द्रोण पर्व · अध्याय 20
द्रोण का गरुड़व्यूह
बारहवें दिन अर्जुन को संशप्तकों द्वारा दूर खींच लिए जाने पर द्रोण युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए गरुड़व्यूह रचते हैं, और युधिष्ठिर अर्धचन्द्र व्यूह से उसका उत्तर देते हैं। धृष्टद्युम्न द्रोण को रोकने का वचन देकर उन पर चढ़ाई करते हैं, और दुर्मुख धृष्टद्युम्न से भिड़ जाता है। द्रोण युधिष्ठिर की सेना की पंक्तियाँ तोड़ देते हैं, हाथियों, रथों और पैदल योद्धाओं का युद्ध रक्त से लथपथ घोर संहार बन जाता है, और शत्रुओं को मोहित करके द्रोण युधिष्ठिर पर टूट पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.20.1)
परिणाम्य निशां तां तु भारद्वाजो महारथः । उक्त्वा सुबहु राजेन्द्र वचनं वै सुयोधनम् ॥
pariṇāmya niśāṃ tāṃ tu bhāradvājo mahārathaḥ | uktvā subahu rājendra vacanaṃ vai suyodhanam
हे राजेन्द्र, उस रात को बिताकर महारथी भरद्वाजपुत्र द्रोण ने सुयोधन से बहुत कुछ कहा,
श्लोक 2 (7.20.2)
विधाय गोप्तॄन्पार्थस्य संशप्तकगणैः सह । निष्क्रान्ते च तदा पार्थे संशप्तकवधं प्रति ॥
vidhāya goptṝnpārthasya saṃśaptakagaṇaiḥ saha | niṣkrānte ca tadā pārthe saṃśaptakavadhaṃ prati
और संशप्तकों के दलों को पार्थ के विरुद्ध ओट के रूप में खड़ा करके, जब पार्थ संशप्तकों का वध करने निकल गए,
श्लोक 3 (7.20.3)
व्यूढानीकस्ततो द्रोणः पाण्डवानां महाचमूम् । अभ्ययाद्भरतश्रेष्ठ धर्मराजजिघृक्षया ॥
vyūḍhānīkastato droṇaḥ pāṇḍavānāṃ mahācamūm | abhyayādbharataśreṣṭha dharmarājajighṛkṣayā
तब द्रोण ने अपनी सेना की व्यूह-रचना की और हे भरतश्रेष्ठ, धर्मराज को पकड़ने की इच्छा से पाण्डवों की विशाल सेना पर चढ़ाई की।
श्लोक 4 (7.20.4)
व्यूढां दृष्ट्वा सुपर्णेन भारद्वाजस्य तां चमूम् । व्यूहेन मण्डलार्धेन प्रत्यव्यूहद्युधिष्ठिरः ॥
vyūḍhāṃ dṛṣṭvā suparṇena bhāradvājasya tāṃ camūm | vyūhena maṇḍalārdhena pratyavyūhadyudhiṣṭhiraḥ
भरद्वाज की सेना को गरुड़ के आकार में सजी देखकर युधिष्ठिर ने अर्धमण्डल व्यूह बनाकर उसका प्रतिव्यूह रचा।
श्लोक 5 (7.20.5)
मुखं त्वासीत्सुपर्णस्य भारद्वाजो महारथः । शिरो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ॥
mukhaṃ tvāsītsuparṇasya bhāradvājo mahārathaḥ | śiro duryodhano rājā sodaryaiḥ sānugairvṛtaḥ
गरुड़ का मुख महारथी भारद्वाज द्रोण थे, और भाइयों तथा अनुयायियों से घिरा हुआ राजा दुर्योधन उसका सिर था।
श्लोक 6 (7.20.6)
चक्षुषी कृतवर्माऽऽसीद्गौतमश्चास्यतां वरः ॥
cakṣuṣī kṛtavarmā''sīdgautamaścāsyatāṃ varaḥ
कृतवर्मा उसकी एक आँख था और धनुर्धरों में श्रेष्ठ गौतम (कृपाचार्य) दूसरी आँख।
श्लोक 7 (7.20.7)
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाक्षश्च वीर्यवान् । कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः ॥
bhūtaśarmā kṣemaśarmā karakākṣaśca vīryavān | kaliṅgāḥ siṃhalāḥ prācyāḥ śūrābhīrā daśerakāḥ
भूतशर्मा, क्षेमशर्मा और पराक्रमी करकाक्ष, कलिंग, सिंहल, प्राच्य, शूर, आभीर और दशेरक,
श्लोक 8 (7.20.8)
शका यवनकाम्भोजास्तथा हंसपथाश्च ये । ग्रीवायां शूरसेनाश्च दरदा मद्रकेकयाः । गजाश्वरथपत्त्योघास्तस्थुः परमदंशिताः ॥
