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द्रोण पर्व · अध्याय 176

कर्ण और घटोत्कच: माया का युद्ध

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि आधी रात को कर्ण और राक्षस घटोत्कच का युद्ध कैसे हुआ, और सञ्जय उस राक्षस के रूप, उसके रथ, घोड़ों, सारथि, ध्वज और धनुष का वर्णन करते हैं। दोनों बाणों से द्वन्द्व करते हैं; जब कर्ण बराबर का निकलता है तब घटोत्कच राक्षसों की सेना और पत्थरों की वर्षा रचता है, चक्र और गदा फेंकता है और पर्वत, मेघ तथा अनेक रूप धरकर माया से लड़ता है। कर्ण हर माया को नष्ट करता जाता है, यहाँ तक कि रुद्र की बनाई लोहे की अशनि को पकड़कर लौटा देता है, और अन्त में घटोत्कच की मायाएँ टूट जाती हैं तथा वह कर्ण की मृत्यु का संकल्प कहकर अदृश्य हो जाता है।

अध्याय 175अध्याय-सूचीअध्याय 177

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.176.1)

यत्तद्वैकर्तनः कर्णो राक्षसश्च घटोत्कचः । निशीथे समसज्जेतां तद्युद्धमभवत्कथम् ॥

yattadvaikartanaḥ karṇo rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | niśīthe samasajjetāṃ tadyuddhamabhavatkatham

विकर्तन-पुत्र कर्ण और राक्षस घटोत्कच आधी रात को जिस युद्ध में एक-दूसरे के सामने आ डटे, वह युद्ध कैसे हुआ?

श्लोक 2 (7.176.2)

कीदृशं चाभवद्रूपं तस्य घोरस्य रक्षसः । येन वैकर्तनः कर्णः सङ्ग्रामे तेन निर्जितः ॥

kīdṛśaṃ cābhavadrūpaṃ tasya ghorasya rakṣasaḥ | yena vaikartanaḥ karṇaḥ saṅgrāme tena nirjitaḥ

उस भयंकर राक्षस का रूप कैसा था, जिसके द्वारा विकर्तन-पुत्र कर्ण युद्ध में पराजित हुआ?

श्लोक 3 (7.176.3)

रथश्च कीदृशस्तस्य मायाः सर्वायुधानि च । किम्प्रमाणा हयास्तस्य रथकेतुर्धनुस्तथा ॥

rathaśca kīdṛśastasya māyāḥ sarvāyudhāni ca | kimpramāṇā hayāstasya rathaketurdhanustathā

उसका रथ कैसा था, उसकी मायाएँ और सारे अस्त्र-शस्त्र कैसे थे? उसके घोड़ों का आकार कितना था, और उसकी रथ-ध्वजा तथा उसका धनुष कैसा था?

श्लोक 4 (7.176.4)

कीदृशं वर्म चैवास्य शिरस्त्राणं च कीदृशम् । पृष्टस्त्वमेतदाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥

kīdṛśaṃ varma caivāsya śirastrāṇaṃ ca kīdṛśam | pṛṣṭastvametadācakṣva kuśalo hyasi sañjaya

उसका कवच कैसा था और उसका शिरस्त्राण कैसा? सञ्जय, मेरे पूछने पर यह सब बताओ, क्योंकि तुम कुशल हो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (7.176.5)

लोहिताक्षो महाकायस्ताम्रास्यो निम्नितोदरः । ऊर्ध्वरोमा हरिश्मश्रुः शङ्कुकर्णो महाहनुः ॥

lohitākṣo mahākāyastāmrāsyo nimnitodaraḥ | ūrdhvaromā hariśmaśruḥ śaṅkukarṇo mahāhanuḥ

उसकी आँखें लाल थीं, शरीर विशाल था, मुख ताँबे के रंग का था और पेट धँसा हुआ था; उसके बाल ऊपर को खड़े थे, दाढ़ी हरी-पीली थी, कान खूँटियों जैसे थे और जबड़ा बहुत बड़ा था।

श्लोक 6 (7.176.6)

आकर्णदारितास्यश्च तीक्ष्णदंष्ट्रः करालवान् । सुदीर्घताम्रजिह्वोष्ठो लम्बभ्रूः स्थूलनासिकः ॥

ākarṇadāritāsyaśca tīkṣṇadaṃṣṭraḥ karālavān | sudīrghatāmrajihvoṣṭho lambabhrūḥ sthūlanāsikaḥ

उसका मुँह कानों तक फटा हुआ था, दाढ़ें तीखी थीं और बाहर निकले दाँत भयानक थे; उसकी जीभ और होंठ बहुत लंबे और ताँबे के रंग के थे, भौंहें लटकी हुई थीं और नाक मोटी थी।

श्लोक 7 (7.176.7)

नीलाङ्गो लोहितग्रीवो गिरिवर्ष्मा भयङ्करः । महाकायो महाबाहुर्महाशीर्षो महाबलः ॥

nīlāṅgo lohitagrīvo girivarṣmā bhayaṅkaraḥ | mahākāyo mahābāhurmahāśīrṣo mahābalaḥ

उसके अंग नीले-काले थे और गला लाल था; वह पर्वत-सा डील-डौल वाला और भयंकर था, उसका शरीर विशाल था, भुजाएँ लंबी थीं, सिर बड़ा था और बल अपार था।

श्लोक 8 (7.176.8)

विकृतः परुषस्पर्शो विकचोद्वृद्धपिण्डकः । स्थूलस्फिग्गूढनाभिश्च शिथिलोपचयो महान् ॥

vikṛtaḥ paruṣasparśo vikacodvṛddhapiṇḍakaḥ | sthūlasphiggūḍhanābhiśca śithilopacayo mahān

वह विकृत आकार का था और उसका स्पर्श कठोर था; उसका सिर खुला और अंग फूले हुए थे, नितंब भारी थे, नाभि छिपी हुई थी, माँस ढीला था और वह बहुत विशाल था।

श्लोक 9 (7.176.9)

तथैव हस्ताभरणी महामायोऽङ्गदी तथा । उरसाऽधारयन्निष्कमग्निमालां यथाऽचलः ॥

tathaiva hastābharaṇī mahāmāyo'ṅgadī tathā | urasā'dhārayanniṣkamagnimālāṃ yathā'calaḥ

वह हाथों में कंगन और बाँहों में बाजूबंद पहने हुए था और बड़ा मायावी था; अपनी छाती पर उसने सोने का निष्क धारण किया था, मानो पर्वत पर आग की माला लिपटी हो।

श्लोक 10 (7.176.10)

तस्य हेममयं चित्रं बहुरूपाङ्गशोभितम् । तोरणप्रतिमं शुभ्रं किरीटं मूर्ध्न्यशोभत ॥

tasya hemamayaṃ citraṃ bahurūpāṅgaśobhitam | toraṇapratimaṃ śubhraṃ kirīṭaṃ mūrdhnyaśobhata

उसके मस्तक पर सोने का एक चमकीला उज्ज्वल मुकुट शोभित था, जिसके अंगों पर अनेक रूप गढ़े हुए थे और जो तोरण जैसा दिखता था।

श्लोक 11 (7.176.11)

कुण्डले बालसूर्याभे मालां हेममयीं शुभाम् । धारयन्विपुलं कांस्यं कवचं च महाप्रभम् । ताराजालनिभं राजन्पूर्णचन्द्रसमप्रभम् ॥

kuṇḍale bālasūryābhe mālāṃ hemamayīṃ śubhām | dhārayanvipulaṃ kāṃsyaṃ kavacaṃ ca mahāprabham | tārājālanibhaṃ rājanpūrṇacandrasamaprabham

उसने बाल सूर्य के समान दीप्तिमान कुण्डल, सोने की सुन्दर माला और काँसे का विशाल तथा अत्यन्त प्रभायुक्त कवच पहन रखा था, राजन्, जो तारों के जाल जैसा और पूर्ण चन्द्रमा जैसा चमकता था।

श्लोक 12 (7.176.12)

