द्रोण पर्व · अध्याय 174
कर्ण द्वारा पाञ्चालों की पराजय; कृष्ण का घटोत्कच को कर्ण के विरुद्ध भेजना
कर्ण धृष्टद्युम्न को हरा देता है, जो पैदल भागकर सहदेव के रथ पर चढ़ जाता है, और पाञ्चालों की सेना को भय से भागने पर विवश कर देता है। विचलित युधिष्ठिर अर्जुन से कुछ करने को कहते हैं; अर्जुन कृष्ण से अपने को कर्ण के पास ले चलने को कहता है। कृष्ण उसे रोक लेते हैं, क्योंकि कर्ण के पास अब भी अर्जुन के लिए रखी इन्द्र की शक्ति है, और वे घटोत्कच को बुलवाते हैं। कृष्ण और अर्जुन उस राक्षस से कहते हैं कि वह रात में अपनी मायाओं से कर्ण का वध करे, पीछे से सात्यकि उसकी रक्षा करेगा, और घटोत्कच कर्ण पर टूट पड़ता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.174.1)
ततः कर्णो रणे दृष्ट्वा पार्षतं परवीरहा । आजघानोरसि शरैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥
tataḥ karṇo raṇe dṛṣṭvā pārṣataṃ paravīrahā | ājaghānorasi śarairdaśabhirmarmabhedibhiḥ
तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले कर्ण ने रण में पार्षत (धृष्टद्युम्न) को देखकर मर्मस्थलों को भेदने वाले दस बाणों से उनकी छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 2 (7.174.2)
प्रतिविव्याध तं तूर्णं धृष्टद्युम्नोपि मारिष । दशभिः सायकैर्हृष्टस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
prativivyādha taṃ tūrṇaṃ dhṛṣṭadyumnopi māriṣa | daśabhiḥ sāyakairhṛṣṭastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
हे मान्यवर, धृष्टद्युम्न ने भी प्रसन्न होकर तुरन्त दस बाणों से उन्हें बदले में बींधा और कहा, "ठहर, ठहर!"
श्लोक 3 (7.174.3)
तावन्योन्यं शरैः सङ्ख्ये सञ्छाद्य सुमहारथौ । पुनः पूर्णायतोत्सृष्टैर्विव्यधाते परस्परम् ॥
tāvanyonyaṃ śaraiḥ saṅkhye sañchādya sumahārathau | punaḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairvivyadhāte parasparam
वे दोनों महारथी युद्ध में एक-दूसरे को बाणों से ढककर फिर पूरी खिंची हुई प्रत्यंचा से छोड़े गए बाणों से परस्पर बींधने लगे।
श्लोक 4 (7.174.4)
ततः पाञ्चालमुख्यस्य धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । सारथिं चतुरश्चाश्वान्कर्णो विव्याध सायकैः ॥
tataḥ pāñcālamukhyasya dhṛṣṭadyumnasya saṃyuge | sārathiṃ caturaścāśvānkarṇo vivyādha sāyakaiḥ
तब कर्ण ने युद्ध में पाञ्चालों के प्रमुख धृष्टद्युम्न के सारथि और चारों घोड़ों को बाणों से बींध दिया।
श्लोक 5 (7.174.5)
कार्मुकप्रवरं चापि प्रचिच्छेद शितैः शरैः । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥
kārmukapravaraṃ cāpi praciccheda śitaiḥ śaraiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat
उसने तीखे बाणों से उनके श्रेष्ठ धनुष को भी काट डाला, और एक भल्ल से उनके सारथि को रथ के अगले भाग से नीचे गिरा दिया।
श्लोक 6 (7.174.6)
धृष्टद्युम्नस्तु विरथो हताश्वो हतसारथिः । गृहीत्वा परिघं घोरं कर्णस्याश्वानपीडयत् ॥
dhṛṣṭadyumnastu viratho hatāśvo hatasārathiḥ | gṛhītvā parighaṃ ghoraṃ karṇasyāśvānapīḍayat
रथहीन हो गए, घोड़े और सारथि मारे जा चुके धृष्टद्युम्न ने एक भयंकर परिघ उठाकर कर्ण के घोड़ों को कुचल दिया।
श्लोक 7 (7.174.7)
विद्धश्च बहुभिस्तेन शरैराशीविषोपमैः । ततो युधिष्ठिरानीकं पद्भ्यामेवान्वपद्यत ॥
