द्रोण पर्व · अध्याय 175
घटोत्कच द्वारा अलम्बल का वध
घटोत्कच को कर्ण पर टूटते देखकर दुर्योधन दुःशासन से कर्ण की रक्षा करने को कहता है। मारे गए राक्षस जटासुर का पुत्र अलम्बल पिता का बदला लेने की अनुमति माँगता है और घटोत्कच से लड़ने भेजा जाता है। घूँसों और मायाओं के घोर युद्ध के बाद घटोत्कच उसे भूमि पर पटककर उसका सिर काट देता है, उसे दुर्योधन के रथ में फेंककर चेतावनी देता है कि कर्ण का भी यही अन्त होगा, और कर्ण पर टूट पड़ता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.175.1)
दृष्ट्वा घटोत्कचं राजन्सूतपुत्ररथं प्रति । आयान्तं तु तथायुक्तं जिघांसुं कर्णमाहवे । अब्रवीत्तत्र पुत्रस्ते दुःशासनमिदं वचः ॥
dṛṣṭvā ghaṭotkacaṃ rājansūtaputrarathaṃ prati | āyāntaṃ tu tathāyuktaṃ jighāṃsuṃ karṇamāhave | abravīttatra putraste duḥśāsanamidaṃ vacaḥ
हे राजन्, घटोत्कच को सूतपुत्र के रथ की ओर इस प्रकार सज्जित होकर, युद्ध में कर्ण को मारने की इच्छा से आते देखकर आपके पुत्र दुर्योधन ने दुःशासन से यह वचन कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (7.175.2)
एतद्रक्षो रणे तूर्णं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् । अभियाति द्रुतं कर्णं तद्वारय महारथम् ॥
etadrakṣo raṇe tūrṇaṃ dṛṣṭvā karṇasya vikramam | abhiyāti drutaṃ karṇaṃ tadvāraya mahāratham
यह राक्षस रण में कर्ण का पराक्रम देखकर शीघ्रता से कर्ण पर चढ़ा आ रहा है। उस महारथी को रोको।
श्लोक 3 (7.175.3)
वृतः सैन्येन महता याहि यत्र महाबलः । कर्णो वैकर्तनो युद्धे राक्षसेन युयुत्सति ॥
vṛtaḥ sainyena mahatā yāhi yatra mahābalaḥ | karṇo vaikartano yuddhe rākṣasena yuyutsati
बड़ी सेना से घिरकर वहाँ जाओ, जहाँ महाबली कर्ण युद्ध में उस राक्षस से लड़ना चाहता है।
श्लोक 4 (7.175.4)
रक्ष कर्णं रणे यत्तो वृतः सैन्येन मानद । मा कर्णं राक्षसो घोरः प्रमादान्नाशयिष्यति ॥
rakṣa karṇaṃ raṇe yatto vṛtaḥ sainyena mānada | mā karṇaṃ rākṣaso ghoraḥ pramādānnāśayiṣyati
हे मानद, सेना से घिरे रहकर सावधानी से रण में कर्ण की रक्षा करो, ताकि वह भयंकर राक्षस असावधानी के कारण कर्ण का नाश न कर दे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (7.175.5)
एतस्मिन्नन्तरे राजञ्जटासुरसुतो बली । दुर्योधनमुपागम्य प्राह प्रहरतां वरः ॥
etasminnantare rājañjaṭāsurasuto balī | duryodhanamupāgamya prāha praharatāṃ varaḥ
इसी बीच, हे राजन्, प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ, जटासुर का बलवान् पुत्र दुर्योधन के पास आकर बोला।
अलम्बल उवाच
श्लोक 6 (7.175.6)
दुर्योधन तवामित्रान्प्रख्यातान्युद्धदुर्मदान् । पाण्डवान्हन्तुमिच्छामि त्वयाऽऽज्ञप्तः सहानुगान् ॥
duryodhana tavāmitrānprakhyātānyuddhadurmadān | pāṇḍavānhantumicchāmi tvayā''jñaptaḥ sahānugān