śakā yavanakāmbhojāstathā haṃsapathāśca ye | grīvāyāṃ śūrasenāśca daradā madrakekayāḥ | gajāśvarathapattyoghāstasthuḥ paramadaṃśitāḥ
शक, यवन, काम्बोज और हंसपथ, तथा गर्दन पर शूरसेन, दरद, मद्र और केकय — हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों के समूहों के साथ पूरे कवच धारण किए खड़े थे।
श्लोक 9 (7.20.9)
भूरिश्रवास्तथा शल्यः सोमदत्तश्च बाह्लिकः । अक्षौहिण्या वृता वीरा दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः ॥
bhūriśravāstathā śalyaḥ somadattaśca bāhlikaḥ | akṣauhiṇyā vṛtā vīrā dakṣiṇaṃ pārśvamāsthitāḥ
भूरिश्रवा, शल्य, सोमदत्त और बाह्लीक — एक अक्षौहिणी से घिरे ये वीर दाहिने पार्श्व में स्थित हुए।
श्लोक 10 (7.20.10)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्भोजश्च सुदक्षिणः । वामं पार्श्वं समाश्रित्य द्रोणपुत्राग्रतः स्थिताः ॥
vindānuvindāvāvantyau kāmbhojaśca sudakṣiṇaḥ | vāmaṃ pārśvaṃ samāśritya droṇaputrāgrataḥ sthitāḥ
अवन्ती के विन्द और अनुविन्द तथा काम्बोजराज सुदक्षिण बायाँ पार्श्व सँभालकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के आगे खड़े हुए।
श्लोक 11 (7.20.11)
पृष्ठे कलिङ्गाः साम्बष्ठा मागधाः पौण्ड्रमद्रकाः । गान्धाराः शकुनाः प्राच्याः पार्वतीया वसातयः ॥
pṛṣṭhe kaliṅgāḥ sāmbaṣṭhā māgadhāḥ pauṇḍramadrakāḥ | gāndhārāḥ śakunāḥ prācyāḥ pārvatīyā vasātayaḥ
पीछे कलिंग, अम्बष्ठ, मागध, पौण्ड्र और मद्रक, गान्धार, शकुन, प्राच्य, पर्वतीय और वसाति थे।
श्लोक 12 (7.20.12)
पुच्छे वैकर्तनः कर्णः सपुत्रज्ञातिबान्धवः । महत्या सेनया तस्थौ नानाजनपदोत्थया ॥
pucche vaikartanaḥ karṇaḥ saputrajñātibāndhavaḥ | mahatyā senayā tasthau nānājanapadotthayā
पूँछ पर विकर्तनपुत्र कर्ण अपने पुत्रों, जाति-भाइयों और बन्धुओं के साथ, अनेक देशों से आई विशाल सेना लेकर खड़ा था।
श्लोक 13 (7.20.13)
जयद्रथो भीमरथः सम्पातिर्ऋषभो जयः । भूमिञ्जयो वृषक्राथो नैषधश्च महाबलः ॥
jayadratho bhīmarathaḥ sampātirṛṣabho jayaḥ | bhūmiñjayo vṛṣakrātho naiṣadhaśca mahābalaḥ
जयद्रथ, भीमरथ, सम्पाति, ऋषभ, जय, भूमिञ्जय, वृषक्रथ और महाबली निषधराज,
श्लोक 14 (7.20.14)
वृता बलेन महता ब्रह्मलोकपरिष्कृताः । व्यूहस्योरसि ते राजन्स्थिता युद्धविशारदाः ॥
vṛtā balena mahatā brahmalokapariṣkṛtāḥ | vyūhasyorasi te rājansthitā yuddhaviśāradāḥ
बड़ी सेना से घिरे हुए, मानो ब्रह्मलोक से विभूषित-से, युद्ध में कुशल ये पुरुष, हे राजन्, व्यूह की छाती पर खड़े थे।
श्लोक 15 (7.20.15)
द्रोणेन विहितो व्यूहः पदात्यश्वरथद्विपैः । वातोद्धूतार्णवाकारः प्रनृत्त इव लक्ष्यते ॥
droṇena vihito vyūhaḥ padātyaśvarathadvipaiḥ | vātoddhūtārṇavākāraḥ pranṛtta iva lakṣyate
द्रोण का रचा हुआ वह व्यूह, पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियों से बना हुआ, वायु से उछाले गए समुद्र के समान था, मानो नाच रहा हो।
श्लोक 16 (7.20.16)
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः । सविद्युत्स्तनिता मेघाः सर्वदिग्भ्यः इवोष्णगे ॥
