparam | aśobhanta raṇe yodhāḥ puṣpitā iva kiṃśukāḥ
रक्त से लथपथ शरीर वाले वे योद्धा एक-दूसरे को देखते हुए रणभूमि में फूले हुए किंशुक (पलाश) वृक्षों के समान शोभित हुए।
श्लोक 16 (7.19.16)
रुधिरोत्पीडनास्ते तु रुधिरेण समुक्षिताः । चन्दनस्य रसेनेव व्यभ्राजन्त रणाजिरे ॥
rudhirotpīḍanāste tu rudhireṇa samukṣitāḥ | candanasya raseneva vyabhrājanta raṇājire
रक्त की धाराओं से भीगे हुए वे रणांगण में ऐसे चमके जैसे उन पर चन्दन का लेप किया गया हो।
श्लोक 17 (7.19.17)
ततः प्रसह्य बीभत्सुर्व्याक्षिपद्गाण्डिवं धनुः । न्यहनत्ताञ्छरैस्तीक्ष्णैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥
tataḥ prasahya bībhatsurvyākṣipadgāṇḍivaṃ dhanuḥ | nyahanattāñcharaistīkṣṇaistamaḥ sūrya ivāṃśubhiḥ
तब बीभत्सु ने बलपूर्वक गाण्डिव धनुष को टंकारा और तीखे बाणों से उन्हें गिरा दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणों से अन्धकार को मिटा देता है।
श्लोक 18 (7.19.18)
हतावशिष्टास्ते भूयः परिवार्य धनञ्जयम् । साश्वध्वजरथं चक्रुरदृश्यं शरवृष्टिभिः ॥
hatāvaśiṣṭāste bhūyaḥ parivārya dhanañjayam | sāśvadhvajarathaṃ cakruradṛśyaṃ śaravṛṣṭibhiḥ
मरने से बचे हुए उन योद्धाओं ने फिर धनञ्जय को घेर लिया और बाणों की वर्षा से उन्हें घोड़ों, ध्वजा और रथ सहित अदृश्य कर दिया।
श्लोक 19 (7.19.19)
ततः शरसहस्राणि तैर्विमुक्तानि भस्मसात् । कृत्वा तदस्त्रं तान्वीराननयद्यमसादनम् ॥
tataḥ śarasahasrāṇi tairvimuktāni bhasmasāt | kṛtvā tadastraṃ tānvīrānanayadyamasādanam
उनके छोड़े हुए हज़ारों बाणों को भस्म करके उस अस्त्र ने उन वीरों को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 20 (7.19.20)
अथ प्रहस्य बीभत्सुर्ललित्थान्मालवानपि । मावेल्लकांस्त्रिगर्तांश्च यौधेयांश्चार्दयच्छरैः ॥
atha prahasya bībhatsurlalitthānmālavānapi | māvellakāṃstrigartāṃśca yaudheyāṃścārdayaccharaiḥ
तब हँसकर बीभत्सु ने ललित्थों, मालवों, मावेल्लकों, त्रिगर्तों और यौधेयों को बाणों से पीड़ित किया।
श्लोक 21 (7.19.21)
ते हन्यमाना वीरेण क्षत्रियाः कालचोदिताः । व्यसृजञ्छरजालानि पार्थे नानाविधानि च ॥
te hanyamānā vīreṇa kṣatriyāḥ kālacoditāḥ | vyasṛjañcharajālāni pārthe nānāvidhāni ca
वीर अर्जुन के हाथों मारे जाते हुए, काल से प्रेरित उन क्षत्रियों ने पार्थ पर नाना प्रकार के बाणों के जाल छोड़े।
श्लोक 22 (7.19.22)
न ध्वजो नार्जुनस्तत्र न रथो न च केशवः । प्रत्यदृश्यत घोरेण शरवर्षेण संवृतः ॥
na dhvajo nārjunastatra na ratho na ca keśavaḥ | pratyadṛśyata ghoreṇa śaravarṣeṇa saṃvṛtaḥ
उस भयंकर बाण-वर्षा से ढके हुए न ध्वजा दिखाई देती थी, न अर्जुन, न रथ और न केशव।