हे दुर्योधन, आपकी आज्ञा पाकर मैं आपके उन शत्रुओं को, युद्ध में मदोन्मत्त और विख्यात पाण्डवों को, उनके अनुचरों सहित मारना चाहता हूँ।
श्लोक 7 (7.175.7)
जटासुरो मम पिता रक्षसां ग्रामणीः पुरा । प्रयुज्य कर्म रक्षोघ्नं क्षुद्रैः पार्थैर्निपातितः ॥
jaṭāsuro mama pitā rakṣasāṃ grāmaṇīḥ purā | prayujya karma rakṣoghnaṃ kṣudraiḥ pārthairnipātitaḥ
मेरे पिता जटासुर पहले राक्षसों के अग्रणी थे। राक्षसों का नाश करने वाले कर्म का सहारा लेकर क्षुद्र पार्थों ने उन्हें मार गिराया।
श्लोक 8 (7.175.8)
तस्यापचितिमिच्छामि शत्रुशोणितपूजया । शत्रुमांसैश्च राजेन्द्र मामनुज्ञातुमर्हसि ॥
tasyāpacitimicchāmi śatruśoṇitapūjayā | śatrumāṃsaiśca rājendra māmanujñātumarhasi
हे राजेन्द्र, मैं शत्रुओं के रक्त और शत्रुओं के मांस से पूजा करके उनका बदला चुकाना चाहता हूँ। आप मुझे अनुमति देने योग्य हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.175.9)
तमब्रवीत्ततो राजा प्रीयमाणः पुनःपुनः । द्रोणकर्णादिभिः सार्धं पर्याप्तोऽहं द्विषद्वधे ॥
tamabravīttato rājā prīyamāṇaḥ punaḥpunaḥ | droṇakarṇādibhiḥ sārdhaṃ paryāpto'haṃ dviṣadvadhe
तब राजा ने बार-बार प्रसन्न होकर उससे कहा, "द्रोण, कर्ण आदि के साथ मैं ही शत्रुओं के वध के लिए पर्याप्त हूँ।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 10 (7.175.10)
त्वं तु गच्छ मयाऽऽज्ञप्तो जहि युद्धे घटोत्कचम् । राक्षसं क्रूरकर्माणं रक्षोमानुषसम्भवम् ॥
tvaṃ tu gaccha mayā''jñapto jahi yuddhe ghaṭotkacam | rākṣasaṃ krūrakarmāṇaṃ rakṣomānuṣasambhavam
तुम तो मेरी आज्ञा से जाओ और युद्ध में घटोत्कच को मारो, उस क्रूरकर्मा राक्षस को जो राक्षस और मनुष्य से उत्पन्न हुआ है,
श्लोक 11 (7.175.11)
पाण्डवानां हितं नित्यं हस्त्यश्वरथघातिनम् । वैहायसगतं युद्धे प्रेषयेर्यमसादनम् ॥
pāṇḍavānāṃ hitaṃ nityaṃ hastyaśvarathaghātinam | vaihāyasagataṃ yuddhe preṣayeryamasādanam
जो सदा पाण्डवों का हित करता है, हाथी, घोड़े और रथों का संहार करता है और आकाश में विचरता है, उसे युद्ध में यमलोक भेज दो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (7.175.12)
तथेत्युक्त्वा महाकायः समाहूय घटोत्कचम् । जाटासुरिर्भैमसेनिं नानाशस्त्रैरवाकिरत् ॥
tathetyuktvā mahākāyaḥ samāhūya ghaṭotkacam | jāṭāsurirbhaimaseniṃ nānāśastrairavākirat
"ऐसा ही हो", यह कहकर विशालकाय जटासुर-पुत्र ने भीमसेन के पुत्र घटोत्कच को ललकारा और उस पर नाना प्रकार के शस्त्रों की वर्षा की।
श्लोक 13 (7.175.13)
अलम्बलं च कर्णं च कुरुसैन्यं च दुस्तरम् । हैडिम्बिः प्रममाथैको महाबातोऽम्बुदानिव ॥
alambalaṃ ca karṇaṃ ca kurusainyaṃ ca dustaram | haiḍimbiḥ pramamāthaiko mahābāto'mbudāniva
हिडिम्बा के पुत्र ने अकेले ही अलम्बल को, कर्ण को और दुस्तर कुरुसेना को वैसे ही तितर-बितर कर दिया, जैसे प्रचण्ड वायु बादलों को।
श्लोक 14 (7.175.14)
ततो मायाबलं दृष्ट्वा रक्षस्तूर्णमलम्बलः । घटोत्कचं शरव्रातैर्नानालिङ्गैः समार्पयत् ॥