tasya pakṣaprapakṣebhyo niṣpatanti yuyutsavaḥ | savidyutstanitā meghāḥ sarvadigbhyaḥ ivoṣṇage
उसके पक्षों और उपपक्षों से युद्ध के इच्छुक योद्धा सब दिशाओं में ऐसे निकल पड़ते थे, जैसे ग्रीष्म के अन्त में बिजली और गर्जन वाले बादल।
श्लोक 17 (7.20.17)
तस्य प्राग्ज्योतिषो मध्ये विधिवत्कल्पितं गजम् । आस्थितः शुशुभे राजन्नंशुमानुदये यथा ॥
tasya prāgjyotiṣo madhye vidhivatkalpitaṃ gajam | āsthitaḥ śuśubhe rājannaṃśumānudaye yathā
उसके बीच में विधिपूर्वक सजाए गए हाथी पर बैठा प्राग्ज्योतिषराज, हे राजन्, उदय होते हुए सूर्य के समान शोभित हो रहा था,
श्लोक 18 (7.20.18)
माल्यदामवता राजञ्श्वेतच्छत्रेण धार्यता । कृत्तिकायोगयुक्तेन पौर्णमास्यामिवेन्दुना ॥
mālyadāmavatā rājañśvetacchatreṇa dhāryatā | kṛttikāyogayuktena paurṇamāsyāmivendunā
उसके ऊपर माला-मालाओं से सजा श्वेत छत्र तना था, जैसे कृत्तिका नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा का चन्द्रमा।
श्लोक 19 (7.20.19)
नीलाञ्जनचयप्रख्यो मदान्धो द्विरदो बभौ । अतिवृष्टो महामेघैर्यथा स्यात्पर्वतो महान् ॥
nīlāñjanacayaprakhyo madāndho dvirado babhau | ativṛṣṭo mahāmeghairyathā syātparvato mahān
काले अंजन के ढेर जैसा, मद से अन्धा वह हाथी ऐसा शोभित हुआ जैसे बड़े बादलों की वर्षा से भीगा हुआ कोई विशाल पर्वत।
श्लोक 20 (7.20.20)
नानानृपतिभिर्वीरैर्विविधायुधभूषणैः । समन्वितः पार्वतीयैः शक्रो देवगणैरिव ॥
nānānṛpatibhirvīrairvividhāyudhabhūṣaṇaiḥ | samanvitaḥ pārvatīyaiḥ śakro devagaṇairiva
अनेक राजाओं और नाना शस्त्र-आभूषणों वाले वीरों से तथा पर्वतीय योद्धाओं से घिरा हुआ वह देवगणों से घिरे इन्द्र के समान था।
श्लोक 21 (7.20.21)
ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य व्यूहं तमतिमानुषम् । अजय्यमरिभिः सङ्ख्ये पार्षतं वाक्यमब्रवीत् ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ prekṣya vyūhaṃ tamatimānuṣam | ajayyamaribhiḥ saṅkhye pārṣataṃ vākyamabravīt
तब उस मानवातीत और शत्रुओं के लिए युद्ध में अजेय व्यूह को देखकर युधिष्ठिर ने पृषतपुत्र (धृष्टद्युम्न) से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 22 (7.20.22)
ब्राह्मणस्य वशं नाहमियामद्य यथा प्रभो । पारावतसवर्णाश्व तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
brāhmaṇasya vaśaṃ nāhamiyāmadya yathā prabho | pārāvatasavarṇāśva tathā nītirvidhīyatām
"हे प्रभो, कबूतर के रंग के घोड़ों वाले वीर! ऐसी नीति अपनाइए कि मैं आज उस ब्राह्मण (द्रोण) के वश में न पड़ूँ।"
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 23 (7.20.23)
द्रोणस्य यतमानस्य वशं नैष्यसि सुव्रत । अहमावारयिष्यामि द्रोणमद्य सहानुगम् ॥
droṇasya yatamānasya vaśaṃ naiṣyasi suvrata | ahamāvārayiṣyāmi droṇamadya sahānugam
"हे सुव्रत, द्रोण के प्रयत्न करने पर भी आप उनके वश में नहीं आएँगे। आज मैं अनुयायियों सहित द्रोण को रोकूँगा।
श्लोक 24 (7.20.24)
मयि जीवति कौरव्य नोद्वेगं कर्तुमर्हसि । न हि शक्तो रणे द्रोणो विजेतुं मां कथञ्चन ॥
mayi jīvati kauravya nodvegaṃ kartumarhasi | na hi śakto raṇe droṇo vijetuṃ māṃ kathañcana