viddhaśca bahubhistena śarairāśīviṣopamaiḥ | tato yudhiṣṭhirānīkaṃ padbhyāmevānvapadyata
कर्ण के विषैले सर्पों जैसे बहुत-से बाणों से बिंधे हुए वे पैदल ही युधिष्ठिर की सेना की ओर चले गए।
श्लोक 8 (7.174.8)
आरुरोह रथं चापि सहदेवस्य मारिष । प्रयातुकामः कर्णाय वारितो धर्मसूनुना ॥
āruroha rathaṃ cāpi sahadevasya māriṣa | prayātukāmaḥ karṇāya vārito dharmasūnunā
हे मान्यवर, वे सहदेव के रथ पर भी चढ़ गए; वे कर्ण के सामने जाना चाहते थे, पर धर्मपुत्र ने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 9 (7.174.9)
कर्णस्तु सुमहातेजाः सिंहनादविमिश्रितम् । धनुःशब्दं महच्चक्रे दध्मौ तारेण चाम्बुजम् ॥
karṇastu sumahātejāḥ siṃhanādavimiśritam | dhanuḥśabdaṃ mahaccakre dadhmau tāreṇa cāmbujam
परन्तु महातेजस्वी कर्ण ने सिंहनाद के साथ मिला हुआ धनुष का भारी टंकार किया और तीव्र स्वर से अपना शंख बजाया।
श्लोक 10 (7.174.10)
दृष्ट्वा विनिर्जितं युद्धे पार्षतं ते महारथाः । अमर्षवशमापन्नाः पाञ्चालाः सहसोमकाः ॥
dṛṣṭvā vinirjitaṃ yuddhe pārṣataṃ te mahārathāḥ | amarṣavaśamāpannāḥ pāñcālāḥ sahasomakāḥ
पार्षत को युद्ध में परास्त हुआ देखकर वे महारथी, सोमकों सहित पाञ्चाल, अमर्ष के वश में हो गए।
श्लोक 11 (7.174.11)
सूतपुत्रवधार्थाय शस्त्राण्यादाय सर्वशः । प्रययुः कर्णमुद्दिश्य मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
sūtaputravadhārthāya śastrāṇyādāya sarvaśaḥ | prayayuḥ karṇamuddiśya mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
सूतपुत्र का वध करने के लिए सब ओर से शस्त्र उठाकर वे कर्ण की ओर बढ़ चले; उन्होंने ठान लिया था कि लौटेंगे तो मृत्यु के बाद ही।
श्लोक 12 (7.174.12)
कर्णस्यापि रथे वाहानन्यान्सूतोऽभ्ययोजयत् । शङ्खवर्णान्महावेगान्सैन्धवान्साधुवाहिनः ॥
karṇasyāpi rathe vāhānanyānsūto'bhyayojayat | śaṅkhavarṇānmahāvegānsaindhavānsādhuvāhinaḥ
सारथि ने कर्ण के रथ में दूसरे घोड़े जोत दिए, जो शंख के समान श्वेत, अत्यन्त वेगवान्, सिन्धु देश के और भली-भाँति रथ खींचने वाले थे।
श्लोक 13 (7.174.13)
लब्धलक्षस्तु राधेयः पञ्चालानां महारथान् । अभ्यपीडयदायस्तः शरैर्मेघ इवाचलम् ॥
labdhalakṣastu rādheyaḥ pañcālānāṃ mahārathān | abhyapīḍayadāyastaḥ śarairmegha ivācalam
निशाना पा चुके राधापुत्र ने प्रयत्नपूर्वक पाञ्चालों के महारथियों को बाणों से वैसे ही दबोच लिया, जैसे बादल पर्वत पर बरसकर उसे दबाता है।
श्लोक 14 (7.174.14)
सा पीड्यमाना कर्णेन पाञ्चालानां महाचमूः । सम्प्राद्रवत्सुसन्त्रस्ता सिंहेनेवार्दिता मृगी ॥
sā pīḍyamānā karṇena pāñcālānāṃ mahācamūḥ | samprādravatsusantrastā siṃhenevārditā mṛgī
कर्ण से सताई जाती हुई पाञ्चालों की वह विशाल सेना सिंह से पीड़ित हिरनी की तरह अत्यन्त भयभीत होकर भाग चली।
श्लोक 15 (7.174.15)
पतितास्तुरगेभ्यश्च गजेभ्यश्च महीतले । रथेभ्यश्च नरास्तूर्णमदृश्यन्त ततस्ततः ॥
patitāsturagebhyaśca gajebhyaśca mahītale | rathebhyaśca narāstūrṇamadṛśyanta tatastataḥ
घोड़ों, हाथियों और रथों से मनुष्य तुरन्त भूमि पर गिरते हुए यहाँ-वहाँ दिखाई देने लगे।
श्लोक 16 (7.174.16)
धावमानस्य योधस्य क्षुरप्रैः स महामृधे । बाहू चिच्छेद वै कर्णः शिरश्चैव सकुण्डलम् ॥
dhāvamānasya yodhasya kṣurapraiḥ sa mahāmṛdhe | bāhū ciccheda vai karṇaḥ śiraścaiva sakuṇḍalam