श्लोक 23 (7.19.23)
ततस्ते लब्धलक्षत्वादन्योन्यमभिचुक्रुशुः । हतौ कृष्णाविति प्रीत्या वासांस्यादुधुवुस्तदा ॥
tataste labdhalakṣatvādanyonyamabhicukruśuḥ | hatau kṛṣṇāviti prītyā vāsāṃsyādudhuvustadā
निशाना लग जाने से वे एक-दूसरे को पुकारने लगे और "दोनों कृष्ण मारे गए!" ऐसा कहते हुए आनन्द से उस समय वस्त्र हिलाने लगे।
श्लोक 24 (7.19.24)
भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः । सिंहनादरवांश्चोग्रांश्चक्रिरे तत्र मारिष ॥
bherīmṛdaṅgaśaṅkhāṃśca dadhmurvīrāḥ sahasraśaḥ | siṃhanādaravāṃścogrāṃścakrire tatra māriṣa
हे मान्यवर, हज़ारों वीरों ने भेरी और मृदंग बजाए, शंख फूँके और वहाँ भयंकर सिंहनाद किए।
श्लोक 25 (7.19.25)
ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमब्रवीत् । क्वासि पार्थ न पश्यामि कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ॥
tataḥ prasiṣvide kṛṣṇaḥ khinnaścārjunamabravīt | kvāsi pārtha na paśyāmi kaccijjīvasi śatruhan
तब पसीने से भीगे और व्याकुल कृष्ण ने अर्जुन से कहा — "पार्थ, तुम कहाँ हो? मैं तुम्हें देख नहीं पाता। हे शत्रुहन्ता, क्या तुम जीवित हो?"
श्लोक 26 (7.19.26)
तस्य तद्भाषितं श्रुत्वा त्वरमाणो धनञ्जयः । वायव्यास्त्रेण तैरस्तां शरवृष्टिमपाहरत् ॥
tasya tadbhāṣitaṃ śrutvā tvaramāṇo dhanañjayaḥ | vāyavyāstreṇa tairastāṃ śaravṛṣṭimapāharat
उनकी वह बात सुनकर धनञ्जय ने शीघ्रता से वायव्य अस्त्र द्वारा उनकी छोड़ी हुई उस बाण-वर्षा को हटा दिया।
श्लोक 27 (7.19.27)
ततः संशप्तकव्रातान्साश्वद्विपरथायुधान् । उवाह भगवान्वायुः शुष्कपर्णचयानिव ॥
tataḥ saṃśaptakavrātānsāśvadviparathāyudhān | uvāha bhagavānvāyuḥ śuṣkaparṇacayāniva
तब भगवान् वायु संशप्तकों के दलों को उनके घोड़ों, हाथियों, रथों और शस्त्रों समेत सूखे पत्तों के ढेरों की भाँति उड़ा ले चले।
श्लोक 28 (7.19.28)
उह्यमानास्तु ते राजन्बह्वशोभन्त वायुना । प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ॥
uhyamānāstu te rājanbahvaśobhanta vāyunā | praḍīnāḥ pakṣiṇaḥ kāle vṛkṣebhya iva māriṣa
हे राजन्, हवा से उड़ाए जाते हुए वे ऐसे शोभित हुए, हे मान्यवर, जैसे समय आने पर वृक्षों से उड़ते हुए पक्षी।
श्लोक 29 (7.19.29)
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनञ्जयः । जघान निशितैर्बाणैः सहस्राणि शतानि च ॥
tāṃstathā vyākulīkṛtya tvaramāṇo dhanañjayaḥ | jaghāna niśitairbāṇaiḥ sahasrāṇi śatāni ca
उन्हें इस प्रकार व्याकुल करके धनञ्जय ने शीघ्रता से तीखे बाणों से सैकड़ों-हज़ारों को मार डाला।
श्लोक 30 (7.19.30)
शिरांसि भल्लैरहरद्बाहूनपि च सायुधान् । हस्तिहस्तोपमांश्चोरूञ्शरैरुर्व्यामपातयत् ॥