हे कुरुवंशी, मेरे जीवित रहते आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। द्रोण युद्ध में किसी भी प्रकार मुझे जीत नहीं सकते।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (7.20.25)
एवमुक्त्वा किरन्बाणान्द्रुपदस्य सुतो बली । पारावतसवर्णाश्वः स्वयं द्रोणमुपाद्रवत् ॥
evamuktvā kiranbāṇāndrupadasya suto balī | pārāvatasavarṇāśvaḥ svayaṃ droṇamupādravat
ऐसा कहकर द्रुपद का बलवान पुत्र बाण बरसाता हुआ अपने कबूतरी रंग के घोड़ों के साथ स्वयं द्रोण पर टूट पड़ा।
श्लोक 26 (7.20.26)
अनिष्टदर्शनं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नमवस्थितम् । क्षणेनैवाभवद्द्रोणो नातिहृष्टमना इव ॥
aniṣṭadarśanaṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnamavasthitam | kṣaṇenaivābhavaddroṇo nātihṛṣṭamanā iva
अपने लिए अशुभ दर्शन वाले धृष्टद्युम्न को सामने खड़ा देखकर द्रोण क्षणभर में कुछ अप्रसन्न-से हो गए।
श्लोक 27 (7.20.27)
स हि जातो महाराज द्रोणस्य निधनं प्रति ॥
sa hi jāto mahārāja droṇasya nidhanaṃ prati
हे महाराज, वह तो द्रोण की मृत्यु के लिए ही उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 28 (7.20.28)
मर्त्यधर्मतया तस्माद्भारद्वाजो व्यमुह्यत । नाशकत्तत्र तत्किञ्चिदनीकं प्रतिवीक्षितुम् ॥
martyadharmatayā tasmādbhāradvājo vyamuhyata | nāśakattatra tatkiñcidanīkaṃ prativīkṣitum
इसलिए मनुष्य-स्वभाव के कारण भरद्वाजपुत्र मोहित हो गए और वहाँ उस सेना के किसी भी भाग की ओर देख न सके।
श्लोक 29 (7.20.29)
ततः किरन्निषूंस्तीक्ष्णान्द्रुपदस्य वरूथिनीम् । भारद्वाजो ययौ तूर्णं पार्षतं वर्जयन्युधि । द्रुपदस्य महत्सैन्यं दारयामास ब्राह्मणः ॥
tataḥ kiranniṣūṃstīkṣṇāndrupadasya varūthinīm | bhāradvājo yayau tūrṇaṃ pārṣataṃ varjayanyudhi | drupadasya mahatsainyaṃ dārayāmāsa brāhmaṇaḥ
तब तीखे बाण बरसाते हुए भारद्वाज युद्ध में पार्षत को बचाते हुए द्रुपद की सेना को चीरकर तेजी से आगे बढ़ गए, और उस ब्राह्मण ने द्रुपद की विशाल सेना को विदीर्ण कर डाला।
श्लोक 30 (7.20.30)
तं तु सम्प्रेक्ष्य पुत्रस्ते दुर्मुखः शत्रुकर्षणः । प्रियं चिकीर्षुर्द्रोणस्य धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥
taṃ tu samprekṣya putraste durmukhaḥ śatrukarṣaṇaḥ | priyaṃ cikīrṣurdroṇasya dhṛṣṭadyumnamavārayat
उन्हें देखकर आपका पुत्र शत्रुसंहारक दुर्मुख द्रोण का प्रिय करने की इच्छा से धृष्टद्युम्न को रोकने लगा।
श्लोक 31 (7.20.31)
स सम्प्रहारस्तुमुलः सुघोरः समपद्यत । पार्षतस्य च शूरस्य दुर्मुखस्य च भारत ॥
sa samprahārastumulaḥ sughoraḥ samapadyata | pārṣatasya ca śūrasya durmukhasya ca bhārata
हे भारत, तब वीर पार्षत और दुर्मुख के बीच अत्यन्त भयंकर और घमासान युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 32 (7.20.32)
पार्षतः शरजालेन क्षिप्रं प्रच्छाद्य दुर्मुखम् । भारद्वाजं शरौघेण महता समवारयत् ॥
pārṣataḥ śarajālena kṣipraṃ pracchādya durmukham | bhāradvājaṃ śaraugheṇa mahatā samavārayat
पार्षत ने बाणों के जाल से शीघ्र ही दुर्मुख को ढक दिया और बाणों की बड़ी बाढ़ से भारद्वाज को रोक दिया।