उस महायुद्ध में भागते हुए एक योद्धा की दोनों भुजाएँ और कुण्डलों सहित सिर कर्ण ने क्षुरप्र बाणों से काट डाले।
श्लोक 17 (7.174.17)
ऊरू चिच्छेद चान्यस्य गजस्थस्य विशाम्पते । वाजिपृष्ठगतस्यापि भूमिष्ठस्य च मारिष ॥
ūrū ciccheda cānyasya gajasthasya viśāmpate | vājipṛṣṭhagatasyāpi bhūmiṣṭhasya ca māriṣa
हे प्रजानाथ, उसने हाथी पर बैठे एक दूसरे योद्धा की जाँघें काट डालीं, और घोड़े की पीठ पर बैठे तथा भूमि पर खड़े योद्धा की भी, हे मान्यवर।
श्लोक 18 (7.174.18)
नाज्ञासिषुर्धावमाना बहवश्च महारथाः । सञ्छिन्नान्यात्मगात्राणि वाहनानि च संयुगे ॥
nājñāsiṣurdhāvamānā bahavaśca mahārathāḥ | sañchinnānyātmagātrāṇi vāhanāni ca saṃyuge
भागते हुए बहुत-से महारथियों को पता ही न चला कि युद्ध में उनके अपने अंग और वाहन कटकर टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं।
श्लोक 19 (7.174.19)
ते वध्यमानाः समरे पाञ्चालाः सृञ्जयैः सह । तृणप्रस्पन्दनाच्चापि सूतपुत्रं स्म मेनिरे ॥
te vadhyamānāḥ samare pāñcālāḥ sṛñjayaiḥ saha | tṛṇapraspandanāccāpi sūtaputraṃ sma menire
रण में मारे जाते हुए पाञ्चाल और सृञ्जय तिनके की हलचल को भी सूतपुत्र समझने लगे।
श्लोक 20 (7.174.20)
अपि स्वं समरे योधं धावमानं विचेतसम् । कर्णमेवाभ्यमन्यन्त ततो भीता द्रवन्ति ते ॥
api svaṃ samare yodhaṃ dhāvamānaṃ vicetasam | karṇamevābhyamanyanta tato bhītā dravanti te
अपने ही दौड़ते हुए बेसुध योद्धा को भी वे कर्ण समझ बैठते थे, और इसी से भयभीत होकर भाग रहे थे।
श्लोक 21 (7.174.21)
तान्यनीकानि भग्नानि द्रवमाणानि भारत । अभ्यद्रवद्द्रुतं कर्णः पृष्ठतो विकिरञ्छरान् ॥
tānyanīkāni bhagnāni dravamāṇāni bhārata | abhyadravaddrutaṃ karṇaḥ pṛṣṭhato vikirañcharān
हे भारत, कर्ण ने पीठ पर बाण बरसाते हुए उन टूटी हुई, भागती सेनाओं का तेज़ी से पीछा किया।
श्लोक 22 (7.174.22)
अवेक्षमाणास्त्वन्योन्यं सुसम्मूढा विचेतसः । नाशक्नुवन्नवस्थातुं काल्यमाना महात्मना ॥
avekṣamāṇāstvanyonyaṃ susammūḍhā vicetasaḥ | nāśaknuvannavasthātuṃ kālyamānā mahātmanā
एक-दूसरे को ताकते हुए, पूरी तरह घबराए और बेसुध, वे उस महात्मा द्वारा खदेड़े जाने पर टिक नहीं पा रहे थे।
श्लोक 23 (7.174.23)
कर्णेनाभ्याहता राजन्पाञ्चालाः परमेषुभिः । द्रोणेन च दिशः सर्वा वीक्षमाणाः प्रदुद्रुवुः ॥
karṇenābhyāhatā rājanpāñcālāḥ parameṣubhiḥ | droṇena ca diśaḥ sarvā vīkṣamāṇāḥ pradudruvuḥ
हे राजन्, कर्ण के उत्तम बाणों से और द्रोण से भी मार खाकर पाञ्चाल सब दिशाओं की ओर ताकते हुए भाग निकले।
श्लोक 24 (7.174.24)
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वसैन्यं प्रेक्ष्य विद्रुतम् । अपयाने मनः कृत्वा फल्गुनं वाक्यमब्रवीत् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā svasainyaṃ prekṣya vidrutam | apayāne manaḥ kṛtvā phalgunaṃ vākyamabravīt
तब राजा युधिष्ठिर ने अपनी सेना को भागते देखा और पीछे हटने का मन बनाकर फाल्गुन से कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (7.174.25)
पश्य कर्णं महेष्वासं धनुष्पाणिमवस्थितम् । निशीथे दारुणे काले तपन्तमिव भास्करम् ॥
paśya karṇaṃ maheṣvāsaṃ dhanuṣpāṇimavasthitam | niśīthe dāruṇe kāle tapantamiva bhāskaram
"महाधनुर्धर कर्ण को देखो, जो हाथ में धनुष लिए खड़ा है और मध्यरात्रि के इस भयंकर समय में सूर्य की तरह तप रहा है।