śirāṃsi bhallairaharadbāhūnapi ca sāyudhān | hastihastopamāṃścorūñśarairurvyāmapātayat
उन्होंने भल्लों से सिर काटे, शस्त्रों सहित भुजाएँ काटीं और हाथी की सूँड़ जैसी जाँघें बाणों से काटकर पृथ्वी पर गिरा दीं।
श्लोक 31 (7.19.31)
पृष्ठच्छिन्नान्विचरणान्विमस्तकदृगङ्गुलीन् । नानाङ्गावयवैर्हीनांश्चकारारीन्धनञ्जयः ॥
pṛṣṭhacchinnānvicaraṇānvimastakadṛgaṅgulīn | nānāṅgāvayavairhīnāṃścakārārīndhanañjayaḥ
धनञ्जय ने अपने शत्रुओं को ऐसा कर दिया कि किसी की पीठ कट गई थी, किसी के पैर नहीं रहे, किसी के सिर, आँखें और अँगुलियाँ नहीं रहीं, और वे नाना अंग-प्रत्यंगों से हीन हो गए।
श्लोक 32 (7.19.32)
गन्धर्वनगराकारान्विधिवत्कल्पितान्रथान् । शरैर्विशकलीकुर्वंश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ॥
gandharvanagarākārānvidhivatkalpitānrathān | śarairviśakalīkurvaṃścakre vyaśvarathadvipān
उन्होंने विधिपूर्वक सजे हुए, गन्धर्वनगरों जैसे दिखने वाले रथों को बाणों से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और घोड़ों, रथों तथा हाथियों को नष्ट कर डाला।
श्लोक 33 (7.19.33)
मुण्डतालवनानीव तत्रतत्र चकाशिरे । छिन्ना रथध्वजव्राताः केचित्तत्र क्वचित्क्वचित् ॥
muṇḍatālavanānīva tatratatra cakāśire | chinnā rathadhvajavrātāḥ kecittatra kvacitkvacit
जहाँ-तहाँ कटे हुए रथों और ध्वजाओं के ढेर, कहीं एक जगह कहीं दूसरी जगह, सिरकटे ताड़ के वनों जैसे दिखाई देते थे।
श्लोक 34 (7.19.34)
सोत्तरायुधिनो नागाः सपताकाङ्कुशध्वजाः । पेतुः शक्राशनिहता द्रुमवन्त इवाचलाः ॥
sottarāyudhino nāgāḥ sapatākāṅkuśadhvajāḥ | petuḥ śakrāśanihatā drumavanta ivācalāḥ
ऊपर बैठे योद्धाओं सहित, पताकाओं, अंकुशों और ध्वजाओं वाले हाथी इन्द्र के वज्र से मारे गए वृक्षों वाले पर्वतों की भाँति गिर पड़े।
श्लोक 35 (7.19.35)
चामरापीडकवचाः स्रस्तान्त्रनयनास्तथा । सारोहास्तुरगाः पेतुः पार्थबाणहताः क्षितौ ॥
cāmarāpīḍakavacāḥ srastāntranayanāstathā | sārohāsturagāḥ petuḥ pārthabāṇahatāḥ kṣitau
सवारों सहित घोड़े, जिनके चँवर, शिरोभूषण और कवच टूट गए थे और जिनकी आँतें तथा आँखें बाहर निकल आई थीं, पार्थ के बाणों से मारे जाकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 36 (7.19.36)
विप्रविद्धासिनाराचाश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तयः । पत्तयश्छिन्नवर्माणः कृपणाः शेरते हताः ॥
vipraviddhāsinārācāśchinnavarmarṣṭiśaktayaḥ | pattayaśchinnavarmāṇaḥ kṛpaṇāḥ śerate hatāḥ
पैदल सैनिक, जिनकी तलवारें और लौह-बाण बिखर गए थे, जिनके कवच, ऋष्टियाँ और शक्तियाँ कट गई थीं और जिनके कवच टूट गए थे, दयनीय दशा में मरे पड़े थे।