श्लोक 33 (7.20.33)
द्रोणावारितं दृष्ट्वा भृशायस्तस्तवात्मजः । नानालिङ्गैः शरव्रातैः पार्षतं सममोहयत् ॥
droṇāvāritaṃ dṛṣṭvā bhṛśāyastastavātmajaḥ | nānāliṅgaiḥ śaravrātaiḥ pārṣataṃ samamohayat
द्रोण को रुका हुआ देखकर आपके पुत्र ने बहुत परिश्रम करके नाना चिह्नों वाले बाणसमूहों से पार्षत को मोहित कर दिया।
श्लोक 34 (7.20.34)
तयोर्विषक्तयोः सङ्ख्ये पाञ्चाल्यकुरुमुख्ययोः । द्रोणो यौधिष्ठिरं सैन्यं बहुधा व्यधमच्छरैः ॥
tayorviṣaktayoḥ saṅkhye pāñcālyakurumukhyayoḥ | droṇo yaudhiṣṭhiraṃ sainyaṃ bahudhā vyadhamaccharaiḥ
पाञ्चाल और कुरु के उन दोनों प्रमुखों के युद्ध में उलझे रहने पर द्रोण ने बाणों से युधिष्ठिर की सेना को अनेक प्रकार से छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 35 (7.20.35)
अनिलेन यथाऽभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः । तथा पार्थस्य सैन्यानि विच्छिन्नानि क्वचित्क्वचित् ॥
anilena yathā'bhrāṇi vicchinnāni samantataḥ | tathā pārthasya sainyāni vicchinnāni kvacitkvacit
जैसे वायु बादलों को चारों ओर बिखेर देती है, वैसे ही पार्थ की सेनाएँ जहाँ-तहाँ बिखर गईं।
श्लोक 36 (7.20.36)
मुहूर्तमिव तद्युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद्राजन्निर्मर्यादमवर्तत ॥
muhūrtamiva tadyuddhamāsīnmadhuradarśanam | tata unmattavadrājannirmaryādamavartata
वह युद्ध क्षणभर देखने में सुहावना लगा, फिर हे राजन्, उन्मत्त की तरह मर्यादाहीन हो गया।
श्लोक 37 (7.20.37)
नैव खं न दिशो भूमिर्बभासे न च भास्करः । नैव स्वे न परे राजन्नाज्ञायन्त परस्परम् । अनुमानेन संज्ञाभिर्युद्धं तत्समवर्तत ॥
naiva khaṃ na diśo bhūmirbabhāse na ca bhāskaraḥ | naiva sve na pare rājannājñāyanta parasparam | anumānena saṃjñābhiryuddhaṃ tatsamavartata
न आकाश, न दिशाएँ, न पृथ्वी और न सूर्य ही दिखाई देता था। हे राजन्, अपने और पराये की पहचान नहीं हो पाती थी; वह युद्ध अनुमान और संकेतों से चल रहा था।
श्लोक 38 (7.20.38)
चूडामणिषु निष्केषु भूषणेष्वपि वर्मसु । तेषामादित्यवर्णाभा रश्मयः प्रचकाशिरे ॥
cūḍāmaṇiṣu niṣkeṣu bhūṣaṇeṣvapi varmasu | teṣāmādityavarṇābhā raśmayaḥ pracakāśire
चूड़ामणियों, निष्कों (स्वर्णहारों), आभूषणों और कवचों पर सूर्य के समान आभा वाली किरणें चमक उठीं।
श्लोक 39 (7.20.39)
तत्प्रकीर्णपताकानां रथवारणवाजिनाम् । बलाकाशबलाभ्राभं ददृशे रूपमाहवे ॥
tatprakīrṇapatākānāṃ rathavāraṇavājinām | balākāśabalābhrābhaṃ dadṛśe rūpamāhave
रथों, हाथियों और घोड़ों की बिखरी हुई पताकाओं से रणभूमि का दृश्य बगुलों और चितकबरे बादलों से भरे आकाश-जैसा दिखाई दिया।
श्लोक 40 (7.20.40)
नरानेव नरा जघ्नरुदग्राश्च हया हयान् । रथांश्च रथिनो जघ्नुर्वारणा वरवारणान् ॥
narāneva narā jaghnarudagrāśca hayā hayān | rathāṃśca rathino jaghnurvāraṇā varavāraṇān
मनुष्य मनुष्यों को मारने लगे, उत्साही घोड़े घोड़ों को, रथी रथों को और हाथी श्रेष्ठ हाथियों को।
श्लोक 41 (7.20.41)
समुच्छ्रितपताकानां गजानां परमद्विपैः । क्षणेन तुमुलो घोरः सङ्ग्रामः समपद्यत ॥