श्लोक 26 (7.174.26)
कर्णसायकनुन्नानां क्रोशतामेष निःस्वनः । अनिशं श्रूयते पार्थ त्वद्बन्धूनामनाथवत् ॥
karṇasāyakanunnānāṃ krośatāmeṣa niḥsvanaḥ | aniśaṃ śrūyate pārtha tvadbandhūnāmanāthavat
हे पार्थ, कर्ण के बाणों से मारे जाते हुए तुम्हारे बन्धुओं की यह चीख़, अनाथों की पुकार जैसी, निरन्तर सुनाई दे रही है।
श्लोक 27 (7.174.27)
यथा विसृजतश्चास्य सन्दधानस्य चाशुगान् । पश्यामि नान्तरं पार्थ क्षपयिष्यति नो ध्रुवम् ॥
yathā visṛjataścāsya sandadhānasya cāśugān | paśyāmi nāntaraṃ pārtha kṣapayiṣyati no dhruvam
हे पार्थ, जैसे वह बाण छोड़ता और चढ़ाता है, उसमें मुझे कोई अन्तराल नहीं दिखता; वह निश्चय ही हमारा नाश कर देगा।
श्लोक 28 (7.174.28)
यदत्रानन्तरं कार्यं प्राप्तकालं च पश्यसि । कर्णस्य वधसंयुक्तं तत्कुरुष्व धनञ्जय ॥
yadatrānantaraṃ kāryaṃ prāptakālaṃ ca paśyasi | karṇasya vadhasaṃyuktaṃ tatkuruṣva dhanañjaya
अब आगे जो करना है, यदि तुम्हें उसका समय आया दिखता है, तो हे धनञ्जय, कर्ण के वध से जुड़ा वही कार्य करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 29 (7.174.29)
एवमुक्तो महाराज पार्थः कृष्णमथाब्रवीत् । भीतः कुन्तीसुतो राजा राधेयस्याद्य विक्रमात् ॥
evamukto mahārāja pārthaḥ kṛṣṇamathābravīt | bhītaḥ kuntīsuto rājā rādheyasyādya vikramāt
हे महाराज, ऐसा कहे जाने पर पार्थ ने कृष्ण से कहा, क्योंकि कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आज राधापुत्र के पराक्रम से भयभीत थे।
अर्जुन उवाच
श्लोक 30 (7.174.30)
एवं गते प्राप्तकालं कर्णानीके पुनः पुनः । भवान्व्यवस्यतु क्षिप्रं द्रवते हि वरूथिनी ॥
evaṃ gate prāptakālaṃ karṇānīke punaḥ punaḥ | bhavānvyavasyatu kṣipraṃ dravate hi varūthinī
"जब स्थिति ऐसी हो गई है, तो कर्ण की सेना पर, जो बार-बार प्रहार कर रही है, कार्रवाई का समय आ गया है; आप शीघ्र निश्चय कीजिए, क्योंकि सेना भाग रही है।
श्लोक 31 (7.174.31)
द्रोणसायकनुन्नानां भग्नानां मधुसूदन । कर्णेन त्रास्यमानानामवस्थानं न विद्यते ॥
droṇasāyakanunnānāṃ bhagnānāṃ madhusūdana | karṇena trāsyamānānāmavasthānaṃ na vidyate
हे मधुसूदन, द्रोण के बाणों से खदेड़े गए, टूटे हुए और कर्ण द्वारा त्रस्त किए जाते इन सैनिकों के लिए ठहरना सम्भव नहीं है।
श्लोक 32 (7.174.32)
पश्यामि च तथा कर्णं विचरन्तमभीतवत् । द्रवमाणान्रथोदारान्किरन्तं निशितैः शरैः ॥
paśyāmi ca tathā karṇaṃ vicarantamabhītavat | dravamāṇānrathodārānkirantaṃ niśitaiḥ śaraiḥ
और मैं देखता हूँ कि कर्ण निर्भय-सा विचर रहा है और भागते हुए श्रेष्ठ रथियों पर तीखे बाण बरसा रहा है।
श्लोक 33 (7.174.33)
नैनं शक्ष्यामि संसोढुं चरन्तं रणमूर्धनि । प्रत्यक्षं वृष्णिशार्दूल पादस्पर्शमिवोरगः ॥
nainaṃ śakṣyāmi saṃsoḍhuṃ carantaṃ raṇamūrdhani | pratyakṣaṃ vṛṣṇiśārdūla pādasparśamivoragaḥ
हे वृष्णिश्रेष्ठ, रण के अग्रभाग में आँखों के सामने उसे विचरते देखना मैं सह नहीं सकूँगा, जैसे साँप पैर का स्पर्श नहीं सह सकता।
श्लोक 34 (7.174.34)
स भवांस्तत्र यात्वाशु यत्र कर्णो महारथः । अहमेनं हनिष्यामि मां वैष मधुसूदन ॥
sa bhavāṃstatra yātvāśu yatra karṇo mahārathaḥ | ahamenaṃ haniṣyāmi māṃ vaiṣa madhusūdana
इसलिए आप शीघ्र वहीं चलिए जहाँ महारथी कर्ण है। हे मधुसूदन, या तो मैं उसे मारूँगा, या वह मुझे मारेगा।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 35 (7.174.35)