कण्ठसूत्रं महच्चापि तपनीयमधारयत् । स तेन विभ्राजत वै सविद्युदिव तोयदः ॥

kaṇṭhasūtraṃ mahaccāpi tapanīyamadhārayat | sa tena vibhrājata vai savidyudiva toyadaḥ

उसने सोने का एक बड़ा कण्ठहार भी पहन रखा था, जिससे वह बिजली से भरे बादल की भाँति दमक रहा था।

श्लोक 13 (7.176.13)

किङ्किणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम् । ऋक्षचर्मावनद्धाङ्गं नल्वमात्रं महारथम् ॥

kiṅkiṇīśatanirghoṣaṃ raktadhvajapatākinam | ṛkṣacarmāvanaddhāṅgaṃ nalvamātraṃ mahāratham

वह एक विशाल रथ पर सवार था, जिसमें सैकड़ों घंटियों का नाद होता था, जिस पर लाल ध्वजाएँ और पताकाएँ फहरती थीं, जिसके अंग रीछ की खाल से मढ़े थे और जिसका विस्तार चार सौ हाथ का था।

श्लोक 14 (7.176.14)

सर्वायुधवरोपेतमास्थितं ध्वजमालिनम् । अष्टचक्रसमायुक्तं मेघगम्भीरनिःस्वनम् ॥

sarvāyudhavaropetamāsthitaṃ dhvajamālinam | aṣṭacakrasamāyuktaṃ meghagambhīraniḥsvanam

वह रथ सब प्रकार के श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित था, ध्वजाओं की मालाओं से सजा था, आठ पहियों वाला था और बादल के समान गम्भीर घोष करता था।

श्लोक 15 (7.176.15)

मत्तमातङ्गसङ्काशा लोहिताक्षा विभीषणाः । कालवर्णासमायुक्ता बलवन्तः शतं हयाः ॥

mattamātaṅgasaṅkāśā lohitākṣā vibhīṣaṇāḥ | kālavarṇāsamāyuktā balavantaḥ śataṃ hayāḥ

उसे सौ घोड़े खींचते थे, जो बलवान, मतवाले हाथियों जैसे, लाल आँखों वाले, भयंकर और काले रंग के थे तथा जुते हुए थे।

श्लोक 16 (7.176.16)

वहन्तो राक्षसं घोरं वालवन्तो जितश्रमाः । विपुलाभिः सटाभिस्ते हेषमाणा मुहुर्मुहुः ॥

vahanto rākṣasaṃ ghoraṃ vālavanto jitaśramāḥ | vipulābhiḥ saṭābhiste heṣamāṇā muhurmuhuḥ

वे लंबी पूँछ और घनी अयालों वाले, थकान को जीते हुए घोड़े उस भयंकर राक्षस को ढोते हुए बार-बार हिनहिना रहे थे।

श्लोक 17 (7.176.17)

मुखैर्नानाविधाकारैर्वेगवन्तो हयोत्तमाः । रथेऽस्य युक्ता गर्जन्तोऽवहंस्ते राक्षसाधिपम् ॥

mukhairnānāvidhākārairvegavanto hayottamāḥ | rathe'sya yuktā garjanto'vahaṃste rākṣasādhipam

नाना आकृतियों के मुखों वाले, वेगवान वे उत्तम घोड़े उसके रथ में जुतकर गरजते हुए राक्षसराज को ले जा रहे थे।

श्लोक 18 (7.176.18)

राक्षसोऽस्य विरूपाक्षः सूतो दीप्तास्यकुण्डलः । घोररूपो महाकायः करालो विकृताननः । रश्मिभिः सूर्यरश्म्याह्वैः सञ्जग्राह हयान्रणे ॥

rākṣaso'sya virūpākṣaḥ sūto dīptāsyakuṇḍalaḥ | ghorarūpo mahākāyaḥ karālo vikṛtānanaḥ | raśmibhiḥ sūryaraśmyāhvaiḥ sañjagrāha hayānraṇe

उसका सारथि विरूपाक्ष नाम का एक राक्षस था, जिसका मुख दहकता था और कानों में कुण्डल थे; वह भयानक रूप, विशाल शरीर और विकृत मुख वाला था। सूर्य की किरणों जैसी चमकती लगामों से उसने युद्ध में घोड़ों को थाम रखा था।

श्लोक 19 (7.176.19)

स तेन सहितस्तस्थावरुणेन यथा रविः । संसक्त इव चाभ्रेण यथाऽद्रिर्महता महान् ॥

sa tena sahitastasthāvaruṇena yathā raviḥ | saṃsakta iva cābhreṇa yathā'drirmahatā mahān

उसके साथ वह ऐसे खड़ा था जैसे अरुण के साथ सूर्य, अथवा जैसे किसी विशाल बादल से घिरा कोई विशाल पर्वत।

श्लोक 20 (7.176.20)

दिवस्पृक्सुमहान्केतुः स्यन्दनेऽस्य समुच्छ्रितः । रक्तोत्तमाङ्गः क्रव्यादो गृध्रः परमभीषणः ॥

divaspṛksumahānketuḥ syandane'sya samucchritaḥ | raktottamāṅgaḥ kravyādo gṛdhraḥ paramabhīṣaṇaḥ

उसके रथ पर आकाश को छूती एक बहुत ऊँची ध्वजा खड़ी थी, जिस पर लाल सिर वाला, माँस खाने वाला, अत्यन्त भयंकर गिद्ध बना था।

श्लोक 21 (7.176.21)

वासवाशनिनिर्घोषं दृढज्यमतिविक्षिपन् । व्यक्तं किष्कुपरीणाहं द्वादशारत्नि कार्मुकम् ॥

vāsavāśaninirghoṣaṃ dṛḍhajyamativikṣipan | vyaktaṃ kiṣkuparīṇāhaṃ dvādaśāratni kārmukam

वह इन्द्र के वज्र जैसी टंकार वाले, दृढ़ प्रत्यंचा से कसे अपने धनुष को खींच रहा था, जो स्पष्ट ही बारह अरत्नि लंबा और एक किष्कु के घेरे का था।

श्लोक 22 (7.176.22)

रथाक्षमात्रैइषुभिः सर्वाः प्रच्छादयन्दिशः । तस्यां वीरापहारिण्यां निशायां कर्णमभ्ययात् ॥

rathākṣamātraiiṣubhiḥ sarvāḥ pracchādayandiśaḥ | tasyāṃ vīrāpahāriṇyāṃ niśāyāṃ karṇamabhyayāt

रथ की धुरी के बराबर बाणों से सब दिशाओं को ढकता हुआ वह वीरों को हर लेने वाली उस रात में कर्ण की ओर बढ़ा।

श्लोक 23 (7.176.23)

तस्य विक्षिपतश्चापं रथे विष्टभ्य तिष्ठतः । अश्रूयत धनुर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥

tasya vikṣipataścāpaṃ rathe viṣṭabhya tiṣṭhataḥ | aśrūyata dhanurghoṣo visphūrjitamivāśaneḥ

रथ पर जमकर खड़े होकर जब वह धनुष खींच रहा था, तब उसके धनुष की टंकार वज्र के कड़कने जैसी सुनाई दी।

श्लोक 24 (7.176.24)

तेन वित्रास्यमानानि तव सैन्यानि भारत । समकम्पन्त सर्वाणि सिन्धोरिव महोर्मयः ॥

tena vitrāsyamānāni tava sainyāni bhārata | samakampanta sarvāṇi sindhoriva mahormayaḥ

भारत, उससे त्रस्त होकर तुम्हारी सारी सेनाएँ समुद्र की विशाल लहरों की तरह काँप उठीं।

श्लोक 25 (7.176.25)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य विरूपाक्षं विभीषणम् । उत्स्मयन्निव राधेयस्त्वरमाणोऽभ्यवारयत् ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya virūpākṣaṃ vibhīṣaṇam | utsmayanniva rādheyastvaramāṇo'bhyavārayat

उस भयंकर विरूपाक्ष को अपनी ओर आते देख राधा-पुत्र कर्ण ने मानो मुस्कराते हुए शीघ्रता से उसे रोक लिया।

श्लोक 26 (7.176.26)