samucchritapatākānāṃ gajānāṃ paramadvipaiḥ | kṣaṇena tumulo ghoraḥ saṅgrāmaḥ samapadyata
ऊँची पताकाओं वाले हाथियों और बड़े-बड़े श्रेष्ठ गजों के बीच क्षणभर में घमासान भयंकर संग्राम छिड़ गया।
श्लोक 42 (7.20.42)
तेषां संसक्तगात्राणां कर्षतामितरेतरम् । दन्तसङ्घातसङ्घर्षात्सधूमोऽग्निरजायत ॥
teṣāṃ saṃsaktagātrāṇāṃ karṣatāmitaretaram | dantasaṅghātasaṅgharṣātsadhūmo'gnirajāyata
एक-दूसरे से सटे शरीरों वाले और एक-दूसरे को खींचते हुए उन हाथियों के दाँतों की रगड़ से धुएँ सहित आग पैदा हो गई।
श्लोक 43 (7.20.43)
विप्रकीर्णपताकास्ते विषाणजनिताग्नयः । बभूवुः खं समासाद्य सविद्युत इवाम्बुदाः ॥
viprakīrṇapatākāste viṣāṇajanitāgnayaḥ | babhūvuḥ khaṃ samāsādya savidyuta ivāmbudāḥ
बिखरी पताकाओं वाले, दाँतों से उत्पन्न अग्नि से युक्त वे हाथी आकाश में पहुँचकर बिजली वाले बादलों जैसे लगने लगे।
श्लोक 44 (7.20.44)
विक्षिपद्भिर्नदद्भिश्च निपतद्भिश्च वारणैः । सम्बभूव मही कीर्णा मेघैर्द्यौरिव वार्षिकी ॥
vikṣipadbhirnadadbhiśca nipatadbhiśca vāraṇaiḥ | sambabhūva mahī kīrṇā meghairdyauriva vārṣikī
इधर-उधर झटकते, चिंघाड़ते और गिरते हुए हाथियों से पृथ्वी ऐसी बिखर गई जैसे वर्षाकाल का आकाश बादलों से भर जाता है।
श्लोक 45 (7.20.45)
तेषामाहन्यमानानां बाणतोमरऋष्टिभिः । वारणानां रवो जज्ञे मेघानामिव सम्प्लवे ॥
teṣāmāhanyamānānāṃ bāṇatomaraṛṣṭibhiḥ | vāraṇānāṃ ravo jajñe meghānāmiva samplave
बाणों, तोमरों और ऋष्टि नामक शस्त्रों से मारे जाते हुए हाथियों का शब्द प्रलय के समय के बादलों की गड़गड़ाहट जैसा उठा।
श्लोक 46 (7.20.46)
तोमराभिहताः केचिद्बाणैश्च परमद्विपाः । वित्रेसुः सर्वनागानां शब्दमेवापरेऽसृजन् ॥
tomarābhihatāḥ kecidbāṇaiśca paramadvipāḥ | vitresuḥ sarvanāgānāṃ śabdamevāpare'sṛjan
कुछ श्रेष्ठ हाथी तोमरों और बाणों से घायल होकर काँप उठे; दूसरों ने सब हाथियों के साथ मिलकर चिंघाड़ मचा दी।
श्लोक 47 (7.20.47)
विषाणाभिहताश्चापि केचित्तत्र गजा गजैः । चक्रुरार्तस्वनं घोरमुत्पातजलदा इव ॥
viṣāṇābhihatāścāpi kecittatra gajā gajaiḥ | cakrurārtasvanaṃ ghoramutpātajaladā iva
वहाँ कुछ हाथी दूसरे हाथियों के दाँतों से घायल होकर अपशकुन के बादलों की तरह भयंकर आर्तनाद करने लगे।
श्लोक 48 (7.20.48)
प्रतीपाः क्रियमाणाश्च वारणा वरवारणैः । उन्मथ्य पुनराजग्मुः प्रेरिताः परमाङ्कुशैः ॥
pratīpāḥ kriyamāṇāśca vāraṇā varavāraṇaiḥ | unmathya punarājagmuḥ preritāḥ paramāṅkuśaiḥ
श्रेष्ठ हाथियों द्वारा पीछे धकेले जाते हुए हाथी तीखे अंकुशों की प्रेरणा से उन्हें कुचलकर फिर लौट आते थे।
श्लोक 49 (7.20.49)
महामात्रैर्महामात्रास्ताडिताः शरतोमरैः । गजेभ्यः पृथिवीं जग्मुर्मुक्तप्रहरणाङ्कुशाः ॥
mahāmātrairmahāmātrāstāḍitāḥ śaratomaraiḥ | gajebhyaḥ pṛthivīṃ jagmurmuktapraharaṇāṅkuśāḥ
महावत महावतों के बाणों और तोमरों से मारे जाने पर हाथियों से धरती पर गिर पड़े; उनके शस्त्र और अंकुश छूट गए थे।
श्लोक 50 (7.20.50)
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्ततः । छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुः सम्प्रविश्य परस्परम् ॥