tato māyābalaṃ dṛṣṭvā rakṣastūrṇamalambalaḥ | ghaṭotkacaṃ śaravrātairnānāliṅgaiḥ samārpayat
तब उसकी माया का बल देखकर राक्षस अलम्बल ने शीघ्र ही नाना प्रकार के चिह्नों वाले बाणों की बौछार से घटोत्कच को बींध डाला।
श्लोक 15 (7.175.15)
विद्ध्वा च बहुभिर्बाणैर्भैमसेनिं महाबलः । व्यद्रावयच्छरव्रातैः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
viddhvā ca bahubhirbāṇairbhaimaseniṃ mahābalaḥ | vyadrāvayaccharavrātaiḥ pāṇḍavānāmanīkinīm
उस बलवान् ने भीमसेन के पुत्र को बहुत-से बाणों से बींधकर बाणों की वर्षा से पाण्डवों की सेना को भगा दिया।
श्लोक 16 (7.175.16)
तेन विद्राव्यमाणानि पाण्डुसैन्यानि भारत । निशीथे विप्रकीर्यन्ते वातनुन्ना घना इव ॥
tena vidrāvyamāṇāni pāṇḍusainyāni bhārata | niśīthe viprakīryante vātanunnā ghanā iva
हे भारत, उसके द्वारा खदेड़ी जाती हुई पाण्डवों की सेनाएँ रात में वैसे ही बिखर गईं, जैसे हवा से उड़ाए गए बादल।
श्लोक 17 (7.175.17)
घटोत्कचशरैर्नुन्ना तथैव तव वाहिनी । निशीथे प्राद्रवद्राजन्नुत्सृज्योल्काः सहस्रशः ॥
ghaṭotkacaśarairnunnā tathaiva tava vāhinī | niśīthe prādravadrājannutsṛjyolkāḥ sahasraśaḥ
उसी प्रकार घटोत्कच के बाणों से खदेड़ी गई आपकी सेना भी, हे राजन्, हज़ारों मशालें फेंककर रात में भाग खड़ी हुई।
श्लोक 18 (7.175.18)
अलम्बलस्ततः क्रुद्धो भैमसेनिं महामृधे । आजघ्ने दशभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥
alambalastataḥ kruddho bhaimaseniṃ mahāmṛdhe | ājaghne daśabhirbāṇaistotrairiva mahādvipam
तब अलम्बल ने क्रुद्ध होकर उस महायुद्ध में भीमसेन के पुत्र को दस बाणों से वैसे ही बींधा, जैसे अंकुशों से किसी विशाल हाथी को बींधा जाता है।
श्लोक 19 (7.175.19)
तिलशस्तस्य संवाहं सूतं सर्वायुधानि च । घटोत्कचः प्रचिच्छेद प्रणदंश्चातिदारुणम् ॥
tilaśastasya saṃvāhaṃ sūtaṃ sarvāyudhāni ca | ghaṭotkacaḥ praciccheda praṇadaṃścātidāruṇam
घटोत्कच ने अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए उसके वाहन को, सारथी को और सारे शस्त्रों को तिल-तिल करके काट डाला।
श्लोक 20 (7.175.20)
ततः कर्णं शरव्रातैः कुरूनन्यान्सहस्रशः । अलम्बलं चाभ्यवर्षन्मेघो मेरुमिवाचलम् ॥
tataḥ karṇaṃ śaravrātaiḥ kurūnanyānsahasraśaḥ | alambalaṃ cābhyavarṣanmegho merumivācalam
फिर उसने कर्ण पर, हज़ारों अन्य कौरवों पर और अलम्बल पर बाणों की वैसी ही वर्षा की, जैसे मेघ मेरु पर्वत पर करता है।
श्लोक 21 (7.175.21)
ततः सञ्चुक्षुभे सैन्यं कुरूणां राक्षसार्दितम् । उपर्युपरि चान्योन्यं चतुरङ्गं ममर्द ह ॥
tataḥ sañcukṣubhe sainyaṃ kurūṇāṃ rākṣasārditam | uparyupari cānyonyaṃ caturaṅgaṃ mamarda ha
तब राक्षस से पीड़ित कौरवों की सेना क्षुब्ध हो उठी और चतुरंगिणी सेना एक-दूसरे पर चढ़ती हुई आपस में ही कुचलने लगी।