ततः कर्णोऽभ्ययादेनमस्यन्नस्यन्तमन्तिकात् । मातङ्ग इव मातङ्गं यूथर्षभमिवर्षभः ॥

tataḥ karṇo'bhyayādenamasyannasyantamantikāt | mātaṅga iva mātaṅgaṃ yūtharṣabhamivarṣabhaḥ

तब कर्ण पास से ही बाण चलाते हुए उस पर टूट पड़ा जो स्वयं बाण चला रहा था, जैसे एक हाथी दूसरे हाथी पर या एक साँड़ झुंड के नायक साँड़ पर टूटता है।

श्लोक 27 (7.176.27)

स सन्निपातस्तुमुलस्तयोरासीद्विशाम्पते । कर्णराक्षसयो राजन्निन्द्रशम्बरयोरिव ॥

sa sannipātastumulastayorāsīdviśāmpate | karṇarākṣasayo rājannindraśambarayoriva

हे प्रजापालक, कर्ण और राक्षस की वह भिड़ंत इन्द्र और शम्बर की भिड़ंत के समान भयानक हुई।

श्लोक 28 (7.176.28)

तौ प्रगृह्य महावेगे धनुषी भीमनिःस्वने । प्राच्छादयेतामन्योन्यं तक्षमाणौ महेषुभिः ॥

tau pragṛhya mahāvege dhanuṣī bhīmaniḥsvane | prācchādayetāmanyonyaṃ takṣamāṇau maheṣubhiḥ

भयंकर टंकार करने वाले धनुषों को बड़े वेग से उठाकर वे दोनों बड़े-बड़े बाणों से एक-दूसरे को चीरते हुए ढकने लगे।

श्लोक 29 (7.176.29)

ततः पूर्णायतोत्सृष्टैरिषुभिर्नतपर्वभिः । न्यवारयेतामन्योन्यं कांस्ये निर्भिद्य वर्मणी ॥

tataḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairiṣubhirnataparvabhiḥ | nyavārayetāmanyonyaṃ kāṃsye nirbhidya varmaṇī

फिर पूरी तरह खींचकर छोड़े गए, झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से वे एक-दूसरे के काँसे के कवच को भेदते हुए एक-दूसरे को रोकते रहे।

श्लोक 30 (7.176.30)

तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ । रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्च ततक्षतुः ॥

tau nakhairiva śārdūlau dantairiva mahādvipau | rathaśaktibhiranyonyaṃ viśikhaiśca tatakṣatuḥ

जैसे दो बाघ नाखूनों से और दो महागज दाँतों से लड़ते हैं, वैसे ही वे रथ-शक्तियों और बाणों से एक-दूसरे को चीरते रहे।

श्लोक 31 (7.176.31)

सञ्छिन्दन्तौ च गात्राणि सन्दधानौ च सायकान् । दहन्तौ च शरोल्काभिर्दुष्प्रेक्ष्यौ च बभूवतुः ॥

sañchindantau ca gātrāṇi sandadhānau ca sāyakān | dahantau ca śarolkābhirduṣprekṣyau ca babhūvatuḥ

एक-दूसरे के अंग काटते, बाण चढ़ाते और बाणों की ज्वालाओं से जलाते हुए वे दोनों देखने में भी कठिन हो गए।

श्लोक 32 (7.176.32)

तौ तु विक्षतसर्वाङ्गौ रुधिरौघपरिप्लुतौ । विभ्राजेतां यथा वारि स्रवन्तौ गैरिकाचलौ ॥

tau tu vikṣatasarvāṅgau rudhiraughapariplutau | vibhrājetāṃ yathā vāri sravantau gairikācalau

सारे अंग घायल, रक्त की धाराओं में नहाए हुए वे दोनों ऐसे शोभित हुए जैसे जल बहाते हुए गेरू के दो पर्वत।

श्लोक 33 (7.176.33)

तौ शराग्रविनुन्नाङ्गौ निर्भिन्दन्तौ परस्परम् । नाकम्पयेतामन्योन्यं यतमानौ महाद्युती ॥

tau śarāgravinunnāṅgau nirbhindantau parasparam | nākampayetāmanyonyaṃ yatamānau mahādyutī

बाणों की नोकों से बिंधे हुए अंगों वाले वे दोनों तेजस्वी एक-दूसरे को बींधते हुए जूझते रहे, पर एक-दूसरे को डिगा न सके।

श्लोक 34 (7.176.34)

तत्प्रवृत्तं निशायुद्धं चिरं सममिवाभवत् । प्राणयोर्दीव्यतो राजन्कर्णराक्षसयोर्मृधे ॥

tatpravṛttaṃ niśāyuddhaṃ ciraṃ samamivābhavat | prāṇayordīvyato rājankarṇarākṣasayormṛdhe

राजन्, प्राणों की बाज़ी लगाए हुए कर्ण और राक्षस का वह रात्रि-युद्ध देर तक मानो बराबरी पर चलता रहा।

श्लोक 35 (7.176.35)

तस्य सन्दधतस्तीक्ष्णाञ्छरांश्चासक्तमस्यतः । धनुर्घोषेण वित्रस्ताः स्वे परे च तदाऽभवन् ॥

tasya sandadhatastīkṣṇāñcharāṃścāsaktamasyataḥ | dhanurghoṣeṇa vitrastāḥ sve pare ca tadā'bhavan

जब वह तीखे बाण चढ़ाकर बिना रुके छोड़ रहा था, तब उसके धनुष की टंकार से अपने और पराए सभी भयभीत हो उठे।

श्लोक 36 (7.176.36)

घटोत्कचं यदा कर्णो विशेषयति नो नृप । ततः प्रादुष्करोद्दिव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥

ghaṭotkacaṃ yadā karṇo viśeṣayati no nṛpa | tataḥ prāduṣkaroddivyamastramastravidāṃ varaḥ

राजन्, जब कर्ण घटोत्कच को पीछे न छोड़ सका, तब अस्त्र जानने वालों में श्रेष्ठ उसने एक दिव्य अस्त्र प्रकट किया।

श्लोक 37 (7.176.37)

कर्णेन सन्धितं दृष्ट्वा दिव्यमस्त्रं घटोत्कचः । प्रादुश्चक्रे महामायां राक्षसीं पाण्डुनन्दनः ॥

karṇena sandhitaṃ dṛṣṭvā divyamastraṃ ghaṭotkacaḥ | prāduścakre mahāmāyāṃ rākṣasīṃ pāṇḍunandanaḥ

कर्ण को दिव्य अस्त्र का सन्धान करते देख पाण्डव-कुमार घटोत्कच ने एक महान राक्षसी माया रची।

श्लोक 38 (7.176.38)

शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तया । रक्षसां घोररूपाणां महत्या सेनया वृतः ॥

śūlamudgaradhāriṇyā śailapādapahastayā | rakṣasāṃ ghorarūpāṇāṃ mahatyā senayā vṛtaḥ

वह भयंकर रूप वाले राक्षसों की एक विशाल सेना से घिरा था, जो हाथों में शूल, मुद्गर, शिलाएँ और वृक्ष लिए हुए थी।

श्लोक 39 (7.176.39)

तमुद्यतमहाचापं दृष्ट्वा ते व्यथिता नृपाः । भूतान्तकमिवायान्तं कालदण्डोग्रधारिणम् ॥

tamudyatamahācāpaṃ dṛṣṭvā te vyathitā nṛpāḥ | bhūtāntakamivāyāntaṃ kāladaṇḍogradhāriṇam

महान धनुष उठाए, कालदण्ड धारण किए प्राणान्तक यम की भाँति आते हुए उसे देखकर वे राजा व्यथित हो उठे।

श्लोक 40 (7.176.40)

घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः । प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ॥

ghaṭotkacaprayuktena siṃhanādena bhīṣitāḥ | prasusruvurgajā mūtraṃ vivyathuśca narā bhṛśam

घटोत्कच के छोड़े हुए सिंहनाद से डरकर हाथी मूत्र करने लगे और मनुष्य बहुत काँपने लगे।

श्लोक 41 (7.176.41)