श्लोक 37 (7.19.37)
तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि । भ्रमद्भिर्निष्टनद्भिश्च क्रूरमायोधनं बभौ ॥
tairhatairhanyamānaiśca patadbhiḥ patitairapi | bhramadbhirniṣṭanadbhiśca krūramāyodhanaṃ babhau
मरे हुओं, मारे जाते हुओं, गिरते हुओं, गिरे हुओं, चक्कर खाते हुओं और कराहते हुओं से वह रणभूमि भयंकर दिखाई देती थी।
श्लोक 38 (7.19.38)
रजश्च महदुद्भूतं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः । मही चाप्यभवद्दुर्गा कबन्धशतसङ्कुला ॥
rajaśca mahadudbhūtaṃ śāntaṃ rudhiravṛṣṭibhiḥ | mahī cāpyabhavaddurgā kabandhaśatasaṅkulā
बड़ी धूल उठी थी, पर रक्त की वर्षा से वह शान्त हो गई; और पृथ्वी सैकड़ों कबन्धों से भरकर दुर्गम हो गई।
श्लोक 39 (7.19.39)
तद्बभौ रौद्रबीभत्सं बीभत्सोर्यानमाहवे । आक्रीडमिव रुद्रस्य घ्नतः कालात्यये पशून् ॥
tadbabhau raudrabībhatsaṃ bībhatsoryānamāhave | ākrīḍamiva rudrasya ghnataḥ kālātyaye paśūn
रणभूमि में बीभत्सु का वह आक्रमण रौद्र और भयानक दिखाई दिया, मानो काल के अन्त में पशुओं का संहार करते हुए रुद्र की क्रीड़ास्थली हो।
श्लोक 40 (7.19.40)
ते वध्यमानाः पार्थेन व्याकुलाश्वरथद्विपाः । तमेवाभिमुखाः क्षीणाः शक्रस्यातिथितां गताः ॥
te vadhyamānāḥ pārthena vyākulāśvarathadvipāḥ | tamevābhimukhāḥ kṣīṇāḥ śakrasyātithitāṃ gatāḥ
पार्थ के हाथों मारे जाते हुए, घोड़ों, रथों और हाथियों के अस्तव्यस्त हो जाने पर वे उन्हीं के सम्मुख क्षीण होकर इन्द्र के अतिथि बन गए।
श्लोक 41 (7.19.41)
सा भूमिर्भरतश्रेष्ठ निहतैस्तैर्महारथैः । आस्तीर्णा सम्बभौ सर्वा प्रेतीभूतैः समन्ततः ॥
sā bhūmirbharataśreṣṭha nihataistairmahārathaiḥ | āstīrṇā sambabhau sarvā pretībhūtaiḥ samantataḥ
हे भरतश्रेष्ठ, मारे गए उन महारथियों के शव बनकर चारों ओर बिछ जाने से वह सारी भूमि उनसे ढकी हुई सी दिखाई देने लगी।
श्लोक 42 (7.19.42)
एतस्मिन्नन्तरे चैव प्रमत्ते सव्यसाचिनि । व्यूढानीकस्ततो द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥
etasminnantare caiva pramatte savyasācini | vyūḍhānīkastato droṇo yudhiṣṭhiramupādravat
इसी बीच सव्यसाची के उधर उलझे रहने पर व्यूह रचकर द्रोणाचार्य युधिष्ठिर पर टूट पड़े।
श्लोक 43 (7.19.43)
तं प्रत्यगृह्णंस्त्वरिता व्यूढानीकाः प्रहारिणः । युधिष्ठिरं परीप्सन्तस्तदासीत्तुमुलं महत् ॥
taṃ pratyagṛhṇaṃstvaritā vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | yudhiṣṭhiraṃ parīpsantastadāsīttumulaṃ mahat
व्यूह बाँधे हुए प्रहारी योद्धाओं ने युधिष्ठिर की रक्षा की इच्छा से तुरन्त उसका सामना किया; तब वहाँ भारी कोलाहल मच गया।