श्लोक 22 (7.175.22)
जाटासुरिर्महाराज विरथो हतसारथिः । घटोत्कचं रणे क्रुद्धो मुष्टिनाऽभ्यहनद्दृढम् ॥
jāṭāsurirmahārāja viratho hatasārathiḥ | ghaṭotkacaṃ raṇe kruddho muṣṭinā'bhyahanaddṛḍham
हे महाराज, रथहीन और सारथी के मारे जाने पर जटासुर-पुत्र ने क्रोध में रण में घटोत्कच को घूँसे से कसकर मारा।
श्लोक 23 (7.175.23)
मुष्टिनाऽभ्याहतस्तेन प्रचचाल घटोत्कचः । क्षितिकम्पे यथा शैलः सवृक्षस्तृणगुल्मवान् ॥
muṣṭinā'bhyāhatastena pracacāla ghaṭotkacaḥ | kṣitikampe yathā śailaḥ savṛkṣastṛṇagulmavān
उसके घूँसे की चोट से घटोत्कच काँप उठा, जैसे भूकम्प में वृक्ष, तृण और झाड़ियों सहित पर्वत हिल उठता है।
श्लोक 24 (7.175.24)
ततः स परिघाभेन द्विट्सङ्घघ्नेन बाहुना । जाटासुरिं भैमसेनिरवधीन्मुष्टिना भृशम् ॥
tataḥ sa parighābhena dviṭsaṅghaghnena bāhunā | jāṭāsuriṃ bhaimaseniravadhīnmuṣṭinā bhṛśam
तब भीमसेन के पुत्र ने लोहे की गदा के समान, शत्रुसमूहों का संहार करने वाली अपनी भुजा से जटासुर-पुत्र को घूँसे से ज़ोर से मारा।
श्लोक 25 (7.175.25)
तं प्रमथ्य ततः क्रुद्धस्तूर्णं हैडिम्बिराक्षिपत् । दोर्भ्यामिन्द्रध्वजाभाभ्यां निष्पिपेष च भूतले ॥
taṃ pramathya tataḥ kruddhastūrṇaṃ haiḍimbirākṣipat | dorbhyāmindradhvajābhābhyāṃ niṣpipeṣa ca bhūtale
उसे मथकर क्रुद्ध हिडिम्बा-पुत्र ने तुरंत उसे उछाल फेंका और इन्द्रध्वज के समान अपनी दोनों भुजाओं से उसे भूमि पर पीस डाला।
श्लोक 26 (7.175.26)
जाटासुरिर्मोक्षयित्वा आत्मानं च घटोत्कचात् । पुनरुत्थाय वेगेन घटोत्कचमुपाद्रावत् ॥
jāṭāsurirmokṣayitvā ātmānaṃ ca ghaṭotkacāt | punarutthāya vegena ghaṭotkacamupādrāvat
जटासुर-पुत्र घटोत्कच से अपने को छुड़ाकर फिर वेग से उठा और घटोत्कच पर टूट पड़ा।
श्लोक 27 (7.175.27)
अलम्बलोऽपि विक्षिप्य समुत्क्षिप्य च राक्षसम् । घटोत्कचं रणे रोषान्निष्पिपेष च भूतले ॥
alambalo'pi vikṣipya samutkṣipya ca rākṣasam | ghaṭotkacaṃ raṇe roṣānniṣpipeṣa ca bhūtale
अलम्बल ने भी उस राक्षस को उछालकर और ऊपर उठाकर रोष में रण में घटोत्कच को भूमि पर पीस डाला।
श्लोक 28 (7.175.28)
तयोः समभवद्युद्धं गर्जतोरतिकाययोः । घटोत्कचालम्बलयोस्तुमुलं रोमहर्षणम् ॥
tayoḥ samabhavadyuddhaṃ garjatoratikāyayoḥ | ghaṭotkacālambalayostumulaṃ romaharṣaṇam
तब गरजते हुए उन दोनों विशालकाय योद्धाओं, घटोत्कच और अलम्बल, के बीच तुमुल और रोमांचकारी युद्ध हुआ।
श्लोक 29 (7.175.29)
विशेषयन्तावन्योन्यं मायाभिरतिमायिनौ । युयुधाते महावीर्याविन्द्रवैरोचनाविव ॥
viśeṣayantāvanyonyaṃ māyābhiratimāyinau | yuyudhāte mahāvīryāvindravairocanāviva
माया से एक-दूसरे को मात देने का यत्न करते हुए, वे दोनों महापराक्रमी और अत्यन्त मायावी इन्द्र और विरोचन-पुत्र (बलि) के समान लड़े।
श्लोक 30 (7.175.30)
पावकाम्बुनिधी भूत्वा पुनर्गरुडतक्षकौ । पुनर्मेघमहावातौ पुनर्वज्रमहाचलौ ॥