ततोऽश्मवृष्टिरत्युग्रा महत्यासीत्समन्ततः । अर्धरात्रेऽधिकबलैर्विमुक्ता रक्षसां बलैः ॥

tato'śmavṛṣṭiratyugrā mahatyāsītsamantataḥ | ardharātre'dhikabalairvimuktā rakṣasāṃ balaiḥ

तब आधी रात को बलवान राक्षस-सेनाओं ने चारों ओर पत्थरों की अत्यन्त भयानक वर्षा कर दी।

श्लोक 42 (7.176.42)

आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः शक्तितोमराः । पतन्त्यविरलाः शूलाः शतघ्न्यः पट्टसास्तथा ॥

āyasāni ca cakrāṇi bhuśuṇḍyaḥ śaktitomarāḥ | patantyaviralāḥ śūlāḥ śataghnyaḥ paṭṭasāstathā

लोहे के चक्र, भुशुण्डी, शक्ति, तोमर, शूल, शतघ्नी और पट्टस लगातार, घने होकर गिरने लगे।

श्लोक 43 (7.176.43)

तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिप । पुत्राश्च तव योधाश्च व्यथिता विप्रदुद्रुवुः ॥

tadugramatiraudraṃ ca dṛṣṭvā yuddhaṃ narādhipa | putrāśca tava yodhāśca vyathitā vipradudruvuḥ

नरेश्वर, उस उग्र और अत्यन्त रौद्र युद्ध को देखकर तुम्हारे पुत्र और योद्धा व्याकुल होकर चारों ओर भाग खड़े हुए।

श्लोक 44 (7.176.44)

तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी कर्णो मानी न विव्यथे । व्यधमच्च शरैर्मायां तां घटोत्कचनिर्मिताम् ॥

tatraiko'strabalaślāghī karṇo mānī na vivyathe | vyadhamacca śarairmāyāṃ tāṃ ghaṭotkacanirmitām

वहाँ केवल अस्त्र-बल पर गर्व करने वाला अभिमानी कर्ण ही विचलित नहीं हुआ, और उसने घटोत्कच की रची उस माया को बाणों से नष्ट कर दिया।

श्लोक 45 (7.176.45)

मायायां तु प्रहीणायाममर्षाच्च घटोत्कचः । विससर्ज शरान्धोरान्सूतपुत्रं त आविशन् ॥

māyāyāṃ tu prahīṇāyāmamarṣācca ghaṭotkacaḥ | visasarja śarāndhorānsūtaputraṃ ta āviśan

माया नष्ट हो जाने पर क्रोध से घटोत्कच ने भयंकर बाण छोड़े, जो सूत-पुत्र के शरीर में घुस गए।

श्लोक 46 (7.176.46)

ततस्ते रुधिराभ्यक्ता भित्त्वा कर्णं महाहवे । विविशुर्धरणीं बाणाः सङ्क्रुद्धा इव पन्नगाः ॥

tataste rudhirābhyaktā bhittvā karṇaṃ mahāhave | viviśurdharaṇīṃ bāṇāḥ saṅkruddhā iva pannagāḥ

फिर रक्त से सने हुए वे बाण उस महायुद्ध में कर्ण को बींधकर कुपित सर्पों की तरह धरती में समा गए।

श्लोक 47 (7.176.47)

सूतपुत्रस्तु सङ्क्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् । घटोत्कचमतिक्रम्य बिभेद दशभिः शरैः ॥

sūtaputrastu saṅkruddho laghuhastaḥ pratāpavān | ghaṭotkacamatikramya bibheda daśabhiḥ śaraiḥ

परन्तु क्रुद्ध, फुर्तीले हाथों वाले और प्रतापी सूत-पुत्र ने घटोत्कच को पीछे छोड़कर उसे दस बाणों से बींध दिया।

श्लोक 48 (7.176.48)

घटोत्कचो विनिर्भिन्नः सूतपुत्रेण मर्मसु । चक्रं दिव्यं सहस्रारमगृह्णाद्व्यथितो भृशम् ॥

ghaṭotkaco vinirbhinnaḥ sūtaputreṇa marmasu | cakraṃ divyaṃ sahasrāramagṛhṇādvyathito bhṛśam

सूत-पुत्र के बाणों से मर्मस्थानों में बिंधा हुआ घटोत्कच अत्यन्त पीड़ित होकर सहस्र अरों वाला एक दिव्य चक्र उठा लाया।

श्लोक 49 (7.176.49)

क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिरत्नविभूषितम् । चिक्षेपाधिरथेः क्रुद्धो भैमसेनिर्जिघांसया ॥

kṣurāntaṃ bālasūryābhaṃ maṇiratnavibhūṣitam | cikṣepādhiratheḥ kruddho bhaimasenirjighāṃsayā

वह चक्र उस्तरे जैसी धार वाला, बाल सूर्य के समान दीप्त और मणि-रत्नों से सजा था; भीम के पुत्र ने क्रोध में भरकर अधिरथ-पुत्र को मारने की इच्छा से उसे फेंका।

श्लोक 50 (7.176.50)

प्रविद्धमतिवेगेन विक्षिप्तं कर्णसायकैः । अभाग्यस्येव सङ्कल्पस्तन्मोघमपतद्भुवि ॥

praviddhamativegena vikṣiptaṃ karṇasāyakaiḥ | abhāgyasyeva saṅkalpastanmoghamapatadbhuvi

अत्यन्त वेग से फेंका गया वह चक्र कर्ण के बाणों से इधर-उधर हटा दिया गया और अभागे मनुष्य के संकल्प की तरह व्यर्थ होकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 51 (7.176.51)

घटोत्कचस्तु सङ्क्रुद्धो दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् । कर्णं प्राच्छादयद्बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥

ghaṭotkacastu saṅkruddho dṛṣṭvā cakraṃ nipātitam | karṇaṃ prācchādayadbāṇaiḥ svarbhānuriva bhāskaram

चक्र को गिरा देखकर क्रोधित घटोत्कच ने कर्ण को बाणों से ऐसे ढक दिया जैसे राहु सूर्य को ढक लेता है।

श्लोक 52 (7.176.52)

सूतपुत्रस्त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः । घटोत्कचरथं तूर्णं छादयामास पत्रिभिः ॥

sūtaputrastvasambhrānto rudropendrendravikramaḥ | ghaṭotkacarathaṃ tūrṇaṃ chādayāmāsa patribhiḥ

रुद्र, विष्णु और इन्द्र के समान पराक्रमी सूत-पुत्र ने बिना घबराए पंखदार बाणों से घटोत्कच के रथ को तुरन्त ढक दिया।

श्लोक 53 (7.176.53)

घटोत्कचेन क्रुद्धेन गदा हेमाङ्गदा तदा । क्षिप्ता भ्राम्य शरैः साऽपि कर्णेनाभ्याहताऽपतत् ॥

ghaṭotkacena kruddhena gadā hemāṅgadā tadā | kṣiptā bhrāmya śaraiḥ sā'pi karṇenābhyāhatā'patat

क्रुद्ध घटोत्कच ने सोने के अंगद वाली एक गदा घुमाकर फेंकी, पर कर्ण के बाणों से टकराकर वह भी गिर पड़ी।

श्लोक 54 (7.176.54)

ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य कालमेघ इवोन्नदन् । प्रववर्ष महाकायो द्रुमवर्षं नभस्तलात् ॥

tato'ntarikṣamutpatya kālamegha ivonnadan | pravavarṣa mahākāyo drumavarṣaṃ nabhastalāt

तब वह विशालकाय आकाश में उछलकर काले मेघ की तरह गरजता हुआ आसमान से वृक्षों की वर्षा करने लगा।

श्लोक 55 (7.176.55)

ततो मायाविनं कर्णो भीमसेनसुतं दिवि । मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ॥

tato māyāvinaṃ karṇo bhīmasenasutaṃ divi | mārgaṇairabhivivyādha ghanaṃ sūrya ivāṃśubhiḥ

तब कर्ण ने आकाश में स्थित उस मायावी भीमसेन-पुत्र को वैसे ही बाणों से बींध दिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से बादल को बींधता है।

श्लोक 56 (7.176.56)