पश्यामि कर्णं कौन्तेय देवराजमिवाहवे । विचरन्तं नरव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ॥
paśyāmi karṇaṃ kaunteya devarājamivāhave | vicarantaṃ naravyāghramatimānuṣavikramam
हे कुन्तीपुत्र, मैं देखता हूँ कि कर्ण देवराज की तरह युद्ध में विचर रहा है, नरश्रेष्ठ है और उसका पराक्रम मनुष्य की सीमा से परे है।
श्लोक 36 (7.174.36)
नैतस्यान्योऽस्ति सङ्ग्रामे प्रत्युद्याता धनञ्जय । ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र राक्षसाद्वा घटोत्कचात् ॥
naitasyānyo'sti saṅgrāme pratyudyātā dhanañjaya | ṛte tvāṃ puruṣavyāghra rākṣasādvā ghaṭotkacāt
हे धनञ्जय, इस युद्ध में उसका सामना करने के लिए तुम्हारे सिवा, हे पुरुषव्याघ्र, या राक्षस घटोत्कच के सिवा कोई दूसरा नहीं है।
श्लोक 37 (7.174.37)
न तु तावदहं मन्ये प्राप्तकालं तवानघ । समागमं महाबाहो सूतपुत्रेण संयुगे ॥
na tu tāvadahaṃ manye prāptakālaṃ tavānagha | samāgamaṃ mahābāho sūtaputreṇa saṃyuge
परन्तु हे निष्पाप, मैं नहीं समझता कि अभी तुम्हारे लिए सूतपुत्र से युद्ध में भिड़ने का समय आया है।
श्लोक 38 (7.174.38)
दीप्यमाना महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी । त्वदर्थं हि महाबाहो सूतपुत्रेण संयुगे ॥
dīpyamānā maholkeva tiṣṭhatyasya hi vāsavī | tvadarthaṃ hi mahābāho sūtaputreṇa saṃyuge
उसके पास वासव की शक्ति रखी है, जो बड़ी उल्का की तरह दहकती है; हे महाबाहो, सूतपुत्र के साथ युद्ध में तुम्हारे लिए ही,
श्लोक 39 (7.174.39)
रक्ष्यते शक्तिरेषा हि रौद्रं रूपं बिभर्ति च । घटोत्कचस्तु राधेयं प्रत्युद्यातु महाबलः ॥
rakṣyate śaktireṣā hi raudraṃ rūpaṃ bibharti ca | ghaṭotkacastu rādheyaṃ pratyudyātu mahābalaḥ
यह शक्ति सँजोकर रखी गई है, और वह भयंकर रूप धारण किए हुए है। इसलिए महाबली घटोत्कच राधापुत्र का सामना करने जाए।
श्लोक 40 (7.174.40)
स हि भीमेन बलिना जातः सुरपराक्रमः । तस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि राक्षसान्यासुराणि च ॥
sa hi bhīmena balinā jātaḥ suraparākramaḥ | tasminnastrāṇi divyāni rākṣasānyāsurāṇi ca
क्योंकि वह बलशाली भीम से उत्पन्न हुआ है और उसमें देवताओं जैसा पराक्रम है; उसमें दिव्य अस्त्र हैं, राक्षसों के भी और असुरों के भी।
श्लोक 41 (7.174.41)
सततं चानुरक्तो वो हितैषी च घटोत्कचः । विजेष्यति रणे कर्णमिति मे नात्र संशयः ॥
satataṃ cānurakto vo hitaiṣī ca ghaṭotkacaḥ | vijeṣyati raṇe karṇamiti me nātra saṃśayaḥ
घटोत्कच सदा तुम सबका अनुरागी और हितैषी है; वह रण में कर्ण को जीत लेगा, इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (7.174.42)
एवमुक्तो महाबाहुः पार्थः पुष्करलोचनः । आजुहावाथ तद्रक्षस्तच्चासीत्प्रादुरग्रतः ॥
evamukto mahābāhuḥ pārthaḥ puṣkaralocanaḥ | ājuhāvātha tadrakṣastaccāsītprāduragrataḥ
ऐसा कहे जाने पर महाबाहु, कमलनयन पार्थ ने उस राक्षस को बुलाया, और वह उसके सामने प्रकट हो गया।
श्लोक 43 (7.174.43)
कवची सशरः खड्गी सधन्वा च विशाम्पते । अभिवाद्य ततः कृष्णं पाण्डवं च धनञ्जयम् । अब्रवीच्च तदा कृष्णमयमस्म्यनुशाधि माम् ॥
kavacī saśaraḥ khaḍgī sadhanvā ca viśāmpate | abhivādya tataḥ kṛṣṇaṃ pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam | abravīcca tadā kṛṣṇamayamasmyanuśādhi mām