pāvakāmbunidhī bhūtvā punargaruḍatakṣakau | punarmeghamahāvātau punarvajramahācalau
वे अग्नि और समुद्र बने, फिर गरुड़ और तक्षक, फिर मेघ और प्रचण्ड वायु, फिर वज्र और महान् पर्वत,
श्लोक 31 (7.175.31)
पुनः कुञ्जरशार्दूलौ पुनः स्वर्भानुभास्करौ । एवं मायाशतसृजावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ । भृशं चित्रमयुध्येतामलम्बलघटोत्कचौ ॥
punaḥ kuñjaraśārdūlau punaḥ svarbhānubhāskarau | evaṃ māyāśatasṛjāvanyonyavadhakāṅkṣiṇau | bhṛśaṃ citramayudhyetāmalambalaghaṭotkacau
फिर हाथी और बाघ, फिर राहु (स्वर्भानु) और सूर्य बने। इस प्रकार सैकड़ों मायाएँ रचते हुए, एक-दूसरे के वध की इच्छा करते हुए, अलम्बल और घटोत्कच ने अद्भुत ढंग से भीषण युद्ध किया।
श्लोक 32 (7.175.32)
परिघैश्च गदाभिश्च प्रासमुद्गरपट्टसैः । मुसलैः पर्वताग्रैश्च तावन्योन्यं विजघ्नतुः ॥
parighaiśca gadābhiśca prāsamudgarapaṭṭasaiḥ | musalaiḥ parvatāgraiśca tāvanyonyaṃ vijaghnatuḥ
परिघों और गदाओं से, प्रासों, मुद्गरों और पट्टिशों से, मूसलों और पर्वत-शिखरों से उन दोनों ने एक-दूसरे पर प्रहार किया।
श्लोक 33 (7.175.33)
हयाभ्यां च गजाभ्यां च रथाभ्यां च पदातिभिः । युयुधाते महामायौ राक्षसप्रवरौ युधि ॥
hayābhyāṃ ca gajābhyāṃ ca rathābhyāṃ ca padātibhiḥ | yuyudhāte mahāmāyau rākṣasapravarau yudhi
दो घोड़ों, दो हाथियों, दो रथों और पैदल सैनिकों के साथ वे दोनों महामायावी राक्षस-श्रेष्ठ युद्ध में लड़े।
श्लोक 34 (7.175.34)
ततो घटोत्कचो राजन्नलम्बलवधेप्सया । उत्पपात भृशं क्रुद्धः श्येनवन्निपपात च ॥
tato ghaṭotkaco rājannalambalavadhepsayā | utpapāta bhṛśaṃ kruddhaḥ śyenavannipapāta ca
तब हे राजन्, घटोत्कच अलम्बल को मारने की इच्छा से अत्यन्त क्रुद्ध होकर ऊपर उछला और बाज़ की तरह नीचे झपटा।
श्लोक 35 (7.175.35)
गृहीत्वा च महाकायं राक्षसेन्द्रमलम्बलम् । उद्यम्य न्यवधीद्भूमौ मयं विष्णुरिवाहवे ॥
gṛhītvā ca mahākāyaṃ rākṣasendramalambalam | udyamya nyavadhīdbhūmau mayaṃ viṣṇurivāhave
उसने विशालकाय राक्षसराज अलम्बल को पकड़कर, उठाकर युद्ध में भूमि पर पटक दिया, जैसे विष्णु ने मय को पटका था।
श्लोक 36 (7.175.36)
ततो घटोत्कचः खड्गमुद्गृह्याद्भुतदर्शनम् । रौद्रस्य कायाद्धि शिरो भीमं विकृतदर्शनम् ॥
tato ghaṭotkacaḥ khaḍgamudgṛhyādbhutadarśanam | raudrasya kāyāddhi śiro bhīmaṃ vikṛtadarśanam
तब घटोत्कच ने अद्भुत दिखने वाली तलवार उठाई, और उस भयंकर राक्षस के शरीर से उसका विकराल रूप वाला भयानक सिर—
श्लोक 37 (7.175.37)
स्फुरतस्तस्य समरे नदतश्चातिभैरवम् । निचकर्त महाराज शत्रोरमितविक्रमः ॥
sphuratastasya samare nadataścātibhairavam | nicakarta mahārāja śatroramitavikramaḥ
हे महाराज, अमित पराक्रमी घटोत्कच ने शत्रु के उस तड़पते और अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए सिर को काट डाला।
श्लोक 38 (7.175.38)