तस्य सर्वान्हयान्हत्वा सञ्छिद्य शतधा रथम् । अभ्यवर्षच्छरैः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥

tasya sarvānhayānhatvā sañchidya śatadhā ratham | abhyavarṣaccharaiḥ karṇaḥ parjanya iva vṛṣṭimān

उसके सब घोड़ों को मारकर और रथ के सौ टुकड़े करके कर्ण उस पर वर्षा करने वाले मेघ की तरह बाणों की वर्षा करने लगा।

श्लोक 57 (7.176.57)

न चास्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् । सोऽदृश्यत मुहूर्तेन श्वाविच्छललितो यथा ॥

na cāsyāsīdanirbhinnaṃ gātre dvyaṅgulamantaram | so'dṛśyata muhūrtena śvāvicchalalito yathā

उसके शरीर में दो अंगुल का भी स्थान बिंधे बिना नहीं बचा; क्षण भर के लिए वह काँटों से भरे साही जैसा दिखाई दिया।

श्लोक 58 (7.176.58)

न हयान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम् । दृष्टवन्तः स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम् ॥

na hayānna rathaṃ tasya na dhvajaṃ na ghaṭotkacam | dṛṣṭavantaḥ sma samare śaraughairabhisaṃvṛtam

बाणों की बौछारों से ढके होने के कारण उस युद्ध में हमें न घोड़े दिखे, न रथ, न ध्वज और न स्वयं घटोत्कच।

श्लोक 59 (7.176.59)

स तु कर्णस्य तद्दिव्यमस्त्रमस्त्रेण शातयन् । मायायुद्धेन मायावी सूतपुत्रमयोधयत् ॥

sa tu karṇasya taddivyamastramastreṇa śātayan | māyāyuddhena māyāvī sūtaputramayodhayat

परन्तु उस मायावी ने कर्ण के उस दिव्य अस्त्र को अपने अस्त्र से नष्ट करते हुए माया-युद्ध द्वारा सूत-पुत्र से युद्ध किया।

श्लोक 60 (7.176.60)

सोऽयोधयत्तदा कर्णं मायया लाघवेन च । अलक्ष्यमाणानि दिवि शरजालानि चापतन् ॥

so'yodhayattadā karṇaṃ māyayā lāghavena ca | alakṣyamāṇāni divi śarajālāni cāpatan

वह माया और फुर्ती से कर्ण से लड़ता रहा, और आकाश से अदृश्य बाणों के झुंड गिरते रहे।

श्लोक 61 (7.176.61)

भैमसेनिर्महामायो मायया कुरुसत्तम । विचचार महाकायो मोहयन्निव भारत ॥

bhaimasenirmahāmāyo māyayā kurusattama | vicacāra mahākāyo mohayanniva bhārata

कुरुश्रेष्ठ, भारत, वह महामायावी भीम-पुत्र विशाल शरीर लिए अपनी माया से मानो सबको मोहित करता हुआ घूमता रहा।

श्लोक 62 (7.176.62)

स तु कृत्वा विरूपाणि वदनान्यशुभानि च । अग्रसत्सूतपुत्रस्य दिव्यान्यस्त्राणि मायया ॥

sa tu kṛtvā virūpāṇi vadanānyaśubhāni ca | agrasatsūtaputrasya divyānyastrāṇi māyayā

भयानक और अशुभ मुख बनाकर उसने अपनी माया से सूत-पुत्र के दिव्य अस्त्रों को निगल लिया।

श्लोक 63 (7.176.63)

पुनश्चापि महाकायः सञ्छिन्नः शतधा रणे । गतसत्वो निरुत्साहः पतितः खाद्व्यदृश्यत ॥

punaścāpi mahākāyaḥ sañchinnaḥ śatadhā raṇe | gatasatvo nirutsāhaḥ patitaḥ khādvyadṛśyata

फिर वह विशालकाय युद्ध में सौ टुकड़ों में कटा हुआ, प्राणहीन और उत्साहहीन होकर आकाश से गिरता दिखाई दिया।

श्लोक 64 (7.176.64)

तं हतं मन्यमानाः स्म प्राणदन्कुरुपुङ्गवाः । अथ देहैर्नवैरन्यैर्दिक्षु सर्वास्वदृश्यत ॥

taṃ hataṃ manyamānāḥ sma prāṇadankurupuṅgavāḥ | atha dehairnavairanyairdikṣu sarvāsvadṛśyata

उसे मरा हुआ मानकर कुरुवंश के प्रमुख वीर चिल्ला उठे; तभी वह सब दिशाओं में नए-नए दूसरे शरीरों में दिखाई देने लगा।

श्लोक 65 (7.176.65)

पुनश्चापि महाकायः शतशीर्षः शतोदरः । व्यदृश्यत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः ॥

punaścāpi mahākāyaḥ śataśīrṣaḥ śatodaraḥ | vyadṛśyata mahābāhurmaināka iva parvataḥ

फिर वह विशालकाय, सौ सिर और सौ पेट वाला महाबाहु मैनाक पर्वत के समान दिखाई दिया।

श्लोक 66 (7.176.66)

अङ्गुष्ठमात्रो भूत्वा च पुनरेव स राक्षसः । सागरोर्मिरिवोद्धूतस्तिर्यगूर्ध्वमवर्तत ॥

aṅguṣṭhamātro bhūtvā ca punareva sa rākṣasaḥ | sāgarormirivoddhūtastiryagūrdhvamavartata

फिर अँगूठे भर का होकर वही राक्षस समुद्र की लहर की तरह उठकर तिरछा और ऊपर की ओर घूमने लगा।

श्लोक 67 (7.176.67)

वसुधां दारयित्वा च पुनरप्सु न्यमज्जत । अदृश्यत तदा तत्र पुनरुन्मज्जितोऽन्यतः ॥

vasudhāṃ dārayitvā ca punarapsu nyamajjata | adṛśyata tadā tatra punarunmajjito'nyataḥ

पृथ्वी को चीरकर वह फिर जल में डूब गया और तब दूसरी जगह फिर निकलता हुआ दिखाई दिया।

श्लोक 68 (7.176.68)

सोऽवतीर्य पुनस्तस्थौ रथे हेमपरिष्कृते । क्षितिं खं च दिशश्चैव माययाऽभ्येत्य दंशितः ॥

so'vatīrya punastasthau rathe hemapariṣkṛte | kṣitiṃ khaṃ ca diśaścaiva māyayā'bhyetya daṃśitaḥ

बाहर निकलकर वह माया से पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को भरकर कवच पहने हुए फिर सोने से सजे रथ पर आ खड़ा हुआ।

श्लोक 69 (7.176.69)

गत्वा कर्णरथाभ्याशं व्यचरत्कुण्डलाननः । प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं विशाम्पते ॥

gatvā karṇarathābhyāśaṃ vyacaratkuṇḍalānanaḥ | prāha vākyamasambhrāntaḥ sūtaputraṃ viśāmpate

हे प्रजापालक, कर्ण के रथ के पास जाकर, मुख पर कुण्डल हिलाता हुआ वह निर्भय होकर सूत-पुत्र से बोला।

घटोत्कच उवाच

श्लोक 70 (7.176.70)

तिष्ठेदानीं क्व मे जीवन्सूतपुत्र गमिष्यसि । युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ॥

tiṣṭhedānīṃ kva me jīvansūtaputra gamiṣyasi | yuddhaśraddhāmahaṃ te'dya vineṣyāmi raṇājire

"सूत-पुत्र, अब ठहर! जीता-जागता मेरे हाथ से कहाँ जाएगा? इस रणभूमि में आज मैं तेरी युद्ध की लालसा मिटा दूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 71 (7.176.71)

इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षं रक्षः क्रूरपराक्रमम् । उत्पपातान्तरिक्षं च जहास च सुविस्तरम् । कर्णमभ्यहनच्चैव गजेन्द्रमिव केसरी ॥

ityuktvā roṣatāmrākṣaṃ rakṣaḥ krūraparākramam | utpapātāntarikṣaṃ ca jahāsa ca suvistaram | karṇamabhyahanaccaiva gajendramiva kesarī