हे प्रजानाथ, कवच, बाण, खड्ग और धनुष से सज्जित उसने कृष्ण और पाण्डव धनञ्जय को प्रणाम किया, और तब कृष्ण से कहा, "मैं यह उपस्थित हूँ; मुझे आज्ञा दीजिए।"
श्लोक 44 (7.174.44)
ततस्तं मेघसङ्काशं दीप्तास्यं दीप्तकुण्डलम् । अभ्यभाषत हैडिम्बिं दाशार्हः प्रहसन्निव ॥
tatastaṃ meghasaṅkāśaṃ dīptāsyaṃ dīptakuṇḍalam | abhyabhāṣata haiḍimbiṃ dāśārhaḥ prahasanniva
तब दाशार्ह (कृष्ण) ने मेघ के समान, दीप्त मुख और चमकते कुण्डलों वाले हिडिम्बापुत्र से मानो हँसते हुए कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 45 (7.174.45)
घटोत्कच विजानीहि यत्त्वां वक्ष्यामि पुत्रक । प्राप्तो विक्रमकालोऽयं तव नान्यस्य कस्याचित् । स त्वं निमज्जतां युद्धे बन्धूनां बान्धवो भव ॥
ghaṭotkaca vijānīhi yattvāṃ vakṣyāmi putraka | prāpto vikramakālo'yaṃ tava nānyasya kasyācit | sa tvaṃ nimajjatāṃ yuddhe bandhūnāṃ bāndhavo bhava
"घटोत्कच, बेटा, मैं जो तुमसे कहने जा रहा हूँ उसे समझ लो। तुम्हारे पराक्रम का समय आ गया है, किसी और का नहीं। इसलिए युद्ध में डूबते हुए अपने बन्धुओं के सच्चे बन्धु बनो।
श्लोक 46 (7.174.46)
यावन्ति च तवास्त्राणि सन्ति मायाश्च राक्षसीः । अद्यैव समयस्तेषां मायानां चैव राक्षस ॥
yāvanti ca tavāstrāṇi santi māyāśca rākṣasīḥ | adyaiva samayasteṣāṃ māyānāṃ caiva rākṣasa
तुम्हारे पास जितने अस्त्र हैं और जो राक्षसी मायाएँ हैं, हे राक्षस, उनका और तुम्हारी मायाओं का समय आज ही है।
श्लोक 47 (7.174.47)
पश्य कर्णेन हैडिम्बे पाण्डवानामनीकिनीम् । काल्यमानां रणे तात सिंहेनेवेतरान्मृगान् ॥
paśya karṇena haiḍimbe pāṇḍavānāmanīkinīm | kālyamānāṃ raṇe tāta siṃhenevetarānmṛgān
देखो हिडिम्बापुत्र, बेटा, कर्ण रण में पाण्डवों की सेना को वैसे ही खदेड़ रहा है जैसे सिंह दूसरे पशुओं को खदेड़ता है।
श्लोक 48 (7.174.48)
एष कर्णो महेष्वासो मतिमान्दृढविक्रमः । पाण्डवानामनीकेषु निहन्ति क्षत्रियर्षभान् ॥
eṣa karṇo maheṣvāso matimāndṛḍhavikramaḥ | pāṇḍavānāmanīkeṣu nihanti kṣatriyarṣabhān
यह महाधनुर्धर कर्ण है, बुद्धिमान् और दृढ़ पराक्रमी, जो पाण्डवों की पंक्तियों में श्रेष्ठ क्षत्रियों को मार रहा है।
श्लोक 49 (7.174.49)
किरन्तः शरवर्षाणि महान्ति दृढधन्विनः । न शक्नुवन्त्यवस्थातुं पीड्यमानाः शरार्चिषा ॥
kirantaḥ śaravarṣāṇi mahānti dṛḍhadhanvinaḥ | na śaknuvantyavasthātuṃ pīḍyamānāḥ śarārciṣā
ये दृढ़ धनुर्धर भी भारी बाण-वर्षा करते हुए उसके बाणों की लपटों से पीड़ित होकर टिक नहीं पा रहे हैं।
श्लोक 50 (7.174.50)
निशीथे सूतपुत्रेण शरवर्षेण पीडिताः । एते द्रवन्ति पाञ्चालाः सिंहेनेवार्दिता मृगाः ॥
niśīthe sūtaputreṇa śaravarṣeṇa pīḍitāḥ | ete dravanti pāñcālāḥ siṃhenevārditā mṛgāḥ
मध्यरात्रि में सूतपुत्र की बाण-वर्षा से पीड़ित ये पाञ्चाल सिंह से सताए गए मृगों की तरह भाग रहे हैं।
श्लोक 51 (7.174.51)
एतस्यैवं प्रवृद्धस्य सूतपुत्रस्य संयुगे । निषेद्धा विद्यते नान्यस्त्वामृते भीमविक्रम ॥
etasyaivaṃ pravṛddhasya sūtaputrasya saṃyuge | niṣeddhā vidyate nānyastvāmṛte bhīmavikrama
युद्ध में इस प्रकार बढ़े हुए सूतपुत्र को रोकने वाला तुम्हारे सिवा, हे भयंकर पराक्रमी, कोई दूसरा नहीं है।
श्लोक 52 (7.174.52)
स त्वं कुरु महाबाहो कर्म युक्तमिहात्मनः । मातुलानां पितॄणां च तेजसोऽस्त्रबलस्य च ॥