nirmanuṣyāśca mātaṅgā vinadantastatastataḥ | chinnābhrāṇīva sampetuḥ sampraviśya parasparam
सवारों से रहित हाथी इधर-उधर चिंघाड़ते हुए एक-दूसरे से टकराकर कटे हुए बादलों की तरह गिर पड़ते थे।
श्लोक 51 (7.20.51)
हतान्परिवहन्तश्च पतितान्पतितायुधान् । दिशो जग्मुर्महानागाः केचिदेकचरा इव ॥
hatānparivahantaśca patitānpatitāyudhān | diśo jagmurmahānāgāḥ kecidekacarā iva
मरे और गिरे हुए, शस्त्र छोड़ चुके लोगों को ढोते हुए कुछ महाहाथी अकेले विचरने वालों की तरह दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 52 (7.20.52)
ताडितास्ताड्यमानाश्च तोमरर्ष्टिपरश्वथैः । पेतुरार्तस्वनं कृत्वा तदा विशसने गजाः ॥
tāḍitāstāḍyamānāśca tomararṣṭiparaśvathaiḥ | peturārtasvanaṃ kṛtvā tadā viśasane gajāḥ
तोमरों, ऋष्टियों और कुल्हाड़ों से मारे जाते और मारते हुए हाथी उस संहार में आर्तनाद करते हुए गिर पड़े।
श्लोक 53 (7.20.53)
तेषां शैलोपमैः कायैर्निपतद्भिः समन्ततः । आहता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च ॥
teṣāṃ śailopamaiḥ kāyairnipatadbhiḥ samantataḥ | āhatā sahasā bhūmiścakampe ca nanāda ca
चारों ओर गिरते हुए उनके पर्वत-जैसे शरीरों की चोट से पृथ्वी सहसा काँप उठी और गूँज उठी।
श्लोक 54 (7.20.54)
सादितैः सगजारोहैः सपताकैः समन्ततः । मातङ्गैः शुशुभे भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥
sāditaiḥ sagajārohaiḥ sapatākaiḥ samantataḥ | mātaṅgaiḥ śuśubhe bhūmirvikīrṇairiva parvataiḥ
सवारों और पताकाओं सहित चारों ओर गिराए गए हाथियों से पृथ्वी ऐसी शोभित हुई मानो बिखरे हुए पर्वतों से ढकी हो।
श्लोक 55 (7.20.55)
गजस्थाश्च महामात्रा निर्भिन्नहृदया रणे । रथिभिः पातिता भल्लैर्विकीर्णाङ्कुशतोमराः ॥
gajasthāśca mahāmātrā nirbhinnahṛdayā raṇe | rathibhiḥ pātitā bhallairvikīrṇāṅkuśatomarāḥ
हाथियों पर बैठे महावत, जिनके हृदय युद्ध में बिंध गए थे, रथियों द्वारा भल्लों से गिरा दिए गए और उनके अंकुश तथा तोमर इधर-उधर बिखर गए।
श्लोक 56 (7.20.56)
क्रौञ्चवद्विनदन्तोऽन्ये नाराचाभिहता गजाः । परान्स्वांश्चापि मृद्नन्तः परिपेतुर्दिशो दश ॥
krauñcavadvinadanto'nye nārācābhihatā gajāḥ | parānsvāṃścāpi mṛdnantaḥ paripeturdiśo daśa
दूसरे हाथी, लोहे के बाणों से घायल होकर क्रौंच पक्षी की तरह चिंघाड़ते हुए अपनों और परायों को कुचलते दसों दिशाओं में दौड़ने लगे।
श्लोक 57 (7.20.57)
गजाश्वरथयोधानां शरीरौघसमावृता । बभूव पृथिवी राजन्मांसशोणितकर्दमा ॥
gajāśvarathayodhānāṃ śarīraughasamāvṛtā | babhūva pṛthivī rājanmāṃsaśoṇitakardamā
हे राजन्, हाथी, घोड़े, रथ और योद्धाओं के शरीरों के ढेरों से ढकी पृथ्वी मांस और रक्त की कीचड़ बन गई।
श्लोक 58 (7.20.58)
प्रमथ्य च विषाणाग्रैः समुत्क्षिप्ताश्च वारणैः । सचक्राश्च विचक्राश्च रथैरेव महारथाः ॥
pramathya ca viṣāṇāgraiḥ samutkṣiptāśca vāraṇaiḥ | sacakrāśca vicakrāśca rathaireva mahārathāḥ
दाँतों के अग्रभाग से मथे और हाथियों द्वारा ऊपर उछाले गए महारथी अपने रथों सहित पड़े थे, कोई पहियों सहित, कोई बिना पहियों के।
श्लोक 59 (7.20.59)