यह कहकर क्रोध से आँखें लाल किए हुए उस क्रूर पराक्रमी राक्षस ने आकाश में उछलकर बहुत देर तक ठहाका लगाया और कर्ण पर वैसे ही प्रहार किया जैसे सिंह गजराज पर करता है।

श्लोक 72 (7.176.72)

रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद्धटोत्कचः । रथिनामृषभं कर्णं धाराभिरिव तोयदः ॥

rathākṣamātrairiṣubhirabhyavarṣaddhaṭotkacaḥ | rathināmṛṣabhaṃ karṇaṃ dhārābhiriva toyadaḥ

घटोत्कच ने रथियों में श्रेष्ठ कर्ण पर रथ की धुरी के बराबर लंबे बाणों की वैसी ही वर्षा की जैसे बादल धाराओं से बरसता है।

श्लोक 73 (7.176.73)

शरवृष्टिं च तां कर्णो दूरात्प्राप्तामशातयत् ॥

śaravṛṣṭiṃ ca tāṃ karṇo dūrātprāptāmaśātayat

परन्तु कर्ण ने दूर से आई हुई उस बाण-वर्षा को काट डाला।

श्लोक 74 (7.176.74)

दृष्ट्वा च विहतां मायां कर्णेन भरतर्षभ । घटोत्कचस्ततो मायां ससर्जान्तर्हितः पुनः ॥

dṛṣṭvā ca vihatāṃ māyāṃ karṇena bharatarṣabha | ghaṭotkacastato māyāṃ sasarjāntarhitaḥ punaḥ

भरतश्रेष्ठ, कर्ण द्वारा अपनी माया को नष्ट हुआ देख घटोत्कच अदृश्य हो गया और उसने फिर एक और माया रची।

श्लोक 75 (7.176.75)

सोऽभवद्गिरिरत्युच्चः शिखरैस्तरुसङ्कटैः । शूलप्रासासिमुसलजलप्रस्रवणो महान् ॥

so'bhavadgiriratyuccaḥ śikharaistarusaṅkaṭaiḥ | śūlaprāsāsimusalajalaprasravaṇo mahān

वह वृक्षों से घिरे शिखरों वाला अत्यन्त ऊँचा पर्वत बन गया, जिससे शूल, प्रास, तलवारें और मूसल झरनों की तरह बह रहे थे।

श्लोक 76 (7.176.76)

तमञ्जनचयप्रख्यं कर्णो दृष्ट्वा महीधरम् । प्रपातैरायुधान्युग्राण्युद्वहन्तं न चुक्षुभे ॥

tamañjanacayaprakhyaṃ karṇo dṛṣṭvā mahīdharam | prapātairāyudhānyugrāṇyudvahantaṃ na cukṣubhe

काजल के ढेर जैसे उस काले पर्वत को, जो अपने प्रपातों में भयंकर आयुध बहा रहा था, देखकर कर्ण विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 77 (7.176.77)

स्मयन्निव ततः कर्णो दिव्यमस्त्रमुदैरयत् । ततः सोऽस्रेण शैलेन्द्रो विक्षिप्तो वै व्यनश्यत ॥

smayanniva tataḥ karṇo divyamastramudairayat | tataḥ so'sreṇa śailendro vikṣipto vai vyanaśyata

तब मुस्कराते हुए कर्ण ने एक दिव्य अस्त्र चलाया, और उस अस्त्र से वह शैलराज छिन्न-भिन्न होकर लुप्त हो गया।

श्लोक 78 (7.176.78)

ततः स तोयदो भूत्वा नीलः सेन्द्रायुधो दिवि । अश्मवृष्टिभिरत्युग्रः सूतपुत्रमवाकिरत् ॥

tataḥ sa toyado bhūtvā nīlaḥ sendrāyudho divi | aśmavṛṣṭibhiratyugraḥ sūtaputramavākirat

फिर वह आकाश में इन्द्रधनुष सहित काला मेघ बन गया और अत्यन्त उग्र होकर पत्थरों की वर्षा से सूत-पुत्र को ढकने लगा।

श्लोक 79 (7.176.79)

अथ सन्धाय वायव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः । व्यधमत्कालमेघं तं कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥

atha sandhāya vāyavyamastramastravidāṃ varaḥ | vyadhamatkālameghaṃ taṃ karṇo vaikartano vṛṣaḥ

तब अस्त्र जानने वालों में श्रेष्ठ वृष नामक वैकर्तन कर्ण ने वायव्य अस्त्र का सन्धान कर उस काले मेघ को उड़ा दिया।

श्लोक 80 (7.176.80)

स मार्गणगणैः कर्णो दिशः प्रच्छाद्य सर्वशः । जघानास्त्रं महाराज घटोत्कचसमीरितम् ॥

sa mārgaṇagaṇaiḥ karṇo diśaḥ pracchādya sarvaśaḥ | jaghānāstraṃ mahārāja ghaṭotkacasamīritam

महाराज, कर्ण ने बाणों के समूहों से सब दिशाओं को ढककर घटोत्कच द्वारा चलाए गए अस्त्र को नष्ट कर दिया।

श्लोक 81 (7.176.81)

ततः प्रहस्य समरे भैमसेनिर्महाबलः । प्रादुश्चक्रे महामायां कर्णं प्रति महारथम् ॥

tataḥ prahasya samare bhaimasenirmahābalaḥ | prāduścakre mahāmāyāṃ karṇaṃ prati mahāratham

तब युद्ध में हँसकर महाबली भीमसेन-पुत्र ने महारथी कर्ण पर एक बड़ी माया प्रकट की।

श्लोक 82 (7.176.82)

स दृष्ट्वा पुनरायान्तं रथेन रथिनां वरम् । घटोत्कचमसम्भ्रान्तं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥

sa dṛṣṭvā punarāyāntaṃ rathena rathināṃ varam | ghaṭotkacamasambhrāntaṃ rākṣasairbahubhirvṛtam

रथियों में श्रेष्ठ घटोत्कच को, जो अनेक राक्षसों से घिरा हुआ और निर्भय था, रथ पर फिर आते देखकर —

श्लोक 83 (7.176.83)

सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तमातङ्गविक्रमैः । गजस्थैश्च रथस्थैश्च वाजिपृष्ठगतैस्तथा । नानाशस्त्रधरैर्घोरैर्नानाकवचभूषणैः ॥

siṃhaśārdūlasadṛśairmattamātaṅgavikramaiḥ | gajasthaiśca rathasthaiśca vājipṛṣṭhagataistathā | nānāśastradharairghorairnānākavacabhūṣaṇaiḥ

जो राक्षस सिंहों और बाघों जैसे थे, मतवाले हाथियों जैसे पराक्रमी थे, हाथियों, रथों और घोड़ों की पीठ पर सवार थे, नाना प्रकार के शस्त्र धारण किए थे, भयंकर थे और भाँति-भाँति के कवच-आभूषणों से सजे थे —

श्लोक 84 (7.176.84)

वृतं घटोत्कचं क्रूरैर्मरुद्भिरिव वासवम् । दृष्ट्वा कर्णो महेष्वासो योधयामास राक्षसम् ॥

vṛtaṃ ghaṭotkacaṃ krūrairmarudbhiriva vāsavam | dṛṣṭvā karṇo maheṣvāso yodhayāmāsa rākṣasam

इन्द्र को मरुद्गण की भाँति उन क्रूर राक्षसों से घिरे हुए घटोत्कच को देखकर महाधनुर्धर कर्ण उस राक्षस से लड़ने लगा।

श्लोक 85 (7.176.85)

घटोत्कचस्ततः कर्णं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः । ननाद भैरवं नादं भीषयन्सर्वपार्थिवान् ॥

ghaṭotkacastataḥ karṇaṃ viddhvā pañcabhirāśugaiḥ | nanāda bhairavaṃ nādaṃ bhīṣayansarvapārthivān

तब घटोत्कच ने कर्ण को पाँच शीघ्रगामी बाणों से बींधकर भयंकर गर्जना की और सब राजाओं को भयभीत कर दिया।

श्लोक 86 (7.176.86)