sa tvaṃ kuru mahābāho karma yuktamihātmanaḥ | mātulānāṃ pitṝṇāṃ ca tejaso'strabalasya ca
इसलिए हे महाबाहो, अपने मामाओं और पितृजनों के लिए तथा अपने तेज और अस्त्रबल के अनुरूप उचित कर्म करो।
श्लोक 53 (7.174.53)
एतदर्थे हि हैडिम्बे पुत्रानिच्छन्ति मानवाः । कथं नस्तारयेद्दुःखात्स त्वं तारय बान्धवान् ॥
etadarthe hi haiḍimbe putrānicchanti mānavāḥ | kathaṃ nastārayedduḥkhātsa tvaṃ tāraya bāndhavān
हे हिडिम्बापुत्र, मनुष्य पुत्र इसीलिए चाहते हैं कि वह हमें दुःख से कैसे पार लगाएगा। इसलिए तुम अपने बन्धुओं को पार लगाओ।
श्लोक 54 (7.174.54)
इच्छन्ति पितरः पुत्रान्स्वार्थहेतोर्घटोत्कच । इहलोकात्परे लोके तारयिष्यन्ति ये हिताः ॥
icchanti pitaraḥ putrānsvārthahetorghaṭotkaca | ihalokātpare loke tārayiṣyanti ye hitāḥ
हे घटोत्कच, पिता अपने ही हित के लिए पुत्र चाहते हैं, ऐसे हितैषी पुत्र जो इस लोक से परलोक में उन्हें पार लगाएँगे।
श्लोक 55 (7.174.55)
तव ह्यत्र बलं भीमं मायाश्च तव दुस्तराः । सङ्क्रामे युध्यमानस्य सततं भीमनन्दन ॥
tava hyatra balaṃ bhīmaṃ māyāśca tava dustarāḥ | saṅkrāme yudhyamānasya satataṃ bhīmanandana
हे भीमपुत्र, यहाँ तुम्हारे पास भयंकर बल है, और तुम्हारी मायाएँ दुस्तर हैं, जब तुम सदा संग्राम में जूझते हो।
श्लोक 56 (7.174.56)
पाण्डवानां प्रभग्नानां कर्णेन निशि सायकैः । मज्जतां धार्तराष्ट्रेषु भव पारं परन्तप ॥
pāṇḍavānāṃ prabhagnānāṃ karṇena niśi sāyakaiḥ | majjatāṃ dhārtarāṣṭreṣu bhava pāraṃ parantapa
हे शत्रुतापन, रात में कर्ण के बाणों से टूटे हुए और धृतराष्ट्र-पुत्रों के बीच डूबते हुए पाण्डवों के लिए तुम दूसरा किनारा बनो।
श्लोक 57 (7.174.57)
रात्रौ हि राक्षसा भूयो भवन्त्यमितविक्रमाः । बलवन्तः सुदुर्धर्षाः शूरा विक्रान्तचारिणः ॥
rātrau hi rākṣasā bhūyo bhavantyamitavikramāḥ | balavantaḥ sudurdharṣāḥ śūrā vikrāntacāriṇaḥ
क्योंकि रात में राक्षस और भी अपार पराक्रमी हो जाते हैं, बलवान्, दुर्धर्ष, शूर और साहसपूर्वक विचरने वाले।
श्लोक 58 (7.174.58)
जहि कर्णं महेष्वासं निशीथे मायया रणे । पार्था द्रोणं वधिष्यन्ति धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥
jahi karṇaṃ maheṣvāsaṃ niśīthe māyayā raṇe | pārthā droṇaṃ vadhiṣyanti dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ
रणभूमि में अपनी माया से मध्यरात्रि के समय महाधनुर्धर कर्ण को मारो; धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में पार्थ द्रोण का वध करेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 59 (7.174.59)
केशवस्य वचः श्रुत्वा बीभत्सुरपि राक्षसम् । अभ्यभाषत कौरव्य घटोत्कचमरिन्दमम् ॥
keśavasya vacaḥ śrutvā bībhatsurapi rākṣasam | abhyabhāṣata kauravya ghaṭotkacamarindamam
हे कौरव, केशव की बात सुनकर बीभत्सु ने भी शत्रुदमन राक्षस घटोत्कच से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 60 (7.174.60)
घटोत्कच भवांश्चैव दीर्घबाहुश्च सात्यकिः । मतौ मे सर्वसैन्येषु भीमसेनश्च पाण्डवः ॥
ghaṭotkaca bhavāṃścaiva dīrghabāhuśca sātyakiḥ | matau me sarvasainyeṣu bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ
"घटोत्कच, तुम, दीर्घबाहु सात्यकि और पाण्डव भीमसेन, इन्हीं को मैं सब सेनाओं में सबसे बढ़कर मानता हूँ।