शिरस्तच्चापि सङ्गृह्य केशेषु रुधिरोक्षितम् । ययौ घटोत्कचस्तूर्णं दुर्योधनरथं प्रति ॥
śirastaccāpi saṅgṛhya keśeṣu rudhirokṣitam | yayau ghaṭotkacastūrṇaṃ duryodhanarathaṃ prati
रक्त से भीगे उस सिर को भी केशों से पकड़कर घटोत्कच तुरंत दुर्योधन के रथ की ओर चल पड़ा।
श्लोक 39 (7.175.39)
द्रोणकर्णकृपान्योधानतीत्य सुमहाबलः । अभ्येत्य च महाबाहुः स्मयमानः स राक्षसः ॥
droṇakarṇakṛpānyodhānatītya sumahābalaḥ | abhyetya ca mahābāhuḥ smayamānaḥ sa rākṣasaḥ
द्रोण, कर्ण और कृप जैसे योद्धाओं को लाँघकर वह महाबली, महाबाहु राक्षस मुस्कराता हुआ वहाँ पहुँचा,
श्लोक 40 (7.175.40)
शिरो रथेऽस्य निक्षिप्य विकृताननमूर्धजम् । प्राणदद्भैरवं नादं प्रावृषीव वलाहकः ॥
śiro rathe'sya nikṣipya vikṛtānanamūrdhajam | prāṇadadbhairavaṃ nādaṃ prāvṛṣīva valāhakaḥ
और विकृत मुख तथा केशों वाले उस सिर को दुर्योधन के रथ में फेंककर उसने वर्षा-ऋतु के मेघ के समान भयंकर गर्जना की।
श्लोक 41 (7.175.41)
अब्रवीच्च ततो राजन्दुर्योधनमिदं वचः ॥
abravīcca tato rājanduryodhanamidaṃ vacaḥ
और फिर, हे राजन्, उसने दुर्योधन से यह वचन कहा—
घटोत्कच उवाच
श्लोक 42 (7.175.42)
एष ते निहतो बन्धुस्त्वया दृष्टोऽस्य विक्रमः । पुनर्द्रष्टासि कर्णस्य निष्ठामेतां तथाऽऽत्मनः ॥
eṣa te nihato bandhustvayā dṛṣṭo'sya vikramaḥ | punardraṣṭāsi karṇasya niṣṭhāmetāṃ tathā''tmanaḥ
"यह तुम्हारा बन्धु मारा गया; तुमने इसका पराक्रम देख लिया। कर्ण का और अपना भी ऐसा ही अन्त तुम फिर देखोगे।
श्लोक 43 (7.175.43)
स्वधर्ममर्थं कामं च त्रितयं योऽभिवाञ्छति । रिक्तपाणिर्न पश्येत राजानं ब्राह्मणं स्त्रियम् । तिष्ठस्व तावत्सुप्रीतो यावत्कर्णं वधाम्यहम् ॥
svadharmamarthaṃ kāmaṃ ca tritayaṃ yo'bhivāñchati | riktapāṇirna paśyeta rājānaṃ brāhmaṇaṃ striyam | tiṣṭhasva tāvatsuprīto yāvatkarṇaṃ vadhāmyaham
जो अपने धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों को चाहता है, उसे राजा, ब्राह्मण और स्त्री के सामने खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। इसलिए जब तक मैं कर्ण का वध करता हूँ, तब तक तुम प्रसन्न होकर ठहरो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (7.175.44)
एवमुक्त्वा ततः प्रायात्कर्णं प्रति नरेश्वरः । किरञ्छरगणांस्तीक्ष्णान्रुषितो रणमूर्धनि ॥
evamuktvā tataḥ prāyātkarṇaṃ prati nareśvaraḥ | kirañcharagaṇāṃstīkṣṇānruṣito raṇamūrdhani
ऐसा कहकर वह वीर रोष से भरा हुआ, रण के अग्रभाग में तीखे बाणों की झड़ी लगाता हुआ कर्ण की ओर चल पड़ा।
श्लोक 45 (7.175.45)
ततः समभवद्युद्धं घोररूपं भयानकम् । विस्मापनं महाराज नरराक्षसयोर्मृधे ॥
tataḥ samabhavadyuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayānakam | vismāpanaṃ mahārāja nararākṣasayormṛdhe
तब, हे महाराज, उस रण में नर और राक्षस के बीच भयानक रूप वाला, विस्मयकारी घोर युद्ध हुआ।