भूयश्चाञ्जलिकेनाथ समार्गणगणं महत् । कर्णहस्तस्थितं चापं चिच्छेदाशु घटोत्कचः ॥

bhūyaścāñjalikenātha samārgaṇagaṇaṃ mahat | karṇahastasthitaṃ cāpaṃ cicchedāśu ghaṭotkacaḥ

फिर घटोत्कच ने अञ्जलिक बाण से कर्ण के हाथ में स्थित उस बड़े धनुष को उसके बाण-समूह सहित तुरन्त काट डाला।

श्लोक 87 (7.176.87)

अथान्यद्धनुरादाय दृढं भारसहं महत् । विचकर्ष बलात्कर्ण इन्द्रायुधमिवोच्छ्रितम् ॥

athānyaddhanurādāya dṛḍhaṃ bhārasahaṃ mahat | vicakarṣa balātkarṇa indrāyudhamivocchritam

कर्ण ने दूसरा दृढ़ और भारी तनाव सह सकने वाला बड़ा धनुष लेकर उसे बल से खींचा, मानो इन्द्रधनुष ऊँचा तान दिया हो।

श्लोक 88 (7.176.88)

ततः कर्णो महाराज प्रेषयामास सायकान् । सुवर्णपुङ्खाञ्छत्रुघ्नान्खेचरान्राक्षसान्प्रति ॥

tataḥ karṇo mahārāja preṣayāmāsa sāyakān | suvarṇapuṅkhāñchatrughnānkhecarānrākṣasānprati

महाराज, तब कर्ण ने आकाशचारी राक्षसों पर सोने के पंखों वाले, शत्रुओं को मारने वाले बाण छोड़े।

श्लोक 89 (7.176.89)

तद्बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहेनेवार्दितं वन्यं गजानामाकुलं कुलम् ॥

tadbāṇairarditaṃ yūthaṃ rakṣasāṃ pīnavakṣasām | siṃhenevārditaṃ vanyaṃ gajānāmākulaṃ kulam

उन बाणों से पीड़ित चौड़ी छाती वाले राक्षसों का झुंड सिंह से सताए हुए जंगली हाथियों के घबराए दल जैसा हो गया।

श्लोक 90 (7.176.90)

विधम्य राक्षसान्बाणैः साश्वसूतगजान्विभुः । ददाह भगवान्वह्निर्भूतानीव युगक्षये ॥

vidhamya rākṣasānbāṇaiḥ sāśvasūtagajānvibhuḥ | dadāha bhagavānvahnirbhūtānīva yugakṣaye

उस प्रतापी ने घोड़ों, सारथियों और हाथियों सहित राक्षसों को बाणों से तितर-बितर करके उन्हें वैसे ही जला डाला जैसे युग के अन्त में भगवान अग्नि सब प्राणियों को जला देते हैं।

श्लोक 91 (7.176.91)

स हत्वा राक्षसीं सेनां शुशुभे सूतनन्दनः । पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ॥

sa hatvā rākṣasīṃ senāṃ śuśubhe sūtanandanaḥ | pureva tripuraṃ dagdhvā divi devo maheśvaraḥ

राक्षसी सेना का संहार कर सूत-पुत्र उसी प्रकार शोभित हुआ जैसे पूर्वकाल में आकाश में त्रिपुर को भस्म करके देव महेश्वर शोभित हुए थे।

श्लोक 92 (7.176.92)

तेषु राजसहस्रेषु पाण्डवेयेषु मारिष । नैनं निरीक्षितुमपि कश्चिच्छक्नोति पार्थिव ॥

teṣu rājasahasreṣu pāṇḍaveyeṣu māriṣa | nainaṃ nirīkṣitumapi kaścicchaknoti pārthiva

हे माननीय, उन सहस्रों पाण्डव-पक्ष के राजाओं में से कोई उसकी ओर देख भी नहीं सकता था, हे राजन्,

श्लोक 93 (7.176.93)

ऋते घटोत्कचाद्राजन्राक्षसेन्द्रान्महाबलात् । भीमवीर्यबलोपेतात्क्रुद्धाद्वैवस्वतादिव ॥

ṛte ghaṭotkacādrājanrākṣasendrānmahābalāt | bhīmavīryabalopetātkruddhādvaivasvatādiva

सिवा महाबली राक्षसराज घटोत्कच के, जो भीम के पराक्रम और बल से युक्त था और क्रोध में यमराज जैसा हो गया था।

श्लोक 94 (7.176.94)

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां पावकः समजायत । महोल्काभ्यां यथा राजन्सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥

tasya kruddhasya netrābhyāṃ pāvakaḥ samajāyata | maholkābhyāṃ yathā rājansārciṣaḥ snehabindavaḥ

राजन्, क्रोध से भरे उस घटोत्कच की आँखों से आग निकली, जैसे दो बड़ी मशालों से लपट के साथ तेल की बूँदें टपकती हैं।

श्लोक 95 (7.176.95)

तलं तलेन संहत्य सन्दश्य दशनच्छदम् । रथमास्थाय च पुनर्मायया निर्मितं तदा ॥

talaṃ talena saṃhatya sandaśya daśanacchadam | rathamāsthāya ca punarmāyayā nirmitaṃ tadā

हथेली पर हथेली पटककर और होंठ चबाकर वह माया से रचे हुए रथ पर फिर आ बैठा,

श्लोक 96 (7.176.96)

युक्तं गजनिभैर्वाहैः पिशाचवदनैः खरैः । स सूतमब्रवीत्क्रुद्धः सूतपुत्राय मां वह ॥

yuktaṃ gajanibhairvāhaiḥ piśācavadanaiḥ kharaiḥ | sa sūtamabravītkruddhaḥ sūtaputrāya māṃ vaha

जिसमें हाथियों जैसे विशाल, पिशाचों जैसे मुखों वाले गधे जुते थे; और उसने क्रोध में सारथि से कहा, "मुझे सूत-पुत्र के पास ले चल।"

श्लोक 97 (7.176.97)

स ययौ घोररूपेण रथेन रथिनां वरः । द्वैरथं सूतपुत्रेण पुनरेव विशाम्पते ॥

sa yayau ghorarūpeṇa rathena rathināṃ varaḥ | dvairathaṃ sūtaputreṇa punareva viśāmpate

हे प्रजापालक, रथियों में श्रेष्ठ वह राक्षस अपने भयानक रथ पर सूत-पुत्र के साथ फिर रथ-युद्ध करने चल पड़ा।

श्लोक 98 (7.176.98)

स चिक्षेप पुनः क्रुद्धः सूतपुत्राय राक्षसः । अष्टचक्रां महाघोरामशनिं रुद्रनिर्मिताम् ॥

sa cikṣepa punaḥ kruddhaḥ sūtaputrāya rākṣasaḥ | aṣṭacakrāṃ mahāghorāmaśaniṃ rudranirmitām

क्रुद्ध राक्षस ने सूत-पुत्र पर रुद्र की बनाई हुई अत्यन्त भयंकर, आठ पहियों वाली एक अशनि फेंकी,

श्लोक 99 (7.176.99)

द्वियोजनसमुत्सेधां योजनायामविस्तराम् । आयसीं निचितां शूलैः कदम्बमिव केशरैः ॥

dviyojanasamutsedhāṃ yojanāyāmavistarām | āyasīṃ nicitāṃ śūlaiḥ kadambamiva keśaraiḥ

जो दो योजन ऊँची और एक योजन लंबी-चौड़ी थी, लोहे की बनी थी और कदम्ब के फूल पर केसरों की तरह शूलों से भरी थी।

श्लोक 100 (7.176.100)

तामवप्लुत्य जग्राह कर्णो न्यस्य महद्धनुः । चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात्सोऽवपुप्लुवे ॥

tāmavaplutya jagrāha karṇo nyasya mahaddhanuḥ | cikṣepa caināṃ tasyaiva syandanātso'vapupluve

कर्ण ने अपना बड़ा धनुष रख दिया, उछलकर उसे पकड़ लिया और उसी के रथ पर वापस फेंक दिया; घटोत्कच रथ से कूद गया।

श्लोक 101 (7.176.101)