श्लोक 61 (7.174.61)
तद्भवान्यातु कर्णेन द्वैरथं युध्यतां निशि । सात्यकिः पृष्ठगोपस्ते भविष्यति महारथः ॥
tadbhavānyātu karṇena dvairathaṃ yudhyatāṃ niśi | sātyakiḥ pṛṣṭhagopaste bhaviṣyati mahārathaḥ
इसलिए तुम रात में कर्ण से रथयुद्ध करने जाओ; महारथी सात्यकि तुम्हारी पीठ की रक्षा करेगा।
श्लोक 62 (7.174.62)
जहि कर्णं रणे शूरं सात्वतेन सहायवान् । यथेन्द्रस्तारकं पूर्वं स्कन्देन सह जघ्निवान् ॥
jahi karṇaṃ raṇe śūraṃ sātvatena sahāyavān | yathendrastārakaṃ pūrvaṃ skandena saha jaghnivān
सात्वत को सहायक बनाकर रण में शूर कर्ण को मारो, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र ने स्कन्द के साथ मिलकर तारक को मारा था।"
घटोत्कच उवाच
श्लोक 63 (7.174.63)
एवमेव महाबाहो यथा वदसि मां प्रभो । त्वया नियुक्तो गच्छामि कर्णस्य वधकाङ्क्षया ॥
evameva mahābāho yathā vadasi māṃ prabho | tvayā niyukto gacchāmi karṇasya vadhakāṅkṣayā
"हे महाबाहो, हे प्रभु, जैसा आप मुझसे कहते हैं वैसा ही होगा; आपसे नियुक्त होकर मैं कर्ण का वध करने की इच्छा से जा रहा हूँ।
श्लोक 64 (7.174.64)
अलमेवास्मि कर्णाय द्रोणायालं च भारत । अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणां महात्मनाम् ॥
alamevāsmi karṇāya droṇāyālaṃ ca bhārata | anyeṣāṃ kṣatriyāṇāṃ ca kṛtāstrāṇāṃ mahātmanām
हे भारत, मैं कर्ण के लिए पर्याप्त हूँ, द्रोण के लिए भी, और दूसरे अस्त्रविद्या में निपुण महात्मा क्षत्रियों के लिए भी।
श्लोक 65 (7.174.65)
अद्य दास्यामि सङ्ग्रामं सूतपुत्राय तं निशि । यं जनाः सम्प्रवक्ष्यन्ति यावद्भूमिर्धरिष्यति ॥
adya dāsyāmi saṅgrāmaṃ sūtaputrāya taṃ niśi | yaṃ janāḥ sampravakṣyanti yāvadbhūmirdhariṣyati
आज रात मैं सूतपुत्र को ऐसा युद्ध दूँगा जिसकी चर्चा लोग तब तक करेंगे जब तक पृथ्वी टिकी रहेगी।
श्लोक 66 (7.174.66)
न चात्र शूरान्मोक्ष्यामि न भीतान्न कृताञ्जलीन् । सर्वानेव वधिष्यामि राक्षसं धर्ममास्थितः ॥
na cātra śūrānmokṣyāmi na bhītānna kṛtāñjalīn | sarvāneva vadhiṣyāmi rākṣasaṃ dharmamāsthitaḥ
यहाँ मैं न शूरों को छोड़ूँगा, न डरे हुओं को, न हाथ जोड़े हुओं को; राक्षस-धर्म का आश्रय लेकर मैं सभी को मारूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 67 (7.174.67)
एवमुक्त्वा महाबाहुर्हैडिम्बिः परवीरहा । अभ्ययात्तुमुले कर्णं तव सैन्यं विभीषयन् ॥
evamuktvā mahābāhurhaiḍimbiḥ paravīrahā | abhyayāttumule karṇaṃ tava sainyaṃ vibhīṣayan
यह कहकर शत्रुवीरों का संहार करने वाला महाबाहु हिडिम्बापुत्र आपकी सेना को भयभीत करता हुआ उस कोलाहल में कर्ण पर टूट पड़ा।
श्लोक 68 (7.174.68)
तमापतन्तं सङ्क्रुद्धं दीप्तास्यं दीप्तमूर्धजम् । प्रहसन्पुरुषव्याघ्रः प्रतिजग्राह सूतजः ॥
tamāpatantaṃ saṅkruddhaṃ dīptāsyaṃ dīptamūrdhajam | prahasanpuruṣavyāghraḥ pratijagrāha sūtajaḥ
दहकते मुख और दहकते केशों वाले, क्रोध से भरे हुए उसे आता देख पुरुषव्याघ्र सूतपुत्र ने हँसते हुए उसका सामना किया।
श्लोक 69 (7.174.69)
तयोः समभवद्युद्धं कर्णराक्षसयोर्निशि । गर्जतो राजशार्दूल शक्रप्रह्लादयोरिव ॥
tayoḥ samabhavadyuddhaṃ karṇarākṣasayorniśi | garjato rājaśārdūla śakraprahlādayoriva
हे राजशार्दूल, तब रात में कर्ण और राक्षस के बीच गर्जना करते हुए ऐसा युद्ध हुआ, जैसा शक्र और प्रह्लाद के बीच हुआ था।