रथाश्च रथिभिर्हीना निर्मनुष्याश्च वाजिनः । हतारोहाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुर्भयातुराः ॥
rathāśca rathibhirhīnā nirmanuṣyāśca vājinaḥ | hatārohāśca mātaṅgā diśo jagmurbhayāturāḥ
रथियों से रहित रथ, मनुष्यों से रहित घोड़े और मारे गए सवारों वाले हाथी भय से व्याकुल होकर दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 60 (7.20.60)
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा । इत्यासीत्तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किञ्चन ॥
jaghānātra pitā putraṃ putraśca pitaraṃ tathā | ityāsīttumulaṃ yuddhaṃ na prājñāyata kiñcana
वहाँ पिता ने पुत्र को मारा और पुत्र ने पिता को; ऐसा घमासान युद्ध हुआ कि कुछ भी पहचाना नहीं जाता था।
श्लोक 61 (7.20.61)
आगुल्फेभ्योऽवसीदन्ते नरा लोहितकर्दमैः । दीप्यमानैः परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमाः ॥
āgulphebhyo'vasīdante narā lohitakardamaiḥ | dīpyamānaiḥ parikṣiptā dāvairiva mahādrumāḥ
मनुष्य टखनों तक रक्त की कीचड़ में धँस रहे थे, मानो दहकते दावानलों से घिरे बड़े वृक्ष हों।
श्लोक 62 (7.20.62)
शोणितैः सिच्यमानानि वस्त्राणि कवचानि च । छत्राणि च पताकाश्च सर्वं रक्तमदृश्यत ॥
śoṇitaiḥ sicyamānāni vastrāṇi kavacāni ca | chatrāṇi ca patākāśca sarvaṃ raktamadṛśyata
रक्त से भीगे वस्त्र और कवच, छत्र और पताकाएँ — सब कुछ लाल दिखाई देता था।
श्लोक 63 (7.20.63)
हयौघाश्च रथौघाश्च नरौघाश्च निपातिताः । संक्षुण्णाः पुनरावृत्य बहुधा रथनेमिभिः ॥
hayaughāśca rathaughāśca naraughāśca nipātitāḥ | saṃkṣuṇṇāḥ punarāvṛtya bahudhā rathanemibhiḥ
गिराए गए घोड़ों, रथों और मनुष्यों के समूह रथ के पहियों से बार-बार और अनेक प्रकार से कुचले गए।
श्लोक 64 (7.20.64)
सगजौघमहावेगः परासुनरशैवलः । रथौघतुमुलावर्तः प्रबभौ सैन्यसागरः ॥
sagajaughamahāvegaḥ parāsunaraśaivalaḥ | rathaughatumulāvartaḥ prababhau sainyasāgaraḥ
हाथियों के समूहों के महावेग वाला, मृत मनुष्यों की काई से भरा और रथ-समूहों के घोर भँवरों वाला वह सेना-सागर शोभित हुआ।
श्लोक 65 (7.20.65)
तं वाहनमहानौभिर्योधा जयधनैषिणः । अवगाह्याथ मज्जन्तो नैव मोहं प्रचक्रिरे ॥
taṃ vāhanamahānaubhiryodhā jayadhanaiṣiṇaḥ | avagāhyātha majjanto naiva mohaṃ pracakrire
विजय और धन के इच्छुक योद्धा वाहनरूपी बड़ी नावों से उसमें उतरे और उसमें डूबते हुए भी मोहित नहीं हुए।
श्लोक 66 (7.20.66)
शरवर्षाभिवृष्टेषु योधेष्वञ्चितलक्ष्मसु । न तेष्वचित्ततां लेभे कश्चिदाहतलक्षणः ॥
śaravarṣābhivṛṣṭeṣu yodheṣvañcitalakṣmasu | na teṣvacittatāṃ lebhe kaścidāhatalakṣaṇaḥ
बाणों की वर्षा से भीगे हुए उत्तम चिह्नों वाले योद्धाओं में से घायल होने पर भी कोई मूर्च्छित नहीं हुआ।
श्लोक 67 (7.20.67)
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भयङ्करे । मोहयित्वा परान्द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥
vartamāne tathā yuddhe ghorarūpe bhayaṅkare | mohayitvā parāndroṇo yudhiṣṭhiramupādravat
जब वह भयंकर और भय उत्पन्न करने वाला युद्ध चल रहा था, तब शत्रुओं को मोहित करके द्रोण युधिष्ठिर पर टूट पड़े।