साश्वसूतध्वजं यानं भस्म कृत्वा महाप्रभा । विवेश वसुधां भित्त्वा सुरास्तत्र विसिस्मियुः ॥

sāśvasūtadhvajaṃ yānaṃ bhasma kṛtvā mahāprabhā | viveśa vasudhāṃ bhittvā surāstatra visismiyuḥ

घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित उस रथ को राख करके वह महातेज धरती को फाड़कर उसमें घुस गया; वहाँ देवता चकित रह गए।

श्लोक 102 (7.176.102)

कर्णं तु सर्वभूतानि पूजयामासुरञ्जसा । यदवप्लुत्य जग्राह देवसृष्टां महाशनिम् ॥

karṇaṃ tu sarvabhūtāni pūjayāmāsurañjasā | yadavaplutya jagrāha devasṛṣṭāṃ mahāśanim

सब प्राणियों ने तुरन्त कर्ण का सम्मान किया, क्योंकि उसने उछलकर देवताओं की रची हुई उस महान अशनि को पकड़ लिया था।

श्लोक 103 (7.176.103)

एवं कृत्वा रणे कर्ण आरुरोह रथं पुनः । ततो मुमोच नाराचान्सूतपुत्रः परन्तपः ॥

evaṃ kṛtvā raṇe karṇa āruroha rathaṃ punaḥ | tato mumoca nārācānsūtaputraḥ parantapaḥ

युद्ध में यह करके कर्ण फिर रथ पर चढ़ गया, और तब शत्रुओं को तपाने वाले सूत-पुत्र ने नाराच बाण छोड़े।

श्लोक 104 (7.176.104)

अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु मानद । यदकार्षीत्तदा कर्णः सङ्ग्रामे भीमदर्शने ॥

aśakyaṃ kartumanyena sarvabhūteṣu mānada | yadakārṣīttadā karṇaḥ saṅgrāme bhīmadarśane

हे मान देने वाले, उस भयानक युद्ध में कर्ण ने तब जो किया, वह समस्त प्राणियों में और कोई नहीं कर सकता था।

श्लोक 105 (7.176.105)

स हन्यमानो नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतः । गन्धर्वनगराकारः पुनरन्तरधीयत ॥

sa hanyamāno nārācairdhārābhiriva parvataḥ | gandharvanagarākāraḥ punarantaradhīyata

नाराचों की धाराओं से पर्वत की भाँति बिंधता हुआ वह गन्धर्वनगर का रूप धरकर फिर अदृश्य हो गया।

श्लोक 106 (7.176.106)

एवं स वै महाकायो मायया लाघवेन च । अस्त्राणि तानि दिव्यानि जघान रिपुसूदनः ॥

evaṃ sa vai mahākāyo māyayā lāghavena ca | astrāṇi tāni divyāni jaghāna ripusūdanaḥ

इस प्रकार शत्रुओं का संहार करने वाले उस विशालकाय घटोत्कच ने माया और फुर्ती से उन दिव्य अस्त्रों को नष्ट कर दिया।

श्लोक 107 (7.176.107)

निहन्यमानेष्वस्त्रेषु मायया तेन रक्षसा । असम्भ्रान्तस्तदा कर्णस्तद्रक्षः प्रत्ययुध्यत ॥

nihanyamāneṣvastreṣu māyayā tena rakṣasā | asambhrāntastadā karṇastadrakṣaḥ pratyayudhyata

उस राक्षस की माया से अस्त्रों के नष्ट होते रहने पर भी कर्ण निर्भय होकर उस राक्षस से लड़ता रहा।

श्लोक 108 (7.176.108)

ततः क्रुद्धो महाराज भैमसेनिर्महाबलः । चकार बहुधाऽऽत्मानं भीषयाणो महारथान् ॥

tataḥ kruddho mahārāja bhaimasenirmahābalaḥ | cakāra bahudhā''tmānaṃ bhīṣayāṇo mahārathān

महाराज, तब क्रुद्ध होकर महाबली भीमसेन-पुत्र ने महारथियों को डराते हुए अपने को अनेक रूपों में बाँट लिया।

श्लोक 109 (7.176.109)

ततो दिग्भ्यः समापेतुः सिंहव्याघ्रतरक्षवः । अग्निजिह्वाश्च भुजगा विहगाश्चाप्ययोमुखाः ॥

tato digbhyaḥ samāpetuḥ siṃhavyāghratarakṣavaḥ | agnijihvāśca bhujagā vihagāścāpyayomukhāḥ

तब चारों दिशाओं से सिंह, बाघ, तरक्षु, अग्नि-जैसी जीभ वाले सर्प और लोहे की चोंच वाले पक्षी टूट पड़े।

श्लोक 110 (7.176.110)

स कीर्यमाणो विशिखैः कर्णचापच्युतैः शरैः । नागराडिव दुष्प्रेक्ष्यस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

sa kīryamāṇo viśikhaiḥ karṇacāpacyutaiḥ śaraiḥ | nāgarāḍiva duṣprekṣyastatraivāntaradhīyata

कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से बिंधता हुआ वह नागराज की तरह दुर्दर्श रूप में वहीं अदृश्य हो गया।

श्लोक 111 (7.176.111)

राक्षसाश्च पिशाचाश्च यातुधानास्तथैव च । शालावृकाश्च बहवो वृकाश्च विकृताननाः ॥

rākṣasāśca piśācāśca yātudhānāstathaiva ca | śālāvṛkāśca bahavo vṛkāśca vikṛtānanāḥ

राक्षस, पिशाच, यातुधान, शृगाल और विकृत मुखों वाले अनेक भेड़िये —

श्लोक 112 (7.176.112)

ते कर्णं क्षपयिष्यन्तः सर्वतः समुपाद्रवन् । अथैनं वाग्भिरुग्राभिस्त्रासयाञ्चिक्रिरे तदा ॥

te karṇaṃ kṣapayiṣyantaḥ sarvataḥ samupādravan | athainaṃ vāgbhirugrābhistrāsayāñcikrire tadā

उसे नष्ट करने की इच्छा से चारों ओर से कर्ण पर टूट पड़े; और तब उन्होंने उग्र वचनों से उसे डराने की चेष्टा की।

श्लोक 113 (7.176.113)

उद्यतैर्बहुभिर्घोरैरायुधैः शोणितोक्षितैः । तेषामनेकैरेकैकं कर्णो विव्याध सायकैः ॥

udyatairbahubhirghorairāyudhaiḥ śoṇitokṣitaiḥ | teṣāmanekairekaikaṃ karṇo vivyādha sāyakaiḥ

रक्त से भीगे हुए अनेक भयंकर शस्त्र उठाए हुए वे आए; और कर्ण ने उनमें से हर एक को कई बाणों से बींध दिया।

श्लोक 114 (7.176.114)

प्रतिहत्य तु तां मायां दिव्येनास्त्रेण राक्षसीम् । आजघान हयानस्य शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

pratihatya tu tāṃ māyāṃ divyenāstreṇa rākṣasīm | ājaghāna hayānasya śaraiḥ sannataparvabhiḥ

उस राक्षसी माया को दिव्य अस्त्र से नष्ट करके उसने झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उसके घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 115 (7.176.115)

ते भग्ना विक्षताङ्गाश्च भिन्नपृष्ठाश्च सायकैः । वसुधामन्वपद्यन्त पश्यतस्तस्य रक्षसः ॥

te bhagnā vikṣatāṅgāśca bhinnapṛṣṭhāśca sāyakaiḥ | vasudhāmanvapadyanta paśyatastasya rakṣasaḥ

बाणों से टूटे, घायल अंगों और फटी पीठ वाले वे उस राक्षस के देखते-देखते धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 116 (7.176.116)

स भग्नमायो हैडिम्बिः कर्णं वैकर्तनं तदा । एष ते विदधे मृत्युमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥

sa bhagnamāyo haiḍimbiḥ karṇaṃ vaikartanaṃ tadā | eṣa te vidadhe mṛtyumityuktvāntaradhīyata

माया के टूट जाने पर हिडिम्बा-पुत्र घटोत्कच ने वैकर्तन कर्ण से, "लो, मैं तेरी मृत्यु का विधान करता हूँ," यह कहा और अदृश्य हो गया।

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